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जलवायु परिवर्तन के कारक

Author: 
डॉ. दिनेश मणि
Source: 
आईसेक्ट विश्विद्यालय द्वारा अनुसृजन परियोजना के अन्तर्गत निर्मित पुस्तक जलवायु परिवर्तन - 2015

जलवायु परिवर्तन


अब समय आ गया है कि हम आँखें खोलें और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें। मानव को चारों दिशाओं से प्रयास करने की जरूरत है। वैसे इतने वर्षों से प्रकृति का जो अत्यधिक नुकसान हुआ है उसको पूरी तरह से पूर्ववत करना सम्भव नहीं है। अपितु उस दिशा में प्रयास करने से कम-से-कम प्रकृति के ऋण से मुक्ति अवश्य प्राप्त कर सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन किसी अचानक आई विपदा की भाँति प्रभावी न होकर धीरे-धीरे पृथ्वी और यहाँ रहने वाले जीवों के लिये प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अनेक समस्याओं को जन्म देती है। जलवायु परिवर्तन का आशय तापमान, बारिश, हवा नमी जैसे जलवायुवीय घटकों में दीर्घकाल के दौरान होने वाले परिवर्तनों से है। जलवायु परिवर्तन का तात्पर्य उन बदलावों से है जिन्हें हम लगातार अनुभव कर रहे हैं।

अब इस बात में कोई दो राय नहीं है कि जलवायु में बदलाव हो रहा है और मानवीय गतिविधियाँ इसका एक कारण हैं। आज उन संकेतों को झुठलाना सम्भव नहीं है जो हमारी पृथ्वी की बेचैनी को व्यक्त कर रहे हैं। आईपीसीसी (इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज) सहित अनेक वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्टों ने जलवायु परिवर्तन की पुष्टि की है। इस रिपोर्ट से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो चुकी है कि पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ता जा रहा है। सन 1961 तथा 1990 के बीच पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 14 डिग्री सेल्सियस था। वर्ष 1998 में यह 0.52 डिग्री सेल्सियस अधिक यानी 14.52 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। जलवायु बदलाव का वैश्विक संकट लगातार बढ़ रहा है।

निश्चित तौर पर हम पिछले किसी भी कालखण्ड की तुलना में एक बेहतर व भौतिकवादी दुनिया में रहते हैं लेकिन यह नई दुनिया हमें पर्यावरण के दोहन की कीमत पर मिली है। यह विडम्बना ही है कि जब मानव समाज विकसित नहीं था तब पर्यावरण प्रदूषित नहीं था और आज हम विकास की ओर कदम बढ़ा रहे हैं तो पर्यावरण भी दिनोंदिन प्रदूषित होता जा रहा है। इस समय विकसित देशों की चमक और उनकी उपभोक्तावादी दृष्टिकोण को अपनाने की होड़ में, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ने लगा है जिससे समस्त पर्यावरण प्रभावित हो रहा है। वास्तव में विकास बुरा नहीं लेकिन उसके हित अपनाए जाने वाला तरीका पर्यावरण हितैषी नहीं है। इसलिये मानव को प्रकृति के दोहन करने की नीतियों को बदलना होगा तभी वह जलवायु परिवर्तन की समस्या से उभर सकेगा।

जलवायु परिवर्तन के कारक:


पृथ्वी की जलवायु गतिशील है जो प्राकृतिक-चक्र के अनुसार सदैव बदलती रहती है। अर्थात जलवायु परिवर्तन एक प्राकृतिक क्रिया है, किन्तु मानवीय गतिविधियों द्वारा जलवायु परिवर्तन की दर में आई वृद्धि चिन्ता का विषय है। जलवायु में आये इन परिवर्तन के कारणों को दो भागों में बाँटा जा सकता है, पहला-प्राकृतिक और दूसरा- मानवीय गतिविधियाँ। प्राकृतिक कारणों से होने वाले जलवायु परिवर्तन से पर्यावरण प्रभावित होता है तथा मानवीय गतिविधियों द्वारा पर्यावरण प्रदूषित होने से जलवायु प्रभावित होती है। इस प्रकार जलवायु एवं पर्यावरण परस्पर एक दूसरे को प्रभावित करते हैं।

प्राकृतिक गतिविधियाँ यथा भूस्खलन, ज्वालामुखी विस्फोट, पृथ्वी का झुकाव, समुद्री तूफान, बाढ़, सूखा आदि से पर्यावरण प्रदूषित होता है तथा वनस्पति का विनाश होता है, जो कि जलवायु परिवर्तन का कारण बनता है।

मानवीय गतिविधियों में शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, वनोन्मूलन, खनिज खनन, जनसंख्या वृद्धि तथा निरन्तर बढ़ती जनसंख्या के कारण भरण-पोषण हेतु अधिकाधिक अन्न उपजाने के लिये रासायनिक कीटनाशकों एवं उर्वरकों का असीमित उपयोग आदि शामिल है।

अ. प्राकृतिक गतिविधियाँ:


1. महाद्वीपीय संवहन- सृष्टि के प्रारम्भ में सभी महाद्वीप एक ही बड़े धरातल के रूप में पृथ्वी पर विद्यमान थे, किन्तु सागरों के कारण धीरे-धीरे वे एक दूसरे से दूर होते गए और आज उनके अलग-अलग खण्ड बन गए हैं। महाद्वीपीय संवहन अर्थात महाद्वीपों का खिसकना अब भी जारी है जिसकी वजह से समुद्री धाराएँ तथा हवाएँ प्रभावित होती हैं और इनका सीधा प्रभाव पृथ्वी की जलवायु पर पड़ता है। हिमालय पर्वत की शृंखला प्रतिवर्ष एक मिलीमीटर की दर से ऊँची हो रही है, जिसका मुख्य कारण भारतीय उपखण्ड का धीरे-धीरे एशियाई महाद्वीप की ओर खिसकना माना जाता है।

2. ज्वालामुखी विस्फोट- ज्वालामुखी विस्फोट होने पर बड़ी मात्रा में विभिन्न गैसें जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, जलवाष्प आदि तथा धूलकण वायुमण्डल में उत्सर्जित होते हैं, जो कि वायुमण्डल की ऊपरी पर्त, समतापमण्डल में जाकर फैल जाते हैं तथा पृथ्वी पर आने वाले सूर्य प्रकाश की मात्रा घटा देते हैं। जिससे पृथ्वी का तापमान कम हो जाता है। एक अनुमान के अनुसार, प्रतिवर्ष लगभग 100 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड गैस ज्वालामुखी विस्फोट द्वारा वायुमण्डल में फैल जाती है। सन 1816 में इंग्लैण्ड, अमेरिका तथा पश्चिमी यूरापीय देशों में ग्रीष्म ऋतु में जो अचानक ठंड आई थी, जिसे ‘‘किलिंग समर फ्रास्ट’’ कहा गया, उसका कारण सन 1815 में इंडोनेशिया में हुए अनेक ज्वालामुखी विस्फोटों को माना जाता है।

3. पृथ्वी का झुकाव- पृथ्वी के झुकाव में बदलाव के कारण ऋतुओं मेें परिवर्तन होता है। अधिक झुकाव अर्थात अधिक गर्मी तथा अधिक सर्दी और कम झुकाव अर्थात कम गर्मी तथा कम सर्दी का मौसम। इस प्रकार पृथ्वी के झुकाव के कारण जलवायु प्रभावित होती है।

4. समुद्री धाराएँ- जलवायु को सन्तुलित रखने में सागरों का बड़ा योगदान रहता है। पृथ्वी के 71 प्रतिशत भाग में समुद्र व्याप्त है, जो कि वातावरण तथा जमीन की तुलना में दोगुना सूर्य का प्रकाश का अवशोषण करते हैं। सागरों को कार्बन डाइऑक्साइड का सबसे बड़ा सिंक कहा जाता है। वायुमण्डल की अपेक्षा 50 गुना अधिक कार्बन डाइऑक्साइड गैस समुद्र में होती है। समुद्री बहाव में बदलाव आने से जलवायु प्रभावित होती है।

ब. मानवीय गतिविधियाँ:


जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ रही है वैसे-वैसे प्राकृतिक तथा पर्यावरणीय संसाधनों पर अनावश्यक दबाव भी बढ़ता जा रहा है। आज विश्व की जनसंख्या 6 अरब से अधिक हो गई है, जिसका घातक प्रभाव प्राकृतिक पर्यावरण पर पड़ रहा है। प्रदूषण की मार झेलते-झेलते जल, वायु, भूमि जैसे प्राकृतिक संसाधनों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है और अगर भविष्य में इसी गति से प्रदूषण होता रहा तो इन संसाधनों को मृतप्राय होने में अधिक समय नहीं लगेगा। दुर्भाग्य से इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। भूमध्य सागर में इतनी अधिक गन्दगी घुल चुकी है कि उसने एक गन्दी झील का रूप ले लिया है। जब सागर जैसी विशाल जलराशि प्रदूषण की मार से नहीं बच पाई, तो छोटे तालाब, झीलों आदि की स्थिति क्या होगी?

1. शहरीकरण- उन्नीसवी सदी में हुई औद्योगिक क्रान्ति की ओर सभी का ध्यान आकर्षित हुआ। रोजगार पाने के लिए गाँवों में स्थित आबादी शहरों की तरफ प्रस्थान करने लगी और शहरों का आकार दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगा। मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली, चेन्नई जैसे महानगरों में उनकी क्षमता से कई गुना अधिक आबादी निवास कर रही है, जिससे शहरों के संसाधनों का असीमित दोहन हो रहा है। जैसे-जैसे शहर बढ़ रहे हैं, वहाँ पर उपलब्ध भू-भाग दिन-प्रतिदिन ऊँची-ऊँची इमारतों से ढँकता जा रहा है, जिससे उस स्थान की जल संवर्धन क्षमता कम हो रही है तथा बारिश के पानी से प्राप्त होने वाली शीतलता में भी कमी हो रही है, जिससे वहाँ के पर्यावरण तथा जलवायु पर निरन्तर प्रभाव पड़ रहा है।

2. औद्योगिकीकरण- जलवायु परिवर्तन में औद्योगिकीकरण की बड़ी भूमिका है। विभिन्न प्रकार की मिलें वातावरण में सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अनेक प्रकार की अन्य जहरीली गैसें और धूलकण हवा में छोड़ती हैं, जो वायुमण्डल में काफी वर्षों तक विद्यमान रहती है। यह ग्रीन हाउस प्रभाव, ओजोन परत का क्षरण तथा भूमण्डलीय तापमान में वृद्धि जैसी समस्याओं का कारण बनते हैं। वायु, जल एवं भूमि प्रदूषण भी औद्योगिकीकरण की ही देन हैं।

3. वनान्मूलन- निरन्तर बढ़ती हुई आबादी की निरन्तर बढ़ती हुई जरूरतों को पूरा करने के लिये वृक्ष काटे जा रहे हैं। रहने की जगह, खेती तथा लकड़ी और अन्य वन संसाधनों की चाह में वनों की अन्धाधुन्ध कटाई हो रही है, जिससे पृथ्वी का हरित क्षेत्र तेजी से घट रहा है और साथ ही जलवायु के परिवर्तन में तेजी आ रही है।

4. रासायनिक कीटनाशकों एवं उर्वरकों का प्रयोग- पिछले कुछ दशकों में रासायनिक उर्वरकों की माँग इतनी तेजी से बढ़ी है कि आज विश्व भर में 1000 से भी अधिक प्रकार की कीटनाशी उपलब्ध हैं। जैसे-जैसे इनका उपयोग बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे वायु, जल तथा भूमि में इनकी मात्रा भी बढ़ती जा रही है, जो कि पर्यावरण को निरन्तर प्रदूषित कर घातक स्थिति में पहुँचा रहे हैं।

5. अन्य मानवीय गतिविधियाँ- अन्य मानवीय गतिविधियों में आजकल परिवहन साधनों, विशेषकर वाहनों का योगदान वायु प्रदूषण बढ़ाने तथा जलवायु को भी प्रभावित करने में अधिक माना जा रहा है।

ज्वालामुखी विस्फोट तथा औद्योगिक इकाइयों, घरों, परिवहन साधनों आदि में प्रयुक्त होने वाले ईंधनों के जलने से विभिन्न प्रकार की गैसें तथा धूलकण वातावरण में उत्सर्जित होते हैं जिनसे अम्ल वर्षा, ओजोन परत का क्षरण तथा ग्रीन हाउस प्रभाव जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।

अम्ल वर्षा:


हवा में विभिन्न प्रकार की गैसों तथा वायुकणों की मात्रा बढ़ती जा रही है। एक सेंटीमीटर के दस-लाखवें भाग के समान व्यास वाले सूक्ष्म ठोस या द्रव कण को वायुकण (ऐरोसॉल) कहते हैं। एक अनुमान के अनुसार, वायुमण्डल में विद्यमान 90 प्रतिशत वायुकण प्राकृतिक गतिविधियों के कारण हैं तथा शेष 10 प्रतिशत वायुकण मानवजनित गतिविधियों द्वारा हैं, जिनमें गाड़ियों से उत्सर्जित धुआँ, मिलों की चिमनियाँ, कचरे का जलना इत्यादि आते हैं। पानी के साथ संयुक्त होकर इनसे सल्फ्यूरिक एसिड और नाइट्रिक एसिड बनते हैं। जब ये सब पानी के साथ नीचे पृथ्वी पर गिरते हैं तो उसी को अम्ल वर्षा कहते हैं जो सभी जीवित-अजीवित वस्तुओं को हानि पहुँचाते हैं।

अन्य संसाधनों जैसे जल, भूमि की तरह वायु दिखाई नहीं देती इसीलिये उसमें विद्यमान प्रदूषण भी दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि साँस लेते समय जो वायु हमारे शरीर में जाती है वह वस्तुतः एक धीमे जहर की तरह काम करती है। कुछ वायुकण सीधे मनुष्य के फेफड़ों तक अन्दर जाते हैं और साँस की बीमारी का कारण बनते हैं। वायु प्रदूषण का प्रभाव बच्चों तथा बूढे़ लोगों पर अधिक होता है।

ओजोन पर्त का क्षरण:


वायुमण्डल की ऊपरी सतह अर्थात समतापमण्डल में ओजोन गैस की परत है, जो सूर्य की पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकती है। इस परत में पराबैंगनी किरणों के कारण ओजोन (O3) के अणुओं का विघटन तथा ऑक्सीजन (O2) का निर्माण निरन्तर होता रहता है। ओजोन परत पराबैंगनी किरणों की अच्छी अवरोधक है। ये किरणें त्वचा कैंसर, मोतियाबिन्द और प्राणी, पौधों तथा फसलों में अन्य समस्याओं का कारण बनती हैं। मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न होने वाली विभिन्न प्रकार की गैसों के कारण ओजोन परत नष्ट हो रही है। समतापमण्डल में फैले हुए क्लोरो-फ्लोरो कार्बन ने अंटार्कटिका के ऊपर की ओजोन परत को 1960 की तुलना में 50-70 प्रतिशत तक कम कर दिया है, जिससे ओजोन छिद्र का निर्माण हुआ है। ऐसे ओजोन छिद्र ऑस्ट्रेलिया, आर्कटिक जैसी अन्य जगहों पर भी पाये गए हैं, जिनसे त्वचा कैंसर रोग बढ़ रहा है।

ग्रीन हाउस प्रभाव:


विभिन्न प्राकृतिक एवं मानवीय गतिविधियों के कारण कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन तथा अन्य हैलोजन जैसी गैसें वायुमण्डल की ऊपरी परत में फैल जाती हैं, जिसकी वजह से सूर्य की किरणें जो पृथ्वी से परावर्तित होती हैं, वे वातावरण की पर्त के बाहर नहीं निकल पातीं और लौटकर पृथ्वी पर ही आ जाती हैं जिससे पृथ्वी की सतह का तापमान बढ़ जाता है। इसी को ग्रीन हाउस प्रभाव कहते हैं और इसका निर्माण करने वाली गैसों को ग्रीन हाउस गैस कहते हैं।

इन गैसों के कारण पृथ्वी का तापमान दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। 1950 में पृथ्वी का औसत तापमान 13.8 डिग्री सेल्सियस था जो 1997 में 14.6 डिग्री सेल्सियस हो गया। 2090 तक इसके लगभग चार डिग्री सेल्सियस और बढ़ जाने का अनुमान है। इसके कारण जलवायु व्यवस्था में परिवर्तन होगा और ऋतु चक्र परिवर्तित हो जाएगा। सागर तट का जल-स्तर बढ़ जाएगा जिसके कारण कई देशों का बहुत बड़ा तटवर्ती भू-भाग जलमग्न हो जाएगा। प्रशांत महासागर में स्थित तुवालू और किरबाती जैसे द्वीप सन 2030 तक पूरी तरह जलमग्न हो जाने की आशंका है। 1990 में जो 21 बिलियन टन ग्रीन हाउस गैसें उत्सर्जित हुई थीं, उनमें 14 बिलियन टन विकसित राष्ट्रों से थीं। कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस जैसे विभिन्न प्रकार के ईंधन ऊर्जा उत्पादन हेतु प्रयोग किये जाते है। अकेले ऊर्जा क्षेत्र से लगभग 75 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड, 20 प्रतिशत मीथेन तथा बड़ी मात्रा में नाइट्रोजन के ऑक्साइड उत्सर्जित होते हैं। चावल के खेत, भराव की जगह, खनिज उत्खनन और पशुओं द्वारा की जानी वाली जुगाली से भी मीथेन गैस उत्सर्जित होती है। एक अध्ययन के अनुसार सन 1850 में कार्बन डाइऑक्साइड की वायुमण्डल में सान्द्रता 275 पीपीएम थी, जो वर्तमान में लगभग 370 पीपीएम हो गई है। वायुमण्डल को गर्म करने में अकेले कार्बन डाइआक्साइड का योगदान 60 प्रतिशत है।

इन सभी से यह ज्ञात होता है कि पृथ्वी की जलवायु में तीव्र गति से परिवर्तन आ रहा है जिसका प्रभाव मानव जीवन पर भी पड़ रहा है और पड़ता रहेगा। बहुत सी ऐसी बीमारियाँ हैं जो बदलती हुए जलवायु में हमें प्रदान की हैं। उतना अधिक इस जलवायु में बदलाव आ रहा है, जितना अधिक उसका सन्तुलन बिगड़ रहा है। उतनी ही अधिक नई-नई बीमारियाँ मनुष्य को सौगात में मिल रही हैं।

अब समय आ गया है कि हम आँखें खोलें और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें। मानव को चारों दिशाओं से प्रयास करने की जरूरत है। वैसे इतने वर्षों से प्रकृति का जो अत्यधिक नुकसान हुआ है उसको पूरी तरह से पूर्ववत करना सम्भव नहीं है। अपितु उस दिशा में प्रयास करने से कम-से-कम प्रकृति के ऋण से मुक्ति अवश्य प्राप्त कर सकते हैं। निम्न सुझाव इस प्रयास में सहायक सिद्ध हो सकते हैं:-

1. वनों की कटाई पर रोक
2. वनीकरण को बढ़ावा
3. भू-उपयोग प्रणाली में सुधार
4. जीवाश्म ईंधन का कम-से-कम प्रयोग
5. अपरम्परागत ऊर्जा स्रोतों के उपयोग को बढ़ावा
6. ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर रोक
7. जैव-उर्वरकों का अधिकतम उपयोग
8. प्लास्टिक की वस्तुओं का सीमित उपयोग
9. पुनः उपयोग में आ सकने वाले पदार्थों से बनी वस्तुओं का अधिक-से-अधिक उपयोग

उपरोक्त तथा इनके जैसे प्रयासों का प्रारम्भ दुनिया भर में हो चुका है। दिसम्बर 1997 में विकसित देशों ने क्योटो संधि को स्वीकार किया, जिसके अन्तर्गत उन सभी देशों का 2008 से 2012 तक, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को सन 1990 के स्तर से 5.2 प्रतिशत कम करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।

इन प्रयासों के साथ-साथ जनमानस में जागरुकता लाने की आवश्यकता है ताकि आने वाली पीढ़ियों को जब हम ये प्रकृति सौंपकर जाएँ, तो वायु उनके साँस लेने लायक हो, भूमि उनके रहने लायक और पानी उनके पीने लायक हो।

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