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अब गाँव-गाँव होंगे क्लाइमेट मैनेजर

Author: 
अरविंद पांडेय
Source: 
दैनिक जागरण, 17 मार्च, 2018

मंत्रालय से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक योजना के तहत प्रत्येक गाँव से कम से कम एक युवा को इस प्रशिक्षण प्रोग्राम में शामिल किया जाएगा। इसके लिये पंचायतों से ही प्रस्ताव माँगे जाएँगे। पंचायतों की माँग के मुताबिक, यह संख्या बढ़ भी सकती है।

मोजेक इण्डिया फाउंडेशन द्वारा कृषि वैज्ञानिक का सम्मान

Source: 
मोजेक इण्डिया फाउंडेशन

कृषि ज्योति परियोजना की 10वीं सालगिरह


अलवर के रामगढ़ ब्लॉक के गाँव मिलकपुर में सरकारी उच्च माध्यमिक स्कूल समेत कई स्कूलों की नवीनीकरण किया गया है। स्कूल नवीनीकरण परियोजना के सफलतापूर्वक पूरा होने पर आज अलवर में भी एक बड़े सामुदायिक समारोह का आयोजन भी किया गया है। स्कूल में कई ढाँचागत सुधार किये गए हैं जिसमें स्कूल की चारदीवारी की ऊँचाई बढ़ाना, लड़कियों और लड़कों के लिये अलग-अलग शौचालयों की व्यवस्था, कमरों व रसोई घर की मरम्मत और पीने के पानी की सुविधा शामिल है।

पेयजल में इनाम, आपदा प्रबन्धन में इन्तजाम

Source: 
अमर उजाला, 03 अप्रैल, 2018

उत्तराखण्ड के हर जिले की अब ड्रोन सुरक्षा का कवच हासिल होगा। सरकार ने हर जिले के लिये एक-एक ड्रोन खरीद लिये हैं। इन्हें जिलों में उपलब्ध करा दिया गया है। आपदा प्रबन्धन विभाग ड्रोन की उपलब्धता के बाद राहत और बचाव के कार्यक्रम में और प्रभावी कार्रवाई की अब उम्मीद कर रहा है। 2013 की आपदा के बाद आपदा प्रबन्धन विभाग अपने इन्तजाम को लगातार चाक चौबन्द बना रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति की योजनाओं पर बेहतर ढंग से काम करने का उत्तराखण्ड को इनाम मिला है। केन्द्र सरकार ने उत्तराखण्ड को 39 करोड़ का इनाम दिया है। इनमें से 27 करोड़ रुपए वो हैं, जो कि नाबार्ड से उत्तराखण्ड ने लोन के रूप में लिये थे। इस लोन को अब केन्द्र सरकार चुकाएगी। इसी तरह, 12 करोड़ रुपए का पुरस्कार अलग से मिला है।

ग्रामीण पेयजल में अब भी आदर्श स्थिति कायम करने की राह में कई अड़चन है। करीब 17 हजार बस्तियों में पेयजल आपूर्ति की शिकायतें हैं। यहाँ पर मानक से कम पानी उपलब्ध हो रहा है।

पेयजल विभाग ने ग्रामीण पेयजल व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिये दो हजार करोड़ का प्रस्ताव तैयार किया है, जिसे अभी वित्त विभाग की स्वीकृति नहीं मिली है। इन स्थितियों के बीच, ग्रामीण पेयजल योजनाओं पर अच्छे काम के लिये पेयजल विभाग को 39 करोड़ का इनाम मिला है। पेयजल निगम के प्रबन्ध निदेशक भजन सिंह के अनुसार, बेहतर कार्य के लिये 12 करोड़ का पुरस्कार मिला है। 27 करोड़ का पुरस्कार इस रूप में है कि अब नाबार्ड से लिये गया लोन केन्द्र सरकार चुकाएगी।

अब हर जिले में होगा ड्रोन सुरक्षा कवच

910 करोड़ से बुझेगी खेतों की प्यास

Author: 
कृष्णेंदु कुमार
Source: 
अमर उजाला, 30 मार्च 2018

भूजलभूजल राज्य के हर खेत तक पानी पहुँचाने के लिये सिंचाई विभाग ने उत्तराखण्ड वाटर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट तैयार किया है। 910 करोड़ रुपए के इस प्रोजेक्ट को केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने सैद्धान्तिक रूप से सहमति प्रदान कर दी है। यह प्रोजेक्ट विश्व बैंक की मदद से संचालित होगा, जिसमें केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी 90:10 में होगी।

राज्य में सिंचाई के तीन प्रमुख संसाधनों में नहरें, नलकूप और पम्प नहरें हैं। राज्य में खेती लायक जमीन 7.142 लाख हेक्टेयर है, जिसके अनुपात में सिंचित क्षेत्रफल मात्र 3.394 लाख हेक्टेयर है। यानि प्रदेश में 3.748 लाख हेक्टेयर खेती लायक जमीन असिंचित है।

असिंचित खेतों तक पानी पहुँचाने के लिये सिंचाई विभाग ने उत्तराखण्ड वाटर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट तैयार किया है। इस प्रोजेक्ट के तहत प्रदेश में नए बैराज, झील, पम्प नहरें बनाई जाएँगी और ट्यूबवेल भी लगेंगे। विश्व बैंक के अधिकारी फील्ड विजिट कर इसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करेंगे। इस प्रोजेक्ट के तहत प्रदेश में जल संरक्षण और संवर्द्धन को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके लिये प्रदेश में नए जलाशय और झीलों का निर्माण कराया जाना भी प्रस्तावित है।

 

उत्तराखण्ड में हर बाइसवें दिन आ रहा एक भूकम्प

Author: 
दीपक पुरोहित
Source: 
हिन्दुस्तान, 29 मार्च 2018

भूकम्पभूकम्पउत्तराखण्ड में औसतन हर 22 वें दिन भूकम्प आ रहा है। बीते तीन सालों के आंकड़ों के मुताबिक सबसे अधिक भूकम्प चमोली (14 बार) और पिथौरागढ़ (12 बार) में आए हैं।

भारतीय भूकम्प सर्वेक्षण की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बीते तीन सालों में उत्तराखण्ड में 50 भूकम्प रिकॉर्ड किए गए हैं। साल दर साल भूकम्प के आंकड़े भी बढ़ रहे हैं। 2015 में 13, 2016 में 17 और 2017 में 18 भूकम्प दर्ज किए गए। 2018 में अब तक दो भूकम्प दर्ज किए गए हैं। तीन सालों में सबसे कम क्षमता का भूकम्प 2.9 मैग्नीट्यूट का रहा, जो चमोली जिले में आया था। इतनी कम क्षमता के भूकम्प से नुकसान नहीं होता। भूकम्प का पिछला आंकड़ा पाँच साल पहले का था। जिसके मुताबिक यह औसतन 30 दिन का था। इस अवधि में सबसे तेज भूकम्प फरवरी 2017 में रिक्टर स्केल पर 5.7 मैग्नीट्यूट क्षमता का आँका गया। इसका केंद्र रुद्रप्रयाग जनपद रहा। इसके अलावा बारत-नेपाल बॉर्डर पर पिथौरागढ़ में 5.5 और 5.2 क्षमता के कुछ अधिक क्षमता के भूकम्प दर्ज किए गए थे।

क्यों आते हैं भूकम्प


भारत में भूकम्प आने का कारण, इंडियन प्लेट का यूरेशियन प्लेट की ओर मूव करना है। हिमालय वह बिन्दु है, जहाँ हर रोज प्लेटों का ये संघर्षण होता है। इस संघर्षण से हिमालय के भीतर व ईर्द-गिर्द मेन बाउंटी थ्रस्ट व मेन सेंट्रल थ्रस्ट का निर्माण हुआ है। भारत में आने वाले लगभग सभी भूकम्प इन्हीं फॉल्ट के इर्द-गिर्द केन्द्रित रहते हैं। कमजोर स्थलों को ही फॉल्ट कहा जाता है। हिमालय के बाहर आने वाले भूकम्पों की तीव्रता कम रहती है।

 

युवा पानीदार समाज बनाने की एक कोशिश

Author: 
जीतेन्द्र कुमार गुप्ता

भूजल प्रबन्धन की ट्रेनिंग में प्रशिक्षण लेते प्रतिभागीभूजल प्रबन्धन की ट्रेनिंग में प्रशिक्षण लेते प्रतिभागी रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून…

आज से लगभग 400 वर्ष पूर्व ही रहीम दास जी ने पानी के बारे में समाज और सत्ता को एक बड़ी चेतावनी दे दी थी कि जल ही जीवन है। पानी के बिना इस संसार और जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पूरा देश आज पानी के संकट के मुहाने पर खड़ा बेबस नजर आ रहा है। पीने के पानी की गुणवत्ता भी एक बड़ी चुनौती है।

देश का मध्य क्षेत्र बुन्देलखण्ड पिछले एक दशक से पानी के संकट का बड़ा शिकार रहा है। यहाँ के ज्यादातर लोगों की जीविका खेती-किसानी ही है और पानी के कारण यहाँ की स्थिति नाजुक रहती है। बुन्देलखण्ड के हालात को देखते हुए लोक विज्ञान संस्थान (पीएसआई) देहरादून द्वारा “भूमिगत जल प्रबन्धन भागीदारी” पर एक प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन 5 से 17 मार्च 2018 तक महात्मा गाँधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय में किया गया। जिसमें विश्वविद्यालय के पानी व पर्यावरण के छात्र- छात्राओं समेत बाहर से आए तमाम संस्थाओं के प्रतिभागियों ने भाग लिया।

वाटरशेड प्रबन्धन जरूरी


आज समाज पानी के जिस संकट का सामना कर रहा है उसका एक ही उपाय है वह है वाटरशेड प्रबन्धन। पानी की समझ को रखते हुए पानी को कैसे बचाया जाए यह आज बड़ी चुनौती है। धरती के चार तिहाई हिस्से में पानी है, उस चार तिहाई हिस्से में 2-3% जल ही पीने लायक है। इसमें भी 2% अंटार्कटिका में बर्फ के रूप में जमा हुआ है।

ऑर्गेनिक और हर्बल खेती से महकेगी देवभूमि

Author: 
अमर उजाला
Source: 
अमर उजाला, 24 मार्च, 2018

वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिये सरकार ने कृषि, उद्यान, पशुपालन के साथ ही कृषि और बागवानी से जुड़े लाइन डिपार्टमेंट के माध्यम से योजना तैयार की है। जिसमें पर्वतीय क्षेत्रों में कलस्टर बनाकर कृषि को बढ़ावा दिया जायेगा। प्रत्येक कलस्टर में क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी व भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार किसानों को फसलों की पैदावार के लिये प्रोत्साहित किया जायेगा। इसके साथ ही विपणन की सुविधा के लिये कोल्ड स्टोर, कोल्ड चेन, नई फल-सब्जी मण्डी, किसान आउटलेट, ग्रामीण हाट बाजार आदि विकसित किये जायेंगे।

दून के लिये सौंग-सूर्याधार प्रोजेक्ट से पानी

Source: 
हिन्दुस्तान, 23 मार्च 2018

सिंचाई विभाग की अत्यंत महत्वाकांक्षी सौंग नदी बाँध और सूर्याधार बैराज प्रोजेक्ट के लिये राज्य सरकार ने बजट में चालीस करोड़ रुपये की व्यवस्था की है। इससे इस योजना के जल्द शुरू होने के आसार हैं। अगले 30 साल तक समूचे देहरादून की पेयजल समस्या को दूर करने के लिये डिज़ायन किए गए इस प्रोजेक्ट के लिये सरकार ने लगभग एक हजार करोड़ रुपये विश्व बैंक और दूसरे संसाधनों से जुटाने का लक्ष्य रखा है।

दून घाटी में बढ़ता जल संकट राज्य बनने के बाद राजधानी में जिस तेजी से आबादी का दबाव बढ़ा है, उसी तेजी से जरूरतें भी बढ़ी हैं। सबसे अहम है पीने का पानी। गर्मियों में दून में पानी की डिमांड और उपलब्धता के बीच भारी अन्तर को देखते हुए सौंग बाँध जैेसे बड़े प्रोजेक्ट के बारे में सरकार भी गम्भीर हुई है। सौंग बाँध और थानों रोड पर सूर्याधार में बनने वाले बैराज से करीब 12 लाख लोगों की प्यास बुझाई जा सकेगी। दून कैनाल डिवीजन के अधिशासी अभियन्ता डीके सिंह ने बताया, सौंग नदी व सूर्याधार प्रोजेक्ट के अस्तित्व में आने के बाद पूरे शहर को ग्रेविटी से पानी की सप्लाई दी जाएगी। इसके साथ ट्यूबवेल पूरी तरह से बन्द कर दिए जाएँगे, जिससे भूजल स्तर भी बना रहेगा। सौंग बाँध पर 990 करोड़ और सूर्याधार बैराज पर 45 करोड़ रुपये खर्च का अनुमान है। इस योजना में छोटे-छोटे चेकडैम बनाकर बारिश के पानी को भी संरक्षित किया जाएगा। प्रोजेक्ट पूरा करने का लक्ष्य 2021 है। सूर्याधार बैराज के लिये टेंडर भी जारी हो चुके हैं।

- 40 करोड़ रुपये की व्यवस्था बजट में की है सरकार ने
- 01 हजार करोड़ रुपये बाहर से जुटाएगी सरकार

जीवन का आधार हैं वृक्ष

Source: 
दैनिक जागरण, 21 मार्च 2018

एक पेड़ अपने पूरे जीवनकाल में हर तरह से मनुष्य के काम आता है। भोजन प्रदान करने, छाँव देने, घर बनाने को लकड़ी देने से लेकर सांसे लेने के लिये जीवनदायिनी ऑक्सीजन भी देता है। आपके आस-पास जितने अधिक पेड़ उतना कम प्रदूषण। इसके बावजूद आधुनिकता की अंधाधुंध दौड़ में जंगलों की कटाई तेजी से जारी है। 2016 में कुल 7.3 करोड़ एकड़ वन क्षेत्र का खात्मा हुआ। वनों को बचाने और धरती को हरा-भरा बनाए रखने के लिये लोगों को जागरुक करने के उद्देश्य से हर साल आज के दिन अन्तरराष्ट्रीय वन दिवस मनाया जाता है।

- ⅓ धरती के कुल भूभाग पर वनों की हिस्सेदारी
- 1.6 अरब जीवनयापन के लिये वनों पर आश्रित वैश्विक आबादी

सतत विकास के लिये अहम


1971 में यूरोपियन संघ की महासभा ने 21 मार्च को विश्व वानिकी दिवस घोषित किया। 28 नवम्बर, 2012 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस दिन को अन्तरराष्ट्रीय वन दिवस घोषित किया। लोगों को वनों की अहमियत समझाने और गरीबी मिटाने, पर्यावरण बचाने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में पेड़ों की भूमिका बताने के उद्देश्य से हर साल यह दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष की थीम है - वन और टिकाऊ शहर। इस वर्ष यह आयोजन दुनियाभर के शहरों को हरा-भरा, स्वस्थ और खुशहाल बनाने पर केंद्रित है।

अब तक की थीमें


2015 - वन , मौसम, बदलाव
2016 - वन और जंगल
2017 - वन और ऊर्जा

घट रहे जंगल


अमेरिका स्थिति यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड द्वारा अक्टूबर, 2017 में पेश की गई रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में अब तक का रिकॉर्ड (7.3 करोड़ एकड़) वन क्षेत्र कम हुआ। यह 2015 के मुकाबले 51 फीसद अधिक है। सर्वाधिक वन क्षेत्र दावानल से खत्म हुआ। कृषि, खनन और लकड़ी जुटाने के लिये भी बड़ी संख्या में पेड़ काटे गए।

जंगल बचाने के आधुनिक प्रयास