कहाँ गईं सारंडा की तितलियाँ...

Submitted by Hindi on Sat, 06/10/2017 - 11:10
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Source
‘और कितना वक्त चाहिए झारखंड को?’ वार्षिकी, दैनिक जागरण, 2013

झारखंड में जंगल ही जीवन का दर्शन है। विकास प्रक्रिया में जंगल और मनुष्य के बीच एक अनमोल रिश्ते की शुरुआत हुई, जिसकी हम अवहेलना नहीं कर सकते। साँस लेने से लेकर, वर्षा, भोजन, आशियाना सब जंगल की ही मेहरबानी है। दुनिया भर में मशीनी इतिहास के प्रारम्भ की कहानी भी जंगलों से ही शुरू होती है। यदि आप विदेशी हैं या शहरी देशवासी जिन्हें पूँजीवादी सोच के साथ आर्थिक विकास की दौड़ में शामिल होने की इच्छा है और केवल दिल्ली, मुम्बई जैसे शहरों तक घूमे हैं, तो मुमकिन है आप इस देश को विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आराम से रख देंगे। जैसा कि पिछले दिनों ओबामा ने भी माना। कभी साँप, बाघ और जंगलों के लिये मशहूर भारत में आज जंगल शब्द के मायने ही बदल गए हैं। और जब भी कोई अनुचित या असभ्य आचरण करता है तो कहा जाता है- जंगली हो क्या। शहरी समाज की इस मानसिकता पर दुख कम और तरस अधिक आता है। जाहिर है कि झारखंड में शासन का असल नियंत्रण और कार्यपालिका के लोगों को देखें तो साफ पता चलेगा कि वे भी इसी तरह की मानसिकता से ग्रसित हैं, जो जंगल और जंगलवासी को असभ्य मानते हैं।

झारखंड में वन और वनवासियों की स्थिति इस एक सच्चाई से सामने आ जाती है। फिर यह तो साल-दो साल नहीं, बल्कि सदियों से चला आ रहा मामला है। आज जिस आर्थिक विकास का हम दम्भ भरते हैं, उसमें इस सच्चाई से नहीं भाग सकते कि विकास की यह इमारत इन वनवासियों की लाशों पर बनी है। औद्योगिक क्रान्ति के बाद से ही इसकी जड़ें तलाशी जा सकती हैं। जाहिर है कि कथित विकसित भारत की आत्मा किसी गाँव या जंगल में नहीं बसती। तो क्या उदीयमान भारत की आत्मा चमचमाती दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई और आईटी हब बंगलुरु में बसती है? आज जब हम दिल्ली, राँची और जमशेदपुर में बैठकर नए साल के जश्न की तैयारियों में डूबे हैं। ठीक इसी वक्त जल-जंगल-जमीन बचाने के लिये छत्तीसगढ़ के बस्तर, ओडिशा के नियामगिरी से लेकर झारखंड के सारंडा के जंगलों तक के विनाश की रूपरेखा बनाई जा रही होगी। जिस रफ्तार से सरकार जंगलों को कॉर्पोरेट हाथों में बिना किसी हिचक के देती जा रही है, उससे जंगलों और जंगल में रहने वाले आदिवासियों के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराता नजर आता है।

हर दावे पर शक : जहाँ एक ओर साल-दर-साल विभिन्न संस्थाओं के आँकड़ों में जंगलों का क्षेत्रफल सिमटता जा रहा है, वहीं विभाग अपनी कारस्तानी को छुपाने के लिये मनगढ़न्त किस्सों, कहानियों, आँकड़ों का दाँव खेलता रहता है। झारखंड में वनों की स्थिति क्या है, इसे जानने के लिये हमें सरकार के आँकड़ों के बजाए अपनी आँखों देखी पर विश्वास करना होगा। जिन इलाकों से अभी हम गुजरते हैं, क्या वाकई वह जगह इसी तरह उजाड़ था? अधिकतर मामलों में इसका जवाब नहीं ही मिलेगा।

जंगल में विचरने वाले जानवर विलुप्त हो रहे हैं। मैंने ग्रीन पीस के लिये अध्ययन के दौरान पाया कि सारंडा, जहाँ तितलियों की हजारों प्रजातियाँ थीं, वहाँ इनकी बहुरंगी उड़ानें देखने को कम ही मिलती हैं। इसी तरह अन्य जंगली पशु-पक्षी भी विलुप्ति के कगार पर है। दरअसल, सरकार को मालूम भी नहीं कि ये जंगल कितनी जैवविविधताओं के मामले में धनी हैं। ऐसे में हम किस विभाग की बात करें और किस नीति की बात करें। यह झारखंड जैसे राज्य में जीने-मरने के सवाल से कम नहीं कि जंगल में होने वाली हरेक बाहरी गतिविधि से पूरा का पूरा जंगल तंत्र, उसमें बसने वाले मानव, पशु-पक्षी सब प्रभावित होते हैं। झारखंड के जंगलों को केवल पर्यावरण के नजरिये से देखना अनुचित होगा। पूरा जंगल एक सजीव माहौल का निर्माण करता है, जिससे न सिर्फ जंगली पेड़-पौधे, बल्कि मनुष्य तक एक साथ मिलकर रहते हैं। छोटानागपुर, संताल परगना से लेकर सारंडा तक फैले सखुआ के जंगलों के बीच बसी एक सम्पूर्ण जंगली और गैर-जंगली बस्तियों में सारी चीजें इन्हीं जंगली परिस्थितियों से ही निकली है।

ऊँची-नीची पहाड़ियों, गहरी खाइयों, पठारों के साथ जंगल, जलवायु की दशाओं में परिवर्तन और उनके साथ बदलती मानवीय बस्तियों में भी जंगल के तत्व ढूँढ़े जा सकते हैं। कल-कल बहती नदी, नालों के बीच पशु, पक्षी, हाथियों के अनेक झुंड एक ऐसे पारितंत्र का निर्माण करते हैं, जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच निकटतम सम्भावित सम्बन्ध देखने को मिलता है। गाँवों में बसे आदिवासियों का जीवन उसी तरह छल-प्रपंच से दूर है, जिस तरह प्रकृति की निश्छलता। झारखंड के घने जंगल दो दशक पहले तक दुनिया भर के शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, सैलानियों में जिज्ञासा का भाव पैदा करते थे। एक ओर जहाँ राँची से लेकर नेतरहाट की पहाड़ियाँ सालों भर हरियाली की चादर ओढ़े रहती थी, तो वहीं दूसरी ओर सारंडा के घने साल जंगल में हाथियों के झुंड प्रकृति के अद्भुत और विहंगम दृश्य पैदा करते थे।

निर्जीव हुई जंगल की सजीवता : इन जंगलों में बसे हजारों आदिवासी गाँव बिना बाहरी डर-भय के सैकड़ों संस्कृतियों को अपने में समेटे सजीवता की मिसाल है। मन्दिर के स्वर, तीर-धनुष, महुआ के फूल, आम के पत्ते, झरने, मुर्गा, बकरी, बत्तख ये जंगल और आदिवासी जीवन की पहचान रहे हैं। लेकिन पिछले एक-डेढ़ दशक में बहुत कुछ बदला है। झारखंड की खुशहाल जंगल और आदिवासी जीवन तेजी से विकासवाद की भेंट चढ़ने लगी है। पूँजीवाद से उपजे आर्थिक विकास की बेलगाम अन्धी दौड़ ने दुनिया भर के महत्त्वपूर्ण जंगलों के साथ-साथ झारखंड के जंगलों और पहाड़ियों को भी बर्बाद करने का काम किया है। झारखंड में छोटानागपुर, संथाल परगना और सारंडा की ज्यादातर पहाड़ियाँ और जंगल खनिज सम्पदाओं मसलन लोहा, सोना, अभ्रक, तांबा, कोयला, यूरेनियम, मैग्नीज के नाम पर बर्बाद होते रहे हैं।

15 नवम्बर, 2000 से अब तक झारखंड सरकार ने बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट कम्पनियों के साथ लगभग 104 समझौते पर दस्तखत किए हैं। सेंसेक्स की बढ़ती ऊँचाइयों में हमें याद भी नहीं रहता कि आज भी हमारे जंगलों में रहने वाले लोग बुनियादी सुविधाओं से वन्चित हैं। कोयले के अन्धाधुन्ध खनन ने आज नॉर्थ कर्णपुरा, साउथ कर्णपुरा, ईस्ट बोकारो, वेस्ट बोकारो, झरिया, डालटनगंज के उटार के जंगलों को तबाही के मुहाने पर ला खड़ा किया है। यही स्थिति पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा में लोह अयस्क खनन से हुई है। नवामुंडी और जामदा से लेकर चाईबासा तक अयस्क खनन का असर स्थानीय आबादी और जंगलों को देखकर महसूस किया जा सकता है।

तबाही का सही आकलन नहीं : खनन करने वाली छोटी-बड़ी कम्पनियों ने गैरकानूनी रूप से सघन सारंडा को भीतर ही भीतर खोखला कर दिया है। नेतरहाट की पहाड़ियाँ बॉक्साइट खनन से अपनी सुन्दरता खोने लगी है। लोहरदगा के इलाके भी बॉक्साइट खनन से तबाह हो रहे हैं। सारंडा ही नहीं, बल्कि झारखंड के तमाम जंगलों और जंगल में रहने वाले लोगों की स्थिति दयनीय है। इन इलाकों के आदिवासी पीने के पानी से लेकर भोजन, स्वास्थ्य, रोजगार, हर काम के लिये जंगल पर ही निर्भर रहे हैं और आज भी हैं। सरकार भले ही अपने स्तर से जंगल के इन गाँवों में सुविधाएँ पहुँचाने में नाकाम रही हों, लेकिन उसने इन वनवासियों को उजाड़ने का पूरा मसौदा जरूर तैयार कर रखा है। नक्सलग्रस्त घोषित इन इलाकों की सुधि अगर सरकार ने पहले ही ली होती तो स्थिति आज इतनी दुखदाई न होती। आज किसी भी सरकारी या गैरसरकार संस्था के पास ऐसा कोई आँकड़ा नहीं है, जिससे इस इलाके में जंगल और जंगलवासियों के संदर्भ में हुई तबाही का सही-सही आकलन किया जाए। झारखंड में जंगल ही जीवन का दर्शन है। विकास प्रक्रिया में जंगल और मनुष्य के बीच एक अनमोल रिश्ते की शुरुआत हुई, जिसकी हम अवहेलना नहीं कर सकते। साँस लेने से लेकर, वर्षा, भोजन, आशियाना सब जंगल की ही मेहरबानी है। दुनिया भर में मशीनी इतिहास के प्रारम्भ की कहानी भी जंगलों से ही शुरू होती है। झारखंड के जंगलों में ऐसे में ढेरों देसी तकनीक के दर्शन होते हैं, जो मनुष्य की विकास प्रक्रिया में उसके जीवन को आसान बनाने के क्रम में जंगल ने ही उसे मुहैया कराई है। दिल्ली, मुम्बई और बड़े शहरों की चकाचौंध में हम अक्सर देश के जंगलों और वहाँ रहने वाले लोगों को भूल जाते हैं। लेकिन हमें यह हमेशा याद रखना होगा कि चाहे हम कितना भी विकास कर लें, साँस तो लेनी ही पड़ेगी, तो उसके लिये हवा कहाँ से आएगी?

 

और कितना वक्त चाहिए झारखंड को

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

जल, जंगल व जमीन

1

कब पानीदार होंगे हम

2

राज्य में भूमिगत जल नहीं है पर्याप्त

3

सिर्फ चिन्ता जताने से कुछ नहीं होगा

4

जल संसाधनों की रक्षा अभी नहीं तो कभी नहीं

5

राज व समाज मिलकर करें प्रयास

6

बूँद-बूँद को अमृत समझना होगा

7

जल त्रासदी की ओर बढ़ता झारखंड

8

चाहिए समावेशी जल नीति

9

बूँद-बूँद सहेजने की जरूरत

10

पानी बचाइये तो जीवन बचेगा

11

जंगल नहीं तो जल नहीं

12

झारखंड की गंगोत्री : मृत्युशैय्या पर जीवन रेखा

13

न प्रकृति राग छेड़ती है, न मोर नाचता है

14

बहुत चलाई तुमने आरी और कुल्हाड़ी

15

हम न बच पाएँगे जंगल बिन

16

खुशहाली के लिये राज्य को चाहिए स्पष्ट वन नीति

17

कहाँ गईं सारंडा कि तितलियाँ…

18

ऐतिहासिक अन्याय झेला है वनवासियों ने

19

बेजुबान की कौन सुनेगा

20

जंगल से जुड़ा है अस्तित्व का मामला

21

जंगल बचा लें

22

...क्यों कुचला हाथी ने हमें

23

जंगल बचेगा तो आदिवासी बचेगा

24

करना होगा जंगल का सम्मान

25

सारंडा जहाँ कायम है जंगल राज

26

वनौषधि को औषधि की जरूरत

27

वनाधिकार कानून के बाद भी बेदखलीकरण क्यों

28

अंग्रेजों से अधिक अपनों ने की बंदरबाँट

29

विकास की सच्चाई से भाग नहीं सकते

30

एसपीटी ने बचाया आदिवासियों को

31

विकसित करनी होगी न्याय की जमीन

32

पुनर्वास नीति में खामियाँ ही खामियाँ

33

झारखंड का नहीं कोई पहरेदार

खनन : वरदान या अभिशाप

34

कुंती के बहाने विकास की माइनिंग

35

सामूहिक निर्णय से पहुँचेंगे तरक्की के शिखर पर

36

विकास के दावों पर खनन की धूल

37

वैश्विक खनन मसौदा व झारखंडी हंड़ियाबाजी

38

खनन क्षेत्र में आदिवासियों की जिंदगी, गुलामों से भी बदतर

39

लोगों को विश्वास में लें तो नहीं होगा विरोध

40

पत्थर दिल क्यों सुनेंगे पत्थरों का दर्द

 

 

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