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करना होगा जंगल का सम्मान

Author: 
बीरेन्द्र कुमार महतो
Source: 
‘और कितना वक्त चाहिए झारखंड को?’ वार्षिकी, दैनिक जागरण, 2013

अगर वास्तव में आने वाली पीढ़ी के लिये हमें जंगल की विरासत रखनी है, तो जंगल को लाभ के लिये, जीवन के लिये बचाने की सोच विकसित करनी होगी। जंगल का सम्मान करना सीखना होगा और अपनी सोच, संस्कृति में बदलाव लाना होगा। आदिवासियों का सदियों से जंगल से गहरा रिश्ता रहा है। वे शुरू से ही जंगल में रहते आए हैं, जंगल उनके जीवन का बुनियादी आधार रहा है। जंगल की इसी हरी-भरी गोद में उन्होंने अपने जीवन का हर व्याकरण सीखा और गढ़ा है। जंगल ने आदिवासियों को आश्रय प्रदान किया और आदिवासियों ने जंगल में उपलब्ध संसाधनों और पूरे पर्यावरण की रक्षा की। आज इस आदिवासी हक के लिये जरूरी है कि इतिहास के संदर्भ में नई दावेदारी पेश की जाए, ताकि इतिहास के अहम पहलू राजनीति का मार्गदर्शन कर सके। बात किसी एक प्रदेश की हो या पूरे देश की, जंगल महत्त्वपूर्ण है। 23 फीसदी भू-भाग पर ही जंगल हैं। लेकिन वास्तव में पाँच या सात फीसदी से ज्यादा जंगल नहीं हैं।

भारतीय आबादी में आदिवासी महत्त्वपूर्ण अंश हैं और जबरदस्त तरीके से वह ठगे जाने का अनुभव करते हैं। भारत में एक लम्बी पट्टी है, जिसमें आदिवासी मूल्य चेतना और आबादी का बँटवारा है। गुजरात से अरुणाचल प्रदेश तक 500-1000 किमी से भी अधिक चौड़ा एवं 2000 किमी लम्बा यह इलाका है। कर्नाटक व केरल के दक्षिणी छोर को यदि छोड़ दिया जाए तो मोटे तौर पर यह आंध्र प्रदेश तक फैला है और भील-गौड़-मुंडा-संताल सहित पूर्वोत्तर की आदिवासी संस्कृति का पुरातन-अधुनातन प्रतिनिधित्व करता है। यह वह इलाका है, जिसमें हजारों-लाखों वर्षों से मानव रहता आ रहा है। भारत में आदिवासियों का रहना, घूमना इसी जंगल पट्टी के आस-पास हुआ है। आदिवासी समाज मनोवैज्ञानिक रूप से यह सोचता व समझता है कि उसकी स्थिति जंगल के साथ ठीक मछली और पानी की तरह है।

आदिवासियों की पहली पसन्द जंगल है। जब जंगल में कुछ नहीं मिलता है, तो ही वे शहर की ओर भागते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कि सियार को जब मरना होता है तो वह जंगल से भागता है। आज हालत यह हो गई है कि आदिवासियों से तमाम विकल्प छीन लिये गए हैं। विवशता है। जंगल साफ कर दिए गए हैं। यह दौर ऐसा है कि यदि आदिवासी पलायन जारी रहा तो, इनकी पूरी नस्ल ही खत्म हो जाएगी। लेकिन इतिहास एक बात साफ बताता है कि आदिवासी हार नहीं मानते जब कभी अस्मिता, अस्तित्व और स्वायत्तता का सवाल उठा, उसने संघर्ष का रास्ता अख्तियार कर लिया। सिद्धू-कान्हू, चाँद-भैरव, बिरसा मुंडा जैसे लोगों ने अंग्रेजी साम्राज्यवाद को इसी बिना पर चुनौती दी। आदिवासियों की इस प्रतिरोध संस्कृति का कारक उस बुनियादी बनावट में है, जो उसे भू-सांस्कृतिक-पर्यावरणीय संरक्षण प्रदान करती है। इसी कारण वह प्रतिपक्षी से लड़ने को तैयार हो जाता है। बिना यह सोचे कि प्रतिद्वन्द्वी कौन है और उसकी ताकत क्या है? जो भी उसे चुनौती देता है। उससे वह लड़ता है। वास्तव में स्वतंत्रता की असली लड़ाई तो आदिवासियों ने ही लड़ी। उसने कभी भी आत्मसमर्पण करना नहीं सीखा। कथित सभ्य लोग किसी भी युद्ध-संघर्ष की रणनीति बनाते हैं, लेकिन आदिवासियों के पास एक सूत्री एजेंडा जल-जंगल-जमीन की रक्षा है।

आज पूरी दुनिया तेजी से घटते वन क्षेत्र से काफी चिन्तित है। कोई ओजोन परत में छेद होने से चिन्तित है, कोई शेयर बाजार के गिरते मूल्यों को लेकर परेशान है तो कोई जंगल में मौजूद जैव-विविधता के पेटेंट के लिये संरक्षण चाहता है। लेकिन हजारों-लाखों वर्षों से जंगल पर आश्रित आदिवासियों की चिन्ता इन सबसे बिल्कुल ही अलग है। आदिवासी जंगल बचाना चाहते हैं अपने अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों की खुशहाल जिन्दगी के लिये। आधुनिक समाज की सोच ने जंगल को लाभ की वस्तु बना दिया है। लेकिन आदिवासियों के लिये जंगल एक पूरी जीवन शैली है। आजीविका का साधन है। आदिवासियों की जीवनशैली, कार्यशैली, जंगल के दोहन का उनका तरीका अलग है। अपने नियम-कानून से वे पुरखों के जमाने से जंगल बचाते आ रहे हैं। आदिवासी अपने जरूरत के अनुसार जंगल से जितना लेते हैं बदले में उसे भी कुछ न कुछ देते हैं। उनकी इसी भावना और जंगल के प्रति उनके आदर से आज जंगल बचे हुए हैं।

जंगल का उपयोग करने में आदिवासियों के तौर-तरीके और नियम से महसूस होगा कि वन संरक्षण में उनकी सोच कितनी टिकाऊ और महत्त्वपूर्ण है सर्वविदित है कि जंगल आदिवासियों का महज आर्थिक आधार ही नहीं, बल्कि उनकी बीमारियों का पूरा इलाज भी जंगली जड़ी-बूटियों से ही होता है। उनके देव स्थान भी जंगल में ही होते हैं यह कोई और नहीं बल्कि हरे-भरे पेड़ पौधे ही होते हैं जिन्हें वे श्रद्धापूर्वक पूजते हैं। लेकिन, आज जंगल पर एक तरह से सरकार के नाम पर वन विभाग के अधिकारियों और उनसे जुड़े ठेकेदारों का एकछत्र राज स्थापित हो गया है। इनकी साँठ-गाँठ से जंगल में प्रतिदिन अवैध धंधा चलता है। पेड़ कटते हैं और बेशकीमती लकड़ियाँ बाजार में भेज दी जाती हैं। एशिया का सबसे घना जंगल सिंहभूम का ‘सारंडा वन’ माना जाता रहा है, लेकिन वह आज हर दिन बदशक्ल हो रहा है।

जंगल के संरक्षण के नाम पर कानून बनाकर आदिवासियों को जंगल से अलग-थलग किया गया, लेकिन इन कानूनों पर टिका शासन ने जंगल को असुरक्षित बना डाला है। वन विभाग जंगल के प्राकृतिक नैसर्गिक रूप को प्रतिदिन बदल रहा है। झारखंड के संदर्भ में आज आदिवासी कल्याण के नए चिन्तन और नई रणनीति पर विचार करना आवश्यक हो गया है, क्योंकि पुराने चिन्तन और विकास की चालू अवधारणा ने उनके हितों की रक्षा कम की है, नुकसान अधिक पहुँचाया है। विकास की आक्रामक तकनीकी रणनीति, राष्ट्र-राज्य की दमनकारी शक्ति और व्यक्तिवादी भेदभावपूर्ण चिन्तन ने आदिवासियों की जातीय और सामूहिकता की भावना पर आधारित चिन्तन बोध व सामाजिक विकास प्रक्रिया को बाधित किया है। गलत प्राथमिकताओं और निहित स्वार्थों पर टिके अमानवीय तंत्र के कारण आदिवासी जीवन का बड़ी तेजी के साथ विघटन हुआ है। एक तरफ उन्हें परम्परा से तोड़ने की कोशिशें की गई हैं, तो दूसरी तरफ उन्हें आधुनिक जीवन और विकसित अर्थतंत्र से जोड़ा भी नहीं जा सका है। इसे आदिवासी एक अजीब किस्म के अलगाव बोध से ग्रस्त हैं। झारखंड जैसे नवगठित राज्य की वास्तविक पीड़ा भी यही है।

गौरतलब है कि विगत वर्ष 2006 में एक लम्बे संघर्ष के बाद किसी तरह वन अधिकार कानून बना। लेकिन आदिवासी मंत्रालय के अधिकारी वन अधिकारों की सुरक्षा की जो हरी-भरी तस्वीर हाल-फिलहाल दिखा रहे हैं, वैसी स्थिति वास्तव में किसी प्रदेश की जमीन पर दिखाई नहीं दे रही है। आज भी वनोपज पर आधारित जीवनशैली जी रहे आदिवासियों से जल, जंगल, जमीन छीनने की कोशिशें लगातार जारी है। देश की अदालतों में वन अधिकार कानून के विरोध में सात याचिकाएँ दायर हैं। इनमें चार तो सेवानिवृत्त वन अधिकारियों ने दायर की है। एक याचिका एक पूर्व जमींदार की है और दो ऐसे पर्यावरण संगठनों ने दायर की हैं, जिनकी सोच भद्रकुलीन है। फिलहाल पूरे देश में कोशिशें जारी हैं कि किस तरह वन अधिकार कानून की प्रक्रिया को अमल में आने से रोका जाए। अफसोस इस बात का है कि केंद्र का आदिवासी मंत्रालय इस सारी गतिविधियों पर निष्पक्ष है। यह उनकी मदद में जुटा है जो वन अधिकार कानून को अमल में नहीं आने देना चाहते। लेकिन इस कानून के बनने के बाद आदिवासी भी अब अपने अधिकारों के प्रति सजग हुए हैं। ऐसा गाँव जहाँ आदिवासी पूरे तौर पर वनोपज पर ही अपना जीवन-यापन करते हैं वे अपने सामुदायिक वन स्रोतों की सीमा बाँध रहे हैं। उनके संरक्षण की अपनी कोशिश कर रहे हैं।

वे अपने पारम्परिक वन क्षेत्र को बचाने का पूरा प्रयास स्थानीय स्तर पर व आन्दोलनों के जरिये संगठित होकर कर रहे हैं। जंगल आधारित जीवनशैली, आदिवासियों का परम्परागत ज्ञान, जरूरतभर उपभोग, संरक्षण के लिये आदिवासियों की सोच, टिकाऊ दृष्टिकोण और कार्यशैली की अनदेखी कर, वन्यप्राणी, जैवविविधता के संरक्षण के नाम पर विदेशी सोच आधुनिक कह कर लादी जा रही है। इससे कुछ फायदा तो हो नहीं रहा, हाँ इससे आदिवासी और जंगल का सहअस्तित्व जरूर खत्म हो रहा है। हमें यह याद रखना होगा कि हजारों हजारों-लाखों वर्षों से आज तक जंगल की रक्षा आदिवासियों की संस्कृति व परम्परा के चलते ही हो पाई है जिसका बड़ा हिस्सा हम महज कुछ दशकों में साफ कर चुके हैं। अगर वास्तव में आने वाली पीढ़ी के लिये हमें जंगल की विरासत रखनी है, तो जंगल को लाभ के लिये, जीवन के लिये बचाने की सोच विकसित करनी होगी। जंगल का सम्मान करना सीखना होगा और अपनी सोच, संस्कृति में बदलाव लाना होगा।

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