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जब भ्रमित हो जाता है मनुष्य का रोग-प्रतिरोधी तंत्र (Confusion of human immune system creates food allergy)

Author: 
उमाशंकर मिश्र
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 26 दिसंबर, 2017

फूड एलर्जी के बढ़ते मामलों पर विशेष फीचर

भारत जैसे देश में खाद्य एलर्जी के खतरे की दस्तक और भी खतरनाक हो सकती है क्योंकि यहाँ न केवल तेजी से पश्चिमी जीवन शैली को अपनाया जा रहा है, बल्कि शहरीकरण और पलायन भी बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार किसी आहार के प्रति एलर्जिक रिएक्शन वयस्कों की अपेक्षा बच्चों में अधिक देखने को मिलते हैं।

नई दिल्ली : बदलती जीवन शैली के साथ-साथ खान-पान का बाजार बढ़ रहा है। इसके साथ खाद्य एलर्जी का खतरा भी अपने पैर पसार रहा है। यह सुनकर कोई भी हैरान हो सकता है कि रोगों से बचाने वाला शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र ही खाद्य एलर्जी के लिये मुख्य रूप से जिम्मेदार होता है। खाद्य एलर्जी के लिये जीवन शैली से लेकर खान-पान की आदतें, प्रदूषित हो रही खाद्य श्रृंखला एवं पर्यावरणीय बदलाव समेत कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार बढ़ती खाद्य एलर्जी का सम्बन्ध महानगरीय क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्तियों के अलावा उन लोगों से भी हो सकता है, जो पाश्चात्य जीवन शैली अपना चुके समुदायों के बीच जाकर रह रहे हैं। भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में यह खुलासा किया गया है।

दिल्ली स्थित वल्लभभाई पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रो. राजकुमार के अनुसार “भारत में 30 प्रतिशत से अधिक लोग किसी-न-किसी प्रकार की एलर्जी से ग्रस्त हैं। खाद्य पदार्थों से होने वाली एलर्जी सम्पर्क माध्यमों जैसे- साँस, स्पर्श एवं आहार से हो सकती है।”

यह भी आश्चर्यजनक है कि खान-पान की अत्यधिक विविधता वाले इस देश में स्वास्थ्य विशेषज्ञ एवं नीति निर्माता फूड एलर्जी से सम्बन्धित आँकड़ों के लिये विदेशी अध्ययनों पर ही निर्भर हैं। हमारे यहाँ राष्ट्रीय स्तर पर एलर्जी से ग्रस्त मरीजों से सम्बन्धित आँकड़ों का अभाव है।

हाल में वल्लभभाई पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट में एलर्जी के विभिन्न रूपों के प्रसार और उनके उपचार से जुड़ी रणनीतियों पर चर्चा के लिये एक सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस दौरान प्रो. राजकुमार ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “भारत की करीब तीन प्रतिशत आबादी फूड एलर्जी से ग्रस्त है। सम्मेलन में आए विशेषज्ञों से प्राप्त तथ्य एलर्जी के मामलों से निपटने में कारगर रणनीति बनाने में मददगार हो सकते हैं।”

मनुष्य का प्रतिरक्षा तंत्र वायरस, परजीवी, बैक्टीरिया और विषाक्त तत्वों के हमले से रक्षा करता है। लेकिन कुछ लोगों का रोग-प्रतिरोधी तंत्र भ्रमित हो जाता है और हानि-रहित एवं हानिकारक तत्वों के बीच अन्तर नहीं कर पाता।

प्रतिरक्षा तंत्र जब किसी खाद्य पदार्थ में मौजूद प्रोटीन की पहचान बाहरी तत्व के रूप में करता है तो यह खास प्रतिरोधी तत्व इम्यूनोग्लोबिन 'ई' उत्पन्न करता है। इम्यूनोग्लोबिन त्वचा, फेफड़े और आँतों की कोशिकाओं से जुड़े रहते हैं। एलर्जी पैदा करने वाले तत्वों के सम्पर्क में आने पर ये कोशिकाएँ हानिकारक तत्वों से बचाव के लिये हिस्टैमीन समेत अन्य रसायन छोड़ती हैं। इस तरह शरीर के भीतर एक घमासान मच जाता है, जिसके कारण हम बीमार हो जाते हैं।

जब शरीर का रोग-प्रतिरोधक तंत्र किसी हानि-रहित बाहरी तत्व के सम्पर्क में आने से अति सक्रिय हो जाता है तो एलर्जी पैदा होती है। एलर्जी के लक्षणों में खुजली होना, त्वचा पर चकत्ते पड़ जाना, आँखों, होठ, चेहरे एवं गले में सूजन, साँस लेने में तकलीफ और धड़कनों का तेज होना शामिल है। कई बार ये लक्षण सामान्य होते हैं तो कई बार जानलेवा भी हो सकते हैं। इसलिये इन्हें नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। एलर्जी पैदा करने वाले तत्वों के प्रति हमारे रोग प्रतिरोधी तंत्र की प्रतिक्रिया का प्रभाव कुछ सेकेंड से लेकर 30 मिनट या फिर 6-8 घंटों में उभर सकता है।

भारत जैसे देश में खाद्य एलर्जी के खतरे की दस्तक और भी खतरनाक हो सकती है क्योंकि यहाँ न केवल तेजी से पश्चिमी जीवन शैली को अपनाया जा रहा है, बल्कि शहरीकरण और पलायन भी बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार किसी आहार के प्रति एलर्जिक रिएक्शन वयस्कों की अपेक्षा बच्चों में अधिक देखने को मिलते हैं।

फूड एलर्जी से सम्बन्धित जागरूकता के प्रसार, शोध एवं शिक्षा से जुड़ी अमेरिकी संस्था फूड एलर्जी रिसर्च एंड एजुकेशन (फेयर) के अनुसार 170 से भी अधिक ऐसे खाद्य पदार्थों की पहचान की गई है, जो एलर्जी पैदा कर सकते हैं। हालांकि फूड एलर्जी के 90 प्रतिशत मामलों के लिये दूध, अंडे, मूंगफली, कवचदार प्राणी, मछली, सोया, प्रिजर्वेटिव्स, फास्ट फूड और गेहूँ को ही एलर्जी पैदा करने वाले कुछ प्रमुख तत्वों को जिम्मेदार माना जाता है।

विभिन्न देशों का एलर्जी सम्बन्धी प्रोफाइल भी अलग-अलग है। भारत में मूंगफली को एलर्जी पैदा करने वाला आम खाद्य पदार्थ माना जाता है। इसके बाद चॉकलेट, मछली, नारियल और काजू एलर्जी पैदा करने वाले तत्वों में शुमार किए जाते हैं।

स्पेन, इटली और ग्रीस जैसे देशों में तरबूज, सेब और आड़ू से होने वाली एलर्जी आम है। नॉर्वे और आइसलैंड जैसे देशों में फलीदार खाद्य पदार्थों को मुख्य रूप से फूड एलर्जी के लिये जिम्मेदार माना जाता है। जबकि स्विजरलैंड को अजवाइन के कारण होने वाली एलर्जी के लिये जाना जाता है। हांगकांग में रॉयल जैली, घाना में अनन्नास, सिंगापुर में पक्षियों के घोंसले, जापान में कूटू और बांग्लादेश में कटहल एलर्जी के लिये सबसे ज्यादा बदनाम हैं।

भोजन से होने वाली एलर्जी के मामलों में सम्बन्धित खाद्य पदार्थ का उपयोग छोड़ देना ही बचाव का उपयुक्त जरिया माना जाता है। एलर्जी होने के उन छिपे हुए कारणों का भी पता लगाने का प्रयास करना चाहिए, जिनसे आप अनजान हैं। उदाहरण के लिये बेकरी उत्पादों को ले सकते हैं। आमतौर पर बेकरी में अंडों का इस्तेमाल होता है। यह संभव है कि आपको अंडों से एलर्जी हो। वैज्ञानिकों के अनुसार फसलों में किए जा रहे आनुवंशिक बदलाव, पशुओं को दी जाने वाली दवाएँ और प्रदूषित होती खाद्य श्रृंखला के कारण भी एलर्जी की समस्या हो सकती है। इसलिये कुछ खाने से पहले तय कर लें कि वह खाद्य पदार्थ आपके शरीर के लिये सही है या नहीं। एलर्जी का इलाज काफी लम्बा चलता है। इसलिये रोगी को धैर्यपूर्वक इलाज कराना चाहिए। डॉक्टर के परामर्श से दवाओं का सही व नियमित प्रयोग करना चाहिए।

विभिन्न प्रकार की एलर्जी की समस्याओं के लिये हमारी जीवन शैली और वातावरण प्रमुख रूप से जिम्मेदार माना जाता है। खान-पान की आदतों से लेकर रहन-सहन के तौर-तरीके, प्रदूषण, मौसम और पर्यावरणीय दशाएँ भी इसमें शामिल हो सकती हैं। इससे निपटने के लिये विस्तृत स्तर पर सर्वेक्षण जरूरी है ताकि एलर्जी पैदा करने वाले तत्वों के प्रभाव के बारे में व्यापक समझ पैदा हो सके।

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