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समग्र विकास के साथ समृद्ध सांस्कृतिक विरासत संजोता ग्रामीण पर्यटन

Author: 
भुवन भास्कर
Source: 
कुरुक्षेत्र, दिसम्बर 2017

पर्यटन की यह नई शाखा, जिसे ग्रामीण पर्यटन कहते हैं, धीरे-धीरे अपना खास स्थान बना रही है। न केवल सरकारों के लिये, बल्कि निजी क्षेत्र के लिये भी। दरअसल ग्रामीण पर्यटन भले ही टूरिज्म सेक्टर की एक शाखा भर मालूम देता हो, लेकिन इसके फायदों को यदि बारीकी से समझा जाये, तो इसका असर कहीं ज्यादा व्यापक और गहरा होता है। ग्रामीण पर्यटन का फलक हिल स्टेशनों और धार्मिक व सांस्कृतिक महत्त्व के केन्द्रों के पर्यटन से कहीं ज्यादा जटिल, प्रभावकारी और व्यापक है। आइये देखते हैं कि ग्रामीण पर्यटन क्यों केवल आमदनी बढ़ाने के तौर पर ही नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक तौर पर भी समग्र विकास का एक प्रभावी माध्यम हो सकता है।

ग्रामीण पर्यटन ग्रामीण पर्यटन या रूरल टूरिज्म का दौर देश के लिये बहुत पुराना नहीं है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि अब यह तेज रफ्तार से बढ़ रहा है। पर्यटन एक उद्योग के तौर पर वैसे भी देश और विभिन्न राज्य सरकारों के लिये प्राथमिकता सूची में शीर्ष पर है क्योंकि इससे देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार के क्षेत्र में बड़ा योगदान हासिल होता है।

ग्रामीण पर्यटन दरअसल अपने आप में भी एक विस्तृत क्षेत्र है, जिसमें कई प्रकार का पर्यटन शामिल होता है। मोटे तौर पर इसके तहत दो तरह की गतिविधियाँ शामिल होती हैं, पहला फार्म टूरिज्म यानी वह सेटअप जिसमें पर्यटकों को खेती के तौर-तरीकों का अनुभव कराया जाता है और दूसरा, रूरल टूरिज्म यानी वह व्यवस्था जिसमें पर्यटक ग्रामीण जनजीवन को महसूस करते हैं। लेकिन इसके अन्दर भी कई सारे थीम हो सकते हैं। जैसे, हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में नग्गर गाँव महिला सशक्तीकरण के एक आदर्श पोस्टर के तौर पर चर्चित हुआ है, वहीं गुजरात के कच्छ में होडका गाँव को पर्यटन से आय बढ़ाने के एक मॉडल की पहचान मिली है। पंजाब में अमृतसर से दो घंटे की दूरी पर विकसित एक केन्द्र ग्रामीण पर्यटन का ऐसा स्वरूप पेश करता है, जहाँ पर्यटकों को ट्रैक्टर की सवारी से लेकर, हल चलाने और गाय का दूध दुहने तक का अनुभव समेटने का मौका मिलता है। तो जाहिर है कि ग्रामीण पर्यटन का फलक हिल स्टेशनों और धार्मिक व सांस्कृतिक महत्त्व के केन्द्रों के पर्यटन से कहीं ज्यादा जटिल, प्रभावकारी और व्यापक है। आइये देखते हैं कि ग्रामीण पर्यटन क्यों केवल आमदनी बढ़ाने के तौर पर ही नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक तौर पर भी समग्र विकास का एक प्रभावी माध्यम हो सकता है:

1. सामाजिक प्रभाव : ग्रामीण पर्यटन गाँव के लोगों को बाहरी दुनिया से जोड़ने का एक बहुत ही सरल और सशक्त माध्यम है। जब शहरी और विदेशी पर्यटक गाँवों में आते हैं, तब वे अपने साथ अलग-अलग सभ्यताओं, संस्कृतियों, सोच और नजरियों की छाप भी लेकर आते हैं। इनसे सम्पर्क में आने के कारण न केवल ग्रामीणों का सामाजिक-सांस्कृतिक दायरा फैलता है, बल्कि पर्यटक भी उस स्थान की लोकभाषा, लोक संस्कृति, रहन-सहन और सोच का प्रभाव अपने साथ लेकर लौटते हैं। किसी देश की सांस्कृतिक विरासत को फैलाने के लिये ग्रामीण पर्यटन से बेहतर कोई माध्यम नहीं हो सकता।

जब विदेशी पर्यटक किसी गाँव में पर्यटक के तौर पर जाते हैं और आरती के साथ लोकनृत्य के जरिये उनका स्वागत होता है, आग्रहपूर्वक उन्हें एक पंक्ति में बिठाकर खिलाया जाता है, तो उस अनुभव को वे विदेशी ताउम्र अपने मन में संजोकर हमेशा के लिये देश के सांस्कृतिक राजदूत का काम करते हैं। इसलिये ग्रामीण पर्यटन सोच और समझ को व्यापक बनाने में दोतरफा तौर पर काम करता है।

2. बुनियादी ढाँचागत विकास : जब हम ग्रामीण पर्यटन की बात करते हैं, तो दरअसल हम स्थान और परिवेश की बात करते हैं। क्योंकि इन दोनों के अलावा व्यवस्था और प्रबन्धन के लिहाज से ग्रामीण पर्यटन में शहरों की ही तरह पर्यटकों की सुविधा और सुख का ख्याल रखना होता है। इसके लिये ग्रामीण पर्यटन का केन्द्र बनाने वाले गाँव में एक स्वस्थ और सुविधा-युक्त जीवन के लिहाज से बुनियादी ढाँचा विकसित करना होता है। वहाँ तक पहुँचने के लिये अच्छी सड़कें तैयार करनी होती हैं। पीने का शुद्ध पानी और बिजली की सप्लाई सुनिश्चित करनी होती है। इन व्यवस्थाओं को तैयार करने के सिलसिले में न केवल पर्यटन का केन्द्र बनने वाला गाँव, बल्कि नजदीक के बड़े शहर से वहाँ तक के बीच में पड़ने वाले सारे भू-भाग को इसका फायदा होता है। अच्छी सड़कें बनने से वह इलाका शहरों से सीधे जुड़ता है और बिजली की आपूर्ति बेहतर होने से छोटे-छोटे कई उद्योग-धन्धे भी विकसित होते हैं।

3. आर्थिक प्रभाव : यह किसी भी पर्यटन का सबसे दृश्य प्रभाव है। ग्रामीण पर्यटन में इसका सीमान्त महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है क्योंकि वहाँ लोगों के पास आय को बढ़ाने के साधन सीमित होते हैं। यह प्रभाव सबसे अहम रोजगार के क्षेत्र में नजर आता है क्योंकि इसमें सेवा क्षेत्र से जुड़े कई रोजगार पैदा होते हैं। साथ ही ग्रामीण उद्यमियों के लिये कम निवेश में अपना कारोबार खड़ा करने का भी यह शानदार अवसर उपलब्ध कराता है। शहर से पर्यटन केन्द्र बने गाँव तक पर्यटकों को लाने-ले जाने के लिये ट्रांसपोर्ट नेटवर्क तैयार करने से लेकर उनके भोजन, निवास और मनोरंजन तक के प्रबन्ध में कई छोटे-बड़े ऐसे मौके खड़े होते हैं, जहाँ जुड़कर गाँववासी अपनी आमदनी में बढ़ोत्तरी कर सकते हैं। इनके अलावा, जहाँ बड़े निवेश की जरूरत होती है, वहाँ बाहर से भी पूँजी, नये आइडिया और नये व्यवसायी आते हैं, जिससे रोजगार के मौके पैदा होते हैं।

नये कारोबार और नये रोजगार के साथ ग्रामीण पर्यटन नई दक्षताएँ भी विकसित करता है। प्रशिक्षण और जागरुकता के कारण ग्रामीणों के बीच सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) और आतिथ्य (हॉस्पिटैलिटी) जैसी कुलीन क्षमताएँ भी पैदा करता है। इससे कुल मिलाकर वहाँ के समाज की योग्यता में बढ़ोत्तरी होती है और उसकी आजीविका का दायरा बढ़ता है। साथ ही पर्यटन-जनित रोजगार में महिलाओं की भूमिका पुरुषों के बराबर या कई जगहों पर कहीं ज्यादा होती है। इससे भी एक ओर तो महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ने से उनके सशक्तीकरण को काफी बल मिलता है, वहीं उन्हें सामाजिक सम्मान भी हासिल होता है।

4. सांस्कृतिक प्रभाव : पर्यटकों के लिये ग्रामीण पर्यटन का सबसे बड़ा आकर्षण गाँवपना होता है। गाँव में एक कुम्हार का काम देखने का इच्छुक पर्यटक मोटर से चल रही चक्की पर बन रहे बर्तनों के लिये शायद एक ढेला भी खर्च न करे। उसे लुभाने के लिये एक कुम्हार की कला का सजीव प्रदर्शन चाहिए। इसी तरह अलग-अलग क्षेत्रों की सांस्कृतिक विशेषता को जाहिर करने वाली वेशभूषा, केश-सज्जा, आभूषण इत्यादि जो अब धीरे-धीरे आधुनिकता की चमक में गँवारपन की निशानी करार देकर धीरे-धीरे लुप्तप्राय हो रहे थे, अब एकाएक सजीव होने लगे हैं। पूरा राजस्थान ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहाँ सांस्कृतिक विरासत की धरोहरों की उधड़ती परतों को पर्यटन की गोंद ने फिर से चिपकाया है और पर्यटकों की रुचियों ने जिन पर रंग-रोगन किया है। इस सांस्कृतिक संरक्षण का एक अभिन्न हिस्सा गाँववासियों में उनकी ऐतिहासिक विरासत को लेकर पैदा होने वाला गौरव-भाव है, जो पर्यटकों के लिये उनके ‘गाँवपन’ को और ज्यादा नैसर्गिक और आकर्षक बनाता है।

इनके अलावा पर्यावरण संरक्षण जैसे कुछ वे फायदे भी हैं, जो सीधे तौर पर कम दिखते हैं, लेकिन जिनकी अहमियत काफी है। गाँवों में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये प्राकृतिक माहौल कायम रखने की कोशिश की जाती है। हरियाली और पेड़-पौधों का संरक्षण किया जाता है और जंगल कायम कर पर्यटकों को प्रकृति से करीबी अनुभव कराया जाता है। ये सारी कोशिशें आखिरकार पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं।

अब एक नजर डालते हैं देश में मौजूद ग्रामीण पर्यटन के कुछ नामचीन केन्द्रों पर और ऊपर बात किये गये फायदों और असर को व्यावहारिक अर्थों में समझने की कोशिश करते हैं :

1. गुजरात के कच्छ के रण में ‘कच्छ एडवेंचर्स इंडिया’ ग्रामीण पर्यटन का एक शानदार नमूना है। साल में लगभग साढ़े तीन महीने तक चलने वाले ‘रण उत्सव’ के नाम से विख्यात इस पर्यटन मेले में देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को एक ही जगह गुजरात के तमाम कलाकारों की जीवन्त कलात्मकता देखने को मिल जाती है। दूर-दूर तक फैले श्वेत मरुस्थल के एक कोने पर बसे मिट्टी के घरों में रहने और तारों से भरी रात में साफ आसमान के नीचे चारपाई पर सोने का अनुभव यहाँ आने वाले पर्यटकों के दिल में गुजरात को हमेशा जिन्दा रखता है। खास बात यह है कि ये पूरा आयोजन होडका गाँव की ग्राम पर्यटन समिति द्वारा ही चलाया जाता है।

2. हिमाचल प्रदेश की स्पीति घाटी अपने यहाँ आने वाले पर्यटकों को बौद्ध मठों, विलेज ट्रेकिंग, याक सफारी, विलेज होमस्टे और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शानदार सौगात देती है। यहाँ के पर्यटन कार्यक्रमों का आयोजन करने वाला इकोस्फेयर स्पीति संगठन यहाँ के स्थानीय समुदायों के साथ काफी गहराई से जुड़ा है और उनके साथ मिलकर ही सारी व्यवस्था करता है। इससे न केवल पर्यटकों को हिमाचल और लद्दाख की एक समन्वित संस्कृति का अनूठा अनुभव होता है, बल्कि स्थानीय समुदायों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति में भी सकारात्मक बदलाव सम्भव हुआ है।

भारतीय मैंग्रोव 3. पश्चिम बंगाल में सुन्दरबन को यूनेस्को ने अन्तरराष्ट्रीय विरासत वाली जगह घोषित किया है। यह दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव जंगल है, जहाँ के बाघ अपने आकार और भव्यता के लिये खास जाने जाते हैं। सुंदरबन के भारतीय हिस्से में 102 द्वीप हैं, जिनमें से केवल आधे से कुछ ज्यादा ही आबाद हैं। यहाँ का ग्रामीण जीवन बहुत चुनौतीपूर्ण है क्योंकि यहाँ न तो पीने के पानी की उपलब्धता है, न बिजली, रोड और गाड़ियाँ हैं। लोग मिट्टी और फूस के बने घरों में रहते हैं और निरन्तर बाघों के हमले के साये में जीते हैं। सुंदरबन के ऐसे जंगलों में कई इको रिसॉर्ट हैं, जो स्थानीय समुदायों द्वारा चलाये जाते हैं। इस विशेष रिसॉर्ट में स्थानीय स्टाइल में बनी छह झोपड़ियाँ हैं, जो धान के खेतों से घिरी हैं। यहाँ रहने वाले पर्यटक ग्रामीण गतिविधियों में हिस्सा ले सकते हैं और देसी नावों में बैठकर पतले घुमावदार जलमार्गों में अद्भुत अनुभव ले सकते हैं।

4. ग्रामीण पर्यटन का किसी जगह की कला पर असर देखना हो, तो कांगड़ा घाटी के गुनेहर गाँव में देखा जा सकता है। हिमाचल प्रदेश के इस गाँव में जर्मन मूल के भारतीय कला प्रेमी फ्रैंक श्लिष्टमैन ने एक परियोजना की शुरुआत की थी, जिसने देखते-देखते इस भूले-बिसरे गाँव को एक प्रसिद्ध कला केन्द्र में बदल दिया। इस गाँव में आज एक आर्ट गैलरी, कारोबारियों के 70 पुराने घरों का जीर्णोद्धार कर बनाया गया इकोलॉजिकल बूटिक, गेस्ट हाउस और एक फ्यूजन रेस्टोरेंट है। यहाँ अक्सर कला समारोह आयोजित किये जाते हैं। इस गाँव में मूलतः गद्दी और बारा भंगाली जनजाति के लोग रहते हैं जो दरअसल भेड़ चराने वाली प्रजाति है। पर्यटकों को उनके बीच रहने और उनकी जीवनशैली देखने का मौका मिलता है।

5. जोधपुर से 40 मिनट की दूरी पर स्थित बिश्नोई गाँव ग्रामीण राजस्थान का वो बेहतरीन अनुभव पर्यटकों को देता है, जो वैसे महसूस कर पाना नामुमकिन है। बिश्नोई समाज इस हद तक प्रकृति प्रेमी है कि हिन्दू होने के बावजूद केवल पेड़ों के संरक्षण की दृष्टि से अपने मृतकों को जलाने की जगह दफनाना पसन्द करता है। यहाँ पाश्चात्य जीवनशैली की सुविधाओं से युक्त पारम्परिक निवास हैं जहाँ पर्यटकों को बुनकर समाज के साथ रहने और उनके जीवन को निकट से देखने का मौका मिलता है। यहाँ आने वाले पर्यटकों को राजस्थान का विख्यात आतिथ्य और घर में बना हुआ शानदार भोजन मिलता है। लोकनृत्य से उनका स्वागत होता है, बिश्नोई गाँव की जीप सफारी, ऊँट सफारी और विलेज ट्रेकिंग के अलावा पर्यटकों के लिये यहाँ खास अफीम उत्सव का भी आयोजन किया जाता है, जो यहाँ के ग्राम्य जीवन का सहज पारम्परिक हिस्सा है।

6. पंजाब में लुधियाना के निकट आयोजित होने वाला सालाना किला रायपुर खेल उत्सव पंजाबी लोक परम्पराओं और लोक-संस्कृति को समझने-जीने का एक अद्भुत अवसर देता है। 1933 से चल रहे उत्सव में ग्राम्य जीवन में शारीरिक शक्ति का महत्त्व दर्शाने वाली कई प्रतियोगिताएँ शामिल होती हैं, जैसे दाँतों से मोटरसाइकिल उठाना, बालों से ट्रैक्टर खींचना इत्यादि। बैलगाड़ी की दौड़ यहाँ का एक प्रमुख आकर्षण होता है और भांगड़ा सहित लोकगीतों की महफिल के साथ पंजाबी थाली का स्वाद पर्यटकों को भारतीय संस्कृति के एक समृद्ध स्वरूप का दर्शन करा जाता है।

7. पूर्वोत्तर भारत का जिक्र इस सन्दर्भ में खासतौर पर किया जा सकता है, जहाँ हाल ही में सरकारों ने इको टूरिज्म पर विशेष जोर देना शुरू किया है। सिक्किम सहित पूर्वोत्तर के राज्य शेष दुनिया के लोगों के लिये कमोबेश अनजाने और अछूते ही रहे हैं। यहाँ की स्थानीय जनजातियाँ पर्यटकों के लिये एक बिल्कुल ही अनछुए परिवेश, जीवनशैली और संस्कृति का दरवाजा खोलती हैं।

ग्रामीण पर्यटन के ऐसे ही व्यापक महत्त्व को समझते हुए न केवल भारत की केन्द्र और तमाम राज्य सरकारों ने हालिया वर्षों में ग्रामीण पर्यटन पर खास ध्यान देना शुरू किया है, बल्कि इसकी कारोबारी क्षमता ने निजी क्षेत्र को भी इस ओर आकर्षित किया है। वर्ष 2005 में शुरू हुए ग्रासरूट्स ने ग्रामीण भारत में आजीविका के 10 लाख मौके पैदा करने के लक्ष्य के साथ रूरल टूरिज्म को बढ़ावा देने का काम शुरू किया। तब से संस्था ने 3 राज्यों के 12 गाँवों में 500 परिवारों के साथ ग्रामीण पर्यटन कार्यक्रम शुरू किये हैं, जहाँ प्रकृति, खेती, ग्रामीण जीवनशैली, ग्रामीण खेल और कार्यशालाओं के माध्यम से पर्यटकों को एक बेहतरीन अनुभव दिया जाता है और बदले में ग्रामीणों के लिये रोजगार के अवसर पैदा किये जाते हैं।

लेखक परिचय


भुवन भास्कर
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और आर्थिक व कृषि मामलों के विशेषज्ञ हैं।
ई-मेल : bhaskarbhuwan@gmail.com

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