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पेस्टीसाइडों का स्थायित्व और पर्यावरण प्रदूषण

Author: 
डॉ. दिनेश मणि
Source: 
ज्ञान-विज्ञान शैक्षिक निबन्ध, पुस्तक माला - 3

पेस्टीसाइड (पीड़कनाशी) ऐसे रसायन हैं जो पौधों को क्षति पहुँचाने वाले कीटों, कवकों, सूत्रकृमियों, कृन्तकों एवं खरपतवारों को नष्ट करते हैं, या उन पर नियंत्रण रखते हैं। पेस्टीसाइडों को उनके प्रकार और उपयोग के आधार पर कीटनाशी, कवकनाशी, सूत्रकृमिनाशी, खरपतवारनाशी, शाकनाशी, आदि वर्गों में वर्गीकृत किया गया है।

फसलों से अधिक उत्पादन प्राप्त करने हेतु फसल संरक्षण में नाशीजीव रसायनों का प्रयोग बहुत समय से हो रहा है। आरम्भ में ये रसायन बहुत ही प्रभावी सिद्ध हुए किन्तु विगत कुछ दशकों से इनकी मारक क्षमता में कमी आई है तथा इनके अत्यधिक प्रयोग के फलस्वरूप पर्यावरण प्रदूषण की समस्या भी उत्पन्न हो गई है। पर्यावरण के विभिन्न घटकों यथा मृदा, जल, वायु, पौधे, जीव-जन्तु, दूध, अंडा, मांस तथा अन्य खाद्य पदार्थ सभी में इन रसायनों के अवशेष पाये जा रहे हैं। इन समस्याओं के निराकरण हेतु रसायनों के कम-से-कम इस्तेमाल पर बल दिया जा रहा है।

रॉशेल कार्सन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द साइलेंट स्प्रिंग’ में बिना सोचे, समझे कीटनाशकों के अन्धाधुन्ध प्रयोग के बारे में विस्तार से वर्णन किया है। उन्होंने बताया है कि कीटनाशकों की इतनी लापरवाही से प्रयोग किया गया है कि वास्तविक हानिकारक कीटों के अतिरिक्त अन्य जीवों को भी नष्ट कर दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि कीटों का जैविक नियंत्रण प्रभावित हुआ और कीटों में रासायनिक कीटनाशकों के लिये प्रतिरोध उत्पन्न हो गया। कीट पुनः बड़ी संख्या में उत्पन्न हुए, द्वितीयक हानिकारक कीट भी उत्पन्न हो गए और पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो गई।

. जीव जगत में पौधभक्षी कीट 26 प्रतिशत एवं शिकारी, परजीवी, परागणकर्मी तथा सफाईकर्मी कीट 31 प्रतिशत हैं। पौधभक्षी अथवा नाशीकीट की केवल एक प्रतिशत जातियाँ ही क्षति पहुँचाती हैं। विश्व में मात्र 3500 कीटों की जातियाँ ही नाशीकीट के रूप में पहचानी गई हैं। हमारे देश में कीटों की लगभग 1000 जातियाँ ही फसलों एवं फसल उत्पादन को खेतों में अथवा भण्डारण में क्षति पहुँचाती हैं।

कृषि में प्रयुक्त किये जाने वाले विभिन्न कीटनाशी, शाकनाशी, कवकनाशी आदि रसायनों का भूमि में विघटन होता रहता है और इनके तरह-तरह के कम विषैले या विषरहित अवशेष पदार्थ बनते रहते हैं, परन्तु इनमें से कुछ रसायन दीर्घस्थायी होते हैं और इनके अवशेष पदार्थ मृदा, जैवमण्डल को बहुत समय तक प्रदूषित किये रहते हैं। इन रसायनों के अवशेष उत्पाद मृदा सूक्ष्मजीवों को (जो कि मृदा की उर्वरता के लिये उत्तरदायी होते हैं।) प्रभावित करते हैं और उनके कार्यशीलता को कम कर देते हैं। ये रसायन तब तक मृदा जैव-मण्डल को असन्तुलित किये रहते हैं, जब तक कि इनका पूर्ण क्षय नहीं हो जाता।

वाष्पीकरण, वाष्पोत्सर्जन, जल-अपघटन, प्रकाश-अपघटन पौधों की उपापचयी क्रियाओं, निक्षालन, सूक्ष्मजीवों द्वारा विच्छेदन तथा अन्य रासायनिक क्रियाओं के अतिरिक्त मृदा के कणों तथा कार्बनिक पदार्थ द्वारा इन विषाक्त रसायनों का अधिशोषण हो जाता है। कुछ रसायन तथा उनके अवशेष इतने स्थायी देखे गए हैं कि एक बार उपयोग करने के उपरान्त मृदा में वर्षों तक विद्यमान रहते हैं और मृदा जीवों के लिये अत्यन्त विषाक्त बने रहते हैं। मृदा में आर्गेनोक्लोरीन वर्ग के कीटनाशकों का स्थायित्वकाल काफी लम्बा होता है। इनमें से डी.डी.टी. तो काफी अलोकप्रिय हो चुका है। इनके अवशेष कई वर्षों तक मृदा में विषाक्त रूप में पड़े रहते हैं। इनके इसी अवगुण के कारण ही अनेक विकसित एवं विकासशील देशों में इनके उपयोग पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है।

मृदा में आर्गेनोक्लोरीन कीटनाशियों के स्थायित्व पर बहुत शोध कार्य हुआ है। इनके दीर्घस्थायित्व होने के कारण ही आर्गेनोफास्फेट, कार्बामेट, संश्लेषित पायरेथ्राइड आदि अतिविषाक्त, अल्पस्थायी रसायनों की खोज हुई जो आर्गेनोक्लोरीन, रसायनों की अपेक्षा अल्पस्थायी तो हैं पर इनके तीक्ष्ण विष मृदाजीवों के लिये हानिकारक हैं और पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं।

दीर्घस्थायी रसायन तब तक मृदा जैवमण्डल को प्रदूषित किये रहते हैं जब तक ये पूर्णरूप से नष्ट नहीं हो जाते। मृदा के कणों तथा कार्बनिक कोलायडों द्वारा इन विषाक्त जीवनाशी रसायनों का अधिशोषण भी एक महत्त्वपूर्ण क्रिया है जो मृदा के उर्वरता को प्रभावित करती है। यह अधिशोषण कीटनाशी रसायन की उपलब्धि, उसकी जैविक क्रिया, सूक्ष्मजीवों के प्रति सहिष्णुता और उनकी उपापचयी क्रिया आदि को तो प्रभावित करता ही है, साथ ही मृदा में कार्बनिक पदार्थों के विघटन, नाइट्रोजन, स्थिरीकरण, फास्फोरस तथा सल्फर के विलयनीकरण आदि से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण क्रियाएँ भी इससे प्रभावित होती हैं। दीर्घस्थायी रसायन प्रयुक्त की गई भूमि से वर्षा व सिंचाई जल द्वारा बहकर नदी, पोखरों, जलाशयों में तथा निक्षालन द्वारा मृदा के निचले संस्तरों में जमा होते रहते हैं। मृदा में पड़े अवशेष मृदाजीवों के ऊतकों में आसानी से पहुँचकर संचित होते देखे गए हैं। डी.डी.टी., गैमेक्सीन, एल्ड्रिन आदि कुछ ऐसे रसायन हैं जो धीरे-धीरे जीव-जन्तुओं के शरीर में एकत्रित होकर विभिन्न बीमारियाँ उत्पन्न करते हैं।

 

सारणी-1 कुछ प्रमुख पीड़कनाशियों के दीर्घस्थायित्व की अवधि

पीड़कनाशी

 

1.

आर्सेनिक

अनिश्चित

2.

क्लोरीनेटिड हाइड्रोकार्बन (जैसे डी.डी.टी., क्लोरडेन आदि)

2 से 5 वर्ष

3.

ट्रायजीन शाकनाशी (जैसे एट्राजिन, सिमेजीन आदि)

1 से 2 वर्ष

4.

बैंजोइक एसिड शाकनाशी (जैसे एनीबेन, डाइकेन्बा)

2 से 12 महीने

5.

यूरिया शाकनाशी (जैसे मोन्यूरान, डाईयूरान)

2 से 10 महीने

6.

फिनॉक्सी शाकनाशी (जैसे 2,4-डी., 2,4,5-टी., क्लोरोडेन, आदि)

 

7.

आर्गेनेफास्फेट कीटनाशी (जैसे पेराथियान, मेलाथियान आदि)

1 से 2 सप्ताह

8.

कार्बामेक कीटनाशी

1 से 8 सप्ताह

9.

कार्बामेट शाकनाशी

2 से 8 सप्ताह

 

 

पीड़कनाशियों की पर्यावरणीय नियति


पीड़कनाशियों की पर्यावरणीय नियति

 

विभिन्न पर्यावरणीय घटकों में सम्पन्न होने वाली स्थानान्तरण प्रक्रियाएँ

प्रकियाएँ

पर्यावरणीय घटक, जिनमें ये प्रभावी होती हैं।

जैव-विच्छेदन

मृदा, जल

जल-अपघटन

मृदा, जल

प्रकाश-अपघटन

वायु, मृदा, जल

 

 

एक पर्यावरणीय घटक से दूसरे घटक में रासायनिक प्रदूषकों के स्थानान्तरण के सम्भावित मार्ग


Untitled पारिस्थितिक प्रतिक्रियाओं के कारण बहुत से कीटों में उनके नियंत्रण के लिये प्रयुक्त होने वाले कीटनाशियों के प्रति प्रतिरोध उत्पन्न होने लगा। इसके परिणामस्वरूप कीट-नियंत्रण के उपाय प्रभावहीन होने लगे। साथ ही अत्यन्त अविषालु दीर्घस्थायी और व्यापक प्रभावों वाले कीटनाशियों के अन्धाधुन्ध प्रयोग ने अलक्षित तथा लाभदायक कीटों जैसे परजीवियों, परभक्षियों तथा परागण-कीटों पर प्रभाव डाला और उनकी संख्या घटने लगी। इससे कम हानि पहुँचाने वाले नाशक कीट अधिक हानि पहुँचाने वाले नाशककीटों में परिवर्तित हो गए। इनका प्रादुर्भाव बार-बार होने लगा, क्योंकि प्राकृतिक शत्रुओं की संख्या कम हो जाने के कारण प्राकृतिक नियंत्रण में बाधा पहुँची। इन परिस्थितियों ने रासायनिक नियंत्रण विधि को ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया कि पिछले अनुभवों के आधार पर इस उपाय पर पुनर्विचार एवं गहन परीक्षण आवश्यक हो गया। फलतः इससे यह निष्कर्ष निकालने के लिये बाध्य होना पड़ा कि नाशक कीट नियंत्रण का अन्तिम हल ऐसे उपायों में निहित है जिसमें कीट नियंत्रण में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न उपायों का संगत और सन्तुलित समन्वय किया जाये। इसे समन्वित कीट प्रबन्धन का नाम दिया गया। कीटनाशी रसायन इस व्यवस्था के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। लेकिन उनके उपयोग के लिये यह आवश्यक हो गया कि उन्हें अधिक तर्कपूर्ण और सन्तुलित रूप में प्रयुक्त किया जाय जिससे लाभकारी कीटों पर कम-से-कम प्रभाव पड़े।

कीटनाशियों को बार-बार उपयोग में न लाकर यदि आवश्यकतानुसार व्यवहार में लाये तो इनकी मात्रा को कम किया जा सकता है। इसी के साथ ही यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है कि किसी पारिस्थितिक-तंत्र में कीटनाशियों के निवेश की मात्रा को भी कम किया जाय। ऐसा देखा गया है कि अधिकतम उपयुक्त परिस्थितियों के अन्तर्गत भी प्रयोग की गई कीटनाशी धूल का 10 से 20 प्रतिशत ही पौधों की सतहों पर पहुँचता है, जिसका एक प्रतिशत से भी कम भाग लक्ष्य कीट तक पहुँचता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि कीटनाशियों के उपयोग के लिये प्रयुक्त की जाने वाली विधियों में पर्याप्त सुधार की सम्भावना है। साथ ही उनके संरूपण (फार्मूलेशन) और उन उपकरणों में भी सुधार की आवश्यकता है जिनके द्वारा उन्हें लक्ष्य तक पहुँचाया जाता है। इससे कीटनाशियों की निवेशित मात्रा में अवश्य कमी आएगी तथा पर्यावरण प्रदूषण भी कम किया जा सकेगा।

पेस्टीसाइडों के दीर्घस्थायित्व से होने वाले प्रदूषण से बचाव के लिये इनके विकल्प जैसे- जैविक नियंत्रण, कृषीय क्रियाओं द्वारा नियंत्रण, भौतिक या यांत्रिक उपायों को अपनाया जाना आवश्यक है। वानस्पतिक उत्पत्ति वाले कीटनाशियों जैसे निकोटीन, पाइरेथ्रिन, रोटेनान, अजॉडिरेक्टिन के इस्तेमाल को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है क्योंकि इनका जैव-विच्छेदन आसानी से हो जाता है और ये कोई विषैले अवशेष पदार्थ नहीं छोड़ते हैं। इस प्रकार पेस्टीसाइडों द्वारा होने वाले प्रदूषण से बचा जा सकता है।

एसोशिएट प्रोफेसर
रसायन विज्ञान विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद, 211002 (उत्तर प्रदेश), ई-मेल : dineshmanidsc@gmail.com


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