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जल संगठन गतिविधियां

जल संगठन गतिविधियां

श्रमदान से जल समस्या का समाधान (Satara votes for Dr. Pol)

Author: 
श्रीपद्रे
Source: 
द वाटर कैचर्स, निम्बी बुक्स प्रकाशन, 2017

डॉ. पॉल इस अजिंक्यतारा जल संरक्षण अभियान के अघोषित अगुवा हो गए। इधर धीरे-धीरे उनकी आबादी भी बढ़ती रही और व्यापारी, तकनीशियन, साफ्टवेयर इंजीनियर और एक राजनीतिज्ञ भी उनके इस अभियान का हिस्सा हो चुके थे। कारवाँ आगे बढ़ा तो किले से नीचे उतरकर लोगोंं के बीच जाने का भी फैसला हुआ कि अगर गाँव वालों को यह बात समझाई जाये कि अगर जमीन पर पानी को संरक्षित किया जाये तो जमीन के नीचे भी पानी का स्तर ऊपर आएगा और सूखे से मुक्ति पाने में यह छोटा सा उपाय बड़ी मदद करेगा। सकाल मराठी का बड़ा अखबार है। 10 जनवरी 2013 को उसने एक छोटा सा विज्ञापन प्रकाशित किया। विज्ञापन भी क्या था एक अपील थी लोगों से कि सतारा के लोग अजिंक्यतारा पर आएँ और उसकी साफ-सफाई में सहयोग दें। जब यह अपील की गई तो भारत में किसी स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत भी नहीं हुई थी इसलिये अपील का ज्यादा असर न हुआ। कुछ मुट्ठी भर लोग ही सतारा की शान अजिंक्यतारा पहुँच पाये। पहले दिन तो कुछ लोग आये भी लेकिन दूसरे दिन सिर्फ तीन लोग बचे जो अजिंक्यतारा की साफ-सफाई में स्वैच्छिक रुचि रखते थे। इसमें एक डॉ. अविनाश पॉल भी थे।

जॉब / नौकरी

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खासम-खास

नदियों के सूखने के कारण (Reasons for drying of rivers)


सूखती नदियाँसूखती नदियाँबीसवीं सदी के पहले कालखण्ड तक भारत की अधिकांश नदियाँ बारहमासी थीं। हिमालय से निकलने वाली नदियों को बर्फ के पिघलने से अतिरिक्त पानी मिलता था। पानी की पूर्ति बनी रहती थी इस कारण उनके सूखने की गति अपेक्षाकृत कम थी। नदी के कछार के प्रतिकूल भूगोल तथा भूजल के कम रीचार्ज या विपरीत कुदरती परिस्थितियों के कारण, उस कालखण्ड में भी भारतीय प्रायद्वीप की कुछ छोटी-छोटी नदियाँ सूखती थीं। इस सब के बावजूद भारतीय नदियों का सूखना मुख्य धारा में नहीं था।

पानी बीच खगड़िया प्यासा

Source: 
राइजिंग टू द काल, 2014

अनुवाद - संजय तिवारी

2007 में बाढ़ के कारण खगड़िया जिले में जल संकट2007 में बाढ़ के कारण खगड़िया जिले में जल संकटखगड़िया सात नदियों की ससुराल है और ससुराल छोड़कर नदियाँ कहीं दूर न चली जाएँ इसलिये सरकारी योजनाओं ने उन्हें बाँधकर रखने की भरपूर कोशिश की है। कोसी, कमला बलान, करेश, बागमती, बूढ़ी गंडक, अधवारा समूह और गंगा। इन सात नदियों पर आठ बाँध बनाए गए हैं।

बागमती पर बना बुढ़वा बाँध और कराची बदला, कोसी पर बदला नागरपारा, गंगा पर गोगरी नारायणपुर, बूढ़ी गंडक पर बूढ़ी गंडक बाँध, कोसी पर बना कोसी बाँध और बागमती की ही एक और सहायक नदी पर बना नगर सुरक्षा बाँध।

सात नदियों पर बने आठ बाँधों के कारण खगड़िया में जल ही जीवन नहीं है, बल्कि जल में ही जीवन है। चारोंं तरफ पानी से घिरा हुआ लेकिन प्यासा। सब तरफ पानी है लेकिन पीने के लिये पानी नहीं है।

‘कड़वी हवा’ का जिक्र एक मीठा एहसास


64वें राष्ट्रीय पुरस्कार में फिल्म कड़वी हवा की सराहना



कड़वी हवाकड़वी हवाइस बार के नेशनल अवार्ड में सामाजिक मुद्दों पर फिल्में बनाने वाले फिल्म निर्देशक नील माधब पांडा की ताजा फिल्म ‘कड़वी हवा’ का विशेष तौर पर जिक्र (स्पेशल मेंशन) किया गया।

स्पेशल मेंशन में फिल्म की सराहना की जाती है और एक सर्टिफिकेट दिया जाता है, बस! बॉलीवुड से गायब होते सामाजिक मुद्दों के बीच सूखा और बढ़ते जलस्तर के मुद्दों पर बनी कड़वी हवा की सराहना और सर्टिफिकेट मिलना राहत देने वाली बात है।

फिल्म की कहानी दो ज्वलन्त मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती है-जलवायु परिवर्तन से बढ़ता जलस्तर व सूखा। फिल्म में एक तरफ सूखाग्रस्त बुन्देलखण्ड है तो दूसरी तरफ ओड़िशा के तटीय क्षेत्र हैं। बुन्देलखण्ड पिछले साल भीषण सूखा पड़ने के कारण सुर्खियों था। खबरें यह भी आई थीं कि अनाज नहीं होने के कारण लोगों को घास की रोटियाँ खानी पड़ी थी। कई खेतिहरों को घर-बार छोड़कर रोजी-रोजगार के लिये शहरों की तरफ पलायन करना पड़ा था।

वनाग्नि - मानव और पर्यावरण के लिये गम्भीर खतरा

Author: 
सुशील कुमार

लापरवाही के कारण उत्तराखण्ड के जंगलों में लगती आगलापरवाही के कारण उत्तराखण्ड के जंगलों में लगती आगपिछले कुछ वर्षों से जंगलों में लगातार आग लगने की घटनाओं ने सरकार, पर्यावरणविद तथा समाज को एक बार फिर सोचने पर मजबूर किया है। जंगलों में अचानक लगने वाली इस आग से बड़े पैमाने पर जन-धन हानि के साथ-ही पेड़-पौधों और वन्य जीवों को नुकसान होता है। इस बारे में व्यापक अध्ययन तथा आग की रोकथाम के लिये सरकार की ओर से विभागीय जाँच भी कराई जाती है।

कई बार कमेटियों का गठन कर दोषी लोगों को दंडित करने तथा भविष्य में इस तरह की व्यापक वनाग्नि को रोकने के लिये संस्तुतियाँ भी प्रस्तुत की जाती हैं। इसके बावजूद आग लगने की घटनाओं में कमी की बजाय ये बढ़ती ही जा रही हैं।

चिपको आंदोलन और चंडी प्रसाद भट्ट

Author: 
रामचंद्र गुहा
Source: 
उत्तराखंड उदय (वार्षिकी), 2015, अमर उजाला पब्लिकेशन्स, नोएडा, उत्तर प्रदेश

चंडी प्रसाद भट्ट पहाड़ में जन्मे ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने पहाड़ पर ही रहना और वहाँ के लोगों की सेवा करना पसंद किया। उनके लिये गढ़वाल और गढ़वाली वैसे संसाधन नहीं थे, जिनका वह अपने करियर के लिये इस्तेमाल करते। उनका जीवन-कर्म पहाड़ के लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिये समर्पित रहा है - आर्थिक, सामाजिक और पारिस्थितिक रूप से आत्मनिर्भर। लेकिन उनके काम की प्रासंगिकता केवल हिमालय तक ही सीमित नहीं थी।

चंडी प्रसाद भट्ट जून, 1981 के पहले सप्ताह में मैंने अलकनंदा की गहरी घाटियों में एक धर्मनिरपेक्ष तीर्थयात्रा शुरू की। मेरा गंतव्य गोपेश्वर था, जो हिंदू तीर्थस्थल बदरीनाथ मंदिर वाली पहाड़ी से सटा हुआ है। मैं यहाँ जिस समकालीन देवता के सम्मान में कुछ बातें बताना चाहता हूँ, वह चिपको आंदोलन के संस्थापक चंडी प्रसाद भट्ट हैं।

बागमती को बाँधने में किसी का हित नहीं

Author: 
उमेश कुमार राय

बकुची-अख्तियारपुर में बागमती और लखनदेई का संगम स्थलबकुची-अख्तियारपुर में बागमती और लखनदेई का संगम स्थलसत्तर के दशक में जब बागमती नदी पर तटबन्ध बनाया जा रहा था, तब ग्रामीणों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। उस वक्त कुछ दूर तक तटबन्ध बने, लेकिन लोगों के विरोध के मद्देनजर काम बन्द कर दिया गया था। इस घटना के लगभग चार दशक गुजर जाने के बाद दोबारा बिहार सरकार बाकी हिस्से पर तटबन्ध बनाना चाहती है और इस बार भी ग्रामीण विरोध कर रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि तटबन्ध बनने से उन्हें फायदे की जगह नुकसान होगा लेकिन सरकार का तर्क है कि वह तटबन्ध बनाकर बाढ़ को बाँध देगी। तटबन्ध की खिलाफत करने वाले लोगों के साथ सरकार की बातचीत हुई, तो तटबन्ध से होने वाले नफा-नुकसान का आकलन करने के लिये विशेषज्ञों की कमेटी बनाने पर सहमति बनी, लेकिन तटबन्ध के खिलाफ आन्दोलन करने वाले लोगों का आरोप है कि किसी भी तरह सरकार तटबन्ध बनाने पर आमादा है और वह आम लोगों के हित नहीं देख रही है।

प्रदूषित पानी आज भी एक भीषण समस्या


दूषित पानी से पनप रही हैं बीमारियाँदूषित पानी से पनप रही हैं बीमारियाँआज समूची दुनिया प्रदूषित पानी की समस्या से जूझ रही है। हालात इतने विषम और भयावह हैं कि प्रदूषित पानी पीने से आज इंसान भयानक बीमारियों की चपेट में आकर अनचाहे मौत का शिकार हो रहा है। असलियत यह है कि पूरी दुनिया में जितनी मौतें सड़क दुर्घटना, एचआईवी या किसी और बीमारी से नहीं होतीं, उससे कई गुणा अधिक मौतें प्रदूषित पानी पीने से उपजी बीमारियों के कारण होती हैं।

यदि संयुक्त राष्ट्र की मानें तो समूची दुनिया में हर साल आठ लाख लोगों की मौत केवल प्रदूषित पानी पीने से होती है। संयुक्त राष्ट्र की बीते दिनों जारी एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एशिया, लैटिन अमरीका और अफ्रीका में हर साल तकरीब 35 लाख लोगों की मौतें दूषित पानी के सम्पर्क में आने से होने वाली बीमारियों के चलते होती हैं। गरीब देशों में यह समस्या और गम्भीर है।

तीस्ता के जल बँटवारे का नहीं हुआ समाधान


तीस्ता नदीतीस्ता नदीभारत एवं बांग्लादेश के बीच 22 समझौतों के जरिए सहयोग का एक नया अध्याय शुरू हुआ है। दोनों देशों के बीच रक्षा, असैन्य परमाणु सहयोग, रेल एवं बस यात्रा शुरू करने समेत साइबर सुरक्षा से जुड़े अहम समझौते हुए हैं। भारत बांग्लादेश को 29 हजार करोड़ रुपए रियायती ब्याज दर पर कर्ज भी देगा। इसके अलावा बांग्लादेश को सैन्य आपूर्ति के लिये 50 करोड़ डॉलर का अतिरिक्त कर्ज देने की भी घोषणा की है।

भारत द्वारा इतनी उदारता बरती जाने के बावजूद पिछले सात वर्ष से अनसुलझा पड़ा तीस्ता जल बँटवारे का मुद्दा लम्बित ही रह गया। हालांकि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भरोसा जताया है कि इस मुद्दे का हल जल्दी ही निकलेगा। तात्कालिक परिस्थितियों में भारत की इस उदारता को इसलिये औचित्यपूर्ण ठहराया जा सकता है, क्योंकि पड़ोसी देश पाकिस्तान भारत में जहाँ निरन्तर आतंक का निर्यात करने में लगा है, वहीं चीन तिब्बती धर्म-गुरू दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा पर भारत से आँखें तरेरे हुए है।

एकमात्र तैरती झील लोकटक

लोकटक झीललोकटक झीललोकटक झील, भारत में ताजे पानी की सबसे बड़ी झील है। यह झील मणिपुर की राजधानी इम्फाल से 53 किलोमीटर दूर और दीमापुर रेलवे स्टेशन के निकट स्थित है। 34.4 डिग्री सेल्सियस का तापमान, 49 से 81 प्रतिशत तक की नमी, 1,183 मिलीमीटर का वार्षिक वर्षा औसत तथा पबोट, तोया और चिंगजाओ पहाड़ मिलकर इसका फैलाव तय करते हैं। इस पर तैरते विशाल हरित घेरों की वजह से इसे तैरती हुई झील कहा जाता है।

एक से चार फीट तक मोटे ये विशाल हरित घेरे वनस्पति मिट्टी और जैविक पदार्थों के मेल से निर्मित मोटी परतें हैं। परतों की मोटाई का 20 प्रतिशत हिस्सा पानी में डूबा रहता है; शेष 80 प्रतिशत सतह पर तैरता दिखाई देता है। ये परतें इतनी मजबूत होती हैं कि स्तनपायी जानवरों को वजन आराम से झेल लेती हैं। स्थानीय बोली में इन्हें फुुमदी कहते हैं।

गंगा-यमुना जैसा अधिकार नर्मदा को क्यों नहीं


नर्मदा नदीनर्मदा नदीहाल ही में उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने देश की गंगा-यमुना नदियों को जीवित इकाई मानते हुए इन्हें वही अधिकार दी है, जो एक जीवित व्यक्ति को हमारे संविधान से स्वतः हासिल हैं। इससे पहले न्यूजीलैंड की नदी वांगानुई को भी ऐसा ही अधिकार मिल चुका है। हालांकि यह नदी वहाँ के माओरी अदिवासी समुदाय की आस्था की प्रतीक रही है और वे लोग इसे बचाने के लिये करीब डेढ़ सदी से संघर्ष कर रहे थे। 290 किमी लम्बी यह नदी अपना अस्तित्व खोती जा रही थी। बेतहाशा खनन और औद्योगिकीकरण से नदी के खत्म होने का खतरा बढ़ गया था। यहाँ की संसद ने इसके लिये बाकायदा माफी माँगते हुए कानून बदला और अन्ततः इसे जीवित इंसान की तरह का दर्जा देकर इसे प्रदूषण से बचाने की दुनिया में अपनी तरह की अनूठी पहल की।

अब न्यायालय से गंगा-यमुना को जीवित इकाई मान लिये जाने के फैसले के बाद देश के नदियों, विविध जलस्रोतों और उसके पर्यावरणीय तंत्र से जुड़े जंगल, पहाड़ और तालाबों को भी इसी तरह की इकाई मानकर उन्हें प्रदूषण से बचाने की माँग जगह-जगह से उठने लगी है। खासतौर पर मध्य प्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा को भी यह दर्जा देने की माँग को लेकर कई जन संगठन सामने आये हैं।