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पानी : समुदाय, संवेदना और समय

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पंचायत परिवार (मई-जून 2003)
पानी पानी के मामले में आम जन पर मेरा भरोसा खुरई अनुविभाग में एसडीओ (राजस्व) के रूप में कार्य करते हुए कायम हुआ। एक छोटा सा ग्रामीण बच्चा उन दिनों मुझे मिला जब खुरई नगरपालिका के प्रशासक की भूमिका निभाते हुए, मैं शहर में जगह-जगह नलकूप खुदवा रहा था, वह बालक अपने हाथ में लकड़ी की एक द्विकोणीय डण्डी लिए हुए था और दावा था कि वह नलकूप की सफलता के लिए विभिन्न वार्डों में ऐसी जगह बता सकता है जहां खुद पानी निकले। मैंने कौतुकवश उसे जीप में साथ बैठा लिया और उसे उन वार्डों में ले गया जिन्हें हमने समस्याग्रस्त वार्ड के रूप में चिन्हित किया था। उसकी पहली सफलता के बाद करीब दर्जन से अधिक स्थानों पर मैंने उसकी सेवाएँ लीं सभी जगह अच्छा पानी मिला। लोकस्वास्थ्य यांत्रिकी और नलकूप विभाग की वॉटर डिवाइजिंग मशीनों से ज्यादा सफलता-दर वाले उस प्रतिभाशाली बच्चे की पढ़ाई आदि के लिये अनौपचारिक मदद करने के बावजूद इस प्रसंग की वास्तविक त्रासदी यह है कि रिकार्ड पर कहीं उस बच्चे का नाम नहीं है क्योंकि सिस्टम में ऐसे डिवाइनर्स की कोई अभिस्वीकृति या सदस्यता नहीं है। बाद में मेरे प्रशासनिक जीवन में ऐसे देसी डिवाइनर्स मुझे और भी मिले। तब लगा कि पानी से अपने संवेदन तन्तुओं को जोड़ने वाली यह एक नेपथ्य सरस्वती भारत के ग्राम्यांचल में शायद अभी भी बह रही है। पुराने समय के राजघरों की तुलना में कुछ और ग्राम्मीकृत लेकिन अभी भी जारी और उपस्थित।

रायपुर में नगर-निगम प्रशासक के रूप में वहां के तालाबों ने मुझे यह सिखाया कि कैसे हमारी आधुनिक और वैज्ञानिक दुनिया में अमृतम् आप वाले सरोवरों को शहर के पंक-पोस्टरों में बदल दिया है। रायपुर में मैंने तालाबों की लाशों पर बनी कालोनियां और बस्तियां देखीं। स्लमलार्ड तालाबों पर कब्जा जमाकर झुग्गियां ठुकवाते, बरसात में स्वभावतः वे बस्तियां पानी में डूब जातीं। फिर उन्हें राजकीय सहायता का कार्यकाण्ड चलता। यह सिर्फ गरीबी और उसके बाद की परिणति नहीं थी बल्कि विभिन्न शासकीय उपक्रमों की कालोनियां भी पुराने तालाब को काटकर बनी हुई थी। बिसालपुर में अपनी परीक्षा के दौर में मैने मल्हार नामक एक ऐसे ग्राम का अध्ययन किया था, जिसमें किसी ऐतिहासिक समय में 108 तालाब थे। पूरे छत्तीसगढ़ में प्राचीन भारतीय समाज ने पानी की बूंदों को संग्रहित करने की यह वैकल्पिक व्यवस्था कर रखी थी। लेकिन नए युग में इन जल मंदिरों को शहर भर की गंदगी को इकठ्ठा करने वाला बजबजाता नर्क बना दिया गया है। जिनमें कभी शुचिता के लिए स्वंय को परवारा जाता था वे अब पोखर हैं। उनमें मच्छर पनपते है, सभ्यताएँ नहीं। रायपुर नगर निगम के तत्वर्षीय बजट की प्रस्तावना में इस बाबत किंचित विस्तार से मैंने लिखा था। मुझे याद है कि किसी तरह की सुचिंतित जल चेतना के अभाव में रायपुर में मुझे इसी बात की विशेष खुशी होती थी कि वहां मैंने गर्मी के एक मौसम में जितने पॉवर पम्प नए टयूबवेलों पर स्थापित करवाए वह नगर-निगम के कुल इतिहास के सकल योग से अधिक थे। वह हैण्डपम्पों के मामले में अभूतपूर्व सफलता का ग्रीष्म था लेकिन आज मैं इस बात पर पानी-पानी होता हूँ कि मेरी एप्रोच कितनी मायोविक थी, कितन टेण्टेटिव।

जशपुर में पहाड़ी कोरवा और बिरहोर जैसी आदिम जन-जातियाँ और उरांवो के बीच मैंने झिर या स्रोत देखे। आदिवासी इनका उपयोग करते थे, लेकिन शासकीय नजरों में ये प्रदूषण के केन्द्र होने से त्याग्य और परित्याग्य थे। अपनी पुस्तक पहाड़ी कोरवा व्यतीत, वर्तमान और विभद्र में मैंने इनका विस्तृत उल्लेख किया है। हमने जब देखा कि आदिवासियों के जीवन से यह झिर इतना गुँथी हुई है तो उसे प्रदूषण-मुक्त और स्थिर बनाने की तकनीक अपनाना मुझे ज्यादा व्यवहार्य लगा। इसके परिणाम अगले साल अच्छे देखने आए, जब जशपुर में डायरिया-डेथ नियन्त्रित हो गई। जबकि उसी परिवेश में पास के जिले सरगुजा में डायरिया से बहुत सी मौतें हुईं। यह कुछ-कुछ गरीबी की मगाडी झील की रिफ्ट वैली में आजकल खोदे जा रहे उधले कुँए जैसा था, जिसमें हैण्डपम्प लगा दिया जाता है। डॉ. ध्रुवज्योति घोष ने कलकत्ता के पोखरों को वेटलैन्डरा प्रोजेक्ट के तहत शुद्ध रमणीय जल में इससे कई गुणा बेहतर तरीके से बदला। मैंने देखा पड़ोसी छोटा नागपुर पठार पर आदिवासी बाँस की पाइप लाइनों का इस्तेमाल करते थे। बांग्लादेश में जिस तरह से आज बंबू पाइप ने क्रांति कर रखी है, और इण्टरनेशनल डेवलपमेण्ट इण्टरप्राइजेस के द्वारा चलाए जा रहे जल रिसर्च केन्द्र ने 15 लाख पम्प बेचे हैं-लगभग उसी तरह का एक प्रारम्भिक प्रयोग मैंने जशपुर में किया था। बाँस के पम्प और पाईपों में जल-परिष्करण क्षमता भी है। लेकिन उन दिनों स्वंय मुझमें जन-आस्थाओं की उर्वरता और श्रद्धाओं को पूरे जोर-शोर से चिल्लाकर बताने का हौसला न था, इसलिये झिर वाले प्रयोग के विपरित बाँस पाईप का प्रयोग बहुत सीमित रहा। आज बांग्लादेश के बाँस पम्पों की सफलता देखकर मुझे यह मुकाम चुक जाने का बहुत अफसोस होता है।

उपरोक्त तीनों पड़ाव बहुत ही कम अवधि के पड़ाव थे। जशपुर से मैं दशपुर चला आया। यह उस आदिवासी दुनिया से एकदम भिन्न दुनिया थी। बहुत ही जागरुक और प्रगतिशील किसानों का यह जिला-मंदसौर इस बात का उदाहरण था कि भूमिगत जल के अंधाधुंध उत्खनन ने क्या कहर बरपाया है। मन्दसौर सर्वाधिक टयूबवेलों वाला जिला है। यह देखते हुए जब यहां कुओं के स्थान पर तालाब बनवाने के लिए जीवनधारायोजना की राशि का एक व्यापक स्तर पर प्रयोग करना चाहा गया तो न्यस्त स्वार्थों ने इसका जमकर विरोध किया। उसी समय जिले में जीवनधारा योजना की राशि का भयंकर दुरुपयोग का प्रसंग उजागर हुआ तो विरोध थोड़ा थमा। प्रशासक योजना की एक कण्डिका, एक परन्तुक में इस तरह के प्रयोग के लिए उपलब्ध अवकाश का इस्तेमाल कर रहा था। यह व्यक्तिगत से सामूहिक की ओर, दोहन से संग्रहण की ओर प्रस्थान-प्रद्याण था। यहीं मैंने पहली-पहली बार डॉ. श्राफ की कुंआं की पुनर्भरण वाला इन्दौर मेथड के बारे में पढ़ा। और मैंने उन्हें मन्दसौर आमन्त्रित कर फेरती भरलो नामक एक योजना का ब्लूप्रिण्ट भी बनवाया, नियति ने बाद में श्री श्राफ के साथ काम करने के लिए मुझे इंदौर भी बुलाया, जहां उनके साथ मिलकर हम इसे व्यापक स्वरूप दे पाए। कंजीडा के पठार पर जब एक करोड़ रुपये से अधिक एक गर्मी के मौसम में व्यय कर लेने के बाद भी किसानों को टयूबवेल में पानी नहीं मिला तो उस समय श्री नरेन्द्र नाहटा, मन्त्री, मध्य प्रदेश शासन के साथ जाकर जन-सहयोग से तालाब बनाने की योजना कंजाडी क्षेत्र में बनाई। उसके कुछ ही दिन बाद वहां से स्थानान्तरित हो जाने से यह ख्वाब अधूरा रह गया। लेकिन आज भी गाँव के पेड़ तले इकठ्ठा हुए किसानों को भीड़ का छलकता हुआ उत्साह मुझे याद है। मन्दसौर में रामपुरा एक अदभुद लघु-नगर है। प्राचीन भारतीय जल-विवेक का अन्यतम उदाहरण। यहां तालाब एक दूसरे से इस कदर जुड़े हैं कि पानी की एक बूँद तक बेकार नहीं रह सकती थी।

इस वक्त तक आते-आते भारतीय ग्रामों की अंदरूनी शक्ति के प्रति मेरा विश्वास काफी दृढ़ हो चला था। लेकिन शायद इस विश्वास के प्रति-ध्रुओं के बाबत् मोहभंग की भी आवश्यकता थी। मैने बाढ़ के दो जिलों में वे तालाब देखे जो सूखा राहत और ग्रामीण विकास निधियों से सिंचाई विभाग के आभियन्ताओं द्वारा बनाए गए थे। एक जिले में मेरे ज्वाइन करने के 15 दिन के भीतर 13 तालाब, जो एक माह पूर्व ही बने थे, फूट गए और कई इन्जीनियर निलम्बित हुए। एक अन्य जिले में मेरे ज्वाइन करने के वक्त तत्कालीन कमिश्नर द्वारा कराई गई जांच में तालाबों में मजदूरों को 38 लाख रुपये का पानी पिलाया जाना बताया गया था। ऐसी स्थिति में मैने अलवर में काम कर रहे तरुण भारत संघ के श्री राजेन्द्र सिंह को वाटरशेड समितियों के सदस्यों को स्वयं अपना तालाब बनाने के लिए प्रेरित करने के वास्ते झाबुआ बुलवाया। तब तक उन्होंने मैगसेसे पुरुस्कार नहीं जीता था, लेकिन उनका झाबुआ आना हम लोगों के लिए एक बड़ा पुरस्कार था। उनके सीधे सरल शब्दों और अनुभवों ने झाबुआ के भील ग्रामीणों पर बड़ा प्रेरक असर डाला। उस वर्कशॉप में जन सहयोग से तालाब बनाने के झाबुआव्यापी अभियान की नींव पड़ी। दो सौ से अधिक ऐसे तालाब बने, जिनमें शासकीय निवेश एक लाख से अधिक ना था, लेकिन जन सहयोग इससे अधिक था। वॉटरशेड समितियों और ग्राम समुदाय के सदस्यों का आत्मविश्वास इतना अधिक था कि उन्होंने तकनीकी अधिकारियों को कई जगह हाथ ही न लगाने दिया और ये तालाब फूटे नहीं। यह ग्रामीण देसी अभियान्त्रिकी की परीक्षा थी, जिसमें उर्त्तीण होकर इस सामुदायिक परिसम्पत्ति के प्रति ऑनरशिप का भाव आदिवासियों में आना था। यों उन 16 महीनों में वहां 147 करोड़ रुपए की लागत वाली पेयजल परियोजना बनी भी, स्वीकृत भी हुई और उद्घाटित भी। लेकिन जिस सामाजिक सार्थकता का अनुभव मुझे इन जान-तालाबों में हुआ, उतना उस विराट परियोजना में नहीं। दरअसल पंचायती राज ने ब्यूरोक्रेसी का विकेन्द्रीकरण कर लेने के बाद टेक्नोक्रेशी का विकेन्द्रकरण करने की बारी है। टेक्नोक्रेशी ने अपने इर्द-गिर्द जिस विशेषज्ञता का प्रभा-मण्डल बना रखा है, वह किसी समय ब्यूरोक्रेसी ने बनाया हुआ था। यूनेस्को की पुस्तक “फार्मर्स आर इन्जीनियर्स” यह बताती है कि ग्रामीण जन भी अभियान्त्रिकी की एक सहज बुद्धि वापरते हैं। इन तालाबों ने यही कुछ सिद्ध किया था। झाबुआ में एक दूसरा सबक मुझे सोंडवा के एक गाँव के भीलों ने सिखाया। वे वही “पाट” पद्धति से सिंचाई करते थे, जहां उनकी देसी बुद्धि और परिश्रम में गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त को पराजित कर रखा था। मैंने जब उन्हें 7 किमी. नीचे स्रोत से अपने खेतों तक पानी ले जाते देखा तो उन्हें मैंने भरमाया कि वे ये सब मेहनत क्यों करते हैं? मैने उन्हें सामूहिक उद्वहन सिंचाई योजना के तहत बैंक से ऋण स्वीकृत करा देता हूं। तब उस आदिवासी ने कहा कि कौन बैंक के और बीडीओ के और बिजली दफ्तर के चक्कर लाएगा। उस क्षण मुझे विकास की सही परिभाषा समझ आई। विकास वह जो अधिकाधिक स्वायत्त हो। विकास वह जो निर्भरताओं और बहिरंगताओं का कमतम बनाना हो।

झाबुआ में जहाँ कई विफल सामूहिक उद्वहन सिंचाई परियोजनाओं ने किसानों को ऋण के दीर्घस्थाई चक्कर में डाल दिया है, तन्त्र के चक्कर लगवाने वाले विकास के प्रति वितृष्ण का भाव लिए उस आदिवासी युवक की स्मृति मेरे जेहन में अभी तक बनी हुई है। डाइंग विज्डम के अनिल अग्रवाल, रालेगांव सीद्दी के अन्ना हजारे और मालवा के आदिवासी अंचलों में सक्रिय तपन भट्टाचार्य मुझे यहीं झाबुआ में मिले।

इंदौर में जन सहयोग से पुराने तालाबों का जीर्णोद्धार करने की जिला सरकार में प्रस्तुत योजना के क्रियान्वयन में स्वयं मुख्यमंत्री के श्रमदान का सुयोग है। दो वर्षों बाद पानी रोको अभियान के रूप ने जब प्रदेश भर में जन सहयोग से पुराने तालाबों के पुर्नउत्थान और नई संरचनाओं के निर्माण का जो महाभियान चालू हुआ, उसमें इंदौर प्रदेश का इस मायने में भी पहला जिला था कि जिसने तालाब जीर्णोद्धार के लिए केन्द्र सरकार से करोड़ों रुपए की राशि प्राप्त की। वॉटर इंजेक्टिंग की डॉ. श्राफ की तकनीक का इन्दौर ने पहले पहल व्यापक प्रयोग किया। रेडक्रास की राशि के माध्यम से और बाढ़ में नीमच जल-सम्मेलन के उपरान्त तो डॉ. श्राफ के फार्मूले प्रदेश भर में छा गए। रेडक्रास की राशि इन्दौर में तालाबों के जीर्णोद्धार में भी प्रयुक्त हुई। क्योंकि सदस्यों का विश्वास था कि जल-संग्रह के बड़ा पुण्य-संग्रह और सेवा-संकलन नहीं है। इंदौर में रूफ वाटर हार्वेस्टिंग के शहरी प्रयोग, निर्माण अनुमतियों में वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था, अखबारों द्वारा स्वंय का जल-चेतना इभियान जैसे बहुत से सुखद अनुभव रहे हैं। इंदौर की नियति और इतिहास में कुछ ऐसा है कि पिछली तीन सदियों से उसके आखिरी वर्ष भयंकर जल-संकट और उससे जूझने के अपूर्व प्रयासों के वर्ष रहे हैं।

अभी जब डेनवर शहर ने इसी 16 अप्रैल को लॉन-वॉटरिंग और आउटडोर वाटरिंग को सीमित करने का कानून बनाया तो मुझे एबीरोड़ के किनारे के वे ही कुछ लोग याद आए। इंदौर में अंधाधुंध टयूबवेल उत्खनन के विरुद्ध धारा 144 का प्रयोग और सरकारी जमीनों पर खुदे कुँओं और टयूबवेलों को राजसात करने के अभियान भी मुझे याद आते हैं। इन्दौर, सागर और रायपुर में मैने वे शहरी पाईप लाईन भी देखी, जिन्हें ढेरों अवैध कनेक्शनों से एक साही या पाक्युपाइन की तरह पंचर कर दिया गया था। आज बिजली के क्षेत्र में काम करते हुए हम लोग पॉवर-थेफ्ट और वितरण क्षतियों की बात करते हैं, लेकिन वॉटर-थेफ्ट और उसको वितरण क्षतियों की भी गणना की जानी चाहिए। आज जब एक नई सोच से डेनवर शहर गोल्फ कोर्सो में जल उपभोग को सीमित करवा रहा है और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं की वाटरिंग को 70 प्रतिशत तक कम कर रहा है, तो लगता है कि राज्य की नियन्ता शक्ति का पानी रोको अभियान में उपयोग कुछ चिजों को संस्थानीकृत करने में मददगार ही होता है।

प्रशासनिक जीवन में मैंने ऐसे गाँव भी देखे हैं, जहाँ औरतें घण्टों वाटर-वाक कर पानी लाती हैं। उन्हें इथियोपिया के डेरा किन्तु गाँव की उस महिला को अमानो की तरह बीबीसी के समाचार का हिस्सा नहीं बनना पड़ा। जो 24 किलोमीटर आ-जाकर 9 घण्टे खर्चकर पानी का मटका भर लाती हुई दिखाई गई थी। पर मुझे उनकी शान्ति पर उतना ही आश्चर्य हुआ है जितना शहरों में एक वक्तनल में पानी न आने पर चक्का जाम पर उतर आने वाले लोगों की उग्रता पर। मुझे आश्चर्य होता है कि क्या आज भी हम नलकूप उत्खनन को एक निजी अधिकार की तरह बरतते आए हैं? जबकि भूमिगत जल-धमनियां शामलात देह मानी जानी चाहिए और टयूबवेल खनन की इजाजत उस धमनी से जुड़े अन्य बाशिन्दों के अनापत्ति प्रमाणपत्र और उपयोगकर्ता से वाटर-टेबल लॉस कम्पेनसेशन के बिना दी ही नहीं जानी चाहिए।

आस्ट्रेलिया के मरे डार्लिग नदी बेसिन में ऐसा होता भी है। मुझे आश्चर्य होता है कि सिंधु, नील, दजला-फरात आदि के किनारे बस्तियां इसलिए बसीं कि वहां पानी था, लेकिन आज कालोनी निर्माण में तालाब (नाली, सड़क, प्रकाशस्तम्भ, सामुदायिक भवन आदि की तरह) एक जरूरी अंग नहीं है। शहरी पानी के प्राइवेटाईजेशन और कार्पोरेटेट कन्ट्रोल के लिए तो अन्तर्राष्ट्रीय फर्मो की सक्रियता बढ़ रही है लेकिन दूर से पानी ढोकर लाती भारतीय ग्रामीण महिला के लिए तो यही बहुत होगा कि नैरोबी के दक्षिण पश्चिम में काम कर रहे इण्टरमीडिएट टेक्नोलॉजी डेवलपमेण्ट ग्रुप की तरह कोई उन्हें इम्प्रूव्ड लोडिंग प्रेक्टिसेज ही सिखा दे। एनरान भारत में बिजली के मामले में असफल हुआ, अमेरिका में पानी के मामलों में उन बड़ी बातों की तुलना में तो मन्दिरो-सरोवरों का जो जीर्णोद्धार तमिलनाडु में जीवन-धारा और ग्राम विकास की निधियों से कर दिखाया गया, वह ज्यादा मायने रखता है। मुझे यह अपनी असफलता लगती है कि मन्दिर-सरोवरों की पर्यावरणीय प्रासंगिकता की ओर कभी मेरा ध्यान गया ही नहीं। असफलताओं के कई चेहरे होते हैं। मसलन मैं इसे अशासकीय संगठनों की भी असफता मानता हूँ कि जिस तरह उन्होंने बड़े बांधो के पर्यावरण दुष्प्रभावों के विरूद्ध जन चेतना विकसित की उतना वे टयूबवेल/हैण्डपम्प कल्चर के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों के सन्दर्भ में नहीं कर पाए।

अभी 26 नवम्बर 2002 के दिन पानी के मानवधिकार अन्तराष्ट्रिय घोषणा आर्थिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों की संयुक्त राष्ट्र संघ समिति द्वारा हुई है।

और अभी दिसम्बर में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने 2003 का अन्तर्राष्ट्रीय फ्रेशवाटर वर्ष घोषित है। मध्यप्रदेश शासन तो इसका पूर्वानुमान पहले ही कर चुका था, इसलिए उसने पानी रोको अभियान इससे काफी पूर्व ही शुरू कर दिया था। बूंदों के संग्रहण, संकलन का यह रचनातम्क और शान्त अभियान हो सकता है। उसे दुनिया को पसंद नहीं आए जो पानी के लिए युद्ध करने में व्यस्त है। पानी की कमी पहले गली मोहल्लों में तनाव पैदा करती थी, नए युग में अन्तर्राष्ट्रीय आतंक और युद्ध पैदा करती है। आज यदि मध्य-पूर्व का क्षेत्र आतंकवाद से ग्रस्त है, तो शायद इसमें कही यह तथ्य भी कोई भूमिका रखता है कि विश्व की 8 प्रतिशत जनसंख्या वाले इस क्षेत्र में विश्व का 1 प्रतिशत ही फ्रेशवॉटर है। आज विश्व भर में युद्दों में मारे गए लोगों की जनसंख्या से 10 गुने लोग जलवाही बीमारियों से मर रहे हैं – 50 लाख सालाना की दर से जिस ईराक को अभी युद्ध में तहस-नहस किया गया है, वहीं की ताजा उपग्रह छबियों से पता लगता है कि वहां की 90 प्रतिशत प्राकृतिक वैटलैण्ड गायब हो चुकी हैं। इजराइल ने तुर्की से गोलन हाइट्स 1967 में छीनी, जिससे आज उसकी कुल जलपूर्ति का 90 प्रतिशत प्राप्त हो रहा है। आज सीरिया को यदि ये हाइट्स मिल जाएँ तो वह गोलिता के पूर्वी तट पर पहुँच जाएगा। फिलिस्तीनी आम अमेरिकी की तुलना में 50 गुना कम पानी पी रहे हैं। इजराइल टर्की से पानी खरीदने की वार्ताएं कर रहा है। वहां कृषकों को जल आवण्टन में 50 प्रतिशत की कटौती कर दी गई है। सद्दाम हुसैन तो बारिश की राष्ट्रव्यापी दुआ के लिए अभी 1999-2000 में एक तिथि तय की थी। उनकी रिलीजस अफेयर्स मिलिस्ट्री ने इसके लिए उचित प्रार्थनाएं तैयार की थी। साऊदी अरब के किंग फहद ने प्रत्येक जिले में अपने नागरिकों से बारिश के लिए दुआ मांगने के लिए आदेश दिए थे। अभी जन इजराइल में नौ माह तक बारिश का एक बूंद नहीं गिरा तो छः घण्टें तक 50 रब्बिरों ने मन्त्र पढ़ते हुए सात बार पवित्र भूमि की परिक्रमा की और तीन दिन तक इस कर्मकाण्ड में भाग लेनेवालों ने व्रत रखे। जोर्डन में प्रिंस हुसैन ने धार्मिक नेताओं को सिर्फ पीसमेकर ही नहीं कहा, रेनमेकर भी कहा। वहां धार्मिक मामलों के मन्त्रालय ने और वहां की ट्रेड यूनियनों ने वर्षा के लिए विशेष प्रार्थना सत्र किए। भारत में हम धर्म-निरपेक्ष राजसत्ता के तहत लोक-विश्वासों का षौचल कहकर खारिज कर देते हैं। लेकिन मध्य-पूर्व (मिडिल-इस्ट) पानी के लिए दुआ से लेकर दून्दू तक सब कुछ कर रहा है। इन सब अनुभवों से गुजरते हुए मुझे लगता है कि पानी के मामले में सबसे संभाव्यता पूर्ण सेक्टर न तो प्राइव्हेट सेक्टर है, न ही सरकारी। जिसे कम्युनिटेरियन सेक्टर कहा जाता है, मेरे हिसाब से उसी में इस मुद्दे की सबसे ऊष्मावान और रोमाचंकारी संभावनाएँ छुपी हुई हैं।

(जैसा उन्होंने पंचायत परिवार के प्रतिनिधि को बताया)

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