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मालवा में रेगिस्तान

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Author: 
डॉ. खुशालसिंह पुरोहित, रतलाम
भारतीय मनीषियों ने हजारों वर्षों से चिंतन– मनन के बाद जलसंचय की विश्वसनीय संरचनायें विकसित की थीं। यह सारी व्यवस्था समाजाधारित थी और इसके केन्द्र में था स्थानीय समुदाय। पिछली लगभग दो शताब्दियों के दौरान इस व्यवस्था की उपेक्षा कर हमारे यहाँ नई प्रणाली पर जोर दिया गया। जिसमें संरचना की परिकल्पना से लेकर उसके निर्माण एवं रखरखाव में समाज का कोई सरोकार नहीं होता है।

इस प्रणाली में एक तरफ तो बड़ी-बड़ी जल संरचनाओं के निर्माण को प्राथमिकता दी गई, दुसरी ओर एकल संरचनाओं के निर्माण के दौरान कैचमेंट के दुष्परिणाम की अनदेखी एक ऐसी भूल थी। जिसके कारण तालाबों एवं जलाशयों का भविष्य किसी हद तक अनिश्चित एवं असुरक्षित हो गया। पिछले वर्षों में देश में बड़े–बड़े जलाशय बने और इन जलाशयों के निर्माण के साथ –सामाजिक विकास एवं आर्थिक विषमता की समस्याएँ भी उभरकर सामने आई। पानी के प्रबंध और वितरण को लेकर जो सोच विकसित हुआ वह आर्थिक रूप से समृद्ध वर्ग के हित साधन का पर्याय बनता गया। भौतिक संसाधनों की बहुलता वाली विकास की अवधारणा में देश की परंपरागत सोच एवं संस्कृति से जुड़ी जल संरचनाओं को नकारने के साथ–साथ पानी के कुप्रबंध एवं असंतुलित उपयोग ने नए सामाजिक संकट को जन्म दिया। यह संकट दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा है। साल दर साल हमारा मालवा क्षेत्र भी इस संकट को झेल रहा है कभी–कभी इस समस्या के हल के अभाव में अपने को असहाय भी महसूस करता है।

आज से 600 वर्ष पूर्व लोकनायक कबीर ने लिखा था- ‘देश मालवा गहर गंभीर, डग-डग रोटी, पग-पग नीर।‘ तब से लेकर अब तक इन शब्दों को इतनी बार दोहराया गया कि ये शब्द स्वयं इतिहास का हिस्सा बन गये। लेकिन आज मालवा की हालत ‘डग-डग नीर के स्थान पर डग-डग पीर हो गयी है।‘ नीर (पानी) के स्थान पर पीर (पीड़ा) का संकेत कबीर ने अपनी वाणी में तभी दे दिया था। कालजयी साहित्यकार ने दूरदृष्टि से जो कुछ युग सत्य देखा और लिखा था उसकी प्रासंगिकता आज और भी बढ़ गयी है। कबीर का कहना है-

बांगड़ देश लूवन का घर है,
तहं जिनि जाहं दाझन का डर है।

सब जग देखों कोई न धीरा,
परत धूरी सिर कहत अबीरा।

न तहां सरवर न तहां पाणी,
तहां सतगुरु न साधु वाणी।

देश मालवा गहर गंभीर,
डग-डग रोटी पग-पग नीर।

कहै कबीर धरत मन माना,
गूंगे का गुड़ गूंगै जाना।


वर्तमान में जहाँ मालवा और रेगिस्तान का संबंध है आज की परिस्थिति में मालवा की स्थिति भी रेगिस्तान जैसी बनती जा रही है।

भारतीय महाद्वीप के मध्य में स्थित मालवा का अपना महत्व है। देस के मध्य में होने के कारण उत्तरी–दक्षिणी और पूर्वी–पश्चिमी प्रदेशों के लोकजीवन, राजनैतिक उत्थान–पतन और सांस्कृतिक क्रियाकलापों ने मालवा के जनजीवन पर गहरी छाप छोड़ी है। मालवा का इतिहास अत्यन्त प्राचीन वैविध्यपूर्ण एवं गौरवशाली रहा है। मालवा दो शब्दों ‘मा’ एव ‘लव’ से बना है। इसका अर्थ लक्ष्मी का निवास माना जाता है। मालवा की समृद्ध भूमि के तीज-त्यौहार, मालवी लोगों की सरलता, मधुरता और मालवा का मौसम प्राचीन काल से प्रसिद्ध रहा है।

मालवा का क्षेत्र और इसके विस्तार के बारे में अनेक विवरण एक अनुमान में कहा गया है कि मालवा का क्षेत्रफल 1 लाख 50 हजार वर्ग किलोमीटर है। इसकी लंबाई 530 किमी एवं चौड़ाई 390 किमी है। मालवा की राजनैतिक सीमाएं परिवर्तनशील रहीं किन्तु प्राकृतिक सीमाओं में कोई खास परिवर्तन नहीं आया। मालवा की सीमा निर्धारण में तीन प्रमुख नदियों का उल्लेखनीय योगदान रहा है।

इत चंबल उत बेतवा, मालवा सीम सुजान।
दखिन दिसी है नर्मदा, यह पूरी पहचान।


आज मालवा की हालत डग-डग डग नीर के स्थान पर डग-डग पीर हो गई है। जिसके लिए हमारी विकास पद्धति, पानी का कुप्रबंध, असंतुलित उपयोग, हमारा समाज तथा सरकारी प्रयास काफी हद तक जिम्मेदार है। लेकिन अब सभी को मिलकर पानी जैसे अहंम मुद्दे को लेकर अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। पानी की हरेक बूँद के महत्व को समझना होगा तथा सामूहिक रूप से जल संचय हेतु रचनात्मक प्रयास करने होगे। तभी हम अपने ‘मालवा’ को रेगिस्तान बनने से रोक पायेंगे।
इन तीन नदियों के मध्य के विस्तृत भू-भाग को देखें तो वर्तमान में मध्यप्रदेश के दक्षिण–पश्चिम में स्थित इस क्षेत्र में राजस्थान का झालावाड़ जिला और मध्य प्रदेश के चौदह जिले मन्दसौर, रतलाम, झाबुआ, धार, उज्जैन, इन्दौर, देवास, शाजापूर, राजगढ़, गुना, विदिशा, रायसेन, सिहोर और भोपाल सम्मिलित हैं। इसका कुल क्षेत्रफल 1 लाख 868 वर्ग कि.मी.है।

मालवा की जल समस्या को समझने के लिए इसकी भौगोलिक स्थिति पर विचार करना होगा। समूचे मालवा की भूगर्भीय संरचना बेसाल्टीय कठोर काली चट्टानों वाली है। जिसे ‘डेक्कन ट्रेप’ कहा जाता है ये चट्टानें लार्वा प्रवाह की सात परतों से बनी है। इनमें कई जगह छिद्र और गहरी दरारें हैं। इन्ही दरारों व छिद्रों से रिस–रिसकर जल धरती में समाकर भीतर के जल का संवर्धन करता है। इन प्राकृतिक जलभरावों (एक्कीफायर) के भी चार स्तर वैज्ञानिकों ने बताए हैं। जिनके अंतर्गत विभिन्न स्तरों पर धरती के भीतर भूजल पाया जाता है। भूजल संवर्धन की कृत्रिम और प्राकृतिक प्रयासों में हमें इनको ध्यान में रखकर योजनाएँ बनानी होंगी। तभी अपेक्षित परिणाम प्राप्त हो सकेंगे।

आजकल मालवा में चल रहे संकट की समस्या पैदा करने में हमारी विकास पद्धति बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। धारणा यह है कि बरसात की मात्रा कम होने से संकट बढ़ा है। जबकि वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है। पिछले 25-30 वर्षों के आकड़ों से पता चलता है कि वर्षा में कोई खास कमी नहीं आई है। आज भी मालवा में सालाना हजार किलोमीटर पानी गिरता है। आज का जलसंकट तो इसलिए पैदा हुआ कि आबादी बढ़ते जाने के साथ-साथ पानी के प्रति हमारे दृष्टिकोण में कोई बदलाव नहीं आ पाया है। पानी की जरूरत को पूरा करने का जो तरीका हमने अपनाया उसी ने पानी की समस्या को गंभीर बनाया। जल संकट समाधान के आज तक के सरकारी प्रयासों की सबसे बड़ी कमी यही रही कि उन्हें देश के विभिन्न क्षेत्रों की क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुकूल नहीं बनाया गया। दूरगामी सोच के अभाव में किसी एक क्षेत्र की सफलता की कहानी दूसरे क्षेत्र में लागू करना हानिकारक हो सकता है। इसका बड़ा उदाहरण पंजाब और हरियाणा में हुई हरित-क्रान्ति का देशव्यापी प्रचार का है। इस हरित-क्रान्ति का मूल आधार था ट्यूबवेल के माध्यम से सिंचाई। इसकी सफलता का आधार वहाँ की कछारी मिट्टी है जिसमें बरसात का पानी आसानी से जमीन में गहराई तक पहुँच जाता है। उस क्षेत्र में नलकूपों के जरिये जितना पानी निकाला जाए उतना पानी फिर से जमीन में जाकर भूजल संवर्धित करता है तो पर्यावरण का संतुलन बना रहता है। इसके विपरीत मालवा क्षेत्र में जमीन के नीचे जिस तरह के पत्थर पाए जाते हैं उसे देखते हुए ट्यूबवेल द्वारा पानी निकालना बहुत ही जोखिम का काम है।

मालवा क्षेत्र में कुछ ही ऐसे स्थान हैं जहाँ भूगर्भ में पानी मिलने की संभावना रहती है। इसलिए नलकूप खनन में अधिक से अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है। नलकूप की गहराई, दो नलकूपों के बीच की दूरी और नलकूप से पानी निकालने की गति इन तीनों में निगरानी और समन्वय सतत् बनी रहनी चाहिए। इसके साथ ही वर्षा का पानी रोकने और भूजल पुनर्भरण के वर्तमान प्रयासों, को समूचे समाज का समर्थन और सहयोग मिलेगा तो ही मालवा को रेगिस्तान बनने से रोका जा सकेगा। यहाँ एक जरूरी बात पर ध्यान बढ़ाना होगा कि भूजल संवर्धन के प्रयासों में सरकारी अधिकारियों के अतिउत्साह और लक्ष्यपूर्ति की खानापूर्ति में पुनर्भरण के लिए बनाए गए ढाँचों कि कोई चूक नहीं रहनी चाहिए, नहीं तो हमारी छोटी सी गलती से धरती के भीतर हजारों साल से सुरक्षित भूजल को प्रदूषित होने में देर नहीं लगेगी। इसलिए भूजल प्रदूषण से बचाकर भी हमारी प्रथमिकताओं में शामिल होना चाहिए।

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