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कृषि उत्पादकता, पोषण स्तर एवं कुपोषण जनित बीमारियाँ : निष्कर्ष एवं सुझाव

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

विकास और उससे उत्पन्न समस्याओं का आश्य यह नहीं है कि धरा का कोष रिक्त हो गया है और भी भारत में अप्रयुक्त और अल्प प्रयुक्त संसाधनों का विपुल भंडार विद्यमान है आवश्यकता है विवेकपूर्ण विदोहन की, उर्वरक शक्ति का उपयोग करने के साथ-साथ लौटाने की विकास की प्रत्येक संकल्पना और परिकल्पना को पर्यावरण की कसौटी पर अहर्य सिद्ध होने पर ही विकास के लिये व्यवहार में लाना होगा।

भारत की बुनियादी समस्या आर्थिक विकास की आवश्यकता है। आर्थिक विकास से आशय है सर्वजन को उनकी न्यूनतम आवश्यकता को पूरा करने के साधन उपलब्ध कराना। इस स्वप्न को मूर्तरूप देने के लिये भारत में स्वतंत्रता के बाद अनेक कदम उठाए गये। 1 अप्रैल 1951 से पहली पंचवर्षीय योजना जो योजनाबद्ध विकास की पहली कड़ी थी, भारतीय ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को इसी दिशा में ले जाने का एक प्रयास थी। पिछले पाँच दशकों के योजनाबद्ध विकास के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं जिनमें उल्लेखनीय है कि भारत का कृषि उत्पादन लगभग चार गुना बढ़ा है और राष्ट्रीय आय में भी प्रति वर्ष लगभग 3.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी हैं सरकार ने कृषि के विकास के लिये जो नीतियाँ अपनाई हैं वे बहुत उत्साहवर्द्धक रही हैं।

सरकार द्वारा निर्धारित सहायतार्थ कीमतों से फसलों के अंतर्गत क्षेत्रफल विस्तार पर प्रभाव पड़ता है। सहायतार्थ कीमतों पर प्रदान किए गये आगतों की मांग में वृद्धि हो रही है अब साधारण उपस्करों और कृषि यंत्रों पर किसानों को अधिक धन व्यय नहीं करना पड़ता है। जिससे कृषि यंत्रों और कार्य मशीनरी की मांग में निरंतर वृद्धि हो रही है। भारत में सामाजिक उपरिसेवाओं का भी पर्याप्त विस्तार हुआ है, वित्तीय साधनों की उपलब्धि से कृषि निर्यात, उद्योग, लघु एवं कुटीर उद्योग, फुटकर एवं छोटे व्यापार एवं रोजगार, शिक्षा आदि के क्षेत्र में पर्याप्त एवं महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई है, साक्षरता का अनुपात बढ़ा है जीवन की प्रत्याशा बढ़ी है वित्तीय साधनों की उपलब्धि से कृषि निर्यात, उद्योग, लघु एवं कुटीर उद्योग, फुटकर एवं छोटे व्यापार एवं रोजगार शिक्षा आदि के क्षेत्र में पर्याप्त एवं महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई, साक्षरता का अनुपात बढ़ा है जीवन की प्रत्याशा बढ़ी है और मानव पूँजी में गुणात्मक सुधार हुए हैं। अब देश में प्रशिक्षित श्रमिकों तकनीकी विशेषज्ञों वैज्ञानिकों, अनुसंधानकर्ताओं, प्रशासकों, प्रबंधकों उद्यमियों आदि की कमी नहीं है। अब साधनों तथा आवश्यकता निर्मित वस्तुओं के लिये विदेशों पर नहीं निर्भर रहना पड़ता है। सबसे बड़े गौरव की बात तो यह है कि हम अपनी घरेलू तकनीक का विकास करके देश के तीव्र आर्थिक विकास की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के योग्य हो गये हैं।

पृथ्वी की सतह कृषि एवं खाद्यान्न उत्पादन का प्रमुख स्थल है जिस पर मानव का भरण पोषण निर्भर रहता है, वास्तव में यह मनुष्य के आर्थिक विकास के लिये पृष्ठ भूमि प्रस्तुत करती है। यह मनुष्य के सामाजिक एवं सर्वांगीण विकास की जननी है।

पृथ्वी का संपूर्ण धरातल कृषि योग्य नहीं है और न ही इसे कृषि योग्य बनाया जा सकता है। कृषि के लिये तो धरातल का वही भाग उपयोगी है जो किसी न किसी रूप में उपजाऊ है। मानवीय प्रयासों के फलस्वरूप कृषि के अयोग्य भूमि का एक बड़ा भाग भी कृषि योग्य बनाया जा सका है। इसलिये मनुष्य को सीमित कृषि योग्य भूमि से ही अपने भरण पोषण का पर्याप्त साधन प्राप्त करना है, यही उसके अनेक उद्यमों का स्रोत भी है इस उद्देश्यों की सफलता भूमि के समुचित उपयोग, उसकी उत्पादन क्षमता, उससे प्राप्त उपलब्धियाँ तथा अन्य लाभों पर निर्भर है। दूसरे शब्दों में भूमि संसाधन के यथा संभव अधिकतम उपयोग तथा उसके नियोजन द्वारा ही मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति संभव है।

तीव्रगति से बढ़ती हुई जनसंख्या, जीवन स्तर का क्रमिक उत्थान, पौधों और जैविक पदार्थों के औद्योगिक उपयोग में अप्रत्याशित वृद्धि खाद्यान्न तथा अन्य कृषि उपजों के बीच भूमि उपयोग में उत्पन्न होने वाली प्रतिस्पर्धा, यातायात साधनों एवं यातायात मार्गों का विस्तार आदि क्रियाएँ कृषि भूमि का अभाव उत्पन्न करते जा रहे हैं, किंतु तकनीकी में परिवर्तन से कृषि उत्पादन की सघनता में वृद्धि भी की जा रही है जिससे कृषि भूमि का अधिक नियोजित उपयोग भी होने लगा है जिससे जनसंख्या की निरंतर वृद्धि होने पर भी खाद्यान्न के अभाव को कुछ हद तक रोका जा सका है।

जनसंख्या की अनियंत्रित वृद्धि को देखते हुए कृषि साधन के विकास से मानवीय समस्याओं का आंशिक समाधान ही संभव है, परंतु इसके लिये भी हमें प्रयत्नशील रहना होगा। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये भूमि की क्षमता, उर्वरता तथा उसके समुचित एवं समन्वित उपयोग का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है, इन्हीं दृष्टिकोणों से कृषि उत्पादन, पोषण स्तर एवं कुपोषण जनित बीमारियों का अध्ययन प्रस्तुत किया जा रहा है। प्रस्तुत शोध प्रबंध का मुख्य उद्देश्य कृषि प्रधान जनपद प्रतापगढ़ की कृषि उत्पादकता, पोषण स्तर एवं स्वास्थ्य की समुचित व्याख्या करना है जिससे जनपद वासियों के आर्थिक उन्नयन हेतु समन्वित वैज्ञानिक नियोजन हेतु कुछ कार्यक्रम प्रस्तावित किए जा सकें। इस शोध निबंध में शोधकर्ता को निष्कर्ष रूप में निम्नलिखित तथ्य प्राप्त हुए हैं -

1. अध्ययन क्षेत्र जनपद प्रतापगढ़ 25 डिग्री 52’ से 26 डिग्री 22’ उत्तरी अक्षांश तथा 81 डिग्री 22’ से 82 डिग्री 49’ पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित है जिसका कुल प्रतिवेदित क्षेत्रफल 36 के मध्य स्थित है जिसका कुल प्रतिवेदित क्षेत्रफल 362426 हेक्टेयर है जिसमें कृषि फसलों हेतु 222106 हेक्टेयर भूमि का उपयोग किया जाता है शेष 140300 हेक्टेयर भूमि अन्य उद्देश्यों की पूर्ति हेतु उपयोग में लाई जाती हैं अथवा अकृष्ठ और परती भूमि के रूप में हैं।

2. गंगा के उत्तर में स्थित यह क्षेत्र गंगा की जलोढ़ मिट्टी से युक्त संयुक्त समतल मैदानी क्षेत्र है जिसका ढाल उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूर्व की ओर है उत्तर पश्चिम में समुद्रतल से ऊँचाई 148.67 मीटर तथा दक्षिण पूर्व में यह 131.36 मीटर है। गंगा नदी के उत्तर में तथा सई नदी के दोनों और कुछ भूमि ऊबड़-खाबड़ तथा असमतल है जो कृषि कार्य की दृष्टि से अधिक उपजाऊ नहीं है।

3. अध्ययन क्षेत्र की कृषि अब परंपरागत सिंचाई का साधन मानसून पर निर्भर न रहकर कृत्रिम सिंचाई के साधनों से सुसज्जित हो गई है परंतु फिर भी औसत वार्षिक वर्षा 824 मिलीमीटर से 977 मिलीमीटर के मध्य रहती है। यहाँ का तापमान उच्चतम 47.7 सेंटीग्रेट तथा न्यूनतम 4.5 सेंटीग्रेट के मध्य रहता है। उच्चतम तापमान सामान्य तथा जून के प्रारंभ में तथा न्यूनतम तापमान जनवरी के प्रारंभ में पाया जाता है।

4. अध्ययन क्षेत्र में कृषि के लिये उपलब्ध 222106 हेक्टेयर भूमि कुल 2529041 लोगों के उदर आपूर्ति का दायित्व वहन करती है। जनसंख्या वृद्धि देखें तो वर्ष 1981 तथा 1991 के मध्य 22.13 की दर से बढ़ी जिससे अब प्रतिवर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर सामान्य घनत्व 671 प्रतिवर्ग किलोमीटर, क्रमिक घनत्व 697 प्रतिवर्ग किलोमीटर तथा कृषि घनत्व 175 व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर है। प्रति हेक्टेयर कृषि क्षेत्र पर 1.75 व्यक्ति निवास कर रहे हैं। जबकि फसल गहनता 157.05 प्रतिशत है।

5. अध्ययन क्षेत्र में अन्य क्षेत्रों की भाँति जोत के आकार में अत्यधिक असमानता दिखाई पड़ती है जहाँ एवं एक ओर तो 87.43 प्रतिशत कृषक ऐसे हैं जिनके पास 1 हेक्टेयर से कम कृषि भूमि है, जब कि दूसरी ओर 12.57 प्रतिशत कृषकों के पास 1 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि है, जिनमें से 1 से 2 हेक्टेयर के मध्य 9.46 प्रतिशत कृषक 2 से 3 हेक्टेयर के मध्य, 1.95 प्रतिशत कृषक, 3 से 5 हेक्टेयर, के मध्य 0.94 प्रतिशत और 5 हेक्टेयर से अधिक भूमि वाले 0.22 प्रतिशत कृषक हैं। क्षेत्रफल की दृष्टि से देखें तो 87.43 प्रतिशत कृषकों के पास कुल भूमि का 56.83 प्रतिशत कृषि क्षेत्र है जबकि 12.57 प्रतिशत कृषकों के पास 43.17 प्रतिशत कृषि क्षेत्र है।

6. अध्ययन क्षेत्र में 222106 हेक्टेयर कुल कृषि क्षेत्र में 57.05 प्रतिशत क्षेत्रफल पर प्रतिवर्ष एक से अधिक बार विभिन्न फसलें उगाई जाती हैं इस प्रकार वर्ष में बोया जाने वाला कृषि क्षेत्र 348810 हेक्टेयर है। सिंचाई के साधनों में प्राकृतिक वर्षा के अतिरिक्त कृत्रिम साधनों का भी उपयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है जिनमें राजकीय नलकूप, राजकीय नहरें, विद्युत/डीजल चलित नलकूप/पंपिंग सेट्स महत्त्वपूर्ण है इन साधनों द्वारा सिंचन सुविधाएँ प्राप्त हो जाने के कारण शुद्ध सिंचित क्षेत्र 163425 हेक्टेयर (शुद्ध बोये गये क्षेत्रफल का 65.91 प्रतिशत) है। कृषि मौसमों में खरीफ तथा रबी कृषि मौसम में खाद्यान, दलहनी तथा तिलहनी फसलों की प्रधानता है जब कि जायद मौसम में ककड़ी, खरबूजा तथा तरबूज और मौसमी सब्जियाँ महत्त्वपूर्ण फसले हैं। खाद्यान फसलों में धन, ज्वार, मक्का, गेहूँ तथा जौ की प्रमुखता है जबकि अरहर, चना, मटर, दलहनी फसल हैं तिलहनी फसलों में लाही, सरसों ही प्रमुख फसलें हैं नकदी फसलों में गन्ना, आलू प्रमुख रूप से उगाए जाते हैं इस प्रकार अध्ययन क्षेत्र में प्रचलित कृषि प्रारूप में 79.42 प्रतिशत क्षेत्र पर खाद्यान्न फसलें, 12.09 प्रतिशत क्षेत्रफल पर दलहनी फसलें, 0.80 प्रतिशत क्षेत्र पर तिलहनी फसलें, आलू 2.2 प्रतिशत क्षेत्र पर गन्ना 0.70 प्रतिशत अन्य फसलों के अंतर्गत 4.79 प्रतिशत क्षेत्र प्रयोग में लाया जाता है।

7. अध्ययन क्षेत्र में विभिन्न फसलों के उत्पादन की दृष्टि से देखें तो कुल खाद्यान 5598609 क्विंटल, दलहन का उत्पादन 412335 क्विंटल तिलहन का उत्पादन 24013 क्विंटल, गन्ना 1500652 क्विंटल तथा आलू 1441641 क्विंटल उत्पन्न किया जाता है। खाद्यान्नों में गेहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा तथा मक्का प्रमुख हैं।

8. अध्ययन क्षेत्र में प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष खाद्यान्न की उपलब्ध मात्रा 244.50 किलोग्राम, दालों की उपलब्ध मात्रा 17.83 किलोग्राम है। इस प्रकार प्रतिदिन प्रति व्यक्ति उपलब्ध खाद्यान्न तथा दलहन की मात्रा क्रमश: 669 ग्राम तथा 49 ग्राम है। विभिन्न फसलों में शुद्ध खाने योग्य पदार्थ खाद्यान्नों की उपलब्ध मात्रा केवल 476 ग्राम तथा दलहन की यह मात्रा केवल 29 ग्राम प्रति व्यक्तियों के प्रतिदिन उपयोग योग्य है।

9. अध्ययन क्षेत्र में अनुकूलतम भूमि भार वहन क्षमता प्रतिवर्ग किलोमीटर 558 व्यक्ति है जब कि कायिक घनत्व 697 व्यक्ति है। इस प्रकार खाद्यान्न उत्पादन की दृष्टि से अध्ययन क्षेत्र 139 व्यक्तियों के लिये अतिरिक्त भरण-पोषण की व्यवस्था करता है क्योंकि अध्ययन क्षेत्र में 558 व्यक्तियों के लिये कुल खाद्यान्न उपलब्ध है जब कि 697 व्यक्तियों का भरण पोषण किया जा रहा है।

10. अध्ययन क्षेत्र में कृषि तकनीकी में आधुनिकीकरण का स्तर सूचकांक 173 से लेकर 334 प्रतिशत तक प्राप्त होता है जिसका वर्गीकरण करने पर अतिरिक्त स्तर पर कुंडा, बाबागंज तथा कालाकांकर विकास खंड स्थित है। निम्न तकनीकी स्तर का प्रदर्शन बिहार, मगरौरा तथा रामपुरखास विकास खंड कर रही है। मध्यम तकनीकी स्तर में सांगीपुर, प्रतापगढ़ सदर तथा गौरा विकासखंड देखे गये जबकि अति उच्च तकनीकी गुणांक 334 प्रतिशत आसपुर देवसरा विकासखंड का प्राप्त हुआ।

11. अध्ययन क्षेत्र में सस्य विभेदीकरण सूचकांक 11.78 से लेकर 44.61 तक प्राप्त हुआ है जिसमें अति उच्च स्तर पर कोई विकास खंड नहीं पाया गया। उच्च स्तर पर पाँच विकासखंड क्रमश: सांगीपुर, संडवा चंद्रिका, प्रतापगढ़ सदर, शिवगढ़ व मांधाता स्थित है। मध्यम स्थिति में छ: विकास खंड क्रमश: कुंडा, रामपुर खास लक्ष्मणपुर, मगरौरा, पट्टी तथा आसपुर देवसरा प्राप्त हुए। निम्न सस्य विभेदीकरण सूचकांक एक मात्र गौरा विकास खंड का प्राप्त हुआ है जबकि अति निम्न सूचकांक कालाकांकर, बाबागंज व बिहार विकासखंडों का प्राप्त हुआ है।

12. अध्ययन क्षेत्र में सस्य संयोजन की दृष्टि से देखें तो दोई की विधि के अनुसार पाँच फसल संयोजन तक प्राप्त होता है जब कि थामस विधि के अनुसार छ: फसल संयोजन विद्यमान है और रफी उल्लाह अध्ययन क्षेत्र को केवल चार फसल संयोजन तक रखते हैं संपूर्ण अध्ययन क्षेत्र के फसल संयोजन की गणना करने पर दोई विधि में दो से पाँच फसल संयोजन प्राप्त होता है, थामस विधि में दो से छ: तक फसल संयोजन देखने को मिलता है जबकि रफी उल्लाह विधि में न्यूनतम 2 से 4 फसल तक संयोजन प्राप्त हुआ है। फसलों के वास्तविक क्रम तथा रफी उल्लाह द्वारा निर्धारित फसलों के क्रम में समानता मिलती है। अध्ययन क्षेत्र में प्रथम स्तर के प्रदेशों के अंतर्गत गेहूँ तथा धान फसलों की प्रधानता पाई जाती है जिनमें से 13 विकास खंडों में गेहूँ प्रथम स्थान पर जब कि बाबागंज तथा बिहार विकासखंडों में धान प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है। इन दो फसलों के अतिरिक्त संडवा, चंद्रिका तथा मांधाता विकासखंडों में बाजरा तीसरी फसल के रूप में महत्त्वपूर्ण है जबकि प्रतापगढ़, सदर, मगरौरा और शिवगढ़ विकास खंडों में अरहर तीसरी फसल के रूप में महत्त्वपूर्ण मान्यता प्राप्त कर रही है।

13. सूक्ष्म स्तरीय अध्ययन के लिये सर्वेक्षण में सीमांत कृषक 122, लघुकृषक 107, लघुमध्यम कृषक 52, मध्यम कृषक 16 तथा बड़े कृषक 3 प्राप्त करते हुए कुल 300 कृषकों से विश्लेषण संबंधी सूचनाएँ प्राप्त की गई हैं। जिनमें से 24 उच्च जाति के, 36 पिछड़ी जाति के, 53 अनुसूचित जाति के तथा 09 मुस्लिम वर्ग के कृषक प्राप्त हुए हैं जिनके परिवारों का औसत आकार 6.73 प्राप्त हुआ है। 122 सीमांत कृषकों के पास कुल 70.93 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र, लघु कृषकों (107) के पास 133.30 हेक्टेयर, लघु मध्यम कृषकों (52) के पास 102.88 हेक्टेयर, मध्यम कृषकों के 16 परिवारों के पास 61.35 हेक्टेयर तथा बड़े कृषकों (3) के पास 44.69 हेक्टेयर कृषि भूमि उपलब्ध पाई गई इस प्रकार 300 कृषक परिवारों के पास 413.15 हेक्टेयर भूमि प्राप्त हुई।

14. सर्वेक्षण में विभिन्न वर्गों द्वारा औसत खाद्यान्न उत्पादकता की दृष्टि से प्रति व्यक्ति प्रति दिन 668.02 ग्राम खाद्यान्न, 24.36 ग्राम दलहन, तिलहन 9.11 ग्राम आलू 150.66 ग्राम उत्पन्न किया जाता है खाद्यान्नों में गेहूँ तथा चावल की प्रधानता है जबकि दलहनों में अरहर तथा चना प्रमुख हैं और तिलहन में लाही/सरसों का विशिष्ट स्थान है।

15. अध्ययन क्षेत्र में विभिन्न वर्गों के मध्य सेवन किए जाने वाले खाद्य पदार्थों को तीन वर्गों में रखा गया है जिनमें परंपरागत खाद्य पदार्थ शिष्ट खाद्य पदार्थ तथा आधुनिक खाद्य पदार्थों को शामिल किया गया है। खाद्य पदार्थों के उपभोग की तीव्रता के क्रम में 760 प्रतिशत से अधिक आवृत्ति वाले खाद्य पदार्थों में रोटी, दाल, भात, तरकारी आदि आते हैं। 40-70 प्रतिशत के मध्य सत्तू, पराठा, खिचड़ी, लस्सी, गादा, महेरी आदि आते हैं। 10-40 प्रतिशत के मध्य पूड़ी, खीर, कढ़ी, चटनी, महेरी, घुथरी, बहुरी, चटनी, माठा, सलाद सेवई, मिठाई, सूतफेनी, बच्चों को दूध आदि खाद्य पदार्थ सेवन किए जाते हैं जबकि 10 प्रतिशत से कम आवृत्ति वाले खाद्य पदार्थों में मालपुआ, शकरपारे, रसखीर, पकौड़ी, बिस्किट, नमकीन, पुआ, सिंघाड़ा, आलू चिप्स, चावलबरी, कुम्हडौरी, समोसा, मकोसा, डबलरोटी, सोयाबीन बरी, मिठाई, मांस, मछली, अंडे, दूध, आलूदम, आलूचिप्स, दही, अचार, मौसमी फल, रसखीर, गुलगुला, चिल्ला, मिठाई घी, मिथौरी, निमोना, मलीदा पूड़ी, कचौड़ी, कबाब, तस्मई, गुलगुला आदि प्रमुख रूप से सेवन किए जाते हैं।

16. प्रतिव्यक्ति खाद्य पदार्थों में लगभग सभी वर्गों में शीतऋतु में मात्रात्मक अधिकतम रहती है, खाद्य पदार्थों की न्यूनतम मात्रा वर्षाऋतु में उपभोग की जाती है। वर्ष भर में प्रति व्यक्ति खाद्य पदार्थों की उपभोग की मात्रा सीमांत कृषकों में 103.79 ग्राम सीमांत कृषकों का, 1023.86 ग्राम लघु कृषक परिवारों का 1026.32 ग्राम लघु मध्यम कृषक परिवारों का 1055.06 ग्राम मध्यम कृषक परिवारों का तथा 1046 ग्राम बड़े परिवारों का प्राप्त हुआ है। लगभग सभी वर्गों के खाद्य पदार्थों में 50 प्रतिशत से अधिक भागेदारी खाद्यान्नों की देखी गई है।

17. विभिन्न खाद्य पदार्थों से प्राप्त होने वाले पोषक तत्वों की गणना करने पर पाया गया कि सभी वर्गों में अधिकांश पोषक तत्व खाद्यान्नों से ग्रहण किए जा रहे हैं और श्रेष्ठ पोषक तत्वों से युक्त खाद्य पदार्थ दूध, घी, मांस, मछली तथा अंडों आदि का सेवन अत्यल्प मात्रा में पाया गया। पोषक तत्वों की गुणात्मक श्रेष्ठता का अभाव लगभग सभी वर्गों में दिखाई पड़ता है, जबकि विभिन्न वर्गों में मात्रात्मक भिन्नता कम दिखाई पड़ती है।

18. प्रतिदिन के भोजन में पोषक तत्वों की आवश्यक मात्रा का संयोजन असंतुलित पाया गया। सीमांत कृषक परिवारों में जहाँ ऊष्मा का 147.90 कैलोरी अधिक उपयोग किया जा रहा है वहीं मध्यम कृषक परिवारों में 110.67 कैलोरी की कमी देखी गई है। प्रोटीन सीमांत कृषक परिवारों तथा बड़े कृषक परिवारों में मानक से कुछ अधिक देखी गई, शेष अन्य वर्गों में इस तत्व की 0.02 ग्राम से लेकर 1059 ग्राम तक की कमी दिखाई पड़ी। वसा पोषक तत्व का विभिन्न वर्गों में 47.53 ग्राम से लेकर 56.66 ग्राम तक का अभाव देखा गया। कार्बोहाइड्रेट्स का उपभोग मानक स्तर से 66.97 ग्राम से लेकर 119.38 ग्राम तक की अधिकता प्रत्येक वर्ग में पाई गई है। सभी वर्गों में अधिकता वाला पोषक तत्व फास्फोरस प्राप्त हुआ है जिसमें .01 ग्राम से लेकर .10 ग्राम तक की अधिकता पाई गई। नियासिन तथा थियासिन की भी सभी वर्गों में अधिकता दिखाई पड़ रही है। राइबोफ्लेबिन की सभी वर्गों में न्यूनता देखी गई।

सीमांत कृषक परिवारों में ऊर्जा 147.19 कैलोरी अधिक, प्रोटीन 0.47 ग्राम अधिक, फाइवर 4.64 ग्राम अधिक, कार्बोहाड्रेटस 119.38 ग्राम अधिक, फास्फोरस 0.10 ग्राम अधिक, थियासिन 1.27 मि. ग्राम अधिक तथा नियासिन 11.08 मि. ग्राम अधिक प्राप्त किये जा रहे हैं। जबकि मानक स्तर से न्यून पोषक तत्वों में वसा 56.66 ग्राम, खनिज 1.13 ग्राम, कैल्सियम 1.02 ग्राम, लोहा 5.54 ग्राम, कैरोटीन 436 मि.ग्राम तथा राइवोफ्लेबिन 0.08 मि. ग्राम कम पाया गया।

लघु कृषक परिवारों में पोषक तत्वों की अधिकता वाले तत्व फाइबर 4.48 ग्राम, कार्बोहाइड्रेटस 117.75 ग्राम, फास्फोरस 0.07 ग्राम, थियासिन 0.87 मि. ग्राम तथा नियासिन 10.08 मि. ग्राम है जबकि मानक स्तर से कम ग्रहण किये जाने वाले पोषक तत्व ऊर्जा 81.82 कैलोरी, प्रोटीन 1.59 ग्राम, वसा 57.67 ग्राम, खनिज 0.85 ग्राम, कैल्सियम 1.01 ग्राम लोहा 4.98 ग्राम, कैरोटीन 28.73 मि. ग्राम और राइबोफ्लेविन 0.11 मि. ग्राम है।

मध्यम कृषक परिवारों में मानक स्तर से अधिक मात्रा में ग्रहण किये जाने वाले पोषक तत्वों में फाइबर 5.01 ग्राम, कार्बोहाइड्रेटस 92.88 ग्राम, फास्फोरस 0.03 ग्राम, कैरोटीन 279.85 मि. ग्राम थियामिन .88 मि. ग्राम तथा नियासिन 8.89 मि. ग्राम पाये गये। जबकि न्यून मात्रा में ग्रहण किये जाने वाले पोषक तत्वों में ऊर्जा 110.61 कैलोरी, प्रोटीन 0.02 ग्राम वसा 47.53 ग्राम, खनिज 0.02 ग्राम, कैल्शियम 0.92 ग्राम, लोहा 3.30 ग्राम तथा राइबोफ्लेबिन 0.11 मि.ग्रां. है।

बड़े कृषक परिवारों में पोषक तत्वों की अधिक मात्रा, प्रोटीन 0.35 ग्राम फाबर 4.77 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट्स 92.88 ग्राम, फास्फोरस 0.03 ग्राम, कैरोटीन 279.85 मि. ग्राम. थियासिन .88 मि. ग्राम तथा नियासिन 8.98 मि.ग्राम. पाये गये जबकि स्वल्पता वाले पोषक तत्व ऊर्जा .92 कैलोरी, वसा 49.68 ग्राम खनिज .34 ग्राम कैल्सियम .96 ग्राम लोहा 4.09 ग्राम तथा राइबोफलेविन .11 मि. ग्राम प्रमुख है।

19. अध्ययन क्षेत्र में ग्रहण किये जाने वाले भोजन से प्राप्त होने वाले पोषक तत्वों के असंतुलन के परिणाम स्वरूप विभिन्न वर्गों में अल्प पोषण तथा कुपोषण से उत्पन्न होने वाले एक या एक से अधिक विभिन्न रोगों से ग्रसित रोगियों में 15.46 प्रतिशत हाथों तथा पैरों की ऐंठन से 16.85 पेट के रोगों से 13.53 प्रतिशत थकान व शरीर में सूजन से 11.69 प्रतिशत सर्दी जुकाम मसूड़ों की सूजन से 8.13 प्रतिशत जीभ तथा ओंठ के रोगों से, 7.43 प्रतिशत प्लेग्रा रोग 4.86 प्रतिशत बेरी-बेरी रोग से 3.22 प्रतिशत रिकेट्स तथा आस्टोमैलेशिया से 4.16 प्रतिशत रतौंधी रोग से 9.66 प्रतिशत जोड़ों तथा गांठों में दर्द से 2.18 प्रतिशत मधुमेह के रोगों से ग्रसित पाये गये।

सुझाव :-


कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था सर्वप्रमुख व्यवसाय है। यह देश के कई उद्योगों के लिये कच्चे पदार्थ की आपूर्ति और कई उद्योगों के मांग का आधार है। यह देश की दो तिहाई जनता की आजीविका का साधन और विभिन्न उत्पादक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति के बाद भी सर्वाधिक राशि का राष्ट्रीय आय में योगदान करने वाला क्षेत्र है। नियोजन के पूर्व भारतीय कृषि अवरोध ग्रस्त थी कृषि से संबंद्ध दशाएँ भी कृषि विकास में बाधक थी। भू धारण प्रणाली वास्तविक कास्तकार के लिये हानिकारक थी, कृषि तकनीक अत्यंत पिछड़ी अवस्था में थी जो आज की परिस्थितियों में अप्रासंगिक हो गई हैं और इन कठिनाइयों को दूर करना भारतीय कृषि के लिये एक चुनौती थी जिनका सफल क्रियान्वयन योजना कालीन कृषि विकासों के प्रयासों की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि रही है। नियोजित विकास प्रयासों के परिणाम स्वरूप कृषि उत्पादन आवश्यकता की दृष्टि से कभी और अति कभी भी दशाओं को पार करता हुआ अब पर्याप्तता की स्थिति में पहुँच चुका है विभिन्न संस्थागत सुधारों और प्राविधिक परिवर्तनों द्वारा इस लांक्षन से अब मुक्ति पा ली गई है। जिसमें कृषि वैज्ञानिकों और प्रविधि विशेषज्ञों की अनवरत साधना निर्णायक रही है। आज हम देश की 100 करोड़ से भी अधिक जनसंख्या को खाद्यान्न आपूर्ति करने में समर्थ हो गये हैं।

इन उपलब्धियों के कुछ नकारात्मक आयाम भी हैं। नियोजन काल में क्षेत्रीय और अंतर्वर्गीय विषमताएँ बढ़ी है। कृषि अर्थव्यवस्था के कतिपय क्षेत्र को भी भारी विनियोग और विकास प्रयासों का लाभ मिला है। कई क्षेत्र की कृषि का स्वरूप अब भी परंपरागत बना हुआ है। खेतिहर समाज के लघु, अतिलघु और भूमिहीन श्रमिकों को कृषि क्षेत्र में किए जाने वाले विनियोग और प्रौद्योगिकी का लाभ अत्यंत कम मिला है। लाभ मिला है अधिक जमीन वाले को यह भी शंका की जाने लगी है कि हम अधिक उत्पादन लेने की होड़ में भूमि की समस्त उर्वरक शक्ति का विदोहन कर ले रहे हैं जब कि आगामी पीढ़ी की सम्यक उर्वरकशक्ति युक्त भूमि हस्तांतरित करना हमारा दायित्व है। रासायनिक उर्वरकों और बढ़ते कीटनाशकों के प्रयोग से मिट्टी के गुणधर्म में तेजी से क्षरण हो रहा है, मिट्टी की ऊपर की परत कड़ी तथा उसमें जलधारण क्षमता घट रही है, अधिक बार सिंचाई होने से भूमि पर न केवल क्षारीयता बढ़ रही है बल्कि अधिक सिंचाई से भूमिगत जल का तल नीचे को जा रहा है, भूमि और जल दोनों प्रदूषित भी हो रहे हैं। ग्रामीण परिवेश और ग्रामीण पर्यावरण भी प्रदूषित हो रहा है। मनुष्य और पशुओं पर रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशक दवाइयों के हानिकारक प्रभाव अब स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होने लगे हैं। फसल नाशक प्रतिरोधी कीटों का प्रकोप बढ़ने लगा है। सम्यक भूमि और जल प्रबंध की कमी के कारण भूमि की उर्वरक ऊपरी सतह क्षतिग्रस्त हो रही है कई विकसित कृषि क्षेत्रों में प्रति निवेश इकाई की उत्पादकता घटने लगी है।

विकास और उससे उत्पन्न समस्याओं का आश्य यह नहीं है कि धरा का कोष रिक्त हो गया है और भी भारत में अप्रयुक्त और अल्प प्रयुक्त संसाधनों का विपुल भंडार विद्यमान है आवश्यकता है विवेकपूर्ण विदोहन की, उर्वरक शक्ति का उपयोग करने के साथ-साथ लौटाने की विकास की प्रत्येक संकल्पना और परिकल्पना को पर्यावरण की कसौटी पर अहर्य सिद्ध होने पर ही विकास के लिये व्यवहार में लाना होगा। राष्ट्रीय प्रदर्शन फार्मों के उपज के आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि भारत में कृषि उपज बढ़ाने की पर्याप्त संभावनाएँ विद्यमान हैं, सामान्य दशाओं में भी कृषि उपज के वर्तमान स्तर को दोगुना किया जा सकता है। कृषि प्रणाली की कोई भी विद्यमान दशा भविष्य के लिये नवीन दृष्टिकोण और कार्यनीति अपनानें की आवश्यकता उत्पन्न कर देती है इसीलिये कृषि क्षेत्र में सतत जीवन संकल्पनाओं और कार्यक्रमों का समावेश होते रहना चाहिए। क्योंकि किसी अर्थव्यवस्था के आर्थिक विकास की पूर्वापेक्षा कृषि क्षेत्र का विकास है। कृषि क्षेत्र का विकास कृषि एवं संबद्ध क्रियाओं में लगे लोगों की आर्थिक स्थिति में तो सुधार करता ही है साथ साथ यह गैर कृषि क्षेत्र के लिये भी खाद्यान्न, कच्चा माल, बाजार और श्रमशक्ति की आपूर्ति करता है।

अध्ययन क्षेत्र एक ग्रामीण क्षेत्र है अतेव इसके समुचित विकास हेतु उच्चतम भूमि क्षमता तथा अधिकतम कृष्योत्पादन आवश्यक है, वास्तव में समुन्नत कृषि विकास की आधारशिला है जिससे न केवल ग्रामीण जनसंख्या की विभिन्न आवश्यकताओं की आपूर्ति होती है बल्कि बहुमुखी विकास को प्रोत्साहन मिलता है। भूमि की प्रत्येक इकाई के अनुकूलतम उपयोग द्वारा भूमि की भरण पोषण क्षमता में कई गुना वृद्धि की जा सकती है एवं ग्रामीण विकास की गति को तीव्र बनाया जा सकता है इससे पर्यावरण में सुधार के साथ-साथ जीवनयापन की सुविधाओं में भी पर्याप्त सुधार किया जा सकता है। साथ ही कृषि पर जनसंख्या के भार को कम करने के लिये कृषि पर आधारित उद्योगों एवं कृष्येत्तर व्यवसायों को प्रोत्साहन देकर रोजगार का सृजन किया जाना भी अपेक्षित है। तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या की भरण-पोषण संबंधी आवश्यकताओं की आपूर्ति हेतु कृषि उत्पादन बढ़ाना अपरिहार्य है जिसमें वृद्धि के लिये निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं।

1. प्राकृतिक समस्याओं के निवारण हेतु सुझाव :
प्राकृतिक विपदाओं में जलप्लावन, जलभराव, सूखा आदि है जिनसे प्रति वर्ष लाखों करोड़ों लोगों की फसल नष्ट हो जाती है। अध्ययन क्षेत्र में अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ पानी के निकास की समुचित व्यवस्था न होने के कारण जलभराव की समस्या से पीड़ित हैं, इसके अतिरिक्त अनेक क्षेत्रों में जलस्तर ऊँचा हो जाने के कारण ऊसर भूमि के क्षेत्रफल में विस्तार हो रहा है इन समस्याओं के निवारण हेतु निम्न उपाय किए जा सकते हैं -

(अ) जल निकास की समुचित व्यवस्था -
अनियंत्रित सिंचाई और जल के कुप्रबंध के कारण जल निकास जलाक्रांति अनुचित जल प्रबंध और छीजन की समस्याएँ उत्पन्न हो गई। नहरों के कारण कुछ क्षेत्रों में हर वर्ष बाढ़ की समस्याएँ उत्पन्न हो जाती है अत: सिंचाई नीति का निर्माण करते समय यह आवश्यक है कि सिंचाई की नई क्षमता का विकास और वर्तमान विद्यमान क्षमता का अनुकूलतम उपयोग को ध्यान में रखा जाना चाहिए। जल संसाधन का कुशलतम उपयोग को आधार पर ही सिंचाई नीति का निर्माण किया जाना चाहिए।

(ब) भूमित जल का सदुपयोग -
सिंचाई के लिये जिन कुँओं का निर्माण किया जा चुका है उसका बेहतर उपयोग किया जाना चाहिए। वर्तमान में इस साधन का पूर्ण सदुपयोग नहीं हो पा रहा है। उसके प्रमुख कारण हैं - शक्ति के साधनों का अभाव, किसानों में परस्पर सहयोग का अभाव, फसलों की गहनता में कमी आदि। अत: इस दिशा में आवश्यक कदम उठाया जाना चाहिए।

(स) भूक्षरण की रोकथाम -
भूक्षरण के गंभीर परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं इसको रोकने के लिये कारगर उपाय करने होंगे। इन उपायों में वनों का विस्तार, भूमि के असमान एवं समतल भागों में वृक्षारोपण करना, चारागाहों में पशुओं को चरानें पर भली भाँति देखभाल तथा नियंत्रण आदि प्रमुख हैं।

2. ऊसर भूमि सुधार -
अध्ययन क्षेत्र के अनेक क्षेत्रों में नहरों की अनियंत्रित सिंचाई के कारण जलस्तर ऊपर उठता जा रहा है जिससे भूमि का एक बड़ा भाग ऊसर में परिवर्तित होता जा रहा है इस समस्या के निराकरण हेतु इन क्षेत्रों में नलकूपों, जिप्सम तथा पम्पिंग सेटों के द्वारा भूमिगत जल को निकालकर जलस्तर को ऊपर उठने से रोका जाना चाहिए। ऊसर सुधार हेतु जिप्सम तथा पायराइट आदि के प्रयोग के लिये विस्तृत कार्यक्रम तैयार किए जाने चाहिए। इन क्षेत्रों में हरी खाद के साथ-साथ गोबर की खाद अत्यावश्यक है।

3. फसल प्रतिरूप तथा भूमि उपयोग में सुधार -
निसंदेह विस्तृत खेती की संभावनाएं अब बहुत सीमित रह गई हैं किंतु फिर भी बंजर भूमि पर सुधार कार्यक्रम अमल में लाकर इन्हें कृषि योग्य बनाने के लिये निरंतर प्रयास किए जाने चाहिए। अध्ययन क्षेत्र में इस मद में 11308 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि बेकार पड़ी हुई है। तथा अन्य परती भूमि के अंतर्गत 17460 हेक्टेयर भूमि पर कृषि फसल नहीं उगाई जा रही है। इस भूमि को यदि किसी प्रकार कृषि उपयोग में लाया जा सके तो लगभग 28768 हेक्टेयर भूमि पर विभिन्न फसलें ऊगाई जा सकती हैं। इसी प्रकार जलभराव के कारण लवणीय और क्षारीय भूमि पर बहुमुखी उपयोग हेतु कृषि योग्य बनाना संभव हो सकता है। इन उपायों में सिंचाई, गहरी जुताई, अपतृण का हराया जाना, रसायनों का उपयोग संप्रावहन, भूतल का कतरना, जल ग्रस्तता के लिये उपयुक्त नालियों द्वारा जल निकास की व्यवस्था करना प्रमुख है।

4. गहन कृषि का विस्तार -
यह सच है कि विस्तृत खेती की क्षमता सीमित है किंतु गहरी खेती की अपार संभावनाएं हैं जिसका उपयोग किया जाना चाहिए। कृषि की विकसित तकनीक का मूल बिंदु है फसलों की गहनता में विस्तार। अब तक एक से अधिक बार जोती गई भूमि के अंतर्गत क्षेत्र में तेज गति से वृद्धि हो रही है परंतु पिछले कुछ वर्षों से इसमें स्थायित्व सा आ गया है इस प्रवृत्ति के दो कारण रहे हैं प्रथम उन्नत कृषि आदानों के पैकेज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हुए हैं। दूसरा जब कभी पैकेज उपलब्ध भी हुए हैं तो इनकी कीमतें बहुत ऊँची रही हैं। इसलिये कृषकों को उन्नत आदानों को सस्ती दरों पर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करवाना चाहिए भूमि की उत्पादकता तथा उर्वरता बढ़ाने के लिये अनेक कदम उठाने होंगे जैसे भू परीक्षण, भूमि को ठीक तरह से जोतना व बीज रोपना भूमि के नष्ट हो रहे तत्वों को बदलना, पर्याप्त मात्रा में उर्वरक प्रयोग करना आदि। फसलों के प्रतिरूप में भी वांछित परिवर्तनों द्वारा भी उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। अत: आवश्यक है कि उत्पादकता बढ़ाने के लिये सरकारी नीतियों में वांछनीय परिवर्तन किए जाएं। जिससे उन्नत विधियों के साथ-साथ मिश्रित फसलों को भी प्रोत्साहन प्राप्त हो।

5. मुद्रादायिनी फसलों में विस्तार -
अध्ययन क्षेत्र में मुद्रादायिनी फसलों में गन्ना तथा आलू की फसलों का ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। गन्ना केवल 3021 हेक्टेयर तथा आलू 7635 हेक्टेयर क्षेत्रफल पर ही उगाया जाता है। गन्नें के क्षेत्रफल में कमी का कारण क्षेत्र में चीनी मिल का न होना है। आलू का भी उत्पादन क्षेत्रीय खाद्य आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिये ही किया जाता है क्योंकि प्रशीतन सुविधाओं का क्षेत्र में नितांत अभाव है। अत: मुद्रादायिनी फसलों के क्षेत्रफल में विस्तार को प्रोत्साहन के लिये किसानों को नकदीकरण की सुविधाएँ दी जानी चाहिए। चिकनाई की आपूर्ति लाही, सरसों द्वारा ही होती है परंतु इसका क्षेत्रफल अभी तक 2178 हेक्टेयर में ही होता है। तिलहनी फसलों के सूरजमुखी, सोयाबीन आदि को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। परंतु इन फसलों का बाजार न होने के कारण विक्रय समस्या से हतोत्साहित होती है। इसी प्रकार सब्जियों के उत्पादन को बढ़ाने का प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए, मसाले वाली फसलों को भी प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।

6. कृषि से संबंधित क्रियाओं को प्रोत्साहन -
ग्रामीण विकास के लिये कृषि विकास का सर्वोपरि महत्त्व हो सकता है किंतु मात्र कृषि विकास से ही सामान्य ग्रामीण जीवन में सुधार और उसके पूरी तरह से उत्थान की सामर्थ्य नहीं होती है। ग्रामीण विकास के लिये हमें कृषि से संबंद्ध अनेक क्षेत्रों में सुधार करने की आवश्यकता पर बल देना चाहिए। संबंद्ध क्षेत्रों में प्रमुख है - पशुपालन, मत्स्य उद्योग, रेशम उत्पादन, बागवानी तथा वानिकी आदि।

(अ) पशुपालन को प्रोत्साहन -
किसी भी अर्थव्यवस्था के लिये पशुपालन बहुत महत्त्वपूर्ण होता है, खेती बाड़ी के लिये हल चलाने, कुओं से पानी निकालने, फसलों को ढोकर मंडी तक ले जाने के आदि कार्यों के लिये पशुओं का बड़ा प्रयोग किया जाता है, इसके अतिरिक्त पशु बड़े मात्रा में खाद के स्रोत, मांस के स्रोत, पशुचर्म तथा खालें, ऊन, पशुचर्बी के अतिरिक्त अन्य उत्पोत्पाद की काफी मात्रा में उपलब्ध होता है। पशुपालन रोजगार और आय का एक बहुत बड़ा साधन है, इनमें प्रमुख हैं - डेरीफार्म, मुर्गीपालन, भेड़ व सुअर पालन एवं मछली पालन।

1. डेरी फार्मिंग -
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में डेरी उद्योग महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। डेरी उद्योग के माध्यम से निर्बल वर्ग की आर्थिक सामाजिक दशा में उल्लेखनीय सुधार लाये जा सकते हैं। डेरी उद्योग के विकास के लिये सबसे बड़ी आवश्यकता तो यह है कि दूध देने वाले पशुओं की उत्पादकता को बढ़ाया जाय जिसके लिये नश्ल सुधार ही पर्याप्त नहीं होगा बल्कि पशुपालन की रीतियों में भी सुधार करना होगा डेरी उद्योग विकास के लिये पौष्टिक चारे की व्यवस्था करना, उनके स्वास्थ्य की देखभाल का प्रबंध तथा उत्पादन का समुचित विक्रय व्यवस्था का विकास करना होगा, पशुपालकों तक पशु वैज्ञानिकों को भेजकर पशुपालन संबंधी ज्ञान के लिये उचित व्यवस्था की जानी चाहिए।

2. मुर्गी पालन -
मुर्गीपालन अपनी विशेषताओं के कारण ग्रामीण समुदाय के निर्बल वर्ग द्वारा बड़ी सरलता से अपनाया जा सकता है, इस काम के लिये थोड़ी पूँजी की आवश्यकता होती है, इसे विभिन्न जलवायु तथा परिस्थितियों में संचालित किया जा सकता है, इससे वर्ष भर आय प्राप्त हो सकती है। मुर्गीपालन के आधुनिक तकनीकी का विकास किया गया है किंतु यह टेक्नोलॉजी अभी तक शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित है अत: इस आधुनिक तकनीकी का सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक विस्तार किया जाना चाहिए, जिससे न केवल अंडों के उत्पादन को बढ़ाया जा सके बल्कि मुर्गीपालन व्यवसाय को भी आधुनिक बनाया जा सके।

3. सुअर पालन -
भेड़, बकरी एवं सुअर पालन का कार्य पूरी तरह से ग्रामीण समुदाय के निर्धन परिवारों द्वारा किया जाता है। भेड़ बकरी तथा सुअर पालन के ऐसे अनेक पहलू हैं जिन पर विशेषज्ञों को ध्यान देने की आवश्यकता है। इन पहलुओं में आहार संसाधनों के विकास की विशेषकर कृषि और औद्योगिक सहउत्पादों के विकास और विपणन की व्यवस्था करना आवश्यक है। साथ ही भेड़ और बकरियों के उत्पादों को उचित मूल्य पर विक्रय की व्यवस्था करना जिससे भेड़ और बकरी पालकों को अपने परिश्रम का उचित मूल्य प्राप्त हो सके।

4. मछली पालन -
मछली पालन मुख्यत: ग्रामीण वर्ग का ही व्यवसाय है। मछली के रूप में प्राप्त खाद्य सामग्री पौष्टिकता से परिपूर्ण होती है अत: इस व्यवसाय को प्रोत्साहित करने हेतु तालाब, झीलों तथा क्षेत्रीय नदियों में मछली पालन को प्रेरित किया जाना चाहिए। यह व्यवसाय भी कम पूँजी पर अधिक लाभ देने वाला व्यवसाय है जो न केवल आय का ही साधन है अपितु पौष्टिक खाद्य सामग्री की भी आपूर्ति होती है। खाद्यान्न समस्या हल करने में यह व्यवसाय महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कर सकता है।

(ब) रेशम उत्पादन को प्रोत्साहन -
रेशम उत्पादन भी किसानों के लिये आय का एक पूरक साधन है यह व्यवसाय श्रम प्रधान होता है अत: इस व्यवसाय में अतिरिक्त रोजगार निर्माण की भारी क्षमता है। रेशम की मांग बढ़ती जा रही है न केवल रेशमी कपड़े के रूप में बल्कि अनेक औद्योगिक क्रियाओं में भी रेशम उत्पाद को प्रोत्साहन देकर क्षेत्रीय लोगों की अतिरिक्त आय का साधन बनाया जा सकता है।

(स) खाद्य संवर्द्धन उद्योग को प्रोत्साहन -
खाद्य संवर्द्धन उद्योग में उन क्रियाओं को शामिल किया जाता है जो खाद्य पदार्थों का रूप परिवर्तन कर उन्हें लंबे समय तक उपभोग योग्य बनाते हैं। फसल काटने के बाद फलों और सब्जियों को प्राकृतिक रूप से अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है। जिससे फसलोत्पादन के समय आपूर्ति बढ़ जाने के कारण कृषकों को इन पदार्थों का उचित मूल्य प्राप्त नहीं हो पाता है जिससे अच्छी फसल के बाद भी कृषकों की आय अपेक्षित रूप से नहीं बढ़ पाती है। उत्पादन को इस तरह की हानि से बचाने के लिये आवश्यक है कि एक ओर फसल कटाई तकनीकों में सुधार किया जाए और प्रशीतन सुविधाएँ सरल और आसान शर्तों पर उपलब्ध करवाई जाये और उपलब्ध उत्पाद के वैकल्पिक उपयोगों की पहचान की जाए। वर्तमान परिस्थितियों में खाद्य उद्योग के विस्तार के वास्ते यह आवश्यक है कि समुचित विकास नीति का निर्माण किया जाय जो इस दिशा में आवश्यक मार्गदर्शन करे।

7. कृषि आधारित ग्रामीण उद्योगों को प्रोत्साहन -
ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की प्रकृति शहरी क्षेत्र में पाई जाने वाली बेरोजगारी से भिन्न होती है। हम अपने सामान्य जीवन में देखते हैं कि जिस समय बीजों को रोपित करने के लिये खेत को तैयार करना होता है या पकी हुई फसल को काटना और साफ करना होता है उस समय श्रमिकों की मांग बढ़ जाती है तब कृषकों या कृषि श्रमिकों को रोजगार मिल जाता है। लेकिन बाकी समय में उन्हें कम या बिल्कुल कार्य नहीं मिल पाता है। इसके अतिरिक्त ग्रामीण क्षेत्रों में प्रच्छन्न बेरोजगारी विद्यमान रहती है, इस मौसमी तथा प्रच्छन्न बेरोजगारी की तीव्रता कम करने के लिये ग्रामीण उद्योगों को प्रोत्साहन देना होगा। इन उद्योगों में प्राय: स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चे माल का ही प्रयोग किया जाता है इसीलिये इन उद्योगों की स्थापना और विकास की संभावनाओं को तलाशना होगा। इन उद्योगों में निम्नलिखित क्रियाओं पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

(अ) कृषि पदार्थों का विधायन -
बड़ी संख्या में लोगों को पूर्णकालिक रोजगार के अवसर प्रदान करने के लिये विधायन संबंधी औद्योगिक इकाइयों की स्थापना ग्रामीण क्षेत्रों में की जानी चाहिए। इस प्रकार के उद्योगों में दूध का विधायन सूरजमुखी, सोयाबीन, सरसों, लाही से तेल निकालना खांडसारी और गुड़ निकालने वाली इकाइयाँ, फलों तथा सब्जियों का विधायन सनई का सामान बनाना उल्लेखनीय है।

(ब) कृषि उत्पादन का उपयोग करने वाले उद्योग -
कृषि के गौण उत्पादन का निर्माण उद्योगों में कच्चे माल के रूप में प्रयोग करने के संबंध में तकनीकी विकास पर्याप्त संभावनाएं उपलब्ध है इस प्रकार के उत्पादन में शीरे से अल्कोहल, धान की भूसी से गत्ता बनाना, टूटे हुये चावल से शराब बनाना, आलू से चिप्स बनाना, गन्ने की खोई से कागज तथा गत्ता बनाना आदि विशेष उल्लेखनीय हैं।

(स) ग्रामीण दस्तकारी एवं उद्योगों का विकास -
ग्रामीण दस्तकारिता की वस्तुओं के निर्माण को और अधिक प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। ग्रामीण दस्तकारी का प्रयोग न केवल उपभोक्ता वस्तुओं के निर्माण में अपितु कृषि मशीनरी एवं उपस्करों के निर्माण में भी किया जा सकता है। इनमें से कृषि यंत्रों/औजारों का निर्माण चटाई, दरी बनाना, डलिया टोकरी बनाना, रस्सी बनाना, सिलाई, कढ़ाई, पत्तल दोना का निर्माण, अचार मुरब्बा का निर्माण, बागवानी, पशुपालन, रेशम के कीड़े पालना आदि प्रमुख हैं।

8. संतुलित भोजन का ज्ञान -
जो आहार हमारे शरीर की भोजन संबंधी समस्त आवश्यकताओं की उचित प्रकार से पूर्ति करता है उसे संतुलित आहार कहते हैं। स्वास्थ्य रक्षा और दीर्घायु प्राप्त करने के लिये हमारे लिये संतुलित आहार लेना परम आवश्यक है। खेद है कि भारतीय जनता का आहार उसकी शारीरिक आवश्यकताओं के अनुसार नहीं है बहुत से लोगों को भरपेट भोजन प्राप्त नहीं होता। भारत जैसे देश में जहाँ गुणात्मक श्रेष्ठता वाले भोज पदार्थों का नितांत अभाव है, जहाँ उनकी कीमतें ऊँची हैं और लोग क्रय शक्ति के अभाव के कारण श्रेष्ठ कोटि के खाद्य पदार्थ क्रय कर पाने में असमर्थ हैं, वहाँ हर व्यक्ति संतुलित आहार पा सके, यह वर्तमान परिस्थितियों में लगभग असंभव प्रतीत होता है। किंतु अभावों के माध्यम भी यदि हमारा भोजन विषयक ज्ञान काम चलाऊ हो और हम यह जान सकें की हमारे लिये कौन सा खाद्य पदार्थ कितना महत्त्वपूर्ण है? तो लोग बिना अतिरिक्त खर्चा बढ़ाये अपने भोजन को वर्तमान रूप में ही कुछ अच्छा अवश्य बना सकते हैं। इसके लिये प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर लोगों को संतुलित भोजन के बारे में ज्ञान कराया जाना चाहिये।

(अ) शिशु का भोजन -
शिशु की क्रियाशीलता द्वारा व्यय हुई शक्ति की पूर्ति के लिये उसकी उचित शारीरिक वृद्धि व मानसिक विकास तथा उत्तम स्वास्थ्य बनाये रखने के लिये माता का दूध ही सर्वोत्तम आहार है। आवश्यकता पड़ने पर शिशु को गाय का दूध देना चाहिये, गाय के दूध के अभाव में बकरी का दूध देना चाहिये। गाय एवं बकरी के दूध में भी शिशु के लिये आवश्यक पोषक तत्व विद्यमान रहते हैं।

(ब) वृद्धावस्था का भोजन -
शिशुओं के समान वृद्ध व्यक्तियों के भोजन का भी विशेष ध्यान रखना चाहिये। इस अवस्था में सुगमता से पचने वाला विटामिनों और प्रोटीन युक्त भोजन देना चाहिये। इसके लिये ताजा हरी पत्तेदार सब्जियाँ, दूध और फलों का रस देना चाहिये। इस अवस्था में मिर्च मसालेदार और गरिष्ठ भोजन नहीं करना चाहिये। भोजन ऐसा होना चाहिये जिसे खानें में श्रम कम किंतु पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में शरीर में पहुँच जाए।

(स) गर्भवती महिला का भोजन -
समान दशा की तुलना में गर्भकाल में महिला को अधिक मात्रा में विटामिन डी, प्रोटीन, फास्फोरस तथा कैल्सियम युक्त भोजन मिलना चाहिये। क्योंकि इन्हीं के माध्यम से उदरस्थ भ्रूण का पोषण होता है। अत: इस काल में महिलाओं को कम से कम 750 ग्राम दूध, 200 ग्राम फल, 01 अंडा तथा 50 ग्राम मांस प्रतिदिन आवश्यक मात्रा में मिलना चाहिये। शाकाहारी महिलाओं को मांस के स्थान पर 50 ग्राम दाल की मात्रा बढ़ा देनी चाहिये।

(द) स्तनपान कराने वाली महिला का भोजन -
इस दशा में महिलाओं को पचने वाला तथा पर्याप्त पौष्टिक तत्वों से भरपूर भोजन होना चाहिये क्योंकि शिशु के पोषण के कारण इस स्थिति में महिला को भूख अधिक लगती है अत: प्रोटीन, कैलोरी तथा कैल्सियम युक्त भोजन की मात्रा बढ़ा देनी चाहिये।

(य) युवकों को भोजन -
इस अवस्था में युवक शारीरिक एवं बौद्धिक विकास करता हुआ समाज में रहकर आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करता है। अथवा विद्यालय में पढ़ता हुआ ब्रह्मचर्य जीवन व्यतीत करता है। भोजन का सीधा प्रभाव मन, बुद्धि और इंद्रियों पर पड़ता है इसलिये इस अवस्था में भोजन संबंधी विशेष सावधानी की आवश्यकता पड़ती है। युवकों को भोजन में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिये।

1. भोजन सादा पौष्टिक तथा ताजा होने के साथ-साथ अधिक गर्म न हो।
2. चना, उड़द, गेहूँ आदि का अंकुरित अन्न का प्रयोग स्वास्थ्य के लिये अच्छा है।
3. भोजन में नींबू का प्रयोग पाचन शक्ति बढ़ाता है।
4. भोजन में सी तथा डी विटामिन पर्याप्त मात्रा में होने चाहिये।
5. खट्टे, चटपटे, मशालेदार, अचार, मुरब्बा का प्रयोग कम से कम करना चाहिये।
6. गाय अथवा बकरी का दूध प्रयोग करना चाहिये।
7. भोजन के साथ देशी खांड या गुड़ लिया जा सकता है।
8. दोपहर भोजन के बाद मौसम के अनुसार ताजे फलों का सेवन स्वास्थ्य के लिये लाभकारी है।

(र) भोजन संबंधी अन्य आवश्यक सुझाव -
1. जाड़े के दिनों में अधिक भोजन करना चाहिये।
2. भोजन को धीरे-धीरे खूब चबाकर करना चाहिये।
3. भोजन एक निश्चित समय पर ही करना चाहिये।
4. सायंकालीन भोजन कम मात्रा में किया जाना चाहिये।

(ल) भोजन पकाने संबंधी सुझाव -
गृहणी जिसका अधिकांश समय रसोई घर में ही व्यतीत होता है को यह जानना आवश्यक है कि पोषक तत्वों का संतुलन पकाने के बाद भी बना रहे। अत: इस संबंध में निम्नांकित बातों का ध्यान रखना चाहिये।

1. मोटा तथा चोकर युक्त आटा खाना पकाने के कुछ समय पूर्व भली प्रकार पानी में गूथकर रखना चाहिये जिससे वह पर्याप्त मात्रा में फूल सके।
2. रोटी चूल्हे की आग में दूर से सेंकी गई स्वास्थ्य वर्धक होती है।
3. यदि रोटी को पकाते समय घी लगा दिया जाय तो स्वास्थ्य वर्धक और गुणकारी हो जाती है। परंतु यदि खाते समय रोटी पर घी लगा दिया जाता है तो भोजन गरिष्ठ हो जाता है।
4. शारीरिक श्रम करने वालों को बिना चुपड़ी रोटी ही खानी चाहिये।
5. कच्ची सब्जी खाना स्वास्थ्य के लिये अच्छा रहता है। परंतु प्रत्येक सब्जी कच्ची नहीं खाई जा सकती। टमाटर, मूली, गाजर, चुकंदर, प्याज, शलजम आदि कच्ची ही खानी चाहिये।
6. सब्जी तलकर खाने में गरिष्ठ होती है अत: उबालकर खाने में स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छी रहती है।
7. सब्जी को छौंकनें में हींग, अदरक, प्याज, हरा धनिया, काली मिर्च का प्रयोग करना चाहिये।
8. सब्जियों का यदि मोटा भाग छीलकर फेंक दिया जाता है तो उसके अधिकांश पौष्टिक तत्व नष्ट हो जाते हैं।
9. चावल का यदि मांड निकाल दिया जाय तो उसके पौष्टिक तत्व समाप्त हो जाते हैं।
10. चावल को रगड़ रगड़ कर धोने से भी पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं।
11. आवश्यकता से अधिक पकानें पर भी पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं।
12. सब्जियाँ भगौने को ढक कर पकाना चाहिये अन्यथा भाप के साथ पोषक तत्व निकल जाते हैं।
13. खाने के समय ही भोजन पकाना चाहिये, रखे भोजन के स्वाभाविक गुण नष्ट हो जाते हैं।
14. शीघ्र गलाने के लिये सोडे का प्रयोग नहीं करना चाहिये।
15. मालपुआ, पूड़ी, कचौड़ी तथा हलुआ भूख से कुछ कम मात्रा में सेवन करना चाहिये।
16. बाजार की विभिन्न मिठाईयों के सेवन से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
17. मांस का सेवन अपने स्वास्थ्य, जलवायु को ध्यान में रखकर अल्प मात्रा में करना चाहिये।
18. कच्चे अंडे की जर्दी दूध में फेंटकर अथवा वैसे ही लेना अधिक लाभकारी है।
19. जिन व्यक्तियों को नेत्र ज्योति कम होती है उन्हें अंडे का सेवन लाभप्रद होता है।
20. मदिरा का सेवन स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है।
21. पत्तेदार सब्जियों की आपूर्ति क्षेत्रीय उत्पादन द्वारा तथा यथा संभव कच्चा सेवन करना चाहिये।

शोध अध्ययन का सार संक्षेप


भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिये कृषि का विशेष महत्त्व है। वास्तव में कृषि अनेक देशों के आर्थिक विकास का प्रमुख आधार है परंतु जिस देश में कृषि भूमि अधिक है वहाँ तो इसका महत्त्व और भी अधिक है। भारत एक ऐसा देश है, परंतु आश्चर्य तो यह है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश के भी कभी-कभी खाद्यान्न संकट का सामना करना पड़ता है। तीव्रगति से बढ़ती हुई जनसंख्या, जीवनस्तर का क्रमिक उत्थान आवश्यकताओं का दिलाता हुआ स्वरूप, पौधों और जैविक पदार्थों के औद्योगिक उपयोग में अप्रत्याशित वृद्धि, खाद्यान्न तथा अन्य कृषि उपजों के बीच भूमि उपयोग में होने वाली प्रतिस्पर्धा, नागरिक एवं औद्योगिक विकास में प्रगति तथा यातायात मार्गों का विस्तार आदि कृषि भूमि का अभाव उत्पन्न करते जा रहे हैं, किंतु तकनीकि परिवर्तन से कृषि उत्पादन में भी वृद्धि की जा रही है जिससे जनसंख्या में निरंतर वृद्धि के बाद भी खाद्यान्न के अभाव को कुछ हद तक रोका जा सका है। किंतु वास्तविकता यह है कि भोजन, कपड़ा, गृह और र्इंधन जैसी समस्याएँ सर्वथा विद्यमान रहेंगी क्योंकि जनसंख्या की अनियंत्रित वृद्धि को देखते हुए कृषि साधनों के विकास से इन समस्याओं को आंशिक समाधान ही संभव है। किंतु इसके लिये हमें प्रयत्नशील रहना अत्यन्त आवश्यक है।

स्वतंत्रता के बाद खाद्यान्नों के उत्पादन में सराहनीय प्रगति के बाद भी भारत में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता 475 ग्राम ही है। जबकि 600 ग्राम पौष्टिकता, का माप चलाऊ स्तर पर माना जाता है, यदि पिछले 20 वर्षों का औसत देखें तो प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता लगभग 450 ग्राम ही है। यदि हम हर भारतीय को औसतन 500 ग्राम खाद्यान्न भी उपलब्ध न करा सके तो कृषि क्षेत्र में हमारी उपलब्धि का कोई अर्थ नहीं है। हमारी खाद्यान्नों की उत्पादकता में निरंतर उतार चढ़ाव भी होते रहे हैं। कभी खाद्यान्न उत्पादकता कम और कभी अधिक रही है। 21वीं सदी आते-आते हमारी खाद्यान्न उत्पादकता स्थिर हो गई है। ऐसी स्थिति में किसी प्राकृतिक आपदा के समय हमें वासियों की न्यूनतम खाद्यान्न आवश्यकता की आपूर्ति कठिन हो जायेगी। तब न फसल बीमा योजना काम आयेगी और न कृषि को औद्योगिक दर्जा देने की नीति। हमें उन क्षेत्रों का विकास करना चाहिये जिनकी क्षमता का अभी तक पूर्णतया दोहन नहीं हो सकता है। अनुमान है कि भारत में कृषि क्षमता का 40 प्रतिशत से अधिक उपयोग नहीं हो पाया है लगभग 10 करोड़ हेकटेयर भूमि बगैर बंजर भूमि है, इसका उपयोग अत्यंत आवश्यक है। कृषि उत्पादकता में वृद्धि के लिये शोधकर्ता के दृष्टिकोण से निम्न कार्यक्रमों को प्रोत्साहित ही नहीं करना है बल्कि इन्हें वास्तविकता का जामा भी पहनाना होगा।

1. मृदा सर्वेक्षण तथा मृदा संरक्षण।
2. अधिकाधिक कृषकों को कृषि की नई तकनीकि का ज्ञान कराना।
3. भूमिगत जल तथा भू पृष्ठीय जल के वैज्ञानिक उपयोग को बढ़ावा देना।
4. जल संसाधन को वैज्ञानिक प्रबंध द्वारा दुरुपयोग को रोकना।
5. कृषकों को समुचित प्रशिक्षण प्रदान करना।
6. मोटे अनाजों के क्षेत्रफल में विस्तार करना।
7. दलहनी तथा तिलहनी फसलों के उत्पादन को बढ़ाना।
8. मुद्रादायिनी फसलों का परंपरागत फसलों के साथ समायोजन।
9. नहरों की सुरक्षा तथा उनके उचित प्रबंध की व्यवस्था करना।
10. जैविक उर्वरकों के प्रयोग को प्रोत्साहन।
11. पशुओं की नस्लों में सुधार तथा पशुपालन को प्रोत्साहन।
12. पशुओं के चारे की फसलों को प्रोत्साहन।
13. कृषि की सहायक क्रियाओं को।
14. कृषि आधारित कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन।

भारत एक कृषि प्रधान देश है जहाँ पर जनसंख्या के एक बड़े भाग की आवश्यकताओं को पूरा करने का दायित्व भूमि संसाधन पर निर्भर है। जनसंख्या की उत्तरोत्तर वृद्धि के फलस्वरूप प्रति व्यक्ति भूक्षेत्र में निरंतर ह्रास हो रहा है, दूसरी ओर निर्धनता व निम्न जीवन स्तर के फलस्वरूप जनसंख्या के एक बड़े भाग का पोषण स्तर निम्न है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या भूख और कुपोषण जैसी बिमारियों की शिकार है तथा 30 प्रतिशत जनसंख्या के पास पर्याप्त भोजन नहीं है किसी देश की जनसंख्या तभी प्रगतिशील हो सकती है जब उसका भरपूर पोषण होता है अत: पोषण स्तर में सुधार हेतु कृषि उत्पादन में वृद्धि करना आवश्यक हो जाता है। जो दो विधियों द्वारा ही संभव है, प्रथम कृषिगत क्षेत्र में वृद्धि करके, द्वितीय वर्तमान कृषिगत क्षेत्र की उत्पादकता में वृद्धि करके। किसी भी विधि को अपनाने के लिये भूमि संसाधन पर जनसंख्या भार का मूल्यांकन करना आवश्यक हो जाता है। तभी विकास की कोई ठोस योजना तैयार किया जाना संभव है।

भूमि समस्त गतिविधियों का आधार है अत: उपलब्ध भूमि से वहाँ की जनसंख्या का समुचित भरण पोषण किस प्रकार संभव बनाया जा सकता है। वर्तमान कृषि उत्पादकता तथा कृषि उत्पादकता में वृद्धि की भावी संभावनाएं क्या है?

किसी क्षेत्र की भूमि की प्राकृतिक प्रकृति कृषि भूमि की ओर बढ़ने की है। अथवा चारागाह तथा वनों की ओर बढ़ने की ओर है, किसी भूखंड को कैसे उपजाऊ बनाया जा सकता है? आदि तथ्यों को ध्यान में रखते हुए शोध अध्ययन प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। प्रस्तुत शोध प्रबंध का प्रमुख उद्देश्य जनपद प्रतापगढ़ की कृषि भूमि क्षमता का मूल्यांकन करना है। इस शोध अध्ययन के निम्नांकित उपलक्ष्य निर्धारित किये गये हैं।

1. सामान्य भूमि उपयोग तथा कृषि भूमि उपयोग का अध्ययन करना।
2. कृषि भूमि का प्रचलित सस्य तथा प्रचलित तकनीक का अध्ययन करना।
3. कृषि भूमि पर जनसंख्या के भार का मापन करना।
4. जनसंख्या के पोषक स्तर का मापन तथा स्वास्थ्य स्तर का ज्ञान प्राप्त करना।
5. कुपोषण तथा अल्पपोषण से संबंधित बीमारी का विश्लेषण करना।
6. पोषण संबंधी समस्याओं के समाधान में सरकार के प्रयासों का ज्ञान प्राप्त करना।
7. कृषि उत्पादन में वृद्धि तथा पोषण संबंधी समस्याओं के समाधान हेतु सुझाव देना।

उपयुक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये शोधकर्ता द्वारा निम्न परिकल्पनाओं को आधार बनाया गया है -

1. कृषि क्षेत्र में खाद्यान्न फसलों की प्रधानता और व्यावसायिक फसलों का अभाव है।
2. कृषि उत्पादकता निम्न होने का कारण कृषि तकनीकी का सीमित प्रयोग।
3. आधुनिक कृषि तकनीकी द्वारा प्रति हेक्टेयर कृषि उत्पादकता में वृद्धि संभव।
4. अध्ययन क्षेत्र के प्रचलित आहार प्रतिरूप में खाद्यान्नों की प्रधानता पाई जाती है।
5. परंपरागत क्षेत्रीय खाद्य पदार्थों से ही गुणात्मक पोषण स्तर प्राप्त करना संभव है।
6. प्रचलित आहार में संतुलन स्थापित करके कुपोषण से बचा जा सकता है।
7. कुपोषण तथा अल्पपोषण के लिये निर्धनता तथा अज्ञानता प्रमुख रूप से उत्तरदायी है।

प्रस्तावित अध्ययन क्षेत्र जनपद प्रतापगढ़, यूपी के इलाहाबाद मंडल के अंतर्गत 25 अंश 52 अक्षांश से 26 अंश 22 अक्षांश तथा 81 अंश 22 अक्षांश से 82 अंश 49 अक्षांश पूर्वी देशांतर के मध्य मंडल के जनपद का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 3717 वर्ग किलोमीटर है। इसके उत्तर में सुल्तानपुर के मध्य स्थित है। जनपद दक्षिण में जनपद इलाहाबाद तथा पश्चिम में जनपद रायबरेली स्थित है। प्रशासनिक दृष्टि से जनपद चार तहसीलों- प्रतापगढ़, कुण्डा, लालगंज तथा पट्टी में विभक्त है। तथा 15 विकास खंडों द्वारा ग्रामीण विकास संचालित होते हैं। वकास खंडों में -

1. कालाकांकर
2. बाबागंज
3. कुंडा
4. बिहार

इस दृष्टि से जनपद में 174 प्रारंभिक कृषि सहकारी साख समितियाँ कार्यरत हैं जिनकी सदस्य संख्या 351020 है और इन समितियों ने 31 मार्च 1995 तक कुल 72930 हजार रुपये अल्कालीन तथा 8002 रुपये मध्यकालीन ऋण के रूप में वितरित किए। जनपद में सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंकों की संख्या 23 है जिसमें 17 बैंक ग्रामीण तथा 06 बैंक नगरीय क्षेत्रों में स्थित है जिनके द्वारा कुल 32030 रुपये के ऋण दीर्घकालीन उद्देश्यों के लिये दिए गये। व्यावसायिक बैंकों की दृष्टि से जनपद में कुल 128 बैंक शाखाएँ कार्यरत हैं जिनमें से 57 राष्ट्रीयकृत बैंक शाखाएँ तथा 71 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक शाखाएँ कार्यरत हैं। बैंकों में प्रति व्यक्ति जमा धनराशि 1320 रुपये तथा प्रति व्यक्ति ऋण वितरण 415 रुपये हैं।

विपणन वह मानवीय क्रिया है जो विनिमय प्रक्रिया संपन्न करते हुए मनुष्य की आवश्यकताओं को संतुष्ट करती है इस दृष्टि से जनपद में 209 बीज गोदाम रासायनिक उर्वरक भंडार हैं जिनकी भंडारण क्षमता 20300 मी. टन है। 64 कीटनाशक डिपो हैं जिनकी क्षमता 6400 मी. टन है। 03 शीत भंडार कार्यरत हैं जिनकी क्षमता 1200 मी. टन है। खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से 02 भारतीय खाद्य निगम भंडारण क्षमता 10000 मी. टन, राज्य भंडार निगम भंडारण क्षमता 10073 मी. टन है। 1200 मी. टन है। परिवहन सुविधाओं की दृष्टि से जनपद में रेल परिवहन तथा सड़क परिवहन प्रमुख साधन है। सड़क परिवहन के लिये जनपद में 148 किलोमीटर प्रादेशिक राजगार्म, 164 किलोमीटर मुख्य जिला सड़क, 1076 किलोमीटर अन्य जिला तथा ग्रामीण सड़कें विद्यमान हैं इसके अतिरिक्त जिला परिषद द्वारा पोषित 284 किलोमीटर तथा नगर पंचायत/क्षेत्र पंचायत द्वारा पोषित सड़कों की लंबाई 56 किलोमीटर है। चिकित्सा सुविधाओं की दृष्टि से अध्ययन क्षेत्र में 12 चिकित्सालय/औषधालय तथा 65 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित हैं जिनमें कुल 946 सैयाएँ उपलब्ध हैं। 26 आयुर्वेदिक चिकित्सायल/औषधालय 05 यूनानी तथा 22 होम्योपैथिक चिकित्सालय उपलब्ध हैं। जिनमें 134 सैयाएँ उपलब्ध हैं। परिवार एवं मातृशिशु कल्याण केंद्रों की संख्या 32 तथा परिवार एवं मातृशिशु कल्याण उपकेंद्र 360 स्थापित हैं। जनपद में कुल 1580 ग्राम विद्युतीकृत किए जा चुके हैं।

भूमि संसाधन मनुष्य के लिये प्रकृति का सर्वोत्तम उपहार है यह प्रत्येक अर्थव्यवस्था की आर्थिक क्रियाओं का आधार है। इस पर ही मनुष्य की समस्त गतिविधियों का सृजन एवं विकास होता है। इस दृष्टि से अध्ययन क्षेत्र का कुल प्रतिवेदित क्षेत्र 362423 हेक्टेयर है जिसमें से 448 हेक्टेयर (0.12 प्रतिशत) वन 8436 हेक्टेयर (2.33 प्रतिशत) कृषि योग्य बंजर भूमि, वर्तमान धरती के अंतर्गत 46218 हेक्टेयर (12.75 प्रतिशत) अन्य परती भूमि के अंतर्गत 16482 हेक्टेयर (4.55 प्रतिशत) ऊसर एवं कृषि अयोग्य भूमि 9760 हेक्टेयर (2.69 प्रतिशत) कृषि के अतिरिक्त अन्य उपयोग में लाई गई भूमि 40284 हेक्टेयर (11.12 प्रतिशत), चारागाह के अंतर्गत 810 हेक्टेयर (0.22 प्रतिशत) उद्यान एवं वृक्षों वाली भूमि के अर्न्तगत 17862 हेक्टेयर (4.93 प्रतिशत) संलग्न है। उक्त आठ शीर्षकों के अंर्तगत कुल 140317 हेक्टेयर अर्थात (38.71 प्रतिशत) भूमि कृषि के उपयोग में नहीं लाई जा पा रही है। इस प्रकार कुल शुद्ध बोया गया क्षेत्र 222106 हेक्टेयर (61.29 प्रतिशत) है जिस पर विभिन्न फसलें उगाई जा रही हैं। पर्यावरणीय संतुलन की दृष्टि से देखें तो अध्ययन क्षेत्र में वनों के अंतर्गत केवल 0.12 प्रतिशत क्षेत्र ही आता है।

जबकि उत्तरांचल राज्य बनने के पूर्व प्रादेशिक स्तर 17 प्रतिशत तथा राष्ट्रीय स्तर 22.7 प्रतिशत है। वर्तमान परती, अन्य परती तथा कृषि योग्य बंजर भूमि का कुल क्षेत्र 71136 हेक्टेयर भूमि को विभिन्न फसलों के अंतर्गत प्रयोग में लाया जाये तो अध्ययन क्षेत्र में 19.63 प्रतिशत क्षेत्र पर विभिन्न फसलें उगाई जा सकती हैं। शुद्ध बोये गये क्षेत्र 222106 हेक्टेयर में 77648 हेक्टेयर (34.96 प्रतिशत) भूमि पर दो या दो से अधिक फसलें उगाई जा रही हैं, जिससे फसल गहनता सूचकांक 134.96 है तथा सकल बोया गया क्षेत्र 348810 हेक्टेयर हो जाता है जो कुल प्रतिवेदित क्षेत्र से कम है।

प्रकृति ने अपनी उदारता से मनुष्य की विविध आवश्यकताएँ पूरी करने के लिये विभिन्न साधनों का निःशुल्क उपहार दिया है जिन्हें प्राकृतिक संसाधन कहा जाता है। इन प्राकृतिक साधनों को जितनी कुशलता से प्रयोग योग्य वस्तुओं और सेवाओं में परिवर्तित कर लिया जाय उतने ही क्षेयस्कर रूप से व्यक्ति का भोजन, आवास, वस्त्र, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा, यातायात एवं संवाद वाहन की आवश्यकताएँ पूरी हो सकती हैं इसलिये विकास की अनिवार्यता के रूप में संसाधनों के विदोहन का पक्ष भी सक्षम, उपयोगी और समाज के अनुकूल होना चाहिये। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों को वस्तुओं और सेवाओं में अधिक कुशलतापूर्वक परिवर्तित किया जा सकता है इसलिये तीव्र आर्थिक विकास के लिये विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी न केवल सहायक वरन एक अपरिहार्य अवयव है।

पिछले दशकों में हरित क्रांति मुख्यत: विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र की सफलता की कहानी है। नवीन विज्ञान और प्रौद्योगिकी के रूप में कृषि के रूप में कृषि निवेशों के समावेश से सिंचाई की सुविधाओं, नवीन कृषि यंत्रों का प्रयोग रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग, फसलों को बीमारियों तथा कीड़े मकोड़ों से फसल की सुरक्षा तथा अधिक उपज देने वाले बीजों के प्रचलन से कृषि में अनिश्चितता कम हुई है तथा फसल संरचना में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था और वर्षा की प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में सिंचाई का जनपदीय अर्थव्यवस्था में विशेष महत्त्व है जनपद में वर्षा का वार्षिक स्तर औसत रूप से 977 मिलीमीटर है जो सफल कृषि के लिये अपेक्षित वर्षा स्तर से कम है।

सामान्य रूप से जहाँ वर्षा 1270 मि.मी से कम होती है वहाँ कृत्रिम सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। वर्षा की मात्रात्मक अल्पता के अतिरिक्त विवरणात्मक पक्ष भी असमान है लगभग 80 प्रतिशत वर्षा जून से सितंबर माह तक होती है जबकि कृषि कार्य सतत जारी रहने की प्रवृत्ति रखता है इसलिये एक से अधिक फसल उगाने के लिये तथा कृषि उत्पादकता में वृद्धि के लिये सिंचाई के लिये कृत्रिम साधनों का विकास अनिवार्य हो जाता है। नियोजन काल में नहरें कृषि सिंचाई के लिये सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत रही है। यद्यपि आज भी जनपद में नहरों का महत्त्वपूर्ण स्थान है जो शुद्ध सिंचित क्षेत्र के लगभग आधे क्षेत्र को जल उपलब्ध कराती है। परंतु अब निजी नलकूप/पम्पिंग सेट का सिंचाई के लिये उपयोग बढ़ता जा रहा है। जनपद में जहाँ शुद्ध सिंचित क्षेत्र 166392 हेक्टेयर है जिसमें 80396 हेक्टेयर (48.32 प्रतिशत) नहरों द्वारा, 82756 हेक्टेयर (49.74 प्रतिशत) निजी नलकूपों द्वारा तथा शेष 3240 हेक्टेयर (1.95 प्रतिशत) अन्य साधनों द्वारा सिंचाई की जाती है सिंचाई क्षमता की दृष्टि से देखें तो जनपद में नहरों की कुल लंबाई 1764 किलोमीटर है परंतु इस साधन द्वारा 80396 हेक्टेयर सिंचन सुविधा उपलब्ध कराई गई।

अर्थात प्रति किलोमीटर 45.58 हेक्टेयर, जबकि नहरों के जल का कुशलता पूर्वक यदि उपयोग किया जाये तो 200 हेक्टेयर प्रति किलोमीटर सिंचन सुविधा उपलब्ध कराई जा सकती है जबकि वर्तमान में यह साधन अपनी क्षमता का 25 प्रतिशत से भी कम उपयोग कर पा रहा है। इसी प्रकार राजकीय नलकूप 94 तथा निजी नलकूप/पंपिंग सेट क्रमश: 6782 तथा 48464 है जो क्रमश: 19.96 हेक्टेयर तथा 1.559 हेक्टेयर प्रति नलकूप/ पंपिंग सेट सिंचन क्षमता का उपयोग किया जा रहा है। जिसे अत्यंत न्यून कहा जा सकता है। सिंचन क्षमता की दृष्टि से संपूर्ण कृषि क्षेत्र को सिंचाई सुविधायें उपलब्ध करवाई जा चुकी है परंतु कुशलतम उपयोग के अभाव में केवल 74.91 प्रतिशत कृषि क्षेत्र को ही सिंचन सुविधायें प्राप्त हो रही हैं।

यंत्रीकरण कृषि उत्पादिता बढ़ाने हेतु यांत्रिक शक्ति का प्रयोग है, यंत्रीकृरण से प्रति इकाई उत्पादन लागत में कमी की जा सकती है साथ ही ऐसी भूमि पर भी कृषि कार्य संभव हो जाता है जो बंजर व कम उपजाऊ होता है। किसी क्षेत्र की भूमि उपयोग में सफलता उस क्षेत्र में प्रयोग होने वाले यांत्रिक उपकरणों पर आधारित है। अध्ययन क्षेत्र में कृषि कार्यों में यंत्रों का उपयोग बढ़ता जा रहा है और पशुओं तथा मानव श्रम का प्रतिस्थापन संचालन शक्ति द्वारा किया जा रहा है जिससे प्रति हेक्टेयर उत्पादन में भी वृद्धि हुई है और कृषि क्षेत्र में भी कृषि यंत्रों के संदर्भ में जनपद में 168630 लकड़ी के हल 33578 लोहे के हल 2342 हैरो तथा कल्टीवेटर, 7726 उन्नत थ्रेसिंग मशीन, 907 स्प्रेयर, 5337 उन्नत बुवाई यंत्र तथा 2301 ट्रैक्टर प्रयुक्त हो रहे हैं। भूमि पर बढ़ता हुआ जनसंख्या का दबाव और भूमि का गैर कृषि कार्यों में बढ़ता हुआ प्रयोग यह तथ्य स्पष्ट करता है कि फसलों के अंर्तगत शुद्ध क्षेत्र बढ़ाकर उत्पादन में वृद्धि की संभावना अत्यंत कम रह गई है अत: कृषि उत्पादकता बढ़ाने में गहरी खेती ही सहायक हो सकती है जिसके लिये रासायनिक उर्वरकों का महत्त्वपूर्ण स्थान बनता जा रहा है क्योंकि भूमि की उर्वरकता बनाये रखने के तथा उर्वरता बढ़ाने के लिये आवश्यक है कि भूमि के ह्रास होने वाले तत्वों की आपूर्ति होनी चाहिये जिसकी आपूर्ति रासायनिक उर्वरकों द्वारा हो सकती है, अध्ययन क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों का महत्त्व हरित क्रांति के बाद ही बढ़ा है।

जहाँ 1980-81 में प्रति हेक्टेयर रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग केवल 34.66 किलो ग्राम था वहीं 90-91 में यह बढ़कर 70.81 किलोग्राम और 85-96 में यह 110.00 किलोग्रम तक पहुँच गया है। रासायनिक उर्वरकों की भाँति आधुनिक कृषि प्रणाली में पौध संरक्षण का भी प्रमुख स्थान है क्योंकि पौध संरक्षण का समुचित ध्यान यदि नहीं दिया जाता है तो पौध नाशकों तथा बीमारियों की सक्रियता बढ़ती है। जिससे फसलों को गंभीर क्षति पहुँचती है। जनपद में फसलों को कीटनाशकों से तथा विभिन्न बीमारियों से बचाने के लिये आवश्यक कीटनाशक रसायन/ पाउडर उपलब्ध हो सके इसके लिये विभिन्न विकासखंडों में 84 कीटनाशक डिपो कार्यरत हैं। जिनकी भंडारण क्षमता 8400 मीट्रिक टन है जिससे अब डी डी टी बी एच सी, एल्ड्रिन, सल्फर, ब्रोमाइड लिम्डेन तथा जिंक आदि फसल प्रणाली से घनिष्ठ रूप से जुड़ गये हैं। परंतु जनपद में फसलों की रक्षा हेतु कीटनाशक डिपो स्थापित हैं, परंतु कृषकों को यह सुविधा न तो समय पर और न आवश्यक मात्रा में उपलब्ध हो पाती है जिससे इनका प्रचलन व्यापक स्तर पर संभव नहीं हो सका है।

बीज कृषि उत्पादन का आधार होते हैं। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये उन्नत किस्म के बीजों का उत्पादन एवं वितरण आवश्यक है क्योंकि बीज की गुणवत्ता पर एवं सामर्थ्य पर ही उत्पादन और उत्पादिता आधारित है। इस दृष्टि से जनपद में 321308 हेक्टेयर क्षेत्रफल फसलें, 2776 हेक्टेयर पर तिलहनी फसलें तथा 10044 हेक्टेयर क्षेत्रफल पर गन्ना तथा आलू की फसलें उगाई जाती हैं। खाद्यान्नों में 280672 हेक्टेयर है जिनमें उड़द, मूंग, चना, मटर तथा अरहर फसलें प्रमुख हैं। जनपद में खाद्यान्न फसलों में लगभग सभी फसलों के लिये उन्नतशील बीजों का प्रचलन है परंतु धान तथा गेहूँ में इनका प्रयोग व्यापक स्तर पर किया जाता है। दलहनी फसलों उड़द, मूंग, चना, मटर तथा अरहर में उन्नत बीजों का प्रचलन है कुछ कृषक अरहर में भी इन बीजों का प्रयोग करते हैं। जायद की फसलों में हरी सब्जियों, खीरा, खरबूजा तथा तरबूज आदि में उन्नत बीजों का व्यापक स्तर पर प्रयोग किया जाता है। उन्नत किस्म के बीजों का सीमित क्षेत्र में प्रयोग किये जाने के दो प्रमुख कारण हैं, प्रथम तो इन बीजों की कीमत अधिक होने के कारण सामान्य कृषकों की क्रयशक्ति के बाहर हैं। द्वितीय इन बीजों का वितरण अत्यंत दोषपूर्ण है सरकार के तमाम प्रयासों के बाद भी ये बीज कृषकों तक समय पर नहीं पहुँच पाते साथ ही प्रमाणिक बीजों की कभी-कभी उत्पादकता इतनी कम हो जाती है कि कृषकों का इन बीजों से विश्वास ही उठ जाता है। सामान्यतया कृषकों को पर्याप्त सुविधाओं के अभाव में ही इन बीजों का प्रयोग करना पड़ता है जिससे इन बीजों की घोषित उत्पादकता तथा वास्तविक उत्पादकता में भारी अंतर हो जाता है।

जनपद में आधुनिक स्तर की गणना करने पर संपूर्ण जनपद में कृषि आधुनिकीकरण का स्तर 252.83 प्रतिशत प्राप्त हुआ है, परंतु विकासखंड स्तर पर 173 प्रतिशत से लेकर 334 प्रतिशत तक भिन्नता पाई गई है। इस अंतर को पाँच श्रेणियों में रखा गया तो अतिनिम्न कृषि आधुनिकीकरण के स्तर वाले विकासखंडों में कुंडा, बाबागंज तथा कालाकांकर प्राप्त हुए। निम्न आधुनिकीकरण वाले बिहार, मगरौरा तथा रामपुर खास विकासखंड प्राप्त हुए हैं। मध्यम आधुनिकीकरण के स्तर वाले सागीपुर, लक्ष्मणपुर, संडवा चंद्रिका, शिवगढ़ तथा मांधाता विकासखंड रहे। जबकि उच्च आधुनिकीकरण की श्रेणी में पट्टी, प्रतापगढ़ सदर तथा गौरा विकासखंड और अति उच्च स्तर पर केवल आसपुर देवसरा विकास खंड स्थित पाया गया।

किसी भी अर्थव्यवस्था में कृषि का सस्य प्रतिरूप वहाँ के प्राकृतिक पर्यावरण पर निर्भर करता है इस दृष्टि से देखा जाए तो जनपद में वर्ष भर में तीन फसलें उगाई जाती हैं यह फसलें ऋतु परिवर्तन से प्रभावित होती हैं। संपूर्ण फसलोत्पादन को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है खाद्य तथा अखाद्य फसलें। रबी की फसलें 47.90 प्रतिशत क्षेत्र पर, खरीफ की फसलें 48.11 प्रतिशत क्षेत्र पर तथा जायद की फसलें 3.99 प्रतिशत क्षेत्र पर उगाई जाती हैं परंतु इन तीनों फसलों में खाद्यान्न फसलों की प्रमुखता है जो लगभग 94 प्रतिशत क्षेत्र पर अधिकृत हैं जबकि व्यावसायिक फसलों का क्षेत्रफल केवल 6 प्रतिशत है। खरीफ की फसलों में धान की 32.78 प्रतिशत, ज्वार 1.76 प्रतिशत, बाजरा 4.10 प्रतिशत मक्का 0.61 प्रतिशत भागीदारी रहती है 12.25 प्रतिशत क्षेत्रफल पर दलहनी फसलें जिसमें उड़द/मूंग 3.83 प्रतिशत चना 2.61 प्रतिशत, मटर 1.50 प्रतिशत तथा अरहर 4.30 प्रतिशत क्षेत्र पर उगाई जाती है। रबी की फसलों में गेहूँ 41.34 प्रतिशत, जौ 1.05 प्रतिशत बोया जाता है। जायद फसलों का क्षेत्र 13932 हेक्टेयर है जिसमें खीरा, ककड़ी, तरबूज तथा सब्जियों का प्रमुख स्थान रहता है।

किसी क्षेत्र की कृषि स्थिति का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिये आवश्यक होता है कि उस क्षेत्र के सस्य विभेदीकरण का ज्ञान किया जाये कृषि के इस स्वभाव का अध्ययन करने के लिये समय-समय पर कृषि अर्थशास्त्रियों ने प्रयास किये हैं। यदि किसी क्षेत्र विशेष में अधिक फसलें उगाई जाती हैं और उनका क्षेत्रफलीय वितरण भी एक समान है तो उस क्षेत्र विशेष में फसलों का विभेदीकरण भी कम होगा। अत: सस्य विभेदीकरण सूचकांक तथा सस्य विभेदीकरण श्रेणी में विपरीत संबंध होता है अर्थात सस्य विभेदीकरण सूचकांक अधिक होगा तो सस्य विभेदीकरण की श्रेणी निम्न होगी इसके विपरीत सूचकांक निम्न होगा तो सस्य विभेदीकरण उच्च होगा। इस दृष्टि से जनपद में सस्य विभेदीकरण सूचकांक 11.78 से 43.99 के मध्य प्राप्त हुआ जहाँ फसलों की सघनता 2 से लेकर 7 तक प्राप्त हुई है। विकासखंड स्तर पर अति उच्च सस्य विभेदीकरण की श्रेणी में कोई भी विकासखंड स्थित नहीं है। उच्च सस्य विभेदीकरण के मध्य सांगीपुर, संडवा चन्द्रिका, प्रतापगढ़ सदर शिवगढ़ तथा मान्धाता आते हैं। जो सस्य विभेदीकरण सूचकांक 10 से 20 के मध्य स्थित हैं। मध्यम सस्य विभेदीकरण के अंतर्गत कुंडा, रामपुर खास, लक्ष्मणपुर, मगरौरा, पट्टी तथा आसपुर देवसरा स्थिति है जो सस्य विभेदीकरण सूचकांक के 20 से 30 के मध्य स्थित है।

जबकि निम्न सस्य विभेदीकरण के अंतर्गत अकेला विकासखंड गौरा आता है और अतिनिम्न सस्य विभेदीकरण में कालाकांकर, बाबागंज तथा बिहार स्थित पाये गये। सस्य संयोजन के अंतर्गत किसी क्षेत्र में उगाई जाने वाली समस्त फसलों का अध्ययन किया जाता है इससे कृषि की क्षेत्रीय विशेषताओं को सरलता से जाना जा सकता है। अध्ययन क्षेत्र में सस्य संयोजन के निर्धारण में दोई, थामस तथा रफीउल्लाह की विधियों का अनुसरण करते हुये उन फसलों को ही सम्मिलित किया गया है। जिनका क्षेत्रफल सकल कृषि क्षेत्र में 2 प्रतिशत या इससे अधिक की भागेदारी करता है। जिसमें दोई विधि के अनुसार अध्ययन क्षेत्र पाँच फसल संयोजन तक देखने को मिलता है। दो फसल संयोजन के अंतर्गत 12 विकासखंड स्थित है और तीन तथा पाँच फसल संयोजनों में क्रमश: सागीपुर, शिवगढ़ तथा प्रतापगढ़ सदर प्राप्त होते हैं। थामस विधि के अंतर्गत अध्ययन क्षेत्र छ: फसल संयोजन तक पहुँचाता है जिसमें दो फसल संयोजन में 11 विकासखंड तथा तीन, चार, पाँच तथा छ: फसल संयोजन के अंतर्गत एक-एक विकासखंड क्रमश: सांगीपुर, शिवगढ़, प्रतापगढ़ सदर तथा संडवा चंद्रिका स्थित है। प्रो. रफीकउल्लाह की गणना विधि से दो फसल श्रेणी में 10 विकासखंड, तीन फसल श्रेणी में 4 विकासखंड तथा चार फसल श्रेणी में एक विकासखंड स्थित है। इस प्रकार रफीउल्लाह विधि से अध्ययन क्षेत्र चार श्रेणी तक, दोई विधि से पाँच फसल श्रेणी तक तथा थामस विधि से छ: फसल श्रेणी तक विस्तृत है।

किसी क्षेत्र की कृषि सक्रियता, कृषि गहनता एवं कृषि कुशलता को प्रदर्शित करने में कृषि उत्पादकता का विशेष स्थान है। यदि उत्पादकता क्षीण होती है तो स्वत: कृषि कुशलता घट जाती है। कृषि उत्पादकता से कृषि उत्पादन का गहरा संबंध है। कुछ विद्वानों ने कृषि उत्पादकता वृद्धि की गणना के लिये फसल गहनता तथा फसल उपज समकक्षता संकेताकों का प्रयोग किया है। फसल गहनता की दृष्टि से अध्ययन क्षेत्र तीन श्रेणियों में बाँटा गया है। क्योंकि विकासखंड स्तर पर 137.89 प्रतिशत से लेकर 167.30 तक फसलगहनता में विचलन प्राप्त होता है जिसमें निम्न फसल गहनता वाले दो विकासखंड हैं प्रतापगढ़ सदर 137.24 प्रतिशत, लक्ष्मणपुर 145.66 प्रतिशत, सांगीपुर 151.60 प्रतिशत, रामपुर खास 155.69 प्रतिशत, पट्टी 156.87 मगरौरा 159.53 प्रतिशत है। जबकि उच्च फसल गहनता वाले विकासखंडों में मांधाता 132.52 प्रतिशत, आसपुर 166.50 प्रतिशत, बिहार 166.50 प्रतिशत तथा गौरा 167.30 प्रतिशत है विकासखंड स्तर पर उत्पादकता के स्तर पर दृष्टि डालने पर ज्ञात होता है कि संपूर्ण अध्ययन क्षेत्र 106.28 प्रतिशत से लेकर 180.42 प्रतिशत तक विस्तृत है। कृषि उत्पादकता की दृष्टि से भी समस्त अध्ययन क्षेत्र चार श्रेणियों में रखा गया है। पाँचवी श्रेणी अतिनिम्न स्तर किसी भी विकासखंड का नहीं है। निम्न स्तर पर प्रतापगढ़ सदर 106.28 प्रतिशत तथा संडवा चंद्रिका 118.75 प्रतिशत पाये गये। मध्यम उत्पादकता वाले विकासखंडों में रामपुर खास 144.24 प्रतिशत, लक्ष्मणपुर 142.76, मान्धाता 148.96 प्रतिशत, मगरौरा 143.25 प्रतिशत, आसपुर देवसरा 149.47 प्रतिशत तथा शिवगढ़ 140.28 प्रतिशत है। उच्च उत्पादकता स्तर वाले विकासखंडों में पट्टी 152.84 प्रतिशत, सांगीपुर 158.94 प्रतिशत तथा कुंडा 174.84 प्रतिशत, बाबांगज 179.28 प्रतिशत है जबकि अति उच्च उत्पादकता श्रेणी में कालाकांकर 178.16 प्रतिशत, बाबागंज 197.28 प्रतिशत बिहार 178.37 प्रतिशत तथा गौरा 180.42 प्रतिशत विकासखंड स्थित है।

जनसंख्या वितरण से किसी क्षेत्र में जनसंख्या संतुलन का बोध होता है। विभिन्न प्रकार के घनत्वों से जनसंख्या वितरण को अच्छी प्रकार से विश्लेषित किया जा सकता है। सामान्य घनत्व की दृष्टि से यदि देखा जाये तो संपूर्ण अध्ययन क्षेत्र का औसत 671 व्यक्ति हैं विकास खंड स्तर पर यदि देखें तो सांगीपुर विकासखंड का न्यूनतम 552 व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर है और मांधाता का सर्वोच्च 769 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। उच्च सामान्य घनत्व वाले अन्य विकासखंड प्रतापगढ़ सदर 766 व्यक्ति तथा आसपुर देवसरा 690 व्यक्ति शिवगढ़ 681 व्यक्ति हैं जबकि मध्यम घनत्व वाले विकासखंडों में लक्ष्मणपुर 669 व्यक्ति, कुंडा 670 व्यक्ति, कालाकांकर 648 व्यक्ति, बिहार 631 व्यक्ति, गौरा 630 व्यक्ति तथा पट्टी 601 व्यक्ति है और निम्न घनत्व वाले मगरौरा 596 व्यक्ति, संडवा चंद्रिका 592 व्यक्ति, रामपुर खास 577 व्यक्ति, बाबागंज 561 व्यक्ति तथा सांगीपुर 552 व्यक्ति हैं। कायिक घनत्व की दृष्टि से प्रति वर्ग किलोमीटर 918 व्यक्ति से 575 व्यक्तियों तक विचलन प्राप्त हुआ जबकि कृषि घनत्व में 196 से लेकर 144 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर प्राप्त हुआ। सामान्य घनत्व, कायिक घनत्व तथा कृषि घनत्व के तुलनात्मक अध्ययन से उच्च घनत्व की श्रेणी में प्रतापगढ़ सदर, शिवगढ़, मांधाता तथा बिहार संडवा चन्द्रिका तथा रामपुर खास प्राप्त हुए जबकि निम्न घनत्व की श्रेणी में गौरा, मगरौरा, सांगीपुर, पट्टी तथा बाबागंज प्राप्त हुए हैं।

मानवीय संसाधन आर्थिक क्रियाओं के साधन एवं लक्ष्य दोनों होते हैं। साधन के रूप में मानव श्रमशक्ति और उद्यमियों को सेवायें प्रदान करते हैं। लक्ष्य के रूप में मानव उपभोग इकाई के रूप में देश के कुल उत्पादन का उपभोग करते हैं, इस प्रकार मानवीय संसाधनों की दोहरी भूमिका होती है। पर्याप्त खाद्य पदार्थ मानव जीवन की प्राथमिक आवश्यकता है। खाद्य समस्या से आशय क्षेत्रीय आवश्यकता के संदर्भ में खाद्यान्न की कमी से है। यह कमी खाद्यान्न की मात्रात्मक न्यूनता के रूप में हो सकती है। या सामान्य पोषण स्तर तक खाद्य पदार्थों के उपलब्ध न हो सकने के रूप में हो सकती है। खाद्य समस्या के गुणात्मक पक्ष का संबंध भोजन में पोषक तत्वों की कमी से है। प्रोटीन, विटामिन, खनिज वसा आदि संतुलित भोजन के आवश्यक घटक हैं परंतु अधिकांश लोगों के भोजन में किसी न किसी तत्व की कमी बनी रहती है। कुपोषण और अल्प पोषण के कारण उनकी कार्यक्षमता घटती है और वे कुसमय बीमारियों के शिकार होने लगते हैं। औसत आधार पर समस्त जनसंख्या के लिये प्रतिदिन 2250 से 3000 कैलोरी ऊर्जा तथा 62 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता है। खाद्य एवं कृषि संगठन ने पुरुष और स्त्री के लिये क्रमश: 2600 तथा 1990 कैलोरी ऊर्जा प्रदान करने वाले आहार को आवश्यक माना है।

किसी क्षेत्र का पोषण स्तर उस क्षेत्र के खाद्यान्नों के उत्पादन एवं उनके समुचित वितरण पर निर्भर करता है। अध्ययन क्षेत्र को यदि इस दृष्टि से देखा जाये तो प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष खाद्यान्न की उपलब्ध मात्रा धान 95.08 किलो ग्राम गेहूँ 122.94 किलोग्राम, जौ 1.88 किलोग्राम, ज्वार 2.56 किलोग्राम बाजरा 6.31 किलोग्राम तथा मक्का 1.36 किलोग्राम है। इन खाद्यान्नों में गेहूँ का योगदान सर्वाधिक है। दलहनी फसलों में प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति उपलब्धि उड़द 2.20 किलोग्राम, मूंग 1.12 किलोग्राम, चना 4.45 किलोग्राम, मटर 2.75 किलोग्राम तथा अरहर 6.43 किलोग्राम है, इनमें अरहर की भागीदारी सर्वाधिक है। विकासखंड स्तर पर यदि देखें तो प्रतिव्यक्ति अन्न की उपलब्ध मात्रा कालाकांकर 623 ग्राम, बाबागंज 879 ग्राम, कुंडा 642 ग्राम, बिहार 833 ग्राम, सांगीपुर 673 ग्राम, रामपुर खास 799 ग्राम, लक्ष्मणपुर 573 ग्राम संडवा चंद्रिका 484 ग्राम प्रतापगढ़ सदर 324 ग्राम मांधाता 619 ग्राम, मगरौरा 719 ग्राम, पट्टी 844 ग्राम, आसपुर देवसरा 711 ग्राम, शिवगढ़ 501 ग्राम तथा गौरा 708 ग्राम हैं। इसी प्रकार दालों की प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन उपलब्धि कालाकांकर 31 ग्राम, बाबागंज 25 ग्राम, कुंडा 42 ग्राम, बिहार 27 ग्राम, सांगीपुर 84 ग्राम, रामपुर खास 40 ग्राम, लक्ष्मणपुर 42 ग्राम, संडवा चंद्रिका 93 ग्राम, प्रतापगढ़ सदर 74 ग्राम, मांधाता 36 ग्राम, मगरौरा 47 ग्राम, पट्टी 50 ग्राम, आसपुर देवसरा 34 ग्राम, शिवगढ़ 80 ग्राम तथा गौरा 38 ग्राम हैं।

पोषण स्तर के अध्ययन के लिये प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न उत्पादन तथा उपभोग के लिये प्रतिव्यक्ति शुद्ध खाद्यान्न उपलब्धता दोनों भिन्न पहलू हैं। जहाँ प्रतिव्यक्ति उत्पादन कृषि क्षेत्र के लिये उत्पादन स्तर का सूचक है वहीं प्रतिव्यक्ति शुद्ध खाद्यान्न उपलब्धता पोषण स्तर का प्रतीक है। अध्ययन क्षेत्र में विकासखंड स्तर पर प्रति व्यक्ति प्रति दिन शुद्ध खाद्यान्न उपलब्धता की गणना करने पर कालाकांकर 476 ग्राम, बाबागंज 618 ग्राम, कुंडा 447 ग्राम, बिहार 567 ग्राम, सांगीपुर 486 ग्राम, रामपुर खास 472 ग्राम, लक्ष्मणपुर 407 ग्राम, संडवा चंद्रिका 365 ग्राम, प्रतापगढ़ सदर 234 ग्राम, मांधाता 428 ग्राम, मगरौरा 497 ग्राम, पट्टी 574 ग्राम, आसपुर देवसरा 504 ग्राम, शिवगढ़ 364 ग्राम, गौरा 503 ग्राम है जबकि दालों की शुद्ध उपलब्ध मात्रा, कालाकांकर 19 ग्राम, बाबागंज 15 ग्राम, कुंडा 25 ग्राम, बिहार 18 ग्राम, सांगीपुर 51 ग्राम, रामपुर खास 24 ग्राम, लक्ष्मणपुर 25 ग्राम, संडवा चंद्रिका 55 ग्राम, प्रतापगढ़ सदर 44 ग्राम, मांधाता 22 ग्राम, मगरौरा 29 ग्राम, पट्टी 30 ग्राम, आसपुर देवसरा 21 ग्राम, शिवगढ़ 47 ग्राम तथा गौरा 27 ग्राम है।

सामान्य रूप से कृषि भूमि पर जैसे-जैसे मनुष्यों का भार बढ़ता जाता है प्रति व्यक्ति उत्पादन कम होता जाता है। प्रति व्यक्ति उत्पादन न गिरने पाये इसके लिये प्रति इकाई कृषि क्षेत्र में पूँजी निवेश बढ़ाया जाये इस प्रकार किसी भी क्षेत्र के विकास तथा नियोजन में जनसंख्या तथा पोषण क्षमता के पारस्परिक संबंध का एक विशेष महत्त्व है। किसी भी क्षेत्र में निवास करने वाली जनसंख्या के पोषण स्तर को सामान्य स्तर पर बनाये रखने के लिये उस क्षेत्र में प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न उत्पादन की आवश्यक मात्रा की आवश्यकता तो होती है साथ ही यह भी देखना होता है कि उस क्षेत्र की कृषि भूमि की वास्तविक भार वहन क्षमता कितनी है अर्थात जो भी कृषि उपज प्राप्त हो रही है वह कितने व्यक्तियों का पोषण करने में सक्षम है। इसके लिये यह देखना होता है कि क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली कृषि उपज से कितनी कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है, यह कैलोरिक उपलब्धता ही उस क्षेत्र के कृषि क्षेत्र की पोषण क्षमता होती है।

अध्ययन क्षेत्र की पोषण क्षमता ज्ञात करने के लिये धान, गेहूँ, जौ, बाजरा तथा मक्का खाद्यान्न उड़द, मूंग, चना, मटर, अरहर, दलहन, लाही, आलू तथा गन्ना कुल तेरह फसलों के उत्पादन को गणना में शामिल किया गया है जिसमें खाद्य योग्य हिस्से की गणना करके कैलोरिक ऊर्जा प्राप्त की गई है जिसमें अध्ययन क्षेत्र प्रतिवर्ष 495082243 कैलोरी ऊर्जा का आकलन किया गया है जबकि 100 व्यक्तियों को प्रतिदिन 243037 कैलोरी ऊर्जा की आवश्यकता होती है इस प्रकार प्रति वर्ष औसत रूप में प्रति व्यक्ति 887693 कैलोरी ऊर्जा की आवश्यकता होगी गणना करने पर यह पाया गया कि अध्ययन क्षेत्र में प्रति हेक्टेयर 558 व्यक्तियों के लिये पोषण क्षमता विद्यमान है विकासखंड स्तर पर गणना करने पर पाया गया तो कालाकांकर 527 व्यक्ति, बाबागंज 550 व्यक्ति, कुंडा 547 व्यक्ति, बिहार 575 व्यक्ति, सांगीपुर 501 व्यक्ति, रामपुर खास 537 व्यक्ति, लक्ष्मणपुर 534 व्यक्ति, संडवा चंद्रिका 515 व्यक्ति, प्रतापगढ़ सदर 419 व्यक्ति, मांधाता 562 व्यक्ति, मगरौरा 528 व्यक्ति, पट्टी 612 व्यक्ति, आसपुर देवसरा 592 व्यक्ति, शिवगढ़ 527 व्यक्ति तथा गौरा 573 व्यक्तियों की पोषण क्षमता रखते हैं। इस प्रकार निम्नतम 450 व्यक्ति तक प्रतापगढ़ सदर, निम्न पोषण क्षमता 451 से 500 तक में कोई भी विकासखंड स्थित नहीं है।

सामान्य पोषण क्षमता 501 से 550 स्तर पर 09 विकासखंड कालाकांकर, बाबागंज, कुंडा, सांगीपुर, रामपुर खास, लक्ष्मणपुर, संडवा चंद्रिका, मगरौरा तथा शिवगढ़ स्थित है। उच्च पोषण क्षमता स्तर पर 551 से 600 पर 04 विकासखंड बिहार, मांधाता, आसपुर देवसरा तथा गौरा विकासखंड पाये गये जबकि पट्टी विकासखंड अति उच्च 601 से अधिक पोषण स्तर के अंतर्गत स्थित है। परंतु कायिक घनत्व के आधार पर देखा गया कि पट्टी विकासखंड को छोड़कर अन्य सभी विकास खंड वर्तमान में अतिरिक्त व्यक्तियों के पोषण का भार वहन कर रहे हैं। जिसमें कालाकांकर 138 व्यक्ति, बाबागंज 220 व्यक्ति, कुंडा 167 व्यक्ति, बिहार 59 व्यक्ति, सांगीपुर 76 व्यक्ति, रामपुर खास 70 व्यक्ति, लक्ष्मणपुर 213 व्यक्ति, संडवा चंद्रिका 178 व्यक्ति, प्रतापगढ़ सदर सर्वाधिक 499 व्यक्ति, मांधाता 184 व्यक्ति, मगरौरा 72 व्यक्ति, आसपुर देवसरा 39 व्यक्ति, शिवगढ़ 238 व्यक्ति तथा गौरा 38 व्यक्तियों के अतिरिक्त भार को वहन कर रहे हैं। केवल पट्टी विकासखंड अभी भी 22 अतिरिक्त व्यक्तियों के पोषण को वहन कर सकता है।

भोजन मनुष्य की प्राथमिक और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। भोजन की आदत तथा पर्यावरण जिसमें मनुष्य जीवनयापन करता है में घनिष्ठ संबंध होता है। जिसके लिये सर्वप्रथम मनुष्य पर्यावरण से संबंध स्थापित करता है तत्पश्चात उस पर्यावरण के अनुसार अपनी खाद्य आदतें तथा खाद्य स्वभाव समायोजित करता है। पारिस्थितिकीय अंतर, आय का आकार परिवार का आकार खाद्य पदार्थों की उपलब्धता तथा लोगों की जीवन शैली लोगों की भोजन आदतों के लिये उत्तरदायी होते हैं। इसके लिये सर्वेक्षण के आधार पर 300 कृषक परिवारों को दैवनिदर्शन पद्धति से चुना गया है जिसमें 122 सीमांत कृषक 0.5 हेक्टेयर तक कृषि भूमि 107 लघु कृषक, 52 लघु मध्यम, 16 मध्यम कृषक, तथा 3 बड़े कृषक प्राप्त हुये हैं। 300 कृषक परिवारों में 65 उच्च जाति के, 95 पिछड़ी जाति के, 113 अनुसूचित जाति के, 27 मुस्लिम धर्म के लोग सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त इन 300 परिवारों के आकार की गणना की गई तो 68 कृषक परिवार 4 सदस्यों से कम, 88 कृषक परिवार 5 से 6 सदस्य तक, 58 कृषक परिवार 7 से 8 सदस्य तक, 62 कृषक परिवार 9 से 10 सदस्य तक तथा 24 कृषक परिवार 10 से अधिक सदस्य वाले प्राप्त हुए हैं।

सर्वेक्षण में लोगों में प्रचलित खाद्य पदार्थों को तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है, प्रथम वर्ग में मुख्य खाद्य पदार्थ सामान्यतया सभी वर्गों में प्रचुर मात्रा में ग्रहण किये जाते हैं। दूसरे वर्ग में सहायक खाद्य पदार्थ आते हैं इनका सेवन सामान्यतया स्वाद बदलने के लिये प्रमुख खाद्य पदार्थों के साथ ग्रहण किये जाते हैं। सामान्यतया इनका प्रयोग अनजाने की शरीर की अम्लीय आवश्यकताओं को पूरा करने में किया जाता है। सर्वेक्षण में पाया गया कि अचार, चटनी तथा मट्ठे का प्रयोग इनकी उपलब्धता के आधार पर लगभग सभी वर्गों में किया जाता है। जबकि दही, मुरब्बा, घी तथा मक्खन कुछ बड़े लोगों तक सीमित है। मादक पेय में शराब का प्रचलन यदा कदा लगभग सभी वर्गों में न्यूनाधिक मात्रा में पाया गया परंतु युवकों में इसके प्रचलन की आवृत्ति अधिक पाई गई। तृतीय वर्ग में गौण खाद्य पदार्थों को सम्मिलित किया गया है जिनमें से कुछ स्वादिष्ट तथा यदा कदा अथवा विशेष अवसरों पर ग्रहण किये जाते हैं। परंतु गुणवत्ता श्रेष्ठता वाले खाद्य पदार्थ लोगों द्वारा स्वल्प और सीमित मात्रा में ग्रहण किये जाते हैं।

परंपरागत तथा गैर परंपरागत खाद्य पदार्थों की पहचान के लिये खाद्य पदार्थों को पुन: तीन वर्गों में बाँटा गया है इनमें से प्रथम वर्ग में परंपरागत सामान्य खाद्य पदार्थ दूसरे वर्ग में परंपरागत विशिष्ट खाद्य पदार्थ तथा तीसरे वर्ग में आधुनिक खाद्य पदार्थ रखे गये हैं। परंपरागत खाद्य पदार्थ कृषकों द्वारा अपने खेतों पर अथवा क्षेत्र में उत्पन्न किये जाते हैं। जबकि आधुनिक खाद्य पदार्थ बाजार से, मेलों से अथवा स्थानीय दुकानों से क्रय करके उपभोग किये जाते हैं। खाद्य पदार्थों का एक अन्य वर्गीकरण उनके उपभोग की आवृत्ति के अनुसार किया जा सकता है। अति उच्च आवृत्ति वाले खाद्य पदार्थ वर्ष में लोगों के भोजन में 70 प्रतिशत से अधिक योगदान करते हैं। उच्च आवृत्ति वाले खाद्य पदार्थ वर्ष में 40 से 70 प्रतिशत तक योगदान करते हैं निम्न आवृत्ति वाले खाद्य पदार्थों का योगदान 10 से 40 प्रतिशत रहता है जबकि 10 प्रतिशत से कम योगदान करने वाले खाद्य पदार्थों को अतिनिम्न आवृत्ति वाले वर्ग में रखा गया है। यह वर्गीकरण यह तथ्य स्पष्ट करता है कि परंपरागत खाद्य आदतों के कारण विभिन्न वर्गों के लोग उन खाद्य पदार्थों के उपभोग में विशेष रुचि रखते हैं।

जिन्हें वे एक लंबे समय से उपभोग करते आ रहे हैं। जैसे विभिन्न वर्गों में रोटी और दाल का उपभोग अति उच्च आवृत्ति प्रदर्शित करता है। कुछ खाद्य पदार्थों के संबंध में यह देखा गया है कि कुछ लोगों द्वारा इनका सेवन सामाजिक संस्कृति का एक अनिवार्य अंग है परंतु कुछ लोगों में इनका प्रयोग पूर्णतया वर्जित है जैसे मांस, मछली का प्रयोग मुस्लिम संस्कृति में एक अनिवार्य जीवन शैली है, परंतु हिंदू परिवारों में इनका सेवन पूर्णतया वर्जित है। अन्य मध्य मार्गी परिवारों में मांसाहार यद्यपि पूर्णतया स्वतंत्र नहीं है। इस कारण इसका यदा कदा सेवन किया जाता है। अनुसूचित जाति के ऐसे अनेक परिवार प्राप्त हुये हैं जिनके सभी सदस्य मांसाहारी हैं। परंतु ये खाद्य पदार्थ महंगे होने के कारण चाहकर भी इनके उपभोग से वंचित रह जाते हैं। अनुसूचित जाति तथा मुस्लिम परिवारों के अतिरिक्त अन्य किसी भी वर्ग में कोई ऐसा परिवार प्राप्त नहीं हुआ जिसके सभी सदस्य मांसाहारी हों।

इसी प्रकार यह भी देखा गया कि खाद्य पदार्थों को पकाने में कुछ परिवारों में अत्यंत सरल विधि है जबकि कुछ परिवारों में इन्हें पकाने की विधि अत्यंत जटिल है। उच्च जाति की अधिकांश महिलाओं में यह प्रवृत्ति पाई गई है कि उनके लिये स्वादिष्ट उत्तम तथा जटिल पद्धति से खाना पकाना एक सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न होता है और एक ही खाद्य पदार्थ को विभिन्न विधियों से तैयार करना उनकी पाक विद्या की श्रेष्ठता तथा पाक कुशलता का प्रतीक माना जाता है जबकि अनुसूचित जाति तथा पिछड़ी जाति के परिवारों की महिलाओं मे पुरुषों के समान शारीरिक श्रम तथा कार्यकुशलता को ही महत्त्व प्रदान किया जाता है। भोजन पकाने के संबंध में यह कहा जा सकता है कि उच्च जाति की महिलाओं में विभिन्न खाद्य पदार्थों को पकाने में विभिन्न विधियां श्रेष्ठता, प्रतिष्ठा, अथवा सामाजिक गुण तथा विभिन्न महिलाओं के मध्य संबंध स्थापन में एक सेतु का कार्य करती है इस सबके बावजूद भी पुरुषों तथा महिलाओं दोनों में समान रूप से संतुलित भोजन, पौष्टिक आहार तथा कुपोषण के ज्ञान का सर्वथा अभाव पाया गया।

ग्रामीण लोगों द्वारा प्रतिदिन तथा विशिष्ट अवसरों पर उपभोग किये जाने वाले खाद्य पदार्थों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के बाद निष्कर्ष रूप में यह उल्लेख किया जा सकता है कि क्षेत्र में प्रात: सेवन किये जाने वाले खाद्य पदार्थों में जिसे क्षेत्रीय भाषा में नाश्ता, चबेना तथा कलेबा आदि के नाम से जाना जाता है सामान्य रूप से पराठा, अचार, सत्तू तथा महेरी का प्रचलन है कुछ परिवार इन पदार्थों के साथ चाय मट्ठा आदि का भी सेवन करते हैं। कुछ परिवार यदा कदा दूध से निर्मित खाद्य पदार्थ जैसे खीर, सेवई, दही आदि का भी सेवन कर लेते हैं। कुछ परिवार मौसमी उपलब्धता के आधार पर कोहरी, गादा, भूजा, चिल्ला, चौसेला, पूड़ी, कचौड़ी, पुआ, पकौड़ी, आलू बंडे आदि का भी सेवन करते पाये गये। मध्याह्न के भोजन में रोटी, दाल, भात, तरकारी सालन प्रमुख रूप से उपभोग किये जाते हैं। सांध्यकालीन भोजन में मध्याह्न काल के ही खाद्य पदार्थों का प्रचलन है मांसाहार का प्रचलन सामान्यतया सांध्यकालीन भोजन में ही प्रचलन है।

विशिष्ट खाद्य पदार्थों की श्रेणी में गर्भवती महिलाओं, शिशु जन्म के बाद जच्चा माताओं, बच्चों, जन्मोत्सव वैवाहिक समारोहों, मृत्युसंस्कारों के विशेष अवसरों पर तथा विशिष्ट अतिथियों के आगमन पर तैयार किये जाने वाले खाद्य पदार्थ आते हैं। कुछ परिवार बच्चों के खान पान पर विशेष ध्यान देते देखे गये हैं। जन्मोत्सव, वैवाहिक संस्कार तथा मृत्युसंस्कार पर सामान्यतया शाकाहारी भोजन की प्रधानता पाई गई परंतु मुस्लिम परिवारों में इन अवसरों पर शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों प्रकार के खाद्य पदार्थों का प्रचलन है। इन अवसरों पर आयोजित भोजों को कच्ची या पक्की कहा जाता है। पक्के भोजों में पूड़ी, कचौड़ी सब्जी, दही, रायता, पुलाव तथा मिष्ठान्न आदि प्रस्तुत किये जाते हैं परंतु कच्ची भोजन व्यवस्था में रोटी, दाल, कढ़ी सब्जी, चावल, चटनी, अचार आदि खाद्य पदार्थों का प्रचलन है। मांसाहारी भोजन में मांस/मछली, रोटी, चावल, आदि का ही प्रचलन है मांसाहारी भोजन में कुछ लोगों द्वारा मादक पेय के सेवन का भी प्रचलन है, मुसलमानों में चावल के स्थान पर पुलाव तथा बिरयानी का प्रचलन है।

किसी क्षेत्र की खाद्य आदतें तथा खाद्य पद्धति बहुत कुछ मौसमी परिवर्तनों द्वारा नियंत्रित और संचालित होती है क्योंकि क्षेत्रीय खाद्य पदार्थों के उत्पादन में विभिन्न मौसमों में भिन्नता पाई जाती है सर्वेक्षण में यह पाया गया कि मौसमी परिवर्तनों के साथ-साथ खाद्य पदार्थों की आवृत्ति बदलती रहती है। यह देखा गया है कि गर्मी के मौसम में खाद्यान्नों का उपभोग बढ़ जाता है तथा दालों की भी खपत इस मौसम में बढ़ जाती है सब्जियों का उपभोग शीत ऋतु में बढ़ जाता है क्योंकि इस मौसम में आलू, टमाटर सस्ता हो जाता है पत्तेदार सब्जियों में चने की पत्तियाँ, पालक, बथुआ, मूली के पत्ते आदि का अधिक प्रचलन है। मांसाहार शीत ऋतु में बढ़ जाता है फलों का उपभोग गर्मी के मौसम में अधिक होता है। क्योंकि इस मौसम में आम, जामुन, खरबूजा, तरबूज, ककड़ी, खीरा आदि फसलें क्षेत्रीय स्तर पर उगाई जाती हैं। सीमांत कृषक परिवारों में वर्षा ऋतु में 940.70 ग्राम, शीत ऋतु में 1171.96 ग्राम तथा ग्रीष्म ऋतु में 997.71 ग्राम खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाता है जिसमें 70 प्रतिशत भागेदारी खाद्यान्नों दालों की रहती है। सब्जियों का योगदान 21 प्रतिशत रहता है। अन्य खाद्य पदार्थों का योगदान केवल 9 प्रतिशत ही रहता है।

लघु कृषक परिवारों में शीत ऋतु में सर्वाधिक 1148.56 ग्राम खाद्य पदार्थों का उपभोग किया जाता है वर्षा ऋतु में 942.73 ग्राम तथा ग्रीष्म ऋतु में 980.29 ग्राम पाया गया जिसमें खाद्यान्नों की भागेदारी 62 प्रतिशत, दालों का 7 प्रतिशत तथा सब्जियों का योगदान 23 प्रतिशत रहता है, मांसाहार 2.01 प्रतिशत तथा फलाहार 2.12 प्रतिशत पाई गई, दूध तथा दूध से बने पदार्थ मान 1.41 प्रतिशत पाये गये। लघु मध्यम कृषक परिवारों द्वारा वर्षा में 965.82, शीत ऋतु में 1089.98 ग्राम तथा ग्रीष्म ऋतु में 1023.16 ग्राम खाद्य पदार्थ सेवन किये जाते हैं, जिसमें खाद्यान्नों की सहभागिता 59.84 प्रतिशत तथा दालों का 7.20 प्रतिशत सब्जियों की सहभागिता 23 प्रतिशत पाई गई। मांसाहार 2.36 प्रतिशत तथा फलाहार का योगदान 2.72 प्रतिशत रहता है। दूध और दूध से बने पदार्थों का योगदान 1.41 पाया गया। लघु मध्यम कृषक परिवारों द्वारा वर्षा में 965.82 ग्राम, शीत ऋतु में 1089.98 ग्राम तथा ग्रीष्म ऋतु में 1023.16 ग्राम खाद्य पदार्थ सेवन किये जाते हैं।

जिसमें खाद्यान्नों की सहभागिता 59.84 प्रतिशत तथा दालों का 7.20 प्रतिशत, सब्जियों की सहभागिता 23 प्रतिशत पाई गई। मांसाहार 2.36 प्रतिशत तथा फलाहार का योगदान 2.72 प्रतिशत रहता है। दूध तथा दूध से बने पदार्थों का योगदान इस वर्ग में भी केवल 1.82 प्रतिशत ही पाया गया। मध्यम कृषक परिवारों में वर्षा ऋतु में 996.87 ग्राम, शीत ऋतु में 1132.51 ग्राम तथा ग्रीष्म ऋतु में 1035.80 ग्राम खाद्य पदार्थों का प्रचलन है जिसमें 51.84 प्रतिशत खाद्यान्न 8.88 प्रतिशत दालें, जड़दार सब्जियाँ 14.44 प्रतिशत, 10.41 प्रतिशत पत्तेदार सब्जियाँ, चिकनाई 1.80 प्रतिशत, दूध तथा दूध से बने पदार्थ 4.13 प्रतिशत, मांसाहार 2.01 प्रतिशत तथा फलाहार 3.87 प्रतिशत पाया गया। बड़े कृषक परिवार वर्षा ऋतु में 991.44 ग्राम, शीत ऋतु में 1114.29 ग्राम तथा ग्रीष्म ऋतु में 1032.45 ग्राम खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं जिसमें 55.55 प्रतिशत खाद्यान्न, 7.81 प्रतिशत दालें, 32 प्रतिशत से अधिक सब्जियाँ, दूध तथा दूध से बने पदार्थों का योगदान 3.01 प्रतिशत, मांसाहार 2.83 प्रतिशत तथा फलाहार का योगदान 3.41 प्रतिशत पाया गया। विभिन्न वर्गों द्वारा ग्रहण किये जाने वाले खाद्य पदार्थों का विशेषण करने पर पाया गया कि केवल खाद्यान्न की मात्रा लगभग सभी वर्गों में मानक स्तर से अधिक ग्रहण की जा रही है अन्य खाद्य पदार्थों मानक स्तर के अनुरूप किसी भी वर्ग द्वारा अपने भोजन में समायोजन नहीं किया जा रहा है।

भोजन का मात्रात्मक तथा गुणात्मक स्तर ही शरीर के लिये आवश्यक पोषक तत्वों की निर्धारण करता है। मनुष्य का समस्त ढाँचा उसके पाचन संस्थान के आधार पर बना है, इसका अभिप्राय है कि मनुष्य जिस प्रकार का खाना खाता है और उसके पाचक अंश जिस प्रकार भोजन को शरीर का अंश बनते हैं तदानुसार ही उसका स्वास्थ्य बनता है, यह मानव शरीर संबंधी विचित्र तथ्य है। प्रत्येक प्राणी को उसके कार्य के अनुसार विभिन्न पोषक तत्वों से युक्त भोजन की आवश्यकता पड़ती है। सामान्यत: भारी कार्य करने वाले को अधिक पोषक तत्वों से युक्त भोजन की आवश्यकता पड़ती है जबकि हल्का कार्य करने वाले को कम पोषक तत्व से युक्त भोजन चाहिये। महिलाओं को भी उनके कार्य के अनुसार भोजन में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। गर्भवती तथा स्तनपान कराने वाली महिलाओं को अधिक पोषक तत्वों से युक्त भोजन चाहिये।

इसी प्रकार विभिन्न आयु के बच्चों के लिये अलग-अलग पोषक तत्वों से युक्त भोजन की आवश्यकता होती है, परंतु जब शरीर में आवश्यक पोषक तत्वों में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है तब शरीर विभिन्न प्रकार के रोगों से ग्रसित हो जाता है। शरीर को निरोग बनाये रखनें के लिये न केवल मात्रात्मक रूप से भोजन की आवश्यकता होती है। बल्कि भोजन गुणात्मक रूप से श्रेष्ठ भी होना चाहिये। अज्ञानता एवं निर्धनता के कारण ग्रामीण जन भोजन का उद्देश्य केवल उदर पूर्ति तक सीमित समझते हैं। इसी कारण ग्रामीण क्षेत्रों में कुपोषण और अल्प पोषण की विकराल समस्या विद्यमान है। जिसके कारण लोग विभिन्न प्रकार के कुपोषण जनित रोगों के सरलता से शिकार हो जाते हैं।

भोजन में पोषक तत्वों की दृष्टि से देखें तो सीमांत कृषक परिवार के सदस्यों द्वारा ग्रहण किया जाने वाला खाद्य पदार्थों से प्राप्त होने वाले पोषक तत्वों में प्रोटीन 8.47 ग्राम, फाइवर 4.64 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट्स 119.38 ग्राम, फास्फोरस 0.10 ग्राम, थियामिन 1.21 मि. ग्राम मानक स्तर से अधिक पाये गये, ऊर्जा भी मानक स्तर से 147.19 कैलोरी अधिक पायी गई जबकि वसा 56.66 ग्राम, खनिज 1.13 ग्राम, कैल्सियम 1.02 ग्राम, लौह 5.54 मि. ग्राम, कैरोटीन 436 मि. ग्राम, राइबोफ्लेविन 0.08 मि. ग्राम, मानक स्तर से कम पाये गये। लघु कृषक परिवार के सदस्यों द्वारा ग्रहण किये जाने वाले खाद्य पदाथो्रं में फाइबर 4.48 ग्राम,0 कार्बोहाइड्रेट्स 117.75 ग्राम, फास्फोरस 0.07 ग्राम, थियामिन 0.93 मि. ग्राम, तथा नियासिन 10.41 ग्राम मानक स्तर से अधिक तथा ऊर्जा 10.21 कैलोरी, प्रोटीन 1.52 ग्राम, वसा 56.04 ग्राम, खनिज 0.87 ग्राम, कैल्सियम 1.01 ग्राम, लौह 4.46 मि. ग्राम, कैरोटीन 154.44 मि. ग्राम तथा राइबोफ्लेविन 0.10 मि. ग्राम मानक स्तर से निम्न पाये गये। लघु मध्यम कृषक परिवारों द्वारा ग्रहण किय जाने वाले खाद्य पदार्थों में फाइबर 4.37 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट्स 100.51 ग्राम, फास्फोरस 0.03 ग्राम, थियामिन 0.87 मि. ग्राम, तथा नियासिन 10.08 मि. ग्राम, मानक स्तर से अधिक तथा ऊर्जा 81.82 कैलोरी, वसा 57.67 ग्राम, खनिज 0.85 ग्राम, कैल्सियम 1.01 ग्राम, लौह 4.98 मि. ग्राम, 28.73 मि. ग्राम, तथा राइबोफ्लेविन 0.11 ग्राम, मि. ग्राम, मानक स्तर से कम पाये गये। मध्यम परिवारों में फाइबर 5.01 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट्स 66.97, फास्फोरस 0.01 ग्राम, कैरोटीन 524.72 मि. ग्राम, थियामिन 0.89 मि. ग्राम, तथा नियासिन 8.11 मि. ग्राम, मानक स्तर अधिक तथा ऊर्जा 107.67 कैलोरी, प्रोटीन 0.02 ग्राम, वसा 47.53 ग्राम, खनिज 0.02 ग्राम, कैल्सियम 0.92 ग्राम, लौह 3.30 मि. ग्राम तथा राइबोफ्लेविन .11 मि. ग्राम, मानक स्तर से कम पाये गये। बड़े कृषक परिवार के सदस्यों द्वारा ग्रहण किये जाने वाले खाद्य पदार्थों में प्रोटीन .35 ग्राम, फाइबर 4.77 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट्स 92.88 ग्राम, फास्फोरस 0.03 ग्राम, कैरोटीन 279.85 मि. ग्राम, थियामिन 0.88 मि. ग्राम, तथा नियासिन 8.89 मि. ग्राम, मानक स्तर से अधिक तथा ऊर्जा 92.92 कैलोरी, वसा 49.68 ग्राम, खनिज .34 ग्राम, कैल्सियम .96 ग्राम, लौह 4.09 मि. ग्राम, तथा राइबोफ्लेविन .11 मि. ग्राम, मानक स्तर से कम पाये गये। तुलनात्मक रूप में देखें तो ऊष्मा केवल सीमांत कृषक परिवारों द्वारा मानक स्तर से अधिक ग्रहण की जा रही है।

शेष अन्य वर्गों में मानक स्तर से कम ग्रहण की जा रही है। वसा सभी वर्गों में मानक स्तर से कम ग्रहण किया जा रहा है। कार्बोहाइड्रेट्स सभी वर्गों में मानक से अधिक प्राप्त हो रहे हैं। कैल्सियम की कमी सभी वर्गों में देखी गई इसी प्रकार लौह तत्व सभी वर्गों में मानक स्तर से कम ग्रहण किया जा रहा है। नियासिन सभी वर्गों में अधिक तथा राइबोफ्लेविन की कमी पाई गई। स्पष्ट है कि लगभग सभी वर्गों में कुछ पोषक तत्वों की अत्यधिक कमी तथा कुछ पोषक तत्वों की अधिकता देखी गई है।

अध्ययन क्षेत्र में विभिन्न वर्गों द्वारा ग्रहण किए जान वाले विभिन्न खाद्य पदार्थ न तो मात्रात्मक दृष्टि से पर्याप्त कहे जा सकते हैं परंतु गुणात्मक दृष्टि से खाद्य पदार्थों से प्राप्त पोषक तत्व मात्रात्मक दृष्टि से तो कुछ ठीक प्रतीत होते हैं परंतु गुणात्मक दृष्टि से निम्न स्तरीय हैं क्योंकि अधिकांश पोषक तत्व लगभग सभी वर्गों द्वारा खाद्यान्नों से ग्रहण किए जा रहे हैं। जिसके कारण कुपोषण जनित रोग ग्रामीण क्षेत्र में एक आम रोग की भांति व्यापक है। सर्वेक्षण में यह पाया गया कि कुल जनसंख्या का 44.84 प्रतिशत भाग विभिन्न कुपोषण से उत्पन्न रोगों का शिकार हैं जिसमें सर्वाधिक 47.82 प्रतिशत, सीमांत कृषक परिवार के सदस्य, 45.38 प्रतिशत, मध्यम कृषक 45.25 प्रतिशत, लघु कृषक 38.30 प्रतिशत, लघु मध्यम कृषक तथा 37.93 प्रतिशत, बड़े कृषक परिवार के सदस्य रोगी पाये गये। कुपोषण जनित रोगों में से हाथ पैरों की ऐंठन से सीमांत कृषक 13.36 प्रतिशत, कृषक 17.32 प्रतिशत, लघु मध्यम कृषक 14.89 प्रतिशत, मध्यम कृषक 11.76 प्रतिशत, तथा बड़े कृषक 13.79 प्रतिशत पाये गये। पेट के रोगी सर्वाधिक मध्यम कृषक परिवारों में 31.93 प्रतिशत, बड़े कृषक परिवारों में 20.70 प्रतिशत, लघु मध्यम कृषक परिवारों में 20.21 प्रतिशत तथा सीमांत और लघु कृषक परिवारों में क्रमश: 15.16 प्रतिशत, और 14.24 प्रतिशत रोगी देखे गये। थकान तथा शरीर में सूजन के शिकार सर्वाधिक बड़े कृषक परिवारों में 17.24 प्रतिशत लघु कृषक परिवारों में 15.64 प्रतिशत, मध्यम कृषक परिवारों में 13.44 प्रतिशत, लघु मध्यम कृषक परिवारों में 12.77 प्रतिशत, सीमांत परिवारों में 11.83 प्रतिशत दिखाई पड़े।

सर्दी, जुकाम तथा मसूड़ों में सूजन से पीड़ित रोगी सर्वाधिक मध्यम कृषक 17.65 प्रतिशत, लघु कृषक 14.11 प्रतिशत, बड़े कृषक 13.79 प्रतिशत, सीमांत परिवारों में 10.41 प्रतिशत, तथा लघु मध्यम कृषक 7.71 प्रतिशत प्राप्त हुये। जीभ तथा ओठो के रोग से पीड़ित बड़े कृषक परिवारों में सर्वाधिक 17.24 प्रतिशत, सीमांत कृषक 9.13 प्रतिशत तथा लघु मध्यम और मध्यम कृषक परिवारों में क्रमश: 8.10 प्रतिशत, 5.58 प्रतिशत, तथा 7.56 देखे गये। पेलेग्रा रोग के सर्वाधिक रोगी 20.70 प्रतिशत बड़े कृषक परिवारों में प्राप्त हुये। लघु कृषक, सीमांत कृषक, लघु मध्यम तथा मध्यम कृषक परिवारों में इस रोग के क्रमश: 8.10 प्रतिशत, 7.97 प्रतिशत, 4.52 प्रतिशत तथा 5.88 प्रतिशत रोगी प्राप्त किये गये। बेरी-बेरी रोग से पीड़ित सर्वाधिक रोगी बड़े कृषक परिवारों में 6.90 प्रतिशत, 6.56 प्रतिशत सीमांत कृषक परिवारों में, लघु कृषक परिवारों में 4.33 प्रतिशत, 4.20 प्रतिशत मध्यम कृषकों में तथा 2.39 प्रतिशत लघु मध्यम कृषक परिवारों में देखे गये। रिकेट्स तथा आस्टोमलेशिया रोग के लक्षण सर्वाधिक 4.35 प्रतिशत सीमांत कृषक परिवारों में, 3.45 प्रतिशत बड़े कृषक, 3.07 लघु कृषक 2.52 प्रतिशत, मध्यम कृषक तथा न्यूनतम 1.33 प्रतिशत लघु मध्यम कृषक परिवारों में देखे गये।

रतौंधी रोग से सर्वाधिक पीड़ित रोगी 5.40 प्रतिशत, सीमांत कृषक 3.91 प्रतिशत, लघु कृषक 3.45 प्रतिशत, बड़े कृषक 3.19 प्रतिशत, लघु मध्यम कृषक तथा न्यूनतम 1.68 प्रतिशत मध्यम कृषक परिवारों में देखे गये। स्कर्वी रोग से सर्वाधिक रोगी 5.01 प्रतिशत सीमांत कृषक परिवारों में, 4.47 प्रतिशत लघु कृषक, 3.48 प्रतिशत लघु मध्यम, 3.45 प्रतिशत बड़े कृषक तथा 3.36 प्रतिशत प्रतिशत मध्यम कृषक प्रभावित मिले। जोड़ों तथा गाठों में दर्द की शिकायत सर्वाधिक 17.24 प्रतिशत बड़े कृषक परिवार के सदस्यों में, दूसरे स्थान पर 13.44 प्रतिशत मध्यम कृषक, सीमांत कृषक 10.80 प्रतिशत, लघु कृषक 8.66 प्रतिशत तथा लघु मध्यम कृषक परिवारों में न्यूनतम 7.45 प्रतिशत सदस्यों नें की। मधुमेह के सर्वाधिक रोगी बड़े कृषक परिवारों में 6.90 प्रतिशत, मध्यम कृषक परिवारों में 3.36 प्रतिशत, सीमांत कृषक परिवारों में 2.31 प्रतिशत, लघु कृषक तथा लघु मध्यम कृषकों में क्रमश: 1.82 प्रतिशत तथा 1.86 प्रतिशत प्राप्त हुये।

भोजन, आहार और खाना पर्यायवाची शब्द है। अन्न शब्द का अर्थ है जो खाया जाये। इस मौलिक अर्थ में अनाज, फल, सब्जी, मांस, मछली सभी अन्न हैं किंतु आज के संकुचित अर्थ में खेतों में उपजने वाले दानें को ही अन्न कहते हैं। संसार के समस्त प्राणियों का आधारभूत कारण भोजन नहीं है इसी कारण प्राणियों की देह एवं प्राणों की स्थिति है। जन्म लेते ही सबसे पहले प्राणी आहार की ओर प्रवृत्त होता है क्योंकि यह उसकी नैसर्गिक एवं स्वाभाविक प्रवृत्ति है। स्वस्थ रूप से जीवन बिताने के लिये हम जो भी अनाज, सब्जी, फल, दूध और मेवा आदि खाद्य पदार्थ ग्रहण करें उन्हें उनके प्राकृतिक रूप में तथा उचित ढंग से ग्रहण करें। ताकि वे हमारे स्वास्थ्य में स्थाई लाभ पहुँचा सकें। वास्तव में हम जितना व्यर्थ के भोजन पर व्यय करते हैं उसका यदि आधा भी हम उत्तम भोजन पर खर्च करें तो कोई ऐसा कारण नहीं है कि हम विभिन्न रोगों से मुक्त होकर देश की सेवा में सशक्त और सक्रिय भूमिका निर्वाह कर सकें।

अंत में यह कहा जा सकता है कि संतुलित भोजन प्राप्त करने के लिये परिवार को अपनी आर्थिक स्थिति के आधार पर विभिन्न समयों में भिन्न-भिन्न पोषक तत्वों से मुक्त खाद्य पदार्थों का चयन करना चाहिए जिससे वे अपनी खाद्य आदतों तथा संतुलित भोजन में सामंजस्य बैठा सकें। अनेक खाद्य पदार्थ जो शरीर के लिये कम कीमत पर आवश्यक पोषक तत्वों को उपलब्ध करा सकते हैं, क्षेत्रीय उत्पादन द्वारा ही समायोजित किए जा सकते हैं परंतु अज्ञानतावश अथवा उच्च जीवन स्तर के खोखले प्रदर्शन के कारण हम उनका सेवन करने से वंचित रह जाते हैं। प्रयास यह किया जाना चाहिये शारीरिक रोगों से मुक्त रह सकें।

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कृषि उत्पादकता, पोषण स्तर एवं कुपोषण जनित बीमारियाँ, शोध-प्रबंध 2002

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

प्रस्तावना : कृषि उत्पादकता, पोषण स्तर एवं कुपोषण जनित बीमारियाँ

2

अध्ययन क्षेत्र की वर्तमान स्थिति

3

सामान्य भूमि उपयोग एवं कृषि भूमि उपयोग

4

सामान्य भूमि उपयोग एवं कृषि भूमि उपयोग

5

कृषि उत्पादकता एवं जनसंख्या संतुलन

6

कृषि उत्पादकता एवं जनसंख्या संतुलन

7

कृषकों का कृषि प्रारूप कृषि उत्पादकता एवं खाद्यान्न उपलब्धि की स्थिति

8

भोजन के पोषक तत्व एवं पोषक स्तर

9

कृषक परिवारों के स्वास्थ्य का स्तर

10

कृषि उत्पादकता में वृद्धि के उपाय

11

कृषि उत्पादकता, पोषण स्तर एवं कुपोषण जनित बीमारियाँ : निष्कर्ष एवं सुझाव

 

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