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लखनऊ महानगर: सामाजिक प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Social Pollution)

Author: 
डॉ. आर.ए. चौरसिया
Source: 
शोध प्रबंध 'बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय पी.एच.डी. (भूगोल) उपाधि हेतु प्रस्तुत' भूगोल विभाग अतर्रा स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अतर्रा (बांदा) 2001

विकास प्रक्रिया में मानव ने प्रकृति के महत्त्व को अस्वीकार कर दिया परिणामत: मानव और प्रकृति के मध्य असंतुलन स्थापित हो गया। असंतुलन के परिणाम स्वरूप मानव की शारीरिक और मानसिक क्षमता का ह्रास हुआ, अत: उसके आचरण, विचार शैली और उत्तरदायित्व की भावना प्रदूषित हो गयी है। यह प्रदूषण समाज में निर्धनता, बेरोजगारी, जनसंख्या वृद्धि, अपराध, बाल अपराध, श्वेतवसन अपराध, मद्यपान एवं मादक द्रव्य व्यसन, छात्र असंतोष, वेश्यावृत्ति, आत्महत्या, भिक्षावृत्ति, आवासों की संकीर्णता, गंदीबस्तियों की समस्या, अशिक्षा, अस्वास्थ्यकर दशाएँ, श्रम समस्याएँ जातिवाद, क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद, आतंकवाद, भाषावाद, सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार, दहेज-प्रथा, बालविवाह, विवाह विच्छेद, बढ़ती हुई अनैतिकता तथा राष्ट्रीय चरित्र का अभाव आदि समस्याओं के रूप में देखने में आता है।

समाजशास्त्रीय विचारकों ने ऐसी सामाजिक दशा को सामान्यतया जीवन मूल्यों की दृष्टि से खतरे के रूप में देखा है रोब तथा सेल्जनिक1 ने सामाजिक समस्या को मानवीय सम्बन्धों से सम्बन्धित एक समस्या माना है, जो समाज के लिये एक गम्भीर खतरा पैदा करती है अथवा व्यक्तियों की महत्त्वपूर्ण आकांक्षाओं की पूर्ति में बाधाएँ उत्पन्न करती है।

“It is a problem in human relationship which seriously threatens society or impedes the important aspirations of many people.”

सामाजिक प्रदूषण का कारण जनसंख्या विस्फोट और औद्योगीकरण के परिणाम स्वरूप नगरीकरण में अति गतिशीलता आयी। परिणाम स्वरूप आज नगर समस्याओं के केंद्र बनकर रह गए हैं। स्वेडन के प्रकृति वैज्ञानिक के. करी लिण्डाल2 (K. Curri Lindall) ने ठीक कहा है –

The human population explosion is, in fact, the worst and basic from of pollution. All the major environmental problems that threaten the future of mankind are caused basically by one factor i.e, too many people.

औद्योगीकरण तथा नगरीकरण की प्रवृत्तियों के कारण सामाजिक प्रदूषण एक गम्भीर समस्या है। डब्लू. वेलेस बीवर3 के अनुसार ‘‘सामाजिक समस्या एक ऐसी दशा है जो चिंता, तनाव संघर्ष या नैराश्य से उत्पन्न होती है और आवश्यकता पूर्ति में बाधा डालती है।’’

“A Social problem is any condition that causes strain, tension, conflict or frustration and interferes with the fulfillment of a need”

लारेन्स फ्रेंक4 के अनुसार - ‘‘सामाजिक समस्या समाज की अधिकतर या बहुत बड़ी संख्या में व्यक्तियों के जीवन से सम्बन्द्ध वे कठिनाइयाँ या बुरे व्यवहार हैं, जिन्हें हम दूर करना या सुधारना चाहते हैं।’’

उपर्युक्त टिप्पणियों से स्पष्ट है कि सामाजिक प्रदूषण के अनेक कारण है जनसंख्या विस्फोट नगरीकरण तथा औद्योगीकरण सामाजिक प्रदूषण को गम्भीरतर बनाने की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण कारक रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से जीविका की तलाश में बड़े पैमाने पर जनसंख्या का नगरीय क्षेत्रों की ओर प्रव्रजन हुआ है इसलिये नगरीय क्षेत्रों में आवास की समस्या उत्पन्न हो गयी है, औद्योगिक क्षेत्रों में जनसंख्या का दबाव अधिक बढ़ गया है और सड़कों रेलवे लाइनों के किनारे गंदी बस्तियों तथा झुग्गी झोपड़ियों का विकास हुआ है। मूलत: मलिन बस्तियाँ औद्योगिक और महानगरों की उपज है। यहाँ व्यक्तियों को छोटा-बड़ा काम अवश्य मिल जाता है किन्तु रहने के लिये घर नहीं मिल पाता, इसलिये महानगरों में गरीबों को मलिन बस्तियों में शरण मिलती है। ये मलिन बस्तियाँ सामाजिक प्रदूषण की क्षेत्र बन जाती है। अत: लखनऊ महानगर की मलिन बस्तियों की समस्याओं का अध्ययन करना समीचीन होगा।

अ. मलिन बस्तियाँ (Slums)


20वीं शताब्दी में विज्ञान, उद्योग और शिक्षा के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति हुई। चिकित्सा विज्ञान ने व्यक्ति को दीर्घायु बनाया है। विकासशील देशों में जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ी। इसी तीव्रता के साथ नगरीय क्षेत्रों में जनसंख्या की वृद्धि हुई। जनसंख्या की अतिशय वृद्धि से नगरों में नारकीय जीवन जीने के लिये विवश लोगों की संख्या बढ़ती गयी। एक मलिन बस्ती में छोटी-छोटी झोपड़ियों एवं कच्चे मकानों में औसतन एक कोठरी में 10 से 15 व्यक्ति तक रहते हैं। जल के निकास का यहाँ कोई प्रबंध नहीं होता। पानी यहाँ सड़ता रहता है। कूड़े कचरे का यहाँ ढेर लगा रहता है। शौच का यहाँ कोई स्थान नहीं रहता है। तंग संकरी मलिन बस्तियों में जीवन कम और बीमारियाँ अधिक हैं। पीले मुरझाये चेहरे, चिपके गाल, उभरती हड्डियाँ, फटे गंदे कपड़े यहाँ के सौंदर्य है। इन्हें पता नहीं कब जवान होते हैं और कब बूढ़े हो जाते हैं। कब इन्हें टीबी हो जाती है और कब कैंसर, ये तो मौत के मुँह में जन्म लेते हैं। इनका जिंदा रहना और मरना समाज के लिये कोई अर्थ नहीं रखता आखिर गरीब के मरने का कोई अर्थ नहीं होता। मलिन बस्तियों में एक इनका जीवन नाली के कीड़ों जैसा है। नेहरू जी ने कानपुर के अहातों को देखकर एक बार कहा था ‘‘आदमी-आदमी को इस रूप में कैसे देखता है।’’ इस प्रकार मलिन बस्तियों का सीधा सम्बन्ध बढ़ती हुई जनसंख्या और आवास व्यवस्था की कमी से है जो समय के साथ और गहरी होती जा रही है।

जिस्ट्स और हलबर्ट5 (Gists and Halbert) के अनुसार ‘‘एक गंदी बस्ती निर्धन लोगों तथा मकानों का क्षेत्र है। यह संक्रमण एवं गिरावट का क्षेत्र है। यह असंगठित क्षेत्र होता है, जो मानव अपशिष्ट से परिपूर्ण है। अपराधियों, सदोष, निम्न एवं व्यक्त लोगों के लिये सुविधा क्षेत्र होता है।’’

“A slum is an area of poor houses and poor people. It is an area of transition and decadence a disorganize area occupied by human derelicts, a catch all for criminals, for the defective, the down and out”

डिकिन्सन6 के अनुसार ‘‘गंदी बस्ती अत्यंत दयनीय दशा का द्योतक है जिसमें मकानों की दशा ऐसी अनुपयुक्त होती है, जो स्वास्थ्य एवं नैतिक मूल्यों के लिये खतरा उत्पन्न करती है।’’

“Slum connotes an extreme condition of blight in which the housing is so unfit as to constitute menace to the health and morals”
संयुक्त राष्ट्र संघ7 ने गंदी बस्ती की परिभाषा इस प्रकार दी है - ‘‘ऐसी इमारतों या इमारतों का समूह अथवा क्षेत्र जिनमें अतिव्यापित भीड़, गिरावट, गदी दशाएँ, सुविधाओं का अभाव जो वहाँ के निवासियों अथवा समुदायों के स्वास्थ्य, सुरक्षा अथवा नैतिक मूल्यों के लिये खतरा उत्पन्न करते हैं, गंदे क्षेत्र कहे जाते हैं।’’

Buildings group of buildings or area characterized by over crowding deterioration in sanitary conditions or absence of facilities or amenities which because of these conditions or any of them endanger the health safety or morals of its inhabitants or the community. (UNESCO 1956)

मलिन बस्तियों को पृथक-पृथक नगरों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इन्हें कोलकाता में बस्ती, मुंबई में चाल या झोपड़ पट्टी, दिल्ली में बस्ती, चेन्नई में चेरी और कानपुर में अहाता कहते हैं। महात्मा गांधी ने चेन्नई की चेरी का वर्णन इस रूप में किया है ‘‘एक चेरी जिसे मैं देखने गया था के चारों ओर पानी और गंदी नालियाँ थी वर्षाऋतु में यहाँ व्यक्तियों के रहने योग्य स्थान नहीं रहते होंगे। दूसरी बात यह है कि चेरियाँ सड़क की सतह से नीची हैं और वर्षाऋतु में इनमें पानी भर जाता है। इनमें सड़कों गलियों की कोई व्यवस्था नहीं होती और अधिकांश झोपड़ियों में नाम मात्र के भी रोशनदान नहीं होते। ये चेरियाँ इतनी नीची होती है कि बिना पूर्णतया झुके इनमें प्रवेश नहीं किया जा सकता है। सभी दृष्टि से यहाँ की सफाई न्यूनतम स्तर से भी गयी गुजरी होती है।’’ कानपुर की मलिन बस्तियों को देखकर नेहरू जी ने कहा था ‘‘ये मलिन बस्तियाँ मानवता के पतन की पराकाष्ठा की प्रतीक हैं। जो व्यक्ति इन मलिन बस्तियों के लिये उत्तरदायी हैं, उन्हें फाँसी दे दी जानी चाहिए।8’’

उपर्युक्त परिभाषों और विचारों से मलिन बस्तियों की विशेषताओं पर प्रकाश पड़ता है। गंदी बस्तियों की समस्या मुख्य रूप से निर्धन लोगों की आवास समस्या है लेकिन अपने व्यापक संदर्भ में यह सामाजिक असंगठन और आर्थिक विपन्नता की समस्या है।

मलिन बस्तियों के अर्थ और उसके विविध रूप


विस्तृत अर्थ में मलिन बस्तियाँ निर्धन व्यक्तियों के रहने के वे स्थान है जहाँ वे झोपड़ियाँ, कैबिन अथवा लकड़ी के छोटे मकान बनाकर रहते हैं। ये मकान अपने भी होते हैं और इसमें किरायेदार भी रहते हैं। इनके निर्माण में खपरैल, बाँस, लकड़ी, टीन, शैड, टाटा, प्लास्टिक तथा चीथड़ों का प्रयोग किया जाता है। ऐसी मलिन बस्तियाँ नाले, नदी, रेलवे और तालाबों के किनारे अन्य अनियोजित नगरीय भूमि पर बस जाती हैं।

मलिन बस्तियों के स्वरूप में क्षेत्रीय विविधताएँ पायी जाती है। प्रत्येक देश की मलिन बस्ती का अपना स्वरूप है। किंतु उनका पर्यावरण और रहने की दशाएँ लगभग समान है। इनमें निवास करने वाले व्यक्ति निर्धन, बेरोजगार और कम आय वाले व्यक्ति हैं जिनका न कोई मकान है और न मकान होने की आशा है। यह वह आवासीय अनाथालय है, जहाँ जीवन की समस्त असुविधाएँ एक साथ देखने को मिलती है। जहाँ व्यक्ति नहीं व्यक्ति के नाम पर पशु रहते और जीते हैं। औद्योगिक क्रांति ने लोगों को रोजगार दिया, विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक चमत्कार दिए किंतु करोड़ों श्रमिकों को घर नहीं दिया। मलिन बस्तियाँ बहुत कुछ इस क्रांति का परिणाम है।

मलिन बस्तियाँ लगातार स्थापित होती जा रही हैं। इनका निर्माण विशेषकर एशिया और अफ्रीका में कूड़ा समझकर फेकी गयी वस्तुओं से किया जाता है। फिलीपींस में दलदली क्षेत्रों, छोटे-छोटे पहाड़ी क्षेत्रों में और युद्ध में जो स्थान नष्ट हो गए थे वहाँ मलिन बस्तियाँ स्थापित हो गयी। लेटिन अमेरिका में छोटे-छोटे पहाड़ों के ढालों पर मलिन बस्तियाँ स्थापित हो गयी है। करांची में कब्रिस्तान और सड़कों के किनारे इन्हें देखा जा सकता है। रावलपिंडी और दक्षिणी स्पेन में प्राचीन गुफाओं में इनके दर्शन होते हैं। अहमदाबाद, कानपुर, नागपुर, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में एक कमरे की कोठरी में अंधेरे से युक्त बस्तियाँ है।

लखनऊ महानगर में मलिन बस्तियों के कारण तथा वितरण


मलिन बस्तियाँ एकाएक उत्पन्न नहीं होती वरन इनकी पृष्ठभूमि में अनेक पोषक तत्व हैं जो इनकी वृद्धि के कारण बने हैं। यहाँ लखनऊ महानगर के परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास किया गया है।

1. निर्धनता : निर्धनता अभिशाप है। निर्धन, बेरोजगार, दैनिक वेतन भोगी, श्रमिक ये सब उस वर्ग के व्यक्ति हैं जो कठोर परिश्रम करने के पश्चात भी दो समय का भोजन अपने परिवार को नहीं दे पाते, न ही ये महँगे सुविधाओं वाले भवन किराये में ले पाने की स्थिति में होते हैं, न ये मकान बना सकने की स्थिति में होते हैं। लाखों श्रमिक जिनके साधन और आय सीमित हैं उसे विवश होकर मलिन बस्तियों में रहना पड़ता है। मकान कम हैं और रहने वाले व्यक्ति अधिक हैं। नगर की अधिकतर आबादी मलिन बस्ति में रहती है। एक अनुमान के अनुसार लखनऊ महानगर की लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या मलिन बस्तियों में है। लखनऊ नगर में कुछ मलिन बस्तियों का सर्वेक्षण कराया, जिसमें पाया गया है कि 15 से 35 की आयु वर्ग 31 प्रतिशत पुरुष अकुशल श्रमिक हैं तथा 23 प्रतिशत बेरोजगार है। 35 से अधिक आयु वर्ग के 18 प्रतिशत अकुशल श्रमिक हैं और लगभग 18 प्रतिशत बेरोजगार है। 15-35 आयु वर्ग की 74 प्रतिशत महिलाएँ बेरोजगार है। 35 से अधिक आयु वर्ग में 92 प्रतिशत बेरोजगार हैं।9

सर्वेक्षण में यह तथ्य भी सामने आये कि कुल जनसंख्या के 16 प्रतिशत लोग जिनकी अवस्था 16 वर्ष से अधिक है बेरोजगार हैं। 53 प्रतिशत बच्चे 6-15 वर्ष के मध्य के हैं और अपने परिवार के कमाऊ सदस्य हैं। कुल आबादी के 63 प्रतिशत व्यस्क दैनिक मजदूरी वाले निर्माण कार्य में लगे हैं इस प्रकार रोजगार का प्रभाव भोजन, आवास तथा वस्त्रों पर तथा परिवार की शिक्षा पर पड़ता है। इनमें सबसे अधिक प्रभाव आवास समस्या के रूप में देखा जाता है।10

2. नगर में आवास समस्या - नगरों में भूमि सीमित है किंतु मांग अधिक है, साथ ही मांग की अधिकता के कारण भूमि का मूल्य जनसाधारण के लिये अदेय हो गया है। अधिकांश लोग किराए के मकानों में रहने को मजबूर है। लाखों श्रमिक जिनके साधन और आय सीमित हैं, विवश होकर मलिन बस्तियों में रहना पड़ता है। मकान कम हैं तथा रहने वाले व्यक्ति अधिक है। जनसंख्या जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है यह समस्या गहराती जा रही है।

लखनऊ महानगर में 1971 में आवासीय मकानों की संख्या 122693 थी। परिवारों की संख्या 140576 थी। 1981 में मकानों की संख्या 159246 थी, जबकि परिवारों की संख्या 167194 थी। यह असंतुलन 1991 में अधिक बढ़ा इस समय परिवारों की संख्या 293130 थी जबकि मकान 270511 थे। इस प्रकार बड़ी संख्या में लोग किराए पर रहते हैं। किराये पर एक कमरा लेने वालों की संख्या अधिक रहती है। क्योंकि बेघर लोगों को आर्थिक स्तर प्राय: नीचा रहता है। मलिन बस्तियों की संख्या लागातार महानगर में बढ़ती चली गयी। जैसे ही जनसंख्या बढ़ी, नगर की सीमाएँ बढ़ी मलिन बस्तियों की संख्या भी बढ़ी। 1991 में मलिन बस्तियों की संख्या 97 आंकी गयी थी, 1996 में लखनऊ नगर निगम द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में लखनऊ महानगर की परिसीमा में 222 मलिन बस्तियों को चिह्नित किया गया। (परिशिष्ट - 44)

लखनऊ नगर के आधारभूत ढाँचे को मलिन बस्तियों ने बहुत प्रभावित किया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय लगभग लखनऊ में 4.97 लाख लोग निवास करते थे 1991 के आंकड़ों के अनुसार लखनऊ महानगर में मलिन बस्तियों रहने वालों की संख्या 3.94 लाख थी जबकि 1981 में 0.19 लाख थी, इस प्रकार जहाँ मलिन बस्तियों की जनसंख्या की दशाब्दी वृद्धि अतिशय है, वहीं मलिन बस्तियों की संख्या में भी अतिशय वृद्धि हुई है। यह नगरीय आवासीय समस्या की ओर संकेत है। ‘मलिन बस्ती उन्मूलन कार्यक्रम’ के अंतर्गत नगर विकास मंत्री लालजी टंडन ने लखनऊ नगर की 700 मलिन बस्तियों को रखा है। लखनऊ विश्वविद्यालय के द्वारा कराए गए एक सवेक्षण से स्पष्ट हुआ कि मलिन बस्तियों में 46 प्रतिशत घर कच्चे, 8 प्रतिशत पक्के-कच्चे और बहुत कम मकान पक्के मिलते हैं। मुख्यत: 83 प्रतिशत घर एक कमरे वाले पाये गए, सफाई व्यवस्था के नाम पर 84 प्रतिशत घरों में जल निकासी की उचित व्यवस्था नहीं थी और 57 प्रतिशत घरों के लोग खुले मैदान में शौच जाते हैं। अत: नगर में आवास समस्या एक बड़ी समस्या के रूप में है। यहाँ के आवास भी आवश्यक सुविधाओं से वंचित है।

3. नगर में जनसंख्या का दबाव - मलिन बस्तियाँ औद्योगिक नगरों की देन हैं लाखों ग्रामीण व्यक्ति काम की खोज में आते हैं और यहीं बस जाते हैं। उनकी आय इतनी सीमित होती है कि वह अच्छे मकानों में नहीं रह सकते। सीमित आय और साधनों का अभाव उन्हें मलिन बस्तियों में रहने को विवश करता है। नगर में जनसंख्या का प्रतिशत प्रति दशाब्दी में द्रुत गति से बढ़ा है। यह 1951 में 28.3 प्रतिशत, 1961 में 31.9 प्रतिशत, 1971 में 24.1 प्रतिशत, 1981 में 23.5 प्रतिशत तथा 1991 में 63 प्रतिशत था। नगर में यह दशाब्दी वृद्धि ग्रामीण क्षेत्रों से नगर में आने वाले व्यक्तियों के कारण हुई। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले लोग नगर में रोजगार पाने के लिये आते हैं। अत: नगर में मलिन बस्तियाँ औद्योगिक केंद्रों के निकट अधिक है। जैसे राजाजीपुरम, तालकटोरा रोड, चौक, नादरगंज, वालागंज में तथा नये आवासी क्षेत्रों के निकट इंदिरा नगर, गोमतीनगर, विकास नगर, एलडीए कानपुर रोड नगर की मलिन बस्तियाँ नालों, रेल पटरियों, सड़कों, पार्कों तथा नदी के तट में बसी हुई है, क्योंकि इनमें रहने वाले लोगों की जीविका मजदूरी तथा सफाई कार्यों एवं कचरे के निस्तारण तथा कचरे से प्राप्त वस्तुओं के कारण होती है।

4. औद्योगिक विकास - नगरीय क्षेत्रों में मलिन बस्तियों की उत्पत्ति का कारण उद्योग होते हैं। उद्योगों में रोजगार पाने के लिये अधिक से अधिक धन अर्जित करने की कल्पना संजोए ग्रामीण क्षेत्रों से लाखों लोग आते हैं। ये मिल, फैक्टरी, कारखाने में या किसी अन्य प्रकार से पेट भरते हैं और निर्धनता ही उनका स्थायी धन हो जाता है। इस औद्योगिक महानगरीय सभ्यता और संस्कृति में उसे तो मलिन बस्तियों में ही रहना पड़ता है।

लखनऊ नगर में चौक क्षेत्र में पाटा नाला के किनारे बसी हुई मलिन बस्ती, सोनिया गांधी नगर, कंचन मार्केट, कटरा, मेडिकल कॉलेज, सर्वेंट क्वाटर, ठाकुरगंज, भावरीनगर, चिदमा टोला, रईस नगर, हुसैनाबाद, तकिया कॉलोनी, कच्ची कॉलोनी, मोहिनी पुरवा, धवल, कैसरबाग मंडी, मजदूर कॉलोनी, भारवेली खुटपुर, वीरनगर, बल्दा कॉलोनी आदि सभी मलिन बस्तियाँ लखनऊ मेडिकल कॉलेज के अधीन भू-खंड में बसी हुई है। यहाँ निवास करने वाले अधिकांश लोग बाजार में मजदूरी के कार्य में लगे हैं इसी प्रकार नादरगंज के निकट की मलिन बस्तियों, चिल्लावां, बेहसा, मुंशी पुरवा, बदाली खेड़ा, आजाद नगर, गिंदन खेड़ा गड़ौरा, अमौसी, हिंदनगर के निवासी नादरगंज की फैक्ट्रियों में कारखानों में काम में लगे हुए हैं। इस प्रकार मलिन बस्तियों में निवास करने वाले लोग निकट के क्षेत्र में उपलब्ध कार्यों से जुड़े हुए हैं।

5. संसाधनों की समस्या - नगरीय पर्यावरण की समस्याओं से मुक्ति पाने के लिये नगरों के पास न तो कोई योजनाएँ है और न ही योजनाओं की पूर्ति के लिये संसाधन सुलभ है। नगरों की मलिन बस्तियों में सुधार के लिये भारत सरकार द्वारा समय-समय पर योजनाएँ बनायी जाती है। इस प्रकार की योजनाओं में आवाज की योजनाएँ मुख्य रूप से सम्मिलित रहती है। लखनऊ नगर में गोमती बंधे, नालों के किनारे, रेलवे लाइन के किनारे तथा महत्त्वपूर्ण पार्कों में बसी मलिन बस्तियों को नयी जगह एक कमरे के मकान बनाकर स्थानान्तरित करने की योजनाएँ आज तक नगर निगम की निर्धनता के कारण पूरी नहीं हो सकी जबकि इस हेतु अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विदेशों से भी सहायता लेने की बात की गयी। मलिन बस्ती सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत, शौचालय निर्माण, सीवर निर्माण, पेयजल आपूर्ति, जल निकास, सड़क निर्माण, मार्ग प्रकाश की व्यवस्था आदि संसाधनों की कमी के कारण लागू नहीं हो पाती हैं। अत: लखनऊ नगर में मलिन बस्तियों की लगातार वृद्धि का कारण संसाधनों का अभाव है।

6. नगरों का अनियोजित विकास - नगर में मलिन बस्तियों का विकास होना इस बात का बहुत बड़ा कारण है कि नगरों के सुनियोजित और योजनाबद्ध ढंग से विकास की योजनाएँ नहीं बनायी गयी। जिन नगरों के विकास में योजनाओं को ध्यान में रखा गया वहाँ यह समस्याएँ बहुत कम देखने को मिलती है। लखनऊ महानगर में आलमबाग क्षेत्र की जितनी भी मलिन बस्तियाँ हैं नगर योजना के अंतर्गत नहीं है। इनमें न तो जल निकास के लिये नालियों की व्यवस्था के लिये भूमि है और न ही समुचित चौड़े मार्गों के लिये ही भूमि है, विद्युत और पेयजल की पूर्ति में भी भारी समस्याएँ है नटखेड़ा, आजादनगर, मधुवन नगर, मरदनखेड़ा, सरदारी खेड़ा तथा अन्य दो दर्जन ऐसी बस्तियाँ है।

नगर में नियोजित विकास के क्षेत्रों में यदि दृष्टि डालें तो यह समस्या कम देखने को मिलती है। यहाँ नालों रेल पथ, सड़कों व पार्कों के पास ऐसी बस्तियाँ बसी है जो अस्थायी रूप से बसती और उजड़ती रहती है। इसमें राजाजीपुरम, एलडीए कानपुर रोड, इंदिरानगर, विकास नगर, गोमती नगर आदि नये नियोजित क्षेत्रों में है इनके लिये नियोजित क्षेत्रों में कुछ स्तर पर निर्माण कार्य भी कराए गए हैं। यद्यपि यह पर्याप्त नहीं है फिर भी समस्या को कम करने में एक प्रयास है।

लखनऊ नगर के प्रमुख वार्डों की मलिन बस्तियों की समस्यायें


लखनऊ महानगर की लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या मलिन बस्तियों में रहती है। नगर का आर्थिक आधार उद्योगों में काम करना व्यवस्था करना तथा अनियोजित क्षेत्र में काम करना है। निश्चित रूप से मलिन बस्तियाँ या तो नगर के किनारे वाले भागों या नदी, नालों एवं रेलपथ के किनारे स्थित है। इस प्रकार की बस्तियों का विस्तार काफी तेजी से होता जा रहा है इसका कारण ग्रामीण क्षेत्र की बेरोजगारी और जनसंख्या का विस्फोट है। लखनऊ नगर में मलिन बस्तियाँ दो प्रकार की देखने में मिलती है।

1. नियोजित मलिन बस्तियाँ - नगर में ऐसी मलिन बस्तियाँ जो कई दशकों से बसी है तथा इन्हें सरकारी विभागों ने भी मान्यता दी है, इन्हें निगम ने भी अनेक सुविधाएँ प्रदान की है। ऐसी बस्तियों में निवास करने वाले लोगों के स्थायी आवास कच्चे या पक्के दोनों प्रकार के हैं। विद्युत, मार्ग प्रकाश, जलापूर्ति, जल निकास, मार्ग, सुलभ शौचालय आदि की कुछ व्यवस्थाएँ की जा चुकी है। नगर निगम लखनऊ के अनुसार नगर में इस प्रकार की मलिन बस्तियों की संख्या 265 है, एक अन्य परियोजना के अंतर्गत नगर में ऐसी 222 बस्तियाँ है। अगस्त 2000 में नगर की सीमाओं में 700 मलिन बस्तियों की बात नगर विकास मंत्री लालजी टंडन ने कही। नगर में ऐसे क्षेत्रों में समय-समय पर स्वास्थ्य, शिक्षा तथा जन जागरूकता के कार्यक्रम चलाए जाते हैं।

2. अनियोजित मलिन बस्तियाँ -


नगर में इस प्रकार की बस्तियाँ नयी विकसित कॉलोनियों में बसी है। यद्यपि इस प्रकार की बस्तियों को कोई वैद्यानिक अधिकार प्राप्त नहीं है, फिर भी इसमें आवास कच्चे बने हुए है। ऐसी बस्तियों नदी तट पर नालों के किनारे-किनारे पार्कों पर और रेलमार्गों के किनारे बसी हुई है। यहाँ पर जलापूर्ति, विद्युतपूर्ति, मार्ग प्रकाश, सड़क व्यवस्था जैसी सुविधाएँ नहीं है। साथ ही समय-समय पर इन्हें नगर निगम के द्वारा हटाया भी जाता है। स्थानांतरण शील होने के कारण नगर निगम द्वारा चलाए जाने वाले सुधार कार्यक्रम यहाँ नहीं लागू हो पाते हैं। ऐसी अव्यवस्थित बस्तियों के लिये नगर निगम द्वारा कुछ स्थायी रूप देने की योजना बनायी जा रही है।

लखनऊ महानगर में नगर निगम द्वारा घोषित 265 मलिन बस्तियाँ हैं। इन मलिन बस्तियों में अलग-अलग प्रकार की समस्याएँ हैं। नगर के 40 वार्डों में कुछ विशेष वार्डों में मलिन बस्तियों की दशा का अवलोकन किया गया है, इन क्षेत्रों की मलिन बस्तियों में कचरा निस्तारण, जल निकास, विद्युतपूर्ति, पेय जलापूर्ति, मार्ग निर्माण, मार्ग प्रकाश व्यवस्था तथा सामाजिक अपराधों की समस्याएँ हैं। इस अध्ययन से नगर की मलिन बस्तियों की दशा का अनुमान किया जा सकता है।

तिलक नगर वार्ड में पिछड़ी व मलिन बस्तियाँ ही अधिक है। संत सुदर्शन पुरी, रामनगर, रामनगर, एलडीए कॉलोनी, तिलक नगर, न्यू तिलक नगर, खजुआ, बिरहाना, कर्बला, बक्कल मिल, तकियाचांद अलीशाह यहाँ की प्रमुख मलिन-बस्तियाँ हैं, इसमें ऐशबाग का क्षेत्र आता है यहाँ की सड़कें 18 से 25 वर्ष पहले की बनी है। तब से इनमें मरम्मत कार्य तक नहीं कराया गया है। लगाए गए खड़ंजों की र्इंटे भी नदारद है। रामनगर, तकिया चांद अलीशाह और विरहाना जोशीटोला में 50 प्रतिशत खड़ंजे खराब हो चुके हैं इस वार्ड में जलापूर्ति की समस्या है, जल का दबाव कम रहने से गड्ढा खोदकर पान लाइन काटकर पानी भरते हैं। खजुआ और सुदर्शन पुरी तथा मुस्लिम बस्तियों- कर्बला, बक्कल मिल तथा तकिया चांद अलीशाह में कनेक्शन बहुत कम है। पूरे वार्ड में मात्र पाँच हैंडपंप लगे हुए हैं जो पानी दे रहे हैं। शेष पाँच में खराबी आ गयी है। मार्ग-प्रकाश के बारे में भी अव्यवस्था है। ट्यूब लाइटों में स्विच नहीं है कहीं-कहीं पर रात दिन जलती है। कहीं-कहीं पूरा का पूरा मार्ग अंधेरे में रहता है। राम नगर मलिन-बस्ती में लाइट रहना ही बड़ी बात है।

तिलकनगर वार्ड में जगह-जगह कूड़े के ढेर हैं। संत सुदर्शनपुर में 25 प्रतिशत जगहों पर सीवर लाइनें नहीं है। न्यू तिलकनगर में भी यही दशा है विरहाना में देवीदयाल मार्ग पर कर्बला बक्कल मिल तथा तकिया चांद में हमेशा जलभराव की समस्या रहती है। रामनगर एलडीए में तो एक फिट पानी भरा रहता है। यही दशा बक्कल मिल सुदर्शनपुरी में है। अंजुमन सिनेमा के अत्यंत प्राचीन कुएँ के पीछे मात्र 25 फीट की दूरी पर सिनेमा हॉल का सेप्टिक टैंक है इसलिये इस कुएँ का जल प्रदूषित हो चुका है। जिसका उपयोग यहाँ के लोग करने को बाध्य हैं। जबकि यूपी नगर निगम अधिनियम 1959 की धारा 238, 239, 255, 257, 258, 262 एवं 271 के अनुसार मल टंकी की स्थापना यहाँ नहीं की जा सकती है।

यहाँ का विद्यालय भवन जीर्ण दशा में है विद्यालय की आवश्यक सुविधाएँ नहीं है। वार्ड के आठ पार्कों में कोई भी पार्क सही दशा में नहीं है। कुछ पार्क अवैध कब्जों के शिकार हैं। यहाँ अवैध कब्जों वाले बांग्लादेशी शरणार्थी भी हैं। इसलिये चोरियां और राहजनी एक आम समस्या है। यहाँ सार्वजनिक शौचालय तो बनवाए गए किंतु जर्जर और गंदगी से भरे हैं उदाहरण के लिये झिंगुरदास की पैड़ी के शौचालय को देखा जा सकता है।

हुसैनाबाद वार्ड ऐतिहासिक विरासतों से परिपूर्ण है आज अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिये भी मोहताज है। हुसैनाबाद वार्ड के अंतर्गत मोहनी पुरवा, हाता मिर्जा जली खां, शिवपुरी, हाता सितारा बेगम, पीरबुखारा, रईस मंजिल, तहसीन गंज, नेपियर रोड कॉलोनी हुसैनाबाद, शीशमहल तथा कुड़िया घाट, जूता बाजार, लंगर खाना बस्तियाँ आती है। यहाँ की ऐतिहासिक धरोहरें भी गंदगी में मलिन होती जाती है।

यहाँ मार्गों में टूटी पाइप लाइनों का पानी भरा रहता है। दुर्गा देवी मार्ग तथा मोहिनी पुरवा मार्ग एकदम जर्जर दशा में है। नालियों में गंदगी भरी हुई है। यहाँ पैदल चलने वालों के लिये भी समस्या है। यहाँ की सफाई व्यवस्था एकदम खराब दशा में है। पेयजल की समस्या भी यहाँ कठिन है ऊँचाई वाला भाग होने के कारण पानी का दबाव बहुत कम रहता है। दो दर्जन हैंडपंपों में आधे से अधिक खराब पड़े हुए हैं। यहाँ जलभराव से लोनियन टोला में एक बच्चे की डूबकर मृत्यु भी हो चुकी है। थोड़ी वर्षा में भी कच्ची नालियां उफनाने लगती है।

मार्ग-प्रकाश व्यवस्था तथा प्राथमिक विद्यालय भी अपनी पहचान खो चुके हैं। यहाँ की मलिन बस्तियों सिताराबेगम, मोहनीपुरवा, रईस मंजिल, लोनियन टोला में प्राय: पीलिया, आंत्रशोथ की स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। अवैध निर्माण अतिक्रमण यहाँ की सबसे गंभीर समस्या है, मोहनीपुरवा से गुलाला श्मशान घाट जाने वाली रोड को प्रॉपर्टी डीलरों द्वारा बेच दिया गया है, नाले नाली के रूप में बदल गए हैं जिससे जल निकास की दशा खराब हो गयी है। इसी प्रकार दुर्गादेवी रोड, अमरनाथ का खेत भी बेच दिया गया है। इसलिये क्षेत्रीय लोगों में आक्रोश व्याप्त है।

लेबर कॉलोनी वार्ड लगभग बीस हजार की आबादी वाला यह वार्ड सेक्टर सात, दस, तेरह, लेबर कॉलोनी, मिली एलआईजी सुप्पारौश, नंदा खेड़ा, दरियापुर, लाइन खेड़ा, मनीनगर आदि बस्तियों में बंटा है। यहाँ पर कई सरकारी विभाग खाद्य आपूर्ति विभाग, एफसीआई गल्ला गोदाम जल संस्थान कार्यालय, विद्युत विभाग का कार्यालय, टिकैतराय पावर हाउस तथा ऐतिहासिक तालाब भी है। यहाँ लेबर कॉलोनी और सुप्पारौश, लाइन खेड़ा तथा नंदाखेड़ा सड़कें बुरी तरह ध्वस्त हैं। यहाँ के निवासी पीने के पानी के लिये मोहताज हो जाते है। यहाँ पाइप लाइन तथा हैंड पंप नहीं है, दो कुओं और कुछ घंटों की पेयजल पूर्ति से यहाँ काम चलता है। इन बस्तियों में बिजली के खंभों में प्रकाश के ट्यूब लाइट नहीं है।

यहाँ की सफाई व्यवस्था बेअसर है, जहाँ तहाँ कूड़े के ढेर लगे रहते हैं। सेक्टर सात स्थित चक्की के पीछे मैदान में सैकड़ों ट्रक कूड़ा पड़ा रहता है। एमआईजी जो एक नियोजित मलिन बस्ती है में कूड़ा पात्र कहीं भी नहीं है। दरियापुर, लाइन खेड़ा, रानीनगर, नंदाखेड़ा में शुलभ शौचालय नहीं है। सीवर लाइन भी नहीं है। अत: अधिकांश लोग मैदान में शौच के लिये जाते हैं। और स्थानीय पर्यावरण प्रदूषित करते हैं यहाँ कहीं भी सरकारी विद्यालय और चिकित्सालय नहीं है। जलभराव की समस्या बरसात में भी इतनी अधिक हो जाती है कि गंदी नालियों का पानी घरों में घुसता है। यह वार्ड आपराधिक दशाओं तथा सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। यहाँ लगभग 25 पार्क है जिनमें 13 में घोसी दूध का धंधा चलाते हैं। कुछ में अवैध कब्जे हैं। इस प्रकार यहाँ की बस्तियों में पेयजल, सड़कें, मार्ग प्रकाश, सीवर लाइन का अभाव है। साथ में अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को बढ़ावा भी मिल रहा है।

छावनी परिषद वार्ड में बड़ी लालकुर्ती बाजार, रजमन बाजार, बड़ाघेरा, बैलबॉडी, प्रेमनगर, घसियारी मंडी, धोबी, नील लाइन, बनिया बाजार, हडसन लाइन, शिया लाइन, कालम मंडी, राबर्ट लाइन, खटिया गोदाम, ग्रास फार्म आदि तथा रेसकोर्स के प्रमुख क्षेत्र है जहाँ गंदी बस्तियों की स्थिति देखी जा सकती है। यहाँ पेयजल की असुविधा प्राय: देखी जाती है। यहाँ पर सोलह हैंडपाइप लगाए गए है। जिनमें अधिकांश खराब दशा में है। यहाँ पर सीवर समस्या भी है। इसके लिये बड़ी लालकुर्ती में आरए लाइन, बीसी बाजार में नेडा के सहयोग से तीन सार्वजनक शौचालय ही बनाए जा सके हैं। इस क्षेत्र में अन्य आवश्यक सुविधाओं के लिये भी नागरिक मोहताज हैं। तोपखाना बाजार तथा रजमन बाजार में सफाई व्यवस्था बहुत पिछड़ी हुई है। यहाँ नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाओं के लिये छावनी परिषद से बाहर जाना पड़ता है। यहाँ पर रजमन बाजार में विद्यालय भी नहीं है तथा छावनी परिषद द्वारा संचालित विद्यालय भी ठीक दशा में नहीं है। यहाँ मार्गों में खड़ंजों की व्यवस्था लगभग सभी जगह करायी गयी है। किंतु अभी कुछ बस्तियों में यह विवाद की दशा में हैं।

यहाँ अनियोजित मलिन बस्तियों की संख्या अधिक है। मोहनगंज, हडसन लाइन, सिया लाइन, गुरु गोविंद सिंह मार्ग, एमएफएसडी गेट तथा बड़ी लालकुर्ती में सैकड़ों झोपड़ियाँ अवैध कब्जों में करार देकर हटायी जाती रही है। इनको न तो बसाया गया न बसने के लिये स्थान ही बताया गया परिणामस्वरूप समय-समय पर यह समस्या खड़ी होती है। इस प्रकार छावनी परिषद में भी मलिन बस्तियों की दशा ठीक नहीं है।

महानगर के सभी वार्डों और बस्तियों की दशा का पृथक-पृथक अध्ययन करना समीचीन नहीं है। अब नगर की प्रमुख मलिन बस्तियों को उदाहरण के रूप में लेंगे। चंद्रभानु गुप्त नगर की मलिन बस्तियों और मुहल्लों हैदर कैनाल कॉलोनी, पान दरीबा, टैक्सी स्टैंड, रैनबसेरा, एपी सेन रोड पर भी गंदगी के ढेर हैं। करहटा, अंबेडकर नगर और संजय नगर मलिन बस्तियों में जन समस्याएँ व्याप्त हैं। ट्रांस गोमती में कुकरैल से लगे क्षेत्रों सर्वोदयनगर, शक्तिनगर, अलीगंज की बनारसी टोला, चौधरी टोला, पांडे टोला, डंडइया बाजार, काली मंदिर, रहीम नगर खुर्द, घोसियाना, चांदगंज तथा खदरा की बस्तियों में मार्ग, जलापूर्ति, मार्ग प्रकाश, गंदगी की समस्याएँ व्याप्त हैं।

यहाँ पर इंदिरा नगर के ‘बी’ ब्लॉक के क्रॉसिंग के निकट स्थित ‘बस्तौली’ मलिन बस्ती का अध्ययन किया गया है। इस बस्ती के 10 प्रतिशत घरों का नमूने के रूप में सर्वेक्षण किया गया और पाया गया कि कुल 1685 की जनसंख्या वाली बस्ती में 253 पुरुष, 257 महिलाएँ हैं। 6 वर्ष तक के बच्चों की संख्या 755 है और 6-14 वर्ष तक के बच्चों की संख्या 420 है। साक्षरता कुल प्रतिशत 60 है। 0 से 8 वर्ष तक के विकलांग बच्चे 8 प्रतिशत हैं। 42 प्रतिशत प्रसव घर पर, 58 प्रतिशत अस्पताल में जिनमें 14.5 प्रतिशत असुरक्षित स्थिति में रहते हैं, यहाँ पर सर्वेक्षण के दौरान पाया गया कि 15-35 आयु वर्ग के पुरुषों में 31 प्रतिशत अकुशल मजदूर हैं। तथा 23 प्रतिशत बेरोजगार हैं। 35 से अधिक आयु वर्ग के पुरुषों में 18 प्रतिशत अकुशल तथा 18 प्रतिशत बेरोजगार हैं। 15-35 आयु वर्ग महिलाओं में 74 प्रतिशत बेरोजगार हैं तथा 92 प्रतिशत 35 से अधिक आयुवर्ग की महिलाएँ बेरोजगार हैं। 15 वर्ष तक के 16 प्रतिशत बच्चे मजदूरी करते हैं। यहाँ पर जन सुविधाओं के सर्वेक्षण में पाया गया कि 70 प्रतिशत घरों में प्रकाश की व्यवस्था है। 30 प्रतिशत में नहीं है। 95 प्रतिशत लोगों के आवास निजी हैं और 5 प्रतिशत लोग किराए पर हैं। 90 प्रतिशत पक्के घर हैं। 10 प्रतिशत घरों में जलापूर्ति है। 40 प्रतिशत में हैंडपंप की व्यवस्था है। प्रसाधन का उपयोग 45 प्रतिशत लोग करते हैं। 55 प्रतिशत खुले मैदानों में जाते हैं।11

गोमती प्रदूषण नियंत्रण योजना के अंतर्गत लखनऊ महानगर की 12 मलिन- बस्तियों का सर्वेक्षण तथा जन सुविधाओं एवं मलिन-बस्तियों में निवास करने वाले लोगों की जागरूकता का अध्ययन किया गया। अध्ययन में पाया गया कि यहाँ पर 12 प्रतिशत के पास नगरीय जलापूर्ति कनेक्शन है। 11 प्रतिशत के पास अपने हैंडपंप हैं तथा 73 प्रतिशत के पास अपना शौचालय नहीं है। 11 प्र्रतिशत के पास कच्चा शौचालय था, अर्थात 80 प्रतिशत लोग शौच बाहर जाते हैं। मलिन-बस्ती में बनाये गये 10 विद्यालयों में से 1 के पास पेशाब घर और शौचालय पाया गया।

लोगों में स्वास्थ्य की दृष्टि से जागरूकता में कमी देखी गयी। शौच के पश्चात 41 प्रतिशत हाथ नहीं धोते हैं। 38 प्रतिशत यों ही सादे पानी से हाथ धोते हैं। मिट्टी या राख से केवल 21 प्रतिशत लोग हाथ धोते हैं। मनोरंजन के साधनों के उपयोग में पाया गया कि 50 प्रतिशत लोग टेलीवीजन नहीं देखते हैं। 26 प्रतिशत लोग कभी-कभी देखते हैं। 13 प्रतिशत आवश्यक कार्यक्रम देखते हैं केवल 11 प्रतिशत प्रत्येक दिन नियमित रूप से देखते है। इसी प्रकार 46 प्रतिशत लोग रेडियो नहीं सुनते, 31 प्रतिशत लोग आवश्यक नहीं समझते 12 प्रतिशत प्रत्येक दिन तथा 11 प्रतिशत आवश्यक दिनों में सुनते हैं केवल 27 प्रतिशत माताएँ ही अपने बच्चों को स्कूल भेजती हैं। 82 प्रतिशत दैनिक मजदूरी करते हैं।12

लखनऊ नगर के आलमबाग क्षेत्र की प्रमुख मलिन-बस्तियों में 1991 में नगर निगम द्वारा रहने वाले परिवारों की संख्या तथा जनसंख्या की स्थिति का अनुमान लगाया गया, जिससे यहाँ पर मलिन-बस्तियों के परिवारों तथा जनसंख्या संरचना का अनुमान होता है।

तालिका-6.1 से पता चलता है कि सबसे कम परिवार चमरोखा और मेंहदी खेड़ा में है, परिवार मेंहदी खेड़ा में अधिक किंतु जनसंख्या चमरोखा की तुलना में 200 से कम है। यहाँ यह बात परिवारों की मानसिक दशा और शिक्षा के स्तर को स्पष्ट करता है। मेंहदी खेड़ा के परिवारों का आर्थिक स्तर अपेक्षाकृत उच्च है और परिवार भी अपेक्षाकृत उच्च वर्ग के हैं। इसी प्रकार कुम्हार मंडी में परिवार 664 है किंतु जनसंख्या किसी भी बस्ती से बहुत कम है। यह स्थिति यहाँ पर व्यवसाय के कारण बाहर बसने से है। इसी प्रकार नगर निगम के द्वारा पुराने नगर की मलिन बस्तियों में अनुसूचित जाति के लोगों का प्रतिशत स्थिति का परिकलन कराया जिनमें कुछ प्रमुख बस्तियों की स्थिति इस प्रकार रही।

तालिका 6.1 आलमबाग लखनऊ की मलिन बस्तियों की संरचना (1991) तालिका - 6.2 से यह बात स्पष्ट होती है कि नगर की मलिन बस्तियों में 80 प्रतिशत से अधिक लोग अनुसूचित जाति के हैं जो छोटे स्तर के कार्य और व्यवसाय से जुड़े हैं। इस प्रकार नगर की कुछ मलिन बस्तियों की जनसंख्या 4000 से अधिक तो कुछ की 800 तक है। यहाँ पर बड़ी जनसंख्या वाली बस्तियों तथा नगर के पुराने क्षेत्रों की जनसंख्या में कार्य स्तर की दृष्टि से विविधता है।

मलिन बस्तियों में विभिन्न प्रकार की समस्याएँ हैं। नगर की बस्तियों में सबसे बड़ी समस्या आवासों की है। सघन जनसंख्या के कारण लोगों में अशांति एवं व्याकुलता आ जाती है, इससे लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। यहाँ लोगों को शुद्ध जल और वायु भी नहीं मिल पाती है। पेचिस डायरिया यहाँ की मुख्य समस्याएँ हैं। मलिन बस्तियों में नशाखोरी की समस्याएँ भी अपनी एक चिंता जनक स्थिति तक बढ़ जाती है। ये गांजा, चरस, कच्ची शराब बेचने के केंद्र बन जाते हैं। जुआ खेलना, अनैतिक यौन सम्बन्ध तथा चोर डकैतों की शरणस्थली बन जाती है। बच्चे के लिये असामाजिक वातावरण मिलता है और बचपन से ही अपराधों के चंगुल में फँस जाते हैं। इनसे विभिन्न प्रकार के अपराधिक कार्य कराए जाते हैं। शराब, गांजा बेचना तथा अनैतिक यौन सम्बन्ध में पड़ना इनकी मजबूरी बन जाती है। इन बस्तियों में सामाजिक आदर्श मूल्य, नैतिकता, सहिष्णुता आदि के दर्शन नहीं होते हैं।

तालिका 6.2 पुराने लखनऊ की मलिन बस्तियों की संरचना (1991) मलिन बस्तियों की दशा की व्याख्या करते हुए डॉ. राधाकमल मुखर्जी ने लिखा है - ‘‘औद्योगिक केंद्रों की हजारों मलिन बस्तियों ने मनुष्यत्व को पशु बना दिया है। नारीत्व का अनादर होता है और बाल्यावस्था को आरंभ में ही विषाक्त बना दिया जाता है। ग्रामीण सामाजिक संहिता श्रमिकों को, औद्योगिक केंद्रों में अपनी पत्नियों के साथ रखने के लिये हतोत्साहित करती है। ऐसे देश जहाँ कम आयु में विवाह प्रचलित है वहाँ युवा श्रमिक, जिसने अपना वैवाहिक जीवन प्रारंभ ही किया हो नगर के आकर्षण से प्रभावित होता है।’’

इस प्रकार नगर की विभिन्न मलिन बस्तियों की समस्याएँ अलग-अलग भी हो सकती है किंतु परिणाम और परिणामों से बचने के लिये योजनाएँ एक जैसी हो सकती है। नगर के स्वस्थ पर्यावरण के लिये मलिन बस्तियों में सुधार के लिये जन सुविधाएँ तथा नीतियाँ लागू करना आवश्यक होगा।

नगर की मलिन बस्तियों का सुधार एवं नियोजन
आवास



मलिन बस्तियों के सुधार हेतु 1950 से विशेष योजनाएँ बनायी गयी है। ये योजनायें मुख्यत: दो सिद्धांतों पर आधारित थी। 1. मलिन बस्तियों में जो लोग रह रहे हैं उन्हें वहीं पुन: स्थापित किया जाए अथवा 2. निकट के स्थान पर मकान निर्माण कर उन्हें वहाँ बसाया जाए, जिससे की वह अपने कार्य स्थल से दूर न हो सके। इसके साथ ही इन बस्तियों का किराया मिलन बस्तियों में रहने वाले व्यक्तियों की आय के अनुरूप हो जिससे कि वे सरलता से किराया दे सकें। साथ ही मकान स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छे होने चाहिए, पेयजल की समुचित व्यवस्था हो तथा शौचालय और सीवर व्यवस्था भी होनी चाहिए। इनमें चौड़ी सड़कें और गलियों का निर्माण हो इन स्थानों पर स्कूल, पार्क, खेल के मैदान, पुलिस स्टेशन, अस्पताल आदि की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।

लखनऊ महानगर की समस्या के समाधान पर विचार करना आवश्यक होगा। यहाँ पर मलिन बस्ती सुधार की कोई विशेष योजना नहीं चलायी गयी। बल्कि सामुदायिक विकास योजना के माध्यम से पेयजल, स्वास्थ्य, सड़कों का निर्माण, जल निकास, शिक्षा व्यवस्था आदि कुछ कार्य किये गए हैं। ये कार्य यहाँ की दशा को देखते हुए बहुत कम है। यहाँ आवास विकास बोर्ड तथा एलडीए ने 75 प्रतिशत मकान निर्धन वर्ग के लिये बनाए हैं। जिनमें 50 प्रतिशत एमआईजी और 10 प्रतिशत एचआईजी के हैं जो 40 प्रतिशत भुगतान देकर प्राप्त किए गए। एलडीए और हुड़को ने 16.5 प्रतिशत ब्याज पर दिया। एलआईजी की 15.5 प्रतिशत ब्याज दर थी, बोर्ड के अनुसार 32009 भवन पंजीकृत है जिनमें की 17868 ईडब्ल्युएस प्रकार के 5436 एलआईजी, 2935 एमआईजी और 565 एचआईजी प्रकार के हैं, बोर्ड के अनुसार 150 एकड़ भूमि भवनों के लिये अधिकृत हैं।13

लखनऊ महानर में एलडीए कानपुर रोड, राजाजीपुर, विकास नगर, अलीगंज, इंदिरानगर, गोमतीनगर जानकीपुरम, आशियाना, साऊथ सिटी, बसेरा, एल्डिको जैसी बड़ी कॉलोनियों में निर्धन आय वर्ग के लिये स्थान बहुत सीमित दिए गए हैं, प्राय: जहाँ भी इस श्रेणी की कॉलोनियाँ है वह अलग थलग पड़ गयी है एलडीए की ऐसी कॉलोनी में, पानी, विद्युत, मार्ग, मार्ग प्रकाश आदि की व्यवस्था नहीं है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिये इन कॉलोनियों में भूमि की कमी नहीं है कमी है तो योजना को कार्यान्वित करने की। आवास समस्या के निराकरण के लिये कई योजनाएँ चलायी जा रही है यथा बगीचा श्रमिकों के लिये विकास योजना, मध्यम आय समूह योजना, निम्न आय समूह योजना, मलिन बस्तियों की सफाई तथा विकास की योजना, झुग्गी झोपड़ी हटाने की योजना, मलिन बस्तियों का परिवेश गत विकास, मलिन बस्ती उन्मूलन कार्यक्रम और मलिन बस्ती पर्यावरण सुधार आदि।

इसके अतिरिक्त विश्व बैंक द्वारा मलिन बस्तियों की दशा में सुधार के लिये आर्थिक सहायता दी जाती है। लखनऊ विकास प्राधिकरण के द्वारा आवास तथा मलिन बस्तियों की समस्या में सुधार अवश्य किया गया किंतु अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। नगर में नयी मलिन बस्तियों का प्रसार कम हुआ है तथा नियोजित क्षेत्र बढ़ा है। मलिन बस्तियों के सुधार के लिये, रोजगार गारंटी योजना, रोजगार कार्ड योजना, सीवरों की निर्माण, सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण, बायोगैस केंद्रों का निर्माण, मार्ग प्रकाश, विद्युत पूर्ति, सड़क निर्माण, सेवा केंद्रों की स्थापना, धोबियों, मजदूरों, बढ़ई, राजमिस्त्री, प्लम्बर आदि को रोजगार देने के लिये नगर निगम तथा हुड़को ने सहायता की घोषणा की है।

विभाग को इस दिशा में नयी रूपरेखा बनाने की आवश्यकता है जिसके अंतर्गत ये कार्य करना आवश्यक है -

1. पुरानी मलिन बस्तियों का जीर्णोद्धार करना नगर के पुराने क्षेत्रों के आवासों में निवास करने की स्थिति नहीं है। नाले के तट पर बनी बस्तियों की भी दशा ऐसी ही है। इन्हे अनुदान देकर सुधारा जा सकता है।

2. नये क्षेत्रों में मलिन बस्तियों को सीमित किंतु विस्तृत क्षेत्रों में बसाया जाए।

3. आवास लागत बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि कुछ ही वर्षों में इनको जीर्ण दशा में पहुँचने से रोका जा सके।

4. मलिन बस्तियों में अवैध निर्माण बड़ी तीव्र गति से होते हैं। अत: इसके नियंत्रण के लिये विभाग को सक्रिय रखा जाए।

5. मलिन बस्तियों में जन सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित हो ताकि यहाँ रहने वाले लोगों का दृष्टिकोण तथा रहने वाले लोगों के प्रति जनसामान्य का दृष्टिकोण बदल सके।

6. जलापूर्ति के लिये सावर्जनिक रूप में इंद्रामार्क हैंडपंप लगाये जाने चाहिए तथा पाइप लाइन बिछायी जानी चाहिए नगर की सैकड़ों मलिन बस्तियों में पेय जलापूर्ति की व्यवस्था नहीं है। अलीनगर सुनहरा, बदाली खेड़ा, चिल्लावा, आजाद नगर जैसी सैकड़ों बस्तियों में ट्यूबवेल लगाए जाने चाहिए।

7. जल निकास के लिये नालियाँ बनाना स्वच्छता के लिये अपरिहार्य है। नगर की अनेक बस्तियों में गंदगी का कारण जल निकास की ठीक व्यवस्था का न होना है। आलमबाग की दर्जनों बस्तियों में गंदे जल के भराव से बीमारियाँ फैलती हैं। अत: इस क्षेत्र में जल निकास की व्यवस्था होनी चाहिए इसी प्रकार आवश्यकता एलडीएएच ब्लॉक की बस्ती में तथा पुराने नगर के क्षेत्रों में है।

8. मार्ग प्रकाश की दशा नगर में अच्छी नहीं है। मलिन बस्तियों के क्षेत्र में तो यह और भी खराब दशा में है। अपराधी प्रवृत्तियों का बढ़ना, चोरियों का होना, छीना-झपटी छेड़छाड़ प्रकाश व्यवस्था की कमी पर निर्भर करता है। लखनऊ महानगर की उन बस्तियों में जो नगर के बाहर की ओर हैं प्रकाश व्यवस्था नहीं है। इसी प्रकार प्रकाश व्यवस्था में सुधार करने की आवश्यकता है।

9. लखनऊ की 70 प्रतिशत मलिन बस्तियों में मार्ग नहीं है। आलमबाग, पुराने लखनऊ, सदर, नालों तथा कुकरैल नदी तट पर बसी बस्तियों की यह बड़ी समस्याएँ हैं। यहाँ पर जो खड़ंजे लगाए गए हैं। वह भी खराब हो चुके हैं। आलमबाग की अधिकांश मलिन बस्तियों में किसी प्रकार के मार्ग ही नहीं बनाए गए हैं। अत: मूलभूत आवश्यकता की पूर्ति का समुचित प्रयास होना चाहिए।

10. जैसा की पिछले अध्ययन में स्पष्ट किया जा चुका है कि नगर की अधिकांश मलिन बस्तियों में न तो सीवर लाइन है और न सावर्जनिक शौचालय है। खुले में नालों में, नालियों में लोग शौच जाने के लिये विवश है। नगर की कुछ मलिन बस्तियों ऊंटखाना, सितारा बेगम लालकुर्ती, जुगौली आदि में नेडा ने सार्वजनिक शौचालय तथा मानव मल पर आधारित गैस इकाइयां स्थापित की जिनके विस्तार की आवश्यकता है। इससे बस्ती का पर्यावरण सुधरेगा तथा विद्युत संकट कम किया जा सकेगा।

11. किसी भी क्षेत्र के समग्र विकास में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ तथा संचार सेवाएँ अपना महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालती है। लखनऊ नगर की मलिन बस्तियों में शिक्षा व्यवस्था ठीक दशा में नहीं है। यहाँ की अधिकांश बस्तियों में विद्यालय नहीं है। जहाँ पर विद्यालय है उनकी दशा ठीक नहीं है। भवन, शिक्षक तथा शिक्षा के लिये आवश्यक सुविधाएँ नहीं है। इन बस्तियों में निजी स्तर पर भी जो संस्थाएँ संचालित है। वह भी मानकों को पूरा करने में पिछड़ी है, एक सर्वेक्षण के अनुसार नगर की केवल 10 प्रतिशत मलिन बस्तियों में विद्यालय है और उनमें 10 प्रतिशत विद्यालयों में ही आवश्यक सुविधाएँ हैं। अत: नगरीय पर्यावरण में सुधार के लिये यहाँ पर शिक्षण संस्थाओं को निजी स्तर पर संचालित कराया जाए तथा सरकारी सहायता प्रदान की जाए।

12. नगर में स्वास्थ्य सेवाएँ राजधानी नगर होने के कारण अच्छी दशा में है, किंतु मलिन बस्तियों में यह सेवाएँ निकटतम दूरी में दुलर्भ है। प्राथमिक सेवाएँ तथा शिशु चिकित्सा सेवाओं का विस्तार करना आवश्यक हो गया है। नगर में स्वास्थ्य परीक्षण शिविर लगाकर मलिन बस्तियों के लोगों को आवश्यक स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी दी जा सकती है। समय-समय पर संक्रामक रोगों से बचने के उपाय बताए जा सकते हैं। परिवार कल्याण और परिवार नियोजन सम्बन्धी जानकारी देने के सम्बन्ध में कैंप लगाए जा सकते हैं। महिला सेविकाएँ भी लगायी जा सकती है जो शिशु तथा महिलाओं की समस्या के निदान में सहायक हो।

13. मलिन बस्तियों के पर्यावरण सुधार के लिये तथा सामाजिक और सांस्कृतिक एकता के लिये समय-समय पर जागरूक और चयनित व्यक्तियों की बैठक आहूत करनी चाहिए तथा स्थानीय लोक गीतों तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए। इससे लोगों में सक्रियता आती है तथा एकता की भावना विकसित होती है। यह सामुदायिक केंद्र सामाजिक चेतना का काम करते हैं तथा स्थानीय लोग गीतों तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए। इससे लोगों में सक्रियता आती है तथा एकता की भावना विकसित होती है। यह सामुदायिक केंद्र सामाजिक चेतना का काम करते हैं तथा सामयिक समस्याओं से भी अवगत कराते रहते हैं। इनके माध्यम से शिक्षा सफाई तथा विभिन्न समस्याओं की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित कराया जा सकता है। इनके माध्यम से विशेषज्ञों द्वारा समस्याओं को लोगों तक पहुँचाने का सार्थक प्रयास भी किया जा सकता है।

14. नगर की मलिन बस्तियों की उपर्युक्त समस्याओं की भाँति नियमित सफाई व्यवस्था का भी अभाव है। नगर के बाहर की ओर किसी भी मलिन बस्ती में नियमित सफाई की कोई भी व्यवस्था नहीं है। नगर के आंतरिक भागों की मलिन बस्तियों में जहाँ सफाई व्यवस्था है वहाँ कचरा कई दिन न उठाने के कारण दुर्गंध पूर्ण वातावरण बन जाता है। इस समस्या के निदान के लिये नियमित सफाई कर्मचारी लगाने तथा कचरा उठाने की व्यवस्था किये जाने की आवश्यकता है। कचरा ऐसी जगह डालना या एकत्र किया जाना चाहिए जिससे सुविधा पूर्वक उठाया जा सके। जहाँ नियमित सफाई व्यवस्था नहीं है वहाँ साप्ताहिक सफाई कार्य किया जा सकता है। यह कार्य स्थानीय पात्रों को सौंपना चाहिए तथा उसके लिये आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध करानी चाहिए।

नगरीय पर्यावरण स्वच्छ रहे, नगर निवासियों को आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध हो, नगर निवासियों के मानसिक स्तर में परिवर्तन हो, नगरीय समाज में बढ़ते अपराधों पर अंकुश लगे, सभी में सम्यक सामाजिक दृष्टिकोण उत्पन्न हो ऐसा दृष्टि कोण रखना शोधकार्य के लिये आवश्यक होता है। नगरों में सामाजिक अपराधिक समस्याएँ बढ़ती जा रही है। अगले अध्ययन क्रम में कतिपय नगरीय समाजिक समस्याओं का अध्ययन करने का प्रयास किया गया है।

ब. अपराध (CRIME)


प्रत्येक समाज अपनी सामाजिक संरचना और व्यवस्था को बनाये रखने एवं ठीक प्रकार से चलाने के लिये कुछ नियमों, प्रथाओं, रूढ़ियों, जनरीतियों एवं सामाजिक मानदंडों को विकसित करता है। इनमें से कुछ के विपरीत आचरण करने पर निंदा की जाती है, कुछ का उल्लंघन अनैतिक माना जाता है, तो व्यवहार के कुछ प्रतिमानों के विरूद्ध कार्य करने पर समाज द्वारा कठोर दंड दिया जाता है। सामाजिक दृष्टि से अपराध में समाज के नियमों का उल्लंघन होता है और उससे समाज को हानि होती है। बीसवीं सदी में अपराध के प्रति तार्किक एवं सामाजिक दृष्टिकोण विकसित हुआ जिसके अनुसार अपराध को समाज विरोधी कार्य माना गया। राज्य के शक्ति ग्रहण करने के साथ-साथ व्यक्ति के व्यवहारों को राज्य के नियमों से संबंद्ध किया गया और ऐसे सभी कार्य जिनसे राज्य के नियमों का उल्लंघन होता हो, अपराध माना जाने लगा। अनेक विद्वानों ने अपराध को सामाजिक दृष्टिकोण से परिभाषित किया है -

बार्नस एवं टीटर्स14 ने लिखा है ‘‘अपराध एक ऐसी क्रिया है जिसको समूह पर्याप्त रूप से खतरनाक समझता हो तथा ऐसे कार्य के लिये अपराधी को दंडित करने और रोकथाम करने के लिये एक निश्चयात्मक सामूहिक प्रक्रिया की आवश्यकता हो।’’

इलियट और मैरिल15 के अनुसार ‘‘समाज विरोधी व्यवहार जो कि समूह द्वारा अस्वीकार किया जाता है। जिसके लिये समूह दंड निर्धारित करता है, अपराध के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।’’

“Crime may be defined as anti. Social behavior which the group rejects and to which it attaches penalties.”

डॉ. हैकरवाल16 ने अपराध के सामाजिक पक्ष को प्रस्तुत करते हुए लिखा है, ‘‘सामाजिक दृष्टिकोण से अपराध व्यक्ति का ऐसा व्यवहार है जो कि उन सम्बन्धों की व्यवस्था में बाधा डालता है जिन्हें समाज अपने अस्तित्व के लिये प्राथमिक दशा के रूप में स्वीकार करता है।’’

अपराध को कानूनी दृष्टि से भी परिभाषित किया गया है। इस व्याख्या के अनुसार वे सारे कार्य जो किसी समय विशेष में किसी संविधान अपराधी संहिता या राज्य के नियमों के विपरीत घोषित किए गए हो अपराध कहलाएँगे। अपराध की कानूनी व्याख्या अपराध के परिणाम और दंड पर अधिक जोर देती है। सेठना17 ने लिखा है ‘‘अपराध वह कार्य या त्रुटि है जिसके लिये कानून दंड देता है।’’

“Crime is an act or omission which the law thinks fit to punish.”

लैंडिस एंड लैंडिस18 के अनुसार ‘‘अपराध वह कार्य है जिसे राज्य ने सामूहिक कल्याण के लिये हानिकारक घोषित किया है और जिसके लिये दंड देने हेतु राज्य शक्ति रखता है।’’

रैमसे क्लार्क19 ने अपनी पुस्तक ‘क्राइम इन अमेरिका’ में अपराध की रोकथाम को महत्त्वपूर्ण माना और कहा- ‘‘हम तब तक अपराध को वास्तविक अर्थों में नियंत्रित नहीं कर पायेंगे, जब तक व्यक्ति गंदी बस्तियों, अज्ञान, हिंसा, भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी, अपौष्टिक भोजन तथा खराब रहन-सहन की अमानवीय दशाओं का शिकार बना रहेगा। जब लोगों का आत्मसम्मान सुरक्षित रह सकेगा, उनका स्वास्थ्य बना रहेगा, उन्हें शिक्षा प्राप्त हो सकेगी, उन्हें नौकरी मिल जायेगी, उनके रहन-सहन का स्तर अमानवीय नहीं रहेगा वे सामाजिक आर्थिक शोषण का शिकार नहीं होंगे, तब उनमें दूसरे के हितों और कल्याण का विचार उत्पन्न होगा और तभी उनमें समाज की व्यवस्था, कानून नैतिकता तथा सामाजिकता के प्रति आदर का भाव उत्पन्न हो सकेगा। संक्षेप में कहा जा सकता है कि यदि हमें अपराध को रोकना है तो हमें उन समस्याओं को हल करना पड़ेगा जो अपराधों को जन्म देती है।’’

आगे कहा कि कोई भी समाज हिंसात्मक तथा अन्य प्रकार के असामाजिक कार्यों की घटनाओं को तब तक रोकने में असफल रहेगा जब तक कि वह उन व्यक्तियों के अपराधों को रोकने में असफल है जो लोग धनी शक्तिशाली तथा साधन संपन्न हो। अत: अपराध की रोकथाम के लिये आवश्यक है कि समाज के सभी वर्गों द्वारा किये जाने वाले अपराधों को रोकने के लिये बराबर का प्रयत्न किया जाए।

इस प्रकार परिभाषाओं में यह जोर दिया गया है कि केवल वे ही कार्य या व्यवहार अपराध माने जायेंगे जो किसी देश के प्रचलित कानूनों के विपरीत हों। अपराध की प्रवृत्ति मानव में कई कारणों से जागृत होती है। इसी प्रकार अपराध कई प्रकार के होते हैं यहाँ पर भिक्षावृत्ति, वेश्यावृत्ति, आत्महत्याएँ, बाल अपराध, खाद्य सामग्री में मिलावट तथा सांप्रदायिक दंगे जैसे सामाजिक अपराधों पर विचार किया जाना समीचीन है।

खाद्य पदार्थों में मिलावट (Food Adultration)


उत्तम स्वास्थ्य के लिये खाद्य पदार्थों का शुद्ध एवं मिलावट रहित होना आवश्यक है। प्राचीन काल में मनीषियों ने खाने पीने की वस्तुओं की शुद्धता के विभिन्न उपाय सुझाए थे, वे आज के वैज्ञानिक अनुसंधानों की कसौटी पर खरे उतर रहे हैं। बदलते रहन-सहन से खान पान का स्तर काफी प्रभावित हुआ है। आजकल कैंसर सहित कई बीमारियों के विरूद्ध खान पान को एक प्रमुख औजार माना जा रहा है। एक शोध के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रीय कैंसर संस्थान ने निष्कर्ष दिया कि सभी तरह के कैंसरों में लगभग एक तिहाई कैंसर रोगों का सम्बन्ध भोजन से होता है। अनेक पोषण विशेषज्ञों के अनुसार शारीरिक क्रिया में उम्र सम्बन्धी गिरावट का सम्बन्ध उम्र से कम बल्कि रहन-सहन, खान-पान से अधिक होता है। कुछ खाद्य पदार्थ, उन रासायनिक तत्वों को शरीर में बनने से रोकते हैं, जिनसे शरीर रोगी बनता है।

खाद्य पदार्थों में मिलावट का कार्य व्यापार के साथ ही प्रचलित हो गया। अधिक लाभ प्राप्त करने के प्रयास में व्यापारी खाद्य पदार्थों में अखाद्य पदार्थ मिला देते हैं जो देखने में बहुमूल्य और सुंदर दिखाई देते हैं और स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद होते हैं। इस प्रकार के अनैतिक कार्य करने वाले व्यापारी सामाजिक अपराधी है। इस प्रकार मिलावट का अर्थ केवल इतना ही नहीं है कि खाद्य पदार्थ में अखाद्य पदार्थ मिलाया गया है, बल्कि उससे पोषक तत्वों का निकाल लेना भी मिलावट के अंतर्गत है जैसे दूध से क्रीम का निकालना। व्यापारीगण भोज्य पदार्थों को संश्लेषित भोजन के रूप में न देखकर उसे विटामिन, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कैलोरी और फैट वगैरह के रूप में देखने लगे हैं। जो प्राकृतिक पदार्थों से कुछ व्यर्थ का अंश निकालकर उससे बेहतर रंग रूप और स्वाद वाला भोजन बनाने की प्रमाणिकता प्रस्तुत कर उपभोक्ताओं को लुभाते हैं खाद्य पदार्थों से निकाले जाने वाले अंश जीवन के लिये महत्त्वपूर्ण होते हैं बल्कि उसके स्थान पर जो रसायन मिलाते हैं वे स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होते हैं। खाद्य पदार्थों में मिलाए जाने वाले कुछ सस्ते खाद्य अखाद्य पदार्थों को तथा उनसे होने वाले रोगों की ओर विपणन एवं निरीक्षण निदेशालय ने भी संकेत किया है।

तालिका 6.3 खाद्य पदार्थों में मिलावट व उसके दुष्प्रभाव इसी प्रकार चावल में सफेद रंग के छोटे पत्थर, मूंगफली के तेल में पामोलीन का तेल, कालीमिर्च में पपीते के बीज, गेहूँ में जई, जीरा में सौंफ, मक्खन में केले, पपीते, मैदे का प्रयोग, चाय में प्रयोग की गयी चाय को सुखाकर तथा चमड़े का बुरादा, कॉफी में इमली के भुने बीज मिलाना, खोए में आलू आदि के मिलाये जाने सहित व्यापारी लाभ कमाने के प्रत्येक पदार्थ में मिलावट की वस्तुएँ खोज लेते हैं।

खाद्य पदार्थों में मिलावट का सबसे घातक प्रभाव रसायनों के मिलाने से पड़ता है। प्रौद्योगिकी एवं संस्करण के विकास के परिणाम स्वरूप डिब्बा बंद भोजन का उदय हुआ जो जीवन शैली को उत्तरोत्तर स्वास्थ्य हानि की ओर अग्रसर कर रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि डिब्बाबंद भोजन आधुनिक जीवन का पर्याय बन गया है। डिब्बा बंद भोजन में परिरक्षी रसायन का प्रयोग खाद्य को देर तक ताजा बनायें रखने के लिये किया जाता है। परिरक्षी रसायन सड़न पैदा करने वाले जीवाणुओं, कीटाणुओं और फफूंदों को मारते हैं। सल्फाइड वर्ग के परिरक्षी रसायनों का प्रयोग खाद्य पदार्थों की रक्षा के लिये किया जाता है। नये शोधों से पता चलता है कि ये खाद्य पदार्थों के विटामिन को नष्ट करते हैं पेट दर्द और एलर्जी का प्रभाव पैदा कर देते हैं। खाद्यान्नों में आकर्षण बढ़ाने तथा बहुमूल्य बनाने में रंगों का प्रयोग किया जाता है जैसे मैटेनिक्येलो, ऑरेंज, येलो, औरामिन, रोडामिन-बी, मैलाकाइट ग्रीन, ब्लू, बीआरएस, इरोथ्रोसिन आदि रंग शरीर में दुष्प्रभाव डालते हैं। इनसे कैंसर शारीरिक वृद्धि का रूकना, रक्त की कमी, अपच एलर्जी, यकृत- गुर्दे की खराबी इत्यादि रोगों को बढ़ावा मिलता है। प्रयोग शालाओं में जंतुओं पर हुए अनुसंधानों ने वैध करार दिये जाने वाले रंगों के प्रयोग को भी पूर्णतया सुरक्षित होने का भ्रम पैदा कर दिया है और सिद्ध किया है कि इनके प्रयोग से भी स्वास्थ्य के लिये खतरा है अमेरिका की फूड एवं ड्रग संस्था की प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि केवल एक प्रकार के रंजक अमैरेंथ जिसका प्रयोग 60 देशों में होता है इसकी 4 प्रतिशत मात्रा भी ट्यूमर पैदा करने में सहायक है। पोषण संस्थान मास्को ने भी प्रयोग में पाया कि कैंसर और प्रजनन शक्ति में ह्रास तथा विकलांग व अपूर्ण संतान तक की उत्पत्ति का भय रहता है।20

लखनऊ महानगर में खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों को रोकने के लिये समय-समय पर नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग द्वारा खाद्य पदार्थों के नमूनों को एकत्र कर जाँच करायी जाती है। मिलावटी सामान बेचने वालों पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाती है। यद्यपि कार्यवाही कभी-कभी इतनी शिथिल होती है कि अपराधी सुधरने के बजाए मिलावट को अधिक बढ़ावा देकर अपना आर्थिक दंड वसूलता है। निरीक्षण करने वाले अधिकारियों के स्तर से कठोर दंड की व्यवस्था न होना नगर में मिलावट का प्रमुख कारण है। नगर के खाद्य पदार्थों के नमूने एकत्र करने का कार्य तथा परीक्षण प्रक्रिया कई अन्य विभाग भी करते हैं किंतु कानूनी स्तर पर कार्यवाही का अधिकार केवल नगर प्रमुख अधिकारी को है। विगत वर्षों में मुख्य नगर चिकित्सा अधिकारी के निर्देश में खाद्य पदार्थों के नमूने लिये गए। तालिका- 6.4 में इन्हें रखा गया है।

नगर स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा खाद्य पदार्थों में मिलावट की जाँच के लिये समय-समय पर खाद्य पदार्थों के नमूने लिये जाते हैं। तालिका 6.4 में तथा परिशिष्ट - 45 में विगत वर्षों के नमूनों की दशा दर्शायी गयी है। वर्ष 1990 में तैयार किये जाने वाले खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों की दशा चिंताजनक रही। कोकाकोला के 25 प्रतिशत नमूने विषाक्त या स्वास्थ्य के लिये हानिकारक पाये गये। 1991 में 50 प्रतिशत नमूने अशुद्ध पाये गए। 1994 में 10 प्रतिशत 1995 में 33 प्रतिशत, 1997 में 20 प्रतिशत, 1998 में 17 प्रतिशत नमूने अशुद्ध दशा में पाये गये इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि अधिकतम 50 प्रतिशत और न्यूनतम 10 प्रतिशत नमूने अशुद्ध हैं। औसत दशा पर विचार किया जाए तो यह चिंताजनक स्थिति है। यद्यपि यह पेय पदार्थ सुविधा भोगी और संपन्न आर्थिक दशा वाले लोग उपयोग करते हैं जो कि चिकित्सा आदि में प्रचुर धन खर्च करते हैं। किंतु इनका दुष्प्रभाव जनसामान्य को अधिक भोगना पड़ता है। क्योंकि वह आर्थिक अभाव के कारण चिकित्सा नहीं करा पाते हैं।

पान मसाला जिसका आज सर्वाधिक लोगों द्वारा सेवन किया जाता है मुख कैंसर तथा गुर्दे की पथरी और तंत्रिका तंत्र के कैंसर को जन्म देता है। 1990 में 76 प्रतिशत नमूनों में मिलावट पायी गयी। 1991 में 30 प्रतिशत, 1995 में 15 प्रतिशत, 1997 में 15 प्रतिशत, 1998 में 21 प्रतिशत नमूनों में मिलावट पायी गयी। पान मसाला के नमूनों में मिलावट की दशा पर विचार किये जाने पर यह भी चिंताजनक स्थिति है। इसके लिये बड़े पैमाने पर प्रयास करने की आवश्यकता है।

खाद्य तेलों में सरसों के तेल में मिलावट की समस्या बहुत गंभीर है। सरसों के तेल में दो प्रकार की मिलावट पायी गयी है। एक तो पीला रंग है जो रसायनों के द्वारा तैयार किया जाता है और स्वास्थ्य को हानि पहुँचाता है, दूसरी मिलावट अर्जीमोन (घमोया) के तेल की होती है। अर्जीमोन एक पतवार है। इसके दानों को सरसों के साथ मिलाकर तेल तैयार किया जाता है जो कि स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। तालिका 6.4 के अनुसार 1990 में सरसों के तेल में 31 नमूनों में 9 नमूने अशुद्ध पाये गए। 1991 में 31 में 8 नमूने अशुद्ध पाये गए। इसी प्रकार 1997 में 37 में 7 नमूने और 1998 में 38 में 12 नमूने अशुद्ध पाये गए। औसत दशा के अनुसार लगभग 25 प्रतिशत नमूने अशुद्ध पाये गए जो एक गम्भीर समस्या है।

तालिका 6.4 खाद्य पदार्थों के परीक्षण की संरचना राज्य सरकार की स्वास्थ्य विभाग की शाखा ने अगस्त 98 में नगर में खाद्य तेलों में अर्जीमोन की मिलावट पर जाँच प्रारम्भ की जिसमें की 111 नमूनों का संग्रह किया। 47 नमूनों का परीक्षण कराया जिसमें 27 नमूनों में अर्जीमोन पाया गया। इसी प्रकार आईटीआरसी के द्वारा एकत्र 52 नमूनों में 82 प्रतिशत नमूनों में जहरीला अर्जीमोन पाया गया। आईटीआरसी के द्वारा विगत कई वर्षों में लखनऊ नगर में सरसों के तेल के विभिन्न उपलब्ध नमूने के लिये 1996 में 70 नमूने लिये गए थे जिनमें 51 नमूनों में 72 प्रतिशत में अर्जीमोन मिला। 1997 में 54 नमूनों में 82 प्रतिशत विषाक्त पाये गए। 1998 में 47 नमूनों की जाँच की जिनमें 27 नमूने (52 प्रतिशत) विषाक्त पाये गए।

विभिन्न खाद्य पदार्थों की तरह दूध में मिलावट आमतौर पर की जाती है। हमारे स्वास्थ्य के लिये दूध सबसे उत्तम भोज्य पदार्थ है। इसे स्वास्थ्य का रक्षक माना जाता है। दूध के गुणों के कारण ही अधिकांश लोग अपने भोजन आदि में किसी न किसी रूप में लेने का प्रयास करते हैं। बहुगुणकारी दूध आज विभिन्न प्रकार की मिलावट से स्वास्थ्य के लिये घातक हो गया है। दूध में स्टार्च, अरारोट, सोयाबीन, यूरिया, डिटर्जेंट, कटिंग ऑयल, पशुवसा तथा अम्ल व क्षार की मिलावट की जाती है। लखनऊ नगर में 1990 में दूध के 18 नमूने लिये गए और उनमें 8 नमूने अशुद्ध पाये गए। 1991 में 12 नमूनों में 5 नमूनें अशुद्ध पाये गए। 1994 में 24 में 3 नमूने, 1995 में 11 में से 4 नमूनें 1997 में 27 में 8 नमूने और 1998 में 38 में से 7 नमूने अशुद्ध पाये गये। इस प्रकार परीक्षण स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं रही औसत दर्जे में 30 प्रतिशत नमूने अशुद्ध पाये गए। राजधानी में व्यापक तौर पर जुलाई 99 में मिलावटी दूध की जाँच का काम सरकारी संस्था जन विश्लेषक प्रयोगशाला कर रही है। दूध के मामलों में इस प्रयोगशाला में मिल्क फैट, सालिडस नाट फैट, कार्बोनेट, ग्लूकोज, यूरिया, स्टार्च केन शुगर, सोडियम क्लोराइड, सोडियम सल्फेट, टिटेनियम डाई ऑक्साइड और हाइड्रोजन पैराक्साइड आदि का परीक्षण होता है। इस प्रयोगशाला में एक समय में 125 नमूनों का परीक्षण किया गया। 80 नमूनों के निष्कर्ष में पाया गया कि 59 नमूनों में मिलावट है जिनमें 23 में यूरिया पाया गया।

खाद्य सामग्री में अपमिश्रण की स्थिति लगातार असंतोष प्रद रही। होटलों व दुकानों में मिलने वाली मिठाई, लड्डू, खाना, बिस्कुट जैसे तैयार भोज्य पदार्थ भी अपमिश्रण से बच नहीं सके। 1990 में बिस्कुट के 34 नमूनों में 5 नमूने अशुद्ध पाये गए, 1997 में 18 में दो नमूने 1998 में 7 में 1 नमूना अशुद्ध पाया गया। इस प्रकार 15 प्रतिशत नमूने बिस्कुट के अशुद्ध दशा में पाये गए। यही स्थिति दालमोट की रही। बेसन के लड्डू के नमूने 1991 में 11 में दो 1994 में 29 में 10 नमूने 1995 में 8 में 5 1997 में 12 में दो और 1998 में 21 में 5 नमूने अपमिश्रित पाये गए। इस प्रकार 20 से 40 प्रतिशत लड्डू के नमूने सही दशा में नहीं पाये गए। पके खाने के 15 प्रतिशत नमूने अशुद्ध दशा में पाये गए। (परिशिष्ट - 45)

नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी ने लखनऊ नगर में मिलावटी खाद्य पदार्थ रोकने के लिये एक अभियान चलाया गया था जो कि पूरे नगर के हजारों दुकानदारों में से केवल 32 नमूने लिये गए थे, जिनमें किसी प्रकार की कार्यवाही नहीं की जा सकी। खाद्य अपमिश्रण के सम्बन्ध में मुख्य नगर अधिकारी डॉ. दिवाकर त्रिपाठी के नेतृत्व में अलग-अलग क्षेत्रों के लिये अलग-अलग निरीक्षण दस्ते भी लगाए गए और नमूने लिये गए जिनकी जाँच पर मिलावट की पुष्टि हुई किंतु इन पर कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकी नगर में खाद्य अपमिश्रण की जाँच करने तथा नमूने लेने का कार्य अन्य संस्थान भी करते हैं, किंतु यह संस्थान अपमिश्रण अधिनियम के अनुसार किसी प्रकार की कानूनी कार्यवाही नहीं कर सकते। यह अधिकार केवल प्रमुख नगर अधिकारी को है।

अपमिश्रण की जाँच की अपनी सीमाएँ हैं, किंतु अपमिश्रण की कोई सीमा रेखा नहीं है। नगर के ढाबों, होटलों, रेस्टोरेंट में बिकने वाली सब्जियों व मांसाहारी भोजन की तरीकों लाल रंग देने के लिये रतन जोत, सूडान - 1 व अन्य प्रतिबंधित घातक रंगों का खुलेआम प्रयोग किया जा रहा है। आइसक्रीम में भी हानिकारक रंगों व प्रतिबंधित सैक्रीन का प्रयोग हो रहा है। पान मसाला बनाने में चमड़ा साफ करने वाला गैम्बियर रसायन मिलाया जा रहा है। नगर में सब्जियों को ताजा दिखाने के प्रयास में परवल, भिंडी, तरोई, पालक, बैंगन को कृत्रिम रासायनिक रंगों से रंगकर बेचा जाता है। सब्जियों में कृत्रिम रंग चढ़ाने वाले हौज बाजार में खुले रूप में देखे जा सकते हैं। नगर की लगभग सभी बड़ी मंडियों में इसके प्रमाण उपलब्ध है। इसी प्रकार मसाला बाजार तो सदैव मिलावट में सबसे आगे रहता है। इसमें मिलावट की जाँच भी शायद कभी की गयी हो।

अपमिश्रण एक व्यापक समस्या है। इसके लिये जनजागरण तथा लोगों में नैतिकता का बोध कराने की सबसे बड़ी आवश्यकता है क्योंकि खाद्य अपमिश्रण कानून लागू कर पाना बहुत कठिन होता है। जाँच प्रक्रिया एक बार में इतना लंबा समय ले लेती है कि तब तक सम्बन्धित मामला ठंडा पड़ जाता है। और अपराधी अपने बचाव के सभी उपक्रम और प्रक्रियाएँ बड़ी कुशलता के साथ पूरी कर लेता है। अपमिश्रण की दशा में सुधार के लिये कुछ आवश्यक प्रयास किये जा सकते हैं -

1. अपमिश्रण जाँच लगातार चलती रहनी चाहिए किसी संकट पूर्ण हादसे के पश्चात जाँच कराना या जाँच दस्तों का गठन प्रभावशाली नहीं हुआ करता है।

2. नमूनों की जाँच में कम समय लगना चाहिए, ताकि अपराधी पर उचित कानूनी कार्यवाही की जा सके।

3. विभिन्न प्रकार के दैनिक उपयोग में आने वाले खाद्य पदार्थों की जाँच सरल विधियों से पूरा करना तथा आम नागरिकों में विधि का प्रचार किया जाना चाहिए ताकि नागरिक स्वयं अपमिश्रण की जाँच कर सके।

4. अपमिश्रण के पदार्थों की जानकारी विशेषकर गृहणियों के लिये उपलब्ध रहनी चाहिए। यह रेडियो, टेलीविजन, समाचार पत्रों व मासिक पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होनी चाहिए जिससे कि लिखित रूप में अपने पास सुरक्षित रखी जा सके तथा समय पर उपयोग किया जा सके।

5. अपमिश्रण कानून तथा सम्बन्धित कार्यवाही की जानकारी, नागरिकों को होनी चाहिये ताकि वह सम्बन्धित सूचना विभाग को दे सके।

6. नागरिकों को प्रयोगशाला में खाद्य अपमिश्रण का परीक्षण कराने की अनुमति नि:शुल्क या न्यूनतम शुल्क पर उपलब्ध होनी चाहिए।

7. वैज्ञानिकों का परामर्श है कि यदि दूध से दही लगातार ठीक से नहीं जमता और दूध से पनीर बनाते समय नींबू का रस या टाटरी डालने पर दूध ठीक तरह से फटता नहीं है तो दूध की जाँच करानी चाहिए। इसके अतिरिक्त दूध में साबुन जैसी महक व स्वाद, तीखा हो, व छूने में साबुन जैसा अहसास हो तो उसमें अपमिश्रण के प्रारंभिक संकेत मिलते है। अत: जन सामान्य को मिलावट परखने की सरल एवं सस्ती तकनीक उपलब्ध करानी चाहिए।

8. खाद्य सामग्री में मिलावट बाजारों में व्यवसाय के रूप में विकसित हो रहे हैं। यह व्यवसाय अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से किया जाता है जो हमारे सामाजिक मूल्यों को क्षति पहुँचाता है तथा समाज में विभिन्न प्रकार के रोगों का जनक बनता है। विभिन्न रोगों से ग्रस्त तथा विकलांग हुए व्यक्ति उत्पादक कार्य करने में असमर्थ होते हैं। परिणाम स्वरूप भिक्षावृत्ति से जीविका चलाने लगते हैं। भिाक्षावृत्ति भी हमारे समाज की एक बड़ी बुराई हैं अगले चरण में नगर की भिक्षावृत्ति की दशा का अध्ययन किया गया है।

भिक्षावृत्ति (BEGGARY)


भिाक्षावृत्ति हमारे समाज का एक कैंसर और कोढ़ है। सम्पूर्ण आर्थिक सामाजिक व्यवस्था को अपंग और कलंकित करने का बहुत कुछ श्रेय इसे भी जाता है। हमारे देश में भिक्षावृत्ति एक गम्भीर समस्या है। यहाँ भिक्षावृत्ति को जन्म देने में सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक कारकों का योगदान रहा है। भूखे व्यक्ति को भोजन देकर लोग आत्म संतोष महसूस करते हैं। भिक्षा देना, दान, दया, सहिष्णुता, परोपकार, अतिथि सत्कार, सहायता, धर्म, पुण्य एवं स्वर्ग प्राप्ति की भावना पर आधारित है। वर्तमान में नवीन सामाजिक एवं धार्मिक मूल्यों की स्थापना के कारण भिक्षावृत्ति आज एक व्यवसाय के रूप में विकसित हुई है और यह एक सामाजिक आर्थिक समस्या बन गयी है। भिक्षा मांगने के लिये भिखारी छल कपट, बनावट, धर्म, नकली वेश-भूषा तथा धोखा-धड़ी आदि का प्रयोग करते हैं। वे आने जाने वाले लोगों में दया की भावना जागृत करते हैं तथा कभी-कभी तो कुछ भिक्षा देने के लिये मजबूर कर देते हैं।

भिक्षावृत्ति का अर्थ एवं परिभाषा


‘‘भिक्षावृत्ति जीवन-यापन का एक ऐसा ढंग और व्यवसाय है जिसमें व्यक्ति काम करने की योग्यता होते हुए भी किसी प्रकार का कार्य नहीं करता बल्कि बिना किसी परिश्रम के भीख मांगकर अपना और अपने परिवार का जीवन-यापन करता है।’’

मुंबई भिक्षावृत्ति अधिनियम 194521 में भिक्षुक को इस प्रकार परिभाषित किया गया है। ‘‘जीवकोपार्जन के साधन के बिना सार्वजनिक स्थानों पर आत्म प्रदर्शन कर मांगने वाला कोई व्यक्ति भिक्षुक है।’’

भारतीय अपराध विधान संहिता की धारा 109 (ब)22 के अनुसार ‘‘एक भिक्षुक वह व्यक्ति है जो अपनी जीविका के साधनों से रहित है या जो स्वयं के साथ खाता नहीं है।’’

इंग्लैंड23 में भिक्षुक को इस प्रकार परिभाषित किया गया है ‘‘वे सब लोग भिखारी है जो इधर उधर घूमते हैं या जो सार्वजनिक स्थानों जैसे- सड़क, कचेहरी आदि के आस-पास रहते हैं या जो भीख मांगते हैं या किसी 16 वर्ष से कम आयु के बालक-बालिकाओं को भीख मांगने के लिये रख लेते हैं। इनमें वे लोग भी भिखारी हैं जो किसी झूठे उद्देश्य से दान या चंदा एकत्रित करते हैं।’’

मैसूर भिक्षावृत्ति अधिनियम24 के अनुसार ‘‘भिक्षावृत्ति के अंतर्गत भीख पाने के लिये दर-दर घूमना और दान देने वाले के मन में दया भाव जागृत करने के लिये फोड़ा, घाव, शारीरिक पीड़ा या वकृतियों को दिखाना तथा उनके सम्बन्ध में गलत बहाना बनाना आता है।’’

भिक्षावृत्ति के कारण


भिक्षावृत्ति अपनाने वाले व्यक्तियों में कई प्रकार के लोग सम्मिलित रहते हैं। अधिकांश ऐसे व्यक्ति है जो अनेक कारणों से परेशान या दु:खी होते हैं, उनके जीवन में आशा की कोई किरण नहीं दिखती तो उन्हें भिक्षावृत्ति के लिये विवश होना पड़ता है। भिक्षावृत्ति के वैयक्तिक कारण भी है जैसे शारीरिक और मानसिक दोष अथवा बीमारियाँ जैसे - लूला, लंगड़ा, अपाहिज, पागल, विक्षिप्त आदि वहीं दूसरी ओर आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कारण भी हैं यहाँ भिक्षावृत्ति के प्रमुख कारणों को प्रस्तुत किया गया है।

1. शारीरक कारण - शरीर से अपाहित, लूले, लंगड़े जो किसी प्रकार का शारीरिक परिश्रम नहीं कर सकते भिक्षुक बनने के लिये मजबूर हो जाते हैं।

2. मानसिक कारण - ऐसे व्यक्ति जो शरीर से स्वस्थ हैं, किंतु मानसिक रूप से पूर्णतया विक्षिप्त होते हैं, इन्हें उचित अनुचित का ज्ञान नहीं रहता करने, न करने उठने-बैठने, बोलने खाने पीने और पहनने जैसे जीवित रहने के लिये आवश्यक विचार भी समाप्त हो गए होते हैं भिक्षावृत्ति करने के लिये विवश हो जाते हैं।

3. धार्मिक कारण - धार्मिक कर्मकांडों के वशीभूत होकर जीवन के आरंभ से लेकर मृत्यु के पश्चात तक दान देने की प्रथा है। अंध विश्वासी रूढ़िवादी और परंपरावादी देश में दान देने वाले की संख्या कम नहीं है। दान की भावना और मानसिकता को भिक्षुक और जजमान दोनों जानते हैं। इसी दुर्बलता का लाभ उठाकर भिक्षुक बनते जाते हैं, दान शीलता अनेक धार्मिक पर्वों स्थानों, दु:खादि से निवृत्ति लाभ आदि के अवसरो पर विशेष रूप से देखी जाती है। धर्म की इस परंपरा से बिना कार्य और परिश्रम किये हुए भी भिक्षुक हजारों रूपये प्रतिमाह अर्जित कर रहे हैं।

4. आर्थिक कारण - भिक्षावृत्ति के लिये आर्थिक परिस्थितियाँ प्रमुख रूप से उत्तरदायी हैं। इसमें निर्धनता एवं बेकारी प्रमुख हैं। व्यक्ति के पास जीवकोपार्जन के साधनों का पूर्णतया अभाव है। अस्तु बेकार दरिद्र व्यक्ति भिक्षावृत्ति पर पूर्णतया निर्भर हो जाता है।

5. प्राकृतिक कारण - कई बार प्राकृतिक प्रकोप भी हजारों लोगों के जीवन को अस्त-व्यस्त कर देता है बाढ़, भूकम्प, भूचाल, महामारी अकाल आदि के अवसर पर लोग अपना मूल स्थान छोड़कर जीवन-यापक के लिये दूसरे स्थानों पर जाते हैं, और कई बार भिक्षा के लिये विवस होना पड़ता है।

6. परम्परागत व्यवसाय - कुछ लोग भिक्षावृत्ति को अपना परम्परागत पेशा मानते हैं। उन्हें यह धंधा अपने पूर्वजों से विरासत में मिला है। अत: वे भी जीवन-यापन के लिये भिक्षावृत्ति को अपना लेते हैं। ऐसे परिवारों में परिवार के बड़े सदस्य छोटों को भीख मांगने की कला का प्रशिक्षण देते हैं।

7. आलस्य - कई लोग जो आलसी होते हैं और किसी भी पकार का परिश्रम नहीं करना चाहते वे भी भिक्षावृत्ति अपना लेते हैं।

8. पूँजीवादी आर्थिक ढाँचा - राजाओं, महाराजाओं, जमींदारों, तालुकेदारों और साम्राज्यवादियों का इस देश में अधिपत्य रहा है। करोड़ों भूमिहीन श्रमिक, बेकार कुंठित व्यक्ति, जिन्हें इस समाज में किसी प्रकार का कार्य नहीं मिलता इनका शोषण किया गया है, बेगार ली गयी है और जब शरीर से दुर्बल और बीमार हो गए तो कहीं काम नहीं मिलता अंतत: विवशता से भिक्षुक बनते हैं और भिक्षा पर पूर्णतया निर्भर रहते हैं।

9. विघटित परिवार - ऐसे परिवार जिसके कार्यकर्ता का देहांत हो गया हो अथवा किसी अपराध में जेल हो गयी हो अथवा जुआड़ी, शराबी परिवार हो अथवा रोगग्रस्त परिवार हो जिसमें आय कोई साधन न हो। इस प्रकार के परिवार के बच्चे, विधवा स्त्रियाँ या विवाहित स्त्रियाँ भिक्षुक बनने के लिये विवश होती हैं। ये अपने और अपने परिवार का पालन पोषण भिक्षुक बनकर ही करते हैं।

10. सामाजिक दुर्बलता - भारत में सामाजिक प्रथाएँ भी ऐसी हैं कि वे भिक्षावृत्ति को प्रोत्साहन देती हैं और कई जातियाँ जैसे- साधु, जोगी नाथ, बाबा, जंगम आदि भिक्षावृत्ति से ही जीवन-यापन करती हैं।

भिखारियों के प्रकार


भिक्षावृत्ति में लगे लोगों को कई वर्गों में रखा गया है -

1. बाल भिक्षुक, 2. शारीरिक दृष्टि से दोषयुक्त भिखारी, 3. मानसिक रूप से दोषयुक्त और मानसिक रोग से पीड़ित भिखारी, 4. रोगग्रस्त भिखारी, 5. धार्मिक भिखारी, 6. बनावटी धार्मिक साधु, 7. जनजातीय भिखारी, 8. रोजगार में लगे भिखारी, 9. छोटा व्यापारी भिक्षुक, 10. अस्थायी बेकार पर काम करने योग्य भिखारी, 11. अस्थायी बेकार पर काम करने के अयोग्य भिखारी, 12. लगभग स्थायी रूप से बेकार परंतु कार्य करने योग्य भिखारी, 13. स्थायी रूप से बेकार और काम करने के अनिच्छुक भिखारी 14. स्थायी बेकार और काम न दिये जाने योग्य भिखारी।

भिक्षावृत्ति का दुष्प्रभाव


भिक्षावृत्ति का सम्बन्ध भिक्षा मांगने वाले तथा भिक्षा देने वाले दोनों पर ही पड़ता है। भिक्षा देने वाला समाज में भिखारियों की संख्या में वृद्धि करता है क्योंकि भिक्षा आसानी से मिल जाने पर आलसी ओर अकर्मण्य लोग भिक्षावृत्ति अपना लेते हैं। इस प्रकार समाज में भिक्षावृत्ति करने वालों की संख्या बढ़ जाती है। भिखारी अपने छोटे-छोटे बच्चों को भीख माँगने का प्रशिक्षण देते हैं। परिणाम स्वरूप आने वाली पीढ़ी में भी भिखारियों की संख्या बढ़ती रहती है। दर-दर की ठोकरें खाने और भीख मांगने में लोगों को मिलने वाली दुत्कार एवं डांट डपट मिलने के कारण भीख मांगने वालों के आत्मसम्मान एवं प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचती है। इसलिये कुछ लोग भिक्षावृत्ति के साथ-साथ चोरी, डैकती, हत्या, वेश्यावृत्ति, चोरी छिपे शराब तथा मादक द्रव्य लाने ले जाने आदि का कार्य भी करते हैं। इस प्रकार भिक्षावृत्ति विभिन्न प्रकार की सामाजिक बुराइयों को जन्म देती है। कई भिखारी शराब तथा अन्य मादक वस्तुओं का सेवन करना भी प्रारंभ कर देते हैं। भिक्षकों की संख्या में वृद्धि होने से समाज में शांति व्यवस्था बनाए रखने का खतरा भी उत्पन्न हो जाता है। समाज को भिक्षावृत्ति पर नियंत्रण लगाने और भिक्षुकों की रोजी-रोटी का प्रबंध करने हेतु धन भी खर्च करना पड़ता है।

लखनऊ महानगर में भिक्षावृत्ति अध्ययन


हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों एवं शास्त्रों में दान की महिमा का उल्लेख किया गया है। साधु, संयासी, ब्रह्मचारी एवं द्विज को भिक्षा देना पुण्य कमाना कहा गया है समय के साथ-साथ भिक्षावृत्ति के साथ कई अंध विश्वास एवं रूढ़ियाँ जुड़ती गयीं, भिक्षुकों की संख्या बढ़ी और व्यवसाय के रूप में आज समाज की बड़ी समस्या बन गया है।

महानगर में कितने भिक्षुक हैं, उनके कितने प्रकार हैं उनके पारिवारिक और आयु वर्ग तथा अन्य विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करना कठिन है। नगर के कतिपय स्थलों में भिखारियों की स्थिति के सामाजिक लक्षणों का अध्ययन किया गया जो इस दिशा का एक सांकेतिक अध्ययन कहा जा सकता है।

चारबाग रेलवे स्टेशन में मार्च 2000 को शोधार्थी द्वारा किये गये सर्वेक्षण में पाया गया कि आरक्षण प्रथम श्रेणी और द्वितीय श्रेणी के बरामदे में तथा छोटी लाइन के बरामदे में कुल 15 भिखारी किसी न किसी रूप में है। जिनमें 7 मानसिक स्तर से कमजोर या कि व्यावहारिक ज्ञान से परे है। 3 शारीरिक रूप से विकलांग है। 30 प्रतिशत भिखारी 10 वर्ष से कम आयु के हैं। किसी ने भी अपनी पारिवारिक दशा की जानकारी नहीं दी, 3 महिला भिखारी थी जिनमें एक अपने छोटे बच्चे के साथ थी। स्टेशन रोड में घूमने वाले भिखारी भी पाये गये जिनकी आयु 30 से 55 तक अनुमानित है।

प्लेटफार्मों में भी 10 भिखारी पाये गये। ये गंदे वेश में घिसे पिटे आशीष वचनों का प्रयोग करके या भिक्षा पात्र आगे करके भिक्षा की अपेक्षा व्यक्त करते हैं।

तालिका - 6.5 में नगर के कुछ राजनीतिक, धार्मिक तथा मनोरंजन के स्थलों को अध्ययन में सम्मिलित कर नगर की भिक्षावृत्ति का प्रतीकात्मक अध्ययन किया गया। अध्ययन में विशेष रूप से धार्मिक स्थलों को सम्मिलित किया गया। धार्मिक स्थलों में हिंदू, मुस्लिम तथा ईसाई धार्मिक स्थल लिये गये। हिंदू धार्मिक स्थलों में अन्य की तुलना में सबसे अधिक भिक्षुक पाये गये। मंदिरों में सबसे अधिक हनुमान सेतु मंदिर में भिक्षुकों की संख्या रही। यहाँ पर भक्तों तथा धार्मिक जनों की भीड़ अधिक रहती है। इसलिये भिक्षुकों को अन्न धन मिलने के आसार अधिक होते हैं। अत: यहाँ पर भिक्षुकों की संख्या अधिक पायी गयी, तालिका से पता लगता है कि धार्मिक प्रवृत्ति के कारण भिक्षुकों की संख्या बढ़ती है विशेष रूप से हिंदुओं में, क्योंकि हिंदुओं में अधिक धार्मिक प्रवृत्ति भी पायी गयी है। दूसरे हिंदू धर्म ग्रंथों में धर्म, दान, दक्षिणा, अन्नदान, धनदान तथा अपंग-अपाहिजों के प्रति दया और सेवा भाव को ही ईश्वर की सच्ची सेवा कहा गया है।

तालिकी 6.5 भिक्षावृत्ति का आयुवर्ग में एक प्रतीकात्मक अध्ययन मनोरंजन के स्थलों इमामबाड़ा, कृष्णा सिनेमा तथा कैपिटल सिनेमा जो नगर के भिन्न-भिन्न स्थलों में स्थिति है। दूसरे सबसे अधिक भिक्षुक प्रधान स्थल है। सिनेमा गृहों में वृद्ध भिक्षुक अधिक पाये गये यहाँ पर देखा गया कि धार्मिक स्थलों से भिक्षावृत्ति भिन्न रूप में है। धार्मिक स्थलों में भिक्षुक अपनी जगह पर बैठ कर भिक्षावृत्ति कटोरा आदि लेकर करते हैं जब कि सिनेमा गृहों के निकट हाथ फैलाने वाले तथा निकट जाकर मांगने वाले अधिक थे। न्यायालय परिसर में भिक्षावृत्ति करने वाले अधिक वायु वर्ग के लोग थे। न्यायालय क्षेत्र में भिखारियों का व्यापक क्षेत्र होता है। लगभग एक भिक्षुक 6 घंटे के अंतराल में परिसर के 3-4 फेरे पूरे करता है। अध्ययन को दूसरे रूप में देखने का प्रयास करें तो पता चलता है कि 50 प्रतिशत बाल भिक्षुक धार्मिक स्थलों में, 20 प्रतिशत मनोरंजन के क्षेत्रों में पाये गये। कुल का 30 प्रतिशत बाल भिक्षुक है, 33 प्रतिशत युवा भिक्षुक है। तथा सबसे अधिक 37 प्रतिशत वृद्ध भिक्षुक है, जो अंकीय स्थिति में लगभग एक दूसरे के निकट है। लगभग 50 प्रतिशत भिक्षुक केवल हिंदू धार्मिक स्थलों में पाये जाते हैं। 30 प्रतिशत मनोरंजन स्थलों में भिक्षुक पाये जाते हैं। 15 प्रतिशत न्यायालय परिसर में तथा शेष अन्य स्थलों में पाये जाते हैं। लगभग 24 प्रतिशत युवा धार्मिक स्थलों में पाये जाते हैं। 18 प्रतिशत गृहों के निकट पाये जाते हैं।

नगर में भिक्षावृत्ति के विभिन्न रूप दिखायी देते हैं। बाजार में बहुरूपिये के वेश में भिक्षावृत्ति करने वाले धार्मिक रूप रेखा बनाकर भिक्षा मांगने वाले, गा-बजाकर भिक्षावृत्ति करने वाले तथा विवाह, शिशु जन्म तथा अन्य धार्मिक रीति-रिवाजों में बधाई गीत गाकर भिक्षावृत्ति करने वाले प्रकारांतर में भिक्षुक वर्ग में ही सम्मिलित किये जायेंगे क्योंकि यह अपनी गति विधियों से जनसामान्य को भिक्षा देने के लिये विवश कर देते हैं। और उनके सुख चैन में विघ्न उत्पन्न करते हैं। भिक्षुकों की बढ़ती जनसंख्या पर अंकुश लगाने की योजना बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि यह देश के शुद्ध सामाजिक पर्यावरण की बड़ी समस्या के रूप में उभरती जा रही है।

भिक्षावृत्ति निवारण के प्रयत्न एवं सुझाव


भिक्षावृत्ति को समाप्त करने के लिये समय-समय पर कई प्रयास किये गये हैं। 1941 में भारतीय रेलवे अधिनियम के अंतर्गत रेलवे स्टेशनों एवं गाड़ी में भीख मांगना दंडनीय अपराध घोषित कर दिया गया। 1959 में भारतीय दंड संहिता में संशोधन करके अनुच्छेद 363-ए में यह बात जोड़ दी गयी कि यदि कोई व्यक्ति किसी नाबालिग बच्चे का कानूनी संरक्षक नहीं है और उससे भीख माँगने का कार्य करवाता है तो यह कार्य दंडनीय होगा इसके अतिरिक्त विभिन्न राज्यों ने भी भिक्षावृत्ति उन्मूलन अधिनियम पारित किये हैं।

सभी नगरों की नगर पालिकाओं, नगर निगमों, को भी यह अधिकार दिया गया कि भिक्षावृत्ति उन्मूलन के लिये कानून बनाएँ। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, भोपाल आदि विभिन्न नगरों की नगर पालिकाओं ने अपने यहाँ इस प्रकार के कानून बनाए हैं। भीख मांगने वाले व्यक्ति पर 50 रुपये से 100 रुपये जुर्माना तथा एक माह से 3 माह तक सजा की व्यवस्था की गयी है जो शारीरिक रूप से स्वस्थ है उससे कार्य लिये जाने की व्यवस्था की गयी है।

भिखारियों को रोगों से मुक्त करने उनकी चिकित्सा करने एवं भोजन आदि की सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिये कोलकाता, चेन्नई, मदुरई, कोयमबटूर आदि नगरों एवं विभिन्न प्रांतों में उचित व्यवस्था की गयी है। कुष्ठ रोगियों के भोजन की अलग व्यवस्था की गयी है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश में असहाय वृद्धों को पेंशन दी जाती है। मुंबई में महिला भिखारियों के लिये अलग अलग भिक्षुक सदन बनाए गए हैं।

भिक्षावृत्ति के उन्मूलन के लिये वर्तमान कानूनी प्रयास पर्याप्त नहीं है। इस समस्या को हल करने के लिये हमें व्यावहारिक कदम उठाने की आवश्यकता है। इसके लिये अग्रलिखित उपाय किये जाने चाहिए-

1. कानून बनाकर भिखारियों के पुनर्वास एवं सुधार के लिये एक समुचित व्यवस्था की जाए।

2. कार्यशालाओं की व्यवस्था करके स्वस्थ, अपंग, महिला बालक एवं वृद्ध भिखारियों के लिये विभिन्न व्यवसायों के प्रशिक्षण की व्यवस्था हो जिससे कि वे भिक्षा के कार्य को भविष्य में त्याग दें।

3. भिक्षावृत्ति में लगे बच्चों को बाल सुधार संस्थाओं में रखकर विभिन्न व्यवसायों का प्रशिक्षण एवं शिक्षा प्रदान की जाए।

4. भिखारियों का मानसिक तथा शारीरिक परीक्षण कराया जाए और उसके बाद उन्हें विभिन्न समाजसेवी संस्थाओं एवं भिक्षुक पुनर्वास गृहों में भेजा जाए।

5. नगरों के केंद्रों तथा राज्यों के आर्थिक सहयोग से भिखारियों के पुनर्वास की व्यापक योजना बनानी चाहिए तथा इनके लिये नियमित आय के स्रोत निश्चित किये जाने चाहिए।

6. भिखारियों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए चाहे सुधार गृह में हो या बाहर हों।

7. भिाखारियों का वर्गीकरण करके उन्हें पुरुष महिला, बालक, कोढ़ी, स्वस्थ्य, बीमार, विकलांग, अंधे एवं बहरे आदि विभिन्न वर्गों में विभक्त किया जाए और उसी के अनुरूप उनके सुधार प्रशिक्षण, शिक्षण एवं पुनर्वास की योजना बनायी जाए।

8. लोगों को जानकारी दी जाए की कि वह दान आदि देकर लोगों को आलसी एवं अकर्मण्य न बनाएँ न ऐसा बनने में प्रोत्साहन दें।

9. विघटित परिवारों के बच्चों तथा अन्य सदस्यों को प्रशिक्षण आदि देकर सक्षम बनाया जाए ताकि वह भिक्षावृत्ति अपनाने के लिये मजबूर न हों।

10. दान देने की प्रवृत्ति में परिवर्तन किया जाए दान किसी व्यक्ति विशेष को नहीं बल्कि विभिन्न सुधार संस्थाओं को प्रदान किया जाए इससे भिखारियों के सुधार एवं पुनर्वास के कार्यक्रम सरलता से पूरे किये जा सकेंगे।

11. शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से स्वस्थ्य एवं काम करने योग्य व्यक्तियों को भिक्षा मांगने पर दंडित किया जाना चाहिए जिससे इस प्रकार का कार्य बंद कर दें।

12. कोढ़ी एवं संक्रामक रोगों से पीड़ित भिखारियों का बंध्याकरण करके पृथक निवास की व्यवस्था की जानी चाहिए।

13. पुनर्वास संस्थाओं में रखे जाने वाले भिखारियों से शारीरिक और मानसिक क्षमता के अनुसार परिश्रम कराया जाए ताकि संस्था की स्थिति में सुधार हो और भिक्षुकों को श्रम करने की आदत पड़े।

14. सुधार संगठनों में भिखारियों की चिकित्सा, शिक्षा, प्रशिक्षण भोजन एवं पुनर्वास की सुविधाएँ प्रदान करने की बहुत कमी है। अत: भिक्षुक गृहों, रैन बसेरा, बाल सुधार संस्थाओं, श्रम शिविरों, स्वागत गृहों, और शरणालयों की व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि सभी प्रकार के भिाखारियों को शरण मिल सके।

15. नगर के विभिन्न सामाजिक संगठनों को इस दिशा में अपना योगदान करने को प्रोत्साहित करना चाहिए तथा उन्हें कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए।

सांप्रदायिकता (COMMUNALISM)


भारत की ज्वलंत समस्याएँ हैं- सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद एवं भाषावाद। इन्होंने राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा उपस्थित की है। हिंदुओं और मुसलमानों के मध्य सामंजस्य की समस्या ने सांप्रदायिकता को जन्म दिया है। समय-समय पर भारत में आक्रणकारी के रूप में विभिन्न धर्मों, प्रजातियों एवं संस्कृतियों के लोग आते रहे हैं। कई सांस्कृतिक एवं धार्मिक समूहों का तो भारतीय समाज से सामंजस्य हो गया, कई उसमें विलीन हो गये। उनमें से कई ने अपना अलग से अस्तित्व बनाए रखा और समय-समय पर धार्मिक और सांस्कृतिक तनावों को जन्म दिया। परिणाम स्वरूप अनेक स्थानों पर सांप्रदायिक दंगे हुए। अलीगढ़, राँची, मेरठ, कोलकाता, औरंगाबाद, अहमदाबाद, मुरादाबाद, बिहार शरीफ, जलगाँव एवं जमशेदपुर तथा कानपुर के दंगों की रक्त रंजित यादें अभी ताजा हैं। सांप्रदायिकता के समान ही भारत में क्षेत्रवाद एवं भाषावाद की समस्याएँ भी मुँह बाये खड़ी है। सांप्रदायिकता इनमें सबसे बड़ी राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याएँ है।

सांप्रदायिकता का अर्थ एवं परिभाषा


‘‘सांप्रदायिकता वह संकीर्ण मनोवृत्ति है जो एक वर्ग अथवा संप्रदाय के लोगों में अपने आर्थिक एवं राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिये पायी जाती है और उसके परिणाम स्वरूप विभिन्न धार्मिक समूहों में तनाव एवं संघर्ष पैदा होते हैं।’’

रेंडम हाउस डिक्शनरी25 के अनुसार ‘‘सांप्रदायिकता अपने ही जातीय समूह के प्रति न कि समग्र के प्रति तीव्र निष्ठा की भावना है।’’

श्री कृष्ण दत्त भट्ट26 के अनुसार ‘‘संप्रदाय का अर्थ है मेरा संप्रदाय, मेरा पंथ, मेरा मत ही सबसे अच्छा है। उसी का महत्त्व सर्वोपरि होना चाहिए। मेरे संप्रदाय की ही तूती बोलनी चाहिए। उसी की सत्ता मानी जानी चाहिए, अन्य संप्रदाय हेय हैं। उन्हें या तो पूर्णत: समाप्त कर दिया जाना चाहिए या यदि वे रहें भी तो वे मेरे मातहत होकर रहें, मेरे आदेशों का सतत पालन करें। मेरी मर्जी पर आश्रित रहें वे पुन: लिखते हैं, ‘‘अपने धार्मिक संप्रदाय से भिन्न अन्य संप्रदाय अथवा संप्रदाय के प्रति उदासीनता, उपेक्षा दयादृष्टि, घृणा विरोध और आक्रमण की भावना, ‘सांप्रदायिकता’ है, जिसका आधार वह वास्तविकता या काल्पनिक भय की आशंका है कि उक्त संप्रदाय हमारे अपने समुदाय और संस्कृति को नष्ट कर देने या हमें जान-माल की क्षति पहुँचाने के लिये कटिबद्ध है।’’

स्मिथ27 के अनुसार ‘‘एक सांप्रदायिक व्यक्ति अथवा समूह वह है जो अपने धार्मिक या भाषा-भाषी समूह को एक ऐसी पृथक राजनीतिक तथा सामाजिक इकाई के रूप में देखता है जिसके हित अन्य समूह से पृथक होते हैं, और जो प्राय: उनके विरोधी भी हो सकते हैं।’’

इस प्रकार सांप्रदायिकता में अपना धर्म अपनी भाषा तथा अपनी संस्कृति को श्रेष्ठतम माना जाता है तथा दूसरे की भाषा, संस्कृति और धर्म के प्रति विरोधी भाव उत्पन्न होता है तथा सामाजिक एवं राजनैतिक अलगाव उत्पन्न हो जाता है। और एक दूसरे को हानि पहुँचाने के सामाजिक रूप में संगठित होते हैं।

सांप्रदायिकता के लिये उत्तरदायी कारक


1. ऐतिहासिक कारक - हमारे देश में मुस्लिम बाहर से आये और इन्होंने भारत में अपने धर्म प्रचार के लिये तलवार और जोर जबरदस्ती का सहारा लिया। औरंगजेब तथा कुछ अन्य राजाओं ने कई हिंदू राजाओं को मुसलमान बनाया। इस कारण हिंदुओं के मन में उनके प्रति घृणा पैदा हुई और कई बार हिंदू मुस्लिम संघर्ष हुए हैं।

2. मनोवैज्ञानिक कारक - हिंदू और मुसलमान दोनों में ही एक दूसरे के प्रति घृणा, द्वेष, प्रतिकार, विरोध एवं पृथक्करण के मनोभाव पाये जाते हैं, इस प्रकार की मनोवृत्ति के कारण सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिला है।

3. सांस्कृतिक भिन्नता - सांप्रदायिकता को जन्म देने में एक महत्त्वपूर्ण कारक हिंदू और मुसलमानों की सांस्कृतिक भिन्नता है। दोनों में रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज, पहनावे, धर्म और विचार धारा में बहुत अंतर है। विवाह, पूजा-पद्धति, देवी-देवताओं की भिन्नता, सांस्कृतिक भेद, मनमुटाव एवं तनाव पैदा करते हैं।

4. भौगोलिक कारक - भौगोलिक विशेषताओं के कारण, भोजन, आवास, पहनावे में भिन्नता है, एक भौगोलिक क्षेत्र के लोग दूसरे भौगोलिक क्षेत्र से भिन्न हैं। फलत: एक दूसरे के प्रति घृणा, द्वेष एवं विरोध के भाव पाये जाते हैं। जो कि सांप्रदायिक तनाओं को जन्म देते हैं।

5. धार्मिक असहिष्णुता - धर्मगुरु, पादरी, पैगम्बर और मौलवी अपने अनुयायियों को धार्मिक कट्टरता की शिक्षा देते रहे हैं, दूसरे धर्म के लोगों को मारना, अपने धर्म का प्रचार करना वे पुण्य मानते हैं। धर्म गुरुओं द्वारा गलत दिशा-निर्देश करने के कारण भी सांप्रदायिक तनावों में वृद्धि हुई है।

6. राजनीतिक स्वार्थ - राजनैतिक लाभ लेने के लिये राजनीतिज्ञों द्वारा चुनाव आदि के समय जिस क्षेत्र में जैसे संप्रदाय के लोगों का बाहूल्य होता है। वहाँ पर उसी संप्रदाय के व्यक्ति को खड़ा किया जाता है। और सांप्रदायिकता की आग भड़कायी जाती है।

7. सांप्रदायिक संगठन - जैन, सिक्ख, हिंदू और मुसलमानों के कई संगठन पाये जाते हैं। ये सांप्रदायिक संगठन अपने-अपने मतावलम्बियों को संगठित करते हैं, और उन्हें दूसरों के प्रति भड़काते हैं जिससे संघर्ष एवं दंगे होते हैं।

8. असामाजिक तत्व एवं निहित स्वार्थ -
सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने में समाज विरोधी तत्वों एवं निहित स्वार्थ वालों का भी महत्त्वपूर्ण हाथ होता है, वे वर्ग संघर्ष और तनाव की स्थिति इस लिये पैदा करते हैं, जिससे कि उन्हें समाज विरोधी कार्य लूट-पाट करने एवं यौनव्यभिचार करने का अवसर प्राप्त हो सके तथा अपने व्यक्तिगत झगड़ों का बदला ले सकें। ऐसे लोग, होली, दिवाली, रामनवमी, मुहर्रम, ईद आदि के अवसर पर पत्थर फेंकने, रंग छिड़कने, आग लगा देने का कार्य करते हैं जिससे की उपद्रव पैदा हो।

9. धर्म निरपेक्षता का दुरूपयोग - भारतीय संविधान भारत को धर्म निरपेक्ष राज्य घोषित करता है। धर्म निरपेक्षता का अनुचित लाभ उठाकर कई बार एक धार्मिक समूह ने दूसरे पर अपने आप को थोपने की कोशिश की जिसके परिणामस्वरूप तनाव व संघर्ष पैदा हुए।

10. मंदिर-मस्जिद विवाद - अयोध्या के प्राचीन राम जन्मभूमि मंदिर को तोड़कर बाबर के सेनापति मीरवाकी ने उसे मस्जिद का रूप दिया ऐसे ही कई धार्मिक स्थलों के उदाहरण हैं, जो प्राय: सांप्रदायिक झगड़ों का कारण बने।

उपर्युक्त सभी कारकों से स्पष्ट है कि भारत में सांप्रदायिकता अनेक सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक एवं राजनीतिक कारकों का मिश्रित फल है। आज की आवश्यकता हे कि इस समस्या को जड़ से उखाड़ फेंका जाए।

सांप्रदायिक तनाव के कारण


1. गौबध हिंदुओं और मुसलमानों के प्रति आपसी संघर्ष का कारण बनते हैं। हिंदू गाय को आदर और सम्मान की दृष्टि से गो-माता के रूप में पूजते हैं। मुसलमान गाय की हत्या करते हैं, इसलिये प्राय: विद्रोह भड़क उठता है।

2. मस्जिद के सामने गाने बजाने के कारण भी सांप्रदायिक दंगे होते हैं।

3. होली के त्योहार पर हिंदू का किसी मुसलमान के ऊपर रंग छिड़क देने पर भी सांप्रदायिक दंगे होते हैं।

4. मुसलमानों द्वारा मंदिरों में तोड़-फोड़ करने या मूर्ति-भजन करने अथवा हिंदुओं द्वारा मस्जिदों में तोड़-फोड़ करने से भी सांप्रदायिक दंगे हुए हैं।

5. हिंदुओं के जलूसों में मुसलमानों द्वारा पथराव करने तथा मोहर्रम के समय पथराव आदि से सांप्रदायिक तनाव भड़कते हैं।

6. सांप्रदायिक तनाव का एक प्रमुख कारण मुसलमानों की देश भक्ति में अविश्वास किया जाना।

7. हिंदू व मुसलमानों का एक दूसरे पर संदेह एवं पूर्वाग्रह भी तनाव पैदा करता है।

8. आर्थिक हित एवं आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा की सुरक्षा को लेकर भी उपद्रव हुए हैं।

9. सांप्रदायिकता की झूठी अफवाहें फैलने के कारण भी उपद्रव होते रहते हैं।

10. अराजक तत्वों द्वारा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिये भी तनाव पैदा किया जाता है।

11. संकीर्ण, राजनीति, जातिवाद, भाषावाद, भाई-भतीजावाद एवं पक्षपात आदि के कारण भी सांप्रदायिक दंगे हुए हैं।

12. बड़े नगरों में हुए झगड़ों एवं दंगों के अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ कि उपद्रवों का कारण, प्रतिशोध, अफवाहें, प्रशासन की ढिलाई, सांप्रदायिक तनाव, उत्तेजना पूर्ण वातावरण, राजनीतिक दलों एवं समाचार पत्रों द्वारा पैदा की गयी उत्तेजना आदि हैं। लखनऊ नगर में हिंदू तथा मुस्लिम धर्मावलंबियों का आपसी सौहार्द तनाव ग्रस्त परिस्थितियों में भी बना रहा है। नगरीय क्षेत्र के विभिन्न धर्मों की जनसंख्या स्थिति तालिका - 6.6 में देखने को मिलती है।

लखनऊ महानगर में विभिन्न संप्रदायों की स्थिति एक समान नहीं है। हिंदू जनसंख्या नगरीय क्षेत्र में 73 प्रतिशत से अधिक है। मुस्लिम जनसंख्या 25 प्रतिशत के लगभग है। अर्थात नगर में हिंदू मुस्लिम जनसंख्या का ही बाहूल्य है। अन्य धर्मों की जनसंख्या बहुत नगण्य है। नगर में सिक्ख जनसंख्या 1.1 प्रतिशत के लगभग है। ईसाई, बौद्ध, जैन व अन्य मतावलंबी नगर में बहुत कम संख्या में हैं। नगर में जनसंख्या की सांप्रदायिक दशा पर विचार करें तो पता चलता है कि जनपद लखनऊ में हिंदू जनसंख्या 78.97 प्रतिशत है और देश में 83 प्रतिशत हिंदू जनसंख्या है। तुलनात्मक रूप में नगर में हिंदू जनसंख्या का प्रतिशत जनपद और देश दोनों से कम है। मुस्लिम जनसंख्या देश के आंकड़ों की तुलना में दोगुने से अधिक है। जनपद के आंकड़ों में भी काफी अंतर है। अन्य सभी संप्रदायों की स्थिति देश के आंकड़ों तथा जनपद के आंकड़ों दोनों से विपरीत दिशा दर्शाते हैं।

तालिका 6.6 लखनऊ महानगर धार्मिक जनसंख्या प्रास्थिति नगर में सभी संप्रदायों का वितरण समान नहीं है। नगर के पुराने बसे क्षेत्रों में मुस्लिम जनसंख्या अधिक है। जबकि नगर के नये बसे क्षेत्रों में हिंदू संख्या अधिक है। चौक, मकबूलगंज, अशर्फाबाद, मशंकगंज, मौलवीगंज, निवाजगंज, एहियागंज, राजाबजार में मुस्लिम संख्या अधिक है। इसी प्रकार गुरूद्वारा रोड, हिंद नगर, सरदारी खेड़ा में सिख जनसंख्या अधिक है। नगर की जनसंख्या की दशा में एक अन्य अंतर्जातीय दशा पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

नगर में हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों का इतिहास बहुत ही नगण्य है। 1968 से पहले के वर्षों में कुछ धार्मिक व्यवस्था के कारण दंगे हुए थे। जिनमें कोई विशेष उल्लेखनीय स्थिति नहीं रही। 1984 में नवंबर में सिक्ख विरोधी दंगों में आलमबाग सिंगार नगर गुरूद्वारे में एक सिक्ख को जला दिया गया था, अन्य स्थितियाँ बहुत मामूली रही।

नगर में हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों का ऐतिहासिक दस्तावेजों में कहीं विशेष उल्लेख नहीं मिलता है। यहाँ हिंदू मुस्लिम एकता की गंगा जमुनी सांस्कृतिक एकता देखी गयी है। प्रबुद्ध वर्गों का मत है कि 1992 में जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद का चर्चित ढांचा ध्वस्त किया गया तो पहली बार संप्रदायों में तनातनी का वातावरण देखा गया इस समय मुस्लिम प्रधान क्षेत्रों में आक्रोश और तनाव के घने मेघ धरातल के निकट तक आ गए किंतु प्रशासन की अति जागरूकता से तनावपूर्ण स्थितियाँ नियंत्रण में रही चौक, अशर्फाबाद, नक्काश, बालागंज, मौलवीगंज में छुट-पुट रूप से र्इंटों-पत्थरों के फेंकने की घटनाएँ हुई पुराने लखनऊ में कई दिनों तक कर्फ्यू लगाया गया तथा लगातार 6 दिसंबर की तिथि को संवेदनशील तिथि मान लिया जाता है, तथा नगरी क्षेत्र में प्रशासनिक व्यवस्था को शक्त रहने के आदेश दिये जाते हैं। यह पुराने नगर के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में विशेष रूप से रखी जाती है। नगर के ऐतिहासिक दस्तावेजों में कोई हिंदू-मुस्लिम विवादों झगड़ों की अधिसूचना दर्ज नहीं है। कुछ विवाद प्रकाश में आये जिनका हल मौखिक विचार विमर्श से ही पूरा किया गया। 5 मई 1990 में कश्मीर में हिंदुओं पर हुए अत्याचार के विरोध में आत्मदाह करने पर अमादा 3 शिव सैनिकों को नाका हिंडोला से पकड़ा गया इस प्रकार की छुट-पुट घटनाओं का क्रम महानगर तथा राजधानी होने के कारण चलता रहा है।

नगर में हिंदू मुस्लिम की घटनाएँ बहुत कम है किंतु यहाँ सांप्रदायिकता का रूप शिया मुस्लिम और सुन्नी मुस्लिमों के आपसी मतभेद में अधिक मिलता है। विगत 25 वर्षों में मुहर्रम के जुलूस निकलने पर प्रशासन ने रोक लगा दी दोनों वर्गों में आपसी वैमनस्य इस रूप में उभरा कि बाजार जला दिये गए जानमाल की भारी हानि हुई 1964 में यह बहुत अधिक रहा तथा 1972 तथा 1976 में भी यह बढ़ा अंतत: मुहर्रम के जुलूसों में प्रतिबंध लगा दिया गया और प्रत्येक वर्ष इस अवसर पर भारी सैन्य बल तैनात किया जाता है। 1976 के पश्चात पहली बार सन 2000 में मुहर्रम का जुलूस शांति पूर्वक निकाला गया यहाँ दोनों मुस्लिम संप्रदायों के आपसी वैमनस्य का कारण रीति रिवाजों में आंशिक भिन्नता है। नगर में यह दंगे अकबरी गेट शिया कॉलेज सुन्नी कॉलेज, चौक आदि क्षेत्रों में रहे। यह दंगे नगर की प्रशासन व्यवस्था तथा शांति के लिये हानिकारक रहे। धन-जन के दुष्परिणाम से अनेकों परिवार तवाह हुए तथा उनका पारिवारिक ढाँचा टूटा। नगर में सांप्रदायिक दुष्परिणाम को निम्न रूपों में भी देखा जा सकता है।

सांप्रदायिकता के दुष्परिणाम


1. राष्ट्र स्तरीय प्रभाव - सांप्रदायिकता के दुष्परिणाम हमारे देश को कई बार बड़े पैमाने पर भुगतने पड़े। हमारे देश का विभाजन भी सांप्रदायिकता का ही परिणाम है। देश में अस्थिरता उत्पन्न करने के लिये भी सांप्रदायिकता की भावना उजागर की जाती है। मुस्लिम देशों का संगठन, ईसाईयों के संगठन अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी एकता की बात रखते हैं जो आपसी राष्ट्रीय एकता की समस्या है।

2. तनाव एवं संघर्ष - सांप्रदायिकता के कारण तनाव एवं संघर्ष की स्थितियाँ उत्पन्न होती है। भारत के अनेक नगरों में प्राय: यह समस्या उग्र रूप ले लेती है। लखनऊ नगर अभी तक ऐसी समस्याओं से बचा हुआ है।

3. जनधन की हानि - सांप्रदायिक दंगों के कारण सार्वजनिक तथा निजी संपत्तियों की भारी हानि होती है। मकान, दुकान, कार्यालय, वाहन, विद्यालय, रेल, डाक-तार आदि की व्यवस्था को भारी हानि पहुँचती है।

4. राजनीतिक दुष्परिणाम - सांप्रदायिक के कारण लोगों का सरकारों के प्रति विश्वास टूट जाता है। न्याय की समस्या उत्पन्न हो जाती है। लोगों का जीवन परिसंकट मय स्थितियों से ग्रस्त हो जाता है।

5. आर्थिक विकास में बाधक - सांप्रदायिक दंगों के कारण कारखानों उद्योगों आदि में तोड़-फोड़ एवं आगजनी की समस्याएँ उत्पन्न होती है। लोग प्रगतिशील विकास कार्यों में पूँजी नहीं लगाना चाहते हैं। नये उद्योगों की स्थापना न होने के कारण बेरोजगारी की स्थिति उत्पन्न होती है।

6. असामाजिक तत्वों की वृद्धि - असामाजिक तत्व अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये सांप्रदायिकता की स्थितियाँ उत्पन्न करने का प्रयास करते रहते हैं। इन स्थितियों का लाभ उठाकर लूटपाट करते हैं तथा अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी का लाभ उठाते हैं।

7. सामाजिक सांस्कृतिक विघटन - विभिन्न धर्मावलम्बी आपसी एकता स्थापित नहीं कर पाते हैं उनके मध्य दूरियाँ बढ़ती जाती हैं। समाज में अविश्वास भय, शंका, घृणा आदि का वातावरण उत्पन्न हो जाता है।

इस प्रकार सांप्रदायिकता हमारी राष्ट्रीय एकता, आर्थिक विकास तथा सामाजिक ढाँचे को छिन्न भिन्न करती हैं। नगर में सिया-सुन्नी दोनों मुस्लिम संप्रदायों के मध्य यह स्थितियाँ कई बार विकृत रूप ले चुकी है। इनके निवारण के लिये उपाय खोजना आवश्यक हो गया है।

सांप्रदायिकता निवारण के उपाय


सांप्रदायिकता की समस्या का समाधान करने के उद्देश्य से कई बार केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय एकता परिषद का गठन किया गया है और कई बार बैठकें आयोजित की गयी है तथा सांप्रदायिकता निवारण हेतु प्रयत्न किये गये हैं। सांप्रदायिकता निवारण हेतु निम्न उपायों पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है :-

1. प्रजातांत्रिक मूल्यों के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति के महत्त्व को मान्यता प्रदान की जाए।

2. सामाजिक सुरक्षा के उपाय किये जाने की आवश्यकता है।

3. किसी भी धार्मिक संगठन या राजनैतिक दल द्वारा घृणा या वैमनस्य फैलाने की दशा में कठोर कानून बनाने की आवश्यकता तथा दंड संहिता का पालन कराए जाने की आवश्यकता है।

4. पारस्परिक सद्भाव, राष्ट्रीय चरित्र एवं एकीकरण को बढ़ावा देने वाले पाठ्यक्रमों को शिक्षा में सम्मिलित किया जाए।

5. प्रशासनिक स्तर पर इस दिशा में सभी के लिये कठोर नियमों के अंतर्गत रखने और रहने की व्यवस्था।

6. जाति, धर्म, भाषा, प्रांतीयता जैसी संकीर्ण विचार धाराओं से परे विचार धाराओं का विकास करने की आवश्यकता है।

7. विभिन्न त्यौहारों, उत्सवों, मेलों आदि को राष्ट्रीय स्तर पर मनाए जाने की आवश्यकता है। इससे पारस्परिक सद्भाव उत्पन्न होगा।

8. संचार माध्यमों से राष्ट्रीय एकता का प्रचार प्रसार नियमित रूप से किया जाना चाहिए। सांप्रदायिक एकता वाले कार्यक्रम कविता पाठ, नाटक, कहानी, वृत्त चित्रों आदि का प्रसारण लगातार चलते रहना चाहिए।

9. राष्ट्रीय स्तर पर सांप्रदायिक एकता के लिये एक शक्तिशाली अधिकारी संपन्न समिति बनायी जाए जो इस दिशा पर स्वतंत्र रूप से अंकुश रख सके।

10. सांप्रदायिक एकता में स्त्रियों का विशेष योगदान हो सकता है। महिला संगठनों के माध्यम से एक सही सार्थक योगदान किया जा सकता है।

11. अल्पसंख्यकों की रक्षा एवं सुरक्षा राज्य का दायित्व है। इसमें समाज को भी उदारता की नीति अपनाने की आवश्यकता है।

12. असामाजिक तत्वों के नियंत्रण के लिये शक्तिशाली प्रयास किये जाने की आवश्यकता है।

13. नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में लाया जाए तथा सभी संप्रदायों को जानने समझने के अवसरों का सृजन किये जाने की आवश्यकता है।

14. चुनावों में सांप्रदायिकता का प्रचार करने वालों पर शक्त कार्यवाही की जाए तथा ऐसे प्रत्याशी को चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जाए।

15. अल्प संख्यकों को ऐसी सुविधाएँ नहीं दी जानी चाहिए जो वर्ग संघर्ष का कारण बनें।

16. किसी भी समस्या के समाधान के लिये सहिष्णुता प्रेम, भाईचारा, उदारता की भावना संजीवनी के समान अचूक औषधि है।

17. राष्ट्रपिता गांधी एवं विनोबाजी शांति सेना बनाने की सिफारिस करते थे जो विभिन्न स्थानों पर शांति स्थापित करने, दंगों का दमन करने, पारस्परिक एकता, विश्वास और मैत्री पैदा करने का कार्य करें।

नगरीय संप्रदायों में परिवारों की रूपरेखा विकृत हो जाती है कुछ परिवार धन जन की भारी क्षति का सामना करते हैं तो कुछ पारिवारिक स्त्री मर्यादा को खो देते हैं जो आगे वेश्यावृत्ति के रूप में परिलक्षित होती है। लखनऊ महानगर में सांप्रदायिकता के समान वेश्यावृत्ति की भी कोई स्पष्ट रूपरेखा दृष्टिगोचर नहीं होती यहाँ पर इस समस्या का अध्ययन करने का प्रयास है।

वेश्यावृत्ति (PROSTITUTION)


वेश्यावृत्ति समाज की एक बड़ी बुराई है जो हमारे समाज में प्राचीन काल से प्रचलित रही है। इसे कभी भी सामाजिक स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई, इस सम्बन्ध में जियोफ्रे28 लिखते हैं- ‘‘वेश्यावृत्ति विश्व का सबसे पुराना व्यवसाय है और यह तभी से चला आ रहा है जब से कि समाज में लोगों की काम भावनाओं को विवाह और परिवार में सीमित किया जाता रहा है’’ भारत में ही नहीं वरन यूनान व जापान में भी ‘हीटरी’ और ‘गीशास’ के रूप में वेश्यावृत्ति का प्रचलन रहा है। वेश्यावृत्ति को यौन तृप्ति का एक विकृत एवं घृणित साधन माना गया है। इससे व्यक्ति का शारीरिक और नैतिक पतन होता है उसे आर्थिक हानि उठानी पड़ती है तथा यह मानव के पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में विष घोल देती है।

वेश्यावृत्ति की परिभाषा -


वेश्यावृत्ति को परिभाषित करते हुए इलियत तथा मैरिल29 लिखते हैं ‘‘वेश्यावृत्ति एक भेद-रहित और धन के लिये स्थापित किया गया अवैध यौन सम्बन्ध है जिसमें भावात्मक उदासीनता होती है।’’

जियोफ्रे30 के अनुसार ‘‘वेश्यावृत्ति आदतन या कभी-कभी बिना किसी भेद भाव के अन्य व्यक्ति के साथ धन के लिये किया गया लैंगिक सहवास है।’’

हेवलॉक एलिस31 के अनुसार, वेश्या वह है जो अपने शरीर को बिना किसी विकल्प के पैसों के लिये कई लोगों को मुक्त रूप से उपलब्ध कराये।

बोंगर32 का मत है कि ‘‘वे स्त्रियाँ वेश्याएँ हैं, जो अपने शरीर को यौन क्रियाओं के लिये बेचती है और इसे एक व्यवसाय बना लेती है।’’

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि वेश्यावृत्ति स्त्री अथवा पुरुष द्वारा आजीविका कमाने के लिये स्थापित किया जाने वाला अवैध यौन सम्बन्ध है। इसमें भावात्मक लगाव नहीं होता है तथा बिना किसी भेदभाव के शरीर को आर्थिक लाभ के लिये बेचा जाता है।

वेश्याओं के प्रकार


1. प्रकट समूह - इनमें वे वेश्याएँ आती है जो रजिस्टर्ड होती है या जो स्पष्ट रूप से वेश्यालय चलाती है। शहरों में ऐसे क्षेत्र को जहाँ वेश्याएँ रहती हैं। ‘‘लाल रोशनी क्षेत्र’’ कहते हैं। इनमें वेश्याओं के कोठे बने होते हैं।

2. अप्रकट समूह - इनमें वे वेश्याएँ आती हैं जो चोरी छिपे वेश्यावृत्ति करती हैं।

3. कॉल गर्ल्स - इस प्रकार की वेश्याएँ शराब घरों, होटलों, कैबरे स्थलों, नाच घरों तथा क्लाबों में जाकर धंधा करती हैं।

4. होटल वेश्याएँ - कई लड़कियाँ होटलों में वेश्यावृत्ति करती हैं। आजकल कई होटलों के मालिक इस व्यवसाय में लगे हुए हैं, वे आमदनी का एक बड़ा हिस्सा स्वयं ले लेते हैं।

5. रखेल वेश्याएँ - कई विवाहित पुरुष पत्नी के अतिरिक्त भी किसी स्त्री से अपने अवैध यौन सम्बन्ध रखते हैं। बड़े-बड़े सेठ, उच्च अधिकारी, स्मगलर, डकैत आदि रखेल रखते हैं।

6. वंशानुगत वेश्याएँ - कई वेश्याएँ वंशानुगत होती हैं। इस प्रकार की वेश्याएँ माँ से पुत्री को अपना धंधा हस्तांतरित करती हैं।

7. वासना पीड़ित वेश्याएँ - इस श्रेणी में वे वेश्याएँ आती हैं जिनमें अन्य स्त्रियों की अपेक्षा यौन इच्छाएँ अधिक होती हैं। और वे अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिये अन्य पुरुषों से संपर्क स्थापित करती हैं।

8. परिस्थिति जन्य वेश्याएँ - इस श्रेणी में वे वेश्याएँ आती हैं जो किसी परिस्थिति एवं कुसंगति में पड़ने के कारण वेश्यावृत्ति अपना लेती हैं। गरीबी, वैधव्य, बेकारी, बेमेल विवाह, बाल विवाह, बलात्कार, अनाथ होने, बहला-फुसलाकर भगा ले जाने या अपहरण करके जबरन समर्पण के लिये दबाव डालने आदि की परिस्थितियों में मजबूर होकर कई स्त्रियाँ वेश्यावृत्ति अपना लेती हैं।

9. अपराधी एवं पिछड़ी जातियों व जनजातियों की वेश्याएँ - कई जातियाँ एवं जनजातियाँ ऐसी हैं जिनमें स्त्रियों में लड़कियों से वेश्यावृत्ति करायी जाती है। कई घुमक्कड़ जनजातियों की स्त्रियाँ यह कार्य करती हैं, इनमें नट, बेड़िया, बसावाी, कंजर, सांसी आदि प्रमुख हैं।

10. धार्मिक वेश्याएँ - प्राचीन काल से ही भारत में देवदासी प्रथा प्रचलित रही है जिनमें युवा लड़कियाँ मंदिरों को सौंप दी जाती थीं। ये लड़कियाँ मंदिर में गायन तथा नृत्य का कार्य करती थीं। देवदासी बनने वाली लड़की का विवाह किसी साधु के साथ औपचारिक रूप से कद दिया जाता था। इन्हें भगतनियों के नाम से भी जानते हैं। मंदिर से सम्बन्धित साधु संत इन देव दासियों का उपभोग करते थे। वेश्यावृत्ति के प्रकार वेश्यावृत्ति के कारणों की ओर संकेत करते हैं विभिन्न विद्वानों ने वेश्यावृत्ति के विभिन्न कारण गिनाएँ हैं।

वेश्यावृत्ति के कारण


1. आर्थिक कारण - वेश्यावृत्ति के आर्थिक कारणों में निर्धनता प्रमुख है। कम आय एवं गरीबी, जीवन स्तर को ऊँचा उठाने की लालसा से भी वेश्यावृत्ति उत्पन्न हो जाती है। लीग ऑफ नेशन्स एडवाइजरी कमेटी33 का मत है कि ‘गरीबी’ कम स्थान और भीड़ तथा कम आय कुछ ऐसे कारण हैं जिनके कारण औरतें वेश्यावृत्ति करती हैं। एम. लौण्ड्रेस34 का कहना है, ‘‘भूख वेश्यावृत्ति की आधार शिला है’’ लीग ऑफ नेशन के द्वारा विभिन्न देशों में की गयी जाँच से ज्ञात हुआ कि गरीबी वेश्यावृत्ति का प्रमुख कारण है श्री कंगा34 के द्वारा किये गये अध्ययन से ज्ञात हुआ कि 41 प्रतिशत वेश्याओं ने गरीबी एवं बेकारी के कारण यह व्यवसाय अपनाया था। नागपुर की 100 वेश्याओं के सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ कि 36 प्रतिशत स्त्रियों ने अभाव, बेकारी एवं जीवन-यापन के साधनों की कमी के कारण वेश्यावृत्ति अपनायी। पुनेकर35 ने अपने मुंबई सर्वेक्षण में 72 प्रतिशत मामलों में वेश्यावृत्ति के लिये गरीबी को उत्तरदायी पाया।

वर्तमान में स्त्रियों द्वारा नौकरी किये जाने के कारण कई बार वे ऑफिस में अपने बॉस के हाथों फँस जाती हैं। दुकानों, होटलों, कार्यालयों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों, क्लबों आदि सभी स्थानों पर बिक्री बढ़ाने, आकर्षण पैदा करने आदि की दृष्टि से सेल्समैन एवं रिसेप्सनिस्ट के रूप में नवयुवतियों को रखा जाता है। कई बार इन पदों के लिये अपने शरीर को भी बेचना पड़ता है।

स्त्रियों में भौतिक सुख सुविधा की विशेष अभिलाषा होती है उनके पास कार, फ्रीज, रेडियो, टेलीविजन, अच्छा मकान, कीमती वस्त्र, फर्नीचर, जेवर आदि हो इन सुख सुविधाओं की चाहत में भी कई स्त्रियाँ वेश्यावृत्ति अपना लेती हैं।

स्त्रियों की परबसता भी कई बार यह स्थिति उत्पन्न करती हैं कि वह उससे मुक्ति पाने के अन्य उपाय न देखकर वेश्यावृत्ति तक अपना लेती हैं।

2. विवाह विच्छेद - दुखी वैवाहित जीवन भी वेश्यावृत्ति के लिये उत्तरदायी है। जिन स्त्रियों का वैवाहित जीवन टूट जाता है वे अपनी यौन संतुष्टि के लिये वेश्यागमन करने के लिये विवश हो जाती है।

3. पारिवारिक परिस्थितियाँ - जिन परिवारों में माता पिता की मृत्यु हो गयी हो, कोई संरक्षक नहीं है। माँ सौतेली हो, पिता शराबी एवं व्यभिचारी हो, माँ स्वयं हो और पिता दलाल हो तो वे अपनी लड़कियों को वेश्यावृत्ति के लिये मजबूर करते हैं। जिन परिवारों में वेश्यावृत्ति परम्परागत रूप में चली आ रही होती है उनमें लड़कियां मां के व्यवसाय को ग्रहण कर लेती है।

4. विधवा विवाह पर रोक - भारत में विधवाओं को पुनर्विवाह की छूट नहीं है। विधवा होने पर स्त्री का जीवन-यापन कठिन हो जाता है। ऐसी दशा में भी स्त्रियों को वेश्यावृत्ति के लिये विवश होना पड़ता है।

5. दहेज प्रथा - वेश्यावृत्ति के लिये दहेज प्रथा भी उत्तरदायी है। कई माता पिता अपनी पुत्रियों के लिये दहेज जुटाने में असमर्थ होते हैं और बड़ी आयु तक लड़कियों का विवाह न होने पर वे अनैतिक यौवन सम्बन्ध स्थापित करने पर मजबूर हो जाती हैं।

6. कुमार्ग पर पड़ी हुई लड़कियाँ - कई बार किन्हीं कारणों से लड़कियाँ जब कुमार्ग में चली जाती हैं तो उन्हें विवश होकर वश्यावृत्ति अपना लेना पड़ता है।

7. मानसिक कमजोरी - लीग ऑफ नेशन्स की एडवाइजरी कमेटी ने अपने अध्ययन में पाया कि वेश्यावृत्ति करने वाली एक तिहाई स्त्रियों का स्वभाव एवं मस्तिष्क असामान्य था।

8. अज्ञान - कई बार लड़कियाँ अज्ञानतावश गुंडों एवं बदमाशों के प्रलोभन में आ जाती हैं जिनकी विवशता में वेश्यावृत्ति अपनानी पड़ती है।

9. औद्योगीकरण और नगरीकरण - औद्योगीकरण के परिणाम स्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों के कुटीर उद्योग नष्ट हुए हैं लोग गाँव से व्यवसाय की खोज में नगरों में आते हैं। नगरों में मकानों की समस्या के कारण पुरुष गाँव में ही अपने परिवार, बच्चे व स्त्रियों को अकेला छोड़कर शहर में काम करने आता है। इससे नगरों में पुरुषों की संख्या स्त्रियों की अपेक्षा बढ़ जाती है। स्त्री-पुरुष का नगरों में यह असंतुलन वेश्यावृत्ति के लिये उत्तरदायी है। पत्नी की अनुपस्थित पुरुषों के लिये वेश्यागमन के लिये प्रेरित करती है। महँगाई, आवास समस्या, उच्च जीवन का मोह, अनैतिक वातावरण आदि स्त्रियों को वेश्यावृत्ति के लिये मजबूर करती हैं।

10. दु:खी वैवाहिक जीवन - दु:खी वैवाहिक जीवन से मुक्ति पाने के लिये स्त्रियाँ वेश्यावृत्ति अपना लेती हैं। सास-ससुर, देवर-जेठ, पति एवं अन्य सदस्यों का उनके प्रति अत्याचार पूर्ण व्यवहार उसे दु:खी बना देता है। प्रतिदिन के कष्टों से मुक्ति पाने के लिये वह घर छोड़कर भाग जाती है और वेश्यावृत्ति अपनाकर अपना जीवन यापन करती है। टाटा इंस्टीट्यूट द्वारा किये गये अध्ययन में 30 प्रतिशत एवं जोरदार के अध्ययन में 84 प्रतिशत स्त्रियों ने दु:खी वैवाहिक जीवन के कारण ही वेश्यावृत्ति अपनायी।

11. अनैतिक व्यापार - विश्व के सभी देशों में स्त्रियों का अनैतिक व्यापार किया जाता है। स्त्रियों को धोखा देकर गुंडे एवं दलाल भगा ले जाते हैं और उन्हें नगरों में बेच दिया जाता है। वहाँ उनसे वेश्यावृत्ति कराकर धन कमाया जाता है।

12. पड़ोसी पर्यावरण - गंदी बस्तियों, नाच घरों, जुआघरों, वेश्याओं के अड्डों, शराबखानों के निकट रहने वाले लोगों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे वातावरण के घरों में लड़कियों का सच्चरित्र बने रहना कठिन होता है।

13. अवैध मातृत्व - वर्तमान के उत्तेजक वातावरण तथा यौन स्वच्छदंता के कारण कई बार लड़कियाँ विवाह से पूर्व ही गर्भ धारण कर लेती हैं। ऐसी स्थिति में प्रेमी भी किनारा कर लेता है वह सामाजिक आलोचना से प्रताड़ित होकर तथा प्रसव पीड़ा, मानसिक वेदना एवं आर्थिक संकटों से बचने के लिये वेश्यावृत्ति अपना लेती है।

14. धार्मिक कारण - दक्षिण भारत की देवदासी जैसी प्रथाएँ समाज में धार्मिक रूप से वेश्याएँ उत्पन्न करने के कारण हैं। टाटा स्कूलऑफ सोशल साइंसेज36 द्वारा मुंबई के अध्ययन में 30.29 प्रतिशत वेश्याएँ देवदासियाँ थीं नैतिक और सामाजिक स्वास्थ्य कमेटी ने अपने प्रतिवेदन में बताया कि मुंबई के चकलों में अत्याधिक संख्या उन वेश्याओं की है जो कर्नाटक, खान देश तथा राज्य के अन्य भागों में यल्लामा, दुर्गा और मंगेश के मंदिरों में अर्पित की गयी थी। इसी प्रकार चेन्नई एवं मैसूर में भी देवदासी प्रथा का प्रचलन है।

15. जैविकीय कारक - माता पिता के संस्कार संतानों में पड़ते हैं अनैतिक और व्यभिचारी आचरण वाले माता पिता के कुसंस्कार लड़कियों को वेश्यावृत्ति की ओर ले जाते हैं। इसी प्रकार कुछ स्त्रियों में अत्याधिक काम वासना पायी जाती है। पति से संतुष्ट न होने पर वे अन्य लोगों से सम्बन्ध स्थापित कर लेती हैं। अमेरिकन सामाजिक स्वास्थ्य संघ का मत है कि असामान्य कामुकता लड़कियों को वेश्यावृत्ति की ओर खींच ले जाती हैं37। पति के नपुंसक होने पर भी अपनी यौन इच्छाओं की तृप्ति के लिये स्त्रियाँ मर्यादा हीन होकर अन्य पुरुषों से सम्बन्ध स्थापित कर लेती हैं।

16. मनोवैज्ञानिक कारक - मंद बुद्धि, मनोविकार एवं नवीन अनुभव की चाह, आदि मानसिक कारक भी वेश्यावृत्ति को जन्म देते हैं। अनेक शोध इस बात की पुष्टि करते हैं कि कई वेश्यायें मंद बुद्धि थीं। पारिवारिक प्रेम एवं स्रेह भावना में कमियों के कारण भी लड़कियों में मनोविकृति पैदा होती है। वे अपना मानसिक संतुलन खो बैठती हैं और जुआ, मद्यपान एवं वेश्यावृत्ति के लिये उत्तरदायी है। डॉक्टर एडवर्ड ग्लोवर का मत है कि स्त्रियों में पुरुषों के प्रति पायी जाने वाली प्रतिशोध की भावना भी वेश्यावृत्ति के लिये जिम्मेदार है। एलिस एवं फ्रायड जैसे मनोवैज्ञानिक वेश्यावृत्ति के लिये काम वासना एवं नये अनुभव की इच्छा को उत्तरदायी मानते हैं। वर्तमान में अश्लील साहित्य शराबवृत्ति एवं सिनेमा के प्रभाव ने यौन उत्तेजना को भड़काने में मदद की है। विभिन्न प्रकार के यौन सुख, जिज्ञासा एवं अनुभवों के लिये भी स्त्रियाँ अपने को अनैतिक यौन व्यवहार में लगा लेती हैं।

17. पुरुषों की काम वासना - वेश्यावृत्ति के लिये पुरुषों की काम वासना भी उत्तरदायी है। धनी एवं विलासी व्यक्ति अपनी काम-वासना की पूर्ति के लिये वेश्या की सृष्टि करते हैं। विभिन्न प्रकार का यौन सुख चाहने वाले पुरुष भी वेश्यागामी हो जाते हैं।

18. सामाजिक कुरीतियाँ - भारतीय समाज में दहेज मृत्यु एवं विभिन्न प्रकार के उत्सव, आदि प्रचलित हैं इनकी पूर्ति के लिये लोगों को ऋण तक लेना पड़ता है। जब ऋण का भार इतना बढ़ जाता है कि उसे चुकाने में असमर्थ हो जाता है तो स्त्री या पुत्री द्वारा यौन व्यभिचार करवाता है और पैसा कमा कर कुरीतियों को निभाता है।

19. युद्ध - युद्ध में पुरुष मारे जाते हैं इससे लड़कियाँ अनाथ एवं स्त्रियाँ विधवा हो जाती हैं। उनके पास जीवन-यापन का कोई साधन नहीं होता तो उन्हें वेश्यावृत्ति के लिये विवश होना पड़ता है।

लखनऊ नगर में वेश्यावृत्ति


वेश्यावृत्ति एक व्यवसाय के रूप में प्राचीन काल से प्रचलित रहा है। धर्मशास्त्रों में अप्सराओं का उल्लेख मिलता है। ये नृत्य गायन आदि से इंद्र के दरबार में देवताओं का मनोरंजन करती थीं और ऋषियों की तपस्या की परीक्षा लेने अथवा भंग करने में उनकी सहायता ली जाती थी। रामायण और महाभारत काल में भी ऐसे उल्लेख मिलते हैं अर्थशास्त्र में कौटिल्य ने राज दरबार में नाच गान करने वाली गणिकाओं का उल्लेख किया है। उन्होंने नगर वधू के नाम से सम्बोधित किया है। मुगलकाल में वेश्यावृत्ति खूब पनपी, फूली फली। नवाब अपने हरम में हजारों स्त्रियाँ रखते थे। अंग्रेजों के समय से ही भारत में औद्योगीकरण और नगरीकरण की नींव रखी गयी इसके साथ ही यह समस्या नया रूप लेकर आयी इस समय जमींदार, ताल्लुकेदार एवं नवाब अपनी व्यक्तिगत वेश्याएँ रखने लगे। आजादी के बाद जमींदारी प्रथा की समाप्ति के बाद वेश्याएँ बेसहारा हो गयी और वेश्यावृत्ति को रोकने के लिये नये कानूनी उपाय किये जाने लगे। किंतु नगरों में चलने वाले होटलों क्लबों नृत्य गृहों में वेश्यावृत्ति देखी जाती हैं। यहाँ लड़कियों ने काल गर्ल्स एवं केरियर गर्ल्स के रूप में वेश्यावृत्ति अपना रखी है। इसमें उच्च सम्मानित घरों की लड़कियाँ एवं स्त्रियाँ हैं। यहाँ लखनऊ महानगर की वेश्यावृत्ति की स्थिति पर ध्यान रखकर क्षेत्रीय स्तर पर अध्ययन किया गया है। नवाबों के समय में लखनऊ में वेश्यावृत्ति इतनी अधिक फली फूली की वेश्याओं के लिये मीना बाजार लगाया जाता था, जहाँ नवाब और नवाबी हुकूमत से जुड़े लोग पहुँचते थे। विलासी नवाबों एवं धनी समृद्ध लोगों के द्वारा वेश्यागमन एक शौक के रूप में प्रचलित था वेश्यावृत्ति में यहाँ के नवाब आकंठ डूबे हुए थे, उनके हरम वेश्याओं से भरे पूरे रहते थे। वेश्याओं का भी वर्गीकरण था, कुछ वेश्याओं के विशेष स्थान प्राप्त होता था नवाबों की हुकूमत में उनकी अच्छी पकड़ रहती थी।

वेश्याएँ नृत्य और संगीत के माध्यम से नवाबों का भरपूर मनोरंजन करती थी उसके बदले में नवाब उन्हें ऐशो आराम की सभी सुविधाएं उपलब्ध कराते थे। मीनाबाजार वेश्याओं की खरीद फरोख्त के लिये लगा करता था, सभी वर्गों के लिये खुला था विशेष व्यक्तियों के लिये विशेष व्यवस्था हुआ करती थी। इस प्रकार नगर नवाबी हुकूमत में वेश्यावृत्ति से परिपूर्ण रहा।

ब्रिटिश काल में इसके रूप में बदलाव आया और अंग्रेजों की तानाशाहीवृत्ति ने इसके खुले रूप को प्रतिबंधित किया। गुप्त रूप में कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। अंग्रेजों की विलाशी वृत्ति भी वेश्यावृत्ति को पोषित करती रही। स्वतंत्रता के पश्चात नगर में वेश्यावृत्ति कुछ क्षेत्रों में सिमट गयी जिनमें चौक प्रथम श्रेणी की चावल वाली गली द्वितीय श्रेणी की तथा बिल्लौचपुरा तृतीय श्रेणी की वेश्यावृत्ति के लिये प्रसिद्ध रहा। यहाँ परे वेश्याओं का वर्गीकरण भी हुआ करता था वर्ग के आधार पर उनके देह व्यापार का मूल्य भी निर्धारित हुआ करता था। यहाँ विशेष अवसरों पर वेश्याओं को आमंत्रित भी किया जाता था। यह वेश्याएँ अपने शान शौकत से भी जानी जाती थी। बाजार, हाट, मेलों, पर्वो में मनोरंजन का खुले रूप में आयोजन भी करती थी। 1956 के वेश्यावृत्ति निरोधक कानून बनाए जाने के पश्चात इसके व्यवसायीकरण पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 1965-66 में कानूनी रूप में अपराध घोषित होने पर इस नगर में वेश्यावृत्ति का खुले रूप में बाजार बंद हो गया, किंतु छिपे तौर पर यथावत चलती रही। उसके क्षेत्रों में परिवर्तन हो गया। कुछ नये क्षेत्र भी इसी दौर में प्रकाश में आये। नगर के जानकीपुरम के निकट पहाड़पुर नामक स्थान वर्तमान में वेश्यावृत्ति के लिये जाना जाता है। मौखिक जानकारी के अनुसार लगभग 100 से 150 वेश्याएँ इस क्षेत्र में चोरी छुपे अपने देह व्यापार में संलग्न है।

वर्तमान में वेश्यावृत्ति नये रूप में उभर रही है। रेलवे स्टेशन में रेलवे पुलिस ने आठ कॉलगर्ल को अनैतिक स्थितियों में गिरफ्तार किया गया यह अश्लील हरकते करते हुए पकड़ी गयी। यह नगर के सभी क्षेत्रों से 25-35 आयु वर्ग की विवाहित जीवन व्यतीत करने वाली महिलाएँ थी, जो ग्राहकों को अड्डों तक ले जाती है। इसी प्रकार जीवन बीमा निगम के गेस्ट हाउस से छ: लोगों को देह व्यापार में लिप्त होने के अपराध में गिरफ्तार किया गया। यह होटलों के लिये अपना काम करती थी। इनके साथ पुरुष साथी भी है।

नगर में भोग विलास की संस्कृति और बढ़ती आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये वेश्यावृत्ति के विभिन्न नये रूप स्पष्ट दृष्टि गोचर होते हैं। अधिकांश वस्तुओं की सेल्समैन के रूप में नवयुवतियों को व्यापारी रखते हैं। इनमें 25 प्रतिशत को दोहरी जिंदगी जीना पड़ता है। इनमें से कुछ तो विवश होती है। कुछ का अपना शौक होता है और आवश्यकता होती है। इसी प्रकार कैसेट तथा वीडियो फिल्म बनाते हुए संपन्न घरों के लड़के-लड़कियों इस अनैतिक व्यापार में लिप्त होने की दशा में गिरफ्तार किये जाते हैं। ऐसे व्यापार में गिरफ्तार व प्रकाश में आने वाले प्रकम 2 प्रतिशत से अधिक नहीं होते हैं।

भारत में वेश्यावृत्ति के अन्य महत्त्वपूर्ण अध्ययन


1962 में टाटा स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज38 के द्वारा मुंबई की 350 वेश्याओं का एक अध्ययन डॉ. पुणेकरके निर्देशन में किया गया जिसमें पाया गया कि - (1) 32.29 प्रतिशत वेश्याएँ देवदासियां थीं। (2) वेश्याओं में से 79.43 प्रतिशत वेश्याएँ हिंदू 11.81 प्रतिशत मुसलमान, 6.75 प्रतिशत ईसाई तथा 2.11 प्रतिशत अन्य धर्मों की थी। हिंदुओं में भी 45.51 प्रतिशत वेश्याएँ महर, मंग ढेड तथा हरिजन जाति की थी (3) गैर देवदासी वेश्याओं में से 40.9 प्रतिशत अविवाहित हैं 28.27 प्रतिशत विधवा, 17.30 प्रतिशत घर से भगायी गयी स्त्रियाँ, 7.17 प्रतिशत परित्यक्ता, 5.91 प्रतिशत पति से पृथक की गयी, 0.42 प्रतिशत विवाहित थीं (4) इस अध्ययन प्रतिवेदन में 26 कारणों का उल्लेख किया गया। माता-पिता, पति संरक्षक की मृत्यु अथवा इनका दुर्व्यवहार, निर्धनता, दु:खी वैवाहिक जीवन, पति द्वारा विश्वास घात, तलाक, भगा ले जाने वंशानुगत रूप में यौन इच्छा, अवैध गर्भ ठहरने, जबरन यौन सम्बन्ध, अज्ञानता बदले की भावना पर्यावरण का प्रभाव आदि।

आल इंडिया मॉरल एंड सोशल हाइजिन ऐसोसियेशन ने 1949-50 में सभी राज्यों में उस समय वेश्यावृत्ति का पता लगाने का प्रयत्न किया। 10 राज्यों से प्राप्त सूचनाएँ इस प्रकार रहीं -

(1) 10 राज्यों में 3219 वेश्याएँ थीं, जिनमें 13530 वेश्याएँ थीं।

(2) इस व्यवसाय में आने की आयु औसत रूप में 10 से 29 वर्ष की थी।

(3) 66.5 प्रतिशत वेश्याएँ गाँवों से आयी, शेष नगरों से।

(4) गरीबी, बेकारी व पारिवारिक विघटन इसके महत्त्वपूर्ण कारण थे। 55.4 प्रतिशत स्त्रियों ने आर्थिक कारणों से 27.7 प्रतिशत घरेलू कारणों से तथा 16.9 प्रतिशत ने धार्मिक एवं सामाजिक कारण से वेश्यावृत्ति अपनायी थी।

27 मई 1990 के साप्ताहिक संडे मेल के अनुसार देश में 1990 में 20 लाख 86 हजार वेश्याएँ थी जिनमें से 3.80 महाराष्ट्र में 3.50 लाख पश्चिमी बंगाल में 2.50 लाख तमिलनाडु में 1.30 लाख बिहार में, 1.27 लाख उत्तर प्रदेश में, 1.25 लाख मध्य प्रदेश में, 75 हजार राजस्थान में मणिपुर व नागालैंड में पचास-पचास हजार, मिजोरम व अरुणाचल में 25-25 हजार वेश्याएँ थीं।

केंद्रीय सरकार द्वारा गठित एक कमेटी (Central Advisory Committee on Child Prostitution Aid 1994) में बाल वेश्याओं के बारे में अपनी एक रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें भारत के छ: महानगरों- मुंबई, कोलकाता, दिल्ली, चेन्नई, बंगलुरु एवं हैदराबाद में वेश्यावृत्ति सम्बन्धी अध्ययन के निष्कर्ष थे। इन महानगरों में सत्तर हजार से 1 लाख तक वेश्याएँ हैं। इनमें 45 प्रतिशत की आयु 16 से 18 वर्ष थी, 15 प्रतिशत की आयु 15 वर्ष थी, 94.6 प्रतिशत वेश्याएँ भारत की थीं तथा शेष नेपाल व बांग्लादेश की। 84.36 प्रतिशत हिंदू एवं शेष वेश्याएँ मुसलमान थी 86 प्रतिशत वेश्याएँ आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, पश्चिमी बंगाल, बिहार एवं उत्तर प्रदेश की थी। शेष अन्य राज्यों की 44 प्रतिशत ने आर्थिक कारण से 24.5 प्रतिशत ने पति द्वारा छोड़ देने से तथा 11.9 प्रतिशत ने धोखे में आकर यह व्यवसाय अपनाया।

14 राज्यों में निवास करने वाली 11,000 वेश्याओं का 1986 में एक सर्वेक्षण किया गया जिसमें पाया गया कि 75 प्रतिशत वेश्याओं को इस व्यवसाय के लिये मजबूर किया गया। इनमें से 33 प्रतिशत को उनके माता-पिता ने 12 को मित्र एवं समाजसेवी लोगों ने 19 प्रतिशत को दलालों ने इस कार्य के लिये विवश किया। 20 प्रतिशत ने यह नहीं बताया कि उन्हें वेश्यावृत्ति के लिये किसने प्रेरित किया।39

वेश्यावृत्ति से सम्बन्धित आंकड़े वहाँ उपलब्ध हो पाते हैं जहाँ वेश्यावृत्ति स्पष्ट रूप से व्यवसाय के रूप में प्रचलित है, किंतु अप्रकट व छिपे रूप में इस व्यवसाय से जुड़े लोगों का अनुमान लगाना कठिन होता है। प्रकट रूप की अपेक्षा अप्रकट रूप में जुड़ी हुई महिलाओं की संख्या अधिक है। वृद्ध तो इस व्यवसाय से जुड़ी हुई है, किंतु प्रकट रूप में वेश्यावृत्ति स्वीकार नहीं करती। उनके आंकड़े ले पाना कठिन होता है। हजारों स्त्रियाँ आर्थिक लाभ के लिये इस व्यवसाय से जुड़ी हुई हैं। ऐसी स्थिति में मानवता के नाम पर वेश्यावृत्ति में लगी स्त्रियों को मुक्त कराना आवश्यक है। क्योंकि वेश्यावृत्ति के दुष्प्रभाव व्यक्ति को ही नहीं पूरे समाज और देश के लिये गंभीर संकट है। वेश्यावृत्ति के दुष्प्रभावों को इस प्रकार देखा जा सकता है।

वेश्यावृत्ति के दुष्प्रभाव


किसी भी समाज के लिये वेश्यावृत्ति उचित नहीं है। यद्यपि कुछ लोगों की मान्यता है कि यह उन व्यक्तियों के लिये लाभकारी है जिनके पास यौन संतुष्टि का कोई वैध व अन्य विकल्प नहीं हैं। क्योंकि इसके अभाव में वे सामाजिक नियमों की अवहेलना करेंगे। इस आधारहीन तर्क को उचित नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि वेश्यावृत्ति से उत्पन्न दुष्प्रभाव समाज और व्यक्ति के लिये बहुत गंभीर होते हैं। इसके कारण व्यक्ति विभिन्न घातक रोगों से ग्रसित हो जाता है और समाज में उपेक्षा का शिकार होकर विभिन्न बुराइयों में फसता जाता है। वेश्यावृत्ति के दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं।

1. नारी जाति का अपमान - वेश्यावृत्ति नारी जाति के लिये एक कलंक है। नारी की सबसे बड़ी संपत्ति उसका शील एवं सतीत्व है। वेश्यावृत्ति करने वाली स्त्री अपने पवित्र गरिमामयी सतीत्व को धन की लालसा में बेच देती है। यह उसके लिये घृणास्पद एवं लज्जाजनक बात है।

2. वैयक्तिक विघटन - वेश्यावृत्ति से समाज में फूटन पड़ जाती है। एक तरफ वह स्त्री, जिसने इस व्यवसाय को अपनाया है उसके पास चरित्र और आत्मसम्मान जैसा कुछ भी नहीं बचाता उसे अनुचित एवं वैधानिक कार्यों को करने में संकोच नहीं होता है। वेश्यावृत्ति में फंसी स्त्रियों का उत्तरदायित्व न तो समाज के प्रति कुछ है और न परिवार के प्रति ही, इनका संपूर्ण जीवन अंदर ही अंदर घुलता रहता है।

वेश्यागामी पुरुष समाज में शराब, जुआ, चोरी सब कुछ कर सकता है। इन्हें न तो अपनी चिंता होती है। और न अपने परिवार की। इनके जीवन की संपूर्ण आय वेश्यावृत्ति में ही व्यय हो जाती है। यह समाज की दृष्टि में और स्वयं अपनी दृष्टि में इतने गिर जाते हैं, कि ये किसी कार्य में रूचि नहीं लेते, और न ही अपने उत्तरदायित्व को ही निभाते हैं। अत: स्त्री और पुरुष दोनों ही इस वृत्ति में फँस जाते हैं। उनके जीवन में घृणा, उपेक्षा, स्नेह और प्रेम का अभाव रहता है इसकी पूर्ति वेश्यावृत्ति से पूरी नहीं होती इसके अभाव में वह सबकुछ समाज विरोधी और अपने विरूद्ध करते रहते हैं। ये उनके व्यक्तित्व को नष्ट भ्रष्ट कर देते हैं।

3. पारिवारिक विघटन - वेश्यावृत्ति पारिवारिक जीवन के लिये खतरा है। जब स्त्री यौन दृष्टि से अपवित्र एवं अविश्वसनीय होती है तो तालाक की समस्या उत्पन्न हो जाती है। पति पत्नी में संघर्ष, मारपीट होने लगती है। पुरुष घर की संपत्ति वेश्यावृत्ति में उड़ाने लगता है। इससे घर की संपत्ति समाप्त होती है। बच्चों की दशा दयनीय हो जाती है। गुप्तांगों की बीमारियाँ माता-पिता से परिवारों में बच्चों को हस्तांतरित होती हैं और इससे परिवार में विघटन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

4. सामाजिक विघटन - वेश्यावृत्ति सामाजिक और सामुदायिक विघटन का कारण बनती है। इससे सामाजिक मूल्यों में गिरावट आती है। सामाजिक मूल्यों का संरक्षण करना कठिन हो जाता है। अपराधों में वृद्धि होती है।

5. नैतिक पतन - वेश्यावृत्ति के कारण नैतिक मूल्यों का पतन होता है। वेश्यावृत्ति में लगे स्त्री पुरुष दोनों का पतन होता है।

6. अपराधों में वृद्धि - वेश्यावृत्ति के साथ जुआ, चोरी, डकैती, अपहरण एवं हत्या आदि अपराध जुड़े हुए हैं। अपराधी वृत्ति के लोग भी वेश्यावृत्ति अपनाने वाली स्त्रियों के यहाँ शरण लेते हैं। कुछ वेश्याएँ भी इस प्रकार के अवैध व्यापारिक और अव्यावहारिक कार्यों से जुड़ी हुई है। इस प्रकार समाज में अपराधों की वृद्धि होती है।

7. आर्थिक हानि - वेश्यावृत्ति के दीवाने अपने परिवार के भरण-पोषण से विमुख होकर वेश्याओं के पीछे घर फूंक तमाशा देखने के लिये विवश हो जाते हैं। इस प्रकार वेश्यावृत्ति से आर्थिक क्षति होती है। अपव्यय बढ़ता है।

8. यौन रोग - वेश्यावृत्ति से स्त्री और पुरुष दोनों गुप्त यौन रोगों से ग्रसित हो जाते हैं। भयंकर गुप्तांगों की बीमारियाँ जैसे प्रमेह, गोनोरिया, उपदंश सुजाक, गुप्तांगों का कैंसर तथा एड्स जैसे जान लेवा रोगों से ग्रसित होकर अपना तथा अपने समाज के लिये भार बनते हैं। इनके अतिरिक्त डिसूरिया, ग्लीट एवं अति स्राव जैसे संक्रामक रोग लग जाते हैं।

9. माद्यपान की लत - वेश्यावृत्ति से प्रभावित व्यक्ति अपनी इच्छाओं की शांति के लिये तरह-तरह के मादक द्रव्य लेने लगते हैं। अपने परिवार के लिये कष्टदायक बनते हैं अपने स्वास्थ्य को खराब करते हैं। मद्यपान की आवश्यकता की पूर्ति के लिये अपराधों को बढ़ावा मिलने लगता है परिवार के लोगों का सुख चैन छिन जाता है।

वेश्यावृत्ति की रोकथाम


वेश्यावृत्ति जैसी घृणित सामाजिक बुराई को दूर करने के लिये भारत में प्राचीन काल से अनेक प्रयत्न किये जाते रहे हैं। हिंदू शास्त्रकारों ने इसको सीमित करने के लिये अनेक नियम बनाए। अंग्रेजों के शासनकाल में केशवचंद्र सेन, शिवनाथ शास्त्री तथा डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी जैसे समाज सेवकों ने इस समस्या को हल करने के लिये अनेक प्रयास किये। 1875 में ऑल इंडिया मॉरल एंड सोशल हाइजिन एसोसियेशन संस्था के द्वारा भारत में रहने वाली अंग्रेज सेना के लिये भारतीय व जापानी स्त्रियों को वेश्यावृत्ति के लिये बंद कर दिया गया।

1923 में भारतीय दंड विधान में परिवर्तन करके 21 वर्ष से कम आयु की किसी बालिका को भारत में आयात करना बंद कर दिया गया। 1923 में लीग ऑफ नेशंस ने भारत में वेश्यावृत्ति के अध्ययन के लिये एक परियोजना प्रारंभ की। इसके पश्चात समय-समय पर वेश्यावृत्ति के उन्मूलन के लिये विभिन्न प्रांतों द्वारा कानून बनाये गये हैं।

1956 में अखिल भारतीय स्तर पर स्त्रियों तथा कन्याओं पर व्यापार निरोधक अधिनियम (सप्रेशन ऑफ इम्मारल ट्रेफिक इन वीमेन एंड गर्ल्स एक्ट) बना जिसमें व्यक्तिगत वेश्यावृत्ति को अपराध माना गया है। वेश्यावृत्ति के नियंत्रण के लिये राज्यों को अधिकार दिये गये हैं।

इस कानून में वेश्यावृत्ति पर नियंत्रण पाने के लिये इस प्रकार की व्यवस्था की गयी -

1. जो व्यक्ति वेश्यालय चलाता है या उसके सम्बन्ध में सहायता देता है। उसे दो वर्ष का कठोर कारावास एवं 2000 रुपये तक का आर्थिक दंड दिया जाता है।

2. 18 वर्ष से अधिक आयु का व्यक्ति यदि वेश्या की आय पर जीवन-यापन करता है, वेश्यावृत्ति के लिये किसी लड़की का प्रयत्न करता है, या ऐसे कामों में सहायता करता है, तो उसे एक या अधिक वर्षों का कारावास तथा 1000 रुपये का आर्थिक दंड दिया जा सकता है।

3. कोई भी वेश्या जो सार्वजनिक स्थान से 200 गज के अंदर अपना पेशा करती है तो उसे दंड दिया जायेगा।

4. वेश्यावृत्ति के लिये उत्तेजित करना भी अपराध माना गया।

5. इस कानून का उल्लंघन करने वाले अपराधियों की देख रेख के लिये पुलिस अधिकारियों के देख-रेख की व्यवस्था की गयी।

6. वेश्याओं को सुरक्षा गृहों में शरण पाने का अधिकार दिया गया।

7. न्यायधीश किसी भी वेश्यालय का स्थान परिवर्तित कर सकता है।

8. बालिकाओं को सुरक्षा गृहों में रखने का अधिकार प्रदान किया गया।

वेश्यावृत्ति उन्मूलन हेतु सुझाव


1. निरोधात्मक कार्य -
(i) स्त्रियों को रोजगार पाने की शिक्षा दी जाए।
(ii) औद्योगिक और नैतिक प्रशिक्षण दिया जाए।
(iii) दहेज प्रथा जैसी समाज विरोधी बुराई को कानूनी तौर पर समाप्त किया जाए।
(iv) विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहन दिया जाए।
(v) समाज में स्त्री-पुरुषों के लिये दोहरे नैतिक मानदंडों को समाप्त किया जाए।
(vi) वेश्याओं के लिये रक्षाग्रहों की स्थापना की जाए तथा विधवा एवं अनाथ लड़कियों के लिये आश्रमों का प्रबंध किया जाए।
(vii) लोगों को यौन शिक्षा प्रदान की जाए तथा वेश्यावृत्ति से होने वाले जननेन्द्रिय रोगों का ज्ञान कराया जाए।
(viii) वेश्यावृत्ति से मुक्त होने के लिये वैचारिक परामर्श केंद्र स्थापित किये जाए।

2. निषेधात्मक कार्य
(i) वेश्याओं का चिकित्सकीय परीक्षण कराया जाए एवं रोग ग्रस्त वेश्याओं का उपचार कराया जाए तथा रोगी वेश्याओं को यौन सम्पर्क स्थापित करने से रोका जाए ताकि बीमारियां न फैल सकें

(ii) वेश्यालयों को धार्मिक शैक्षणिक एवं औद्योगिक स्थानों से दूर रखा जाए तथा क्रमश: बंद करने की दिशा में प्रयास किया जाए।

(iii) वेश्यावृत्ति करने वाले बीमार लोगों की चिकित्सा की जाए तथा उन्हें यौन रोगों से बचने के साधन प्रदान किए जाए।

3. वैधानिक कार्य -
वेश्यावृत्ति रोकने के लिये कानूनी कदम उठाए जाए एवं उन्हें लागू किया जाए, कानून को प्रभावी और सफल बनाने के लिये मध्यस्थों की भूमिका को समाप्त किया जाए।

4. अन्य सुझाव -
(i) जनता का सहयोग लिया जाए। इस बुराई को समाप्त करने के लिये जनता को सहयोग दिया जाए।

(ii) सामाजिक कार्यकर्त्ताओं का भी योगदान प्राप्त करना इस दिशा में महत्त्व का होगा।

(iii) वेश्याओं के पुनर्वास के लिये समाज कल्याण विभाग तथा धार्मिक एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं का सहयोग लिया जाए।

(iv) पारिवारिक संगठन बनाए रखने के लिये स्त्रियों के शोषण पर रोक लगायी जाए।

(v) मनोरंजन की उचित व्यवस्था की जाए।

(vi) यौन साहित्य एवं उत्तेजक फिल्मों पर रोक लगायी जाए।

(vii) नाचघरों में स्त्रियों की सदस्यता, एक निश्चित उम्र से कम की लड़कियों के क्लबों में प्रवेश, सार्वजनिक स्थलों पर अश्लील फैशन व तड़क-भड़क वाली वेशभूषा आदि पर नियंत्रण लगाया जाना चाहिए।

(viii) वेश्याओं और पुलिस के मध्य अनैतिक सम्बन्ध समाप्त किये जायें ताकि वेश्यालय चलाने वाले कानून की गिरफ्त से न बच सकें।

(ix) बाल शिक्षण का उचित प्रबंध किया जाए, उन्हें नैतिक शिक्षा देकर उचित-अनुचित का ज्ञान देकर वेश्यावृत्ति से बचाया जाए।

(x) माता-पिता या अध्यापक समिति का निर्माण किया जाए। यह समिति विद्यार्थियों की समस्याओं पर विचार करे तथा उसके निराकरण का उपाय सोंचे।

(xi) वेश्यावृत्ति से निकले हुए व्यक्तियों को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त हो।

आत्महत्या (SUCIDE)


आत्महत्या वैयक्तिक और सामाजिक सामंजस्य के अभाव का परिणाम है। प्रत्येक दिन सामाचार पत्रों पत्रिकाओं में हम आत्महत्या से सम्बन्धित समाचार पढ़ते रहते हैं। मुख्य तथा रोजगार के अवसरों का अभाव, औद्योगिक अज्ञानता, निरक्षरता एवं विवेक शक्ति तथा आत्मबल का अभाव आत्महत्या के मुख्य कारण है। आत्महत्या जैसी सामाजिक प्रघटना के लिये कुछ एक कारण ही नहीं है। बल्कि इसके लिये पारिवारिक विघटन, नगरीकरण औद्योगीकरण पद और कार्य में परिवर्तन जैसे अनेकों कारण आते हैं। जो व्यक्ति आत्महत्या करता है उसका समूह से बंधन टूट चुका होता है। प्राथमिक समूह जब अपने सदस्यों को एकता के समूह में पिरोने में असफल हो जाता है। ऐसी स्थितियों में भी आत्महत्याएँ की जाती हैं।

दुर्खीम का मत है कि सामूहिक जीवन के बंधन जब विघटित हो जाते हैं तो आत्महत्या की जाती है। कई व्यक्ति सामाजिक कारणों से भी आत्महत्या करते हैं। जैसे असाहय एवं लंबी रूग्णावस्था से परेशान होकर मानसिक दुर्बलता को आत्महत्या के लिये विशेषत: उत्तरदायी समझा जाता है।

आत्महत्या की समस्या विश्व के सभी देशों में पायी जाती है। इसका प्रचलन आदि काल से रहा है। यद्यपि सभी धर्मों में आत्महत्या की निंदा की गयी है। किंतु विशेष अवसरों पर विशेष कारणों से की जाने वाली आत्महत्या की प्रशंसा भी की जाती है। यही नहीं ऐसा करना वांछनीय भी माना जाता है। बौध धर्म में आत्महत्या को बुरा नहीं माना जाता। जैनधर्म में अन्न एवं जल का त्याग करके तपस्या के द्वारा शरीर त्यागने को गौरवपूर्ण माना जाता है।

हिंदुओं में पति के साथ सती होना एवं जौहर करना स्त्री के लिये सम्मान जनक माना जाता रहा है किंतु हमारे यहाँ व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये की गयी आत्महत्या को कायरता एवं पाप माना गया है। हिंदुओं में यह मान्यता है कि आत्महत्या करने वाला प्रेतयोनि में जन्म लेता है। उसकी आत्मा भटकती रहती है। उसे मोक्ष प्राप्त नहीं होता। समाधि लगाकर शरीर त्यागना अथवा समाज व देश के लिये प्राणों की बलि देना समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा है। रोम में आत्महत्या करना सम्मान जनक माना जाता रहा है। ईसाई धर्म के उदय से पूर्व तक आत्महत्या को बुराई के रूप में नहीं देखा गया, किंतु ईसाई धर्म में आत्महत्या की घोर निंदा की गयी है। जापान में पराजित सैनिक एवं उच्च वर्ग के लोग हराकीरी (आत्महत्या) कर लेते थे। निम्न वर्ग के लोग तथा दु:खी प्रेमी ‘शिंजु’ प्रकार की आत्महत्या कर लेते हैं। जब कोई व्यक्ति अपने प्रेमी के पास स्वर्ग में पहुँचना चाहता है तो ‘जुंशी’ प्रकार की आत्महत्या कर लेता है। आज भी सैनिक दुश्मनों के हाथों मरने की अपेक्षा आत्महत्या करना उचित मानते हैं। लगभग सभी देशों में सामाजिक एवं सामूहिक कारणों से की जाने वाली आत्महत्या प्रशंसनीय एवं सम्मान जनक मानी जाती रही है। किंतु व्यक्तिगत कारणों से की जाने वाली आत्महत्या निंदनीय और अपराध मानी जाती है। ऐसी आत्महत्या कायरता का प्रतीक है। आत्महत्या को वर्तमान में गैरकानूनी एवं अपराध घोषित किया गया है।

आत्महत्या की परिभाषा एवं प्रकृति


आत्महत्या एक ऐसी सामाजिक विकृति है। जिसमें व्यक्ति स्वयं ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेता है। इसके लिये अनेक सामाजिक, मानसिक एवं अन्य परिस्थितियाँ उत्तरदायी हैं। आत्महत्या की विभिन्न परिभाषाएँ इस प्रकार है -

एनसाक्लोपीडिया ब्रिटानिका40 के अनुसार ‘‘आत्महत्या स्वेच्छा पूर्वक और जानबूझकर की जाने वाली आत्महनन की क्रिया है।’’

रूथ कैवन41 के अनुसार ‘‘आत्महत्या अपने आप स्वेच्छा से जीवन लीला समाप्त करने हेतु अथवा मृत्यु द्वारा आतंकित होने पर अपने जीवन को बचाने में असमर्थता की प्रक्रिया है।’’

दुर्खीम42 के अनुसार आत्महत्या ऐसी सकारात्मक अथवा नकारात्मक क्रिया है। जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रत्येक स्थिति में मृत्यु के रूप में प्रतिफलित होती है। इस क्रिया का कर्ता स्वयं ही इस क्रिया के परिणाम का भक्ष्य बनता है। और उसे इस परिणाम का पहले ही ज्ञान रहता है।

इलियेट व मैरिल43 का मत है कि आत्महत्या व्यक्ति के विघटन का दुखद तथा अपरिवर्तनशील अंतिम परिणाम है। यह व्यक्ति के दृष्टि कोणों में होने वाले उन क्रमिक परिवर्तनों का अंतिम परिणाम है। जिनमें व्यक्ति के मन में जीवन के प्रति अगाध प्रेम के स्थान पर जीवन के प्रति घृणा उत्पन्न हो जाती है।

मावरर आत्महत्या को वैज्ञानिक विघटन के रूप में स्वीकार नहीं करते। उनका मत है कि आत्महत्या में व्यक्ति स्वयं को समाप्त करने की इच्छा रखता है। साथ ही दूसरों का ध्यान सहानुभूति तथा उन पर नियंत्रण भी प्राप्त करना चाहता है।

परिभाषाओं के विश्लेषण से यह निष्कर्ष आते हैं कि आत्महत्या एक ऐसी प्रक्रिया है। जिसमें व्यक्ति स्वेच्छा से अपने विचारों के अनुरूप अपने आप को समाप्त करता है।

आत्महत्या के कारण सभी के लिये एक जैसे नहीं होते हैं। फ्रायड आत्महत्या के लिये हीन भावना, घृणा एवं निराशा को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। मार्टिन गोल्ड का मानना है कि जो बचपन से शारीरिक दंड एवं यातना अधिक भुगतते हैं, वे दूसरों पर क्रोध करते हैं और मानसिक रूप से कष्ट भुगतने वाले स्वयं पर अधिक क्रोध करते हैं। यही कारण है कि निम्न वर्ग के लोग अधिक आत्महत्याएँ करते हैं। हाबवाच का मत है कि नगरीय जीवन ही वैयक्तिक विघटन एवं आत्महत्या के लिये उत्तरदायी है। हेनरी और शार्ट का मत है कि आर्थिक कारण वैयक्तिक विक्षिप्तता उत्पन्न करते हैं। विक्षिप्त अवस्था व्यक्ति में आक्रामक व्यवहार उत्पन्न करती है और यही स्थितियाँ आगे चलकर आत्महत्या का कारण बन जाती है। जिलबुर्ग की मान्यता है कि जो व्यक्ति तीव्र आक्रमणकारी उत्तेजनाओं का शिकार होते हैं वे सामाजिक नियंत्रण एवं दबाव के कारण अपनी उत्तेजनाओं को अभिव्यक्त नहीं कर पाते और न ही उत्तेजना के प्रभाव से बच पाते हैं इस दशा में आत्महत्या कर बैठते हैं। फेलरेट का मत है कि व्यक्ति में अत्याधिक उद्वेग होने पर उनकी विचार शक्ति समाप्त हो जाती है। यही स्थिति आत्महत्या के लिये उत्तरदायी है। विलियम्स आत्महत्या के लिये भय, घृणा, वैमनस्य अपर्याप्तता एवं अत्याधिक अपराधी भावना को उत्तरदायी ठहराते हैं।44

आत्महत्या के कारण


आत्महत्या के लिये अनेक सामाजिक, वैयक्तिक, पारिवारिक, भौगोलिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सामुदायिक परिस्थितियाँ उत्तरदायी हैं। भारत जैसे देश में आत्महत्या के कारण गरीबी, बेकारी, शारीरिक व्याधि, प्रेम में असफलता, धार्मिक प्रथाएँ एवं रीति रिवाज, राजनीतिक उथल-पुथल, पारिवारिक संघर्ष, जाति से बहिष्कार, मानसिक तनाव, उद्वेग आदि है। यहाँ गाँवों की तुलना में शहरों में तथा स्त्रियों की तुलना में पुरुषों में एवं बूढ़े तथा बच्चों की तुलना में युवा लोगों में आत्महत्या की दर ऊँची है। आत्महत्या के प्रमुख कारण निम्नलिखित है।

(i) वैयक्तिक कारक -


कई विद्वान आत्महत्या को वैयक्तिक घटना मानते हैं। अत: वे इसके लिये शारीरिक और मानसिक दोषों को उत्तरदायी मानते हैं। प्रमुख वैयक्तिक कारक इस प्रकार हैं -

1. शारीरिक दोष - शारीरिक दृष्टि से पायी जाने वाली कमियाँ जैसे लंगड़ा अपाहिज होना, अपंग, बहरा या अंधा होना हकलाना या कुरूपता आदि व्यक्ति में हीन भावना पैदा करती है और व्यक्ति आत्महत्या कर बैठता है।

2. शारीरिक व्याधियाँ - भयंकर शारीरिक व्याधियाँ जैसे कुष्ठ रोग, क्षय कैंसर, लंबी बीमारी, कष्टप्रद रोग एवं गुप्तांगों की बीमारियाँ आदि भी व्यक्ति को आत्महत्या करने को प्रेरित करती है।

3. मानसिक विकार - कई प्रकार के मानसिक तनाव एवं विकार जैसे चिंता, अत्यधिक भय स्नायु तनाव, मानसिक अस्थिरता, हीनभावना, निराशा, भावुकता, क्रोध एवं समर्पण शीलता आदि भी व्यक्ति को आत्महत्या करने को प्रोत्साहित करते हैं।

4. पारिवारिक विसंगति - जब व्यक्ति को पारिवारिक संघर्ष और तनाव से गुजरना पड़ता है तो उसका संतुलित जीवन बिगड़ जाता है और पुन: अनुकूल न कर पाने की स्थिति में वह आत्महत्या करके जीवन से मुक्ति पा लेता है अत्यधिक काम वासना होने, अपराधी क्रियाओं में लगे होने, अत्यधिक शराब पीने, अन्य मादक द्रव्यों का सेवन करने, जुआ खेलने एवं वेश्यावृत्ति करने वाले व्यक्ति इसी कारण से आत्महत्या कर बैठते हैं।

(ii) पारिवारिक कारक


जब व्यक्ति का पारिवारिक जीवन संघर्षमय एवं तनावपूर्ण होता है, तो परिवार का व्यक्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति की शांति एवं सुरक्षा भंग हो जाती है। उसके व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं हो पाता और ऐसा परिवार विघटित व्यक्ति को जन्म देता है। वे पारिवारिक स्थितियाँ जो व्यक्ति को आत्महत्या करने के लिये प्रेरित करती हैं, इस प्रकार हैं -

1. टूटते परिवार - माता पिता की मृत्यु होना, पति पत्नी का परित्याग एवं तलाक होने अथवा उनमें मेल न खाना आदि की स्थिति में व्यक्ति पर सामाजिक नियंत्रण शिथिल हो जाता है। व्यक्ति अकेलापन महसूस करता है और आत्महत्या कर बैठता है। यही कारण है कि विधवा या विधुर व्यक्ति, परित्यक्त एवं तलाक शुदा व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की तुलना में अधिक आत्महत्या करते हैं।

2. पारिवारिक कलह - जिन परिवारों में लगातार संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती रहती है यथा पति-पत्नी, भाई, माता पिता, सास बहू आदि में कलह होने पर परिवार का नियंत्रण एवं अनुशासन समाप्त हो जाता है। ऐसे परिवार के सदस्य आत्महत्या अधिक करते हैं।

3. दाम्पत्य जीवन में असामंजस्य - पति पत्नी में से कोई भी एक दूसरे से सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाने की स्थिति में मानसिक तनाव, घृणा, क्रूरता, क्रोध आदि से ग्रस्त रहता है जिससे आत्महत्या करके छुटकारा प्राप्त किया जाता है।

4. रोमांस - प्रेम एवं रोमांस में असफल होने अथवा जिस व्यक्ति को वह अत्यधिक प्यार करता है और किसी कारण से उससे विवाह करने में असफल हो जाता है या प्रेमी प्रेमिका में से कोई एक दूसरे से विश्वासघात कर देता है तब भी व्यक्ति आत्महत्या कर बैठता है। वर्तमान में आत्महत्या की अधिक घटनाएँ विशेषकर नगरीय क्षेत्रों में इसी रूप में होती है।

5. दुर्व्यवहार - सौतेली माँ का बच्चों के प्रति भेदभाव पूर्ण व्यवहार, सास का बहु के प्रति दुर्व्यवहार पति द्वारा पत्नी के साथ मार पीट करने उसके भरण पोषण की व्यवस्था न करने तथा अमानवीय व्यवहार करने आदि की स्थितियाँ भी आत्महत्या के लिये उत्तरदायी है।

(iii) सामाजिक कारक
दुर्खीम आत्महत्या को एक सामाजिक घटना मानते हैं। और वे इसके लिये सामाजिक कारकों को ही उत्तरदायी मानते हैं। आत्महत्या के लिये उत्तरदायी प्रमुख सामाजिक कराक इस प्रकार है -

1. दोषपूर्ण समाजीकरण - व्यक्ति का समाजीकरण करने वाली अनेक सामाजिक संस्थाएँ है जिनमें परिवार, पड़ोस, क्लब, मित्र मंडली, शिक्षण संस्थाएँ, मनोरंजन प्रदान करने वाली संस्थाएँ प्रमुख है। वर्तमान में इन संस्थाओं में अनेक विकार उत्पन्न हो गए हैं। परिणाम स्वरूप व्यक्ति में निराशा, असहिष्णुता, अत्यधिक भावुकता एवं क्रोध घर कर जाते हैं। यह अपर्याप्त सामाजीकरण की प्रवृत्ति व्यक्ति को आत्महत्या के लिये प्रेरित करता है।

2. सामाजिक कुरीतियाँ - भारत संस्कारित संस्कृति वाला देश है। कुछ संस्कार आज इस रूप में समाज में प्रचलित है कि लोग उनका निर्वाह नहीं कर पाते और आत्महत्या कर बैठते हैं। दहेज, मृत्युभोज, विधवा विवाह का अभाव, जैसी कुरीतियाँ आत्महत्या के लिये विवश करती हैं। दहेज के कारण माता-पिता अपनी लड़कियों का विवाह नहीं कर पाते हैं, और मानसिक संतुलन खो देते है। इसी प्रकार लड़कियाँ माता पिता की दशा को देखकर चिंता ग्रस्त होती है। विधवा विवाह या पुनर्विवाह न हो पाने के कारण समाज में अपमानित या दोषों के लगाए जाने से भी आत्महत्या के लिये लोग विवश होते हैं।

3. पद की हानि - किसी आर्थिक क्षति या व्यावहारिक कारणों से जब व्यक्ति की मान प्रतिष्ठा को ठेस लगती है, तब वह आत्मलानी एवं हीन भावना से ग्रस्त होकर आत्महत्या के लिये विवश हो जाते हैं।

4. सामाजिक विघटन - सामाजिक समस्याओं की अधिकता के विशेषकर युद्ध आदि के समय सामाजिक एवं सामुदायिक विघटन उत्पन्न हो जाता है। और उसे पुन: अनुकूल स्थितियाँ नहीं मिल पाती है। ऐसी दशा में भी लोग आत्महत्या कर लेते हैं।

(iv) आर्थिक कारक
विभिन्न प्रकार की आर्थिक विषमताएँ एवं परिस्थितियाँ भी आत्महत्या को जन्म देती है -

1. निर्धनता - गरीबी की स्थितियों में व्यक्ति अपने परिवार एवं आश्रितों की आवश्यकता पूरी नहीं कर पाता गरीबी के कारण उसे अनेक इच्छाओं का दमन करना पड़ता है। वह हीन भावना से ग्रस्त हो जाता है। ये सभी स्थितियाँ जब व्यक्ति के लिये असह्य हो जाती है तो वह आत्महत्या कर लेता है।

2. बेकारी - जब व्यक्ति जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाता है। परिवार जनों का भरण पोषण न कर पाने में अपने आप को दोषी समझने लगता है, अपने आपको दूसरों का भार समझने लगता है तब वह इन समस्याओं से मुक्ति पाने के लिये आत्महत्या कर लेता है।

3. धार्मिक स्वीकृति - हिंदू इस्लाम व कैथोलिक धर्मों में आत्महत्या को पाप माना गया है और आत्महत्या से बचने का आदेश दिया गया है। दूसरी ओर प्रोटेस्टेण्ट धर्म में स्वतंत्रता अधिक है। वह समूहवाद के स्थान पर व्यक्तिवाद पर जोर देता है। इसलिये अन्य धर्मावलम्बियों की तुलना में प्रोटेस्टेण्ट धर्म के लोग अधिक आत्महत्या करते हैं।

(v) भौगोलिक कारक
यद्यपि भौगोलिक कारकों का आत्महत्या से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है किंतु ये व्यक्ति में संवेग, मानसिक तनाव आदि को जन्म देते हैं जो आत्महत्या के लिये उत्तरदायी हैं। बाढ़, भूकम्प, अकाल, अतिवृष्टि अनावृष्टि, भूमि की अनुत्पादकता एवं मौसम का दुष्प्रभाव लोगों के संगठित एवं सुव्यवस्थित जीवन को नष्ट कर देता है यह असंतुलन आत्महत्याओं को बढ़ाने में योग देता है।

(vi) नगरीकरण
सोरोकिन एवं जिमरमैन ने आत्महत्या के लिये नगरीकरण को उत्तरदायी माना है। नगरों में व्यक्तिवादी संस्कृति की अधिकता एवं सामुदायिक भावना का अभाव पाया जाता है। नगरों की गंदी बस्तियाँ, दूषित वातावरण एवं अकेलापन आत्महत्या के लिये उत्तरदायी है। दुर्खीम की मान्यता के अनुसार गाँवों की अपेक्षा नगरों में आत्महत्याएँ अधिक होती है।

(vii) मनोवैज्ञानिक कारक
आत्महत्या के लिये अनेक मनोवैज्ञानिक कारक जैसे अत्यधिक क्रोध, भावुकता मानसिक बीमारियाँ, चिंता उन्माद, मानसिक दुर्बलता, संवेगात्मकता, कुंठा निराशा एवं अत्यधिक संवेदनशीलता आदि उत्तरदायी है।

सभी कारकों के अतिरिक्त युद्ध, मद्यपान, परीक्षा में असफलता स्थान परिवर्तन आदि भी आत्महत्या को बढ़ावा देते हैं। युद्ध के समय सैनिकों एवं नागरिकों में साधारण दिनों की अपेक्षा अधिक आत्महत्या करने की प्रवृत्ति पायी गयी हैं। प्रेम में असफलता तथा परीक्षा में असफलता की दशा में आत्महत्या अधिक की जाती है। स्पष्ट है आत्महत्या एक जटिल तथ्य है, जिसके लिये कई परिस्थितियाँ उत्तरदायी हैं।

लखनऊ महानगर में आत्महत्याएँ


वर्तमान में जनसंख्या औद्योगीकरण और नगरीकरण की वृद्धि हुई है। भारत में 1973 में 40,807, 1979 में 38,217, 1980 में 41663 और 1994 में 89195 लोगों ने आत्महत्या की राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार आत्महत्या की वृद्धि दर 6.2 प्रतिशत है जबकि जनसंख्या वृद्धि दर 2.1 प्रतिशत प्रतिवर्ष है।45 राज्यों की दृष्टि से सर्वाधिक आत्महत्याएँ पश्चिमी बंगाल में (7057) दर्ज की गयी। उसके बाद कर्नाटक (5759) तमिलनाडु में (4809) केरल (3813) आदि राज्य आते हैं। आत्महत्याओं के सबसे कम मामले मणिपुर (12) नागालैंड (13) में रही। महानगरों में आत्महत्या की संख्या इस प्रकार रही अहमदाबाद 232, बंगलौर 936, मुंबई 202, कोलकाता 23, दिल्ली 255, हैदराबाद 87, कानपुर 143 तथा मद्रास 263 है। इस प्रकार अध्ययन के विभिन्न पक्षों में यह भी लिया गया कि किन-किन कारणों से लोगों ने आत्महत्या की। इसमें पाया गया कि 13 प्रतिशत लोगों ने भयानक बीमारी से ऊबकर आत्महत्या की। 7.6 प्रतिशत ने ससुराल वालों से झगड़ा होने, 5.4 प्रतिशत ने यौन सम्बन्धों, 5 प्रतिशत ने पति पत्नी के झगड़ों, 1.7 प्रतिशत ने परीक्षा में असफलता, 2.8 प्रतिशत ने गरीबी, 3.2 प्रतिशत ने पागलपन, 2.7 प्रतिशत ने संपत्ति सम्बन्धी झगड़ा होने, 1.7 प्रतिशत ने बेकारी बदनामी, दिवाला आदि कारणों से आत्महत्या की। 54.6 प्रतिशत ने अन्य कारणों से आत्महत्या की। आत्महत्या करने वालों में 58.1 प्रतिशत पुरुष और 41.9 प्रतिशत महिलाएँ थीं। सर्वाधिक आत्महत्या 28.4 प्रतिशत 30-35 वर्ष की आयु में की गयी। आत्महत्या जहर खाकर, पानी में डूबने, फांसी लगा लेने एवं तेल छिड़क कर आग लगा लेने की विधियों का प्रयोग अधिक होता है। पारिवारिक कलह, सास ससुर एवं पति पत्नी के झगड़े, दहेज की मांग, विधवा पुनर्विवाह का अभाव आदि स्त्रियों में आत्महत्या के प्रमुख कारण है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में प्रतिदिन 1 हजार लोग आत्महत्याएँ करते हैं जिनमें 110 भारत में होती है। वर्तमान में यहाँ प्रत्येक छह मिनट में एक आत्महत्या होती है। संगठन के अनुसार भारत में इस समय प्रतिवर्ष 89 हजार से भी अधिक व्यक्ति आत्महत्याएँ करते हैं। भारत में प्रति 6 मिनट में एक आत्महत्या होती है। महिलाओं में से विवाहित महिलाओं में 20 से 29 वर्ष के मध्य आत्महत्याएँ अधिक होती है। आत्महत्याओं के लिये सर्वाधिक उत्तरदायी दहेज और पारिवारिक झगड़े हैं।

राजधानी लखनऊ में खुद अपनी जिंदगी खत्म करने वालों का प्रतिशत देश के प्रमुख नगरों में से कहीं सबसे आगे है। पुलिस विभाग के द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार प्रत्येक दिन कोई न कोई जिंदगी से ऊबकर जान दे रहा है। मई 1996 में आत्महत्या करने वालों की कुल तादाद 29 थी, जून 1996 में बढ़कर 37 हो गयी और जुलाई 1996 में आत्महत्या करने वालों की संख्या 39 हो गयी। किंतु यह आंकड़ें पुलिस फाइलों में नहीं है। पुलिस विभाग के आंकड़ों के अनुसार आत्महत्या के कारणों पर ध्यान नहीं दिया गया बल्कि आत्महत्या किस प्रकार की गयी यह बात अधिक महत्त्व की रही। यहाँ आत्महत्या के पाँच प्रकार लिये गए, जिसमें फांसी, नशीली दवाएँ, पानी में डूबकर मरना, ट्रेन से कटकर मरना, आग लगाकर मरना आदि। इसके अतिरिक्त, ऊँचाई से कूद कर मरना, गोली मार लेना आदि द्वारा भी लोग खुदकुशी करते हैं।

दैनिक जागरण, लखनऊ 10 अगस्त के एक सर्वेक्षण में दयाशंकर शुक्ल ने प्रकाशित किया कि वर्ष 1996 के मई, जून और जुलाई महीनों में आत्महत्या की ज्यादातर वारदातें पारिवारिक उलझनों के चलते हुई। एक विश्लेषण के अनुसार इस अवधि में 55 प्रतिशत लोगों ने अपनी घरेलू जिंदगी से ऊबकर आत्महत्या की, जबकि 32 प्रतिशत आत्महत्याएँ मानसिक या किसी अन्य बीमारी से परेशान होकर की। बेरोजगारी और खराब आर्थिक स्थिति से निराश होकर खुदकुशी करने वालों का प्रतिशत 5 था। 8 प्रतिशत आत्महत्याओं के कारण स्पष्ट नहीं हो सके। जिंदगी से परेशान लोगों में सबसे अधिक 60 प्रतिशत आत्महत्याएँ नींद की गोली खाकर की गयी। 25 प्रतिशत लोगों ने फांसी लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त की। आत्महत्या करने वालों में 5 प्रतिशत लोग गोमती में डूबकर मरें। इनमें 10 प्रतिशत लोग अन्य प्रकार से आत्महत्या की।

अध्ययन के अन्य पहलू में यह तथ्य सामने आये कि राजधानी में अधिकतर आत्महत्यायें कम उम्र के लोगों की थी। अध्ययन में पाया गया कि 18 वर्ष से कम आयु के 17 प्रतिशत लोगों ने आत्महत्या की जब कि 18 से 30 आयु वर्ग के 58 प्रतिशत, 30 से 40 आयु वर्ग के 20 प्रतिशत, व 40 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के 20 प्रतिशत व 40 वर्ष से अधिक आयु के केवल 5 प्रतिशत लोग थे। इस प्रकार स्पष्ट रूप से यह बात सामने आती है कि युवाओं में आत्महत्याओं की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। आत्महत्या की दर में 300 गुना की वृद्धि हुई। संजीवनी पत्रिका के निदेशक के अनुसार 17 से 39 वर्ष के लोग अधिक आत्महत्या करते हैं।

तालिका 6.7 लखनऊ महागर में आत्महत्याओं की संरचना तालिका - 6.7 में देखने पर पता चलता है कि वर्ष 1998 और 1999 में आत्महत्याओं की स्थिति लगभग समान रही। पुरुष और महिलाओं की दशा पर विचार किया जाए तो पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ आत्महत्या करने में पीछे हैं। वर्ष 1998 में लगभग 62 प्रतिशत पुरुषों ने आत्महत्या किया जबकि महिलाओं का प्रतिशत 36 रहा जो पुरुषों से लगभग 28 प्रतिशत कम है। इसी प्रकार वर्ष 1999 में 60 प्रतिशत पुरुषों ने आत्महत्या की जबकि महिलाओं का प्रतिशत 40 ही रहा। यहाँ पर आत्महत्या करने के प्रकार पर भी विचार करना आवश्यक है। तालिका देखने से पता चलता है कि गले में फंदा डालकर मरने वालों की संख्या अधिक है। वर्ष 1998 में गले में फंदा डालकर मरने वाले पुरुषों की संख्या महिलाओं की अपेक्षा दो गुनी है। 1998 में पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ फांसी लगाकर मरने में आगे है। दूसरी स्थिति है नशीली या जहरीली दवाएँ खाकर आत्महत्या करने वालों की है। वर्ष 1998 में महिलाओं की संख्या से पुरुषों की संख्या लगभग 7 गुना अधिक है। वर्ष 1999 में दोगुना है, तीसरी दशा है पानी में डूबकर मरने वालों की यहाँ भी महिलाओं की संख्या पुरुषों से पीछे है। यहाँ पर एक बात यह भी स्पष्ट होती है कि पानी में डूबकर मरने की घटनाएँ गोमती नदी में ही होती है।

आत्महत्या का निवारण करना एक कठिन उपाय है। सामाजिक एवं वैयक्तिक विघटन के अन्य रूपों में सुधार की सम्भावना बनी रह सकती है, किंतु आत्महत्या एक ऐसी चरम अभिव्यक्ति है, जिसमें व्यक्ति आत्महत्या करके स्वयं को समाप्त कर लेता है तो ऐसी दशा में सुधार किसमें किया जाए। पारिवारिक सुख में वृद्धि करके तथा व्यक्तित्व एवं राष्ट्र के निर्माण के लिये आवश्यक है कि व्यक्ति को सबल बनाया जाए और उसे आत्महत्या से रोका जाए। आत्महत्या पर नियंत्रण कानून बना देने या समझाने बुझाने से नहीं हो सकता। बल्कि इसके लिये ऐसी आवश्यकता है कि व्यक्ति में जीवन के प्रति अगाध प्रेम पैदा हो जाए। वह मृत्यु के बजाए जीवन को महत्त्वपूर्ण समझे।

आत्महत्या के निवारण के लिये प्रयास


1. सामाज में व्याप्त आर्थिक विषमता को दूर किया जाना चाहिए।

2. व्यक्ति को निर्धनता तथा बेकारी से छुटकारा दिलाना चाहिए।

3. आत्महत्या करने वाले व्यक्ति का मानसिक विश्लेषण कर उसकी मानसिक चिकित्सा की जाए।

4. वैयक्तिक एवं पारिवारिक समस्याओं का निदान किया जाए जो आत्महत्या के लिये प्रेरित करती है।

5. जो धार्मिक रूढ़िया एवं प्रथाएँ आत्महत्या के लिये प्रेरित करती है उन्हें समाप्त किया जाए।

6. पर्यावरण सम्बन्धी दोषों को दूर किया जाए।

7. परिवार एवं समाज में सब एक दूसरे से सहानुभूति एवं उदारता का व्यवहार बनाकर आत्महत्या को निश्चित रूप से नियंत्रित कर सकते हैं। आत्महत्या करने वाला व्यक्ति दयनीय स्थिति में रहता है। उसे प्रेम एवं सहानुभूति की आवश्यकता होती है। परिवार, पड़ोस, रिश्तेदारों एवं मित्रों सभी से उसे प्रेम एवं सहानुभूति मिलने पर आत्महत्या रोकी जा सकती है। आत्महत्या को दंडनीय अपराध घोषित करने से इस समस्या का समाधान नहीं है।

8. पारिवारिक लोग एक दूसरे की मनोदशा को समझकर सामयिक व्यवहार का ध्यान रखें।

9. आध्यात्मिक ज्ञान और ईश्वर में विश्वास की भावना भी आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध पर नियंत्रण करने में समर्थ है।

10. बीमारी की दशाओं में चिकित्सा की उत्तम व्यवस्था देने का पूरा प्रयास करना चाहिए।

11. आवेश के क्षणों को टालना आत्महत्या की दर में नियंत्रण ला सकता है।

12. क्षुब्ध या आवेश की दशा में व्यक्ति को अकेले न छोड़ा जाए।

13. गम्भीरता का जीवन व्यतीत करने वालों के जीवन में मनोवैज्ञानिक प्रभाव से परिवर्तन लाया जाए।

बाल अपराध (JUVENILE DELINQUENCY)


बच्चे का नटखटपन एक सार्वभौमिक सत्य है किंतु यह नटखटपन समाज की मान्यताओं को भंग करने लगता है तो वह अपराध की संज्ञा से संबोधित किया जाता है। आयु स्तर के अनुसार बालकों में अपराधी प्रवृत्ति बढ़ती जाती है और उसमें अंतर भी आता है। झूट बोलना, डींग मारना, अपनी शेखी बघारना, धोखा देना, ठगी करना, चोरी करना, तोड़ फोड़ करना, दूसरे साथियों को डराना, स्कूल से भागना, घर से भागना, छिपना आदि विभिन्न रूपों में बालकों की अपराधी प्रवृत्ति देखी जाती है। बाल अपराध को समाज शास्त्रियों ने विभिन्न रूपों में परिभाषित किया है -

सेठना46 के अनुसार ‘‘बाल अपराध के अंतर्गत किसी बालक या ऐसे तरुण व्यक्ति के गलत कार्य आते हैं जो सम्बन्धित स्थान के कानून (जो उस समय लागू हो) के द्वारा निर्दिष्ट आयु सीमा के अंतर्गत आते हैं।’’

न्यूमेयर47 के अनुसार, ‘‘एक बाल अपराधी निर्धारित आयु से कम आयु का वह व्यक्ति है जो समाज विरोधी कार्य करने का दोषी है और जिसका दुराचरण कानून का उल्लंघन है।’’

फ्राइडलैण्डर48 के अनुसार, ‘‘बाल अपराधी वह बच्चा है जिसकी मनोवृत्ति कानून को भंग करने वाली हो अथवा कानून को भंग करने का संकेत करती हो।’’

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि राज्य द्वारा निर्धारित आयु समूह के बच्चे द्वारा किया गया कानून विरोधी कार्य बाल अपराध है। केंद्र ने 1986 में बाल न्याय अधिनियम, 1986 (Juvenile Justice Act 1986) पारित किया जिसमें 16 वर्ष तक की आयु के लड़के लड़कियों को अपराध करने पर बाल अपराधियों की श्रेणी में सम्मिलित किया गया है।

बाल अपराध के कारण


1. पारिवारिक कारण - परिवार की आर्थिक स्थितियों, शैक्षिक स्तर, नैतिकता आदि का बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। परिवार बच्चे की प्रथम पाठशाला है परिवार के व्यवहार और गुणों का बच्चे पर स्थायी प्रभाव पड़ता है। अत: अपराधी प्रवृत्ति भी बालक में पारिवारिक कारणों से उत्पन्न होती है। गोडार्ड, रिचार्ड, डुग्डेल एवं इस्टा ब्रूक ने अपने-अपने अध्ययन से स्पष्ट किया कि शारीरिक रूप से क्षत विक्षत परिवारों की सभी पीढ़ियाँ अपराधी थी, अत: अपराध वंशानुक्रमणजनित है। परिवार के सदस्य की मृत्यु हो जाना, बीमार रहना, तलाक, पृथक्करण, मनमुटाव, मानसिक संघर्ष में रहने वाले परिवार के अध्ययन में हंसा सेठ, कारसैंडर्स, बेजहाट, सुलेंज, मेंहीम, ग्लूक एवं कुमारी इलियेट ने पाया कि बाल अपराधियों की संख्या टूटे परिवारों से आती है। इसके अतिरिक्त पारिवारिक लोगों का अपराधी होना, सौतेले माता पिता, पक्षपात, दोषपूर्ण अनुशासन, गरीबी, बच्चों का तिरस्कार, भीड़युक्त परिवार बाल अपराधियों को जन्म देते हैं।

2. व्यक्तिगत कारण - बाल अपराध की प्रवृत्ति शारीरिक विकारों, कमजोर दृष्टि, बहरापन, अशुद्ध उच्चारण, अस्थि विकलांगता कमजोरी, बीमारी आदि कारणों से बालक में उत्पन्न हो जाती है। मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों ने मानसिक असामान्यताओं को बाल अपराध के लिये दोषी माना है। अधिकांश बाल अपराधियों में अपराधी भावना के लिये स्कूल के प्रति अनिच्छा, भेदभाव की भावना तथा भाई बहनों एवं खेल प्रेमियों के प्रति असंतोष आदि उत्तरदायी थे।

3. सामुदायिक कारक - बालक जिस समुदाय में रहता है यदि उसका वातावरण उपयुक्त नहीं है तो बालक अपराधी बन सकता है। गरीबी निम्न आर्थिक व सामाजिक दशा की सूचक है। पारिवारिक व सामुदायिक स्रोतों के अभाव में तथा खेल के मैदानों में घरों की अनुचित व्यवस्था के कारण अपराध पनपते हैं गंदी बस्तियों में अपराधी प्रवृत्ति के अधिक बालक पाये गए। उचित मनोरंजन के अभाव में बाल अपराध की दर बढ़ती है खाली समय में स्कूल जाने की तुलना में अधिक बाल अपराध की घटनाएँ घटित होती हैं। विद्यालय का अनुपयुक्त वातावरण, अध्यापकों का व्यवहार, अध्यापकों की प्रभाव हीनता, अध्यापक के घर का संघर्ष, असुरक्षा बीमारी, गृहकार्य की अधिकता, तनाव दबाव का वातावरण बालक के कोमल मस्तिष्क को प्रभावित करता है।

अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के मध्य निवास की स्थितियों में भी बालक का कोमल मन दूषित होता है। नगरों के केंद्रों एवं व्यापारिक क्षेत्र में अपराध अधिक होते हैं। जैसे-जैसे नगर से बाहर की ओर चलते हैं अपराध कम होते जाते हैं। आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की निकटता अपराध की प्रवृत्ति को सीखने में मदद करती है। युद्ध संघर्ष के वातावरण में बाल अपराध बढ़ते हैं। युद्ध की स्थितियों में भोजन, आवास, पालन पोषण की समस्याएँ बाल अपराध को बढ़ाती हैं। समाज विरोधी वातावरण, सांस्कृतिक भिन्नता, संघर्ष, जातीय व्यवस्था, नैतिक पतन, स्वच्छंदता की वृत्ति, आर्थिक मंदी, अवारागर्दी एवं भगोड़ापन जैसे आमाजिक कारण बालक को अपराधी बनाने में योग देते हैं। नगर के बाल अपराध की स्थितियों का प्रतीकात्मक अध्ययन करने का एक प्रयास यहाँ किया गया है।

लखनऊ महानगर में बाल अपराध की स्थितियाँ


नगरीय सामाजिक पर्यावरण में बाल आपराधिक प्रवृत्तियों का खुले रूप में कहीं भी लेखा-जोखा नहीं संकलित किया गया है। अधिकांश स्थितियों को मौखिक रूप में आपसी परामर्श या समझौते के आधार पर निपटा लिया जाता है। कुछ बालक आपराधिक प्रवृत्तियाँ ऐसी हैं जिनके आधार पर बाल अपराध की सजा बालकों को किशारे बंदी गृह में सुधार के लिये रखकर दी जाती है।

किशोर सुधारगृह मोहान रोड, लखनऊ में शोधार्थी ने व्यापक रूप से दो चरणों पर वहाँ के बाल अपराधियों की संख्या की जानकारी की तथा सुधार गृह द्वारा किए जाने वाले प्रयासों का अध्ययन किया। सुधार गृह में उपस्थित बालकों पर सुधार के प्रभाव की जानकारी भी की।

तालिका 6.8 किशोर सुधार गृह में बाल अपराधियों की स्थिति सुधार गृह में 10-16 वर्ष तक के किशोरों के रहने तथा उनके जीवन के सुधार के लिये आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध करायी गयी हैं यहाँ पर लाये गये बाल-अपराधी हत्या, चोरी, रेलवे स्टेशन तथा बस स्टेशनों में यात्रियों के समान लेकर भागने वाले अपराधी थे। यहाँ रखे गये अधिकांश (90 प्रतिशत) बाल अपराधी अपने घर परिवार के बारे में जानकारी नहीं रखते हैं। 80 प्रतिशत बाल अपराधी भगोड़े हैं। जो घर की पारिवारिक स्थितियों से या विसंगतियों से ऊबकर घर छोड़ने को मजबूर हो गये। 10 प्रतिशत ऐसे भी बाल अपराधी है जो शारीरिक रूप से विकालंग हैं जिनमें कम सुनने, अंधापन, अस्थिविकलांगता तथा चेहरे के टेढ़ापन जैसी दशाएं हैं। 98 प्रतिशत बाल अपराधियों को अपने अपराध का बोध नहीं है और न ही उन्हें अपने सजा की जानकारी है। यह पूछने पर कि तुम्हें यहाँ क्यों रखा गया है? इसका उत्तर भी उन्हें नहीं मालूम, केवल 10 प्रतिशत ही अपने घर जाना चाहते हैं। और घर के लिये पत्र लिखते हैं। उनके परिवार के लोग मिलने आते है। उन्हें अपनी पढ़ाई की चिंता है तथा माता पिता की याद आती है।

किशोर सुधार गृह की प्रशिक्षण इकाई से जुड़े प्रश्नों के उत्तर इस दशा के लिये अनुकूल नहीं है। लकड़ी का काम, मोचीगीरी, सिलाई का कार्य तथा रस्सियाँ बनाने, कुर्सियों को बुनने के अतिरिक्त अन्य कोई प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं है, आवास की दशा ठीक थी, पर्याप्त कमरे, बरांडे थे। सभी के पास बक्से थे, विश्राम के लिये तख्त थे। यहाँ पर सफाई की दशा अच्छी नहीं थी। बच्चों में शिष्टाचार का अभाव था। भोजन पर्याप्त किंतु स्वास्थ्य के लिये पौष्टिक तत्वों से पूर्ण नहीं कहा जा सकता है। दिए जाने वाले प्रशिक्षण के सम्बन्ध में बालकों में कोई रूचि नहीं थी। केवल 10 प्रतिशत ही अपने कार्य के प्रति लगनशील थे। बालकों के खेलने के लिये पर्याप्त मैदान है। किंतु उपकरण नहीं है। खेलने का प्रोत्साहन देने वाले अधिकारी कर्मचारी भी उदासीन है। मनोरंजन के साधनों का अभाव है। कहीं आने जाने को नहीं मिलता है। इस प्रकार किशोर सुधार गृह की स्थिति अनुकूल नहीं है।

बाल अधिनियम के अनुसार बाल अपराध की कोई भी रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की जा सकती, सभी सूचनाएँ गुप्त रखी जाती है। अत: ऐसे अध्ययन को व्यावहारिक रूप में ही देखना उचित होगा। नगरीय पर्यावरण को स्वस्थ बनाए रखने के लिये सामाजिक संकीर्णताओं से ऊपर उठकर बालकों के प्रति समग्र दृष्टिकोण अपनाना चाहिए तथा अपराध की दिशा में जाने वाले बालकों के पतन पर सहानुभूति पूर्वक विचार करना चाहिए।

भारत में बाल अपराधियों की संरचना में शुधी अध्ययन कर्ताओं ने पाया कि भारत में जितने भी बाल अपराध होते हैं उनमें केवल दो प्रतिशत ही पुलिस एवं न्यायालय के ध्यान में आते हैं। प्रतिवर्ष 50 हजार बाल अपराध भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के अंतर्गत और 85 हजार स्थानीय एवं विशिष्ट कानूनों के अंतर्गत किये जाते हैं। नगर का आकार जितना अधिक बड़ा होता है बाल अपराध उसी क्रम में बढ़ते हैं। नगरीय प्रभाव एवं दशा भी बाल अपराध को बढ़ाती है। नगरों की मलिन बस्तियाँ अपराधी चलचित्र बाल अपराध को अधिक बढ़ावा देते हैं। लड़कियों की तुलना में लड़कों में अपराधवृत्ति अधिक पायी जाती है। किंतु विगत 10 वर्षों में लड़कों की तुलना लड़कियों में अपराधी प्रवृत्ति अधिक पायी गयी। चोरी, सेंधमारी, झगड़ा फसाद, हत्या तथा राहजनी में 36 प्रतिशत बाल अपराधी, 12 प्रतिशत दंगे, 3 प्रतिशत हत्या में, 1.3 प्रतिशत बलात्कार तथा 1.3 प्रतिशत भगा ले जाने के अपराध में पकड़े गये। इसका कारण गरीबी, टूटते परिवार, गंदी बस्तियां, अकाल, बाढ़, बेकारी आदि हैं लड़कों द्वारा आर्थिक अपराध अधिक किये जाते हैं जबकि लड़कियों द्वारा यौन अपराध अधिक किये जाते हैं।

अध्ययन में यह तथ्य भी आये कि बाल अपराधी समूह में अपराध अधिक करते हैं कुछ समूह उन्हें प्रशिक्षण प्रदान करते हैं 12 से 16 आयु वर्ग के बाल अपराधी जो लगभग 81 प्रतिशत विद्यालय छोड़ने की स्थिति में होते हैं। अपराध अधिक करते हैं। 1988 के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 42 प्रतिशत बाल अपराधी अशिक्षित तथा 52 प्रतिशत प्राथमिक शिक्षा प्राप्त थे। जातीय स्तर पाया गया कि अनुसूचित जाति और जनजाति के अपराधी अधिक पाये गये। 81 प्रतिशत बाल अपराधी पहली बार अपराध करने वाले हैं। और लगभग 10 प्रतिशत ही अपराध की पुनरावृत्ति करने वाले होते हैं। लगभग 64 प्रतिशत बाल अपराधी अपने माता पिता या अन्य संरक्षकों के साथ अपराध के समय होते हैं, केवल 13 प्रतिशत ही परिवार विहीन थे।

बाल-अपराधिक वृत्ति पर नियंत्रण


बाल अपराध की दशा में नियंत्रण के लिये प्रभावशाली कानून बनाने, सुधार संस्थाओं एवं विद्यालयों की स्थापना करने जैसे प्रयास किये जा सकते हैं।

1. हिरासत घर - अपराधिक स्थितियों से बाल अपराधी को अलग रखा जाए क्योंकि युवा अपराधियों के सम्पर्क में आने पर उनके अधिक अपराधी बन जाने की संभावना रहती है। इनके माध्यम से बालक की मानसिकता, सामाजिक और शारीरिक दशाओं का अध्ययन निष्पक्ष रूप से करके पारिवारिक वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए।

2. प्रमाणित विद्यालयों की स्थापना - अपराध की सजा पाये बाल अपराधी को न्यायालय की अनुमति पर ऐसे विद्यालयों में रखा जाता है जहाँ उसे शिक्षा तथा रोजगार परक जानकारी देकर भविष्य के लिये सामान्य जीवन जीने के योग्य बनाया जाता है। इन विद्यालयों के वातावरण में सामाजिकता और नैतिकता का वातावरण बनाने तथा बच्चे को पारिवारिक वातावरण में रहने का अभ्यस्त बनाया जाना चाहिए। खेलों तथा मनोरंजन का वातावरण पैदाकर चारित्रिक क्षमताओं का विकास किया जा सकता है।

3. परिवेक्षण गृह - परिवेक्षण गृह में ऐसे अपराधियों को रखा जाता है जिन्हें दिन में नौकरी एवं काम करने की छूट होती है। रात्रि में ठीक समय पर पहुँचना अनिवार्य होता है। परिवेक्षण अधिकारी अपराधी की गतिविधियों पर नजर रखता है। यहाँ पर बाल अपराधी के प्रति विश्वास, सामाजिक मर्यादाओं का पालन, समय का पालन, जीविकोपार्जन, सभी से मिलने जुलने तथा व्यवहार में सभी से जुड़ने का अवसर प्रदान कर परिवेक्षण गृह बाल अपराध में सुधार को नयी दिशा दे सकते हैं।

4. किशोर बंदीगृह - किशोर बंदीगृहों में बाल अपराधियों को रखा जाता है। यहाँ पर व्यवसाय का प्रशिक्षण, अध्ययन, आने जाने, भोजन आदि की व्यवस्था होती है। इनमें बाल अपराधियों की प्रगति का पूर्ण ब्यौरा रखा जाता है जिसके आधार पर उन्हें अपराध मुक्त होने की दशा पर सम्मानित जीवन जीने में मदद मिल सके।

5. सुधार गृह विद्यालय - सजा पाये बाल अपराधी या आंशिक अपराध सिद्ध होने की दशा में बाल अपराधियों को सुधार गृह विद्यालयों में रखा जाता है। इसमें रोजगार के लिये कृषि, चमड़े का काम, खिलौने, दरी, निवार, रस्सी बनाने, बढ़ईगीरी, सिलाई आदि का काम सिखाया जाता है उन्हें अन्य रोजगार परक कार्यों का रूचि के अनुसार प्रशिक्षण देने की व्यवस्था होती है।

ऐसे विद्यालयों में आज विभिन्न प्रकार की समस्याएँ हैं। बालकों की मनो दशाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। इसलिये ये विद्यालय सुधार के स्थान पर बाल अपराधियों में असंतोष और असहिष्णुता की स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं। इनके वातावरण और शिक्षण दशाओं और रोजगार परक शिक्षा में नवीनता लाने और रूचिकर बनाने की आवश्यकता है। उनके प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है।

6. पोषण तथा सहायक गृहों में सुधार - पोषण गृहों में 10 से कम आयुवर्ग के बाल अपराधियों को रखा जाता है। यहाँ पर पारिवारिक रूप से टूटे बच्चे अधिक होते हैं इसलिये अपराध के बोध कराने से ऊपर उठकर पोषण के साथ-साथ पारिवारिक वातावरण करने की आवश्यकता है। बालक, बाल अपराध में प्रवृत्त न हो इसके लिये आवश्यक है कि -

1. स्वस्थ मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

2. अश्लील साहित्य एवं दोषपूर्ण चलचित्रों पर नियंत्रण लगाना चाहिए।

3. पथभ्रष्ट बालकों के सुधार के लिये उनके माता पिता को मदद देने के लिये बाल सलाहकार केंद्र स्थापित होने चाहिए।

4. बच्चे कोरे कागद हैं अत: उन्हें दूषित सामाजिक वातावरण से बचाना चाहिए।

5. साधारण अपराध के लिये न्यायालय के अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारी के सम्मुख उपस्थित किया जाना चाहिए। ऐसे अधिकारी सुधार के लिये महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं।

6. मलिन बस्तियों के सामाजिक पर्यावरण को बदलने के लिये धार्मिक संस्थाओं की सहायता ली जा सकती है।

7. बाल न्यायालयों की संख्या में वृद्धि की जानी चाहिए।

8. शिक्षा व्यवस्था में नैतिक शिक्षा को अनिवार्य पाठयक्रम बनाना चाहिए।

9. गरीबी तथा बेकारी में जीविका चलाने वाले परिवारों के लिये शिक्षा नि:शुल्क तथा अनिवार्य होनी चाहिए।

10. बाल अपराधियों के सुधार में संलग्न संस्थाओं की आर्थिक दशा में सुधार किया जाना चाहिए।

11. बाल अपराध नियंत्रण के लिये सारे देश में कानून समान रूप से लागू किया जाना चाहिए।

12. बाल अधिनियम के अंतर्गत बनाये गए कानून की सन 1860 की धारा 399 व 562 में प्राविधान है कि बाल अपराधी को युवा अपराधियों से पृथक रखा जाए। इसका पालन किया जाना चाहिए।

13. समाज कल्याण मंत्रियों की 1987 की बैठक में लिये गए निर्णय कि बाल अपराधियों को जेल में नहीं रखा जायेगा का पालन किया जाना चाहिए।

14. 1960 के बाल अधिनियम के अंतर्गत स्थापित बाल न्यायलयों के लिये निर्देशित आचरण संहिता बाल अपराध सुधार की दिशा में महत्त्वपूर्ण है। इसके निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए।

15. बाल अपराधियों को अच्छे आचरण से सम्बन्धित कहानी नाटकों, आदि के माध्यम से प्रेरित करना चाहिए।

16. विद्यालय के बालकों को अन्य बालकों के सम्पर्क में समय व्यतीत करने के अवसर उपलब्ध कराने चाहिए।

स. स्वयंसेवी संस्थाएँ एवं सामाजिक प्रदूषण नियंत्रण


कार्य के संपादन में व्यक्ति का समर्पित योगदान ऐतिहासिक परिवर्तन प्रस्तुत करने में सफल होता है। निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये दृढ़ संकल्प संस्थाएँ समाज में परिवर्तन करने में समर्थ होती है। एक नव सृजनकारी पथ प्रदर्शन का शंखनाद करती हैं। संस्थाओं में व्यक्ति संयुक्त रूप से अपना स्वैच्छिक योगदान करता है। व्यक्ति के स्वैच्छिक अल्प योगदान से संस्थाएँ समाजहित के बड़े से बड़े कार्य संपादन में सफल हो जाती हैं। वर्तमान में व्यक्तिवाद का आधिक्य बढ़ता जा रहा है, परिवार टूटते जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में अपरिहार्य उत्तर दायित्वों का निर्वाह भी स्वयंसेवी संस्थाएँ पूरा करने में आगे हैं। सामाजिक रीति रिवाज, धार्मिक कार्य, विवाह, त्यौहार, मेलों आदि का आयोजन भी सामाजिक संस्थाएँ करने लगी हैं।

क्षेत्रीय पर्यावरण की दशाओं पर स्वयंसेवी संस्थाएँ अपना एक नैतिक दृष्टिकोण अपनाती हैं। वे समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर समाज हित में, सामाजिक सहयोग एवं सहकार से कार्य करती हैं। आज सामाजिक और भौगोलिक पर्यावरणीय अवमूल्यन होने की दशा में जन जागरूकता उत्पन्न करना तथा जनसामान्य को उसके कर्तव्यों का ज्ञान कराने के लिये स्वयंसेवी संस्थाओं की महती आवश्यकता है। विगत वर्षों में नगर की पर्यावरणीय समस्याओं पर स्वयंसेवी संस्थाएँ, सरकारी संस्थाएँ, सहकारी संस्थाएँ, निजी संस्थाएँ एवं व्यक्ति स्तर पर पर्यावरणीय दृष्टिकोण को मुखर किया है। इससे लोगों में अपने पर्यावरण के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने की दिशा में अनेक संस्थाएँ बहुमूल्य योगदान दे रहीं हैं।

1. लखनऊ नगर के पर्यावरण संरक्षण की दिशा में नगर विकास मंत्री लाल जी टंडन के प्रशंसनीय योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। इन्होंने लखनऊ नगर की गौरव गरिमा को वापस लाने का संकल्प किया है और नगर की प्रत्येक पर्यावरणीय समस्या को गम्भीरता से लिया है। चाहे वह पॉलीथीन लिफाफे को प्रतिबंधित करने के कानून को लागू करना हो या, नगरीय पशुओं तथा गायों को बचाने के लिये पुरजोर प्रयास करने या कानून बनाने की बात हो या मलिन बस्ती पर्यावरण सुधार हो या गोमती सफाई के लिये अपने समर्थकों के साथ समय-समय पर कार्य करने की बात हो या यातायात तथा परिवहन व्यवस्था को नये रूप देने की दिशा में प्रयास हो। यह महामानव सबसे आगे रहा। इनके व्यक्तिगत और सामूहिक योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है।

2. हिंदू संस्कृति के संरक्षक ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ के प्रयास नगरीय पर्यावरण के संरक्षण के लिये बहुमूल्य हैं। इसने धार्मिक पर्वों तथा पूज्य पुरुषों की स्मृति में गोमती सफाई कार्य करने का संकल्प किया और गोमती तट पर शाखा लगाकर गोमती को प्रदूषण से मुक्त कराने का संकल्प लिया। 4 जून रविवार को नगर के सभी भागों अमीनाबाद, सदर, हजरतगंज मॉडल हाउस, इंदिरा नगर, गोमती नगर, एचएएल, महानगर, आलमबाग, कृष्णानगर, निशातगंज,जानकीपुरम, डालीगंज खदरा, त्रिवेणीनगर, अलीगंज आदि से एकत्र होकर क्षेत्रीय वर्गों में विभाजित होकर गोमती के अलग-अलग क्षेत्रों बांस, बल्ली तथा जाल लेकर, जलकुंभी सहित व अन्य कचरा निकाला इस समय महानगर संघ संचालक लक्ष्मी चंद्र अग्रवाल, महानगर सम्पर्क प्रमुख अशोक सिन्हा, नगर कार्यवाहक राघवेंद्र शुक्ल, नगर विकास मंत्री लालजी टंडन, नगर प्रमुख डॉ. एससी राय भी उपस्थित होकर गोमती को प्रदूषण मुक्त बनाने का संकल्प लिया।

3. नगरीय पर्यावरण संरक्षण में, गायत्री परिवार महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। गायत्री परिवार नगर के सामाजिक पर्यावरण को सुखद बनाने के लिये समय-समय पर भजन कीर्तनों का आयोजन करते हैं। सामाजिक मूल्यों से संरक्षण के लिये अपने विचारों का प्रचार प्रसार करते हैं। गायत्री परिवार द्वारा गोमती सफाई के लिये कई आयोजन किये गये हैं तथा नगर के दूषित पर्यावरण से आहत गायों एवं पशुओं के संरक्षण के लिये भी प्रयास किये हैं।

4. नगर के धार्मिक प्रतिष्ठान गोमती को प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा अपना योगदान कर रहे हैं। हनुमान सेतु मंदिर, मनकामेश्वर मंदिर, अलीगंज हनुमान मंदिर जैसे प्रतिष्ठान मंदिर में चढ़ाए गए पुष्पों को गोमती में न विसर्जित करके खाद बनाने में प्रयोग कर रहे हैं। इन संस्थाओं से अन्य धार्मिक संस्थाएँ सीख लेकर अपने यहाँ ऐसी व्यवस्था के लिये संकल्परत हैं। इस दिशा में नगर के डीआईजी शैलजाकांत मिश्र जो स्वयं में धर्म परायण और नैतिक विचारों के धनी हैं प्रयासरत हैं। पूजन आदि की अवशेष सामग्री जो गोमती में विसर्जित कर दी जाती है। इसे गोमती में न विसर्जित किया जाए इसके लिये पॉलिथीन का प्रयोग वर्जित करने, पुष्पादि किसी प्रकार की सामग्री गोमती में विसर्जित न करने सम्बन्धी पोस्टर चस्पा कराए हैं ताथा बैनर लगवाएँ हैं।

5. भारतीय पर्यावरण एवं मद्य निषेध सेवा संस्थान, गौरी बाजार के अध्यक्ष रामसजीवन रावत सहित अन्य कार्यकारी सदस्य क्षेत्र स्तर पर पर्यावरण संरक्षण, नशाउन्मूलन, दहेज प्रथा, जातिवाद महिला उत्पीड़न, अशिक्षा, बेरोजगारी तथा भ्रष्टाचार जैसी सामाजिक बुराइयों से बचने के लिये गोष्ठी आहूत कर लोगों को जागरूक करते रहते हैं। गोष्ठी के माध्यम से संस्था के महामंत्री अवधेश कुमार साहु पॉलिथीन के प्रयोग तथा शराब के ठेकों को बंद करने की शासन से पुरजोर अपील करते हैं।

6. रायबरेली रोड में स्थित ‘‘सेनानी बिहार’’ के एपीएस एकेडमी ने ‘पर्यावरण विनाश और हम’ विषय पर प्रदर्शिनी का आयोजन किया इसके माध्यम से छात्रों में पर्यावरण सुरक्षा के उपायों की जानकारी दी गयी, भाषण प्रतियोगिता, चित्र, मॉडल आदि भी प्रदर्शित किये गए। यहाँ पर भी डीआईजी शैलजाकांत मिश्र ने पर्यावरण के महत्त्व का बोध छात्रों तथा उपस्थित लोगों को कराया।

7. नगरीय पर्यावरण संरक्षण के लिये प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय ने पर्यावरण सुरक्षा पर चित्र व पोस्टर प्रदर्शनी का आयोजन कर लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने का प्रयास किया है। वहीं धार्मिक प्रचार-प्रसार से सामाजिक पर्यावरण को सुखद बनाने का कार्य कर रहा है।

8. इंडियन सोसाइटी फॉर कजर्वेशन ऑफ नेचर एंड नेचुरल रिसोर्सेज ने नगरीय पेयजल बचाओ कार्यक्रम के लिये नगर में सतुत्य प्रयास कर रही है।

9. दया सजीव सेवा समिति पर्यावरण एवं वन्य जीव संरक्षण के लिये विद्यालयों के माध्यम से अपना प्रचार प्रसार कर रही है तथा दुबग्गा माल रोड पर स्थित बेहता नहर की सफाई कर लोगों को पर्यावरण रक्षा की सीख दी।

10. स्पेस इंडिया सोसाइटी फॉर पीपुल्स एक्रालेजमेंट एंड कम्युनिटी इम्पावर सोसाइटी ने पर्यावरण ‘कल आज और कल’ विषय पर नगर की प्रतिष्ठित संस्थाओं के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की अपनी अभिव्यक्ति प्रस्तुत की है।

11. ‘चित्र गुप्त नगर वेलफेयर सोसायटी’ ने पॉलीथीन बहिष्कार के लिये जनजागरण अभियान चलाया इन्होंने घर-घर जाकर पॉलीथीन से होने वाली हानियों की जानकारी देने का संकल्प लिया है।

12. इंडियन हेल्थ केयर सिपकान, काशिश ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल डेवलपमेंट (इप्सा), जन उत्थान संस्थान समाधान एवं अभियान संस्थाएं भी नगरीय पर्यावरण संरक्षण की दिशा में लोगों में जागरूकता उत्पन्न कर रही है।

13. नगर में ध्वनि प्रदूषण फैलाए जाने के विरूद्ध राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, राजकीय जुबली कॉलेज, सेंटीनियल इंटर कॉलेज, भारतीय बालिका इंटर कॉलेज, बिशुन नारायण इंटर कॉलेज तथा सहाए सिंह बालिका इंटर कॉलेज की छात्राओं ने ध्वनि प्रदूषण रोकने की प्रशासन से मांग की जो पर्यावरण के प्रति जागरूकता की दिशा में सार्थक कदम है।

14. पर्यावरण सुरक्षा के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिये सामाजिक संस्था एक्सनोरा इनोवेटर्स क्लब लखनऊ ने एक कार्य योजना प्रारंभ की जिसमें कचरे के उपयोग की जानकारी दी गयी इसमें प्लास्टिक, पॉलीथीन, कागज, सीसा, धातुओं आदि के पुनर्प्रयोग करने तथा इधर-उधर न फेंकने का परामर्श दिया जाता है। क्लब की अध्यक्षा प्रभा चतुर्वेदी, उपाध्यक्षा प्रतिभा मित्तल प्रचार निदेशक कर्नल एन कुमार के प्रयास स्तुत्य है।

15. पर्यावरण चेतना परिसर, मानव इन्कलेव पिकनिक स्पॉट रोड, इंदिरा नगर लखनऊ से प्रकाशित हिंदी मासिक ‘पर्यावरण चेतना’ नामक पत्रिका न केवल पर्यावरण के प्रति समर्पित है, बल्कि नगरीय पर्यावरण पर पैनी दृष्टि रखकर अपने प्रकाशन में स्थायी स्तंभ के रूप में ‘लखनऊ नगर की पर्यावरणीय गतिविधियों’ को रखा है। जिसके प्रयास से लोगों में नगरीय पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ती जा रही है।

16. ‘सेवा संस्थान’ के अजीत कुमार तथा उनके सहयोगी सामाजिक पर्यावरण की दशा ठीक बनाए रखने के लिये महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिये कार्य कर रहे हैं इसके अतिरिक्त नगर की मलिन बस्तियों का अध्ययन भी संस्था के द्वारा कराया जाता है।

17. ‘महिला महाशक्ति’ की अध्यक्षा सुश्री मंजू श्री का कहना है कि सामाजिक जागरूकता के अभाव में कोई भी पर्यावरण कार्यक्रम सफल नहीं हो सकता। इन्होंने अपनी संस्था के माध्यम से पर्यावरण जागरूकता के कार्यक्रमों का आयोजन कर नगरीय पर्यावरण सुंदर बनाए रखने की दिशा में योगदान दिया है।

18. ‘संकल्प सेवा संस्थान’ ने पर्यावरण में वानस्पतिक औषधियों के महत्त्व के पौधों की जानकारी लोगों तक पहुँचाने के प्रयास किये हैं।

19. ‘टैम्पों टैक्सी महासंघ’ ने स्कूटर इंडिया के साथ मिलकर वाहनों को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिये पहल की। वाहनों में औसत गुणता के यंत्र, उपकरण न लगे होने से प्रदूषण अधिक होता है। इसके लिये स्कूटर इंडिया अच्छी गुणता के प्रदूषण रहित वाहन बनाने की मांग की।

20. सहारा इंडिया वेलफेयर फाउण्डेशन की इकाई ‘सहारा संकल्प’ के तत्वावधान में ‘प्रेरण दिवस’ (10 जून) का आयोजन कर लोगों के स्वास्थ्य की नि:शुल्क जाँच कराकर औषधियाँ वितरित की यह संकल्प सामाजिक पर्यावरण सुधार के लिये प्रेरणाप्रद रहा।

21. इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन इन सांइस टेक्नोलॉजी के निदेशक ने ‘पृथ्वी पर जीवन’ विषय की गोष्ठी का आयोजन किया।

22. ग्रामीण जनकल्याण महिला विकास संस्थान, गौरान क्लीनिक एवं अनुसंधान केंद्र तथा इंडियन साइंस कम्यूनिकेशन सोसाइटी पर्यावरण के प्रति नगर के नागरिकों में जागरूकता उत्पन्न करने में संलग्न है।

23. ‘प्राणि उद्यान लखनऊ’ ने त्रैमासिक पत्रिका ‘समाचार दर्शन’ निकाली है। यह प्राणियों के प्रति लोगों में जानकारी बढ़ाकर पर्यावरण अभिज्ञान को आलोकित कर रही है।

24. ‘प्रियदर्शी युवा कल्याण सोसाइटी’ समय-समय विद्यालयों, पोस्टरों व बैनरों के माध्यम से पर्यावरण जन जागरूकता अभियान संचालित करती रहती है।

25. ‘विज्ञान एवं प्रौद्योगिक परिषद इंस्टीट्यूट फॉर इन्वायरमेंटल डेवलपमेंट स्टडीज’ ने ‘कचरे का उपयोगी इस्तेमाल’ विषय पर सभा का आयोजन किया। संस्थान की अध्यक्षा डॉ. साधना सिंह ने पर्यावरण प्रदूषण के लिये चिंता व्यक्त की तथा घरेलू कचरे के प्रयोग की विधि बतायी। संस्थान के निदेशक डॉ. सुनील गुप्ता ने महिलाओं से विशेष रूप से आह्वान किया कि घरेलू कचरे को फेंके नहीं उसे उपयोगी बनाएँ।

26. नगर की सरकारी संस्थाएँ पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने की दिशा में स्वतंत्र रूप से पर्यावरण के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिये कार्य करती रहती हैं। उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी ने पौध रोपकर तथा नाटकों कहानियों के माध्यम से पर्यावरण शिक्षा प्रदान की।

27. ‘विज्ञान भवन में इंजीनियर्स एसोसिएशन’ द्वारा ‘‘जल संसाधन एवं सामाजिक मुद्दे’’ विषय पर गोष्ठी का आयोजन करके वर्षा जल के संरक्षण करने और उसके उपयोग की दिशा में लोगों को जानकारी देने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है।

28. औद्योगिक विष विज्ञान केंद्र पर्यावरण संरक्षण के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण और उपयोगी कार्य करने वाले संस्थानों में है। यह नगर के जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण तथा ध्वनि प्रदूषण की वास्तविक जानकारी नागरिकों तक पहुँचा रहा है साथ ही बचाव के लिये नये-नये उपकरणों का निर्माण, तकनीकी ज्ञान भी उपलब्ध कराता है तथा प्रदूषण के प्रभाव से बचने के लिये सरल सस्ती जानकारी भी लोगों को उपलब्ध कराता है। खाद्य सामग्री, खाद्य तेलों और दूध में मिलावट की जानकारी केंद्र द्वारा नागरिकों को दी गयी तथा स्वयं मिलावट परखो व्यावहारिक जानकारी भी दी गयी।

29. राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान नगरीय पर्यावरण की व्यापक जानकारी लोगों को कराता है तथा यहाँ की पर्यावरण प्रयोगशाला से स्थानीय पर्यावरण के लिये उपयोगी पौधों को रोपने की जानकारी भी दी जाती है। यहाँ महिला केंद्रित कार्यक्रम कार्यक्रम का आयोजन करके पर्यावरण सुरक्षा, अपशिष्ट निस्तारण स्वास्थ्य सुरक्षा, खाद्य एवं पोषक पदार्थ आदि के विभिन्न पहलुओं की जानकारी लोगों को उपलब्ध करायी जाती है।

30. ‘आंचलिक विज्ञान केंद्र’ छात्रों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाने के लिये चित्रकारी, भाषण आदि प्रतियोगिता के कार्यक्रम आयोजित करता है।

31. ‘भारतीय स्टेट बैंक’ ने वन्यजीव एवं पर्यावरण संरक्षण के लिये कार्यक्रम आयोजित किया। नगर में बड़े पैमाने पर वृक्षा रोपण कराया।

32. ‘सूडा’ की निदेशक अनीता जैन व अपर निदेशक चंद्र प्रकाश ने महिलाओं को पर्यावरण सुरक्षा के लिये संकल्पवान रहने की बात की है। साथ ही नगर की मलिन बस्ती सुधार, कार्यक्रम के लिये सबसे अग्रणी और दीर्घजीवी संस्था है।

33. ‘इंडियन वाटर वर्क्स एसोसिएशन, लखनऊ’ के चेयरमैन का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण अपनी वर्तमान पीढ़ी के लिये आवश्यक है।

34. ‘यूनीसेफ’ के प्रतिनिधि जोहान फेजस्काल्ड का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण में जनता एवं स्वयंसेवी संस्थाओं की भागीदारी आवश्यक है।

35. इंस्टीट्यूट ऑफ इन्वायरनमेंटल रिसर्च एंटर प्रीनियोरशिप एजूकेशन एंड डेवलप्मेंट (आईरीड) के अध्यक्ष चंद्रकुमार छाबड़ा ने नगर के धार्मिक संस्थानों तथा मंदिर के पुजारियों से एवं आम लोगों से अपील की है कि वह पूजा के फूल गोमती में न फेंके और इसके सदस्यों ने मंदिरों में जनसंपर्क कर इस अभियान में मंदिर के पुजारियों को भी सम्मिलित होने दीपावली में पटाखे न जलाने का आह्वान किया।

36. ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने पॉलीथीन के विरुद्ध हस्ताक्षर अभियान चलाया तथा 300 मी. लंबा बैनर लगाकर हस्ताक्षर कराए, पर्यावरण की जानकारी दी तथा प्रयोग के लिये जूट के थैले वितरित किए।

37. पत्रकारिता तथा जनसम्पर्क विभाग, स्टेट बैंक नगर, मैनेजमेंट एसोसिएशन, ने नगर के कई स्थानों में सफाई कार्य में अपना योगदान दिया, ऐसा ही कार्य ‘नगर में वाल्मीकि समाज’ ने अपनाया है।

38. पंजाब नेशनल, इलाहाबाद तथा सेंट्रल बैंकों ने नगर के विभिन्न मार्गों में वृक्षारोपण कार्य कराया तथा समय-समय पर पर्यावरण संरक्षण पर पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन करते हैं।

39. जिला नगरीय विकास, इंडियन वाटरवर्क्स ने जल सम्पदा के संरक्षण की मुहिम चलायी है।

40. ‘हरियाली’ संस्था ने नगर के विभिन्न मार्गों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण का कार्य एक वैज्ञानिक मानकों के आधार पर कराया है। इस दिशा में नगर की सबसे प्रभावशाली संस्था है।

41. ‘सर्वो’ पेप्सी, 7 अप तथा दैनिक जागरण ने वृक्षा रोपण कार्य कराया तथा पॉलीथीन के विकल्प में जूट के बैग दिये। पराग दुग्ध डेरी ने अपने रिक्त थैलों को एकत्र करके वापस करने वालों को पुरस्कार वितरित कर इस दिशा में एक नया द्वार खोला।

42. नगर के प्रतिष्ठित पब्लिक विद्यालय, सिटी मांटेसरी, महारानी लक्ष्मीबाई, रेडरोज, जयपुरिया कॉलेज, लामाटिनीयर, सैंट फ्रांसिस, सेंटथॉमस, सेंट मीरास, लखनऊ पब्लिक कॉलेज, न्यूपब्लिक कॉलेज, स्प्रिंग डेल, अल्मायटी कॉलेज, न्यू वे कॉलेज, सरस्वती विद्यामंदिर अलीगंज आदि के द्वारा पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रदर्शनी, पोस्टर, पेंटिंग का आयोजन किया जाता है।

43. लखनऊ विश्व विद्यालय के विधि विभाग, समाजकार्य विभाग, समाज शास्त्र विभाग, रसायन शास्त्र विभाग, तथा वनस्पति विभागों में पर्यावरण के पृथक पाठ्यक्रम सम्मिलित किये गये हैं। अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में भी इस दिशा में उल्लेखनीय प्रयास हुए हैं। मेडिकल कॉलेज, संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, श्यामा प्रसाद मुखर्जी अस्पताल और बलरामपुर अस्पताल ने भी स्थानीय पर्यावरण को बचाने के लिये अपशिष्टों के निस्तारण की बेहतर तकनीकि के प्रयास किये हैं। यहाँ के कुशल चिकित्सक पर्यावरण के दुष्प्रभाव पर अपनी जानकारी देकर नगर निवासियों में स्थानीय पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाने का प्रयास कर रहे हैं।

44. केंद्रीय जल संस्थान, भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग, भूगर्भ जलप्रदूषण विभाग, गोमती प्रदूषण नियंत्रण इकाई जल निगम लखनऊ, जल संस्थान, उद्यान एवं फल संरक्षण संस्थान, स्थानीय गन्ना संस्थान, पर्यावरण शिक्षण विद्यालय इंदिरानगर, पर्यावरण शिक्षण संस्था कुर्सी रोड, अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान, मौसम विभाग, संगध पौध अनुसंधान संस्थान, राज्य परिवहन विभाग, नगर यातायात निरीक्षण विभाग, वाहन पंजीकरण कार्यालय और जिला उद्योग विभाग के प्रबुद्ध व्यक्तियों तथा संस्थाओं का स्थानीय पर्यावरण संरक्षण में महत्त्वपूर्ण योगदान है।

45. पर्यावरण संरक्षण के लिये उत्तरदायी विभाग, पर्यावरण सचिवालय, पर्यावरण निदेशालय, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी नगरीय पर्यावरण की प्रमाप कराते रहते हैं तथा सार्वजनिक हित में प्रकाशन करते हैं।

46. नगर के कुछ प्रबुद्ध वर्ग के व्यक्ति भी नगरीय पर्यावरण संरक्षण की दिशा में व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से अपना योगदान दे रहे हैं। श्री रामदत्त त्रिपाठी पर्यावरण विशेषज्ञों में एक महान व्यक्तित्व हैं जिन्होंने समाचार पत्रों के माध्यम से लखनऊ नगर के पर्यावरण तथा गोमती प्रदूषण की स्थितियाँ तथा सुधार के सम्बन्ध में बहुआयामी योजना प्रकाशित करते रहते हैं, पीसीएस एसोसिएशन के अध्यक्ष हरदेव सिंह, दूरदर्शन निदेशक कुलभूषण जी, डीआईजी शैलजा कांत मिश्र, श्री ज्ञानेश्वर शुक्ल आदि गोमती स्वच्छता के लिये कार्य कर रहे हैं। गौतम राय ने पर्यावरण रक्षण की दिशा में ‘हुकडू का खजाना’ नाटक लिखकर, आनंद मोहन भटनाकर तथा रूमा सिंह ने नगरीय पर्यावरण पर समाचार पत्रों में लगातार लेख प्रकाशित किये हैं।

संस्थाओं के प्रयास के साथ आज की आवश्यकता पर्यावरण के बहुउपयोगी तत्वों के प्रबंधन की है। कुशल प्रबंधन से ही नगरीय पर्यावरण की रक्षा हो सकती और जन जीवन सुखी होगा।

संदर्भ (REFERENCE)


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लखनऊ महानगर एक पर्यावरण प्रदूषण अध्ययन (Lucknow Metropolis : A Study in Environmental Pollution) - 2001


(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

पर्यावरण प्रदूषण की संकल्पना और लखनऊ (Lucknow Metro-City: Concept of Environmental Pollution)

2

लखनऊ महानगर: मृदा प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Soil Pollution)

3

लखनऊ महानगर: जल प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Water Pollution)

4

लखनऊ महानगर: वायु प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Air Pollution)

5

लखनऊ महानगर: ध्वनि प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Noise Pollution)

6

लखनऊ महानगर: सामाजिक प्रदूषण (Lucknow Metro-City: Social Pollution)

7

लखनऊ महानगर: प्रदूषण नियंत्रण एवं पर्यावरण प्रबंध (Lucknow Metro-City: Pollution Control and Environmental Management)

 

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