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फिलहाल आसान नहीं है गंगा की सफाई का मसला


. गंगा सफाई का सवाल दिन-ब-दिन उलझता जा रहा है। इस संदर्भ में जैसे दावे किए जा रहे थे कि गंगा 2018 तक साफ हो जायेगी, उसकी उम्मीद फिलहाल बेमानी है। गंगा की वर्तमान में जो हालत है उसे देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि गंगा की सफाई का मसला उतना आसान नहीं है जितना समझा जा रहा था। इस दिशा में जो विचारणीय है, वह यह कि गंगा सफाई के लक्ष्य को जिस रूप में देखा जाना चाहिये था, उसका पूरी तरह अभाव रहा। दरअसल सरकार ने इसे एक राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में देखा लेकिन नौकरशाही ने न तो इसे राष्ट्रीय लक्ष्य माना और न ही उसे उस स्तर पर प्राथमिकता ही दी। जबकि यह योजना प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना थी और वह इसमें विशेष रुचि भी ले रहे थे।

इसके बावजूद योजना का आगे न बढ़ना गंभीर चिंता का विषय है। वह भी उस दशा में जबकि योजना की कामयाबी के लिये सरकार के सात मंत्रालयों की प्रतिष्ठा दाँव पर लगी हो। यहाँ सवाल यह उठता है कि इस योजना के क्रियान्वयन और उसको अमलीजामा पहनाने में किसी किस्म के संसाधनों का अभाव एक बड़ी अड़चन के रूप में सामने था, नौकरशाही या सरकारी मशीनरी की इच्छाशक्ति का अभाव प्रमुख था जिसके चलते बीते तीन साल ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसे देखकर यह आशा की जा सके कि अब गंगा साफ हो जायेगी। जबकि सरकार यह कहते नहीं थकती कि संसाधनों के अभाव की बात बिल्कुल बेमानी है।

इसमें दोराय नहीं कि इस तथ्य को नेता, नौकरशाह, सभी भली-भाँति जानते-समझते हैं कि गंगा देश के जनमानस की आस्था से जुड़ी है। गंगा सफाई के मसले पर बीते अप्रैल महीने में संपन्न समीक्षा बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने योजना की धीमी चाल पर गहरी चिंता जाहिर की थी। दुख की बात यह कि योजना के लिये निर्धारित बजट का अधिकांश हिस्सा बिना खर्च के पड़ा था। ऐसी स्थिति में योजना का 2018 तक पूरा होना कदापि संभव नहीं था। बाकी कामों की बात तो दीगर है, केवल एसटीपी चालू होने को ही लें, यहाँ चालू होने की बात तो दीगर है, अहम सवाल तो उनके लगने का है या फिर शवदाह गृहों में सुधार को ही लें, जाहिर है इन कामों में अभी तक केवल औपचारिकताएँ ही पूरी हुई हैं। ऐसे हालात में गंगा के बहाव पथ में बसे शहरों के सीधे तौर पर गिर रहे सीवेज के शोधन का तो सवाल ही कहाँ उठता है। इस दिशा में राष्ट्रीय हरित अधिकरण की जितनी भी प्रशंसा की जाये, वह कम ही है।

क्योंकि उसने गंगा सफाई के मसले पर समय-समय पर नमामि गंगे मिशन के अधिकारियों के अलावा न केवल केन्द्र सरकार बल्कि राज्य सरकारों को कड़ी चेतावनी ही दी, उन्हें उनके गंगा की सफाई के मसले पर उपेक्षा किये जाने के सवाल पर फटकारा भी और गंगा में प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों-प्रतिष्ठानों, टेनरियों और कचरा डालने पर कड़ा दण्ड दिये जाने व जुर्माना लगाये जाने के आदेश भी दिये। साथ ही अधिकरण ने गंगा में कचरा फेंक रहे बिजली संयंत्रों से जवाब तलब किया कि उन्होंने गंगा को प्रदूषित होने से रोकने की दिशा में अभी तक क्या उपाय किये हैं। उसने बिजली, पर्यावरण, वन व जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से भी कहा है कि वे इस बाबत बैठक करें और हलफनामे के साथ अधिकरण में अपनी टिप्पणियाँ दाखिल करें।

इन हालातों में जैसाकि सरकार दावा कर रही है कि गंगा सफाई के लिये नमामि गंगे परियोजना के तहत किये जाने वाले प्रयासों का असर वर्ष 2018 में दिखने लगेगा, सभंव नहीं लगता। वैसे ऐसे दावे तो हमारी केन्द्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती जी 2015 से ही बराबर करती रही हैं कि गंगा सफाई का असर 2016 के अक्टूबर महीने से ही दिखने लगेगा। आज वर्ष 2017 के भी सात महीने बीत चुके हैं गंगा में सफाई का असर तो दिखाई नहीं दिया बल्कि वह जैसे पहले मैली थी, उससे कहीं अधिक मैली दिखाई दे रही है। यही वह अहम वजह रही जिसके चलते केन्द्र सरकार के मंत्रियों में बयानों के मामले में शीर्ष पर रहने वाली केन्द्रीय मंत्री उमा भारतीजी को बीते दिनों संसद में कहना पड़ा कि गंगा की सफाई अब सिर्फ सरकार के बूते संभव नहीं है।

सरकार की भूमिका केवल निर्माण कार्य तक है। गंगा को साफ रखने के लिये लोगों की भागीदारी जरूरी है। उनके अनुसार सरकार गंगा नदी के बहाव क्षेत्र में पड़ने वाले राज्यों के सुझावों के आधार पर गंगा नदी संरक्षण को गति देने के लिये तथा इस मार्ग में आने वाली अड़चनों को दूर करने के लिये एक कानून लाने पर विचार कर रही है। इस पर गंगा बेसिन के तहत आने वाले सभी पाँच राज्य सहमत हैं। संसद में लाने से पहले इस कानून के प्रस्तावों को संबंधित राज्यों के साथ साझा किया जायेगा।

ऐसा लगता है कि अब सरकार की मंशा गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक गंगा के लिये एक कानून बनाने की है। इसके तहत गंगा के अलावा यमुना जैसी उसकी महत्त्वपूर्ण सहायक नदियों की देखभाल का जिम्मा भी होगा। सहायक नदियों पर भी गंगा का कानून लागू होगा। स्वच्छ गंगा मिशन के लिये व्यय होने वाली राशि का ऑडिट केन्द्रीय एजेंसी करेगी और उसकी रखवाली मानक के अनुरूप की जायेगी। गंगा की 24 घंटे रखवाली के लिये गंगा पुलिस की तैनाती की जायेगी। गंगा को प्रदूषित करने वाले व्यक्ति के लिये जुर्माना और दण्ड का प्रावधान होगा। नये कानून के तहत बनने वाले नये प्राधिकरण के बाद हाल फिलहाल गंगा की देखभाल कर रही गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी और नमामि गंगे मिशन का वजूद समाप्त हो जायेगा। गंगा की रक्षा का पूरा अधिकार केन्द्र सरकार का होगा। इस कानून का मसौदा इस प्रकार तैयार किया जा रहा है कि इसमें राज्य सरकारें मनमानी ना कर पायें। कानून के तहत गंगा पर अंतिम निर्णय का अधिकार केन्द्र सरकार के पास होगा।

फिलहाल सरकार गंगा सफाई कार्यक्रम में तेजी लाने हेतु समितियाँ गठित किये जाने पर विचार कर रही है। उसके अनुसार गंगा में रेत खनन, डी-सिल्टिंग और गंगा की अविरलता के लिये अन्तरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ माधव चितले की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया जायेगा जो भीमगौड़ा से फरक्का तक डि-सिल्टिंग से सम्बन्धित कामों के लिये सिफ़ारिशें व दिशा-निर्देश जारी करेगी। साथ ही राज्यों की सहमति से वहाँ के गैर-चिन्हित नालों पर जल शोधन प्रौद्योगिकी के परीक्षण हेतु छोटे-छोटे प्रोजेक्ट चलाये जायेंगे। गंगा स्वच्छता पर नमामि गंगे कार्यक्रम का क्रियान्वयन कर रहे दो मौजूदा निकायों के स्थान पर दो स्तरीय तंत्र गठित किया जायेगा। उनमें एक ‘एकीकृत विकास परिषद’ के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होंगे जिसमें जल संसाधन, पर्यावरण, शहरी विकास, विद्युत, ग्रामीण विकास, पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री, गंगा बेसिन के पाँचो राज्यों के मुख्यमंत्री और पाँच सह चयनित विशेषज्ञ शामिल होंगे।

इसके अलावा दूसरे ‘राष्ट्रीय नदी गंगा बेसिन प्रबंधन निगम’ की अध्यक्ष जल संसाधन मंत्री होंगी। इसमें जल संसाधन, पर्यावरण मंत्रालयों के सचिव, नीति आयोग के उप प्रमुख, सीपीसीबी के अध्यक्ष, आइडीसी के पाँच विशेषज्ञ शामिल होंगे। गंगा में गाद की समस्या के लिये भी एक विशेषज्ञ समिति गठित होगी। बीते दिनों सरकार ने उत्तर प्रदेश और बिहार के लिये तीन-तीन परियोजनाएँ मंजूर की हैं जो दोनों राज्यों में सीवेज शोधन संयंत्रों की स्थापना और घाटों के विकास हेतु शोध करेंगी।

जाहिर है कि अभी फिलहाल गंगा सफाई की उम्मीद बेमानी है। मोदी सरकार तीन साल बाद अभी गंगा सफाई हेतु समितियों, निकायों के गठन की ही प्रक्रिया चला रही है। इनकी रिपोर्टें, विशेषज्ञों की सिफारिशें कब आयेंगी, उसके बाद उन पर क्रियान्वयन कब होगा, यह भविष्य के गर्भ में है। सरकार ने इसकी कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की है। हाँ दावे जरूर किये जा रहे हैं। गंगा सफाई के दावों से जनता अब उब चुकी है। 1986 से यही सब तो वह देख रही है। ऐसा लगता है कि शायद 2019 के चुनावों में मोदी जी जनता से गंगा की सफाई के लिये पाँच साल और माँगें। मौजूदा हालात तो ऐसे ही संकेत दे रहे हैं।

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