डूबता वेनिस तैरते भवन

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अमर उजाला, 26 मई, 2018

दुनिया में वेनिस जैसी शायद ही कोई और जगह हो, जो पानी में तैरती नजर आती है। तैरते हुये इस शहर ने न केवल गलियों को नहरों में और जमीनों को द्वीपों में बदल दिया है, बल्कि इसके मकानों के लकड़ी के पाये पानी में डूबे हुए हैं। समुद्र से लगे दूसरे इलाकों की तरह दुनिया का यह खूबसूरत शहर भी अब खतरे का सामना कर रहा है, क्योंकि जल-स्तर लगातार बढ़ रहा है और जमीन सिकुड़ती जा रही है।

वेनिस में हर दूसरे साल होने वाले आर्ट एंड आर्किटेक्चर के आयोजनों में इस साल इसकी शुरुआत आज हो रही है। शहर के इस आसन्न खतरे की ओर ध्यान दिलाया जाता रहा है। टिकाऊ स्थापत्य, जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते जल-स्तर के बारे में शहर वासियों को बताया जाता रहा है। अनेक लोगों ने बढ़ते जल-स्तर के अनुरूप अपने भवनों को ऊँचा उठा लिया है। कला प्रेमियों के देश इटली के वेनिस शहर में फ्लोटिंग आर्किटेक्चर यानी तैरती स्थापत्य कला अब समय की जरूरत है।

आर्ट एंड आर्किटेक्चर के द्विवार्षिक आयोजनों के एक निदेशक वोने फैरेल कहते हैं, “हम जिस समस्या से जूझ रहे हैं, उसमें आर्किटेक्ट ही अपने मौलिक विचारों के जरिये नई दिशा दे सकते हैं।” उनके मुताबिक, गम्भीर पर्यावरणीय समस्या के बीच हमारे आर्किटेक्ट अगर फ्लोटिंग बिल्डिंग्स जैसी उभरती तकनीकों के मामले में अपनी भूमिका निभा पाये तभी वे अपने पेशे के साथ न्याय कर पाएँगे। बात सिर्फ वेनिस तक सीमित नहीं है। चूँकि शहरों में निर्माण के लिये जमीन का न होना और जल-स्तर बढ़ना अब एक वैश्विक समस्या है, इसलिये दुनिया भर के आर्किटेक्ट्स, नाव बनाने वाले, डेवलपर्स और नगर योजनाकार इसे एक अवसर की तरह ले रहे हैं। वे डिजाइनर होम्स और फ्लोटिंग रिसॉर्ट्स बना रहे हैं। यहाँ तक कि फ्लोटिंग सिटीज भी उनकी योजनाओं में हैं।

पॉलिथिन होटलों और वेडिंग प्वाइंट पर कसेगा शिकंजा

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हिन्दुस्तान, 25 मई, 2018

शहर के होटल, वेडिंग प्वाइट को अपने यहाँ बोर्ड पर ‘पॉलिथिन प्रतिबन्धित’ होने की बात लिखना अनिवार्य कर दिया गया है। सभी को बोर्ड में लिखना होगा कि पॉलिथिन प्रतिबन्धित है और इसका इस्तेमाल यहाँ न करें। ऐसा न करने पर सम्बन्धित होटल व वेडिंग प्वाइंट के खिलाफ पाँच हजार रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा।

होटलों,वेडिंग प्वाइंट में प्लास्टिक के डिस्पोजल चम्मच, काँटे, प्लेट आदि का खूब इस्तेमाल होता है। पूर्व में शासन, प्रशासन व गढ़वाल आयुक्त की ओर से आदेश करने के बावजूद होटल व वेडिंग प्वाइंटों में प्लास्टिक युक्त सामग्री का खूब इस्तेमाल होता है। गुरुवार को अपर आयुक्त प्रशासन गढ़वाल मण्डल ने आदेश जारी किया है। इसमें कहा है कि राज्य में पॉलिथिन, थर्माकोल, प्लास्टिक के गिलास, प्लेट आदि प्रतिबन्धित है। जो भी इसका उपयोग, खरीद करते पाया जाता है उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। आदेश का उल्लघन करने वालों के खिलाफ पाँच हजार का जुर्माना लगाया जाएगा। एफआईआर भी कराई जाएगी।

जुर्माना नहीं भरा तो वेडिंग प्वाइंट मालिक पर होगी एफआईआर

प्लास्टिक युक्त सामग्री का इस्तेमाल करने में कुछ समय पहले अपर आयुक्त प्रशासन गढ़वाल मण्डल ने पशुपति वेडिंग प्वाइंट के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की थी। करीब 1.85 लाख का जुर्माना सम्बन्धित वेडिंग प्वाइंट पर लगाया गया था। लेकिन उक्त वेडिंग प्वाइंट ने अभी तक जुर्माना नहीं दिया है। अपर आयुक्त प्रशासन गढ़वाल मण्डल हरक सिंह रावत ने बताया कि पशुपति वेडिंग प्वाइंट को जुर्माना राशि नगर निगम में जमा करने के लिये सात दिन का समय दिया गया है। यदि ये राशि जमा नहीं हुई तो वेडिंग संचालक के खिलाफ थाने में मुकदमा दर्ज किया।


नगर निगम भी सक्रिय

रिस्पना और बिंदाल के जलग्रहण क्षेत्र पर अवैध कब्जा

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दैनिक जागरण, 23 मई, 2018

देहरादून। राजधानी की प्रमुख नदियों पर अफसरों की अनदेखी और अतिक्रमणकारियों की मनमानी से आबादी बस गई है। स्थिति यह है कि नदियों पर बहुमंजिला इमारतें और आवासीय प्रोजेक्ट तक खड़े कर दिये। अधिकारियों में दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव के कारण हालात और खराब होते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि शहर की नालियों को भी अतिक्रमणकारियों ने नहीं छोड़ा उन पर भी दुकानें बना ली है।

दून में सरकारी और निजी जमीनों को कब्जाने के मामले आम हैं। इतना ही नहीं यहाँ पर नदी, नाले और नालियों पर भी अतिक्रमणकारियों का राज चलता है। निरन्तर बढ़ रहे अतिक्रमण से जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। स्थिति यह है कि शहर की प्रमुख नदी रिस्पना को मसूरी से लगे शिखरफॉल से करीब 12 किमी दूर मोथरोवाला संगम, बिंदाल को मालसी से सुसवा तक 13 किमी, टौंस को गुच्चू पानी से प्रेमनगर तक, सौंग को मालदेवता से डोईवाला तक तथा नून नदी को कैंट इलाके में अतिक्रमणकारियों ने पूरी तरह से कब्जा रखा है। मगर कार्रवाई के नाम पर यहाँ चालान भी नहीं होता है। इससे अतिक्रमणकारियों के हौसले बुलंद हैं। इसी का परिणाम है कि नदियों को बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे आबादी में तब्दील हो रहा है।

इन नदियों पर अतिक्रमण शिखर फॉल, कैरवाना गाँव, राजपुर, पुलिस अॉफिसर्स कॉलोनी, रायपुर, भगत सिंह कॉलोनी, चूना भट्ठा, अधोईवाला, नई बस्ती डालनवाला क्षेत्र, रिस्पना क्षेत्र, डिफेंस कॉलोनी मोथरोवाला।

मालसी क्षेत्र, कैंटोनमेंट क्षेत्र, जाखन, सालावाला, हाथीबड़कला, बिंदाल बस्ती, बिंदाल पुल, खुड़बुड़ा, कैंट क्षेत्र की नून नदी, गुच्चूपानी से प्रेमनगर तक टौंस नदी और मालदेवता से डोईवाला तक सौंग नदी पर भी अवैध कब्जे हो रखे हैं।

आबादी तक पहुँची वनाग्नि की लपटें

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राष्ट्रीय सहारा, 23 मई, 2018

जंगलों की उपेक्षा के कारण लगती आगजंगलों की उपेक्षा के कारण लगती आग पौड़ी शहर के चारों तरफ के जंगल वनाग्नि की भेंट चढ़ चुके हैं, अब जंगलों से होकर आग बस्ती की ओर रुख कर गई है। मंगलवार को पौड़ी के कण्डोलिया क्षेत्र में आग डीएफओ कार्यालय के निकट स्थित घरों तक जा पहुँची। एहतियात के तौर पर केन्द्रीय विद्यालय के बच्चों की छुट्टी कर दी गई। वन विभाग व फायर सर्विस के घंटों प्रयास के बाद आग पर काबू पाया जा सका।

कण्डोलिया ल्वाली वाली मोटर मार्ग पर मंगलवार सुबह से लगी आग हवा के साथ तेज होती चली गई। देखते ही देखते आग घरों तक जा पहुँची। वन विभाग और फायर सर्विस ने घंटों मशक्कत के बाद घरों तक पहुँची आग पर काबू पाया। बढ़ती आग के कारण पास में केन्द्रीय विद्यालय को खतरा देख सभी स्कूली छात्रों की छुट्टी करवाकर उन्हें घर भेज दिया गया। स्कूली छात्रों ने बताया की सुबह से ही आग का धुँआ उनकी कक्षा के अन्दर आ रहा था, जिससे कि उन्हें पढ़ने में भी समस्या हो रही थी। साथ ही बढ़ती आग से विद्यालय को भी खतरा पैदा हो गया था। इसे देखते हुये स्कूली बच्चों को सुरक्षा के लिहाज से घर भेज दिया गया।

स्थानीय लोगों में आग को लेकर खौफ का माहौल बना हुआ है। चार साल पहले भी इसी तरह से कण्डोलिया में आग फैलते हुए घरों तक जा पहुँची थी। शाम का समय होने के कारण आग पर काबू नहीं पाया गया, जिस कारण लाखों का सामान जलकर राख हो गया था। रोष व्यक्त करते हुए स्थानीय लोगों का कहना है कि कण्डोलिया के पास ही प्रभागीय वनाधिकारी सिविल एवं सोयम का कार्यालय है। उसके बाद भी विभाग द्वारा सतर्कता नहीं बरती जा रही।

कच्चे तालाब में डुबा दिये साढ़े आठ लाख

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दैनिक जागरण, 13 अप्रैल 2018

देहरादून। चकराता ब्लॉक की बेगी ग्राम पंचायत में मनरेगा के तहत कच्चे तालाब निर्माण के नाम पर साढ़े आठ लाख रुपए की वित्तीय अनियमितता सामने आई है। पूर्व प्रधान ने कुछ कार्य दूसरी ग्राम पंचायत में करा दिये तो कुछ कार्य हुये नहीं और उसके नाम पर भुगतान हो गया। अब जिलाधिकारी की ओर से पूर्व प्रधान को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। जवाब आने के बाद वसूली की कार्रवाई की जाएगी।

बेगी निवासी फकीर चन्द ने जिलाधिकारी से इस सम्बन्ध में शिकायत की थी कि वर्ष 2007 से 2010 के मध्य विभिन्न कार्यों में बड़ी वित्तीय गड़बड़ी की गई है। इसके बाद मुख्य विकास अधिकारी ने तीन सदस्यीय कमेटी गठित कर जाँच शुरू कराई थी। जाँच में सामने आया कि पूर्व ग्राम प्रधान ने छह ऐसी जगह तालाब निर्माण कराया, जो क्षेत्र उक्त पंचायत में आता ही नहीं था। इस पर चार लाख 27 हजार रुपए खर्च किये गये।

इसके अलावा पाँच मामले ऐसे हैं, जहाँ तालाब निर्माण दिखाया, लेकिन जाँच के दौरान वहाँ कुछ भी नही मिला। साथ ही निर्माण सामग्री ढुलान के नाम पर भी फर्जी भुगतान किया गया। जिन लोगों को भुगतान होना दर्शाया गया है, उन्होंने भी जाँच समिति को लिखित में दिया है कि उन्होंने ऐसा कोई काम किया ही नहीं। आरोप है कि खाते से पैसा निकालने के लिये उनके फर्जी हस्ताक्षरों का इस्तेमाल किया गया।

मुख्य विकास अधिकारी जी.एस. रावत ने बताया कि उप जिलाधिकारी चकराता से कार्यस्थल चिन्हित करने के लिये पत्र लिखा गया था। चकराता तहसील के राजस्व उप निरीक्षक ने जाँच की और रिपोर्ट दी कि कौन-कौन से कार्यस्थल उक्त पंचायत क्षेत्र से बाहर हैं। मनरेगा के नियमानुसार दूसरे क्षेत्र में काम नहीं कराया जा सकता। नोटिस जारी करने के 20 दिन के भीतर पूर्व प्रधान को जवाब देना होगा। अगर कोई जवाब नहीं आता तो माना जाएगा कि उन्हें आरोप मान्य हैं।

बंजारवाला ग्राम प्रधान को भी नोटिस

हिण्डन सेवा - सरकार और समाज का अनूठा संगम

Author: 
रमन त्यागी

हिंडन की सफाईहिंडन की सफाईकल नहीं आज और आज नहीं अब.......इसी भाव के साथ डॉ. प्रभात कुमार ने जुलाई 2017 को हिण्डन नदी को बदहाली से उबारने का साहसी निर्णय लिया था। उस निर्णय का प्रतिफल था ‘निर्मल हिण्डन कार्यक्रम’ का जन्म। लगभग एक वर्ष के अपने सफर में निर्मल हिण्डन कार्यक्रम ने हिण्डन सेवा के रूप में समाज और सरकार के समन्वय का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया।

हिण्डन सेवा का कार्य इस सोच के साथ प्रारम्भ किया गया था कि हिण्डन व उसकी सहायक नदियों को समाज के सहयोग से गन्दगी मुक्त किया जाएगा। इस कार्य के लिये सभी आमंत्रित थे। किसी पर कोई दबाव नहीं था पर सेवा में लोग भाग लें इसके लिये आग्रह जरूर किया गया था। इस आग्रह पर समाज ने भी निराश नहीं किया और उठ खड़ा हुआ हिण्डन सेवा के लिये। साथ बैठे, बात हुई, रणनीति बनी और हिण्डन सेवा प्रारम्भ हो गई।

22 अप्रैल का दिन इस बात का साक्षी बना जब सरकार और समाज के नुमाइंदे उल्लास के साथ हिण्डन को गंदगीमुक्त करने के उद्देश्य से उसमें कूद पड़े। सेवा का यह कार्य पुरा महादेव के निकट से बहती हिण्डन नदी से प्रारम्भ हुआ। नदी मेरठ और बागपत जनपद की सीमा रेखा है। इसके पूर्वी दिशा में मेरठ तथा पश्चिम में बागपत जनपद हैं।

दोनों जनपदों की सीमा पर हिण्डन नदी की सेवा का कार्य एक साथ प्रारम्भ किया गया। मेरठ व बागपत दोनों ही जनपदों के प्रशासनिक अधिकारी, गाँवों के प्रधान, बड़ी संख्या में ग्रामीण, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि, स्वयंसेवक व राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ता जुट पड़े नदी सेवा में।

भयंकर प्रदूषण के कारण जिस हिण्डन नदी के निकट खड़ा होना भी दूभर था उत्साह से लबरेज लोगों ने एक ही दिन में उसके करीब एक किलोमीटर हिस्से की सफाई कर दी।

बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड से फसलों में बढ़ सकता है कीट प्रकोप

Source: 
इंडिया साइंस वायर, 11 मई, 2018

डॉ. गुरु प्रसन्ना पांडीडॉ. गुरु प्रसन्ना पांडी वातावरण में लगातार बढ़ रही कार्बन डाइऑक्साइड के कारण फसल उत्पादन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, पर इसके साथ ही फसलों के लिये हानिकारक कीटों की आबादी में भी बढ़ोत्तरी हो सकती है।

धान की फसल और उसमें लगने वाले भूरा फुदका कीट पर कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ी हुई मात्रा के प्रभावों का अध्ययन करने के बाद कटक स्थित राष्ट्रीय चावल अनुसन्धान संस्थान और नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान के वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुँचे हैं।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि वर्ष 2050 में कार्बन डाइऑक्साइड 550 पीपीएम और वर्ष 2100 में 730–1020 पीपीएम तक पहुँच जाएगी। भविष्य में फसलों और कीटों दोनों के अनुकूलन पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।

भूरा फुदका कीट अध्ययन के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड की अलग-अलग दो तरह की मात्राओं क्रमशः 390 से 392 पीपीएम और 578 से 584 पीपीएम के वातावरण में चावल की पूसा बासमती-1401 किस्म को बरसात के मौसम के दौरान 2.5 मीटर ऊँचे और तीन मीटर चौड़े ऊपर से खुले हुए कक्ष में नियंत्रित परिस्थितियों में उगाया गया था। समयानुसार पौधों को भूरा फुदका (ब्राउन प्लांट हापर) कीट, जिसका वैज्ञानिक नाम नीलापर्वता लुजेन्‍स है, से संक्रमित कराया गया।

स्वच्छ पर्यावरण के लिये विज्ञान और प्रौद्योगिकी आधारित नवाचार

Author: 
उमाशंकर मिश्र
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 10 मई, 2018

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा आयोजित प्रदर्शनी में भाग लेते बच्चेविज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा आयोजित प्रदर्शनी में भाग लेते बच्चे नई दिल्ली। कचरा प्रबन्धन, दूषित जल शोधन, प्रदूषण नियंत्रण, हरित और सौर ऊर्जा के उपयोग समेत विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी आधारित कुछ ऐसे प्रयोग हैं, जो स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण सुनिश्चत करने में मददगार हो सकते हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा आयोजित एक प्रदर्शनी में इसी तरह के प्रयोगों पर आधारित तकनीकी एवं वैज्ञानिक नवाचारों को दर्शाया गया है।

इस प्रदर्शनी का उद्घाटन 7 मई को विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के सचिव प्रोफेसर आशुतोष शर्मा ने किया। नई दिल्ली के टेक्नोलॉजी भवन में लगी इस प्रदर्शनी का बृहस्पतिवार को अन्तिम दिन था। इस प्रदर्शनी को देखने के लिये हर रोज बड़ी संख्या में लोग पहुँच रहे थे, जिनमें स्कूली बच्चों की संख्या सबसे अधिक थी। स्वच्छ भारत मिशन के अन्तर्गत चल रहे स्वच्छता पखवाड़े के दौरान पर्यावरण की स्वच्छता में योगदान देने वाली प्रौद्योगिकियों को प्रदर्शनी में पोस्टर्स और मॉडल्स के जरिये प्रदर्शित किया गया।

समझें नदियों की भाषा


जंगल ही वास्तव में नदियों को बचाने के यंत्र हैं। वृक्षारोपण करते समय बहुत सावधानी से प्रजातियों का चयन किया जाना चाहिए ताकि नदियों को संरक्षित करने में हमें सहायता मिल सके। उन्होंने 6वीं सदी में वाराहमिहिर द्वारा लिखी वराहसंहिता का उल्लेख भी किया जिसमें भूजल और वृक्षों पर आधारित अनेक लक्षणों का विवरण उपलब्ध है। यह ग्रन्थ नदी संरक्षण पर काम करने वाले लोगों के लिये पथ प्रदर्शक का काम कर सकती है। भोपाल के सप्रे संग्रहालय में 17 अप्रैल को नदी मित्रों का जमावड़ा लगा था। मौका था मध्य प्रदेश के नर्मदा कछार की सूखती नदियों को फिर से अविरल बनाने पर चिन्तन का। चिन्तन दो घंटे तक जारी रहा जिसमें वन विभाग के अफसर, बाँध निर्माण से जुड़े सिविल इंजीनियर, भूवैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता और मीडिया से जुड़े लोगों ने भाग लिया।

चिन्तन का लब्बोलुआब था नदियों को समग्रता में समझकर ही उन्हें संरक्षित किया जा सकता है। और इस कार्य में सबको अपनी सहभागिता सुनिश्चित करनी होगी। एकांगी सोच नदियों के पुनर्जीवन का आधार नहीं हो सकती। बैठक की अध्यक्षता भारतीय वन सेवा के पूर्व अतिरिक्त मुख्य वन संरक्षक विनायक सिलेकर ने की और अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों ने अपनी बातें रखीं।