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वनाग्नि और इसके प्रभाव

Author: 
अरण्य रंजन, प्रियव्रत शतपथी
Source: 
वनाग्नि संकट से जूझता हिमालय उत्तराखण्ड वनाग्नि वर्ष 2016 एक नागरिक रिपोर्ट, एक्शन एड, नेचुरल रिसोर्सेज हब, 2017

मानव जीवन का पहला आविष्कार था दो पत्थरों को रगड़ कर आग उत्पन्न करना। आग पैदा करने की कला सीखने के बाद प्रागैतिहासिक मानव के जीवन में कितनी सहजता आई होगी कि उसने आग को अपने से कहीं ऊपर का मानते हुये देव होने की संज्ञा दी। कालांतर में वेद, पुराणों और शास्त्रों में अग्निदेव को पूजने के लिये मंत्रों और विधानों का प्रावधान किया। तब से लेकर आज तक मानव के लिये आग जीवन जीने का प्रमुख साधन है। आज भले ही इसके स्वरूपों में परिवर्तन हुआ हो, लेकिन पेट की आग को शांत करने के लिये आग जलानी पड़ती है।

पृथ्वी का जो तत्व सृजन के लिये है, वह विनाशकारी भी हो सकता है। जल, थल और नभ से पैदा होने वाली आपदाओं के रूप में हम सभी इस तथ्य को भली-भांति जानते हैं। यह भी सर्वविदित है कि भूकम्प, बाढ़ आसमानी बिजली, दावानल जैसी आपदायें पृथ्वी पर बढ़े विनाश का कारण बनी हैं। मनुष्य ने सभ्य होने के साथ अपने लालच, सुविधाओं के लिये इन आपदाओं की बारंबारता और तीव्रता को बढ़ाया है। प्राकृतिक आपदायें पहले भी घटित होती थीं, तब इनसे होने वाले नुकसान के लिये मानव प्रकृति और उन अलौकिक शक्तियों को कोसता था, जिनको वह अपने से सर्वोच्च समझता था और किसी भी होने व न होने के लिये उन्हें ही जिम्मेदार समझता था। आज घटने वाली आपदाओं को भी ऐसा ही समझें तो हम निश्चित ही वास्तविकता से किनारा करेंगे। प्रकृति के साथ मानव समाज के सहज रिश्तों में बहुत बड़ी टूटन आई है। प्रकृति और उसके संसाधनों को देखने के दृष्टिकोण में तेजी से अंतर आया है। प्रकृति को साधन के बजाय साध्य मानने और समझने लगे हैं। यह मानसिकता हमें प्रकृति से दूर ले जा रही है, और कुछ चालाक लालची लोग इस प्रक्रिया को अपने हित के लिये तेजी से क्रियान्वित कर रहे हैं। लोगों को प्रकृति से दूर ले जाने में सरकारों के द्वारा लागू की जाने वाली नीतियों भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं।

सृष्टि की उत्पत्ति के समय से मानव ने प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाया है। प्रकृति से प्राप्त अनमोल संसाधनों के उपयोग से मानव अपनी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करता था। रोटी, कपड़ा और मकान की जरूरतों को मानव अपने आस-पास की प्रकृति से प्राप्त करता था, और यह बहुत सहज था। धीरे-धीरे समाजों ने विकास के सोपान पर अपनी यात्रा को आगे बढ़ाया, तो आवश्यकतायें भी बढ़ने लगी, और समाज एक उपभोक्ता बन गया, जो अपनी आवश्यकता और विलासिता के लिये सब कुछ खरीदना चाहता है। उसके लिये प्राकृतिक संसाधन उत्पाद मात्र है। बाजार और उसको संचालित करने वाले बढ़े हाथों के हित साधने के लिये आम जन के हितों व हकों पर सिलसिलेवार ढंग से कुठाराघात किया गया है। उन सारी व्यवस्थाओं जो आमजन को प्रकृति से जोड़ती थी, को सोच-समझकर चालाकी पूर्ण ढंग से दरकिनार करके नई बाजार के हितों को साधने वाली व्यवस्थाओं को स्थापित किया गया।

वनाग्नि का सामाजिक-आर्थिक पहलू


जंगल से चारा लाती बुजुर्ग महिला वनाग्नि दो महत्त्वपूर्ण शब्दों के युग्म से बना है। वन और अग्नि यह दोनों ही शब्द अपने आप में पूरा वाक्य है और यह भी कह सकते हैं कि सृष्टि को जीवन देने के पर्याय है। इन दोनों तत्वों का मानव जीवन के सामाजिक-आर्थिक पहलुओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जब दोनों में एक तत्व दूसरे तत्व के विनाश का कारण बनता है या उसे कारण बनाया जाता है, तो प्रकृति में रहने वाले सभी जीवों का जीवन दुष्कर हो जाता है। जंगलों की आग इससे जुड़े समस्त जीवों के जीवन को बुरे ढंग से प्रभावित करती है।

भारत गाँवों का कृषि प्रधान देश कहा जाता है, सही रूप में हम कितना मान पाते हैं यह दूसरा विषय हो सकता है। गाँव और कृषि की बात आती है, तो जंगल और प्राकृतिक संसाधानों का जुड़ाव स्वत: ही हो जाता है। उत्तराखंड राज्य जिसकी 67 फीसदी जमीन वन भूमि है। उसमें जंगल से जुड़े बिना जीवन संभव नहीं भी नहीं है। उत्तराखंड, गाँवों से बना राज्य है जहाँ पर आजीविका का मुख्य साधन कृषि व पशुपालन है।

गाँव का जीवन पूरी तरह से प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। गाँव के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश जंगल में समाहित है। घास, चारागाह, ईंधन, कृषि उपकरण और कई विशेष अवसरों पर भोजन के रूप में कंद-मूल व फल इत्यादि की पूर्ति जंगल से ही होती है। आजीविका के प्रमुख साधन कृषि व पशुपालन के लिये पूरी निर्भरता जंगल पर है। कृषि उपकरण, सिंचाई के लिये पानी, खेत जोतने वाले बैलों का चारा सभी कुछ जंगलों से ही आता है। गाय, भैंस, भेड़ बकरी के लिये चारे का मुख्य स्रोत चारागाह और जंगलों से प्राप्त होने वाली हरी घास है। जंगलों में मिलने वाले बुरांश के फूल और काफल पर्यटन के सीजन में कई लोगों की आजीविका के स्रोत बने हैं। काफल के मौसम में गाँव से झुण्ड के झुण्ड काफल लेने के लिये जंगल जाते थे। यह गाँव में उत्सव जैसा होता था। दिवाली के सयम भी भैले (चीड़ की लकड़ियों की छोटी गट्ठी जिसे जंगली बेल से बांधकर दोनों तरफ आग जलाकर खेलने वाला खेल) के लिये चीड़ की लकड़ी लेने के लिये भी ऐसे ही समूह बनाकर जंगल जाते थे।

लोक जीवन के बारीक जुड़ाव ही मनुष्य को प्रकृति के नजदीक लेकर आते हैं। गाँवों के आर्थिक व सामाजिक सरोकारों में परिवर्तन आने के कारण ही दावानल के इतने भयावह रूप में आने पर भी कोई हलचल नहीं दिखी है। सत्तर के दशक का चिपको आन्दोलन रहा हो या 1931 से वन पंचायतों का गठन हो, यह हमारी सामूहिक चेतना के मजबूत प्रतीक हैं। जब कभी भी जंगलों का मुनाफे के लिये इस्तेमाल किया गया लोगों ने उसका पुरजोर प्रतिरोध किया। उत्तराखंड के जंगलों में इस वर्ष लगी भीषण आग के बाद चिपको जैसे आन्दोलनों की उम्मीद अभी तो कम से कम नहीं दिख रही है।

यह सरकारों और समाज को समझना होगा कि प्रकृति में रहने वाले अन्य प्राणियों का भी हक है। लोक परम्पराओं में बहुत अच्छे से व्याख्यायित किया गया है कि दिन छिपने के पश्चात जीवन थम जाना चाहिये। जिससे अन्य प्राणियों, वनस्पतियों और जीव आदि को भी अपने जीवन जीने और प्रकृति में अपनी हिस्सेदारी का अवसर मिल सके। भौतिक वादी युग में मानव ने सभी जगह अतिक्रमण कर दिया है।

मानव व प्रकृति के सहज रिश्ते


लोक और वन के रिश्ते को समझने के लिये सांस्कृतिक पक्ष को जानना व समझना आवश्यक है। सृष्टि और पारिस्थितिकी तंत्र में जुड़ने वाला मनुष्य सबसे अंतिम और नवीन प्राणी है। सभी प्राणियों में मनुष्य ही है जो सभी जगह और संसाधनों पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। लोक में ईश्वर से पहले प्रकृति और जंगल को पूछने और पूजने की परम्परा रही है। लोक साहित्य और जागरों में प्रकृति की उत्पत्ति से लेकर लोक समाज के सुदृढ़ और मजबूत रिश्तों को उजागर किया गया है। मनुष्य से पहले उन प्राणियों का भी प्रकृति पर अधिकार है, जो मानव उत्पत्ति से पूर्व भी प्रकृति का अहम हिस्सा रहे हैं।

लोक परंपराओं में प्रकृति के साथ इस अटूट रिश्ते को पूरा सम्मान दिया गया है। प्राकृतिक संसाधन तो हमेशा से ही जीव-जन्तुओं, जानवरों और समुदायों के अधिकार में रहे हैं। पहले इन अधिकारों को छीना गया है। अब कानूनों के द्वारा अधिकारों को देने की कवायद की जा रही है, और उसको भी करने में ईमानदारी का अभाव है।

पहाड़ों में मानव और प्रकृति का परस्पर अटूट रिश्ता रहा है। मनुष्य सदियों से जंगलों को पोषित व संरक्षित करता आया है। बदले में वनों से अपने जीवन और आजीविका को चलाने के लिये लकड़ी, ईंधन, चारा इत्यादि लेता रहा है। यह रिश्ता सामाजिक, संस्कृति और लोक परम्पराओं से सुदृढ़ हुआ। चिपको आंदोलन की धरती पर 4500 हेक्टेयर जंगल स्वाह होने के बावजूद कोई मजबूत हस्तक्षेप कहीं उबर कर सामने नहीं आया। वनाग्नि की रोकथाम में समाज और समुदाय की कमजोर होती भूमिका चिंता का विषय है। जंगल में सजावटी वृक्षों जिन्हें जानवर भी न खा सकें, लगाये जाने की कवायद करने वाले जंगल को नहीं जानते हैं। तेजी से हो रहे पलायन और भौतिक युग में जीने की चाह ने लोगों को विशेषकर युवाओं को खेती और पशुपालन से विमुख किया है। यह भी एक कारण है कि नया समाज जंगलों से पूरी तरह से नहीं जुड़ पा रहा है।

समाज को अधिकारों से वंचित करने का सिलसिला निरंतर जारी है। लोगों के छोटे-छोटे अधिकारों को भी नियम कानूनों के द्वारा रौंदा जा रहा है। कृषि उपकरणों को बनाने के लिये जंगल से लकड़ी लाना संगीन अपराध बना दिया गया। दीपावली के समय पहाड़ पर लोग चीड़ की लकड़ी को जंगली बेल से बाँधकर जिसे भैला कहते हैं, से खेलते हैं। जंगल से भैले के लिये चीड़ की लकड़ी के लिये वन विभाग द्वारा कभी गाँव वासियों को रोका टोका नहीं गया था। पिछले कुछ समय से ग्रामवासियों के इस अधिकार को भी निलंबित करके भैले खेलने की लकड़ी से भी वंचित कर दिया गया है। जन अधिकारों को दमित करने के लिये इन नियम कानूनों को सख्ती के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। समाज और वन के रिश्तों को कमजोर करने में सरकार की ये नीतियाँ ही प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं।

जंगलों, मानव और जानवरों का रिश्ता अविभाज्य है। जीवन और जीविका के लिये लोग पीढ़ियों से जंगलों पर निर्भर हैं। स्थानीय लोगों के वन अधिकारों को जितना सीमित किया जाता है, वन संरक्षण और सुरक्षा के प्रति लोग उतने ही उदासीन होते हैं।

शासन सत्ता द्वारा वन अधिकारों का अतिक्रमण


जंगल से लकड़ी ले जाती महिला सभ्यता के विकसित होने के साथ ही मानव समाज ने अपनी बुनियादी आवश्यकताओं के लिये प्रकृति के साथ रिश्तों को परम्परा और सामाजिक व्यवहार से पारिस्थितिकी में संतुलन बनाया हुआ था। अपनी जरूरत भर को पूरा करने के लिये प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाता था। अपनी आवश्यकताओं से अधिक लेने की मानसिकता ही नहीं थी। विकास की सीढ़ियों को पार करते हुये मनुष्य के दिमाग में प्रकृति को उपभोग की वस्तु और लाभ देने वाली वस्तु की समझ स्थापित करने की शुरुआत औपनिवेशिक काल से ही हो गई थी। भारत में यह ब्रिटिश शासन के दौरान आरम्भ हुई।

इतिहासकार मानते हैं कि अठाहरवीं सदी की शुरुआत में अंग्रेज सरकार ने उत्तराखंड पर अपना शासन करना प्रारंभ कर दिया। जो गोरखा शासन को हटाने के बाद सन 1815 में मध्य हिमालय को कब्जे में लेने पर पूरा हुआ। इससे पहले यहाँ के निवासी अपनी जरूरत और सुविधा के अनुसार अपने निवास को स्थापित करते और जीवन निर्वाह के लिये जंगलों से इमारती लकड़ी, ईंधन, चारा इत्यादि लेते थे। प्राकृतिक संसाधनों के दुरुपयोग को रोकने के लिये सामाजिक व्यवहार थे, जो इनकी बर्बादी को प्रतिबंधित करते थे। ब्रिटिश शासन की शुरुआत से लोगों के इन प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक अधिकारों को संकुचित किया जाने लगा। ब्रिटिश शासकों ने लोगों के नियंत्रण में आने वाले वन क्षेत्र में निरंतर कटौती करनी शुरू कर दिया। पेड़ों से चारा पत्ती लेने, चरान व चुगान को सख्ती से बंद करने वाले कानूनें को लागू किया। कृषि क्षेत्र विस्तार को प्रतिबंधित कर दिया। घास की अच्छी पैदावार के लिये लोगों द्वारा जंगल में लगाई जाने वाली नियंत्रित आग के उपयोग को विनयमित किया गया। अधिकारियों और वन रक्षकों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी की गई। यह नियम-कानून लोगों के बीच पनपने वाले असंतोष का कारण बने।

लोगों के वन उपयोग के अधिकारों में कटौती के परिणाम स्वरूप कुमायुं और गढ़वाल के लोग सरकार के विरोध में आ गये। इस जनप्रतिरोध ने 1921 की गर्मियों में व्यापक रूप लिया और ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण क्षेत्र के जंगलों को लोगों के द्वारा जलाया गया। ब्रिटिश सरकार इस प्रतिरोध के सामने पूरी तरह से लाचार और लकवाग्रस्त हो गई। इसके बाद सरकार को स्थानीय लोगों की मांग पर कुमायुं फॉरेस्ट ग्रिवांसेस कमेटी के गठन के लिये मजबूर होना पड़ा। इस समिति के द्वारा 30 से अधिक संस्तुतियां सरकार को सौंपी गई। इन संस्तुतियों के आधार पर 1931 में सरकार को कुमायुं वन पंचायत अधिनियम (फॉरेस्ट काउंसिल एक्ट) पारित करना पड़ा। इस अधिनियम ने ग्रामीणों को अपेक्षाकृत स्वायत्त वन प्रबंधन समितियों के गठन में सक्षम बनाया। जीवन निर्वाह के लिये वन प्रबंधन व नियंत्रण हेतु शक्तियों का हस्तांतरण सरकार और समुदाय के द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के सह प्रबंधन का उदाहरण देश दुनिया के सामने प्रस्तुत हुआ।

तब से लेकर आज तक वन पंचायतों को भारतीय वन अधिनियम 1927 के सेक्शन 28 (2) के अन्तर्गत गठित किया जाता है। वन पंचायतों के गठन का उद्देश्य था, कि वे वनों को सुरक्षा देने और विकसित करने का काम करेंगी। वन उत्पादों को वन से जुड़े (वनवासियों) लोगों के बीच समान रूप से बँटवारा करेंगे। उत्तराखंड में लगभग 12064 वन पंचायतें हैं। राज्य के 11 पर्वतीय जिलों का 5,23,289 हेक्टेयर वन क्षेत्र इन वन पंचायतों के अंतर्गत आता है। अधिकतर वन पंचायतों के द्वारा लिये ग्रामीणों के जीवन निर्वाह करने के जरूरी संसाधन घास, चारा पत्ती, पशुओं के बिछावन के लिये पत्तियाँ, जानवरों के लिये चारागाह, ईंधन की लकड़ी, ईमारती एवं कृषि उपकरणों को बनाने के लिये लकड़ी के रूप में मिलता रहा है।

वन पंचायत कानून के अंतर्गत ग्रामीण अपने स्तर पर ही रोजमर्रा के प्रबंधन के लिये नियम बना सकते थे। वन पंचायतों की वन प्रबंधन की जिम्मेदारी भी बढ़ी, और इसमें अनियमितता पाये जाने पर वन पंचायतों के जरूरी अधिकारों के साथ ही वित्तीय स्वायतता पर भी प्रतिबंध लगाने के प्रावधान थे। इस दौरान वन पंचायतों की शक्तियाँ वन या राजस्व विभाग को हस्तांतरित हो जाती थी। वन विभाग दायित्व वन पंचायतों को तकनीकी सहायता देने का था और वन पंचायतें लीसा निकालने या ईमारती लकड़ी लेने से पहले वन विभाग से सलाह लेती थी। वहीं टिहरी की राजशाही में इसी दौरान भगौड़े अंग्रेज सिपाही विल्सन की सलाह मानते हुये राजा ने जंगलों का कटान मुनाफा कमाने के लिये शुरू कर दिया। इस प्रकार टिहरी रियासत में जंगलों को खरीदने वाला विल्सन पहला ठेकेदार बना। राजा ने राज्य और इससे बाहर के मालदारों को भी जंगलों को काटने के ठेके देने शुरू कर दिये। इन बाहरी लोगों ने स्थानीय लोगों को भी जंगल कटान के विभिन्न कार्यों में सम्मिलित कर दिया। स्थानीय हक हकूक पहले की तरह मालगुजार व्यवस्था के अंतर्गत चलते रहे, परंतु जंगलों का कटान शुरू हो गया। ब्रिटिश शासित गढ़वाल ओर कुमायुं में वन पंचायत के बाहर के वनों में अंग्रेजों के द्वारा जंगलों का कटान शुरू करवा दिया गया। हिमालय के ब्रिटिश शासित क्षेत्र और राजा के अधीन क्षेत्र में जंगलों का कटान आजादी के बाद भी निर्बाध गति से चलता रहा। ब्रिटिश शासित हिमालय क्षेत्र में जंगलों पर हक के प्रतिरोध ने लोगों को वन पंचायत की व्यवस्था मिली। टिहरी रियासत में राजा ने ब्रिटिश सरकार की वन नीतियों को लागू किया। अनेकों स्थानों पर लोगों ने प्रतिरोध किया, लोगों के द्वारा पंचायत के माध्यम से समानान्तर शासन चलाने के प्रयास किये जाने लगे। इसी दौर में उत्तरकाशी के तिलाड़ी नामक स्थान पर लोगों के द्वारा अपने वन हकों को लेने के लिये महापंचायत का आयोजन किया गया था। राजा ने शांत प्रतिरोध कर रहे लोगों पर गोली चार्ज करवा दिया। जिसमें सैकड़ों की संख्या में बच्चे, बूढ़े, जवान, बीमार, विकलांग और महिलायें थी। कई लोग गोलियों की मार से बचने के लिये यमुना में कूद गये। तिलाड़ी में 30 मई, 1930 को घटी इस घटना को तिलाड़ी काण्ड के नाम से जाना जाता है और हिमालय का जलियावाला बाग भी कहते हैं।

अपनी स्थापना के समय 1931 के बाद से ही वन पंचायतों के अधिकारों में निरंतर गिरावट आई है। वन पंचायतों की देख-रेख के लिये वन विभाग के अधिकारियों को वन पंचायत रेगुलेशन एक्ट 2005 के अंतर्गत नियुक्त किया गया है। वन पंचायतों के अधिकारों को सीमित करके पंचायती वनों का प्रबंधन वन विभाग को सौंपा गया। पंचायती वनों के नियोजन की जिम्मेदारी पंचायती वन से दूर बैठे प्रभागीय वनाधिकारी को सौंप दी गई। वनों के प्रबंधन नियोजन में वन पंचायतों की भूमिका को हटा ही दिया। वन पंचायतों के द्वारा बनाये नियमों का प्रभागीय वनाधिकारी द्वारा अनुमोदित होना आवश्यक है। इन 85 वर्षों में वन पंचायत कानून में तीन बड़े परिवर्तन हुये हैं- 1976, 2001, 2005 जिन्होंने वन पंचायत के गठन की पूरी अवधारणा को ही बदल दिया।

मुनाफे के शिकार प्राकृतिक संसाधन


मुनाफे के शिकार प्राकृतिक संसाधन लोगों के वनाधिकारों को कम करने के पीछे वनों और इसके उत्पादों के बाजारीकरण का दृष्टिकोण रहा है। औपनिवेशिक काल के समय जब यूरोप सहित पूरी दुनिया में विकास के मानदण्ड बदल रहे थे, तब वनों और प्राकृतिक संसाधनों पर ही सर्वाधिक दबाव पड़ा। दुनिया निर्माण कर रही थी और जंगल साफ हो रहे थे। इसका असर भारत पर भी पड़ा और यहाँ के जंगलों पर मुनाफाखोरों की कुदृष्टि पड़ी। आजादी के आंदोलन के साथ अपने प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिये भी लोगों ने आंदोलन किया। वनों पर कानून की आड़ लेकर किये अप्रत्याशित आक्रमण ने लोक और वनों के स्वच्छ और अबोध रिश्तों में आमजन के मानस को भी बदला और इन रिश्तों में लालच और लाभ का पुट भी आया।

उत्तराखंड राज्य जो प्राकृतिक संसाधनों की प्रचूरता वाला माना जाता है। जहाँ पर 1921 का प्रतिरोध, 1930 की तिलाड़ी की घटना और सत्तर के दशक के चिपको आंदोलन ने देश-दुनिया को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। उस प्रदेश में प्राकृतिक संसाधनों की लूट चरम पर है। तथाकथित विकास, जो ठेकेदारों, मुनाफाखोरों के द्वारा स्थापित किया जा रहा है, से यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों को लूटने के दरवाजे खुले हैं। इसके अलावा जंगलों में वन माफिया, जड़ी-बूटी माफिया और शिकारियों के द्वारा भी प्राकृतिक संसाधनों की लूट खसोट बेखटके जारी है। जंगलों में माफिया की मौजूदगी से वन विभाग भी अनभिज्ञ नहीं है। ब्रदीनाथ से आगे भारत के अंतिम गाँव के ऊपर के जंगल में दिनांक 14 नवम्बर, 2016 को सर्दी व बर्फ पड़ने के मौसम में भी आग लग जाती है या लगाई जाती है। तो माफिया और उसकी सांठ-गांठ के प्रति संदेह की गुंजाईश नहीं बच पाती है। इस माफिया को रोकने में वो किन कारणों से सफल नहीं हो पा रहे हैं, इस पर बहुत ज्यादा शोध की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से ही ऊर्जा प्रदेश का सपना यहाँ के राजनीतिज्ञ देख रहे हैं। इस सपने को पूरा करने हेतु पावर प्रोजेक्टों को स्थापित करने के लिये यहाँ की नदियों, वनों और भूमि पर सबसे अधिक संकट आया है। एक तरफ लोगों की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के अधिकारों में निरंतर कटौती की जा रही है और इन ऊर्जा परियोजनाओं जैसे विकास के लिये प्राकृतिक संसाधनों को लूटने के खुले अवसर दिये जा रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों से आय प्राप्त करना सरकारों के लिये राजस्व का प्रमुख स्रोत है। वनाग्नि से वन सम्पदा के नुकसान का रिकार्ड किसी भी स्तर पर नहीं है। केवल वन सम्पत्ति, जिसमें सिर्फ ईमारती लकड़ी आती है, को ही नुकसान के रूप में दर्ज किया जाता है।

सरकार की मानसिकता में ही यह है कि, वन और उससे मिलने वाले संसाधन उनके लिये केवल उत्पाद मात्र हैं। उत्पादों का क्रय-विक्रय करके मुनाफा वसूली का सिद्धांत वनों और प्राकृतिक संसाधनों पर भी लागू किया जा रहा है। प्राकृतिक संसाधनों को पूरी तरह से बाजार के हवाले कर दिया गया है। वनों में फैलने वाली आग की भीषणता उसी अनुपात में तेजी से बढ़ रही है, जितना बाजार मुनाफे के लिये किया जाने वाला हस्तक्षेप बढ़ रहा है।

वन और जन के रिश्तों में बिखराव की परिणति दावानल


वन पर आधारित समाजों के वन अधिकारों को समाप्त करने के बाद में कोई भी ऐसी सामाजिक व्यवस्था नहीं बन पाई है, जो वनों को आग से और अन्य नुकसानों से बचाने की जिम्मेदारी उठा सके। लोगों की वनों के प्रति रुचि कम हुई है और वे वनों की सारी जिम्मेदारी वन विभाग को ही समझते हैं। वन विभाग सिर्फ वनों की देखभाल और व्यावसायिक प्रबन्धन कर सकता है। वनों के संरक्षण और सुरक्षा का भार उठाने के लिये वन विभाग सक्षम नहीं है। समुदाय की भागीदारी और रुचि के बिना जंगलों की सुरक्षा भी संभव नहीं है।

प्राकृतिक प्रक्रिया के साथ वन उगता और बढ़ता है। मानवीय हस्तक्षेप इसको प्रभावित करता है। जब वनों को सजावटी एवं व्यावसायिक मकसद के लिये इस्तेमाल किया जाता है और ऐसे पौधों को बढ़ावा दिया जाता है जिन्हें कोई भी जंगली जानवर नहीं खा सके। यह बात वन की महिमा को कम करता है। जन और जानवर के बिना वन का अस्तित्व भी नहीं है।

यह बात शासन करने वाले तत्व नहीं समझ पाते या समझना नहीं चाहते कि प्रकृति और मानव के रिश्ते जितने अधिक लालच और लाभ के लिये होंगे, विनाश उतनी ही तेजी से हमारे निकट आयेगा। पूर्व के समाजों ने अपनी जीवन जीने की आधारभूत ज़रूरतों को पूरा करने के लिये प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग करने की व्यवस्थाओं, परम्पराओं को भी बढ़ाया था। ब्रिटिश सरकार ने जंगलों को श्रेणीबद्ध करके वन पंचायतों के माध्यम से स्थानीय निवासियों के हक हकूकों को बाधित नहीं होने दिया राजा के द्वारा टिहरी रियासत में अंग्रेजों की वन नीतियों से प्रभावित अपनी नीतियों को लागू करने के बावजूद स्थानीय निवासियों को प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर कोई विशेष पाबंदी नहीं रही। रियासतकाल में राजा के कर्मचारियों द्वारा उत्पीड़न की घटनायें होती थी और लोग इनका प्रतिरोध भी करते थे। कई बार राजा के वन कर्मचारी लोगों को मार भी डालते थे। वनों को बचाने और बचाये रखने के लिये सामाजिक व्यवहारों का प्रतिबंध होता था, जिसे सबको स्वीकार करना ही पड़ता था। लकड़ी के नक्काशीदार मकान बनाये जाते, जिनमें कई वृक्षों को काटना पड़ता था। इस प्रकार की आवश्यकता के लिये राजा द्वारा दिये जाने वाले रमाने के अलावा भी लोग पेड़ काटते थे। पेड़ को सिर्फ कुल्हाड़ी से काटा जाता था, बसौला, छेणी, हथौड़ी जैसे उपकरणों से उन पर नक्काशी भी की जाती थी। पेड़ों को काटने के लिये आरे का प्रयोग तब ही आरम्भ हुये जब शासकों ने वन नीतियाँ व कानून बनाये।

इन संसाधनों का आवश्यकता से अधिक उपयोग करने वाले व्यक्ति को समाज में सम्मान नहीं मिलता था। वन पर दावानल जैसा कोई भी संकट आने पर लोग संगठित होकर सामाधान करते थे। जंगल में आग लगने पर लोग बारी-बारी से आग बुझाने जाते थे। लोगों के इस मजबूत सम्बन्ध को सरकारों ने विभिन्न कानूनों व नीतियों के माध्यम से तोड़कर वन के वास्तविक और सबसे प्रभावशाली संरक्षकों को वनों से दूर कर दिया है।

वनाग्नि: वर्तमान परिदृश्य


वनाग्नि वर्तमान परिदृश्य उत्तराखंड के दावानल को देर से ही सही पर देश दुनिया के लोगों ने ध्यान दिया। वनाग्नि की घटनायें उत्तराखंड के इतिहास में रही हैं। इस बार की आग की तीव्रता व्यापकता और निरंतरता आग की अन्य घटनाओं से अलग है। वन विभाग, उत्तराखंड की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार पूरे प्रदेश में 5 जून 2016 तक आरक्षित वन क्षेत्र में 1327 एवं सिविल सोयम वन में 742 कुल 2069 घटनायें चिन्हित हुई हैं। आरक्षित वन क्षेत्र में 2,822.85 हेक्टेयर एवं सिविल सोयम वन में 1,600.50 हैं और कुल 4,423.35 हेक्टेयर वन क्षेत्र को वनाग्नि ने अपनी चपेट में लिया है। सर्वाधिक वनाग्नि की चपेट में आने वाला जिला नैनीताल है जहाँ पर आरक्षित वन क्षेत्र में 239 एवं सिविल सोयम वन में 27 घटनाओं ने 494.86 हेक्टेयर जंगल को स्वाह कर दिया। ऊधम सिंह नगर में वनाग्नि की सर्वाधिक कम 16 घटनायें हुई हैं।

विभिन्न समाचार पत्रों में अधिकारियों के बयानानुसार इन वनाग्नि की घटनाओं ने पूरे उत्तराखंड में लगभग 6-7 लोगों की जान भी ली है। दावानल के प्रारम्भ में 2 फरवरी 2016 को उत्तरकाशी की दो महिलाओं की आग की चपेट में आने से मृत्यु हो गई। गौलागेट में झारखंड की महिला मजदूर अपने बच्चे के साथ वनाग्नि की भेंट चढ़ गई। चमोली में वनाग्नि की रोकथाम में लगे कांस्टेबल की पहाड़ से गिरे पत्थर से चोट लगने के कारण मृत्यु हो गई। 28 अप्रैल, 2016 के समाचार पत्रों में छपी खबर के अनुसार बोहराकोट और ओखलकांडा गाँव के दो ग्रामीण जंगल की आग बुझाते समय बुरी तरह जलने से हताहत हुये। वनाग्नि की घटनाओं में 10 लोग एवं 7 पशु घायल हुये हैं। इसके अलावा कई अन्य घटनायें हुई हैं जिनमें जन-धन की हानि हुई है। उत्तराखंड से जुड़े हिमाचल के सिरमौर जिले में वनाग्नि के कारण वन में रह रहे 7-8 गुर्जर परिवारों के घर जल गये। वे अपने पशुओं को भी नहीं बचा पाये। घर में रखा समान और नकदी भी जल गई। परिवारों के सामने आजीविका, आवास का संकट बना हुआ है। हिमाचल सरकार ने प्रभावित परिवारों को दो हजार रुपये प्रति परिवार मुआवजा दिया है।

सूचना माध्यमों और समाचार पत्रों में वैज्ञानिकों के अनुसार वनाग्नि से ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। इस वर्ष आग की घटनाओं के कारण ग्लेशियरों पर भी संकट गहरा गया है। एक शोध के अनुसार उत्तर भारत में इस वर्ष तापमान में .02 डिग्री सेन्टीग्रेड की वृद्धि हुई है। ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियों में खतरनाक रसायन बहकर आने के कारण प्रदूषण भी बढ़ा है।

उत्तराखंड वन विभाग के अनुसार वनाग्नि को रोकने के लिये विभागीय स्तर पर त्वरित कार्यवाही के लिये साढ़े तीन करोड़ की कार्ययोजना लागू की गई थी। वनाग्नि को रोकने के लिये जन जागरूकता की 3000 बैठकों, बैनर पोस्टर और हैण्डबिल के द्वारा विभागीय स्तर पर प्रयास किये गये। वनाग्नि के प्रबंधन में राज्य की ओर से 11160 व्यक्ति एवं एनडीआरएफ की तीन कम्पनियाँ लगी रहीं। इस बार हेलीकाॅप्टर से भी आग बुझाने के प्रयास किये गये। यह कितने सफल हुये इसका मूल्यांकन भी किया जाना आवश्यक है।

वनाग्नि ने कितने वन्य प्राणियों, पक्षियों और सरिसृपों को प्रभावित किया है, प्रभावित वन क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर हुये प्रभावों का आंकलन अभी न तो सरकार के पास है और न ही कहीं अन्य सक्षम स्तर पर उपलब्ध है। पूरे 90 दिनों से अधिक समय तक उत्तराखंड, हिमाचल एवं जम्मू-कश्मीर में आग और धूयें के कारण जानवरों और प्राणियों के ऊपर क्या प्रभाव पड़े हैं, इसका आंकलन भी किया जाना बाकी है।

वनाग्नि के प्रभाव


वनों की जैव विविधता और पूरा पारिस्थितिकी तंत्र वनाग्नि से तहस-नहस और नष्ट हुआ है वनों के जलने से केवल इमारती लकड़ी ही नहीं जलती बल्कि जीवन की एक पूरी व्यवस्था और क्रिया प्रभावित, समाप्त होती है। जंगल में पेड़ पौधों के साथ ही छोटी-छोटी घास व झाड़ियाँ भी नष्ट होती हैं। जिसकी वजह से भू-क्षरण, भू-स्खलन और त्वरित बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि हो रही है।

जंगल की आग से उठने वाला धुआँ और विभिन्न प्रकार की जहरीली गैसें मानव और सभी प्राणियों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं। हृदय और श्वास से सम्बन्धित बीमारियाँ होने की सम्भावनाएँ रहती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इस आग से निकलने वाली गैसें, जिनका प्रभाव वायुमंडल में 3 साल तक रहता है के कारण कैंसर जैसी घातक बीमारियाँ हो सकती हैं।

जल स्रोत और वनाग्नि


वनाग्नि संकट से जूझता हिमालय उत्तराखण्ड जलस्रोतों का उद्गम अधिकांश वन या वन क्षेत्र में है। वनाग्नि के कारण जलस्रोतों पर कितना और कैसा प्रभाव पड़ा, यह अध्ययन का विषय है। एक अनुमान के अनुसार पहाड़ के 50 प्रतिशत से अधिक जलस्रोत सूख चुके हैं या सूखने की कगार पर हैं। जलस्रोत का जल पेयजल लाइनों के माध्यम से समाज तक पहुँचता है वहीं जंगली जानवरों के लिये भी पेयजल उपलब्ध होता है। ग्लेशियर के अलावा जलस्रोत यहाँ की नदियों के प्रमुख स्रोत हैं। जलस्रोतों के प्रभावित होने से नदियों पर संकट है। नदियों को सिर्फ खनन के ठेके के लिये याद किये जाने के बजाय इस बातपर चिंतन मनन करना जरूरी है, कि नदियों का पानी क्यों सूख रहा है।

वनाग्नि से जलस्रोतों के सूखने की प्रक्रिया तेज हुई है। विभिन्न स्थानों से जल संकट की सूचनायें समाचार माध्यमों से मिल रही हैं। जलस्रोतों को बचाने के लिये जंगलों को आग से बचाया जाना आवश्यक है। जलस्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिये चाल खाल एवं चौड़ी पत्ती वाले पौधों के रोपण के परम्परागत तरीकों को समाज की सहभागिता से किया जाना आवश्यक है।

वन्य जीव पर प्रभाव


वनों में आग लगने से वनस्पति के बाद सर्वाधिक नुकसान वन्य जीवों को उठाना पड़ रहा है। कई प्रजाति ऐसी हैं जो लुप्तप्राय होने की स्थिति में आ गई हैं। यह समय पक्षियों के अंडें देने एवं नवसृजन का होता है। आग लगने के कारण पक्षियों के साथ अंडा और घोसलें भी समाप्त हो जाते हैं। जमीन के अंदर रहने वाले सरिसृप तो बाहर भी नहीं आ पाते और वहीं जलकर, दम घुटने से मर जाते हैं। नारायण बगड़ के साथी हरपाल सिंह नेगी, सिद्धार्थ नेगी व उनकी टीम से चर्चा के दौरान जानकारी मिली कि नारायण बगड़ के आस-पास के वनों में भीषण आग लगी हुई थी। आग से जान बचाने के लिये झुलसी हालत में एक हिरन पहाड़ से सड़क पर गिर गया। काफी ज्यादा झुलस जाने के बावजूद उसमें जान बची हुई थी। हरपाल नेगी और उनके साथी उस हिरन को उठाकर निकट के पशु अस्पताल में ले गये और इलाज करवाया। स्वस्थ होने पर हिरन को पुनः जंगल में छोड़ दिया। इसी प्रकार अन्य हिरन पुनः सडक पर गिरा और उन्होंने इलाज करवाकर जंगल में छोड़ दिया। ये दोनों हिरन तो सौभाग्यशाली रहे परंतु क्या जंगल के अन्य जीव भी इतने ही भाग्य के साथ जी पाते हैं। आग से झुलसते जंगल में मांस जलने की दुर्गन्ध और जानवरों के अवशेष दिख रहे थे।

सिलीय प्राणी आग से बचने के लिये भागते हैं परंतु अधिकांश आग से घिर जाने के कारण जल कर मर जाते हैं। वन्य जीवों के छोटे-छोटे बच्चे तो भाग भी नहीं पाते और जलकर मरना उनकी नियती बनता है। इतने बड़े वन क्षेत्र में आग लगने के बावजूद किसी भी स्तर पर कोई आंकड़ा जानकारी उपलब्ध नहीं है, कि वन्य जीवों पर क्या प्रभाव पड़ा है। आग के समय और बाद में वन्य जीवों की क्या स्थिति है, इसका कोई मोटा-मोटा आंकलन भी कहीं सार्वजनिक स्तर पर उपलब्ध नहीं है। जंगल में आग लगने से वन्य जीवों पर पड़ने वाले प्रभावों पर गहन अध्ययन करने की भी आवश्यकता है।

त्वरित बाढ़ और भूस्खलन


वनाग्नि से बारिश के तेज रफ्तार पानी को रोकने वाली वनस्पतियाँ, घास, झाड़ियाँ और पेड़ समाप्त हो जाते हैं। इस वर्ष मानसून के पहले की हल्की बारिशों से भी त्वरित बाढ़ की घटनायें हुई हैं जिनसे बढ़ी मात्रा में भूस्खलन हुआ है और तबाही हुई व कई लोगों की जान गई। इस वर्ष मई माह में ही त्वरित बाढ़ की घटनायें हुई। जंगल की आग से त्वरित बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं में तेजी आती है, जैसा इस वर्ष देखने को मिला सामान्य मानसून बारिश में भी त्वरित बाढ़ और भूस्खलन ने कई दर्जन जिंदगियों को मौत के मुँह में धकेला है। इस बार नदियों में त्वरित बाढ़ के दौरान जंगलों की आग की राख, कोयले के कारण काला पानी और मलबा बहकर आया। मई के प्रथम सप्ताह में ही हेंवलघाटी की प्रमुख नदी हेंवल में दो घंटे की बारिश से रात्रि की आठ बजे त्वरित बाढ़ ने दर्जनों गाँवों और कई कस्बों में अफरा तफरी मचाई। इस प्रकार की अनेकों घटनायें राज्य के छोटे-बड़े नदी-नालों में हुई, जिसका रिकॉर्ड कहीं उपलब्ध नहीं है। टिहरी, चमोली और पिथौरागढ़ जिलों में हुये बाढ़ व भूस्खलन से कई दर्जन लोगों की मौत हुई थीं वनाग्नि के प्रभाव ने इन घटनाओं की तीव्रता को बढ़ाया है।

वनाग्नि को समग्रता में समझने के लिये वन और जन के रिश्तों को समझना आवश्यक है। जन के वनों से टूटते रिश्तों के कारणों और उन प्रक्रियाओं, व्यवस्थाओं को समझना भी आवश्यक है, जिनकी वजह से जनसमुदाय का जुड़ाव जंगलों व प्रकृति से टूटा है। समाज और जंगल के रिश्तों में आई टूटन से वनाग्नि जैसी विनाशकारी घटनाओं में बढ़ोतरी के कारण पर्यावरण, स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर पड़े प्रभावों को समझे बिना जनसमझ तैयार नहीं की जा सकती है। वनों में आग लगने से नुकसान होता है परन्तु क्या कोई ऐसा भी है जिसे लाभ हो सकता है, यदि कोई ऐसा है तो उसकी पहचान करनी आवश्यक है।

 

वनाग्नि संकट से जूझता हिमालय उत्तराखण्ड

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

क्या होती है वन प्रकृति

2

वनाग्नि और इसके प्रभाव

3

उत्तराखण्ड में वनाग्नि के कारण

 

 

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