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संवेदनहीनता का सबूत है प्रदूषण का बढ़ता कहर


वायु प्रदूषण के मामले में मौजूदा हालात इस आशंका को बल प्रदान करते हैं कि आने वाली सदी में हमें इससे भी भयावह स्थिति का सामना करना पड़ेगा। उस समय हम तापमान वृद्धि के अभूतपूर्व संकट से जूझ रहे होंगे। यह दुखद स्थिति कार्बन उत्सर्जन सीमित करने के मामले में हमारी संवेदनहीनता का परिचायक है। इस मामले में हम पूरी तरह नाकाम रहे हैं। इस नाकामी में हमारी अनियोजित और असुरक्षित आर्थिक गतिविधियों की प्रभावी भूमिका तो है ही, अंधाधुंध ढाँचागत विकास ने भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। आज प्रदूषण एक ऐसी समस्या है जिसने कमोबेश पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है। पृथ्वी के वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में बढ़ोत्तरी ने वायु प्रदूषण की समस्या को भयावह स्तर तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई है। दुनिया के वैज्ञानिकों के शोध अध्ययन इस बात को प्रमाणित करते हैं कि आज वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा का स्तर खतरनाक स्थिति को पार कर गया है। संयुक्त राष्ट्र और विश्व मौसम विज्ञान संगठन की ताजा रिपोर्टें इसकी जीती-जागती मिसाल हैं कि बीते तीस लाख सालों में भी ऐसा नहीं हुआ है जैसा हम आज देख रहे हैं। दुनिया में हर साल 17 लाख बच्चों की प्रदूषण से मौत हालात की भयावहता का सबूत है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण रिपोर्ट की मानें तो अन्तरराष्ट्रीय लक्ष्य और घरेलू प्रतिबद्धताओं के बीच इतना बड़ा अंतर है कि यह पृथ्वी को उस स्तर पर जहाँ हम औद्योगिक क्रांति के पहले खड़े थे, वहाँ लाकर छोड़ देता है। यह सबसे अधिक दुखदायी, गम्भीर और चिंताजनक स्थिति है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन की ताजा रिपोर्ट यह साबित करती है कि पृथ्वी के वातावरण में साल 2015 में कार्बन डाइऑक्साइड के अनुपात में बढ़ोत्तरी बीते दस वर्षों की औसत बढ़ोत्तरी से तकरीबन 50 फीसदी अधिक हुई थी। और 2016 में तो इसने कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में बढ़ोत्तरी के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये।

वायु प्रदूषण के मामले में मौजूदा हालात इस आशंका को बल प्रदान करते हैं कि आने वाली सदी में हमें इससे भी भयावह स्थिति का सामना करना पड़ेगा। उस समय हम तापमान वृद्धि के अभूतपूर्व संकट से जूझ रहे होंगे। यह दुखद स्थिति कार्बन उत्सर्जन सीमित करने के मामले में हमारी संवेदनहीनता का परिचायक है। इस मामले में हम पूरी तरह नाकाम रहे हैं। इस नाकामी में हमारी अनियोजित और असुरक्षित आर्थिक गतिविधियों की प्रभावी भूमिका तो है ही, अंधाधुंध ढाँचागत विकास ने भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। साथ ही इस सच्चाई को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि दुनिया के तमाम देशों में हो रहे अंधाधुंध ढाँचागत विकास से विनाश का खतरा बढ़ रहा है। दुनिया के वैज्ञानिकों द्वारा किये गये हालिया अध्ययनों में चेतावनी दी गई है कि अनियंत्रित विकास, आर्थिक- सामाजिक और पर्यावरणीय खतरों की ओर ले जा रहा है। उन्होंने इस बात पर दुख और चिंता जाहिर की है कि इस ओर किसी का ध्यान नहीं है।

दुनिया की स्थिति पर नजर डालें तो पता चलता है कि समूची दुनिया में सर्वाधिक प्रदूषण के मामले में रूस में स्थित दजेरजिंस्क, नारिल्स्क और रुडनाया प्रिस्तान जहरीले रसायन और खनन, उक्रेन परमाणु बिजली घर, किर्गिस्तान यूरेनियम, चीन खनन, भारत जहरीले रसायन, डॉमेनिकन रिपब्लिक जस्ते के विष, पेरू और जांबिया जहरीले रसायनों के लिये विख्यात हैं। अभी तक हमारे देश में राजधानी दिल्ली की पहचान दुनिया के पांचवें सबसे अधिक शोर वाले शहर के रूप में होती थी। यही नहीं वर्ल्ड हियरिंग इंडेक्स के अनुसार सर्वाधिक ध्वनि प्रदूषण और बहरेपन या अन्य कारणों से आने वाले शहरों की सूची में देश की राजधानी दिल्ली दुनिया में ग्वांगझोउ चीन के बाद दूसरे नम्बर पर है। इसके बाद काहिरा, मुंबई और इस्तांबूल आते हैं।

आईआईटी दिल्ली के ताजे अध्ययन में यह साफ हो गया है कि हाल-फिलहाल हमारे देश में ध्वनि प्रदूषण में कमी की कोई उम्मीद दिखाई नहीं देती। कारण ऐसी जगहों पर जहाँ 95 डेसिबल तक ध्वनि का स्तर हो, वहाँ रोजाना चार घंटे रहने से ही सुनाई देना बंद हो सकता है। ऐसी जगह तो 100 डेसिबल ध्वनि के स्तर में रोजाना दो घंटे ही रहना खतरनाक होता है। और यदि वहाँ 105 डेसिबल का ध्वनि स्तर हो, उस दशा में सुनाई देने की आशा ही बेमानी है यानी सुनाई देना उस स्थिति में बंद ही हो जायेगा।

वायु प्रदूषण को लें, सबसे पहले वाहनों की स्थिति का जायजा लें, यहाँ भले दस साल पुराने वाहनों पर रोक है लेकिन स्वच्छ ईंधन और टेक्नोलॉजी का एजेंडा अब भी अधूरा है। बढ़ती कारों और दुपहिया वाहनों की बेतहाशा बढ़ती तादाद पर आज भी अंकुश की बात सपना है। फिर वाहनों के मानकों के निर्धारण का सवाल भी अनसुलझा है। परिवहन विभाग की गाड़ियों का जायजा लें तो प्रदूषण जाँच में दिल्ली परिवहन और निजी मालिकों की तकरीब 90 फीसदी से अधिक बसें प्रदूषण मानकों पर खरी नहीं उतरी हैं। प्रदूषण मानकों में नाकाम रहने वाली बसों में प्रदूषण स्तर 90 से 120 एचएचयू तक पाया गया है। गौरतलब है कि यह यूरो 3 व यूरो 4 के लिये 65 एचएचयू होना चाहिए। जबकि यह 110 एक्यूआई तक पहुँच जाता है जबकि हवा में कार्बन मोनो ऑक्साइड की मात्रा 100 एक्यूआई से अधिक नहीं होनी चाहिए। असलियत यह है कि राजधानी की हवा में गाड़ियों के धुएँ के कारण प्रदूषण बढ़ रहा है। कारण यहाँ की हवा में कार्बन मोनो ऑक्साइड की मात्रा खतरनाक स्तर को पार कर गई है।

इसमें दो राय नहीं कि दिल्ली के प्रदूषण में वाहनों के धुएँ की हिस्सेदारी 17 फीसदी है। जबकि पेटकोक एवं अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की हिस्सेदारी 16 फीसदी है। इसमें सबसे ज्यादा 23 फीसदी हिस्सेदारी निर्माण गतिविधियों से उत्पन्न धूल और मिट्टी के कणों की है। इसके अलावा 20 फीसदी माध्यमिक कणों की है जो उत्सर्जित कणों की वायुमंडल में प्रतिक्रिया से बनते हैं। 12 फीसदी जैव ईंधन की हिस्सेदारी है जिसके लिये पड़ोसी राज्य जिम्मेवार हैं जो पराली और गोबर आदि के जलने से होती है। इसके अलावा तकरीबन 7 फीसदी औद्योगिक उत्सर्जन और 5 फीसदी समुद्री नमक की हिस्सेदारी है।

दरअसल पेटकोक एक ऐसा पेट्रोलियम उत्पाद है जो रिफाइनरी में सबसे अंत में निकलता है। जाहिर सी बात है कि यह बेहद खतरनाक है। यह पेट्रोल, डीजल और कोयले की तुलना में सस्ता होता है, इसलिए उद्योगों में इसका बेतहाशा इस्तेमाल होता है। खासकर सीमेंट कारखानों में इसका अत्यधिक इस्तेमाल होता है। पेटकोक से कोयले की तुलना में 10 फीसदी ज्यादा कार्बन का उत्सर्जन होता है। कोयले से सल्फर की उत्सर्जन मात्रा 4000 पार्ट प्रति मिलियन निर्धारित है जबकि पेटकोक में यह उत्सर्जन एनसीआर में 72000 पीपीएम पाया गया है। जाहिर है यह प्रदूषण की परत को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है। इसके बेतहाशा इस्तेमाल ने समस्या को और विकराल बना दिया है। पेटकोक और फर्नेस ऑयल पर प्रतिबंध लगाने की मांग पर भी अदालत में निर्णय लटका हुआ है।

इसके अलावा दिल्ली में रोजाना निकलने वाला तकरीब 9 हजार मीट्रिक टन कूड़ा-कचरा भी दिल्ली की आबोहवा को विषाक्त बनाने में कम दोषी नहीं हैं। एक समस्या तो इनके रख-रखाव की ही है जिसमें दिल्ली के तीनों निगमों की नाकामी जगजाहिर है ही, दूसरे कचरा सड़ने से स्वास्थ्य के लिये बेहद हानिकारक गैसें जैसे सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, एसिटलीन, मीथेन, नाइट्रोजन ऑक्साइड निकलती हैं। ये गैसें अस्थमा जैसी फेफड़े और सांस की बीमारियों के लिये जिम्मेवार हैं। साथ ही इससे निकलने वाले खतरनाक तत्व कैंसर के भी कारण बन रहे हैं। बच्चों और महिलाओं पर ये गैसें घातक प्रभाव डाल रही हैं। मीथेन के चलते कूड़े के ढेरों पर आग लगने की घटनाएँ आम बात है। इससे वातावरण में खतरनाक धुएँ का जहर आये-दिन घुलता है। इससे होने वाला प्रदूषण लोगों को जानलेवा बीमारियों का शिकार बना रहा है। घरों के अंदर का प्रदूषण भी मौत का कारण बन रहा है। देश में हर साल इससे 43 लाख लोग चपेट में आते हैं। 2015 में तो इससे 1.24 लाख लोगों की मौत हुई है। 2010 में 10 लाख बच्चों का समय से पहले जन्म हुआ है। दुखद यह है कि यह तादाद दुनिया में सर्वाधिक और चीन से दोगुनी है।

इन हालातों ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली को गैस चैम्बर में तब्दील कर दिया है। नतीजन अस्पतालों में निमोनिया, सांस, ब्लड प्रेशर, हृदय, किडनी तथा ब्लैडर, अनिद्रा और कोलेरैक्टल के कैंसर और फेफड़े से सम्बंधित तथा आँख में जलन की बीमारियों से पीड़ित लोगों का तांता लगा है। इनमें महिलाओं, बूढ़ोंं और बच्चों की तादाद सर्वाधिक है। हालात की गम्भीरता को देखते हुए 12वीं कक्षा तक के स्कूल बंद कर दिये गए हैं। लोगों से बहुत जरूरत होने पर ही घर से बाहर मॉस्क पहनकर निकलने को कहा जा रहा है। केन्द्रीय पेट्रोलियम एवं कौशल विकास मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान पर्यावरण, समाज के विकास और स्वास्थ्य के लिये ईंधन के संरक्षण की अपील कर रहे हैं। इसे वह सबकी सामूहिक जिम्मेवारी बता रहे हैं। हाईकोर्ट प्रदूषण के लिये जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई करने के निर्देश दे रहा है। प्रदूषण फैलाने वाले 35 बिजलीघरों पर सख्ती, बीते साल की तरह सम-विषम का फार्मूला लागू करने और प्रदूषण से निपटने की योजना की तैयारी की जा रही है। निष्कर्ष यह कि यह सब हमारी नाकामी और लापरवाही का नतीजा है।

अब हमें चेत जाना चाहिए। हमें चीन से सबक लेना चाहिए जिसने अपने यहाँ कोशिश करके कुछ हद तक अपनी आबोहवा को सुधारा। उसके विपरीत हम सभा-सेमिनार और बहसों में ही उलझे रहे। नतीजा प्रदूषण स्तर का बीते एक दशक में खतरनाक स्तर के पार चले जाना है। मौजूदा हालात वह चाहे यूएन हो या डब्ल्यूएचओ या फिर कोई और संगठन की समय-समय पर दी गई चेतावनियों और सुझावों को नजरअंदाज करने के जीते-जागते सबूत हैं। इसके भी कि हमारे यहाँ प्रदूषण के खात्मे की दिशा ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं तक पर उतना वैज्ञानिक तरीके से काम नहीं हुआ, जैसाकि होना चाहिए था। यह हमारी व्यवस्था की विसंगति की जीती-जागती मिसाल है। अब समय संवेदनहीन नहीं, संवेदनशील होकर सतर्क होने और कुछ कारगर कदम उठाने का है। अन्यथा बहुत देर हो जायेगी।


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