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याद रखें इन जलस्रोतों को

Author: 
राकेश दीवान

पहले हम कोइतुरों को जानें


महाकौशल में पानी के स्रोतों तथा सार्वजनिक हित के निर्माण कार्यों को बनवाने और रख-रखाव करने का अधिकतर काम 12-13वीं से 17-18वीं सदी के बीच वहाँ राज करने वाले गोंड राजाओं के जमाने का है। सन् 1801 के मई महीने में इस इलाके का भ्रमण करने वाले एक यूरोपीय पर्यटक कोलब्रुक ने लिखा है कि ‘इस प्रदेश की समृद्धि के लिए, जिसका पता उसकी राजधानी से चलता है तथा जिसकी पुष्टि उन जिलों से होती है। जिनका हमने भ्रमण किया। मैं इस प्रदेश के राजाओं की सराहना अंतर्राज्यीय वाणिज्य के बिना गोंड राजाओं की छत्रछाया में अनेक व्यक्तियों ने उर्वर भूमि में कृषि व्यवसाय अपनाया तथा उसकी समृद्धि के अमिट चिन्ह आज भी साफ-सुथरे भवनों में, मंदिरों की संख्या और उसकी भव्यता में, उनके तालाबों और अन्य लोकोपयोगी निर्माण कार्यों में, उनके नगरों के विस्तार में तथा उनके द्वारा किए गए वृक्षारोपणों में सुरक्षित है। इन सबका श्रेय पूर्ववर्ती शासन को है।’

इनके अलावा पानी की व्यवस्था के कुछ और भी उदाहरण मिलते हैं लेकिन समय और समाज की लापरवाही के चलते इनमें से कई धीरे-धीरे खत्म हो गए। फिर भी इतिहास में अल्हण देवी सरीखे उदाहरण मिल जाते हैं जिन्होंने चेदि वंश के राजा गयाकर्णदेव (1123ई. से 1156ई. तक) से विवाह किया था। ये वे ही अल्हण देवी हैं जिन्होंने जबलपुर के पास भेड़ाघाट में चौंसठ योगिनी का मंदिर और उससे जुड़े मठ तथा व्याख्यान शाला बनवाकर इन्दुमाली के नाम से भगवान शिव को समर्पित किए थे। इस मंदिर से दो गाँव लगे थे जिनकी आय से मंदिर तथा दूसरे धार्मिक कार्य चलाए जाते थे। गयाकर्णदेव और अल्हण देवी के पुत्र जयसिंह देव ने उस प्रसिद्ध गोसल देवी से विवाह किया था। जिनके नाम से जबलपुर में आज भी एक मोहल्ला गोसलपुर मौजूद है। इससे पहले 9वीं शताब्दी में कलचुरी वंश ने इस इलाके पर राज किया था। उनकी राजधानी त्रिपुरी थी जहाँ बाद में आजादी पूर्व कांग्रेस का ऐतिहासिक सम्मेलन हुआ था। एक समय की यह राजधानी आजकल तेवर नाम के गाँव के रूप में जानी जाती है।

आज के छिंदवाड़ा जिले में बिछुआ विकासखंड के एक गाँव नीलकंठी में 14 वीं शताब्दी के राजा कृष्णदेव राय का बनवाया शिव मंदिर प्रसिद्ध है, जहाँ तिफना नदी से तीन छोटी-छोटी नदियों का संगम है। उसी के पास का नीलकंठी परसगांव के राजा के अधीन था। कहते हैं कि इस गाँव की एक गुफा में दो शिल्पकार भाई नग्न होकर मूर्तियाँ बनाते थे। उनकी बहन जब भोजन लाती थी तो घण्टी बजाकर अपने आने की सूचना देती थी। एक बार उसने यह नहीं किया और नतीजे में दोनों भाई पत्थर की मूर्ति में बदल गए।

चेदि और कलचुरी वंशों के राज-काज में तालाबों, बावड़ियों का निर्माण भी किया गया था। जबलपुर का प्रसिद्ध हनुमान ताल कलचुरी वंश के राजा जाजल्ल देव ने इसी दौर में बनवाया था। इसी वंश के राजा रतन देव ने छत्तीसगढ़ की अपनी राजधानी रतनपुर को बसाया था, जहाँ कहा जाता है कि 1600 तालाब थे और इस तरह बरसात का बूंद-बूद पानी रोक लिया जाता था। इसी दौर में खेड़ला राज्य का भी जिक्र आता है, जो गोंड़ों के आधीन नहीं था।

खेड़ला राज्य के बारे में अधिकतम जानकारी एक संत मुकंदराव स्वामी के ग्रंथ ‘विवेकसिंधु’ से मिलती है। जो कि 13 वीं शताब्दी के अंत तक रहे थे। मराठी के आदि कवि माने गए मुकुंदराव स्वामी के दौर में खेड़ला साम्राज्य की गद्दी पर जैतपाल नामक राजा का राज्य था और मुकंदराव स्वामी ने अपने जीवन का अंतिम हिस्सा जैतपाल के संरक्षण में ही बिताया था।

बैतूल के पास खेड़ला में वन विभाग के कई एकड़ रकबे में फैले किले के अवशेष आज भी खेड़ला राज्य की स्मृति को जिंदा रखे हैं। कहते हैं कि खेड़ला के एक प्रसिद्ध राजा नरसिंह राय ने घोषणा की थी कि जो भी उन्हें तुरत-फुरत ब्रह्म दिखा देगा उसे राजपाट दिया जाएगा। लेकिन इस कोशिश में जो सफल न हो तो उसे किले से लगे रावनबाड़ी गाँव में तालाब खोदने में लगा दिया जाएगा। राजा का कहना था कि ‘गाबड़ी में पाँव, ब्रह्म दिखाओ’ यानि कि जब तक घोड़े पर चढ़ने की रकाब, गाबड़ी में पाँव जाए उतने में ब्रह्म के दर्शन करवाए जाएँ। इस घोषणा को सुनकर कई ब्राह्मण, पंडित, विद्वान आए लेकिन कोई भी राजा को ब्रह्म नहीं दिखा सका और सब के सब तालाब खोदने में लग गए।

तभी काशी से पैदल चलकर मुकुंदराव स्वामी आए और उन्होंने राजा को ब्रह्म के दर्शन करवाए। कहा जाता है कि राजा तब 7-8 दिन समाधि में डूब गए थे, उन्हें लगा कि सच्चा गुरू मिल गया है।

मुकुंदराव स्वामी के आते ही तालाब खोदने में लगे विद्वान उनके दर्शनों के लिए दौड़ पड़े। लेकिन तभी चमत्कारित रूप से कुदाल और फावड़े अपने आप चलने लगे। कहते हैं कि इस प्रकार एक रात में रावन बाड़ी का विशाल 20 एकड़ का तालाब तैयार हुआ।

खेड़ला के राजा नरसिंहराय के जमाने में 300 कुएँ और बावड़ियाँ थीं और उसने किले के पास मुकुंदराव स्वामी के लिए एक भव्य मंदिर बनवाया था। इस मंदिर के पास एक तालाब और मुकुंदराव स्वामी की समाधि आज भी मौजूद है। कहा जाता है कि राजा ने अपने पास मौजूद पारस पत्थर, जिसे छुआने से लोहा सोना बन जाता है, को इसी तालाब में फेंक दिया था। बाद में अंग्रेजों ने लोहे की जंजीर बनवाकर तालाब में डाली तो वह सोने की हो गई थी। किले के पास ही एक सुन्दर चोर बावड़ी है। जो सामान्य तौर पर दिखाई नहीं पड़ती। यह बावड़ी राजा हरदेव के जमाने में बनी थी। इसमें आज भी अथाह पानी मौजूद है। इतिहासविद् वाकणकर के अनुसार के अनुसार खेड़ला के किले में पानी का गड्ढा था जिसके तल में चूने का प्लास्टर किया था। यह एक तरह की जल भंडारण की टंकी थी।

कोईतुर कौन हैं?


चेदि और कलचुरियों के बाद गोंडों ने कई राज्यों को जीता और महाकौशल में लगभग 400 साल तक राज किया। अंग्रेजों के जमाने से ही अनुसूचित जनजाति के खाँचे में पड़े और आज भी पिछड़े कहे जाने वाले गोंडों का अपना गौरवशाली लंबा इतिहास रहा है। भाषा के हिसाब से गोंडी द्रविड़ भाषा समूह की एक शाखा है जिसमें तेलुगू के कई शब्द प्रचलित हैं। गोंड दक्षिण से आए थे और उन्होंने बस्तर, छत्तीसगढ़ की भारिया और मुंडा जातियों को पहाड़ों की तरफ धकेल कर अपना राज स्थापित किया था।

गोंडों को नाम हिन्दुओं और अन्य लोगों ने दिया है। हालांकि वे खुद को ‘कोइतुर’ कहते और कहलाना पसंद भी करते हैं। फादर हिस्लाप, जो इस विषय के ज्ञाता रहे थे, के अनुसार गोंड शब्द तेलुगू के कोंड या कोंडा से आया है जिसका मतलब है पहाड़ यानि गोंड पहाड़ी लोग हैं। मंडला के सेटलमेंट अधिकारी कैप्टन वॉर्ड के अनुसार गोंड संस्कृत के ‘गो’ और ‘उंड’ शब्दों से बना है। जिनका मतलब है पृथ्वी एवं शरीर यानि गोंड का अर्थ है। पृथ्वी या जमीन के आदमी। यह वैसे गलत है क्योंकि संस्कृत साहित्य में गैर-आर्य जाति गोंड का कोई जिक्र नहीं है। संस्कृत साहित्य में एक गैर-आर्य जाति शबर का जिक्र है जो भूभाग के एक हिस्से पर काबिज थे, लेकिन गोंड नहीं थे। जनरल कनिंघम के अनुसार गोंड ‘गौर’ शब्द से बना है।

यहाँ उल्लेखनीय है कि गोंड किस तरह अपने जन्म को देखते हैं। फादर हिस्लॉप ने गोंडों के प्रधान पुजारी से बात करके उनके जन्म की कहानी लिखी है। इस कहानी में हिन्दू मान्यताएँ भी घूल-मिल गई हैं। इसके अनुसार-

शुरुआत में चारों तरफ पानी ही पानी था और भगवान ने कमल के पत्ते पर जन्म लिया था जहाँ वे अकेले ही रहते थे। उन्होंने पहले एक कौआ और एक केकड़ा बनाया। केकड़ा डुबकी लगाकर समुद्र के तल में पहुँचा तो वहाँ उसने एक केंचुआ देखा। केंचुआ ऊपर लाया गाया तो वह अपने मुँह में मिट्टी भी साथ लाया। भगवान ने इस मिट्टी से जमीन के कुछ टुकड़े बनाये और वे उस पर चले। इस दौरान उन्हें एक बुल-बुला मिला जिससे महादेव और पार्वती निकले। फिर पार्वती ने 22 ब्राह्म देवों और 18 गोंड देवों को जन्म दिया। गोंड इधर-उधर रह रहे थे और इससे दुखी होकर महादेव ने उन्हें बाहर करने का तय किया। उन्होंने एक गिलहरी बनाकर गोंडों के बीच छोड़ दी जिसे मारकर खाने के लालच में सारे गोंड उसके पीछे पड़ गए। गिलहरी भागती दौड़ती एक विशाल गुफा में छिप गई और जब उसी के पीछे सारे गोंड भी गुफा में चले गए तो महादेव ने एक बड़ी शिला से गुफा का मुँह बंद कर दिया। लेकिन इन गोंडों में से चार बाहर ही रह गए थे जो भागकर लाल पहाड़ी के काछीकोपा लोहारगढ़ चले गए। पार्वती गोंडों की गंध न पाकर उन्हें वापस लाने के लिए तपस्या करने लगीं। महादेव ने तब गोंडों को वापस लाने का वायदा किया और इस तरह लिगों का जन्म हुआ। लिंगो महान शक्तियों वाले नायक थे। उन्होंने गोंडों को आग जलाना सिखाया और एक साथ बसकर रहने की शिक्षा भी दी। लेकिन शीघ्र ही एक झगड़े में चारों गोंडों ने मिलकर लिंगों को मार दिया।

महादेव को इसकी खबर मिली तो उन्होंने लिंगो को पवित्र जल से पुनर्जीवित कर दिया। लिंगों ने सोचा कि चार भाई काफी नहीं हैं इसलिए उसने अपने बाकी के 16 गोंड भाइयों की भी खोज शुरू की। वह पूरी पृथ्वी पर घूमा, चाँद-सितारों से पूछताछ की लेकिन कोई उसे नहीं बता पाया। तब उसे एक बूढ़ा साधु मिला जिसने उसे बताया कि गोंडों को महादेव ने एक गुफा बंद कर दिया है। लिंगो ने घोर तपस्या की और महादेव को प्रसन्न करके गुफा के मुँह से शिला हटवाई और इस तरह से गोंड आजाद हुए।

इस इलाके में गोंडों के तीन राज्य रहे हैं। चांदा (चन्द्रपुर, महाराष्ट्र) में चांदा राज्य, छिंदवाड़ा के पास देवगढ़ में देवगढ़ राज्य और पहले गढ़ा और फिर मंडला में गढ़ा-मंडला राज्य।

देवगढ़ राज्य (1590ई. 1743 ई. तक)


इस राज्य के निर्माता दैवीय गुणों से सम्पन्न जाटबा थे। अकबर के समकालीन राजा जाटबा, कहते हैं कि कुँवारी कन्या से अमरवाड़ा के पास राजाखोह में पैदा हुए थे। इस राज्य का केन्द्र देवगढ़ था जो कि आज के छिंदवाड़ा के दक्षिण-पश्चिम में करीब 24 मील दूर स्थित है। अंतिम दिनों में यह राज्य इतना विशाल और ताकतवर बन गया थe कि मंडला, चांदा आदि राज्यों से उसकी ज्यादा पूछ होती थी। जाटबा के समय में ही यह राज्य भिलाई, दुर्ग, होशंगाबाद, शाहपुर, असीरगढ़ तक फैल गया था और बटकाखाप, पगारा, आलनेर, श्रीझोत, हर्रई, चौरई आदि 11 जागीरें उसने अपने सरदारों को दे दी थीं। कहते हैं कि हथियागढ़ के रंसूर-धंसूर के नाम से प्रसिद्ध गवली राजाओं को जाटबा ने मारकर किले पर कब्जा कर लिया था।

जाटबा के बाद तीसरी-चौथी पीढ़ी यानि सन् 1686 ई. के आसपास एक राजा हुए थे बख्तबुलंद। वे औरंगजेब के जमाने में दिल्ली दरबार भी गए थे और वहाँ की सम्पन्नता तथा व्यवस्थाओं से बहुत प्रभावित होकर लौटे थे। बख्तबुलन्द का अपने भाई से झगड़ा होने पर उन्होंने औरंगजेब से मदद माँगी थी और नतीजे में उन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार करना पड़ा था। बाद में इस परिवार के आखिरी राजा आदमशाह वापस हिन्दू हो गये थे।

बख्तबुलंद के दौर में दूर-दूर से मेहनती किसानों को राज्य में बुलाकर बसाया गया था ताकि खेती सम्पन्न हो सके। यह कहा जा सकता है कि बाद में मराठा राज्य को बख्तबुलंद के इन कार्यों से शासन करने में बहुत मदद मिली।

बख्तबुलंद का साम्राज्य आज के छिंदवाड़ा, बैतूल, सिवनी, भण्डारा, बालाघाट और नागपुर के कुछ हिस्सों तक था। बख्तबुलंद ने आज के नागपुर शहर की नींव रखी थी जिसे पहले राजापुर बारसा नाम की छोटी-मोटी बस्तियों के रूप में जाना जाता था। कहा जाता है कि देवगढ़ राज्य के टूटने से आज का नागपुर बना है। इसी तरह मोहखेड़ के टूटने से आज का छिंदवाड़ा जिला बना है। मोहखेड़ा में देवगढ़ राजा की कचहरी तथा किला था और महुआ के पेड़ पर फाँसी तक दी जाती थी।

देवगढ़ राज्य में उस समय 200 बावड़ियाँ और 700 कुएँ थे। जुन्नारदेव के पास हिरदागढ़ में पत्थरों से पटी एक तीन-चार फुट की झिरिया है जिससे असीमित पानी मिलती है। इसी तरह तामिया में तुल-तुला पहाड़ है जहाँ से तुल-तुल की ध्वनि करता हुआ पानी निकलता है। यहाँ एक मंदिर और पुराना जलस्रोत है। हर्रई में देवगढ़ राजाओं के जमाने की झिरिया है जो आज भी बड़ी आबादी वाले इस कस्बे को पानी देती रहती है। झिलमिला स्टेशन के पास चौराई में किसानों के देवता डोलना, डुल्ला या डोलन देव का वास है। कहते हैं यहाँ की दलदली जमीन डोलती है। और पापी इसमें धँस जाते हैं। बिछिया-सोंसर मार्ग पर एक विशाल तालाब है जिसे देवगढ़ राजाओं ने बनवाया था। इसी तरह परासिया-छिंदवाड़ा मार्ग पर गोंगीवाड़ा के पास मारई गाँव में एक विशाल बावड़ी बनी है।

गढ़ा मंडला राज्य (15वीं शताब्दी से 1789 ई. तक)


यहाँ राजगोंड राज्य करते थे। इस राज्य का केंद्र पहले गढ़ा (जबलपुर के पास) था और बाद में मंडला बना। इस राज्य के निर्माता जदुराय नामक एक व्यक्ति थे जो गोदावरी के किनारे के एक गाँव में पटेल के बेटे थे। जदुराय तत्कालीन कलचुरी राजाओं की नौकरी में थे लेकिन बाद में कलचुरियों की कमजोरियों को बताकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी। उन्होंने एक स्थानीय गोंड सरदार नागदेव की बेटी से विवाह किया था और बाद में नागदेव की मृत्यु पर खुद ही सरदार बन गए थे।

जदुराय ने सुरभि पाठक को अपना मंत्री बनाया जो खुद भी पहले कलचुरियों की नौकरी में थे। इन दोनों ने तय किया कि अपने पूर्व राजाओं को हटायेंगे और उसमें वे सफल भी हुए।

जदुराय की अगली पीढ़ी में संग्रामशाह (1510ई. से 1513 ई. के बीच) राजा बने और उन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया। उन्होंने नरसिंह पुर के पास चौरागढ़ का किला बनवाया और गढ़ा (जबलपुर) में संग्राम सागर नामक विशाल तालाब का निर्माण करवाया। इस तालाब के पास उन्होंने भैरव बाजना मठ भी बनवाया था।

संग्रामशाह के बाद दलपतशाह राजा बने जो राजधानी गढ़ा से सिंगोरगढ़ (दमोह जिले में) ले गए दलपतशाह के विवाह का प्रस्ताव जब महोबा के चंदेल राजा का पुत्री दुर्गावती के लिए भेजा गया तो पहले गढ़ा के राजाओं ने प्रस्ताव नामंजूर कर दिया। दलपतशाह खुद सुन्दर थे और उनके पिता संग्रामशाह की ख्याति थी, इसलिए दुर्गावति भी उनसे विवाह के लिए उत्सुक थीं। ऐसे में दुर्गावती को युद्ध करके ही प्राप्त किया जा सकता था और दलपतशाह ने यही किया।

दलपतशाह विवाह के बाद अधिक जीवित नहीं रहे और वे अपने पाँच वर्ष के पुत्र वीरनारायण को छोड़कर स्वर्ग सिधार गए। दुर्गावती वीरनारायण की संरक्षक रहीं और बाद में उन्होंने 1549 में राज्य की गद्दी सँभाली।

जलस्रोतों की भी सम्राज्ञी थीं-दुर्गावती


दुर्गावती के राज सँभालने के 15 वर्ष बाद 1564 ई. में मुगलों के कड़ा-मणिकपुर के सिपहसालार आसफ खाँ ने दुर्गावती की वीरता, सुन्दरता पर मुग्ध होकर हमला किया। पराजय निकट देखकर 24 जून 1564 ई. को नर्रई के समीप खुद को तलवार से खत्म कर लिया। आसफ खाँ ने एक हजार हाथी और बहुत-सा सोना, जेवरात लूटे और इसमें से कुछ दिल्ली दरबार को भी भेजे। गढ़ा राज्य को मुगल साम्राज्य के मालवा सूबे में शामिल करके सरदार के रूप में रख दिया गया। रानी दुर्गावती के बाद गढ़ा का गोंड राजवंश मुगलों के अधीन हो गया।

दुर्गावती ने अपने शासनकाल में गढ़ा के पास रानीताल और चेरीताल समेत अनेक तालाबों का निर्माण करवाया था। गढ़ा और मंडला के आसपास भी उन्होंने कई महत्वपूर्ण निर्माण करवाए थे।

हिरदेशाह गोंड राज्य के एक और प्रभावशाली राजा थे उन्होंने बुन्देला राजा जुझारसिंह से अपने पिता का बदला लिया और फिर अपना राज भी वापस अपने अधिकार में कर लिया। हिरदेशाह ने राज्य को सुव्यवस्थित करने में अहम् भूमिका निभाई। कृषि योग्य क्षेत्र बढ़ाया और मेहनती किसान जातियों, खासकर कुर्मी और लोधियों के अपने इलाके में बुलाकर बसाया था। उन्होंने मंडला के पास हिरदेनगर भी बसाया।

हिरदेशाह ने एक लाख आम के पेड़ लगवाए जो आज के लाखा क्षेत्र में थे। जबलपुर की फौजी छावनी उसी जगह बनी है। इसके अलावा उन्होंने गढ़ा के पास एक बेहतरीन तालाब गंगासागर बनवाया। उन्होंने राजधानी को गढ़ा से रामनगर स्थानांतरित किया। यहाँ नर्मदा के किनारे उन्होंने एक शानदार महल बनवाया, जो 1663 ई. में बनकर तैयार हो गया था।

बाद में 1700 ई. के आसपास गोंड राजा नरेन्द्र शाह ने मंडला को राजधानी बनाया। अठारहवीं सदी के मध्य से गढ़ा राज्य पर मराठों के आक्रमण होने लगे और अंत में सन् 1704 ई. में मराठों ने इस राज्य को अपने अधीन कर लिया।

चांदा राज्य (13वीं से 18वीं शताब्दी)


चांदा में गोंडों ने छत्रियों के माना राज्यों को हटाकर राज्य का अधिकार जमाया था। परम्परा के अनुसार ज्ञान और ताकत में श्रेष्ठ एक कोल भील आदमी ने बिखरे हुए गोंडों को एकत्रित करके एक राज्य की शुरुआत की थी। उन्होंने गोंडों को लोहा बनाना (अयस्क से लोहा निकालना) सिखाया और माना राजाओं के खिलाफ संघर्ष में नेतृत्व किया। करीब 200 वर्षों में माना राजाओं को पूरी तरह हटाया जा सका। यहाँ की गद्दी पर सबसे पहले राजा भीम बल्लाल सिंह बैठे थे। उनका राज्य 13 वीं शताब्दी में रहा था। सन् 1240 में भीम बल्लाल के बाद उनके बेटे खुरजा बल्लालसिंह और फिर खुरजा के बेटे हीरसिंह राजा बने। हीरसिंह जो की योद्धा और बुद्धिमान राजा थे, ने पहली बार जमीन पर लेवी लगाई लेकिन उन्होंने कभी खुद को उसका मालिक नहीं माना। बाद में भी गोंड राजाओं ने खुद को भूमि का मालिक नहीं माना।

तालाबों की चाँदी का राज्य-चाँदा


गोंड काल में बनाए गए जलस्रोतों में से हैं चाँदा राज्य के असंख्य तालाब। आज के भण्डारा जिले में, एक अध्ययन के अनुसार 410000 हेक्टेयर जमीन का 78 प्रतिशत हिस्सा अकेले इन्हीं तालाबों की दम पर सिंचित होता है। यहाँ कुल 43381 तालाब आज भी हैं जिनमें से 238 तालाब 10 हेक्टेयर से भी बड़े हैं, 3007 तालाब 4 से 10 हेक्टेयर के, 7534 तालाब 2 से 4 हेक्टेयर के, 13289 तालाब 1 से 2 हेक्टेयर के और 19313 तालाब एक हेक्टेयर से कम के हैं। देवगढ़ व मंडला के गोंड राज्यों की सीमाओं से लगे चाँदा राज्य (आज का भण्डारा जिला) के एक राजा हीरसिंह का फरमान था कि ‘जो व्यक्ति जंगल के किसी टुकड़े को साफ करके आबादी के लायक बनाएगा उसे उस इलाके के ‘सरदार’ और ‘जमींदार’ का खिताब दिया जाएगा।’ इसी फरमान के अनुसार ‘जो व्यक्ति तालाब का निर्माण करेगा उसे उसी तालाब से सिंचित जमीन पुरस्कार स्वरूप प्रदान की जाएगी।’ तालाब बनाने वाले लोगों को राजा की तरफ से भेंट में सोने का हल देकर सम्मान करने तक का चलन था। इन फरमानों के कारण विशाल भू-भाग खेती लायक बनाया गया और असंख्य तालाब भी खोदे गए। कहते हैं आज के नागपुर और चांदा इलाके में 45 हजार तालाब बने थे।

वैनगंगा घाटी की मराठी पट्टी में किसानों की एक छोटी जाति ‘कोहली’ भण्डारा, चांदा, गढ़चिरोली और बालाघाट जिलों में बसी है। यह जाति विशाल सिंचाई तालाबों के निर्माताओं के रूप में जानी जाती है जिनके कारण पूरी वैनगंगा घाटी प्रसिद्ध है। इन तालाबों का पानी धान और कोहली जाति की प्रिय फसल गन्ना के उत्पादन के काम में लाया जाता है।

कोहली जाति की मान्यता है कि उन्हें चांदा के एक गोंड राजा द्वारा बनारस से लौटते हुए वहाँ से लाकर भण्डारा में बसाया गया था। कई बार अवर्षा के कारण धान की फसल बिगड़ती रहती थी और इसलिए जल-आपूर्ति के लिए ये तालाब बनाए गए थे। फिर धान की फसल की लोकप्रियता के कारण भी लगभग हर जगह तालाब निर्माण किया गया था।

ये तालाब ढाई से तीन सौ वर्ष पुराने हैं। आबादी और उसकी जरूरतों के तालाबों के लिए जंगलों के हिस्सों को साफ करने के कई उदाहरण हैं जिसमें पाटिल (मालगुजार) की मुख्य भूमिका होती थी। आजकल तालाब सिर्फ सिंचाई ही नहीं बल्कि पेयजल और मछली पालन के लिए भी उपयोग किए जाते हैं। कोहली लोग ऐसे व्यक्तियों के सम्मान करते थे जो कई तालाबों के मालिक होते थे।

इन तालाबों की पाल पर आमतौर पर भूराजी देव के मंदिर बने हैं। यह देवता प्राकृतिक प्रकोप और दुश्मनों से तालाबों को बचाने की जिम्मेदारी निभाता है, ऐसी मान्यता है। इसी तरह से हर गाँव में भीमसेन के मंदिर भी पाए जाते हैं। अकाल या वर्षा की देरी के समय इस देवता पर गोबर थोप दिया जाता है। कहा जाता है कि इससे देवता नाराज होकर खुद को धोने के लिए बरसात करवाएँगे।

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