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धूप की भीषण गर्मी और कंपकपाती नर्मदा

Author: 
चिन्मय मिश्र
Source: 
तहलका, 15 अक्टूबर, 2017

अन्याय की पराकाष्ठा कई बार पीड़ित के भीतर असाधारण साहस और प्रतिरोध (प्रतिशोध नहीं) का संचार कर देती है। यह बात हम अक्सर एक व्यक्ति या अधिकतम एक छोटे व्यक्ति समूह के सन्दर्भ में अनुकूल पाते हैं। परन्तु 16 सितम्बर की दोपहर नर्मदा घाटी के पश्चिम निमाड़ में छोटा बड़दा गाँव पहुँचे तो एहसास हुआ कि, नहीं एक पूरा समाज जिसमें हजारों परिवार हैं, में अन्याय के खिलाफ लड़ने की असीम ताकत और ऊर्जा समाहित हो गई है। उस दिन पानी 128 मीटर की सीमा पार कर गया था और कई गाँवों के तमाम घर सरदार सरोवर बाँध (जलाशय) की डूब में आने लगे थे। निसरपुर कस्बे की निचली बस्तियाँ डूबने लगी थी।

नर्मदा बांध के खिलाफ़ आदिवासियों की विशाल  पदयात्रा बिना व्यवस्थित विस्थापन के डूब क्षेत्र में जबरिया बेदखली के खिलाफ नर्मदा बचाओ आन्दोलन की नेत्री मेधा पाटकर और उनके साथ करीब 40 से अधिक कार्यकर्ता जल सत्याग्रह के लिये पानी में उतर गए। हम जब वहाँ पहुँचे तब उन्हें पानी में उतरे 24 घंटे से ज्यादा हो चुके थे। लगातार पानी में रहने से हाथ की हथेली और पैर के तलुओं की चमड़ी सफेद पड़ चुकी थी। कई लोगों के हाथों पैरों से खून रिसने लगा था। अधिकांश लोग लगातार दिन-रात पानी में रहने की वजह से ठंड से काँप रहे थे। निमाड़ की जानलेवा गर्मी में इस कंपकपाहट ठंडी को देखकर अंदर तक सिहरन पैदा हो रही थी। गौरतलब है कि निमाड़ में सामान्य तौर पर ठंड बहुत कम ही पड़ती है। पानी में बैठी महिलओं और पुरुषों के चेहरों पर निराशा नहीं थी। बाहर चिलचिलाती धूप में हजारों लोग तप रहे थे।

ऐसा लग रहा था कि जैसे हम लोग उत्साह के सागर में प्रवेश कर गए हों। हिम्मत करके पानी में उतरने के बाद कुछ देर बाद एहसास हुआ कि शरीर सिर्फ ठंडा ही नहीं हो रहा है, बल्कि छोटी-बड़ी मछलियाँ और अन्य जलीय जन्तु भी लगातार शरीर पर जुटे पड़े हैं। परन्तु इस सबसे जूझते हुए वहाँ डटे हुए थे। एकाएक गाँधी फिल्म का नमक सत्याग्रह वाला दृश्य याद हो आया जिसमें पुलिस पीटकर सत्याग्रहियों को अधमरा कर रही है और बिना प्रतिकार किए गिरने के लिये दूसरा जत्था आ जाता है। रायटर का पत्रकार समाचार भेजता है कि आज ब्रिटिश एम्पायर (साम्राज्य) हार गया और भारत आजाद हो गया। छोटा बड़दा के सत्याग्रह ने भी जतला दिया कि भारत सरकार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र व गुजरात की सरकारें हार चुकी हैं और सत्य व अहिंसा का मार्ग छोड़ झूठ व गलतबयानी का सहारा ले रही हैं।

एकाएक पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई भी याद आए। उन्होंने ही सरदार सरोवर बाँध के तकनीकी पक्ष व ऊँचाई में अपने प्रधानमंत्रित्व काल में गुजरात को प्राथमिकता दिलवाई थी। उन्होंने 1961 में पौंग बाँध के डूब क्षेत्र में एक आम सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था, “हमारा आपसे आग्रह है कि बाँध के बनते ही आप अपने घरों से निकल जाएँ। घर से निकल जाना ही आप लोगों के लिये बेहतर होगा। नहीं तो हम पानी छोड़ देंगे।” इस कथन के 56 वर्षों बाद हमारे 56 इंच सीने वाले प्रधानमंत्री और गुजरात के मुख्यमंत्री बाँध का पानी छोड़कर लोगों को नहीं डुबा रहे हैं, बल्कि इसके ठीक विपरीत जलाशय में जबरन पानी भर कर निमाड़ व महाराष्ट्र के 40 हजार से ज्यादा परिवारों के दो लाख से ज्यादा भारतीय परिवारों को नष्ट कर देना चाहते हैं। मगर लोग आत्मसमर्पण को तैयार नहीं हैं। वे इस मानव निर्मित प्रलय से अपने शरीर को हथियार बनाकर टक्कर ले रहे हैं। सवाल कब तक का नहीं है।

बल्कि असाधारण बात यह है कि वे आज भी नारा लगा रहे हैं, ‘सरकार चाहे जो करे, हाथ हमारा नहीं उठेगा।’ संघर्ष के 32 वर्षों की थका देने वाली यात्रा और दुनिया जिसे पराजय की संज्ञा दे रही है, उस समाज में आज भी अपने ऊपर इतना भरोसा है। उन्होंने नर्मदा घाटी में महात्मा गाँधी को पुनर्जीवित कर दिया है। ऐसा इसलिये कहा जा सकता है क्योंकि गाँधी महज एक व्यक्ति नहीं एक विचार है और नर्मदा घाटी ने सिद्ध कर दिया कि विचार को न तो कोई गोली से मार सकता है और न ही पानी में डुबोकर कोई उसे नष्ट कर सकता है।

गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान में भाजपा के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ सुरेश मेहता ने एक पर्चा जारी कर कहा कि मूल योजना में 1,79,200 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई की योजना थी। परन्तु 2012-13 तक मात्र 2,09,057 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र ही सिंचित हो पाया था। यानी कुल योजना का महज 11.67 प्रतिशत। 2017-18 व 2018-19 तक 3,30,160 हेक्टेयर का लक्ष्य है जो कि मात्र 18.42 फीसद बैठेगा। इतना ही नहीं अभी 42000 किलोमीटर नहरें बनाना बाकी है। ऐसा तब जबकि सरकार ने नहरों की लम्बाई 90,389 किलोमीटर से घटाकर 71,748 किलोमीटर कर दी है। यानी 18000 किलोमीटर की कमी। इतना ही प्रतिवर्ष 3,856 किलोमीटर नहरों का निर्माण प्रस्तावित है और इन पर प्रतिवर्ष 9,000 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। इस आधार पर अभी सरदार सरोवर परियोजना को पूरा होने में ग्यारह वर्ष और लगेंगे। इस परियोजना में अभी तक 56268 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। यानि यह परियोजना कुल 155268 करोड़ रुपये अर्थात मूल योजना से कुल 25 गुणा ज्यादा महँगी साबित हो रही है। हमने तो नहीं सुना कि पूरे विश्व में किसी परियोजना को पूरा होने के 11 वर्ष पहले ही लोकार्पित कर दिया गया हो।

अनुपम मिश्र ने अपने लेख, ‘नर्मदा घाटी : सचमुच कुछ घटिया विचार’ में लिखा है, “मध्य प्रदेश के सिंचाई सचिव रह चुके प्रशासक ने तत्कालीन प्रधानमंत्री (इंदिरा गाँधी) को पत्र लिखकर नर्मदा घाटी में बन रहे बड़े बाँधों सरदार सरोवर व नर्मदा सागर (अब इंदिरा सागर) की ओछी योजनाओं का ब्यौरा दिया है और बताया है कि इन बड़े बाँधों से होने वाले लाभ का जो दावा किया गया है वह पूरा होगा नहीं। इनके कारण उजड़ने वाले लोगों से जो वादा किया गया है वह निभाया नहीं जा सकेगा और कुल मिलाकर नुकसान इतना ज्यादा होगा कि 21वीं सदी के लिये तैयार की जा रही नर्मदा घाटी कहीं बीस हजार साल पीछे न धकेल दी जाये।” वास्तव में यही हुआ है और आगे भी शायद यह जारी रहेगा। पुनर्वास को लेकर लगातार गलतबयानी हो रही है। लाखों आदिवासियों, दलितों, किसानों के साथ घनघोर अन्याय हो रहा है। एक ही राष्ट्र में पुल, बाँध के एक ओर जश्न मनाया जा रहा है और दूसरी ओर मातम है। गुजरात में बाँध स्थल केवड़िया पर स्थानीय आदिवासी पिछले एक वर्ष से धरने पर बैठे हैं। पूरे गुजरात में किसान विरोध पर हैं क्योंकि उनके नाम पर अपने प्रिय उद्योगपतियों को लाखों लीटर पानी इसी बाँध से प्रतिदिन दिया जा रहा है।

हजारों बरस पहले यह घाटी ऐसी ही पानी के भंडार से उभरी होगी। एशिया का पहला किसान यहीं विकसित हुआ। किसी समय यहाँ धान की खेती के होने के प्रमाण मिलते हैं तो कभी शुतुरमुर्गों के विचरण के। अर्थात दो बिल्कुल विपरीत परिस्थितियों में यहाँ जीवन निर्बाध चलता रहा, परन्तु मानव निर्मित प्रलय ने तो नर्मदा में रहने वाले जलीय जीव जंतु और वनस्पतियों को भी नष्ट करना शुरू कर दिया है। इसके प्रमाण 500 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर जबलपुर व नरसिंहपुर से मिलना शुरू हो जाते हैं।

सरदार सरोवर बाँध के उद्घाटन समारोह में इसके शिलान्यासकर्ता तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू का उल्लेख न करके वर्तमान प्रधानमंत्री ने यह साफ दिखा दिया है कि भविष्य की राजनीति का स्वरूप वह कैसा बनाना चाहते हैं। जिद की राजनीति के भयावह परिणाम आखिर हम सबको भुगतने ही होंगे। परंतु दूसरी ओर भविष्य के संघर्ष का स्वरूप भी नर्मदा बचाओ आन्दोलन व नर्मदा घाटी ने मेधा पाटकर के नेतृत्व में स्पष्ट कर दिया है।

युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है, महज दूसरा दौर शुरू हुआ है। सरहदें अभी भी खुली हैं। देखना है घाटी के लोगों का कौन अपना साथ देगा।

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