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नदियों को अविरल बहने दो

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चंडी प्रसाद भट्ट/ 15 सितम्बर 2009
अभी कुछ ही दिन पहले उत्तराखंड के श्रीनगर में अलकनंदा पर निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजना के लिए बनाया गया कॉफर बांध के टूटने के समाचार से चिन्ता हो गयी थी, लेकिन जिला प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रण में बताया। साथ ही अगले कुछ दिनों तक लोगों को नदी तट से दूर रहने की अपील भी की गयी। इसमें यह भी कहा गया कि नदी में बाढ़ नहीं है, केवल जलस्तर बढ़ा है। 12 बजे तक जब नदी का प्रवाह सामान्य होने की जानकारी मिली तो संतोष हुआ कि एक मानवजनित आपदा टल गयी है।

हम लोगों ने सन् 1970 में अलकनंदा की प्रलयकारी बाढ़ देखी और उसके दुष्प्रभावों को भोगा है। उस दिन भी जलस्तर बढ़ने के साथ उसमें एक तिहाई गाद भी बही थी। उसका दुष्प्रभाव ऊपरी गंगा नहर तक पर पड़ा था। मेरा मानना है कि उस समय भी अलकनंदा को बौखलाने में मानवजनित कृत्य भी सम्मिलित थे, जिसके बाद इन कृत्यों को उजागर कर अलकनंदा के ऊपरी पणढालों की रक्षा के लिए चिपको आन्दोलन शुरू करना पड़ेगा।

अलकनंदा अपने उद्गम अलकापुरी बाँक के बाद माणा गांव के पास सरस्वती नदी के संगम तथा बद्रीनाथ से आगे लगातार गहरी घाटी में बहती है। बस्तियां इससे काफी दूर ऊपर पहाड़ियों में बसी थी। बहुत कम बरसातें ऐसी थीं, जो नदी के तटवर्ती क्षेत्र में थी। यहां तक कि देवप्रयाग, जहां अलकनंदा और भागीरथी का संगम है, उसके पूर्व में जो संगम है रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, नन्दप्रयाग और विष्णुप्रयाग, इन सभी प्रयागों में नदी से काफी ऊपर बसासतें थीं। ये बसासतें लगभग सौ मीटर से ऊपर ही होंगी, लेकिन अलकनंदा जब अपने उद्गम से लगभग 200 किलोमीटर की यात्रा करके श्रीनगर (गढ़वाल) में प्रवेश करती है तो उसे वहां पर चौरास मैदान मिल जाता है।

इस मैदान के आस-पास नदी के किनारे की बसासतें आज से नहीं बल्कि सदियों से बतायी जाती हैं। एक समय में टिहरी के राजाओं की राजधानी थी, लेकिन जब-जब अलकनंदा बौखलायी तो वह इस चौपाट में जो भी था, उसको ध्वस्त करते हुए आगे बढ़ जाती थी। इतिहास साक्षी है कि पूर्व में अलकनंदा श्रीनगर को कई बार तहस-नहस कर चुकी है।

अलकनंदा घाटी में 1803 में आये प्रलयकारी भूकम्प से श्रीनगर में भारी तबाही हुई थी। गंगा के स्नोत को देखने आये एक दल ने तब श्रीनगर में भारी तबाही का जिक्र किया था। इसी प्रकार अलकनंदा में सन् 1868 और 1880 में भी प्रलयकारी बाढ़ की जानकारी मिलती है। सन् 1893 में अलकनंदा की सहायक धारा बिरही नदी के ऊपर गौणा गांव के पास एक पहाड़ के टूटने से तीन सौ मीटर ऊँचा तालाब बना था, जो एक साल बाद सन् 1894 में टूटा था। उस समय पूर्व सूचना के बाद भी उस क्षेत्र में भारी तबाही हुई थी।

सन् 1970 की प्रलयकारी बाढ़ से कौन परिचित नहीं है? तब श्रीनगर में आईटीआई के भवनों में एक मंजिल तक अलकनंदा की बाढ़ का पानी और गाद जमा हो गया था। जो आज भी वहां 1970 की बाढ़ की याद दिलाता है। उस समय गंगा में गाद की मात्र की गणना 3.06 की गयी थी, जबकि औसत गाद 0.06 मापी गयी थी।

श्रीनगर के बाद भी अलकनंदा, बस्ती से दूर घाटी में ही बहती है। देवप्रयाग से गंगा बन कर भी वह ऋषिकेश तक घाटी में ही बहती है, लेकिन उसके बाद वहां छलछलाती हुई मैदानों में प्रवाहित होती है। पहाड़ों में श्रीनगर ही अपवाद था कि यहां नदी के किनारे आबादी थी। पहले लोग नदी के स्वभाव को समझते थे। उसी के अनुरूप व्यवहार करते थे और उससे दूर ही रहते थे, लेकिन आज नदी की उपेक्षा करके उसके साथ कई प्रकार की छेड़छाड़ हो रही हैं। ऊपर से उसके दायरे के भीतर प्रयागों में ही नहीं, अपितु तटवर्ती क्षेत्रों में भी बसासतों की भरमार हो गयी है।

बिरही बगड़, मैठाणा बगड़, नन्दप्रयाग, देवली बगड़, काल्दू बगड़, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर में नदी के तटवर्ती क्षेत्र में बसासतों की भरमार हो गई है, लेकिन सबसे आश्चर्यजनक तो कौड़ियाला के पास एकदम गंगा से सटकर बने हुए गढ़वाल मण्डल विकास निगम के विश्रमगृह हैं, जो सरकारी अभिकरणों ने खुद ही बनाए हैं।

पहले लोग नदी-तटों, नालों के प्रवाह क्षेत्रों एवं चट्टानों के आस-पास बसाहट बसाने के बारे में सावधानी बरतते थे। यदि जरूरी हुआ तो शीतकालीन अस्थायी आवास तक ही सीमित रखते थे। उसके बाद ऊँचाई वाले इलाकों में चले जाते थे। नदी-नालों और गदेरों के पास बसाहत के लिए चेतावनी थी कि ‘नदी तीर का रोखड़ा-जतकत सौ रे पार’ अर्थात जो उसके समीप बसता है, वह हमेशा खतरे में ही है।

इधर पिछले तीन दशकों से अलकनन्दा, भागीरथी तथा इनकी सहायक नदियों में अनेकों परियोजनायें स्थापित हो गई हैं या निर्माणाधीन हैं। जहां ये परियोजनाएं बन रही है, उनके कई इलाके बहुत संवेदनशील है और ये इलाके मुख्य केन्द्रीय भ्रंश के आस-पास हैं, जिनकी स्थिरता के बारे में शंकायें प्रकट की जा रही हैं।

ऊपर से इन परियोजनाओं के निर्माण से, जिसमें सुरंग आदि भी सम्मिलित हैं, से निकाले गये मलबे को सुरक्षित रखने की समस्या है। जो अरबों घन फुट मिट्टी और पत्थर इन सभी परियोजनाओं से खोदा गया है या खोदा जायेगा, वह भी अन्ततोगत्वा नदियों में ही पड़ेगा, जिससे इसका तल उठ जायेगा। एक ओर चिन्ता इन परियोजनाओं की स्थिरता से जुड़ी है, जो भविष्य के लिए एक चेतावनी है।

इस प्रकार अलकनंदा जैसी नदी, जिसका जलागम अत्यन्त संवेदनशील है, पर अविवेकपूर्ण निर्माण से नदियों का तल उठने तथा उसके अधिक संवेदनशील होने का खतरा गढ़ गया है। इसके बावजूद उसके तटवर्ती क्षेत्रों में बसासतों का विस्तार किया जा रहा है। इस सबके एकीकृत प्रभाव का किस प्रकार दुष्प्रभाव पड़ेगा, कहा नहीं जा सकता है। यदि पूर्व की भांति ये नदियां बौखलायेंगी तो वह इस शताब्दी की भयंकरतम त्रसदी होगी। फिर लोग और व्यवस्था इसे अपनी कारस्तानी स्वीकार करने के बजाय अलकनंदा और गंगा को कोसेंगे।

श्रीनगर(गढ़वाल),जो बुद्धिजीवियों और विशेषज्ञों का गढ़ माना जाता है, उनसे आशा की जाती है कि वे एकमतता से विज्ञानसम्मत एवं अनुभवजनित ज्ञान के आधार पर इन नदियों पर बनने वाली परियोजनाओं के भले-बुरे पक्षों को व्यवस्था एवं लोगों के सामने उजागर करें, जिससे ये योजनायें विनाश के बजाय स्थायी विकास का मार्ग प्रशस्त करें।

लेखक प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और चिपको आंदोलन के नेता हैं।

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