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टाँका : राजस्थान की परंपरागत जल-संग्रह तकनीक (Traditional method of water conservation in Rajasthan - Tanka)

Source: 
ग्राविस, जोधपुर, मार्च 2002

पिछले कई दशकों से पेयजल हेतु वर्षा-जल संग्रहण की परम्परागत तकनीकों के प्रचलन में काफी गिरावट आ रही है तथा ग्रामीणों की निर्भरता नलकूप जैसी तकनीकों पर बढ़ती जा रही है। राजस्थान में भू-जल का स्तर जहाँ एक तरफ तेजी से नीचे जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ काफी बड़े क्षेत्र में भूजल प्रदूषित है। साथ ही बढ़ती हुई जनसंख्या तथा पशुसंख्या का दबाव भी पेयजल स्रोतों पर बढ़ रहा है। ऐसी परिस्थिति में पेयजल की समस्या के निदान में परम्परागत तकनीकों का विशेष महत्व है।

एक टाँके के आगोर में खेलते बच्चे राजस्थान में थार मरुस्थलीय क्षेत्र पानी की कमी वाला क्षेत्र है। कम वर्षा व भूमिगत जल प्रदूषित होने के कारण यहाँ के निवासियों ने प्राचीनकाल से ही जल संग्रहण के ऐसे तरीके विकसित किए, जिससे मनुष्यों तथा पशुओं की पानी की आवश्यकताएं पूरी की जा सके। इनमें से एक प्रमुख तरीका है - टाँका।

राजस्थान में टाँकों का इतिहास बहुत पुराना है। ऐसा कहा जाता है कि सर्वप्रथम टाँका वर्ष 1607 में राजा सूर सिंह ने बनवाया था। जोधपुर के मेहरानगढ़ किले में भी वर्ष 1759 में महाराजा उदय सिंह ने ऐसा टाँका बनवाया था। वर्ष 1895-96 के महा-अकाल में ऐसे टाँके बड़े स्तर पर बनवाए गए। सबसे बड़ा टाँका करीब 350 वर्ष पहले जयपुर के जयगढ़ किले में बनवाया गया था। इसकी क्षमता साठ लाख गैलन (लगभग तीन करोड़ लीटर) पानी की थी। जहाँ अधिकांश स्थानों पर भूमिगत जल खारा है तथा भूजल अधिक गहराई पर है, ऐसे क्षेत्रो में टाँका, स्वच्छ तथा मीठा पेयजल पाने का सुविधाजनक तरीका है। मरुस्थल में रहने वाले परिवार जिन्हें पेयजल दूर से लाना पड़ता है, उनके लिये पानी का टाँका एक अनिवार्य आवश्यकता है। खेतो में ऐसे टाँके बनाए गए हैं।

टाँके व्यक्तिगत, सार्वजनिक या सामूहिक स्तर पर बनाए जाते हैं। कई गरीब परिवार मिलकर सामूहिक टाँके बनाते हैं। सार्वजनिक टाँके पंचायती भूमि पर बनाए जाते हैं। जिन परिवारों की क्षमता व्यक्तिगत टाँके बनाने की होती है, ऐसे परिवार व्यक्तिगत स्तर पर भी बनाते हैं। निजी टाँके घरों के सामने, आँगन में या अहाते में बनते है। सम्पन्न परिवारों के पास कई टाँके भी होते है तथा वे मकान की छत का वर्षा-जल भी टाँकों में संग्रहित कर लेते है।

बनावट


टाँका एक भूमिगत पक्का कुण्ड है जो सामान्यतया गोल होता है। जहाँ भूमि कठोर होती है वहाँ इस मिट्टी को टाँके के बाहर चारों वृत्ताकार बाहर से अन्दर की ओर सूखा ढालदार प्लेटफार्म बनाने हेतु प्रयोग किया जाता है। इस ढालदार सतह प्लेटफार्म को आगोर या कैचमेन्ट एरिया (या टाँके का जलग्रहण-कैचमेंट क्षेत्र, जहाँ से वर्षा-जल एकत्रित किया जाता है) कहते हैं। आगोर में गिरने वाले पानी का बहाव टाँके की तरफ किया जाता है तथा टाँके में एक से लेकर तीन तक प्रवेश द्वार (इनलेट) बनाए जाते हैं, जिनके द्वारा पानी टाँके के अन्दर जाता है।

टाँके के मुँह पर चूने पत्थर या सीमेन्ट की पक्की बनावट की जाती है। टाँके में एक तरफ निकास द्वार बनाया जाता है जिससे अधिक पानी आने पर बाहर निकाला जा सके। टाँके से पानी निकालने के लिये टाँके की छत पर एक छोटा ढक्कन लगा होता है, जिसे खोलकर बाल्टी तथा रस्सी की सहायता से टाँके से पानी खींचा जाता है। आगोर पानी इकट्ठा करने का माध्यम है। कई क्षेत्रों में टाँको का आगोर प्राकृतिक ढालदार जमीन का होता है। कई क्षेत्रों में विशेषकर रेतीले स्थानों पर कृत्रिम आगोर बनाना पड़ता है। यह टाँके सामान्यतया घरों के पास बनाए जाते हैं। एक सामान्य टाँके का चित्र नीचे दर्शाया गया है।

एक टाँके का अनुप्रस्थ काट

विशेषता


- इसके चार बेफिल वाल्व (रुकावदार खेली) जल के साथ आने वाली मिट्टी को रोकने में सहायक रहती हैं।
- टाँके के पानी में बदबू नहीं आती है।
- कम खर्च में टाँका निर्माण होता है।
- पूरा जल टाँके में पहुँचता है।

सुधार कार्य


ग्रामीण विकास विज्ञान समिति (ग्राविस) ने जन सहभागिता के आधार पर टाँको की तकनीक में सुधार लाने हेतु प्रयोगात्मक कार्य किये हैं।

- जिन स्थानों पर पत्थर के बोल्डर उपलब्ध नहीं हैं, ऐसे स्थानों पर फर्मा (मोल्डस) के द्वारा सीमेंट-कंकरीट की ढलाई की दीवार बनायी गई है।
- टाँका निर्माण में लागत को कम करने के लिये टाँके की छत पत्थर के छोटे-छोटे टुकडों से बनायी गई है या सीमेन्ट तथा बजरी से ‘डोम’ बनाये गये हैं।
- वर्षा-जल के साथ आई मिट्टी को टाँके में जाने से रोकने के लिये विभिन्न प्रकार के ‘सिल्ट-कैचर’ बनाये गये हैं।
- प्रवेश एवं निकास द्वार पर जाली लगाने का कार्य किया गया है।

ग्राविस के द्वारा प्रयोग किये गये दो प्रकार के सिल्ट कैचर (मिट्टी रोक-विधि) के नमूने नीचे दर्शाये गये हैं।

टाँके में शिल्ट कैच के तरीके यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ग्रामवासियों ने नमूना नं. 1 को अधिक पसन्द किया तथा अपनाया है। ग्राविस के अनुभवों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि टाँका निर्माण में नीचे लिखी सावधानियाँ जरूर रखनी चाहिए:

फोटो साभार - पीयर वॉटर एक्सचैंज

सावधानियाँ तथा कुछ महत्त्वपूर्ण बातें:-


- पशुओं को रोकने हेतु आगोर के चारों ओर काँटो की बाड़ बनाना।
- प्रतिवर्ष वर्षा से पहले आगोर की सफाई करना।
- टाँके के पैदें पर प्रतिवर्ष मिट्टी जमा हो जाती है। इस मिट्टी को साफ करने हेतु टाँका निर्माण के समय टाँके में व्यक्ति के प्रवेश के लिये पत्थर की सीढ़ी बनाना।
- टाँके का मुँह आदमी के प्रवेश जितना ढक्कनदार बनाना।
- पानी के प्रवेश और निकास द्वार पर मिट्टी तथा अन्य अनावश्यक वस्तुओं को रोकने के लिये लोहे की जाली लगाना।
- पानी निकालने के लिये टाँके की छत पर लोहे का ढक्कन लगाना, जिसे ताला लगाकर बन्द किया जा सके।
- टाँके में जाने वाली मिट्टी को रोकने की नई तकनीकों के सिल्ट-कैचर (मिट्टी रोक) बनाना।
- पानी, घड़े में भरने तथा पशुओं को पिलाने के लिये अलग-अलग उचित स्थान बनाना।

यह गौर किये जाने लायक बात है कि पारंपरिक टाँको के निर्माण में सुधार कार्यक्रम के अन्तर्गत ग्राविस ने स्वच्छता के लिये उन सभी व्यवस्थाओं का प्रावधान किया है, जिसे आज के जल स्वास्थ्य वैज्ञानिक सलाह देते हैं।

टाँके या कुण्ड पक्की छत वाले ग्रामीण घरो में भी बनाए जा सकते हैं, जहाँ छत ही जलग्रहण (कैचमेंट) क्षेत्र होता है, आगोर की आवश्यकता नहीं होती। छत की नाली को टाँके से जोड दिया जाता है। सिल्ट कैचर बनाने की जरूरत भी नहीं होती। वर्षा का स्वच्छ जला संग्रह होता है।

टाँके से लाभ


- करीब पूरे वर्ष पेयजल की उपलब्धता।
- खारे पानी को पीने की मजबूरी से निजात।
- दूर से पानी लाने की समस्या से छुटकारा।
- पानी लाने में लगने वाले समय की बचत।
- अधिक रसायन वाले पानी से होने वाली बीमारियों से बचाव।
- पानी लाने की चिन्ता के कारण होने वाले तनाव से महिलाओं को छुटकारा।
- पानी भरने, संग्रह तथा संरक्षण करने हेतु साधनों की उपलब्धता।

सिणधरी, बाड़मेर में एक टाँका और आगोर राजकीय सहायता से सामूहिक टाँको का निर्माण कराया गया है। बड़ी संख्या में सामूहिक टाँके या तो खराब हो गये हैं या कार्यशील नहीं हैं। यदि कुछ टाँके कार्यशील हैं भी तो, उनका आधिकांश लाभ गाँव के उच्च वर्ग के परिवार ले रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार गाँव में बने कुल पारिवारिक टाँके का 90 प्रतिशत उच्च जाति वर्ग के पास है, निम्न जाति वर्ग के पास मात्र 10 प्रतिशत टाँके ही पाये गये हैं। ग्राविस के अनुभव के आधार पर यह कहना उचित होगा कि भारत सरकार को न्यूनतम आवश्यक सहयोग कर सभी निर्धन परिवारों के लिये पेयजल टाँको का निर्माण उनके स्वयं के अभिक्रम तथा संसाधनों से कराने के लिये प्रेरित करना चाहिये। ग्राविस के अनुसार उक्त आकार के पारिवारिक टाँके की लागत लगभग रु. 12,000 आती है।

ग्राविस ने मरुस्थल के जोधपुर, बाडमेर, जैसलमेर तथा नागौर जिलों के अनेक गाँवों में ग्रामीणों को प्रेरित कर 2500 से अधिक पेयजल टाँको का निर्माण सुधरी हुई तकनीक के आधार पर करवाया है। फलस्वरुप ग्रामीणों ने न सिर्फ पेयजल की उपलब्धता निश्चित कर ली है, बल्कि जलाभाव के कारण खारा पानी पीने की मजबूरी, पानी लाने के श्रम एवं धन की बचत भी की है। साथ ही गृहिणियों को पानी के अभाव के कारण होने वाले तनाव से भी छुटकारा मिला है।

टांका से जुड़े स्टोरी को पढ़ने के लिये नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

 

 

 
 
 
 
 

टाँके के बारे में और जानकारी के लिये निम्न संस्था से सम्पर्क करें -
ग्राविस, ग्रामीण विकास विज्ञान समिति 3/458, मिल्कमैन कॉलोनी, पाल रोड, जोधपुर-342008 (राजस्थान), फोन - 0291 - 741317, फैक्स - 0291 - 744549, ईमेल - publications@gravis.org.in, Visit us - www.gravis.org.in

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