माँ के लिये रस्मों के मोहताज क्यों हैं हम

Author: 
महेश शुक्ल
Source: 
दैनिक जागरण, 22 अप्रैल, 2018

आज आप सब जगह अर्थ डे के बारे में पढ़ रहे होंगे। धरती को लगातार बढ़ते जा रहे खतरे के बारे में जान रहे होंगे। कुछ बच्चों के स्कूलों में भी अर्थ डे सेलिब्रेशन हुए होंगे। 48 साल से लगातार अर्थ डे सेलिब्रेट हो रहा है। दुनिया के 192 देशों में। हम भी उनमें से एक हैं, लेकिन क्या हम मदर अर्थ को वो नुकसान होने से रोक सके, जिसकी आशंका 1970 में सीनेटर गेलार्ड नेल्सन ने जताई थी।

वर्सोवा बीच पर ओलिव रिडले कछुआ का पुनः आगमन आज आपसे एक अहम मुद्दे पर बात करनी है, लेकिन उससे पहले जिक्र मुम्बई की एक खबर का। इस लेख के साथ लगी फोटो देख रहे हैं आप? इंसान के कदम और अपने नेचुरल हैबिटेट यानी समुद्र की ओर बढ़ते नन्हें कछुए, एक बारगी कुछ खास नहीं लगता इस फोटो में। सामान्य सी घटना है। समुद्र किनारे इंसान होंगे ही और पानी व कछुओं का पुराना नाता है ही। तो फिर क्या खास है इस फोटो में? मायानगरी के सबसे बिजी बीचेस में से एक, वर्सोवा सी बीच की बात है यह। अभी पिछले महीने ही वहाँ ओलिव रिडले टर्टल्स की वापसी हुई है। वह भी दशकों बाद। एक खास तरह के इन कछुओं ने लम्बे समय के बाद वर्सोवा में समुद्र किनारे रेत में हैचिंग की।

ओलिव रिडले टर्टल्स की नई जेनरेशन ने वर्सोवा बीच पर आँखें खोलीं और इस फोटो में यही जेनरेशन अपने नेचुरल हैबिटेट यानी समुद्र में जाती दिख रही है। अब कनेक्शन इंसानों के कदमों का। दरअसल, इंसानों ने ही इस बीच को इस लायक बनाया है कि कछुए यहाँ वापसी कर सकें। पेशे से वकील अफरोज शाह ने कुछ अन्य मुम्बईवासियों के साथ मिलकर गन्दगी से भरे वर्सोवा बीच को साफ करने की मुहिम कुछ साल पहले शुरू की थी।

कहा जा रहा है कि अफरोज और उनके साथियों ने करीब 2.7 किलोमीटर लम्बे बीच से 5 मिलियन किलो कूड़ा-करकट और प्लास्टिक साफ किया है। इसी साफ-सफाई की वजह से ओलिव रिडले टर्टल्स वर्सोवा बीच पर वापसी कर सके हैं। यह नेचुरल प्रोसेस फिर से शुरू हुआ है। पॉल्यूशन और गन्दगी के कारण यह कछुए बरसों पहले बीच पर आना और हैचिंग करना छोड़ चुके थे। कारण था, बीच पर हम इंसानों द्वारा फैलाई जाने वाली भीषण गन्दगी और पॉल्यूशन।

इस घटना का आज जिक्र करने की एक खास वजह है। दरअसल, आज ‘अर्थ डे’ है। मदर अर्थ डे। अपनी धरती माँ को बचाने वाला दिन। अफरोज और उनके साथियों की यह कोशिश मदर अर्थ को ही बचाने की मुहिम का एक हिस्सा है। सबसे अहम बात यह है कि अफरोज और उनके अभियान में जुड़ रहे लोगों ने इस नेक और जरूरी काम के लिये अर्थ डे जैसे किसी खास दिन का इन्तजार नहीं किया। उनके लिये तो हर रोज ही अर्थ डे है। उन्होंने इसे बरसों-बरस जारी रखा। जिसका नतीजा हमारे सामने हैं। आज आप अखबारों में अर्थ डे के बारे में पढ़ रहे होंगे। धरती को लगातार बढ़ते जा रहे खतरे के बारे में जान रहे होंगे।

कुछ बच्चों के स्कूलों में भी अर्थ डे सेलिब्रेशन हुए होंगे। मशहूर स्टैंडअप कॉमेडियन अमित टंडन ने एक शो में कहा था कि बच्चे को अर्थ बनाकर भेजने के लिये कहते हैं। अब पैरेंट्स क्या करें? खैर, कुछ बच्चे शायद अर्थ बनकर स्कूल गए भी हों, लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि पढ़कर, सुनकर और पार्टिसिपेट करके भी हम वास्तव में मदर अर्थ के लिये क्या कर पा रहे हैं और कितना कर पा रहे हैं?

1970 में एक अमेरिकी सीनेटर ने करीब 2 करोड़ लोगों के साथ मिलकर अर्थ डे सेलिब्रेशन शुरू किया था। मकसद था बरसों बाद मदर अर्थ को होने वाले नुकसान को रोकना। 48 साल से लगातार अर्थ डे सेलिब्रेट हो रहा है। दुनिया के 192 देशों में। हम भी उनमें से एक हैं, लेकिन क्या हम मदर अर्थ को वो नुकसान होने से रोक सके, जिसकी आशंका 1970 में सीनेटर गेलार्ड नेल्सन ने जताई थी? नहीं, हम अपनी धरती माँ को इन खतरों से नहीं बचा सके हैं। हम क्लाइमेट चेंज को एक विकराल खतरे के रूप में सामने पा रहे हैं। बढ़ता तापमान, जानलेवा बारिश और अत्यधिक ठंड। अब मौसम अक्सर एक्सट्रीम हो रहा है। इसकी वजह? हमारी अर्थ डे को एक खास दिन सेलिब्रेट करने की आदत। इसे रोजमर्रा किये जाने वाले जरूरी काम में तब्दील न करना। पढ़ना, देखना, जानना पर समझना नहीं।

पिछले कुछ साल में धरती का तापमान 140F बढ़ चुका है और यह खतरनाक है। जाहिर है मौसम चक्र पर इस बढ़ते हुए तापमान का खतरनाक असर होगा। पिछले दो दशक में दुनिया में मौसम बहुत तेजी से बदला है। समुद्र का पानी पहले से ज्यादा खारा हो रहा है। समुद्र के पानी का स्तर भी खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है यानी हजारों किलोमीटर लम्बी कोस्टलाइन पर बसी जिन्दगी को बड़ा खतरा बना हुआ है। यानी हर तरफ खतरा। फिर भी हम सेलिब्रेशन के मोड में ही क्यों हैं? क्या यह हमारे लिये और बड़ा खतरा नहीं है?

आखिर स्कूलों के करिकुलम में सेव मदर अर्थ नाम का चैप्टर क्यों शामिल नहीं हो सकता? आखिर क्यों हम बच्चों को इस बारे में तफ्सील से नहीं बताते? क्यों हम खुद को भी इस बारे में अपडेट नहीं रखते? तमाम रिसर्च मैटीरियल उपलब्ध है धरती के बिगड़ते स्वरूप के बारे में जानने को। क्यों नहीं हम औरों को भी अवेयर करते हैं?

दरअसल फिलहाल कमी अवेयरनेस की है। जब जानकारी का ही स्तर कम होगा, तो एक्टिवेशन तो कम होना लाजिमी है ही। एक दिन अर्थ डे मनाने के मोड से बाहर निकलना जरूरी है। हर व्यक्ति का इस बारे में जानना जरूरी है। बच्चों के मन-मस्तिष्क में क्लाइमेट चेंज, पॉल्यूशन और सेव मदर अर्थ के मायने अंकित करने होंगे। खुद की छोटी-छोटी आदतों को बदलना होगा। कभी जाकर देखना होगा कि हमारे शहर से बहने वाली नदी के किनारे गन्दे हैं क्या? हैं तो साफ क्यों नहीं किये जा सकते?

हमारे घर और ऑफिस के आस-पास हरियाली कम है क्या? साथियों संग इस मामले में कुछ किया जा सकता है क्या? किसी संगठन का इन्तजार क्यों करना। खुद ही रोप दें कुछ पौधे और करते रहें उनकी देखभाल। वीक में एक दिन कार फ्री डे मना लें। औरों को भी प्रेरित कर लें इस काम के लिये, माँ बीमार होती है, तो हम अच्छा अस्पताल, अच्छे डॉक्टर और अच्छी देखभाल करते हैं। बस यही काम कर लें हम सब अपनी धरती माँ के लिये, अफरोज की तरह। यकीन मानिए, कभी अर्थ डे मनाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।


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