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बारिश, जंगल और सिनेमा

Author: 
उमेश कुमार राय

राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म निर्देशक श्रीराम डाल्टन के नेतृत्व में नये फिल्म डायरेक्टरों ने पिछले साल पानी पर वर्कशॉप किया था और पानी के मुद्दे पर ही 10 लघु फिल्में बनायी थीं। इस साल उन्होंने नेतारहाट में जंगल के मुद्दे पर वर्कशॉप की और इस मुद्दे पर फिल्में भी बनायीं। वर्कशॉप के दौरान क्या हुआ और किस तरह की कठिनाइयाँ व चुनौतियाँ आईं, साझा कर रहे हैं श्रीराम डाल्टन-

WorkShop-in-Jungle 25 जुलाई 2017 को जब हम झारखंड के नेतारहाट के लिये रवाना हुए, तो 50 किलोमीटर पहले से ही घाटी में घनघोर कोहरे की चादर दिखने लगी। एक तरफ पहाड़, तो दूसरी तरफ खाई और उस पर कोहरा। दृश्य पूरी तरह सिनेमाई था, लेकिन कोहरा इतना घना था कि दो कदम की दूरी पर भी कुछ नहीं दिख रहा था। हम काफी सावधानी बरतते हुए आगे बढ़ने लगे और नेतारहाट पहुँचे। वहाँ हमारा स्वागत मूसलधार बारिश ने किया। हमें पता चला कि पिछले तीन दिनों से ऐसी ही जबरदस्त बारिश हो रही है। कई जगह पेड़ टूट कर धराशाई हो गये थे। कई जगहों पर बिजली के तार भी टूट चुके थे।

वैसे, हमें झारखंड के सबसे ऊँचे पहाड़ और घने जंगल की बारिश का अंदाज़ा था। हम जब वर्कशॉप की तारीख तय कर रहे थे तो हमें लगने लगा था कि इस बार कई तरह की चुनौतियों से जूझना होगा। कई लोगों ने हमें आगाह भी किया था कि ‘अरे ! इस समय तो बहुत बारिश होगी!’ पर हम पानी और जंगल की जुगलबंदी देखना और दिखाना चाहते थे तथा इसके लिये हम मुसीबत झेलने के लिये पूरी तरह तैयार थे।

पिछला वर्कशॉप हमने मई की झुलसा देनेवाली गर्मी में किया था। गर्मी को झेलना बारिश से ज्यादा मुश्किल है क्योंकि गर्मी में आपका दिल-दिमाग काम नहीं करता। आपकी ऊर्जा बेवजह नष्ट हो जाती है। इन सबके बावजूद हमारा पिछला वर्कशॉप कामयाब रहा था, इसलिये इस बार हममें अधिक ऊर्जा थी।

खैर, मैं बात कर रहा था नेतारहाट में बारिश का। तो जैसा मैंने बताया कि जब हम नेतारहाट पहुँचे, तो जोरदार बारिश हो रही थी। हमारे पहुँचने के तीन बाद तक लगातार वहाँ बारिश होती रही जिससे हमारे सामने कई चुनौतियाँ आ गयीं। इन चुनौतियों के बीच ही हमारा वर्कशॉप शुरू हुआ।

यहाँ मैं यह बताना चाहता हूँ कि पिछली बार की तुलना में इस बार नये लोग अधिक आये थे। तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए करीब 80 लोग वर्कशॉप में हिस्सा लेने के लिये पहुँच गये थे। पूरी टीम चार अलग-अलग जगहों पर ठहरी हुई थी। वर्कशॉप को सफल बनाने में गाँव के लोग, नेतारहाट पंचायत के लोग, नेतारहाट आवासीय विद्यालय प्रशासन, लातेहार प्रशासन डीसी, डीडीसी अनिल सिंह, महुआडार बीडीओ, लोहारदग्गा डीएफओ, आर्ट एंड कल्चर डिपार्टमेंट के राहुल शर्मा, रणेंद्र कुमार, डायरेक्टर, आर्ट एंड कल्चर, डायरेक्टर आईपीआरडी, ग्रामीण विकास एनएन सिन्हा, आईपीआरडी संजय कुमार समेत आईपीआरडी के सभी लोग, वन विभाग और डाल्टनगंज डीसी और पलामु आईपीटीए का भरपूर सहयोग मिला।

वर्कशॉप के दौरान हमलोगों ने एक फीचर फिल्म भी बनायी। इस फिल्म को एके पंकज ने लिखा है। फिल्म की स्क्रीन प्ले और डायलॉग दुष्यंत ने लिखा है। दुष्यंत जी अपनी ज़िम्मेदारी को अंजाम तक पहुँचाने के लिये एक हफ़्ता पहले ही राँची पहुँच गये पंकज जी और हमारी टीम के साथ कई रातें फिल्म पर चर्चा करने में गुजारीं। चर्चा की वे रातें बेहद यादगार रहीं। पंकज जी के साथ कभी-कभी स्क्रिप्ट को लेकर मोहब्बताना बहस होती और दोनों के माथे पर शिकन आ जाती जिसे चाय की चुस्कियों से दूर कर लिया करते थे। गरमागरम चाय जब अंदर जाती, तो कई नई चीजें बाहर आतीं, जिन्हें हम हर्फ में ढालकर कोरे सफहे पर सजा दिया करते। इस तरह एक बेहतरीन स्क्रिप्ट तैयार हो गयी।

वर्कशॉप की कमान मिलिंद उके जी ने अपने हाथों में ली और काफी व्यवस्थित तरीके से प्रतिभागियों के साथ उन्होंने क्लास शुरू की। मिलिंद उके शाहिद कपूर व नाना पाटेकर अभिनीत फिल्म ‘पाठशाला’ कई फिल्मों का निर्देशन कर चुके हैं।

छह दिनों तक फिल्म मेकिंग के ग्रामर, सम्भावनाएँ, फिल्म निर्माण की प्रक्रिया और तकनीक समझते हुए प्रतिभागी अपनी-अपनी कहानियों पर काम करने लगे। साथ में मिलिंद उके ने एक फिल्म अपने मेंटरशिप में ली थी, जिसको उन्होंने बहुत कम समय में और सुंदर तरीके से पूरा किया। चार नये लोगों ने उस फिल्म को मिलिंद जी की देखरेख में निर्देशित किया। मिलिंद उके पाँच दिन तक इस वर्कशॉप में रहे।

विभा रानी 25 जुलाई को नेतारहाट पहुँचीं और 30 को वापस मुंबई लौट गईं। विभा दी ने थियेटर की बारिकियाँ और अभिनय के बारे में प्रतिभागियों को टिप्स दिये। उन्होंने नौटंकी शैली और पारंपरिक गारी-गीत का मंचन भी किया। यही नहीं, फीचर फिल्म ‘बलेमा’ के कलाकारों को भी उन्हें प्रशिक्षण दिया। उक्त फीचर फिल्म मिलिंद उके और विभा दी के सहयोग से पूरी हो चुकी थी और बाकी फिल्मों में टीम मेंबर लग गये थे।

वर्कशॉप के लिये विशारद बसनेत भी समय से पहले पहुँच गये थे और उन्होंने वर्कशॉप में आये प्रतिभागियों को फिजिकल ऐक्टिंग के बारे में बताया। विशारद नेपाल से इतनी दूर नेतारहाट पहुँचे थे, जिससे आप समझ सकते हैं कि वह इस वर्कशॉप को लेकर कितने गंभीर थे।

अगस्त की शुरुआत में नितिन चंद्र भी वर्कशॉप में शामिल होने के लिये मुंबई से निकल चुके थे। वे राँची से नेतारहाट आ रहे थे कि अत्यधिक बारिश के कारण रास्ते में पेड़ गिर पड़ा जिस कारण उन्हें वापस राँची लौट जाना पड़ा। वह एक दिन बाद नेतारहाट पहुँचे और फिल्म निर्माण की बारीकियों के बारे में बताया। जंगल पर बनने वाली दो लघु फिल्में उनके दिशा-निर्देशन में बनीं।

इन सभी चीजों के बीच एक और मजेदार काम हुआ, जो नेतारहाट फिल्म इंस्टीट्यूट के लिये पहचान बन गया। श्रीलंका से आये प्रख्यात स्कल्पचर प्रगीत मनोहंसा ने एक आर्टवर्क इंस्टीट्यूट को भेंट किया। प्रगीत लोहे की बेकार चीज़ों को बिना उसके फॉर्म को तोड़े-मरोड़े आर्टवर्क बनाते हैं।

यह मेरे लिये बहुत फक्र की बात थी कि कई तरह की मुश्किलों का सामने करते हुए वह नेतारहाट के जंगलों में पहुँचे थे। वह श्रीलंका से पहले बंगलुरु पहुँचे। वहाँ उनकी फ्लाइट मिस हो गयी और नई जगह कोई सम्पर्क नहीं होने के कारण वह वापस लौट गये। इसके बाद वह दोबारा आये और वर्कशॉप में हिस्सा लिया। उन्होंने अर्थमूवर की मदद से लोहे की एक कलाकृति तैयार कर दी, जिसकी ऊँचाई 10 फीट और वजन आठ क्विंटल है। यह कलाकृति पुराने फिल्म कैमरे की तरह दिखती है।

फिल्में बनाने के लिये हमने दो टीम बनायी थी। एक टीम फीचर फिल्म ‘बालेमा’ बना रही थी और दूसरी टीम लघु फिल्में। ‘बालेमा’ के कैमरा मैन थे नकुल गायकवाड और राजेश सिंह। नकुल ने प्राग फिल्म स्कूल से सिनेमाई ट्रेनिंग ली है वहीं राजेश फाइन आर्ट के पेंटर हैं । दोनों रोज सुबह भारी साजो-सामान लेकर घाटी में उतरते थे, तो दृश्य फिल्माकर लौटते थे। हर सुबह वे उसी उत्साह के साथ घाटी में उतरते।

इसी तरह की जद्दोजहद के बीच वर्कशॉप और फिल्म निर्माण पूरा हुआ। फिलहाल एडिटर अखिल और मनीष राज फिल्मों की एडिटिंग में लगे हुए हैं। उनके लिये रात और दिन में कोई फर्क नहीं है। गुजरात से आशीष पीठिया ने एसोसिएट डायरेक्टर की कमान सम्भाली, असम से परीक्षित, गुमला से पवन बाड़ा, लोहरदग्गा से हैरी बारला और राँची से संजय मुंडा व वसीम रांचवी ने निर्देशन में मदद की।

फीचर फिल्म ‘बालेमा’ के सभी कलाकार स्थानीय निवासी हैं जो मूलतः आदिवासी हैं। फिल्म में किसान टूनी नगेसिया, मतरू नगेसिया, अमिता खाखा और जस्टिन लकड़ा ने अभिनय किया है।

यहाँ मजेदार बात यह है कि इन कलाकारों का चयन गजब तरीके से किया गया। मसलन मैं और दुष्यंत ने मतरू बाबा को पान की दुकान पर बारिश में भीगते देखा, तो लगा कि वह ‘डोकरा बूढ़ा’ के किरदार के लिये परफैक्ट हैं। हमने उनसे बात की, तो वह इसके लिये तुरन्त तैयार हो गये। ‘बालेमा’ के लिये हमने कई कास्टिंग देखी, पर चैन तब मिला जब टूनी किसान नगेसिया मिली।

रुकिये! चीजें इतनी आसानी से नहीं हुई थीं। मतरू बाबा से पहली बार हमारी मुलाकात नेतारहाट बाजार में हुई थी। उस वक्त तय हुआ कि जब हम 25 जुलाई को नेतारहाट में पहुँचेंगे, तो मतरू बाबा ताहीर गाँव में मिलेंगे।

यहाँ यह भी बता दें कि नेतारहाट पहाड़ से सटे ठीक पाँच सौ फीट नीचे है ताहीर गाँव। तयशुदा बातचीत के आधार पर हम नेतारहाट पहुँचे और ताहीर गाँव जाने को हुए तो पता चला कि वहाँ तक गाड़ी नहीं जाती। कई साल पहले एक बार रोड बना था, पर मतरू बाबा के अनुसार ठेकेदार ने सही काम नहीं किया। खैर… हमें पता चला कि किसी तरह बोलेरो उतर जाती है, तो हम छोटा ट्रक लेकर गाँव रवाना हो गये। नीचे पहुँच कर बहुत मुश्किल से मतरू बाबा का घर ढूँढा। मतरू बाबा की पहल पर कुछ बच्चों को इकट्ठा किया गया क्योंकि फिल्म में बच्चों की भी जरूरत थी। ताहीर गाँव में अब तक बिजली नहीं पहुँची है। ऐसे गाँव में फिल्म की बात करना उनका मजाक उड़ाने जैसा था, लेकिन हमने उन्हें काफी समझाया। वे समझ भी गये, लेकिन बला अभी टली नहीं थी। किसी ने बच्चों के कान में यह बात डाल दी कि उन्हें हमलोग बेच देंगे। यह सुनते ही बच्चे सिर पर पाँव रखकर भाग गये। हमलोग बच्चों को समझाना चाहते थे, इसलिये उनके पीछे दौड़े और काफी मशक्कत कर उन्हें फिल्म में काम करने के लिये तैयार किया। उसी वक्त हमें 12-13 साल की तीन लड़कियाँ सज-धज कर रोपनी करने जाती दिखीं। उन्हें देखकर हमारी टूनी किसान नगेसिया की तलाश खत्म हुई।

जिस वक्त हम वर्कशॉप कर रहे थे, वह धनरोपनी का वक्त था। गाँव में धनरोपनी में सभी एक-दूसरे की मदद करते हैं। अगर कोई दूसरे की मदद नहीं कर पाते हैं, तो उसे किसी दूसरे व्यक्ति को इसके लिये तैयार करना पड़ता है या फिर पैसे देने पड़ते हैं। चूँकि शूटिंग में वक्त लगना था, इसलिये यह समस्या आई कि जिन लोगों को लेकर शूटिंग करनी है उनके बदले गाँव के किसानों के खेत में धनरोपनी कौन करेगा। हमने किसानों को समझाकर उनको होनेवाले नुकसान की भरपाई का आश्वासन दिया और बच्चों व अन्य लोगों को लेकर हमलोग नेतारहाट लौटने लगे।

गाँव नीचे थे, इसलिये वहाँ तक हमारी गाड़ी आसानी से पहुँच गयी थी, लेकिन लौटते वक्त गाड़ी को ऊपर लाने में कठिनाई हो रही थी। दूसरी तरफ सड़क की दोनों ओर खाई थी, लेकिन किसी तरह हम नेतारहाट लौटे। दो-तीन घण्टे के अन्दर सभी बच्चे शूटिंग में मजे लेने लगे। टूनी और उसकी दोस्त रजवंती ने इसको चैलेंज की तरह लिया और क्या ख़ूब अदाकारी की।

अन्य कलाकारों में जस्टिन लकड़ा को खेत में हल चलाते चम्पा, कूरूंद से उठाया गया। जस्टिन के गाँव में सड़क तो दूर अब तक मोबाइल फोन नहीं पहुँचा है। जस्टिन से जब हमने फिल्म में काम करने की बात कही, तो वह तैयार हो गये। कीचड़ सने कपड़े में ही वह हमारे साथ हो लिये। जस्टिन हमारे लिये मजेदार कलाकार साबित हुए। कडूख भाषा को लेकर उनका प्रेम इतना अधिक है कि कई जगह पर सीन को कडूख गीत में रखने की सलाह देते। हमने भी ऐसा ही किया। बस यह जान लीजिए कि सादरी भाषा की फिल्म में आपको कडूख में 2-3 गीत तो जरूर सुनने को मिलेंगे।

वर्कशॉप की पूरी कहानी में एक किरदार राजीव गुप्ता भी हैं। वह काफी समय से हमारे साथ जुड़ना चाह रहे थे। एक दिन राँची में उन्होंने मुझे अपने घर आमंत्रित किया। यह बहुत सार्थक मुलाक़ात थी। सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर राजीव जी ने जब समझा कि ‘जंगल’ वर्कशॉप शुरू होने वाला है और हमको मदद चाहिए, तो उन्होंने किसी को फोन किया और कुछ ही देर में वह आदमी हमारे सामने था। यह आदमी था साकेत कुमार। साकेत आईआईटी खड़गपुर से गणित और कम्प्यूटर से इंजीनियरिंग कर अमेरिका व इजराइल में अपनी सेवा चुके हैं। वह फिलहाल झारखंड में ‘पानी’ पर बहुत गम्भीरता से काम कर रहे हैं। महुवाडार के रहने वाले साकेत पाँच मिनट में ही वर्कशॉप से सम्बन्धित ज़रूरतों की लिस्ट लेकर बैठ गए और सब-कुछ मैनेज कर दिया। साकेत बहुत कमाल के राइटर हैं और ISM राँची के वाइस चेयरमन हैं। वह इस वर्कशॉप के क्रिएटिव डायरेक्टर भी हैं।

इन सबके अलावा भी कई लोग हैं, जिनका नाम मैंने नहीं लिया है। अगर वे न होते, तो वर्कशॉप सफल नहीं हो पाता। कई लोग चाहकर भी किन्हीं मजबूरियों के कारण वर्कशॉप का हिस्सा नहीं बन पाये, लेकिन उनकी गैर-मौजूदगी भी हमें ऊर्जान्वित करती रही।

जंगल पर हमारा वर्कशॉप 16 अगस्त 2017 को खत्म हुआ। जंगल के मुद्दे पर जो फिल्में बनी हैं, उन्हें जल्द ही रिलीज किया जायेगा। फिल्मों के हवाले से हम यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि जंगल हमारे लिये और पर्यावरण के लिये क्यों जरूरी है। हम यह महसूस करते हैं कि हमारे खुद के अस्तित्व के लिये जंगल बहुत जरूरी है।

हम अगले साल जमीन के मुद्दे पर वर्कशॉप करने जा रहे हैं और इसी पर आधारित फिल्में बनाएँगे।

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