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नरेगा

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम (नरेगा)के संसाधन


पानी के पोर्टल के माध्यम से हमारा मुख्य ध्येय रोज़गार गारण्टी कार्यक्रम के अंतर्गत किए जा रहे कार्यों का बेहतर नियोजन, कार्यान्वयन और सामाजिक अंकेक्षण सुनिश्चित करना है। ताकि रोज़गार गारण्टी स्कीम दीर्घकालीन खाद्यसुरक्षा, पानी-पर्यावरण और निरंतर आजीविका के सृजन का रास्ता बन सके।

रोजगार गारंटी स्कीम (नरेगा) पर एक वीडियो



National Rural Employment Guarantee scheme in Hindi


भारत का राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून मानव इतिहास के सबसे बड़े रोजगार कार्यक्रम का वादा करता है। वर्ष 2008-09 में भारत सरकार ने इस कार्यक्रम के लिए 26,500 करोड़ रुपया मुहैया करायें है और इस कार्यक्रम का विस्तार अब पूरे देश में हो चुका है जिसमें सबसे पिछड़े और उपेक्षित क्षेत्र शामिल हैं। सबसे गरीब परिवारों को काम उपलब्ध कराते हुए यह कार्यक्रम गांव में स्थायी परिसम्पत्तियों के सृजन की सम्भावना उज्ज्वल करता है। इस कार्यक्रम का शंखनाद ग्रामीण बदहाली और दुर्गति के साये में हुआ है। विकास के नक्शे पर देश के करोड़ो लोगों का चेहरा आज भी धूमिल है।

नरेगा- दिशा निर्देश

इस अध्याय में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम के मुख्य प्रावधानों का सारांश दिया गया है जिसमें केन्द्रिय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी अधिकारिक दिशा निर्देश का भी समावेश किया गया है।

2.1 अधिनियम के उद्देश्य

नरेगा-संदर्भ एवं राष्ट्रीय महत्त्व

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम: संदर्भ एवं राष्ट्रीय महत्त्व



1.1 संदर्भ
आर्थिक वृद्धि दर में बढ़त और स्टाक मार्केट की आक्रमक चढ़ाई ने भारत को दुनिया की सबसे आकर्षक अर्थव्यवस्थाओं की श्रेणी में ला खड़ा किया है। भारत ने विदेशी निवेश के मामले में तो अमेरिका को भी विश्व के दूसरे स्थान से हटा दिया है। अब इस संदर्भ में प्रथम स्थान पर चीन के बाद भारत की ही गिनती होती है। किन्तु यह अप्रत्याशित प्रदर्शन भारत की उस दुखती रग को छिपाता है जिसको लोगों ने 2004 के ऐतिहासिक चुनावों में अपने मत के माध्यम से उजागर किया -

भूमिका

दिसंबर 2005 में भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने समाज प्रगति सहयोग से निवेदन किया कि हाल ही में पारित राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारण्टी अधिनियम पर संस्था एक प्रशिक्षण पुस्तक तैयार करे। इससे पूर्व समाज प्रगति सहयोग ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यू.एन.डी.पी) द्वारा नई दिल्ली में आयोजित एक बैठक में प्रशिक्षण पुस्तक के संभावित आकार पर एक प्रस्तुति की थी। अप्रैल 2006 तक पुस्तक का पहला मसौदा तैयार कर समाज प्रगति सहयोग ने ग्रामीण विकास मंत्रालय, नई दिल्ली में आयोजित एक विशेष परामर्श बैठक में उसकी प्रस्तुति की। बैठक में देश के अनेक विषय विशेषज्ञ उपस्थित थे। जो किताब आपके हाथ में है उसका जन्म इस लंबी प्रक्रिया से गुज़र कर हुआ।

हाथ उठें निर्माण में

mआज देश में विश्वास और विश्वसनीयता का संकट पैदा हो गया है। दूर-दराज़ के ग्रामीण आदिवासी क्षेत्रों में तो एकता का यह सूत्रा बहुत ही कमज़ोर है। हम सभी को अपने ग्रामीण, आदिवासी भाई-बहनों की ओर हाथ बढ़ाना है, उनके दुख-दर्द, उनकी वेदना को समझना ही नहीं, अनुभव भी करना है। विकास की एक नवीन परिभाषा स्थापित करनी है। इस सृजनात्मक संघर्ष में देश के युवा वर्ग का नेतृत्व रहेगा, ऐसी मेरी आशा है। इस संघर्ष में आवश्यक है उनकी कल्पना शक्ति और उनका मर्मस्पर्श, जो भारत का पुननिर्माण करेंगे।

जलागम कार्य प्रशिक्षण पुस्तक

राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारण्टी अधिनियम


जलागम कार्य प्रशिक्षण पुस्तक



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बाबा आमटे लोक सशक्तिकरण केन्द्र


समाज प्रगति सहयोग
जुलाई 2006

डूंगरपुर की रोजगार गारंटी योजना – परिवर्तन के चिन्ह

Source: 
निर्मला लक्ष्मणन/ nregaconsortium.in

एक महत्वपूर्ण सॉशल ऑडिट की रिपोर्ट से पता चला है कि राजस्थान के डूंगरपुर में जहाँ लोग रोजगार को लेकर चुनौतियों से जूझ रहे थे, वहाँ अब सार्वजनिक कार्यों में रोजगार में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

देश के बेहद गरीब ग्रामीण इलाकों में एक “खामोश क्रान्ति” की शुरुआत हो चुकी है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (नरेगा), देश के चुनिन्दा जिलों में 2 फ़रवरी से प्रारम्भ हो चुका है और इससे इन जिलों की तस्वीर बदलने लगी है। राजस्थान से चुने गये छः जिलों में से एक है डूंग़रपुर, जिसे नरेगा लागू करने हेतु प्रथम चरण में चुना गया है। यहाँ किये गये एक सॉशल ऑडिट के अनुसार पता चला है कि गरीब ग्रामीणों के जीवन में गत दो माह में ही सुधार हुआ है। यहां आधे से अधिक परिवारों का कम से कम एक सदस्य नरेगा के तहत रोजगार पा चुका है।

यह सामाजिक परीक्षण रिपोर्ट अप्रैल के अन्त में जाँची गई, जिसमें 11 राज्यों के 600 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। आस्था संस्थान और मज़दूर किसान शक्ति संगठन (MKSS)

प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण कोई रामबाण इलाज नहीं है…

वेब/संगठन: 
nregaconsortium.in
Source: 
मिहिर शाह
गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रम उसी समय सफ़ल सिद्ध हो सकते हैं, जब ऐसे कार्यक्रम उन्हें सतत आजीविका चलाने लायक बना सकें, ताकि गरीब सरकारी मदद पर आश्रित ही न रहें। इस कार्य के लिये मजबूत जन-संस्थान, सटीक तकनीक, मानव संसाधन का हुनर विकास, बाज़ार की सहायता तथा एक पर्याप्त निवेश सभी साथ में होना चाहिये। डायरेक्ट कैश ट्रांसफ़र (DCT) नामक शब्द आजकल विकास समूहों के भीतर काफ़ी चर्चा में है। इकोनोमिस्ट अरविन्द सुब्रह्मणियन ने भारत में गरीबी दूर करने के तौर तरीकों के बारे में अपनी पुस्तक “फ़र्स्ट बेस्ट ऑप्शन” मे DCT के बारे में लिखा है (द हिन्दू, अगस्त 24, 2008)। हाल ही में प्रकाशित “इकॉनॉमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली (अप्रैल 12, 2008)” के अंक में सुब्रह्मणियन के विचारों से देवेश कपूर और पार्थ मुखोपाध्याय (KMS) ने भी अन्य कई मुद्दों पर विस्तार से सहमति जताई है। KMS कहते हैं, खाद्य, उर्वरक और ईंधन इन तीन प्रमुख वस्तुओं पर भारत के केन्द्रीय बजट में केन्द्र प्रायोजित योजनाओं में ही लगभग 2,00,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी जाती है। वे पूछते हैं कि – क्या भारत के गरीबों के विकास और उसके उन्मूलन के लक्ष्यों को केन्द्रीय तन्त्र के माध्यम से इतनी विशाल धनराशि खर्च करके भी पाया जा सका है? क्या यह एक अच्छा तरीका कहा जा सकता है? मैं कहूँगा, निश्चित ही है, बजाय इसके कि मुँह में पानी लाने लायक एक करोड़ की राशि प्रत्येक ग्राम पंचायत के खाते में सीधे डाल दी जाये।