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किसी भी हाल में पानी बचाएँ

Author: 
बिंदेश्वर पाठक
Source: 
कादम्बिनी, मई, 2018
एक तरफ हमारे गाँवों में पीने के पानी की किल्लत, तो दूसरी तरफ शहरों के शौचालयों में सफाई के नाम पर कई-कई लीटर पानी की बर्बादी। यह सब देखकर सुलभ शौचालय में पानी की बचत की तकनीक खोजी गई। इसके और भी कई फायदे हो रहे हैं। हमारे देश के गाँवों में आज भी पीने के पानी की भारी किल्लत है। कहीं-कहीं तो हालात और भी ज्यादा बदतर हैं। एक तरफ पीने के पानी को मोहताज इस देश की ग्रामीण जनता है, तो दूसरी तरफ शहरों के शौचालयों में 8 से 10 लीटर तक पानी सफाई के नाम पर बर्बाद कर दिया जाता है। हाल यह है कि अब बड़े-बड़े शहर, महानगर भी पानी की किल्लत की चपेट में आ रहे हैं। पानी की ऐसी बर्बादी को देखकर बेहद दुख होता है। यह सब देखकर ही दशकों पहले मेरे मन में विचार आया कि कुछ ऐसा किया जाये कि शौचालयों में शुचिता भी रहे और पानी की बर्बादी भी न हो। यह विचार आते ही मैंने सोचना शुरू कर दिया, जिसका परिणाम दो गड्ढेवाली सुलभ शौचालय तकनीक के रूप में सामने आया। इस कार्य को गति देने के लिये मैंने 5 मार्च, 1970 को ‘सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन’ की स्थापना की। आज हम इसके माध्यम से पेयजल के क्षेत्र की अनेक योजनाओं के साथ-साथ स्वच्छता और सामाजिक कल्याण के कार्य भी कर रहे हैं। यहाँ बात हो रही है कि शौचालयों में पानी की बर्बादी को कैसे रोका जाये? इसके लिये सुलभ तकनीक की खोज की गई। इसमें दो गड्ढों की व्यवस्था है और ढक्कन को वॉटरसील से सीलबन्द कर दिया जाता है। दोनों गड्ढों का इस्तेमाल बारी-बारी से होता है। एक गड्ढे के भर जाने पर मल-मूत्र को दूसरे गड्ढे में छोड़ा जाता है। पहले गड्ढे को दो साल तक वैसे ही छोड़ देते हैं। इस दौरान मानव- मल गन्धहीन, पैथोजन-मुक्त ठोस थक्कों में रूपान्तरित होकर खाद बन जाता है। उसे आसानी से खोदकर निकाला जा सकता है और उसका इस्तेमाल खाद के रूप में किया जा सकता है। इस तकनीक में मानव-मल को हाथ से खुदाई करके निकालने की जरूरत नहीं पड़ती। इस शौचालय को ‘सुलभ शौचालय’ नाम दिया गया, इसका निर्माण विभिन्न भूजल वाली जगहों में थोड़ी सावधानी के साथ किया जा सकता है। ‘टू-पिट पोर-फ्लश’ वाली इस तकनीक को शहरी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक इस्तेमाल में लाया गया। जहाँ सीवर और सेप्टिक टैंक नहीं हैं, वहाँ मानव-मल के निस्तारण के लिये इस प्रणाली को सुरक्षित और साफ-सुथरा माना गया। इस शौचालय के डब्ल्यू.सी. में एक पी-ट्रैप रहता है और उसकी बनावट इस प्रकार है कि इसमें मल की सफाई के लिये मात्र 1.5 से 2 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जबकि कमोड आदि में 8 से 10 लीटर पानी की जरूरत होती है। इस प्रकार से हमारे द्वारा तैयार किये गये शौचालय से बड़ी मात्रा में पानी की बचत होती है।

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