अन्दर शौचालय, बाहर शौच - सरकार लक्ष्य से दूर

Submitted by RuralWater on Sat, 04/28/2018 - 18:56
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डाउन टू अर्थ, अप्रैल, 2018


खुले में शौचखुले में शौच (फोटो साभार - स्क्रॉल.इन)पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय (एमडीडब्ल्यूएस) ने 1 मार्च, 2018 को इण्डिया हैबिटेट सेंटर में ग्रामीण स्वच्छ भारत मिशन पर एक बैठक का आयोजन किया। बैठक में स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) पर तीसरी बार चर्चा की जा रही थी। यह पहली बार नहीं है कि मंत्रालय ने मिशन की प्रगति के बारे में चर्चा करने के लिये इससे सम्बन्धित लोगों को इकट्ठा किया हो। भारत को स्वच्छ बनाने की समय सीमा (अक्टूबर, 2019) तेजी से सामने आ रही है।

बैठक पेयजल और स्वच्छता सचिव, परमेश्वरन अय्यर की प्रस्तुति के साथ शुरू हुई। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि घरेलू कवरेज पर मंत्रालय द्वारा दिखाए गए आँकड़े बहुत प्रभावशाली हैं। अक्टूबर 2014 में जब मिशन शुरू किया गया था तो कवरेज लगभग 40 प्रतिशत थी, जो कि 38.70 प्रतिशत से बढ़ी है।

मंत्रालय द्वारा दिखाए गए नक्शे से पता चलता है कि ऐसा कोई राज्य नहीं है जहाँ घरेलू शौचालय कवरेज 30 प्रतिशत से कम है। उत्तर प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, बिहार और ओड़िशा के चार राज्यों में 60 प्रतिशत से कम घरेलू कवरेज दिखाए गए हैं और अन्य सभी राज्यों में 60 प्रतिशत से अधिक कवरेज हैं। आँकड़े शौचालयों के निर्माण की उच्च दर के बारे में बताते हैं।

केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के पूर्व सचिव एन सी सक्सेना ने बताया कि स्वच्छ भारत मिशन के अन्तर्गत शौचालयों का उपयोग अभी भी एक समस्या है।

सन 1999 में सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान शुरू करने वाले सक्सेना ने बताया कि शौचालय के लिये दी जाने वाली सब्सिडी गरीबी रेखा से ऊपर की जनसंख्या वाले लोगों के लिये पूरी तरह समाप्त कर दी गई जबकि गरीबी रेखा से नीचे के लिये इसे 3,000 रुपए से घटाकर 500 रुपए कर दिया गया। उन्होंने छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को खुले में शौच से मुक्त घोषित किये जाने पर सवाल उठाया, उन्होंने कहा यह कैसे हो सकता है जबकि रिपोर्ट बताती है कि शौचालयों का उपयोग अभी भी 100 प्रतिशत नहीं है।

महाराष्ट्र के स्वच्छ भारत मिशन के निदेशक सतीश उमरीकर ने कहा कि शौचालयों के उपयोग करने का तरीका बदलना होगा। उनके अनुसार, लोगों को पहले शौचालयों के उपयोग करने की आदत डालनी चाहिए, भले ही बनावट में खराबी ही क्यों न हो एक बार ऐसा करने पर, लोग स्वतः ही अपने पैसे से समस्याओं को अपने आप ही सुधार देंगे। 2017 में बिहार और ओड़िशा जैसे पिछड़े राज्यों के अनुभवों से पता चलता है कि शौचालयों के दोषपूर्ण डिजाइन के कारण यहाँ लोगों के द्वारा शौचालयों के उपयोग करने में कमी आई है। इन क्षेत्रों में शौचालयों को अनाज या पशु शेड के भण्डारण के रूप में इस्तेमाल बड़े पैमाने पर देखने में आया है।
 

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