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पर्यावरण अनुकूल आवास (Eco friendly house)

Author: 
धीप्रज्ञ द्विवेदी
Source: 
योजना, सितम्बर 2017

ईको फ्रेंडली घरईको फ्रेंडली घरमेरियम-वेबस्टर के अनुसार, पर्यावरण अनुकूल या ईको-फ्रेंडली शब्द का शाब्दिक अर्थ पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक नहीं है और इसका पहला ज्ञात उपयोग 1989 में हुआ था; हालांकि पर्यावरण अनुकूल शब्द 1971 से भी पुराना है। इस शब्द का सबसे अधिक उपयोग हरे रहने और अन्य टिकाऊ प्रथाओं में योगदान करने वाले उत्पादों के सन्दर्भ में किया जाता है, पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद भी भूमि, वायु और जल तथा अन्य प्रदूषण को रोकते हैं।

आज हमारा देश कई समस्याओं से जूझ रहा है जिसमें एक महत्त्वपूर्ण समस्या है घरों की कमी। तेजी से बढ़ती जनसंख्या और उससे कहीं तीव्रता से बढ़ रहे शहरीकरण ने देश में घरों की उपलब्धता की समस्या खड़ी कर दी है। 2012-2017 के बीच यह अनुमान लगाया गया था कि भारत में शहरी क्षेत्रों में 18.78 मिलियन घरों की कमी होगी जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह संख्या लगभग 43.90 मिलियन होगी।

निम्न आय वर्ग एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग शहरी क्षेत्रों में लगभग 95 प्रतिशत घरों की कमी का सामना कर रहे हैं। इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लगभग 90 प्रतिशत घरों की उपलब्धता की समस्या से जूझ रहे हैं। इस स्थिति में सरकार एवं नीति निर्धारकों के सामने एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है सबके लिये सस्ते घर उपलब्ध कराना (एनबीएच 2015)।

इस समस्या के समाधान के प्रयास वर्षों से चल रहे हैं। ये सारे प्रयास मुख्यतः शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहे हैं। केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों एवं अन्य सरकारी संस्थाओं ने इसके लिये कई कदम उठाए हैं, जैसे शहरी क्षेत्रों में निम्न आय वर्ग मकान, जनता फ्लैट, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिये मकान इत्यादि, साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के लिये समय-समय पर सस्ते घर उपलब्ध कराने के प्रयास किये गए (सरकार व अन्य 2016)।

हाल ही में भारत सरकार ने देश में आवास की कमी को दूर करने के लिये कई महत्त्वाकांक्षी परियोजनाएँ प्रस्तावित कीं और उनमें से कई पर कार्य प्रारम्भ भी हो चुका है जिसमें शामिल हैं : 2022 तक सभी के लिये घर (शहरी) मिशन, अटल शहरी सुधार एवं कायाकल्प मिशन (अमृत) और स्मार्ट सिटी परियोजना। इन घरों के निर्माण का सीधा प्रभाव प्रकृति के ऊपर पड़ेगा क्योंकि इनके निर्माण के लिये आवश्यक पदार्थ की पूर्ति प्रकृति से ही होनी है। इतना ही इन घरों की एक मूलभूत आवश्यकता होगी बिजली। केन्द्रीय सांख्यिकी आयोग की 2016 की रपट में बताया गया है कि भारत में उपभोग में लाई जाने वाली बिजली का कुल 23 प्रतिशत आवासीय उपयोग में आता है।

यह अनुमान किया जा रहा है कि वर्तमान दर के अनुसार वर्ष 2050 तक आवासीय बिजली की माँग में 8 गुना वृद्धि हो जाएगा। अतः ऐसे घरों का विकास और निर्माण आवश्यक है जो न केवल प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कम या सन्तुलित तरीके से करें बल्कि उनका पुनर्चक्रण हो सकता हो। उदाहरणस्वरूप उसमें दिन के समय प्राकृतिक रोशनी की सुविधा हो ताकि दिन के समय रोशनी के लिये बिजली का उपयोग न करना पड़े।

इन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2001 के ऊर्जा संरक्षण कानून के अन्तर्गत देश के भवनों के लिये ऊर्जा संरक्षण कोड (ईसीबीसी) विकसित किये गए। हाल ही में ईसीबीसी में समयानुकूल संशोधन किये गए हैं ताकि पर्यावरण अनुकूल घरों को बढ़ावा दिया जा सके।

आज हम पर्यावरण अनुकूल घरों के बारे में चर्चा करेंगे। ये घर जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को नियंत्रित करने में भी सहायता प्रदान कर सकते हैं। जैसा हम सभी जानते हैं कि सम्पूर्ण विश्व जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को महसूस कर रहा है, जिसका मुख्य कारक कार्बन डाइऑक्साइड है जो लगभग 55 प्रतिशत वैश्विक तापन के लिये जिम्मेदार है और निर्माण, अन्य उद्योगों के साथ 40 प्रतिशत मानव-निर्मित कार्बन उत्सर्जन के लिये जिम्मेदार है, अतः सरकारें और व्यक्ति दोनों पर्यावरण के अनुकूल घरों के निर्माण का कार्य अधिक गम्भीरता से ले रहे हैं।

पर्यावरण के प्रति लोगों में बढ़ती जागरुकता के कारण पर्यावरण अनुकूल घरों की माँग पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ती रही है, माँग बढ़ने के कारण इस क्षेत्र में नई तकनीकों का विकास भी किया जा रहा है साथ ही पहले से उपलब्ध तकनीकों में भी सुधार हो रहा है। इन तकनीकों में पवन टरबाइन से, सौर पैनलों तक, उच्च दक्षता प्रकाश व्यवस्था, अति कुशल इन्सुलेशन, ग्लेजिंग, जल संरक्षण, रीसाइक्लिंग और बहुत कुछ शामिल हैं।

हरित भवनों को उनके संरक्षित संसाधन और ऊर्जा कुशल निर्माण सामग्री के साथ एक स्वस्थ वातावरण सुनिश्चित करने के लिये डिजाइन और निर्माण किया जाता है जो नवीकरणीय होते हैं। दुनिया भर के लोग घर में रहने का विकल्प चाहते हैं जो उनके लिये स्वस्थ, सुरक्षित और सस्ता है और साथ-ही-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी सहयोगी हो। मौजूदा भवन निर्माण सामग्री के पुनर्नवीनीकरण और पानी का पुनः उपयोग, एक आधुनिक घर के निर्माण और चालू परिचालन के पर्यावरणीय प्रभाव को काफी कम करता है।

एक हरित ढाँचा पर्यावरणीय अनुकूल इमारत है, जो कुल पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने के लिये डिजाइन, निर्माण और संचालित है। घर के कार्बन पदचिन्ह को कम ऊर्जा की खपत, जल संरक्षण और अपशिष्ट रीसाइक्लिंग जैसे तरीकों से कम किया जा सकता है। पारिस्थितिकी के अनुकूल ऐसी प्रथाओं को सन्दर्भित करता है जो किसी को प्राकृतिक संसाधनों के अवशोषण के प्रति अधिक जागरूक बनाता है। कम पानी, गैस और बिजली का उपयोग करने वाली दैनिक आदतों में सामान्य उदाहरण है कि हर कोई हरित पर्यावरण में योगदान कर सकता है।

हाल के वर्षों में, पूरी दुनिया के साथ-साथ बहुत से भारतीयों ने भी अपने घरों को टिकाऊ प्रौद्योगिकी का उपयोग करके पर्यावरणीय प्रभाव और वित्तीय परिव्यय दोनों को कम करने के प्रयास शुरू कर दिये हैं। टिकाऊ इमारत में होने वाली उछाल वास्तुकला नवाचार के नए तरीकों के विकास में योगदान दे रहा है।

ग्रीन घरों में अपशिष्ट घटाना, रीसाइक्लिंग, स्थानीय और नवीकरणीय सामग्री का उपयोग, अक्षय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग और आवास के बेहतर तरीके के कार्यान्वयन को प्रोत्साहित करना। एक ग्रीन हाउस का मुख्य पर्यावरणीय विशेषता पीवीसी मुक्त है पीवीसी, या विनाइल, निर्माण में प्रयुक्त सबसे आम और सबसे हानिकारक सामग्री में से एक है। ये रसायन हवा, पानी और खाद्य शृंखला में निर्माण कर सकते हैं, जिससे कैंसर, प्रतिरक्षा प्रणाली की क्षति और हार्मोन के व्यवधान जैसे गम्भीर स्वास्थ्य समस्याएँ हो सकती हैं।


किसी भी पर्यावरण घर की एक प्रमुख विशेषता कम ऊर्जा का उपयोग है। वास्तव में, हरे घर सामान्य घरों से 20 प्रतिशत कम ऊर्जा का उपयोग करते हैं। जल संरक्षण और रीसाइक्लिंग सिद्धान्तों को घर के निर्माण और इसके दैनिक कार्यों के लिये लागू किया गया है। जल बुद्धिमान भूनिर्माण गर्मियों में शीतलन की छाया प्रदान करने के लिये आस-पास के पत्ते बना सकते हैं, जिससे ऊर्जा-भूखा वातानुकूलन की आवश्यकता कम हो सकती है।

किसी भी पर्यावरण अनुकूल घर की एक प्रमुख विशेषता कम ऊर्जा का उपयोग है। वास्तव में, हरे घर सामान्य घरों से 20 प्रतिशत कम ऊर्जा का उपयोग करते हैं। जल संरक्षण और रीसाइक्लिंग सिद्धान्तों को घर के निर्माण और इसके दैनिक कार्यों के लिये लागू किया गया है। जल बुद्धिमान भू-निर्माण गर्मियों में शीतलन की छाया प्रदान करने के लिये आस-पास के पत्ते बना सकते हैं, जिससे ऊर्जा-भूखा वातानुकूलन की आवश्यकता कम हो सकती है।

अधिक-से-अधिक घरों को मालिक पर्यावरण मित्रता और टिकाऊ घरों की ओर झुका रहे हैं जो अपनी जेब के लिये अच्छे हैं, उनके स्वास्थ्य के लिये अच्छा है और वास्तु के लिये अच्छा है। इन दिनों एक पर्यावरण के अनुकूल घर को किसी अन्य नवनिर्मित आवास से अलग नहीं दिखना चाहिए।

पर्यावरण अनुकूल घरों और उनसे होने वाले फायदों को समझने के लिये हम सब बंगलुरु और केरल (स्रोत: बेटर इण्डिया) के कुछ घरों को उदाहरणस्वरूप देख सकते हैं।

होमबेलाकु


हस्तिनिर्मित मिट्टी के बक्से, वर्षाजल संचयन इकाइयों, एक वनस्पति उद्यान, वारली कला और सूरज की प्राकृतिक रोशनी के चकाचौंध से भरपूर, होमबेलाकु, बंगलुरु के हरित घरों में से एक है। यह घर लोकप्रिय कन्नड़ कवि चेन्नवीर कानावी के पुत्र एवं पुत्रवधु करुण प्रसाद कानावी और विशाखा कानावी का है। उन्होंने अपने पिता की कविताओं के संग्रह के नाम पर अपने घर का नाम होमबेलाकु रखा गया है। इस घर की पर्यावरणीय विशेषताओं में शामिल हैं:

1. क्ले और कीचड़ के ब्लॉक का इस्तेमाल ईंटों के बजाय निर्माण के लिये किया गया है जिससे ईंट बनाने के समय ऊर्जा के उपभोग में कमी आई है।
2. दीवालों को प्लास्टर और पेंट नहीं किया गया है ताकि सीसा और वोलाटाइल कार्बनिक उत्पादों के उपयोग से बचा जा सके।
3. साधारण कोटा टाइलों का उपयोग मोजैक टाइलों के स्थान पर किया गया है।
4. सौर ऊर्जा आधारित व्यवस्थाएँ लगाई गई हैं।
5. दिन के समय रोशनी के लिये सूरज की रोशनी का उपयोग किया जाता है।
6. अपशिष्ट पृथक्करण की व्यवस्था की गई है तथा कम्पोस्ट का निर्माण किया जाता है।
7. वर्षाजल संग्रहण की व्यवस्था।
8. भूरे जल की रीसाइक्लिंग और उपयोग की व्यवस्था ताकि रसोई और कपड़े धोने की मशीन से निकलने वाले दूषित जल का पुनः उपयोग हो सके।
9. सीमेन्ट प्लास्टर या पेंट का उपयोग नहीं होने के कारण निर्माण की कीमतों में कमी आई है।

कचरा माने


इस घर का निर्माण जी वी दशरथी ने किया है। इस घर के निर्माण में एक व्यक्ति का अपशिष्ट दूसरे के लिये खजाना हो सकता है के सिद्धान्त का उपयोग हुआ है। इनके घर का नाम कचरा है जिसका शाब्दिक अर्थ है कचड़ा घर। यह घर पर्यावरण संरक्षण के “4-आर” रिड्यूस, रियूज, रिसाइकिल एंड रिथिंक सिद्धान्त को शब्दशः लागू करता है। उन्होंने अपने घर का निर्माण गिराए गए घरों तथा सेकेंड हैंड बाजार से लिये गए सामान का इस्तेमाल करके किया है। इस घर की पर्यावरणीय विशेषताओं में शामिल हैं:

1. 80 प्रतिशत फिटिंग गिराए गए घरों से ली गई हैं, लकड़ी स्क्रैप से लिया गया है तथा ज्यादातर घरेलू चीजें सेकेंड हैंड हैं।
2. सौर ऊर्जा आधारित व्यवस्थाएँ, वर्षा जल संचयन और भूरा जल पुनर्चक्रण की व्यवस्थाएँ हैं।
3. बनाने में समय एवं धन दोनों की बचत हुई है।

चोकालिंगम मुथिआ का घर


इस घर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह घर पूरी तरह से ऊर्जा स्रोत के आधार पर ऑफ ग्रिड है अर्थात अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये सार्वजनिक विद्युत प्रणाली पर निर्भर नहीं है बल्कि आत्मनिर्भर है। मुथिया इस बात पर विश्वास करते हैं कि केवल उन्हीं उत्पादों का उपयोग किया जाये जो उत्पादित या संरक्षित हो सकते हों। इस घर की पर्यावरणीय विशेषताओं में शामिल हैं:

1. मिट्टी के ब्लाक का उपयोग ताकि सीमेंट के उपयोग को कम-से-कम रखा जाये।
2. अच्छी वायु संचरण की व्यवस्था एवं सूरज की रोशनी का अधिकतम उपयोग।
3. पूरी तरह सौर ऊर्जा आधारित विद्युत व्यवस्था।
4. अपशिष्ट प्रबन्धन जिसमें सबसे पहले अपशिष्टों को सूखे एवं गीले में बाँटा जाता है उसके बाद सूखे अपशिष्टों को बीबीएमपी को दिया जाता है जबकि गीले के द्वारा बायो गैस तथा कम्पोस्ट का निर्माण किया जाता है जिसके द्वारा रसोई की आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है।
5. वर्षाजल संचयन एवं उपयोग की सुविधा।
6. भूरे जल के पुनर्चक्रण की व्यवस्था।

आशा और हरि का घर


केरल के कुन्नुर जिले में अवस्थित यह घर पर्यावरण अनुकूल घर के सर्वोत्तम उदाहरणों में से एक है। यह एक ऐसा घर है जिसमें 40 डिग्री के तापमान में भी ए.सी.-कूलर की बात कौन करे, पंखे की भी जरूरत महसूस नहीं होती। उन्होंने अपने जीवन को प्रकृति से जोड़ लिया है। उनके घर के चारों ओर एक छोटा जंगल तैयार हो गया है। इस प्रकार के प्रकृति आधारित जीवनशैली का लाभ क्या है? सबसे बड़ा लाभ यह है कि उन्होंने पिछले 17 वर्षों में किसी भी दवा का उपयोग नहीं किया है। इस घर की पर्यावरणीय विशेषताओं में शामिल हैं:

1. मिट्टी की दीवारें जो केरल की स्थानीय जनजातियों के घरों से प्रेरित हैं, इन्हें हम जीवित भी मान सकते हैं क्यों कि ये दीवारें हवा को घर के अन्दर आने और बाहर जाने में सहायता करती हैं। दिन के समय सूरज का ताप धीरे-धीरे घर के अन्दर आता है जिससे घर धीरे-धीरे गर्म होता है, शाम तक घर गर्म हो जाता है और रात में 11 बजे तक गर्म रहता है, उसके बाद धीरे-धीरे ठंडा होता रहता है और यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।
2. विद्युत का उपयोग कम-से-कम करने का प्रयास किया गया है और पूरे घर में प्राकृतिक रोशनी की व्यवस्था की गई है।
3. सोलर पैनल और बायो गैस का उपयोग किया जाता है।
4. एक सामान्य घर में कम-से-कम 50 यूनिट प्रतिमाह बिजली की खपत होती है जबकि इस घर में केवल 4 यूनिट प्रतिमाह जबकि उनके घर में भी अन्य घरों की तरह सभी घरेलू उपकरण हैं जैसे टी.वी., मिक्सर ग्राइंडर, कम्प्यूटर इत्यादि।

उपरोक्त उदाहरणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि एक पर्यावरण अनुकूल घर, एक ऐसा घर है जो ऊर्जा खपत कम करता हो अर्थात उसका कार्बन फुट प्रिंट बहुत ही कम हो (जो नोवेह के टेक्नोइकोसिस्टम के उलटा काम करता हो), जो पर्यावरण संरक्षण में सहायक हो, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में नहीं बल्कि प्रकृति के साथ मिलकर चलने वाला हो। इस प्रकार के घर न केवल प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हैं बल्कि स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी उचित हैं, जो हम आशा और हरि के घर के उदाहरण से समझ सकते हैं। एक घर को हम पर्यावरण अनुकूल घर तब मान सकते हैं जब उसमें निम्नलिखित विशेषताएँ हों:

1. सीमेंट का कम-से-कम उपयोग।
2. पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों से तैयार किये गए विद्युत का कम-से-कम उपयोग हो या ऊर्जा के क्षेत्र में लगभग अथवा पूर्ण स्वावलम्बी हो, इसके लिये सौर ऊर्जा और बायो गैस का उपयोग करना उचित है तथा जिन स्थानों पर वायु की गति 15 किमी प्रति घंटे से ज्यादा हो वहाँ पवन चक्कियों का उपयोग हो सकता है।
3. अपशिष्टों का समुचित निस्तारण हो जिसके लिये उसे गीले एवं सूखे में तथा जैविक तथा अजैविक में विभाजित किया जा सकता है। पर्यावरण अनुकूल घरों में सामान्य तौर पर अजैविक अपशिष्ट उत्पादित नहीं होते हैं।
4. खाद के रूप कम्पोस्ट का उपयोग हो सकता है साथ ही बायो गैस प्लांट में बचे अवशेष बेहतरीन खाद होते हैं।
5. प्लास्टिक का उपयोग न के बराबर करना।
6. जल संरक्षण, जिसमें वर्षाजल संचयन से लेकर भूरे जल के पुनः उपयोग तक की कई अलग-अलग व्यवस्थाएँ शामिल हैं।

सन्दर्भ


1. Introduction to Environmental Engineering and Science: Gilbert M Masters and Wendell P Ela
2. Perspective in Environmental Studies: Anubha kaushik and CP kaushik
3. www.thebetterindia.com
4. http://www.ecofriendlyhouses.net/
5. http://englishmanoramaonline.com
6. Bureau of Energy Efficiency. Energy Conservation Building Code 2017 [Ministry of Power] Government of India 110 (2017). India.
7. Bureau of Indian Standards. (2016). National Building Code of India 2016. New Delhi India.
8. http://www.carbse.org/
9. Energy statistics 2016. Ministry of Statistics and Programme Implemntation Governmnt of India.

लेखक परिचय


लेखक पर्यावरण विज्ञान के विशेषज्ञ हैं। ऊर्जा तथा पर्यावरणीय सम्बन्धी विषयों पर नियमित रूप से लिखते रहते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के विद्यार्थियों के बीच यह विषय पढ़ाते भी हैं। स्वास्थ्य जागरूकता पर कार्य करने वाली संस्था स्वस्थ भारत के संस्थापक सदस्य भी हैं।

समावेशी चिन्तन पर कार्यरत सभ्यता अध्ययन केन्द्र के साथ शोध कार्यों में जुड़े हुए हैं।

ईमेल: dhimesh.dubey@outlook.com


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