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क्या सरकारें पराली जलाने की किसानों की मजबूरी खत्म कर सकेंगी

Author: 
विपिन पब्बी
Source: 
नवोदय टाइम्स, 23 नवम्बर, 2017

कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के नेतृत्व में पंजाब सरकार ने हाल ही में फसलों के अवशेषों को जैव ऊर्जा में बदलने के लिये जिस प्रकार 400 संयंत्र स्थापित करने हेतु चेन्नई आधारित फर्म के साथ सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, उससे ठूंठ जलाने के मामले में उम्मीद की नई किरण दिखाई देने लगी है।

कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के नेतृत्व में पंजाब सरकार ने हाल ही में फसलों के अवशेषों को जैव ऊर्जा में बदलने के लिये जिस प्रकार 400 संयंत्र स्थापित करने हेतु चेन्नई आधारित फर्म के साथ सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, उससे ठूंठ जलाने के मामले में उम्मीद की नई किरण दिखाई देने लगी है। नवम्बर आने की देर होती है तो उत्तरी भारत में हर वर्ष सामान्य जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। समाचार पत्र प्रदूषण के उच्च स्तर की रिपोर्टों से भरे होते हैं लेकिन इन रिपोर्टों का मुख्य फोकस राजधानी दिल्ली पर होता है जबकि पूरी उत्तरी ‘काऊ बैल्ट’ इससे प्रभावित होती है। इसी बीच टी.वी. स्टूडियोज में इस मुद्दे पर खूब सीना पीटा जाता है।

नवम्बर समाप्त होने तक सामान्यतः वर्षा की कुछ फुहारों के बाद जैसे ही धुन्ध छंटनी शुरू होती है और सूर्य फिर से अपना तेज बिखेरने के योग्य हो जाता है तो सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट आता है। अगले वर्ष फिर से ‘रिकॉर्ड’ या ‘अत्यधिक’ प्रदूषण स्तरों की दुहाई इस तरह शुरू हो जाएगी और हर कोई इस बारे में जुबान लड़ानी शुरू कर देगा।

अब की बार कुछ रिपोर्टों में यह इंगित किया गया कि सुदूर ईराक, कुवैत और सऊदी अरब में कई दिन तक चली धूल-मिट्टी वाली आँधी के कारण भारत में प्रदूषण की स्थिति बदतर हुई है। यह आकलन “वायु गुणवत्ता एवं मौसम भविष्यवाणी व अनुसन्धान प्रणाली” द्वारा किए गए इस अध्ययन पर आधारित है। यह अध्ययन संस्थान केन्द्रीय पृथ्वी विज्ञान एवं भारतीय मौसम विभाग के अन्तर्गत आता है। इस अध्ययन में दावा किया गया कि दिल्ली और भारत के अन्य भागों में 40 प्रतिशत प्रदूषण अरब देशों में चली धूल भरी आंधियों के कारण था जबकि दिल्ली और इसेक आस-पास के राज्यों में 25 प्रतिशत प्रदूषण धान के ठूंठ एवं पराली जलाने के कारण पैदा हुआ था जबकि अन्य स्थानीय कारण 35 प्रतिशत प्रदूषण के लिये जिम्मेदार थे। ये सभी कारण मिलकर ही नवम्बर माह में वायु गुणवत्ता का सूचकांक 478 तक ऊँचा उठाने के लिये जिम्मेदार थे जिसको प्रदूषण का बहुत उच्च स्तर करार दिया।

बेशक इन आँकड़ों में धान के ठूंठ और पराली जलाने की प्रक्रिया को गत अवधि में प्रदूषण का मुख्य कारण माने जाने से एक प्रकार का क्षमादान मिल गया है तो भी तथ्य यह है कि दीवाली पर पटाखे फोड़े जाने और बारिश की कमी जैसी सामान्य पारिस्थितियों से मिलकर यह बात समस्या को और भी जटिल बना देती है। धान के ठूंठ जलाने की क्रिया भी इन दिनों देखने में आती है क्योंकि राजधानी के आस-पास के राज्यों में किसानों के पास गेहूँ की फसल हेतु खेत तैयार करने के लिये केवल 15-20 दिन का ही समय होता है। बहुत से लोगों को यह जानकारी नहीं कि अधिकतर किसान धान की कटाई के लिये हार्वेस्टर कम्बाइन किराए पर बुलाते हैं जो धान के खेत में 4 से 6 इंच के ठूंठ छोड़ देती है क्योंकि यह बिल्कुल जमीनी स्तर से कटाई नहीं कर सकती। हार्वेस्टर से कटाई की प्रति एकड़ लागत 1300 रुपए आती है। यदि इस काम के लिये मजदूरों को लगाया जाए तो यह लागत कई गुणा बढ़ जाएगी।

खेत में धान के ठूंठ हों तो किसान अपनी नई फसल की बुवाई करने के योग्य नहीं हो पाते। इसलिये वे दिहाड़ीदार मजदूरों से इन ठूंठों की कटाई करवाते हैं लेकिन ऐसा करने से लगभग 6000 रुपये प्रति एकड़ लागत आती है इसलिये वे इन ठूंठों को जलाना ही बेहतर समझते हैं। जब समस्या केवल माचिस की एक तीली से हल हो सकती हो तो कोई भी किसान 6000 रुपए बर्बाद नहीं करना चाहेगा?

बेशक राज्य सरकारें खेतों में आग लगाने वाले किसानों पर जुर्मानें ठोंकने को मजबूर हुई हैं तो भी राजनीतिज्ञ अपने इस भारी-भरकम वोट बैंक के विरुद्ध कोई कड़ी कार्रवाई करने में रुचि नहीं लेते। ऐसे में यह देखने में आता है कि जुर्माने लगाए जाने के बावजूद बहुत ही कम किसान इनकी अदायगी करते हैं।

दबाव की नीति स्पष्ट तौर पर विफल हुई है और केन्द्र तथा प्रभावित राज्यों की सरकारों को दीर्घकालिक समाधान तलाश करने के लिये मिल-बैठकर मन्थन करना होगा। यह तो स्पष्ट है कि सरकारें कुछ भी कर लें, ठूंठ जलाने की मजबूरी को समाप्त नहीं कर सकतीं।

इसका सबसे लाभदायक विकल्प यह है कि भारी संख्या में ‘टर्बो हैप्पी सीडर’ (टी.एच.एस.) मशीनों की व्यवस्था की जाए। यह मशीन न केवल ठूंठों को जमीनी स्तर से काट सकती है बल्कि साथ ही साथ इन्हें उखाड़ इनके छेदों में गेहूँ के बीज भी बो सकती है। इससे भी बड़ी बात यह है कि यह ठूंठों की कटाई करके इनसे बोए गए बीज को कवर यानी कि प्रतिरक्षा उपलब्ध करवा सकती है। लगभग डेढ़ लाख लागत वाली इस मशीन को हार्वेस्टर कम्बाइन मशीन के साथ भी प्रयुक्त किया जा सकता है लेकिन हार्वेस्टर मशीन की लागत 18 लाख रुपए होती है।

ऐसे में इन दोनों मशीनों पर लगभग 20 लाख रुपए की राशि खर्च करना अधिकतर किसानों के बूते की बात नहीं। शायद इसका एक हल यह हो सकता है कि सरकारी एजेंसियाँ किसानों को ये दोनों मशीनें किराए पर उसी तरह उपलब्ध करवाएँ जैसे वर्तमान में किसान कम्बाइनें किराए पर लाते हैं। सरकार भी सस्ते ऋणों जैसे प्रोत्साहन उपलब्ध करवाकर किसानों को प्रेरित करने की दिशा में योगदान दे सकती है।

कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के नेतृत्व में पंजाब सरकार ने हाल ही में फसलों के अवशेषों को जैव ऊर्जा में बदलने के लिये जिस प्रकार 400 संयंत्र स्थापित करने हेतु चेन्नई आधारित फर्म के साथ सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, उससे ठूंठ जलाने के मामले में उम्मीद की नई किरण दिखाई देने लगी है। यह अनुमान लगाया गया है कि इन सभी संयंत्रों पर लगभग 10,000 करोड़ रुपए लागत आएगी। इस सौदे में पंजाब सरकार की हिस्सेदारी यह होगी कि वह प्रत्येक इकाई को 33 वर्ष के पट्टे पर 7-7 एकड़ भूमि का आवंटन करेगी और सब्सिडी दरों पर बिजली भी उपलब्ध करवाएगी।

इसके एवज में फर्म को अगले 10 माह में 400 कलस्टर इकाइयों का निर्माण करना होगा। प्रत्येक संयंत्र में प्रतिवर्ष 50,000 टन पराली प्रसंस्कृत करने की क्षमता होगी।

इस पहल का अवश्य ही स्वागत करना चाहिए। वास्तव में बहुत लम्बे समय से यह प्रतीक्षा थी कि सरकारें इस प्रकार का कोई कदम उठाएँ। इसके साथ ही यह उम्मीद भी की जा रही है कि विद्युत मंत्रालय ताप विद्युत संयंत्रों के लिये पराली के बने हुए गोले प्रयुक्त करेगा। किसानों को भी प्रोत्साहन दिए जाने की जरूरत है। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो टी.वी. स्टूडियोज में बैठे हुए हेकड़ीबाज अगले नवम्बर में बहुत आगबबूला होकर इस मुद्दे पर चर्चा कर रहे होंगे तथा प्रदूषण की समस्या को लेकर भारी मात्रा में कागज काले किए जाएँगे।

vipinpubby@gmail.com

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