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विकास का हिंद स्वराज मॉडल ही हमें बचाएगा

Author: 
विवेक बंसल
वेब/संगठन: 
amarujala.com
जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन शुरू होने के पहले ग्लोबल वार्मिंग से जुड़े सवाल पर एक नोबेल पुरस्कार सम्मानित अर्थशास्त्री ने कहा था कि आज अगर महात्मा गांधी जीवित होते, तो उनके पास भी इस संकट से निपटने का कोई नुस्खा न होता। लेकिन मेरी दृष्टि में उनका यह कहना ज्यादा सार्थक होता कि गांधी जी ने हिंद स्वराज में औद्योगिक सभ्यता के जिन संकटों को लेकर दुनिया को चेताया था, उन पर यदि अमल हुआ होता, तो ग्लोबल वार्मिंग की नौबत नहीं आती।

बहरहाल, एक अंतरराष्ट्रीय एजेंसी पीयू रिसर्च सेंटर ने अपने हालिया सर्वेक्षण में बताया है कि धरती के बढ़ते तापमान को लेकर 67 प्रतिशत भारतीय चिंतित हैं। चीन में यह महज 30 प्रतिशत है। प्रदूषण में अहम योगदान देने वाले तीन प्रमुख देशों अमेरिका, रूस और चीन में लोग अपेक्षाकृत कम चिंतित हैं। रूस और अमेरिका में यह प्रतिशत केवल 44 फीसदी है। विसंगति देखिए कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा गठित वैज्ञानिकों की अंतरराष्ट्रीय कमेटी ने विकसित देशों को यह मानने को बाध्य कर दिया है कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए वे ही सर्वाधिक जिम्मेदार हैं। फिर भी इसके दुष्प्रभावों को कम करने के प्रयासों में वे काफी पीछे हैं। इसलिए कोपेनहेगन में यह तर्क वाजिब था कि बाली की दीर्घकालीन सहयोग कार्ययोजना (एलसीए) ट्रैक और क्योटो प्रोटोकॉल ट्रैक पर गंभीरता से विचार हो। आखिर एलसीए को क्योटो प्रोटोकॉल की पहली अवधि के खत्म होने से पहले कानूनी तौर पर बाध्यकारी बनाने की बात थी।

आज भारत समेत दुनिया के कई देशों में अनेक स्थानों पर तापमान 45 डिग्री सेल्सियस पार कर जाता है। एशियाई विकास बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगले 25 वर्षों में एशिया में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन तीन गुना बढ़ सकता है। इसके साथ ही इस क्षेत्र के दो बड़े देश भारत और चीन के ग्लेशियर पिघलने से इनके सामने पीने के पानी का संकट खड़ा हो सकता है। दूसरी तरफ, अंतरराष्ट्रीय राहत संस्था ऑक्सफेम के अनुसार, पिछले बीस वर्षों के दौरान प्राकृतिक आपदाओं की संख्या में करीब चार गुनीबढ़ोतरी हुई है। करोड़ों लोगों के जीवन को बाढ़ और चक्रवात ने प्रभावित किया है। अब हर साल औसतन 500 आपदाएं आती हैं, जिनकी संख्या बीस साल पहले 120 के आसपास होती थीं। इसका मुख्य कारण ग्लोबल वार्मिंग है।

इसलिए कोपेनहेगन से दुनिया को बहुत आशा थी, लेकिन सचाई यही है कि क्योटो संधि का पालन करने से विकसित देश शुरू से ही हिचकते रहे हैं। अमेरिका ने यह कहते हुए अपना हाथ खींच लिया था कि यह उसकी अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह है। दिलचस्प यह है कि दुनिया की 15 फीसदी जनसंख्या वाले देश दुनिया के 40 फीसदी प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग करते हैं। अमेरिका में आज प्रति हजार 765 वाहन हैं, उसकी तुलना में भारत में यह 12 और बांग्लादेश में केवल दो वाहन हैं। इसी तरह, अमेरिका में प्रति व्यक्ति रोजाना बिजली की खपत 1,460 वाट है, जबकि भारत में यह 51 और बांग्लादेश में केवल 15 वाट है।

अमेरिका का एक तबका मानता रहा है कि कार्बन उत्सर्जन में कमी करने से न सिर्फ उनकी नौकरियों में कमी आएगी, बल्कि ईंधन के दामों में भी बढ़ोतरी हो सकती है। दरअसल, मानव विकास सूचकांक के भौतिक मानक भी कहीं-न-कहीं जलवायु परिवर्तन के संकट की वजह रहे हैं। इन मानकों को बदलने की जरूरत है। लंबे अरसे से इस विकास सूचकांक में संतोष व प्रसन्नता को शामिल करने के तर्क दिए जाते रहे हैं। भारत की कोई 70 फीसदी आबादी आज भी संयमित उपभोग में भरोसा करती है। पश्चिम के कई अध्ययनों के मुताबिक भौतिक प्रतिष्ठा दिखाने वाले मानव विकास सूचकांक के अंतिम पायदान पर रहने के बावजूद भारत में संतोष व प्रसन्नता का अनुपात पश्चिमी समाज से कहीं ज्यादा है। भूटान अपने संविधान में ‘सकल घरेलू उत्पाद’ से ज्यादा महत्व ‘सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता’ को देता है। इसको बनाए रखने के लिए देश का 60 प्रतिशत भाग वन क्षेत्र होना चाहिए। भूटान सरकार का मानना है कि पेड़ों की कटाई से देश के प्राकृतिक सौंदर्य को खतरा पैदा होगा। तब ‘सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता’ को बरकरार रखने में चुनौती आएगी।

ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से निपटने की यह अनिवार्य शर्त होनी चाहिए कि विकसित देश किसी भी तरह विकासशील देशों को अपना बाजार न समझें। इसलिए पश्चिमी देशों के विकास मॉडल को अपनाकर हम वही गलती करेंगे, जिसका खामियाजा दुनिया भुगत रही है। क्लोरो-फ्लोरो कार्बन गैसों का उत्सर्जन कम करने के लिए फ्रिज, एयरकंडीशनर जैसी कूलिंग मशीनों के इस्तेमाल को कम करने की जरूरत है। ऐसा भी हो सकता है कि ऐसी मशीनों का उपयोग किया जाए, जिनसे जहरीली गैस कम निकलती हों। रासायनिक कचरे को दोबारा उपयोग में लाने लायक तकनीक का विकास हो। भारत सरीखे देश में सबसे ज्यादा ध्यान अक्षय ऊर्जा पर देने की जरूरत है। अलबत्ता जलवायु परिवर्तन संकट का निदान केवल सरकार के स्तर से नहीं हो सकता, बल्कि इसमें आम जन की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण है। यह विषय केवल एक देश का नहीं, बल्कि सबका है। इसमें प्रतिस्पर्द्धा नहीं, बल्कि आपसी सहयोग की जरूरत है।

(लेखक उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य हैं)

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