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रासायनिक खादों के बढ़ते खतरे

Author: 
डॉ. अनिल प्रकाश जोशी
Source: 
दैनिक जागरण, 03 फरवरी, 2018

पिछले 50-60 सालों में जिंक, लौह, तांबा एवं मैग्नीशियम हमारी मिट्टी से खत्म से हो गये हैं। रासायनिक खादों के उत्पादन में ऊर्जा का जो अत्यधिक उपयोग होता है उसके भी दुष्परिणाम आने लगे हैं। अमोनिया खाद बनाने के लिये दुनिया की 5 फीसद जलाऊ गैस का उपयोग किया जाता है। चूँकि नाइट्रोजन खाद की माँग अधिक है इसलिये उसके उत्पादन से नाइट्रस ऑक्साइड कार्बन डाइऑक्साइड के बाद दूसरा बड़ा वायु प्रदूषण का कारण बन रहा है।

यह अच्छी बात है कि आम बजट में खेती-किसानी और गाँव-गरीबों की सुध ली गई, लेकिन इसी के साथ कृषि से जुड़ी कुछ अन्य समस्याओं का भी समाधान खोजने की जरूरत है। माना जाता है कि अंग्रेजी सत्ता के समय 1943 में बंगाल में पड़े अकाल ने देश में खेती की सूरत बदल दी थी। इस अकाल ने नीतिकारों को यह महसूस करा दिया था कि सबसे पहली प्राथमिकता, लोगों का पेट भरने की है। इसके बाद खेती की पैदावार बढ़ाने के रास्ते तलाशे गये। बाद में हरित क्रान्ति का आगाज हुआ। धीरे-धीरे बीजों से लेकर खेती के नये तौर-तरीके और खाद की खुराक को चुस्त करने की शुरुआत हुई। खेती-बाड़ी को लाभ का सौदा बनाकर देश को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश शुरू हुई। समय के साथ हम खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हुए, लेकिन इसके साथ-साथ एक असुरक्षा की भी शुरुआत हुई है। खाद्य सुरक्षा की तरफ तो हम बढ़े, पर भोजन की पूरी परिभाषा में खरे नहीं उतर पाये।

एक तरफ जहाँ भोजन में आवश्यक तत्वों की कमी हुई वहीं दूसरी तरफ खेती में ऐसे तत्वों का उपयोग बढ़ा जो शरीर के लिये घातक हैं। यह सब हुआ मिट्टी के मिजाज के कारण, जिसे हमने रसायनों से बीमार कर डाला। असल में खाद्य सुरक्षा की होड़ में हम सिर्फ उत्पादन की ही तरफ चिन्तित रहे। उसकी गुणवत्ता की तरफ ध्यान नहीं दे पाये। यह सब रसायनों के बड़े उद्योगों की शुरुआत के चलते हुआ। तीन परिस्थितियों ने इन उद्योगों के आगे हमने घुटने टेक दिये। पहला, पर्याप्त भोजन की आवश्यकता जो उच्च रसायनों के उपयोग से सम्भव थी। दूसरा, आकर्षक विज्ञापन जिन्होंने उत्पादन को आकर्षित किया और तीसरा, लम्बी-चौड़ी सब्सिडी।

आज देश में 57 बड़े, करीब इतने ही मझोले और 64 छोटे दर्जे के ऐसे उद्योग हैं जो खेती के रसायनों की आपूर्ति कर रहे हैं। लगभग हर वर्ष 121.10 लाख मीट्रिक टन रासायनिक खादों का उत्पादन अपने देश में होता है, जो दुनिया में तीसरे नम्बर पर है और बाजार में इनकी हिस्सेदारी 25 फीसद है। 1950-51 में देश में उर्वरक की खपत प्रति हेक्टेयर एक चौथाई से कम होती थी। आज स्थिति अलग है। खेती में नाइट्रोजन और फास्फोरस की अधिक आवश्यकता होती है। ये दोनों मुख्य उर्वरक हैं। आज हम करीब 121.10 लाख मीट्रिक टन नाइट्रोजन और 57 लाख मीट्रिक टन फास्फोरस पैदा करते हैं। इतनी मात्रा में रासायनिक खादों का प्रयोग पर्यावरणीय विषमताओं का भी कारक है। इन खादों का अधिकांश हिस्सा पानी के साथ या तो नदी-नालों के रास्ते समुद्र या फिर भूमिगत जल को प्रदूषित करता है।

अत्यधिक फास्फेट एक ऐसे बैक्टीरिया को जन्म देता है जो मानव शरीर के लिये हानिकारक होता है। इसी तरह अत्यधिक मात्रा में नाइट्रोजन के उपयोग से पानी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है जिससे जल पादप और जीवों पर प्रतिकूल असर पड़ता है। यही वजह है कि यूरोप और अमेरिका ने इनके उपयोग को नियंत्रित किया है। फास्फोरस खाद में कैडमियम होता है जो किडनी के लिये नुकसानदायक हैं। उसमें फ्लोराइड की भी अधिकता पाई जाती है, जो शरीर के लिये घातक है। पेट से लेकर दाँतों की बीमारी का एक कारण फ्लोराइड ही है।

यह भी पाया गया है कि फास्फेट का अधिक उपयोग मिट्टी में यूरेनियम-238 की मौजूदगी का कारण बन सकता है जो बाद में पानी-भोजन के साथ शरीर में भी पहुँच सकता है। रासायनिक खादों के लगातार अत्यधिक उपयोग से मिट्टी में अतिसूक्ष्म आवश्यक तत्वों की भी कमी आती है। पिछले 50-60 सालों में जिंक, लौह, तांबा एवं मैग्नीशियम हमारी मिट्टी से खत्म से हो गये हैं। रासायनिक खादों के उत्पादन में ऊर्जा का जो अत्यधिक उपयोग होता है उसके भी दुष्परिणाम आने लगे हैं। अमोनिया खाद बनाने के लिये दुनिया की 5 फीसद जलाऊ गैस का उपयोग किया जाता है। चूँकि नाइट्रोजन खाद की माँग अधिक है इसलिये उसके उत्पादन से नाइट्रस ऑक्साइड कार्बन डाइऑक्साइड के बाद दूसरा बड़ा वायु प्रदूषण का कारण बन रहा है। दूसरे देशों में खासतौर से यूरोप, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने इस दिशा में जरूरी कदम उठाने शुरू कर दिये हैं। वहाँ पानी-मिट्टी को उर्वरकों के प्रदूषण से बचाने के लिये कायदे-कानून बन चुके हैं। साथ ही खेती में उनके उपयोग पर नियंत्रण भी शुरू हो चुका है, पर अपने देश में नियंत्रण के अभाव में हालात गम्भीर हो रहे हैं।

हमारे यहाँ किसान को यह सिखाया जाता है कि अधिक पानी और खाद ही अच्छी फसल के कारक हैं। यही कारण है कि दोनों का ही सीमा से अधिक उपयोग हो रहा है। रासायनिक खादों का ज्यादा इस्तेमाल मिट्टी के उपयोगी तत्वों को खत्म करने का काम कर रहा है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो जल्द ही बड़े दुष्परिणाम सामने आयेंगे। सरकारों को मिट्टी की सेहत को बचाने के लिये जैविक खादों के उत्पादन को भी उद्योगों के दायरे में ले आना चाहिए। इन्हें भी सब्सिडी का लाभ दिया जाना चाहिये। इससे जैव खाद उद्योग को तो बढ़ावा मिलेगा ही, साथ ही पर्यावरण और भोजन, दोनों की सुरक्षा में बड़ा योगदान होगा। जैविक खाद उद्योग बड़े स्तर पर रोजगार भी पैदा करेंगे।

(लेखक पर्यावरणविद हैं)

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