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आदाब, गौतम!

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बूँदों की मनुहार ‘पुस्तक’

तपती दोपहरी में तीन ओर पहाड़ों से घिरे जंगल में हमारी आंखे नम हो गई हैं..... !

हम कभी पहाड़ तो कभी गौतम को देखते! बूंदों की हमसफर यात्रा का यह कथानक बूंदों से परे भी बहुत कुछ सुना रहा था। हमको लगता कि क्या हम बूंदों से भटक रहे हैं? लेकिन जब भी कभी पड़ाव मिलता तो बूंदों की महिमा हमारे सामने होती।

......और जब इन पहाड़ों, खेतों, गौतम व मांगलिया से विदा ली तो लगा कि पानी की बूंदों की रहस्यमयी शक्ति को कैसे पहचाना जाए। उसका ‘रासायनिक विश्लेषण’ कैसे किया जिसमें हमें तुलसीदासजी के दर्शन- “.....जासु कृपा सु दयाल.......!” के साक्षात दर्शन हुए। जिसमें इच्छा हुई कि यह कहानी जन-जन को सुनाई जाए। निराशाओं के घटाटोप अंघेरों को लाकर गौतम और खटावला की पहाड़ियों के जज्बाती रिश्तों के चरणों में पटक दिया जाए। आत्मविश्वास, संकल्प, तपस्या का सामाजिक चेहरा- जो यहां पंक्तिबद्ध खड़े दिख रहे हैं, इनसे हर उस शख्स को मिलाया जाए जो किसी कांटे की छोटी सी चुभन मात्र से पगडंडियों, मंजिलों को दूर से सलाम कर फिर अपने घर की ओर रूख कर लेते हैं........!

मूझे पूरा विश्वास है, आप हमारे साथ इस कथा यात्रा के हमसफर बनना चाहेंगे। लेकिन एक निवेदन भी है- आप भी बूंदों से निकलने वाले उस विराट प्रेरणा-पुंज को खोजिएगा- जिसमें जैसे शख्स भी पहाड़ लांघने लगते हैं।

चलिए, सफर शुरू करते हैं........! पश्चिमी मध्यप्रदेश का झाबुआ जिला लगातार दूसरे साल भी सूखे की विभीषिका से रूबरू हो रहा है। गर्म हवाओं के थपेड़े यहां की तरख्तविहीन पहाड़ियों से मिलकर आने के बाद अच्छों-अच्छों के हौसले पस्त कर देते हैं। ऐसी ही एक दोपहर हम झाबुआ जिले के थांदला ब्लाक के दूरस्थ गांव खटावला में खड़े हैं। जब हर गांव के साथ सूखा, पलायन, गरीबी, बेकारी जैसी सूर्खियां जुड़ी हैं, पानी के भंडार की बात तो दूर, पीने के पानी के लिए भी भारी मशक्कत करनी पड़ रही है, चारों ओर सूखा ही सूखा- ऐसे में हमारे सामने एक बड़ा नाला स्वच्छ पानी से लबालब मिले तो आश्चर्य तो होगा ही, लेकिन घोर आश्चर्य तो उस समय हुआ जब तीन-तीन, चार-चार फीट पर पानी की कुण्डियां भी मिलीं। किस्से यूं सुनने को मिले की इस सूखे में भी जब कोई आदवासी मकान बनाने के लिए नींव खोदता है तो उसमें भी यहां पानी निकल रहा है।

चार साल पहले यह गांव भी झाबुआ के अन्य गांवों की तरह पानी के घोर संकट से जूझ रहा था। अधिकांश किसान केवल खरीफ की फसल पर ही निर्भर थे। पलायन हर परिवार को खाए जा रहा था। भूपेंद्रसिंह गौतम कह रहे हैं- इस भारी गर्मी में आप जो इस स्टापडेम में पानी देख रहे हैं, यह सामने वाली पहाड़ी से रिस कर आ रहा है। सोचिए, कितना पानी हमने संग्रहित कर रखा है। जबकि दो साल से लगातार सूखा पड़ रहा है। इस पानी को यदि मोटर से पूरी तरह खाली कर दिया जाए तो 24 घंटों के बाद यह स्टापडेम फिर से लबालब भर जाएगा।

पहाड़ी पर खंतियां खोदकर पानी नीचे उतारा गया है। पहले यह पानी फालतू बहकर गांव से विदा हो जाया करता था। गांव में थमने के बाद इन बूंदों ने क्षेत्र की समाजार्थिक स्थिति को बदल कर रख दिया है।

गौतम ने हमारी मुलाकात गांव के मंगलिया भाई से कराई। मंगलिया भी अपने आप में एक कहानी हैं – चार साल पहले जब गौतम ने इस गांव में पानी आंदोलन की दस्तक दी तो यह शख्स चौबीसों घंटे शराह के नशे में धुत्त रहता था। वह गांव का ओपीनियन लीडर था। खटवला व आसपास के चार-पांच गांवों में इनका प्रभाव माना जाता था। हर वक्त नशे में धुत्त रहने वाले मांगलिया का आत्मविश्वास जागा। उसे लगा, बाहर के लोग मिलने आते हैं, पानी की बात करते हैं, तो उसने नशे से तौबा कर ली। इसके बाद पानी आंदोलन को जमीन पर उतारने की रणनीति बनाई गई।

आसपास पहाड़ियों यहां वाटरशेड की प्राकृतिक संरचनाएं बना रहीं हैं। पीछे के पहाड़ का आधा भाग खटावला में तो आधा गोरिया खदान में आता है। इसका फैला हुआ एक कोना काकनवानी में आता है। सामने वाले पहाड़ का भी एक हिस्सा खटावला में, जबकि पास वाला रोजिया में आता है। आगे जाकर यही पहाड़ी अलीपुरा और घोंसली तक फैली हुई है।

गौतम और मांगलिया सुनाते हैं- सबसे पहले हमने इन पहाड़ियों पर जाकर बरसात की बूंदों की मान-मनौवल की। इसके बाद गांव में पानी के दर्शन स्थायी हो गए। इस भीषण गर्मी में भी झिरी नाले के स्टापडेम में पानी की सतत् उपलब्धि इसका प्रमाण है। जमीन के लेबल पर गांव के कुओं में पानी भरा है। चार साल पहले गांव में केवल पांच ही कुंए थे। अब बढ़कर यह संख्या 20 तक जा पहुँची है। इन 15 कुओं की वृद्धि का सीधा मतलब है- ये 15 परिवार अब पलायन पर नहीं जा रहे हैं।

पानी आंदोलन के बाद गांव का कृषि परिदृश्य भी बदल गया। पहले केवल पांच कुंए ही थे। रबी की फसल के लिए एक-दो पानी लेने के बाद वे जवाब देने लग जाते। खटावला सहित आसपास के चार-पांच गांवों में रबी की फसल कुल क्षेत्रफल के मात्र 35 प्रतिशत हिस्से में ही होती थी, लेकिन अब 93 प्रतिशत क्षेत्र में रबी फसलें ली जा रही हैं। उद्यानिकी विकास के तहत गांव मे 20 बगीचे भी लगाए गए हैं। प्रयोग के तौर पर पहला बगीचा मंगलिया का ही था। यह बगीचा अब तक करीब 50 गांव के लोग आकर देख गए हैं और मंगलिया खुद भी बाहर जाकर लोगों के बीच बैठकें लेते हैं- पानी आंदोलन के बाद बदली स्थिति को दर्शाते हैं।

खटावला में कुछ कुण्डियां भी देखने को मिलीं। इसका पानी इतना स्वच्छ की सीधे ही पी लिया जाए। इन कुण्डियों को पत्थरों से ढंक दिया गया था। मंगलिया कह रहा था- हमारी मान्यता है कि यदि मवेशी इसे जूठा कर लेंगे तो गांव के पानी को नजर लग जाएगी। पानी को पवित्रता के साथ नहीं लेगे तो यह नाराज होकर वापस नीचे चला जाएगा। मंगलिया ने बताया कि इस तरह की कुण्डियों को हम चारों तरफ से खोदते हैं। भोग लगाकर पूजा-अर्चना और मान-मनौवल करते हैं। इसके बाद फिर उपयोग में लेते हैं।

पहाड़ी पर पानी रोकने के बाद के किस्से भी कम नहीं हैं। अनेक स्थानों पर पत्थरों को किसी अन्य काम से खिसकाने के बाद पहले थो़ड़ी नमी दिखती है। फिर थोड़ा पत्थर हटाने के बाद नमी बढ़ती जाती है। पांच-छह फीट खोदने के बाद तो यहां इस भीषण गर्मी में भी पानी की झिरी मिल रही है। यह सब देखकर हमें 1996 के दरमियान झाबुआ यात्रा की यादें ताजा होने लगीं। उस वक्त यहां पानी आंदोलन की जमीन तैयार की जा रही थी। तत्कालीन वन मंडलाधिकारी श्री एबी गुप्ता बार-बार कह रहे थे - ‘समाज थोड़ा सहयोग करे तो झाबुआ के इन पत्थरों से भरे पहाड़ों को हम पानी का पहाड़ बना सकते हैं।’ और सचमुच ये पहाड़ पानी के हो गए। पानी की बैंक बन गए। जब संकट आया धरातल पर बड़ा गड्ढा खोदा और इस ‘बैंक’ में जमा पानी रूपी ‘राशि’ निकाल ली। न कोई पास बुक न चेक पर साइन करने की झंझट और न किसी कैशियर की झुंझलाहट! मानों सभी भूमिकाओं में ‘समाज’ ही खड़ा है।

पहाड़ में पानी की यह कहानी काकनवानी व खटावला के बीच रास्ते पर भी देखने को मिली। सरपंच गंदालाल ने एक ऐसे स्थान पर खुदाई शुरू करवाई जहां पिछले साल एक छोटे से गड्ढे में पानी दिख रहा था। गांव वालों ने मिलकर श्रमदान किया। इसमें अच्छा पानी आ गया। यहां भी सामने एक पहा़ड़ी दिख रही है जिसमें कन्टूर ट्रेंच व बोल्डर चेक्स की मदद से पानी रोका गया था। पहाड़ की इसी रिसन से नाला जिंदा हो गया। सरपंच खुद पानी समिति के अध्यक्ष भी हैं। उन्हें प्रेरित किया गया कि गांव के विकास में उनकी दोहरी भूमिका है। यानी कोई कार्य पंचायत से तो कोई काम पानी समिति से करना है। श्रमदान से तैयार कुए में पानी आया तो इस समय पंचायत के पास राशि नहीं थी। लेकिन सरपंच गेंदालाल के माथे पर भी तो पानी आंदोलन का जुनून सवार था। उसने ग्राम कोष से 30 हजार रूपये का ऋण लेकर इस कुएं की दीवार का पक्का निर्माण कराया। पंचायत में किस्त आई तो यह राशि ग्राम कोष में वापस जम करा दी।

गौतम कहते हैं- पानी तो पर्याप्त गिरता है। मुख्य बात यह है कि हम उसे कितना रोक पाते हैं। हमने इन क्षेत्रों में पहाड़ों पर ‘उपचार’ किया। पानी को नीचे बहकर आने ही नहीं दिया। यह पहाड़ में ही जमा होता गया। जो हमें इन कुओं के रूप में मिल रहा है। इस साल जितना भी पानी गिरा, हम यदि उसे नालों में बहने से रोक देते तो आज सभी स्थानों पर सूखे में भी पानी की त्रासदी नहीं भोग रहे होते। मिसाल के तौर पर खटावला हमारे सामने है। पिछले साल तो झाबुआ में प्रभारी सचिव ने भोपाल से आकर जून में देखा था- भीषण गर्मी में भी यह स्टापडेम ओवरफ्लो हो रहा था। वे बोल पड़े थे- चमत्कार.....!!

हम जानते हैं, आपके जेहन में सवाल उठ रहा है कि यह गौतम कौन है।

दरअसल, गौतम का पूरा नाम भूपेंद्रसिंग गौतम है। ये मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले के कुंदेश्वर गांव से यहां झाबुआ के जंगलों में पानी की बूंदों को सहेजने का व्यापक पैमाने पर कार्य कर रहे हैं। आपकी देखरेख में 25-30 गांवों में आंदोलन का फैलाव हो रहा है। पानी के लिए समाज को जागृत करने की मंजिल हर वक्त आपके सामने रहती है. वैसे गौतम बनारस के मूल निवासी हैं, वहां समीप एक गांव में आपका पुश्तैनी मकान भी है। छतरपुर के कॉलेज से आपने प्राणी शास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल की है। इसके बाद चित्रकूट के ग्रामोदय विश्वविद्यालय से ग्रामीण विकास में भी स्नातकोत्तर उपाधि ली है।

हमने प्रश्न किया : ‘आप बनारस के घाट, संगम और झाबुआ में पानी की बूंदें रोकने तक के सफर को एक साथ किस रूप में देखते हैं?’

गौतम बोले : ‘बनारस की अपनी तो कोई महत्ता नहीं है। इसकी महत्ता तो गंगा के कारण है। यही स्थिति इलाहाबाद की भी है। कलकत्ता का नाम भी हुगली की वजह से ही है। जितने भी बड़े शहर बसे हैं, पानी के स्रोत के पास ही हैं। प्राचीन काल से ही यह माना गया है कि दो चीजों का होना बहुत आवश्यक है- उपजाऊ जमीन और पानी का स्रोत। क्योंकि इन्हें ‘इम्पोर्ट’ नहीं किया जा सकता।‘

बनारस की दूसरी महत्ता है – शंकरजी का स्थान! ऐसी मान्यता है कि जब गंगा धरती पर अवतरित हुई तो शंकरजी को चिंता हुई, वह सीधे पाताल में न चली जाए। यदि ऐसा हुआ तो पृथ्वीवासियों के काम में न आएंगी। शंकरजी ने गंगा को अपनी जटा में समा लिया। मानव की आवश्यकतानुसार उसे एक धारा के रूप में बाहर निकाला। जितनी जरूरत है उतनी ही उसे मिले, बरबाद न हो।

गौतम कह रहे थे : मेरे एक करीबी मित्र श्री गणेश बागड़िया जो समाजसेवी और प्रोफेसर हैं, ने चित्रकूट में समाजसेवा की पढ़ाई के दौरान कहा था कि वनवास के दौरान भगवान राम यहां पिकनिक मनाने नहीं आए थे। यहां हड्डियों का पहाड़ देखकर उन्होंने संतों से पूछा था- ‘यह क्या है?’ जवाब आया ‘यह उन लोगों की हड्डियां हैं, जिन्हें राक्षस मार कर खा गये थे।‘ तब राम ने संकल्प लिया कि ‘जब तक राक्षसों का नाश नहीं कर देते तब तक चैन से नहीं बैठेंगे।’ आदमी नहीं आए तो उन्होंने बंदरों को साथ लेकर ही अपने अभियान की शुरुआत कर डाली थी।’ समझिए, मैंने भी तभी समाज के लिए चुनौती भरा काम करने का संकल्प ले लिया था।

............और यह शख्स जब बनारस, टीकमगढ़ चित्रकूट का सफर तय करता हुआ झाबुआ के डुंगरों पर पानी रोकने के महाभियान का क्षेत्रीय नायक बना तब उसने पहला काम किसी तपस्या जैसा ही किया। गौतम ने एक तरह से अपने आप को टेस्ट भी कर लिया। मेघनगर के मदराणी गांव में एक झोपड़ी में नौ माह तक रहे। आदिवासी परिवारों के बीच उठते-बैठते। उनकी सामाजिक-आर्थिक दशा को गहराई के साथ समझा। इसी दौरान पानी आंदोलन की रणनीति भी तैयार की। ख्यात सर्वोदयी समाजसेवी श्री रामजी भाई को भी एक माह के लिए मदराणी गांव लेकर आए। गौतम का दर्शन है : पानी आंदोलन की व्यापक पैठ के लिए यह जरूरी है कि ग्रामीण आपको ‘स्पेशल इफेक्ट्स’ के साथ नहीं देखे। जब तक वह ऐसा नहीं कर रहा है, समझिए आप सफल नहीं हो सकते हैं।

प्रिय गौतमजी,


बूंदों की हमसफर यात्रा के दौरान थांदला के जंगलों और दूरदराज के गांवों में आपसे मुलाकात यादगार रही। जब चर्चा कर रहे थे, मैं कभी पहड़ी तो कभी आपको देख रहा था। झिरी माता के नालों का पानी और लबालब कुंए, सूखे और भीषण गर्मी में आपके प्रयासों की दास्तान सुना रहे थे। मैं बार-बार भटक रहा था। कभी मुझे तुलसीदासजी की चौपाई याद आ रही थी- “पंगु चढ़ई गिरिवर गहन, जासु कृपा सु दयाल.....”! तो कभी यह सोच रहा था- ईश्वर की कृपा और बूंदों का आकर्षण क्या एक तराजू में रखने की स्थिति में है। बशर्ते किसी ने दोनों को समझने की कोशिश की हो। आपको चलने में दिक्कत है लेकिन आप जिस तेज गति से पठारों-टेकरियों को पार कर रहे थे, वह हमारे लिए प्रेरणा के सूर्य से कम नहीं था। बूंदों के देवत्व और तेजस्व की भांति आपके भीतर भी संकल्प के बड़े पर्वत मजबूती पा चुके हैं। सही है, फिर कन्टूर ट्रेंच और बोल्डर चेक्स के लिए इन पर्वतों को लांघना कौन सी बड़ी बात है।........और वर्षों से दबे सागवान के वृक्ष भी आखिर क्यों नहीं आप जैसे व्यक्ति को देखने सीना तानकर जमीन से बाहर आएंगे! पानी के लिए इतिहास पुरुषों के बजाय आप जैसे लोगों के किस्से घर-घर सुनाए जाने चाहिए। उस समाज के सामने जो बूंदों को सहेजना किसी सरकारी काम का हिस्सा भर ही समझता है।

ठीक वैसा ही हम आज झाबुआ जिले में देख रहे हैं।

..........इन पहाड़ियों को मान लें कि ये शंकरजी की जटाएं हैं। बरसात की बूंदों के रूप में मानो गंगा अवतरित हो रही हैं। इन पर्वतों को पवित्र मानकर बूंदों रूपी गंगा को हम इनके समाने का जतन करें। यहीं जब रिसन के रूप में हमें कुओं, तालाबों, नदी, नालों से मिले तो हम इनका उपयोग करें। हमें अब इन्हीं ‘गंगा’ की मनुहार करनी है।

-आपके जेहने में यह सवाल भी गाहे-बगाहे उठ रहा होगा कि शुरुआत में यह क्यों लिखा कि हमारी आंखे नम हो रही थीं?

बहुत ही विनम्रता के साथ हम आपको बता रहे हैं कि थांदला वे मेघनगर के 25-30 गांवों में पानी आंदोलन का फैलाव करने वाला यह समाजसेवी विकलांग है।.......चलने में इन्हें दिक्कत होती है। पानी बचाने के अभियान के इनके किस्से सुनते हम कई बार अवाक् रह गए हैं!

गौतम से जब विकलांगता औऱ समजासेवा के तारतम्य पर चर्चा की तो वे बोले : मेरे पिताजी अस्पताल में बाबू रहे। परिवार के छः सदस्यों में से चार विकलांग हैं। पिता, भाई, बहन और स्वयं। शारीरिक कमी के कारण..............गौतम जी, उस समय यही तो सब सोच रहे थे। सूखे में नमी की तरह हमारी आंखे भी नम हो रहीं थीं............। इन प्रतिकूलताओं में भी आपने समाजसेवा का यह रास्ता चुना- तब आदिवासी समाज भी क्यों नहीं आपके इशारों पर पानी रोकने के लिए आएगा।

पानी आंदोलन में आप जैसी अनुकरणीय मिसाल को हमारा आदाब...........!!

कभी मुलाकात हो न हो! लेकिन जब-जब कोई घास का तिनका किसी शोख और चंचल बूंदों से रुकने की मनुहार करेगा तब-तब आप याद आओगे!

...........फिर..........आदाब...............!!

 

बूँदों की मनुहार


(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

आदाब, गौतम

2

बूँदों का सरताज : भानपुरा

3

फुलजी बा की दूसरी लड़ाई

4

डेढ़ हजार में जिंदा नदी

5

बालोदा लक्खा का जिन्दा समाज

6

दसवीं पास ‘इंजीनियर’

7

हजारों आत्माओं का पुनर्जन्म

8

नेगड़िया की संत बूँदें

9

बूँद-बूँद में नर्मदे हर

10

आधी करोड़पति बूँदें

11

पानी के मन्दिर

12

घर-घर के आगे डॉक्टर

13

बूँदों की अड़जी-पड़जी

14

धन्यवाद, मवड़ी नाला

15

वह यादगार रसीद

16

पुनोबा : एक विश्वविद्यालय

17

बूँदों की रियासत

18

खुश हो गये खेत

18

लक्ष्य पूर्ति की हांडी के चावल

20

बूँदें, नर्मदा घाटी और विस्थापन

21

बूँदों का रुकना, गुल्लक का भरना

22

लिफ्ट से पहले

23

रुक जाओ, रेगिस्तान

24

जीवन दायिनी

25

सुरंगी रुत आई म्हारा देस

26

बूँदों की पूजा

 


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