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मक्का, गेहूँ एवं मूंग फसल चक्र उन्नत खेती का बेहतर विकल्प

Source: 
इंडिया साइंस वायर, 11 दिसम्बर, 2017

वास्को-द-गामा (गोवा) : भारतीय वैज्ञानिकों ने फिलीपींस, बांग्लादेश और नेपाल के साथ मिलकर एकीकृत कृषि प्रणाली का ऐसा विकल्प दिया है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखते हुए फसल उत्पादकता और आमदनी बढ़ाई जा सकती है।

कृषि फिलीपींस एवं भारत के अन्तरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थानों और बांग्लादेश, नेपाल व भारत के अन्तरराष्ट्रीय मक्का एवं गेहूँ सुधार केंद्रों तथा हरियाणा स्थित आईसीएआर-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने सीरियल सिस्टम्स इनिशिएटिव फॉर साउथ एशिया (सीएसआईएसए) परियोजना के अन्तर्गत चावल और गेहूँ के उच्च पैदावार वाले क्षेत्रों में एकीकृत प्रबंधन विकल्पों की पहचान करके भविष्य हेतु एक एकीकृत कृषि प्रणाली का विकल्प पेश किया है।

वर्ष 2009–2014 के दौरान पाँच वर्षों तक किए गए इस अध्ययन में उत्तर-पश्चिम भारत में सिंधु-गंगा के मैदानों के फसल चक्र, जुताई-बुआई के तरीकों, अवशेष प्रबंधन और अन्य फसल प्रबंधन तरीकों पर आधारित चार अलग-अलग तरह की तैयार की गईं फसल प्रणालियों के आधार पर प्रायोगिक खेतों में फसलें उगाकर तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है।

आनुवंशिक परिष्कृत बीज

Author: 
डॉ. एम.के. यादव
Source: 
विज्ञान प्रगति, दिसम्बर 2017

टर्मीनेटर/जी.एम. तकनीक को कृषि का ‘अणु बम’ कहा गया है। संयुक्त राज्य अमेरिका की एक जैवप्रौद्योगिकी कम्पनी बायर ने इस तकनीक को पेटेन्ट भी करवा लिया है। इस तकनीक के तहत बनाए गए बीजों की विशेषता है कि उन्हें एक बार ही फसल उत्पादन के लिये उपयोग किया जा सकता है एवं उसके द्वारा ली गई फसल से पुनः आगे फसल नहीं ली जा सकती है। अतः यह स्वाभाविक है कि टर्मीनेटर/जी.एम. बीजों से फसल लेने के पश्चात अगली फसल के लिये किसानों को पुनः नया बीज कम्पनियों से खरीदना पड़ेगा।

15 वर्ष पहले बाजार में मिलने वाला तरबूज का पाँच हजार रुपये प्रति किलो वाला बीज आज एक लाख रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है और पहले जैसा स्वाद भी उनमें नहीं है, न ही हमारा वह उन्नत बीज। विशेषकर सब्जियों के बीज की दृष्टि से कोरिया, जापान, यू.एस.ए. एवं चीन ने कब्जा कर लिया है। किसान महँगा बीज खरीदने को मजबूर हैं। अतः ऐसी तकनीकियों को भारत में अपनाने से पूर्व इसके आर्थिक एवं सामाजिक पहलुओं की विवेचना अति आवश्यक है।

प्लांटीबॉडी जैवप्रौद्योगिकी अनुसन्धान की नई दिशा

Author: 
सिम्पल कुमार सुमन
Source: 
विज्ञान प्रगति, दिसम्बर 2017

शायद बहुत कम लोगों ने ही प्लांटीबॉडी का नाम सुना होगा। प्लांटीबॉडी पादप द्वारा निर्मित एंटीबॉडी है। साधारणतः सामान्य पादप एंटीबॉडी का निर्माण नहीं करते हैं। प्लांटीबॉडी का निर्माण ट्रांसजेनिक (जी.एम.) पादप के द्वारा होता है। हम सभी जानते हैं एंटीबॉडी एक प्रकार की ग्लाइकोप्रोटीन होती है, जो हम मनुष्यों एवं अन्य जानवरों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का मुख्य भाग है। जैव प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत रिकॉम्बिनेन्ट डी.एन.ए. टेक्नोलॉजी (आर.डी.टी.) के माध्यम से एंटीबॉडी उत्पन्न करने वाले जीन को पौधों में स्थानान्तरित करना सम्भव हो सका है। ऐसे पौधे जो वांछित जीन के प्रभावों को प्रदर्शित करते हैं, ‘ट्रांसजेनिक पादप’ कहे जाते हैं और स्थानान्तरित जीन को ‘ट्रांसजीन’ कहा जाता है। सर्वप्रथम 1989 में तम्बाकू के पौधे में चूहे, एवं खरगोश के जीनों को डाला गया और कैरोआरएक्स (CaroRx) का उत्पादन किया गया जिससे जैव प्रौद्योगिकी की विकास एवं अनुसन्धान में एक नई विमा का विकास हुआ। शब्द प्लांटीबॉडी एवं इसकी संकल्पना संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित बायोटेक कम्पनी बायोलेक्स थेरोप्यूटिक्स इन्कॉर्पोरेशन के द्वारा दिया गया।

पौधों और फसल की प्लांटीबॉडी

सामान्य एंटीबॉडी एवं पादप एंटीबॉडी में अन्तर

भारत में सिंचाई परियोजनाओं का आकलन

Author: 
गजेन्द्र सिंह ‘मधुसूदन’
Source: 
कुरुक्षेत्र, नवम्बर 2017

देश में सिंचाई परियोजनाओं और नहरों से कुल सिंचित क्षेत्र का 40 प्रतिशत सींचा जाता है। शेष 60 प्रतिशत क्षेत्र अन्य साधनों से सींचा जाता है। यानी देश में अभी तक उपलब्ध परियोजनागत सम्भाव्य सिंचाई क्षमता का उपयोग नहीं किया जा सका है और देश में कृषि माँग के अनुरूप सिंचाई सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसलिये इस दिशा में बड़े निवेश और सम्भाव्य सिंचाई क्षमता के अधिकतम उपयोग की आवश्यकता है।

महिलाएँ यहाँ भी बनें मालकिन

Author: 
सुगंधा मुंशी
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 02 दिसम्बर, 2017

कृषि प्रधान आजाद भारत के 70 साल बीत चुके हैं। कृषि को ‘निर्माण रूपी व्यवस्था’ के रूप में स्थापित करने वाले किसान वर्ग का अहम हिस्सा ‘महिला किसान’, आज भी अपनी पहचान और अपने अस्तित्व के लिये अंतिम हाशिये पर इंतजार में हैं। 21वीं सदी में भी कृषि क्षेत्र लिंग असमानता के मानसिक रोग से जूझ रहा है। बावजूद इसके कि महिलाओं की मेहनत कृषि में केंद्रीय भूमिका निभाती है। उनकी पहचान या तो श्रमिक या फिर पुरुष किसान के सहयोगी तक ही सीमित समझी जाती है।

कृषि विकास : केंद्र और राज्य सम्बन्धों के बरक्स

Author: 
महेन्द्र प्रसाद सिंह
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 02 दिसम्बर, 2017

. सर्वविदित है कि भारतीय संविधान एक संकेंद्रित संघीय ढाँचे का निर्माण करता है। यह कथन राजनीतिक शक्तियों तथा वित्तीय संसाधनों के विभाजन के सम्बन्ध में निर्विवाद है। तथापि संघीय ढाँचे के कार्यकरण के दौरान, स्वतंत्रता के लगभग चार दशकों के बाद से उपयुक्त संवैधानिक ढाँचे के बावजूद भारतीय संघ व्यवहारत: विकेंद्रित हो गया अर्थात राज्य सरकारों की राजनीतिक स्थिति केंद्र के मुकाबले काफी सशक्त हो गई। संघीय गठबंधन सरकारों के दौर में एक चरण ऐसा भी आ गया कि क्षेत्रीय संघीय सरकार के निर्माण और विघटन में निर्णायक भूमिका अदा करने लगे। ऐसा इस कारण हुआ कि कोई भी राष्ट्रीय दल इस स्थिति में नहीं रहा कि बहुमत सरकार का गठन कर पाए। इसके लिये क्षेत्रीय दलों का सहारा लेना आवश्यक हो गया।

फलस्वरूप, क्षेत्रीय दलों तथा मुख्यमंत्रियों की स्थिति बहुत मजबूत हो गई। 2014 के लोक सभा चुनावों में यह स्थिति किंचित बदल गई, जब 30 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बहुमत सरकार बनाने में सफलता प्राप्त कर ली। हालाँकि, फिर भी इस दल ने गठबंधन सरकार की परंपरा जारी रखी। इस बदलते परिदृश्य में कृषि को लेकर प्राय: विवाद उठा है कि इस सेक्टर के विकास में गिरावट के लिये कौन उत्तरदायी है। कांग्रेस-वनाम गैर-कांग्रेस सरकारों के विवाद के अलावा एक दिलचस्प नया विवाद यह भी उभरा है कि कृषि की बदहालत के लिये केंद्र सरकार जिम्मेवार है अथवा राज्य सरकारें?

विवाद का कोण

खेती को प्राथमिकता में लाएँ तो

Author: 
अवधेश कुमार
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 02 दिसम्बर, 2017

. इस बात से इनकार करना कठिन है कि खेती और किसान, दोनों संकट में हैं। भारत जैसे देश की रचना ऐसी है कि जब तक खेती संकट से नहीं उबरेगा, किसान खुशहाल नहीं होंगे, यह वास्तविक प्रगति नहीं कर सकता। विडम्बना देखिए, ज्यादातर नेता एवं नौकरशाह इस बात को समझते हैं, लेकिन खेती और किसान को अर्थनीति में जितना महत्त्व मिलना चाहिए, नहीं दे पाते। हर सरकार, हर पार्टी स्वयं को किसानों का हितैषी बताती है, उसकी बात भी करती है, पर धरातल पर जितना होते दिखना चाहिए, उतना दिखता नहीं। इस संदर्भ में मानना भी गलत है कि केवल 1991 के बाद उदारीकरण की ओर कदम बढ़ाने के समय से खेती और किसान संकट में आए हैं। अगर हम इसे स्वीकार करते हैं, तो मानना होगा कि 1991 के पूर्व खेती पर कोई संकट नहीं था, किसान बिल्कुल खुशहाल थे, खेती को समाज में अन्य पेशों के समतुल्य सम्मान प्राप्त था..। यह सच नहीं है।

अगर आजादी के बाद खेती को केंद्र और राज्य सरकारों की आर्थिक नीतियों में प्राथमिकता मिली होती तो 1990 का अर्थ संकट आता ही नहीं और उसके बाद भारत को उदारीकरण के नाम पर बाजार-आधारित पूँजीवाद की ओर अग्रसर होने को विवश नहीं होना पड़ता। 1991 से भारतीय अर्थ नीति में आमूल बदलाव की शुरुआत विवशता में हुई। नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी को ऐसा लगा कि इसके बगैर भारत की अर्थव्यवस्था को संकट से उबारा जा ही नहीं सकता। वास्तव में बाजार पूँजीवाद की नीतियों ने खेती पर पहले से घनीभूत संकटों को ही बढ़ाया और इसके समाधान को जटिल बना दिया है किंतु हम पूर्व की अर्थ नीति को खेती और किसानों के पक्ष का नहीं मान सकते।

आमूल परिवर्तन की जरूरत

किसान पहचानें अपनी शक्ति

Author: 
मनीष शेखर
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 02 दिसम्बर, 2017

खेती एवं कृषि कार्य के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ हैं। विकास की अंधी दौड़ में हम कृषि से विमुख होकर शहरों की ओर रोजगार के अवसर तलाश रहे हैं। मान बैठे हैं कि कृषि कार्य से सम्मानजनक आय संभव नहीं है। इसका कारण है कि जहाँ सभी क्षेत्रों ने विकास के लिये समय के साथ अपने भीतर बदलाव किए हैं, वहीं कृषि में हम परंपरागत तरीकों से ही अच्छी आमदनी की अपेक्षा रखते हैं, जिससे हमें निराशा होती है

कृषक जीवन संघर्ष और आत्महत्या

Author: 
संतोष कुमार राय
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 02 दिसम्बर, 2017

किसानों की आत्महत्या के पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला कर्ज और दूसरा प्राकृतिक आपदाएँ तथा फसल नुकसान। कर्ज की व्याख्या सरकारी अमला अपने तरीके से करता रहा है। दरअसल, किसानों द्वारा लिये जाने वाले कर्ज का बड़ा हिस्सा गैर-सरकारी है, जो सरकारी तंत्र की आड़ में विकराल रूप धारण कर चुका है। इस पूरे प्रकरण को विदर्भ के संदर्भ में देखा जाए तो स्थिति साफ हो जाएगी।