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नदी विवादों में कहाँ गुम है राष्ट्रीय जलनीति


बीते बीस सालों में भूजल भण्डार की ही तरह हमने नदियों के पानी का सर्वाधिक और मनमाना दोहन करना शुरू कर दिया है। इसमें हम नदी तंत्र की भी उपेक्षा कर रहे हैं, जो सबसे ज्यादा त्रासद है और भविष्य में आत्मघाती साबित होने वाला कदम होगा। पानी को लेकर हम अधिकार की ठसक से भरे हैं, इसे प्रकृति का उपहार मानकर सदियों पुरानी हमारी उदारता और सदाशयता भी तेजी से खत्म हो रही है। यदि कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों ही अकाल का सामना कर रहे हैं तो दोनों को ही एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा की जगह मिल-बैठकर समाधानकारक निर्णय लेने चाहिए। बीते पूरे महीने लगातार एक के बाद एक नदियों के पानी के बँटवारे को लेकर विवाद सुर्खियों में रहे। कावेरी विवाद ने तो उग्र रूप भी ले लिया था। कानूनी पेचीदगियों और जमीनी स्तर पर आ रही परेशानियों से पानी का हल निकालना मुश्किल साबित हो रहा है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि आखिर इन विवादों के फोकस में हमारी राष्ट्रीय जलनीति 2012 क्या कहती है।

इस नीति के तहत क्या कोई फार्मूला ऐसा निकलता है या कोई राह आसान होती है या नहीं। यह जानना बहुत रोचक है। और यह भी कि कई-कई सालों तक नदियों के पानी को लेकर किये जाने वाले जरूरी फैसलों में सरकारें कितनी देरी से जागती हैं, ज्यादातर में तो लापरवाही की हद तक या जब तक कि हालात चिन्ताजनक न बन जाएँ।

2012 की संशोधित राष्ट्रीय जल नीति कहती है कि जल प्राकृतिक संसाधन है और जीवन, जीविका, खाद्य सुरक्षा और निरन्तर विकास का आधार है। जल के सम्बन्ध में समुचित नीतियाँ, कानून और विनियमन बनाने का अधिकार राज्य का है तथापि जल सम्बन्धी सामान्य सिद्धान्तों का व्यापक राष्ट्रीय जल सम्बन्धी ढाँचागत कानून तैयार करने की आवश्यकता है।

जल घरेलू उपयोग, कृषि, जलविद्युत, तापविद्युत, नौवहन, मनोरंजन इत्यादि के लिये आवश्यक है। इन विभिन्न प्रकार के उपयोग के लिये जल का समुचित उपयोग किया जाना चाहिए तथा जल को एक दुर्लभ संसाधन मानने के लिये जागरुकता फैलानी चाहिए।

जलनीति में यह भी स्पष्ट है कि देश के विभिन्न बेसिनों तथा राज्यों के विभिन्न हिस्सों में जल संसाधन की उपलब्धता तथा इनके उपयोग का वैज्ञानिक पद्धति से आकलन और आवधिक रूप से अर्थात प्रत्येक पाँच वर्ष में समीक्षा किये जाने की आवश्यकता है।

पक्षकार राज्यों के बीच जल से सम्बन्धित मुद्दों पर विचार विमर्श करने तथा मतैक्य बनाने, सहयोग और सुलह करने हेतु राष्ट्रीय स्तर पर एक मंच होना चाहिए। अन्तरराष्ट्रीय नदियों के जल के बँटवारे और प्रबन्धन हेतु सर्वोपरि राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए तटवर्ती राज्यों के परामर्श से द्विपक्षीय आधार पर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय जलनीति में अन्तर्निहित बातें कागजों पर तो बड़ी अच्छी लगती हैं लेकिन इसका जमीनी स्तर पर कितना और कहाँ तक अमल हो पाया है। वह हम सबके सामने है। नीति के तहत विवादों का सम्यक तरीके से तीव्र समाधान करने के लिये केन्द्र में एक स्थायी जल विवाद अधिकरण स्थापित किया जाना था। लेकिन आज तक ऐसा नहीं हो सका।

वहीं विवादों के समाधान के लिये केन्द्र अथवा राज्य सरकारों के अच्छे कार्यालयों के अलावा, माध्यस्थ एवं मध्यस्थता का रास्ता जैसा मामला हो, भी अपनाया जाना चाहिए, ऐसा नीति में उल्लेख होने पर भी सरकारें तब तक कोई यथोचित कदम नहीं उठाती, जब तक कि विवाद उग्र रूप नहीं ले लेता। अब त्वरित गति से ऐसे विवाद निपटाने होंगे।

सितम्बर के दूसरे हफ्ते में सुप्रीम कोर्ट ने 12 सितम्बर को अपने आदेश में कर्नाटक को 20 सितम्बर तक तमिलनाडु के लिये हर दिन 12 हजार क्यूसेक पानी छोड़े जाने को कहा। इसे लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु आमने-सामने हो गए हैं। विवाद ने अचानक हिंसक रूप ले लिया। पानी के नाम पर दोनों राज्यों के लोगों में नफरत की आग इस तरह फैली है कि वे एक दूसरे को मरने-मारने पर उतारू हो गए।

महत्त्वपूर्ण यह भी है कि दोनों ही राज्यों में इसे पेयजल आपूर्ति के लिये जरूरी माना जा रहा है। सूखे से दूसरे जल संसाधन लोगों को पानी पिला पाने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं तो नदी के पानी पर इसके लिये दबाव बनने लगा है। इसका उद्गम कर्नाटक से होने की वजह से कर्नाटक इस पर अपना प्राथमिक हक मानता रहा है पर उधर तमिलनाडु के लोगों के लिये भी कावेरी का पानी कम महत्त्व का नहीं है। इस बार इन राज्यों में सूखे की हालत ने स्थिति को और भी भयावह बना दिया है।

यह मामला अभी सुर्खियों में ही था कि छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के बीच महानदी को लेकर बरसों पुराना विवाद एक बार फिर हरा हो गया, जब ओड़िशा ने छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा महानदी पर बनाए जा रहे कुछ सिंचाई व अन्य परियोजनाओं पर यह कहते हुए ऐतराज जताया कि इससे उनके प्रदेश को मिलने वाली महानदी के पानी की तादाद में कमी आएगी। इसे लेकर केन्द्र सरकार के जल संसाधन विभाग ने मामला सुलझाने की कोशिश भी की पर मामला अब भी वहीं का वहीं अटका पड़ा है।

इधर भारत के पाकिस्तान से तनावपूर्ण सम्बन्धों के चलते सरकारी तौर पर ऐसी चर्चा भी सामने आई कि सिंधु नदी के पानी को लेकर भारत और पाक के मध्य बरसों पुरानी संधि को लेकर कोई कूटनीतिक कदम उठा सकता है। कहा तो यह भी गया कि भारत अपनी संधि के करार को खत्म कर सकता है। हालांकि इसमें तत्काल कोई कदम उठाना इसलिये भी सम्भव नहीं है कि अनायास संधि खत्म करने पर भारत के लिये भी सिंधु नदी की विशाल जलराशि को रोक पाना या मोड़ पाना जमीनी स्तर पर तत्काल नहीं हो सकता।

यह बात देश में तेजी से उठ रही थी, इसी दौरान खबर आई चीन से कि उसने ब्रह्मपुत्र नदी का पानी रोक दिया है। इससे भारत के कुछ हिस्सों में पहुँचने वाले पानी की तादाद में कमी आएगी। इससे पहले कृष्णा नदी के पानी को लेकर भी आन्ध्र और तेलंगाना के बीच विवाद सामने आते रहे हैं।

इस तरह बीते कुछ दिन नदियों के विवाद और उनके जल बँटवारे को लेकर काफी अहम रहे हैं। ऐसे में कुछ सवाल उठना लाजमी है। पहला कि क्या हमने सूखे की स्थितियों को लेकर नदी के पानी को ही एकमेव विकल्प की तरह तो अख्तियार नहीं कर लिया है। हमारे लिये नदियाँ सॉफ्ट टारगेट बनने लगी है। कहीं भी पानी देना हो, पेयजल या खेती या उद्योगों के लिये।

हम अपनी नदियों का बेशकीमती पानी लुटाने में बहुत उदार होते जा रहे हैं। उद्योगों और खेती को दूसरे नम्बर पर रखा जाना चाहिए और पेयजल को पहले, लेकिन कई जगह इसकी परवाह नहीं की जाती। नदियों के अलावा तालाबों, नालों, कुएँ-कुण्डियों और बावड़ियों के विकल्प पर कोई बात नहीं हो रही।

बीते बीस सालों में भूजल भण्डार की ही तरह हमने नदियों के पानी का सर्वाधिक और मनमाना दोहन करना शुरू कर दिया है। इसमें हम नदी तंत्र की भी उपेक्षा कर रहे हैं, जो सबसे ज्यादा त्रासद है और भविष्य में आत्मघाती साबित होने वाला कदम होगा। पानी को लेकर हम अधिकार की ठसक से भरे हैं, इसे प्रकृति का उपहार मानकर सदियों पुरानी हमारी उदारता और सदाशयता भी तेजी से खत्म हो रही है। यदि कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों ही अकाल का सामना कर रहे हैं तो दोनों को ही एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा की जगह मिल-बैठकर समाधानकारक निर्णय लेने चाहिए।

दूसरा बड़ा सवाल यह है कि नदियों के पानी के इस्तेमाल में हमें अब और ज्यादा समझ की जरूरत है। जिस तरह नदियों का पानी कम होता जा रहा है, उससे साफ है कि हमें नदियों के पानी को समझ के साथ इस्तेमाल करना होगा और इसकी एक स्पष्ट, पारदर्शी और पर्यावरण सरोकारों से जुड़ी साझा नीति बनाने और उस पर ईमानदारी से अमल करने की महती जरूरत है। कहीं ऐसा न हो कि जिस तरह हमने देखते-ही-देखते भूजल भण्डारों को खत्म किया, उससे भी कम समय में हम अपनी सदानीरा नदियों को भी सूखा सकते हैं। हमें इस पर पुनर्विचार करने का यही समय है ताकि समय रहते कुछ जतन कर सकें।

तीसरा बड़ा सवाल राष्ट्रीय जल नीति को और मजबूत तथा अमली रूप में लाना होगा। अच्छा हो कि ऐसे मामले कोर्ट की जगह जल आयोग या अन्य समकक्ष जगहों पर मध्यस्थता से हल किये जाएँ। राज्यों के बीच जल बँटवारे का निर्धारण बेसिन में मौजूद जल संसाधन और उसकी जरूरतों के मद्देनजर राष्ट्रिय परिप्रेक्ष्य में सोच-समझ तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ होने चाहिए। जल अधिकरण को भेजे गए विवादों का समय सीमा में निराकरण करने के लिये अन्तरराज्यीय जल विवाद अधिनियम 1956 का पुनरीक्षण कर इसे प्रभावी बनाए जाने की भी जरूरत है।

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