बूँदों की अड़जी-पड़जी

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बूँदों की मनुहार ‘पुस्तक’

झाबुआ जिले के आदिवासी बहुल गाँवों में भागीदारी से सार्वजनिक या सामुदायिक कार्य करने की परम्परा पुनर्जीवित हो रही है। इसका सुखद पहलू यह है कि इसके माध्यम से पानी बचाने का काम गति पकड़ रहा है। बरसों से लगभग भुला दी गयी आदिवासी समाज की एक अच्छी परम्परा रही है ‘अड़जी-पड़जी’। पारस्परिक सहयोग सहकार के पुरातन मूल्य पर आधारित इस परम्परा के तहत ग्रामीणजन खेती किसानी के काम-काज में श्रम का आदान-प्रदान किया करते थे। जैसे, किसी किसान के खेत में उसका पड़ोसी एक दिन मदद करता है तो दूसरे दिन उतने ही समय के लिये वह पहले दिन के श्रम के ऋण की भरपाई के लिये पहले किसान के खेत में काम करने जाता है। यह परम्परा वर्षों से आदिवासी समाज को एकजुट व मजबूत बनाये हुए थी। कालान्तर में रुपये का प्रादुर्भाव एक विनिमय शक्ति के रूप में हुआ तथा गाँव में यह परम्परा कमजोर होते हुये धीरे-धीरे लुप्त हो गई। परिणामतः आदिवासी हर छोटे-मोटे काम के लिये पैसों की जरूरत महसूस करने लगे तथा उनमें द्वेषपूर्ण स्पर्धा का भाव पैदा हो गया।

अड़जी-पड़जी लेकिन गत तीन-चार सालों से झाबुआ जिले के पेटलावद विकासखण्ड में इस परम्परा को पुनर्जीवित करने के प्रयास में पानी बचाने का काम बहुत मजबूती से आगे बढ़ रहा है। क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवी संस्था ‘सम्पर्क’ द्वारा अभिप्रेरित ग्राम समूह ‘अड़जी-पड़जी’ के माध्यम से एक-दूसरे की मदद कर अपने गाँव के तालाब को गहराकर वर्षा के पानी को संचित करने की मुहिम में पिछले वर्षों में बड़े उत्साह से शामिल हुये। ग्राम सुआपाट, सागड़िया, जूनाखेड़ा तथा देवली ऐसे ही गाँव हैं, जहाँ के निवासियों ने मिलकर गत दो वर्षों से सतत पड़ रहे सूखे की त्रासदी झेलकर खुद को बचाये रखने का यह मार्ग चुना। ग्रामीणों ने चौपाल पर बैठकें आयोजित कर यह तय किया कि वे प्रत्येक परिवार से एक या दो सदस्य तालाब पर पहुँचकर उसके गहरीकरण में जुटेंगे तथा तालाब से निकलने वाली मिट्टी को बारी-बारी से अपने-अपने खेत में डालेंगे। यह ‘अड़जी-पड़जी’ ग्रामीणों ने श्रम के विनिमय के रूप में अपनाई।

जबकि मिट्टी ढोने का कार्य उन्होंने अपने स्वयं के खर्च पर किया। इसमें किसानों को सीधे दो फायदे हुये प्रथम तो उनके गाँव के तालाब की जलग्रहण क्षमता में आशातीत वृद्धि हुई, दूसरा उनके खेतों में तालाब की मिट्टी पड़ने से खेतों की उपजाऊ क्षमता में बढ़ोत्तरी हुई। गत वर्षों में पेटलावद विकासखण्ड के लगभग 50 गाँवों में ‘अड़जी-पड़जी’। परम्परा पुनः प्रचलन में आई है तथा इनमें से अनेक गाँव में किसी-न-किसी रूप में पानी व मिट्टी बचाने का कार्य ‘अड़जी-पड़जी’ को केन्द्र में रखते हुए किया गया है।

इसके परिणामों की चर्चा करते हुए ग्राम जूनाखेड़ा निवासी मांगू अरड़ ने बताया कि गाँव में वर्षों पहले बनाये गये सरकारी तालाब में काफी गाद जमा होने के कारण उसकी जलग्रहण क्षमता लगभग आधी रह गई थी। यह सम्भव नहीं दिखाई पड़ता था कि इस तालाब की पूरी क्षमता का उपयोग गाँव वासी फिर कभी कर सकेंगे। परन्तु ‘अड़जी-पड़जी’ परम्परा को फिर से लागू करके हमने यह कर दिखाया। वस्तुतः पानी बचाने के साथ-साथ ग्रामीणजनों ने अपने खेत में मेड़बन्दी करके खेतों की उपजाऊ मिट्टी को भी बहने से रोका है। इस तरह ‘गाँव का पानी गाँव में, खेत की मिट्टी खेत में’ के शाश्वत वाक्य पर एकजुटता के साथ अमल भी किया है। ग्राम देवली के सरपंच मानसिंह भाभर बताते हैं कि गाँव के तालाब में गत वर्ष गाँव के 80 परिवारों ने मिलकर ‘अड़जी-पड़जी’ की परम्परा अपनाकर कार्य करते हुये तालाब की मिट्टी हटायी और उसे गहरा किया।

परिणामस्वरूप उसे छोटे तालाब में भी अब पूरे सालभर पानी उपलब्ध रहता है जो गर्मी के दिनों में आस-पास के तीन गाँव के मवेशियों के लिये पेयजल के उपयोग में लाया जा रहा है। ग्राम सुवापाट में ग्रामीणों ने अपने मवेशियों की पेयजल समस्या की मुक्ति के लिये इसी उपाय पर अमल किया। सुवापाट के 42 परिवारों ने मिलकर एक छोटी तलैया (जिसे गाँव के लोग तलावड़ी कहते हैं) का जीर्णोद्धार कर डाला। गाँव के इन लोगों ने तय किया कि सभी लोग बराबर श्रम करेंगे तथा एक-एक दिन उस तालाब की मिट्टी को अपने-अपने खेत में डालेंगे। ‘अड़जी-पड़जी’ परम्परा के इस प्रकार के इस्तेमाल से सुवापाट की लगभग लुप्तप्रायः तलैया की कायापलट हो गई तथा मध्य मई तक पानी उसमें रहने लगा। गाँव की महिला कार्यकर्ता शान्तिबाई के अनुसार यदि ‘अड़जी-पड़जी’ परम्परा अपनाकर हम लोग तालाब की मिट्टी नहीं निकालते तो हमारे मवेशियों को 5 किमी दूर पानी पिलाने के लिये ले जाना पड़ता। इसके अतिरिक्त गामड़ी, गरवाड़ा, भूरिघाटी, नवापाड़ा, कचराखदान एवं लालारुण्डी आदि 6 गाँवों में से प्रत्येक गाँव में एक-एक पाल संरचना का निर्माण आदिवासियों ने पारस्परिक सहयोग की इस परम्परा का उपयोग कर किया।

इसके पीछे आदिवासियों का मानना है कि एक-दूसरे की मदद करके ही भूगर्भीय जलस्तर को ऊपर उठाने में कुछ उल्लेखनीय कार्य किया जा सकता है। गत वर्ष पेटलावद विकासखण्ड के 15 गाँवों के 400 परिवारों ने मिलकर 400 कार्यदिवस की अड़जी-पड़जी कर अपने-अपने खेतों में मेड़बन्दी की। दरअसल, आदिवासियों के सामूहिक प्रयास जिन्हें उनकी सांस्कृतिक, सामाजिक परम्परा बल प्रदान कर रही है, इस क्षेत्र में उनके विकास के मार्ग प्रशस्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ‘अड़जी-पड़जी।’ परम्परा भी ऐसी ही सुपरम्परा हैं जिनके माध्यम से पानी बचाकर आदिवासी किन्हीं अर्थों में प्रकृति के साथ खुद की मदद भी कर रहे हैं।

नन्हीं बूँदें, नन्हें हाथ


कई तरह की मुसीबतों का सामना करने वाले झाबुआ जिले के आदिवासी समाज के बच्चों में आजकल कुछ नया कर गुजरने की लालसा जाग गई है। इसी लालसा से प्रेरित होकर ये बच्चे खेलने-कूदने की उम्र में बड़े लोगों की तरह सयानेपन का परिचय देते हुए डूंगर में पानी रोकने के महत्त्वपूर्ण कार्य में अपने स्तर पर जुट गये हैं। अंचल के विभिन्न गाँवों में पानी रोकने के काम में लगे ये सैकड़ों आदिवासी बच्चे दिनभर जंगल में मवेशी चराते हैं तथा शाम होते ही जल संरक्षण के कार्य में लग जाते हैं।

क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवी संस्था ‘सम्पर्क’ की रात्रिशालाओं में नवाचार पद्धति से रात के समय कुछ घण्टे पढ़ाई करने वाले ये कामकाजी बच्चे संस्था के पानी व मिट्टी जैसे प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के सन्देश पर अमल करते हुये अपने छोटे-छोटे हाथों से कंटूर ट्रेंच, नाला बन्धान, डोह एवं छोटे डग आउट जैसी वर्षाजल को रोकने वाली संरचनाएँ बना रहे हैं। अपने कार्य को सुचारु रूप से चलाने के लिये उन्होंने समय व कार्यनीति भी तयकर रखी है। शाम ढलते ही एक बच्चा ऊँचे टीले पर चढ़कर थाली या केतली (जो प्रायः चरवाहे बच्चों के पास होती है) विशेष ताल में बजाता है जिसे सुनकर सारे चरवाहे बच्चे निर्धारित स्थान पर एकत्र हो जाते हैं। आस-पास से छोटे-बड़े पत्थर उठाकर नाला बन्धान करते हैं। कई बार वे गैंती, तगारी, व फावड़े अपने घर से लाकर कंटूर ट्रेंच व खन्ती भी खोदते हैं। इस प्रकार बरसात के पानी को रोकने का अपने स्तर पर प्रबन्ध करने का उनका संकल्प कार्य रूप ले रहा है।

आदिवासी बच्चों की इस अनूठी तथा उत्साहपूर्ण पहल के पीछे भी रोचक बाते हैं। संस्था ने सूखे के संकट के कारण को जानने, समझने तथा इससे निपटने के उपायों के प्रति बच्चों को बचपन से ही संवेदनशील बनाने के उद्देश्य से एक कार्यशाला का आयोजन किया था। इसमें गाँव के बुजुर्गों ने पुराने जमाने में डग-डग पर पानी मिलने की बात कही थी। उनकी बातों का बच्चों के बाल मन पर काफी गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने प्रश्न किया कि क्या ऐसी स्थिति पुनः नहीं आ सकती? तब बुजुर्गों ने पानी रोकने की जरूरत के बारे में बताया। इसके बाद कुछ बच्चे संस्था के कार्यकर्ताओं के साथ राजस्थान के अलवर जिले के नीम गाँव भी गये थे जहाँ राष्ट्रीय जल सम्मेलन हुआ था। वहाँ भरपूर पानी देखकर बच्चों का मन पानी रोकने के लिये मचल उठा तथा अपने गाँव में वापस आकर इस काम में जुट गये। पेटलावद विकास खण्ड के माही नदी के किनारे बसे भगतिया, काचरोटिया, कास्याखाली, कालीघाटी, धान्य खण्डी, गरवाड़ा, मोच्चाघाटी, मातापाड़ा, चिछ खोदरा, कुंवारझर आदि 10 गाँवों में ये आदिवासी बच्चे अभी तक 4 कंटूर ट्रेन्च, 5 डग आउट,190 नाला बन्धान तथा 14 डोह बना चुके हैं। करीब 8 पंचायतों में चल रही इस मुहिम में वे सैकड़ों आदिवासी बच्चे संलग्न हैं, जो दिनभर गाय, बकरी चराते हैं।

ग्राम भगतिया निवासी 9 वर्षीय मोहन के अनुसार उनके ये छोटे-छोटे काम बड़े लोगों के लिये भी प्रेरणादायी होंगे। इन रात्रिशालाओं में बच्चों को लोकतंत्र की व्यावहारिक शिक्षा देने के लिये पंचायतों की तर्ज पर ‘पंचों’ का भी चुनाव हुआ है। सभी सत्रह शालाओं के पंचों ने मिलकर अपना एक जनपद अध्यक्ष भी चुना है। ग्राम गरवाड़ा निवासी 12 वर्षीय ‘मानसिंह’ जो बच्चों का ‘जनपद अध्यक्ष’ है, अपने साथियों द्वारा बनाये गये नाला बन्धान की ओर इशारा कर बताता है - “इससे पानी की चाल (गति) कम होगी और रुका हुआ पानी जमीन के पेट में उतरेगा। इससे हमारे कुएँ फिर जीवित हो सकेंगे।” इन छोटे-छोटे बच्चों का बड़ा संकल्प तथा उसे पूरा करने की इच्छा शक्ति सचमुच इनके काम को देखने वाले को अचम्भित कर देती है। प्रतिदिन सूरज ढलने से लेकर अंधेरा घिरने तक ये मेहनत करते हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि इसके लिये कोई इन्हें आदेशित नहीं करता। इनका उत्साह तथा पानी रुकने की कल्पना से पैदा हुई खुशी ही इनका पारिश्रमिक है। झाबुआ जिले के ठेठ डूंगर में पानी के प्रति बच्चों में पैदा हुआ यह लगाव सम्भवतः आने वाले वर्षों में सूखे के संकट से जूझने की शक्ति समाज को देगा ही। सम्भव यह भी है कि भविष्य में सूखा यहाँ से मुँह की खाकर लौटे।

देवास जिले के पानपाट से फतेहगढ़ तक की जलयात्रा के दौरान भी हमने बच्चों की अगुवाई देखी थी। जल यात्रा में झंडे, बैनर और बुजुर्ग महिलाओं के झोले सम्भालने का काम 15-20 बच्चों की टोली कर रही थी। पानपाट में तालाब बनाने के दौरान इन बच्चों ने लोगों को कार्यस्थल पर दोपहर का भोजन पहुँचाने की जिम्मेदारी ले रखी थी। गाँव में पानी रोकने की आयोजनाओं में ये बच्चे सबसे आगे बैठकर शिरकत करते रहे। पानपाट क्षेत्र में काम कर रही स्वयंसेवी संस्था विभावरी के सचिव सुनील चतुर्वेदी कहते हैं- ये करीब 20 बच्चे शुरू से ही हमारे साथ हो लिये हैं। यदि यह बाल सेना हमने अच्छी तरह से तैयार कर ली तो भविष्य में इन गाँवों को आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी। अनेक गाँवों में यह बात सामने आई कि कुछ प्रौढ़ लोग हर काम के लिये सरकार की ओर देखने की आदत से मजबूर हैं, जबकि नई पीढ़ी के लोग व्यवस्था पर आश्रित रहने के बजाय खुद ही कुछ करना चाहते हैं। यह बाल सेना भी यदि इसी संस्कार से सराबोर हो गई तो आदर्श गाँवों की कल्पना में ये बच्चे बड़े मददगार साबित होंगे। इन्हें इसी गाँव के लिये रोपित किया जा रहा है। तब हर गाँव में एक स्वयंसेवी संगठन स्थानीय स्तर पर ही तैयार हो जायेगा। हमें सुखद आश्चर्य है कि पानी आन्दोलन की शुरुआत के बाद इन बच्चों ने पाउच खाना छोड़ दिया है। इसके पूर्व एक बच्चा आठ से लेकर 15 पाउच एक दिन में साफ कर जाया करता था।

पानी, परम्पराएँ और समाज


बूँदों की मनुहार के प्रसंग में स्वयंसेवी संस्था ‘सम्पर्क’ के निदेशक श्री नीलेश देसाई से विस्तृत चर्चा के अंश - झाबुआ के आदिवासियों की सामाजिक एवं आर्थिक समस्याएँ भिन्न तरह की हैं। एक आदिवासी के लिये सबसे जरूरी दो वस्तुएँ हैं। एक तो उनके घर में साल नहीं तो कम-से-कम छह माह के लिये पर्याप्त अनाज हो तथा उसके मवेशी के लिये चारा हो। बाकी चीजें वह किसी तरह चला लेता है। सामान्यतः खाद्यान्न की समस्या तो कुछ हद तक खेती की उपज से हल हो जाती है परन्तु बीते कुछ वर्षों में खेती की लागत में बढ़ोत्तरी तथा अल्प वर्षा की वजह से खेती अब घाटे का सौदा हो गयी है। वनों का विनाश, भूमि कटाव, भूजल स्तर में निरन्तर गिरावट इन समस्त बातों से आदिवासियों का जीवन-यापन बहुत मुश्किल हो गया है।

यदि सामाजिक समस्याओं की बात करें तो हम पायेंगे कि आदिवासी समाज टूटन का शिकार हो गया है। सांस्कृतिक मूल्यों के ह्रास की वजह से असंगठित हुए आदिवासियों में समानता, सहकार और सादगी अब बीते समय की बात हो गई है। इनकी जगह आडम्बर तथा बाजार के दबाव में पैदा हुई कर्ज आधारित जीवन शैली गाँव में पनप गई है। अच्छी परम्पराओं का टूटना भी इस समाज की एक बड़ी समस्या है।

किसी भी सभ्यता के विकास में पानी का महत्त्वपूर्ण स्थान है। पानी का अभाव ग्रामीणों की विपन्नता का बड़ा कारण है। जहाँ पानी उपलब्ध हुआ (यह उपलब्धता हमें पर्यामित्र दृष्टिकोण से देखनी होगी) वहाँ किसानों ने प्रगति के प्रतिमान स्थापित किये हैं, पानी रोकना ही समस्या का निदान नहीं है बल्कि पानी रोककर उसके संरक्षण एवं सदुपयोग का एक लोकाधारित तंत्र विकसित करना होगा। तभी बूँदों के रुकने की सार्थकता सिद्ध हो सकेगी।

यह अच्छा है कि पानी रोकने का काम जटिल तकनीकी बन्धनों से मुक्त होकर आम आदमी की आकांक्षाओं के अनुरूप उसी के हाथों गति पकड़ रहा है। यह होना भी चाहिये। दरअसल, समाज को सूत्रधार बनाये बिना कोई आन्दोलन सफल नहीं हो सकता फिर भी अभी जमीनी स्तर पर इस दिशा में काफी काम करने की आवश्यकता है। जब तक लोग इसे अपना काम मानकर नहीं करते तब तक पूरे परिणामों के लिये प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। गाँव में इस चेतना को विस्तारित करने की बड़ी आवश्यकता है।

पानी बचाने के मामले में हमारा समाज वर्षों पहले अपनी परम्पराओं के बूते काफी समृद्ध था। सहभागिता एवं पारस्परिक सहकार के आधार पर पानी बचाना हमारे समाज का वह काम था-जिसका आधार थी परम्पराएँ। कालान्तर में वे परम्पराएँ समाप्त होती गई। और पानी बचाना सरकार की कार्यसूची में चला गया। फिर पानी की किल्लत धीरे-धीरे बढ़ने लगी। आज अगर पानी के काम में जो गति दिखाई पड़ रही है और सामाजिक स्तर पर इस काम की गम्भीरता को समझा जा रहा है इसलिये कि अब ज्यादातर लोग समझने लगे हैं कि बिना पानी बचाये आगामी पीढ़ियों को जीवित रख पाना कठिन हो जायेगा। इसके साथ ही ग्रामीण समाज भी इस दिशा में सक्रिय हुआ है। यह स्थिति आगे सुखद परिणाम देगी।

किसी भी कार्य में सरकार का मुँह ताकने की प्रवृत्ति समाज की बदहाली का एक बड़ा कारण है। यह सही है कि विकास कार्य करने का सरकार का दायित्व है, लेकिन सरकार पर पूर्ण तरह निर्भर रहना खतरनाक है। इस प्रवृत्ति से बचना चाहिये। लोकसहभागिता और खुद के दम पर गाँवों का विकास किया जाना ग्रामीणों के लिये अब जरूरी हो गया है। लोकाधारित विकास ही स्थायी होगा। सामाजिक न्याय विशेषकर गाँव में चौपाल के न्याय की पुनर्स्थापना, श्रमदान से चारागाह विकास, वन संरक्षण, ग्रामकोष जैसे क्षेत्रों में लोगों को आगे लाने का वातावरण बनाना चाहिये।

यदि समुचित जल प्रबन्धन गाँव में कर लिया जाये तो ग्रामीण समाज की विपन्नता को निश्चय ही दूर किया जा सकता है। क्योंकि पानी का संरक्षण एवं सहभागी प्रबन्धन ही गाँवों की खुशहाली का एकमात्र रास्ता हो सकता है। परन्तु साथ ही गाँव के समाज के लिये यह भी आवश्यक होगा कि हम एक आचार संहिता बनाकर उस पर अमल करें। सामाजिक सुपरम्पराओं के लिये पुनर्स्थापन का वातावरण बने तथा समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति को ऊपर उठाने के लिये साझा प्रयास किये जायें।

जलग्रहण क्षेत्र हमारे देवालय हैं। इनका महिमा मण्डन, देखभाल और रख-रखाव अत्यन्त आवश्यक है। यह काम साझा रूप में जिम्मेदारीपूर्वक समाज ही करें तो बेहतर होगा। इसके लिये हमें एक तंत्र विकसित करना पड़ेगा। इसके लिये हम जल बिरादरी बनाकर गाँव-गाँव इस चेतना की मुहिम को खड़ी करने के प्रयास में जुटे हैं।

झाबुआ जिले के आदिवासियों के साथ हमने अपने काम की जो शुरुआत की थी, वह पानी के पारस्परिक स्रोतों के विकास को लेकर थी। स्टॉपडैम का निर्माण, कुआँ मरम्मत, हैण्डपम्प खनन आदि। लेकिन हमने देखा कि केवल पानी बचाने भर से बात नहीं बनती है बल्कि ऐसे में समाज और भ्रमित हो जाता है। ग्राम पन्नास का उदाहरण हमारे सामने था जहाँ हमने सवा लाख रुपये लागत का स्टॉपडैम, सन 1988 में बनवाया। स्टॉपडैम बनने के बाद करीब 400 बीघा जमीन में सिंचाई करना सम्भव हो गया। लगभग 100 परिवारों ने अपने खेतों में इसके बाद खरीफ व रबी की दोनों फसलें भरपूर लीं। दो सालों में इस उपज से ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति में काफी बदलाव आया।

लेकिन इस बदलाव के कई नकारात्मक पहलू भी दिखाई पड़े। जैसे, पैसा हाथ में आने के बाद गाँव में वधुमूल्य में अचानक वृद्धि हो गई, लोगों ने शराब पीना शुरू कर दिया। लोगों के अनुत्पादक खर्चों में बहुत वृद्धि हो गई। कहने को उपज पन्नास में अधिक हुई, लेकिन सारा पैसा पास के कस्बे रायपुरिया के बाजार में चला गया। इस परिदृश्य से हमने यह जाना कि एकांगी समृद्धि घातक होती है। पानी बचाने के साथ-साथ स्वअनुशासन, संसाधनों के उपयोग का तार्किक निर्धारण तथा पारम्परिक मूल्यों का बचाव भी बहुत आवश्यक है। अब हम इस दिशा में ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं कि आदिवासी समाज अनावश्यक खर्चे बन्द करें। पुरातन सादगी की तरफ लौटे तथा अपनी अच्छी परम्पराओं को फिर जीवित करें तभी स्थायी विकास का सुफल मिल सकेगा।

 

बूँदों की मनुहार


(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

आदाब, गौतम

2

बूँदों का सरताज : भानपुरा

3

फुलजी बा की दूसरी लड़ाई

4

डेढ़ हजार में जिंदा नदी

5

बालोदा लक्खा का जिन्दा समाज

6

दसवीं पास ‘इंजीनियर’

7

हजारों आत्माओं का पुनर्जन्म

8

नेगड़िया की संत बूँदें

9

बूँद-बूँद में नर्मदे हर

10

आधी करोड़पति बूँदें

11

पानी के मन्दिर

12

घर-घर के आगे डॉक्टर

13

बूँदों की अड़जी-पड़जी

14

धन्यवाद, मवड़ी नाला

15

वह यादगार रसीद

16

पुनोबा : एक विश्वविद्यालय

17

बूँदों की रियासत

18

खुश हो गये खेत

18

लक्ष्य पूर्ति की हांडी के चावल

20

बूँदें, नर्मदा घाटी और विस्थापन

21

बूँदों का रुकना, गुल्लक का भरना

22

लिफ्ट से पहले

23

रुक जाओ, रेगिस्तान

24

जीवन दायिनी

25

सुरंगी रुत आई म्हारा देस

26

बूँदों की पूजा

 


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