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पुनर्वास नीति में खामियाँ ही खामियाँ

Author: 
ग्लैडसन डुंगडुंग
Source: 
‘और कितना वक्त चाहिए झारखंड को?’ वार्षिकी, दैनिक जागरण, 2013

सरकार द्वारा नियुक्त पुनर्वास आयुक्त, ग्राम सभा से विचार-विमर्श के बाद प्राथमिकता तय करेंगे। इससे स्पष्ट है कि इस नीति में प्रभावित परिवार के वर्तमान पीढ़ी का तो थोड़ा ख्याल रखा गया है, लेकिन इसके बाद आने वाली पीढ़ी के लिये कुछ भी प्रावधान नहीं है यानी प्रभावित परिवार की अगली पीढ़ी मजदूर बनने के अलावा कुछ नहीं कर सकती है। पुनर्वास यानी पहले तोड़ो घर, फिर होगी चर्चा और इसके बाद बनेगी नीति, वह भी पूँजीपतियों के मनमुताबिक। झारखंड सरकार ने राज्य बनने के आठ सालों के बाद पुनर्स्थापन व पुनर्वास नीति-2008 की घोषणा की। तत्कालीन मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने इस नीति की घोषणा करते हुए कहा था- यह राज्य के विकास का आधार है, इससे बेहतर पुनर्वास नीति नहीं हो सकती है। बात बिल्कुल सही, लेकिन कोड़ा ने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह नीति जमीन मालिकों के लिये बेहतर है या उद्योगपतियों के लिये।

पुनर्वास नीति में सबसे बड़ी बात जो है, वह यह कि कम्पनी के वार्षिक मुनाफे में से एक प्रतिशत जमीन मालिकों को दिया जाएगा। सम्भवतः यह प्रावधान भूरिया कमेटी के सुझावों के आधार पर किया गया। समिति ने अपने सुझावों में कहा था कि किसी भी उद्योग में स्थानीय लोग जिनकी जमीनें ली गई हों, उन्हें उद्योग में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। उद्योग में हिस्सेदारी का प्रावधान तो लोक-लुभावन दिखाई पड़ता है, पर महज एक प्रतिशत लाभ में हिस्सेदारी रैयतों को भीख देने से अधिक और क्या है। जिनकी जमीन पर कारखाना लगे, उन्हें बराबर की हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। आदिवासी समुदाय तो शिकार पर साथ जाने वाले कुत्तों को भी शिकार का बराबर हिस्सा देते हैं, लेकिन सरकार ने आदिवासियों की संस्कृति-परम्परा के खिलाफ यह पुनर्स्थापन व पुनर्वास नीति बनाई है।

दूसरी बात यह कि नीति में कहा गया है कि हिस्सेदारी का पैसा पुनर्वासित क्षेत्र के विकास पर खर्च होगा। ऐसे में मुनाफे का पैसा सीधे तौर पर विस्थापितों को नहीं मिलेगा। जाहिर है कि मुनाफे का एक प्रतिशत खर्च दिखाना बड़ी बात नहीं, जिसमें छल-कपट की कई गुंजाईश होगी, जैसा कि अब तक होता आया है। इस नीति का दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रावधान यह है कि खेती की जमीन के बदले दूसरी जगह पर खेती लायक जमीन दी जाएगी। राज्य सरकार ने अब तक सौ से अधिक एमओयू करार किए हैं। इसके लिये करीब दो लाख एकड़ जमीन की जरूरत है। अगर यहाँ के आदिवासियों और सदान रैयतों की खेती की जमीन ले ली जाती है तो उन्हें भी दो लाख एकड़ जमीन बदले में चाहिए। सवाल यह है कि सरकार इतनी जमीन कहाँ से लाएगी? खेती की जमीन तो सरकार के पास है ही नहीं।

गैर-मजरूआ और कुछ सरकारी जमीन थी उसे भी बन्दोबस्त कर दिया गया। ऐसे में क्या सरकार कारखानों से जमीन का भी उत्पादन करेगी? साफ है कि जमीन के बदले जमीन सिर्फ धोखा है। पुनर्वास नीति के बाकी प्रावधानों में कुछ भी नया नहीं है। जमीन के बदले नौकरी देने की बात कही गई है। प्रभावित परिवार अगर अनस्किल्ड है तो कम्पनी द्वारा उन्हें प्रशिक्षण दिया जाएगा। घर अधिग्रहित किए जाने के बदले ग्रामीण क्षेत्र में 10 डिसमिल जमीन या शहरी क्षेत्र में पाँच डिसमिल जमीन पर घर बनाकर दिया जाएगा। पुनर्वास नीति में कहा गया है कि जमीन लेने वाली कम्पनी पक्का मकान बनाकर देगी, जिसमें दो बेडरूम, एक ड्राइंग रूप, एक रसोई घर और एक शौचालय होगा।

सरकार द्वारा नियुक्त पुनर्वास आयुक्त, ग्राम सभा से विचार-विमर्श के बाद प्राथमिकता तय करेंगे। इससे स्पष्ट है कि इस नीति में प्रभावित परिवार के वर्तमान पीढ़ी का तो थोड़ा ख्याल रखा गया है, लेकिन इसके बाद आने वाली पीढ़ी के लिये कुछ भी प्रावधान नहीं है यानी प्रभावित परिवार की अगली पीढ़ी मजदूर बनने के अलावा कुछ नहीं कर सकती है। जहाँ तक आदिवासी समुदाय का सवाल है, तो वे अपना अस्तित्व खो देंगे, क्योंकि स्वतंत्र रूप से जीने वाले समुदाय को पुनर्वास के नाम पर किसी कोने में रख दिया जायेगा।

पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास नीति में यह भी कहा गया है कि प्रभावित परिवार को प्रतिमाह एक हजार रुपये प्रति एकड़ की दर से 30 वर्षों तक मुआवजा दिया जाएगा। यानि जिस परिवार की जमीन कम-से-कम एक एकड़ होगी, उसे कुल 12 हजार रुपये प्रतिवर्ष दिया जाएगा, जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने वालों की आय से भी कम। यानी यह पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास नीति बीपीएल की संख्या को और बढ़ाएगी। इसमें यह भी प्रावधान है कि यदि कोई परिवार पुनर्स्थापित क्षेत्र में नहीं रहना चाहता है, तो उसे एक बार में तीन लाख रुपये दिये जाएँगे तथा प्रभावित क्षेत्र में कम-से-कम 12 वर्षों से रहने वाले बीपीएल परिवार, जिनका अपना मकान नहीं भी हो, तब भी उन्हें कम-से-कम 100 वर्ग मीटर का एक आवास बनाकर दिया जाएगा। यदि वे आवास नहीं लेना चाहेंगे, तो उन्हें एक बार में दो लाख रुपये की वित्तीय सहायता देनी होगी। यह प्रावधान प्रभावित परिवार को घुमन्तू बना देगा, क्योंकि पुनर्वास के नाम पर मिलने वाली राशि के खत्म होने के साथ इस परिवार के पास कुछ भी नहीं बचेगा तथा सरकार एवं कम्पनी भी अपने दायित्व से बरी हो जाएँगे। यह प्रावधान सिर्फ लाभ पर आधारित परिवारों के लिये फायदेमंद होगा, लेकिन आदिवासी समुदाय जो लाभ से कभी सरोकार नहीं रखता है, इसलिये इस समुदाय के पास लुटाने के अलावा कुछ भी नहीं बचेगा।

यह नीति जमीन मालिकों खासकर आदिवासियों को लालच दिखाकर उनकी जमीन हड़पने का हथियार है। सरकार की मंशा सही होती तो इस नीति में जमीन मालिकों को शेयर होल्डर बनाकर कम्पनी के मुनाफे का 50 प्रतिशत हिस्सा उन्हें देने का प्रावधान किया गया होता। अगर कम्पनी अपने वादे के मुताबिक कार्य नहीं करती है, तो उसे हटाने का अधिकार जमीन रैयतों को होता एवं कम्पनी बन्द होने की स्थिति में उन्हें जमीन पुनः वापस मिल जाती। लेकिन उद्योगपतियों के इशारे पर इन प्रावधानों को सीधे तौर पर नकार दिया गया है। कम्पनी द्वारा स्वयं जमीन अधिग्रहण करने वाली जमीन में पुनर्वास नीति लागू नहीं होती। इसका मतलब यह खेल रैयतों को धोखे में रखकर उनकी जमीन हड़पने की साजिश है, क्योंकि अब कम्पनी सीधे गाँव वालों से जमीन खरीदने हेतु स्वतंत्र है और रैयतों को पुनर्वास के नाम पर कुछ नहीं मिलेगा।

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