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नर्मदा पर निर्माणाधीन महेश्वर बांध पर परियोजनाकार को कारण बताओ नोटिस जारी

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NBA, MOEF

उपयुक्त पुनर्वास न होने के कारण जब महेश्वर बांध परियोजना के सैकड़ो प्रभावितों ने नई दिल्ली में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के समक्ष अचानक धरना दिया तो केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश ने महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए पर्यावरण मंत्रालय के अधिनियम 5 के तहत परियोजनाकार को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। बांध से प्रभावित गांववासी सालों से यह कहते रहे हैं कि उनका पुनर्वास उस गति से नहीं हो पा रहा है जिस गति से बांध का निर्माण हो रहा है। जबकि पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा परियोजना को दी गई सशर्त मंजूरी में यह कहा गया है कि बांध का निर्माण और पुनर्वास साथ-साथ होने चाहिए।

नर्मदा घाटी से करीब आठ सौ गांववासियों ने नर्मदा बचाओ आंदोलन के नेतृत्व में दिल्ली पहुंचकर पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के समक्ष धरना दिया। धरने में गांववासियों ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से मांग की कि महेश्वर बांध के काम को तत्काल रोका जाए क्योंकि हजारों विस्थापितों का अभी तक पुनर्वास नहीं हो सका है। विस्थापितों ने कहा कि यदि पर्यावरण एवं वन मंत्रालय महेश्वर बांध को दी गई मंजूरी के शर्तो को पालन कराने में और बांध के काम को रोकने में नाकाम रहती है तो, गांववासी इसके खिलाफ मार्च महीने के मध्य में राजधानी में अनिश्चितकालीन धरना देने को बाध्य होंगे। धरने के दौरान प्रभावितों के एक प्रतिनिधिमंडल ने पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश से मिलकर उन्हें अवगत कराया कि महेश्वर बांध के पुनर्वास की योजना आज नहीं बनी है। जबकि बांध के कार्य के मुकाबले पुनर्वास का काम बहुत पीछे छूट चुका है।

प्रतिनिधिमंडल की मांगों पर विचार करते हुए जयराम रमेश ने प्रभावितों को आश्वस्त किया कि वे स्वयं इस मामले में तत्काल नोटिस लेंगे। साथ ही उन्होंने 16 फरवरी का शाम को ही परियोजनाकारों को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया। परियोजनाकारों को 15 दिन का कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए कहा गया है कि यदि वे मंत्रालय के निर्धारित शर्तों का पालन करने में नाकाम रहते हैं तो क्यों न परियोजना के काम को रोक दिया जाय। मंत्री ने भी माना कि पुनर्वास एवं निर्माण कार्य साथ-साथ चलने चाहिए।

महेश्वर बांध नर्मदा घाटी में बनाये जा रहे बड़े बांधों में से एक है, जिससे क्षेत्र के करीब 50,000 से 70,000 किसानों, मछुआरों, मल्लाहों एवं भूमिहीन कामगारों के 61 गांव के आवास एवं जमीन में डूब जाएंगे। सन 1992 में इस परियोजना का निजीकरण करके एस. कुमार्स समूह को सौंप दिया गया था। इस परियोजना की निर्धारित उत्पादन क्षमता 400 मेगावाट होगी। इस परियोजना को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा पहली बार 1994 में और फिर उसके बाद सन 2001 में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 के तहत शर्तों के आधार पर मंजूरी दी गई थी। जिसके तहत राज्य सरकार एवं एस कुमार्स कंपनी गांववासियों के पुनर्वास करने एवं प्रभावित परिवारों को कम से कम दो हेक्टेयर जमीन, पुनर्वास स्थल एवं अन्य लाभ उपलब्ध कराने को बाध्य है। मंजूरी के शर्तों के अनुसार दिसंबर 2001 तक खेती की जमीनों सहित पुनर्वास की पूरी योजना प्रस्तुत हो जानी चाहिए, और पुनर्वास उपायों का क्रियान्वयन उसी गति से होना चाहिए जिस गति से बांध का निर्माण हो रहा हो। जबकि, उन शर्तों का खुला उल्लंघन करते हुए आज तक पुनर्वास की योजना प्रस्तुत ही नहीं की गई है। यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि परियोजनाकारों ने आज तक पुनर्वास नीति के अनुरूप एक भी गांववासी को खेती की जमीन नहीं उपलब्ध करायी है। इसके बजाय परियोजना प्रवर्तक अवैध रूप से डूब क्षेत्र में सीधी जमीन खरीद रहे हैं और विस्थापितों को पुनर्वास नीति के अनुरूप पुनर्वास लाभों से वंचित करने के लिए दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने को बाध्य कर रहे हैं। यह प्रक्रिया उच्च न्यायालय के आदेश के बाद मई 2009 में रोक दी गई, जिसे अदालत ने असंवैधानिक ठहराया था।

यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि परियोजनाकारों द्वारा डूब की वास्तविक स्थिति को भी कम करके बताया जा रहा है। परियोजना के तकनीकी आर्थिकी मंजूरी एवं नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार 1435 हेक्टेयर जमीन डूब में आयेगी, जबकि परियोजनाकर सिर्फ 873 हेक्टेयर जमीन को ही डूब में बता रहे हैं। परियोजनाकार बैक-वाटर सर्वेक्षण भी उपलब्ध कराने से इनकार कर रहे हैं। इस तरह वास्तव में कितनी आबादी प्रभावित हो रही है और उनके लिए कितनी रकम और जमीन की जरूरत है वह भी आज तक मालूम नहीं है। इस तरह, परियोजना की वित्तीय आवश्यकता की पूर्ति एवं करीब 80 फीसदी काम पूर्ण हो गया है, जबकि आज तक केवल 3 फीसदी विस्थापितों का ही पुनर्वास हो सका है।

प्रभावित क्षेत्र की वास्तविक स्थिति को देखते हुए 29 अक्तूबर 2009 को केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को यह कहते हुए पत्र लिखा था कि पुनर्वास का कार्य अभी शुरूआती स्थिति में है, लेकिन बांध का काम करीब 80-90 फीसदी पूरा हो चुका है। इस तरह मंत्रालय को इस बात की चिंता है कि निजी कंपनी श्री महेश्वर हाइडिल पॉवर कॉरपोरेशन विस्थापितों को मझधार में छोड़ते हुए पुनर्वास की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएगी। इस तरह पर्यावारण मंत्रालय के शर्तों के उल्लंघन के कारण मंत्रालय ने पुनर्वास योजना प्रस्तुत करने एवं पुनर्वास कार्य बांध के निर्माण के गति के अनुरूप होने तक बांध को के निर्माण को रोकने का प्रस्ताव किया। राज्य के मुख्यमंत्री ने मंत्रालय को दिये जवाब में माना कि पुनर्वास का काम सिर्फ 3 फीसदी ही हो पाया है। अभी हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गठित निगरानी समिति ने क्षेत्र का दौरा करके स्पष्ट किया था कि पुनवार्स कार्य काफी पीछे चल रहा है और आवश्यक पुनर्वास योजना प्रस्तुत नहीं किया गया है।

यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि महेश्वर परियोजना को तकनीकी-आर्थिकी मंजूरी के अंतर्गत परियोजना की लागत 1673 करोड़ रुपये आंकी गई थी, जो कि अब बढ़कर 2800 करोड़ रुपये हो गई है। इस तरह बिजली की कीमत निश्चित रूप से काफी ज्यादा आयेगी, जिससे मध्य प्रदेश के लोगों को बिल्कुल फायदा नहीं होगा। जबकि एस कुमार्स के साथ किये गये बिजली खरीद समझौते के अनुसार मध्य प्रदेश सरकार अगले 35 सालों तक इस महंगी बिजली खरीदने को बाध्य होगी।

नर्मदा बचाओ आंदोलन की मांग है कि राज्य एवं केन्द्र सरकार यह सुनिश्चित करें कि यह परियोजना लागों के हित में हो, और यह भी मांग है कि जब तक पुनर्वास कार्य पूरा न हो जाय तब तक पर्यावरणीय मंजूरी के कानूनी शर्तों का पालन करते हुए महेश्वर बांध के काम को तत्काल रोका जाए।

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