अंग्रेजों से अधिक अपनों ने की बंदरबांट

Submitted by Hindi on Thu, 06/15/2017 - 12:01
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Source
‘और कितना वक्त चाहिए झारखंड को?’ वार्षिकी, दैनिक जागरण, 2013

अंग्रेजी सरकार के समक्ष और उनकी जानकारी में यह बात थी कि कृषि भूमि के असली मालिक आदिवासी खेतिहर थे, जिन्हें 1823-24 से लेकर उन्नीसवीं सदी के अन्त तक छल-बल से लूटा गया। उनसे लूटी गई भूमि की वापसी के कोई प्रावधान इस अधिनियम में व्यवस्थित नहीं किए गए। 11 नवम्बर, 1908 को कलकत्ता गजट में छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट-1908 के प्रकाशन के साथ ही उस समय छोटानागपुर कहे जाने वाले सम्पूर्ण क्षेत्र में लागू किया गया। कलकत्ता गजट में इसका प्रकाशन इसलिये किया गया कि उन दिनों छोटानागपुर बंगाल प्रान्त का अंग था। इस कानून को बनाने और लागू करने का मुख्य उद्देश्य जमींदारों और खेतिहर भू-स्वामियों के बीच की सम्बन्धों और लगान-निर्धारण के मामलों को सुव्यवस्थित करना था। कृषि भूमि के स्वामित्व और दखल कब्जे के विवादों तथा फसलों की लूटपाट के क्रम में होते रहे मार-काट, खूनी संघर्ष आदि पर काबू पाने के जरिए क्षेत्र में अमन-चैन कायम करना था।

नतीजा हुआ कि भूमि के स्वामित्व और दखल कब्जे से सम्बन्धित होते आ रहे विवादों की समाप्ति हो गई, फलस्वरूप विधि व्यवस्था कायम हो गई। जमींदारों को निर्धारित लगान से अधिक की वसूली करने पर सजा ठहराई गई और लगान वसूल कर मालगुजारी रसीद नहीं देना दंडनीय अपराध माना गया। इनके कारण खेतिहर भू-स्वामियों को जमींदारों के शोषण और जुल्म से छुटकारा मिला। लेकिन, अंग्रेजी सरकार ने एक बात पर आदिवासी भू-स्वामियों पर न्यायपूर्ण प्रावधान नहीं बनाया।

अंग्रेजी सरकार के समक्ष और उनकी जानकारी में यह बात थी कि कृषि भूमि के असली मालिक आदिवासी खेतिहर थे, जिन्हें 1823-24 से लेकर उन्नीसवीं सदी के अन्त तक छल-बल से लूटा गया। उनसे लूटी गई भूमि की वापसी के कोई प्रावधान इस अधिनियम में व्यवस्थित नहीं किए गए।

इस प्रकार भू-लुटेरों के आपराधिक कार्यों को अनदेखा कर उन्हें कृषि भूमि का स्वामित्व प्रदान किया गया। अब तक छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट में 20 संशोधन हुए हैं, जिनमें से कुछ अच्छे हैं, लेकिन कुछ संशोधन छोटानागपुर के मूल बासिन्दों के लिये अनुपयुक्त और नुकसानदेह साबित हुए। जब तक अंग्रेज थे, इस अधिनियम के प्रावधान का सही पालन हुआ, लेकिन अंग्रेजों के 1947 में जाने के बाद और विशेष कर जमींदारी उन्मूलन के बाद क्षेत्र के कृषि कार्य को तथा कृषकों को कानूनों के सही पालन नहीं होने के कारण भारी नुकसान पहुँचा है। कानून का बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया जाता रहा है। जिन प्रावधानों के उल्लंघन से कृषि कार्य और झारखंडियों को भारी नुकसान हुआ, उनमें से कुछ की चर्चा नीचे की जाती है। यह स्मरण करना जरूरी है कि काश्तकारी कानून काश्त (खेती-बाड़ी) के और काश्तकारियों (कृषकों) के हित और संरक्षण के लिये बनाये जाते हैं, अन्य प्रयोजनों के लिये (कुछ अपवादों को छोड़) ये कानून नहीं बनते हैं।

दफा 21 के प्रावधान खेतिहर रैयतों के अलावे किसी और को कृषि भूमि पर घर-बाड़ी बनाने की अनुमति नहीं देते हैं। यानी कृषि भूमि का उपयोग गैर कृषि कार्य में नहीं किया जा सकता है। कृषि भूमि पर गैर कृषि कार्य करने के लिये दफा 49 और 50 के तहत जो प्रावधान है उसी अनुसार गैर कृषि कार्य किये जा सकते हैं, अन्यथा नहीं।

खामियाँ : दफा 21 के प्रावधानों का उल्लंघन अन्य दफाओं के प्रावधानों की अपेक्षा सबसे अधिक किया गया है और आज भी किया जा रहा है। इसी प्रावधान का उल्लंघन कर गाँवों का शहर राँची आज महानगर बन गया है। नगरपालिका तथा आरआरडीए को सीएनटी एक्ट के प्रावधानों को अवलंघित (ओवराइड) करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, क्योंकि नगरपालिका क्षेत्र में भी सीएनटी एक्ट लागू है, जो एक स्पेशल और लोकल एक्ट है। इनके प्रावधानों पर देश का कोई भी सामान्य कानून कुप्रभाव नहीं डाल सकता है।

दफा 22 में दफा 21 के प्रावधान के उल्लंघन करने पर उनके खिलाफ उपायुक्तों को कानूनी कार्रवाई करने की शक्ति दी गई।

खामियाँ : इसका पालन किसी भी उपायुक्त ने कभी भी नहीं किया। इस कारण उपायुक्तगण दफा 21 के प्रावधानों के उल्लंघन के लिये जिम्मेवार होते हैं। जब कानून बना है, तो उस अनुसार कार्रवाई होनी ही चाहिए।

दफा 46 में आज के प्रावधान हैं। वह भारत की आजादी के कुछ महीनों बाद बिहार सरकार की देन है। इसके द्वारा स्थायी रैयतों की कृषि भूमि को कुछ प्रतिबंधों (शर्तों) के साथ बिकाऊ बना दिया।

खामियाँ : छोटानागपुर में इसका प्रचलन ही नहीं था। इस कानून के लागू होने से पिछले 4-5 दशकों में कृषि हित और कृषकों के हितों को भारी नुकसान हुआ। अनाज का अभाव हो गया और कृषक कंगाल और भूमिहीन होकर हजारों की संख्या में उजड़ गए। बिहार सरकार ने राजनैतिक दुष्प्रेरणा से जानबूझकर ऐसा नुकसानदेह कानून बनाया, क्योंकि उन दिनों तक आदिवासी कांग्रेस पार्टी को स्थानीय निकायों के चुनावों में वोट नहीं देते थे। दफा 46 के प्रतिबंधों का खुला उल्लंघन करते हुए आदिवासी तथा गैर आदिवासी स्थाई रैयतों में थाने से बाहर तथा जिले के बाहर के लोगों के पास कृषि भूमि बेची, जिन्होंने दफा 21 के प्रावधान का उल्लंघन करते हुए खरीदी गई भूमि का गैर कृषि कार्य में उपयोग किया, घर मकान बना लिया। ऐसा उल्लंघन शिक्षित आदिवासी और गैर आदिवासी खरीदारों ने बड़े पैमाने पर किया। उपायुक्तों तथा उनके अधिकारियों ने यह जाँचा नहीं कि भू-क्रेता थाने या जिले का निवासी है या नहीं, उन्होंने अपनी कानूनी जिम्मेवारी को बिना निभाए भूमि बेचने की अनुमति दे दी। जिसे कानूनन जमीन खरीदने का हक नहीं बनता था, उसने भी जमीन खरीद ली। और यह धंधा आज भी जारी है। फिर इसी कानून में लुटेरों द्वारा कानून के उल्लंघन में की गई भूमि की नाजायज खरीद-बिक्री को जायज करने का प्रावधान भी वर्ष 1969 में बना दिया गया। जबकि भूमि लुटेरे को कानून तोड़ने की सजा मिलनी चाहिए थी, किन्तु ऐसा न कर कानून में उनके नाजायज कार्य का पुरस्कृत करने जैसी व्यवस्था बना दी गई।

दफा 48 के प्रावधानों का भी वही हाल हुआ जो दफा 46 के प्रावधानों के बाबत ऊपर बताया गया है।

दफा 49 के प्रावधानों के अनुसार रैयती भूमि को शिक्षा, चिकित्सा और धार्मिक प्रयोजनों तथा लोकहित प्रयोजनों के लिये भूमि अन्तरित करने का कानून वर्ष 1995 तक था।

दुरुपयोग : इस प्रावधान का भी दुरुपयोग हुआ। लेकिन, दुरुपयोग पर रोक लगाने की दिशा में सरकार और सरकारी अधिकारियों ने कुछ भी नहीं किया। वर्ष 1995 के संशोधन द्वारा शिक्षा, चिकित्सा और धार्मिक प्रयोजनों के स्थान पर औद्यतोगिक तथा खनन के लिये भूमि अन्तरण का कानून बना जो आज भी मौजूद है। इस प्रकार यह कानून आज उद्योगपतियों और खनिजों के पट्टेधारियों के हितों की वृद्धि के पक्ष में है, कृषि हितों और कृषक हितों को अनदेखा कर दिया गया।

दफा 50 में भू-अर्जन की प्रक्रिया सम्बन्धी प्रावधान है।



दुरुपयोग : छोटानागपुर के किसी भी उपायुक्त ने इस प्रावधान का उपयोग न कर बिहार राज्य के भू-अर्जन कानून का इस्तेमाल किया जो दफा 50 के प्रावधान के आलोक में अवैध है।

गैर कानूनी तरीके से आदिवासियों के हड़पी गई भूमि की वापसी के नाम पर वर्ष 1969 में एक रेगुलेशन जारी किया गया जो आज सीएनटी एक्ट की दफा 71ए के रूप में मौजूद है।

दुरुपयोग : इस कानून के कार्यान्वयन का नतीजा यह हुआ कि कम ही मामलों में आदिवासियों की जमीन वापस हुई। अधिकांश मामले या तो सही या गलत कारणों से खारिज कर दिए गए अथवा कानून तोड़ने वालों के पक्ष में फैसले लिये गए। इस प्रकार क्षेत्रफल के हिसाब से कानून तोड़ने वालों को अधिक जमीन मिली और आदिवासियों को कम।

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