बंजर जमीन मूल चुनौती

Source: 
डाउन टू अर्थ, जून, 2018

बंजर भूमिबंजर भूमिमध्य प्रदेश में पिछले साल प्रदर्शन के दौरान फायरिंग से 6 किसानों की मौत और महाराष्ट्र में कर्जमाफी के लिये आन्दोलन दो बड़ी घटनाएँ थीं। ये घटनाएँ भारत की कृषि को प्रभावित कर रहे गम्भीर संकट के बड़े लक्षण हैं। भारत में भूमि का बंजर होना या मरुस्थलीकरण कृषि की मूलभूत चुनौती है।

सरकारी अनुमान के मुताबिक, 30 प्रतिशत भारत बंजर हो गया है या बंजर होने के कगार पर है। भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्र 328.72 मिलियन हेक्टेयर (एमएचए) है, इसमें से 96.4 एमएचए बंजर होने के करीब है। आठ राज्यों- राजस्थान, दिल्ली, गोवा, महाराष्ट्र, झारखंड, नागालैंड, त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश में करीब 40 से 70 प्रतिशत भूमि बंजर होने की स्थिति में है। इसके अलावा 29 में से 26 राज्यों में पिछले दस वर्षों में जमीन के बंजर होने की दर में बढ़ोत्तरी हुई है।

जमीन को बंजर उस स्थिति में कहा जाता है जब क्षरण से भूमि क्षेत्र लगातार सूखता जाता है और अपने जलस्रोत खो देता है। साथ ही साथ अपनी वनस्पति और वन्यजीव भी गँवा देता है। कम बारिश और भूमिगत जल के नीचे जाने से मुख्यतः जमीन बंजर होती है। 10.98 प्रतिशत भूमि के बंजर होने के पीछे यह कारण जिम्मेदार है। जल क्षरण ठंडे और गर्म रेगिस्तानी इलाकों में देखा जा रहा है। अगला बड़ा कारण वायु क्षरण है।

डबलिंग फार्मर्स इनकम समिति की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कृषि भूमि का बड़ा भाग नई टाउनशिप और औद्योगिक इकाइयों को दिया जा रहा है। रिपोर्ट में चिंता जाहिर की गई है कि उजाड़ और गैर कृषि योग्य भूमि को खेती के दायरे में लाया जा रहा है। इससे कृषि की उत्पादकता और आय सुरक्षा पर असर पड़ा है।

घाटे का सौदा

Source: 
डाउन टू अर्थ, जून, 2018

कृषिकृषि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक महत्त्वपूर्ण वादा है- 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करना। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने 2018-19 के बजट में इसे शामिल किया। साथ ही एक अन्य घोषणा की कि खरीफ की फसलों के लिये उत्पादन लागत से 50 प्रतिशत अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित किया जाएगा। लेकिन क्या यह सम्भव है?

किसानों की आय दोगुनी करने के सम्बन्ध में केन्द्र सरकार द्वारा गठित दलवई समिति के अनुसार, किसानों की आमदनी नगण्य दर से बढ़ रही है। राष्ट्रीय स्तर पर 2002-12 के दशक में खेती से आमदनी औसतन 3.8 प्रतिशत बढ़ी। इस अवधि में कृषि क्षेत्र की समग्र वार्षिक विकास दर 3 प्रतिशत थी। हैरानी की बात यह है कि 2001 से 2011 के बीच देश में किसानों की संख्या 8.5 मिलियन कम हो गई है। वहीं, कृषि श्रमिकों की संख्या 37.5 मिलियन बढ़ी। इस अवधि में 16 राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों के किसानों की आय में ऋणात्मक वृद्धि हुई।

2012-13 के दौरान दिल्ली में एक किसान ने 14,079 रुपए अर्जित किये। 2002-03 के मुकाबले यह आमदनी 12.6 प्रतिशत कम है। खेती से आमदनी में यह गिरावट 13 राज्यों के अतिरिक्त पश्चिम बंगााल (4.2 प्रतिशत), बिहार (1.4 प्रतिशत) और उत्तराखण्ड (3.4 प्रतिशत) में दर्ज की गई। इसका क्या मतलब निकाला जाए? अब नजर डालते हैं किसानों की आमदनी दोगुनी करने की लागत पर। कृषि एक निजी उद्यम है जिसे सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों से मदद मिलती है।

अॉपरेशन ग्रीन से सुधरेगी कृषि की तस्वीर

Author: 
सुरेन्द्र प्रसाद सिंह
Source: 
कुरुक्षेत्र, अप्रैल 2018

आलू की खेतीआलू की खेती देश में अॉपरेशन फ्लड (श्वेत क्रान्ति) की अभूतपूर्व सफलता के बाद सरकार ने अॉपरेशन ग्रीन शुरू करने की घोषणा की है। इसमें टमाटर, प्याज और आलू जैसी फसलों को उसकी खेती से लेकर रसोईघर तक की आपूर्ति शृंखला को संयोजित करना है। इस पूरी शृंखला को मजबूत बनाने के लिये सरकार ने आम बजट में बजटीय प्रावधान किया है। इसमें कृषि मंत्रालय के साथ खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की भूमिका भी अहम होगी।

रसोईघर की प्रमुख सब्जियों में शुमार इन कृषि उत्पादों की खेती आमतौर पर देश के छोटे एवं मझोले स्तर के किसान ज्यादा करते हैं। यही वजह है कि पैदावार अधिक हुई तो मूल्य घट जाने से उनकी लागत मिलने के भी लाले पड़ जाते हैं। इसके विपरीत इन जिंसों की पैदावार घटी तो पूरे देश में हाय-तौबा मचना आम हो गया है। राजनैतिक तौर पर यह बेहद संवेदनशील मुद्दा बन जाता है।

अॉपरेशन ग्रीन के तहत इसमें एक तरफ किसानों को इनकी खेती के लिये प्रोत्साहित करना है तो दूसरी तरफ उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर इन जिंसों की साल भर उपलब्धता बनाए रखने की चुनौती से निपटना है। इन्हीं दोहरी बाधाओं से निपटने के लिये सरकार ने अॉपरेशन ग्रीन की शुरुआत कर दी है। आगामी वित्त वर्ष में इस दिशा में कार्य तेजी भी पकड़ सकता है। इसके चलते किसानों की आमदनी को दोगुना करने की सरकार की मंशा को पूरा करने में भी मदद मिलेगी।

बूँदें सहेजकर सब्जियाँ उगा रहे विजय

Author: 
रघुभाई जड़धारी
Source: 
दैनिक जागरण, 1 जून, 2018

पुण्डीर फसलों की सिंचाई के लिये बरसाती पानी तो उपयोग में लाते ही हैं, घर में उपयोग होने वाले पानी को भी एक अलग टैंक में संग्रहीत करते हैं। रही बरसाती पानी के संचय की बात तो इसका तरीका भी बेहद सरल है। घरों की छतों के किनारे टिन की नालियाँ बनाकर उन्हे टैंकों से जोड़ा गया है। बारिश होने पर सारा पानी इन नालियों से टैंको में चला जाता है, जिसे बाद में सिंचाई में उपयोग किया जाता है।

गुम हो गई हवेली खेती की पद्धति


नर्मदा के कछार के प्रारम्भिक हिस्से में मध्य प्रदेश के जबलपुर, नरसिंहपुर, सागर और दमोह जिले के कुछ हिस्से आते हैं। इन जिलों में लगभग 50 साल पहले तक खेती की हवेली व्यवस्था प्रचलन में थी। इस व्यवस्था को बड़े-बूढ़े किसान, आज भी याद करते हैं। उनका कहना है कि इस व्यवस्था के अन्तर्गत एक से तीन मीटर (कहीं-कहीं और अधिक) ऊँची-ऊँची मेंड़ें डालकर रबी की फसल लेने के लिये खेत तैयार किये जाते थे।

मेंड़ बनाने का काम फसल कटाई के बाद, अक्सर गर्मी के मौसम में किया जाता था। उन्हें खूब मजबूत बनाया जाता था। उनके निर्माण में खेत की ही मिट्टी का उपयोग किया जाता था। हवेली खेतों की साइज दो हेक्टेयर से लेकर 10-12 हेक्टेयर तक होती थी। खेत लगभग समतल होते थे। उन खेतों को बरसात के मौसम में पानी से भरकर रखा जाता था। पानी के लगभग चार माह तक भरे रहने के कारण खेतों में अक्सर पैदा होने वाले खरपतवार, जिसे स्थानीय भाषा में कांस कहते हैं, पानी में गलकर नष्ट हो जाते थे।

कहते हैं कि हवेली व्यवस्था का विकास पूर्वी नर्मदा कछार में उत्तर दिशा से आये खेतिहर लोगों ने किया था। उन्होंने स्थानीय आदिवासियों को दक्षिण की ओर खदेड़ा और घाटी के उपजाऊ हिस्से पर अपनी मिल्कियत कायम की। स्थानीय मिट्टियों की उत्पादकता से सम्बन्धित गुणों को पहचाना। बरसात की मात्रा और उसके वितरण की बारीकियों तथा साल भर के मौसम के व्यवहार को समझा।

मौसम के साल-दर-साल के बदलाव की बारीकियों को जाना। उत्पादन पर आने वाले सम्भावित खतरों को समझा। सारी परिस्थितियों और सम्भावनाओं को ध्यान में रख सबसे अधिक निरापद फसलों को चुना। अवलोकनों तथा समय की कसौटी पर खरी उतरी उनकी निरापदता को भी परखा। हवेली व्यवस्था उसी गहन गम्भीर अवलोकन प्रक्रिया तथा ग्रामीण समाज की प्रज्ञा का परिणाम है।

बाँस मिशन आर्थिक समृद्धि का जरिया

Author: 
नीरेन्द्र देव
Source: 
योजना, अप्रैल 2018

पारम्परिक किसानों का तजुर्बा यह कहता है कि मक्का या बाजरे के साथ चावल की खेती करने पर प्रदर्शन बेहतर रहता है। आमतौर पर विभिन्न समुदाय के लोग अलग-अलग तरीके से खेती करते हैं। मसलन झूम खेती और दूसरी प्रणाली सीढ़ीनुमा खेती की है। सीढ़ीनुमा खेती को घाटियों और पहाड़ियों में अंजाम दिया जाता है, जबकि जंगल और आसपास के इलाकों में सिफ्टिंग या झूम सिस्टम के जरिए खेती की जाती है। यह खेती की बेहद पुरानी परम्परा है।

सोयाबीन में सुनहरा मौका

Author: 
संदीप सेन
Source: 
डाउन टू अर्थ, मई, 2018

सोयाबीन की खेतीसोयाबीन की खेती (फोटो साभार - डाउन टू अर्थ)विश्व की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ आमने-सामने हैं जिसके कारण व्यापार युद्ध की प्रबल सम्भावना पैदा हो गई है।

2 मार्च को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रीय सुरक्षा पर लागू होने वाले व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232 के तहत अल्युमिनियम और इस्पात के आयात पर भारी शुल्क लगा दिया। उन्होंने वाशिंगटन में उद्योग जगत के उपस्थित लोगों के बीच घोषणा करते हुए कहा, “यदि आप करों का भुगतान नहीं करना चाहते हैं तो अपने संयंत्र अमेरिका में लगाएँ।” बिजनेस न्यूज चैनल सीएनबीसी के एंकर जिम क्रैमर ने टिप्पणी करते हुए कहा, “ट्रम्प सरकार द्वारा आयातित स्टील पर प्रतिबन्ध लगाया गया है जिसे रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों के द्वारा समर्थन मिलना एक दुर्लभ उदाहरण है।”

हालांकि ट्रम्प ने इस छूट की घोषणा कनाडा और मैक्सिको के लिये ही की है और कहा है कि अन्य सहयोगियों के लिये भी अपवाद तैयार किये जा सकते हैं। कई लोगों का मानना है कि इस टैरिफ- स्टील पर 25 फीसदी और अल्युमिनियम पर 10 फीसदी का वास्तविक लक्ष्य चीन है, जो पूरे विश्व का आधा स्टील का निर्माण करता है और अक्सर इसे अन्य बाजारों में खपाने का आरोप भी लगाता रहा है, जिससे कीमतों में गिरावट होती है।

घर की जरूरतों ने गाँव का हुलिया बदल दिया

Author: 
राजकुमारी
Source: 
अमर उजाला, 11 मई 2018

मैं अपनी मेहनत से अपने परिवार की दशा बदलना चाहती थी। और इसके लिये मेरे पास जरिया सिर्फ खेती ही था। इसी प्रयास में मैं राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय गई, जहाँ से मैंने अपनी जमीन के अनुकूल खेती की उन्नत जानकारी हासिल की। फिर मैंने पपीते के साथ ओल (जिमीकंद) की खेती भी शुरू की। अपनी फसल को सीधे बाजार में बेचने के बजाय मैंने दूसरा रास्ता अपनाया। इस घटना को साढ़े तीन दशक से भी ज्यादा वक्त बीत चुका है। मैंने दसवीं की पढ़ाई पूरी ही की थी कि मेरी शादी कर दी गई। मैं अपने पति के साथ संयुक्त परिवार में रहने लगी। मेरे पति परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ तम्बाकू की खेती करते थे।

शादी को कुछ ही वक्त बीता था कि परिवार का बँटवारा हो गया, और मेरे पति के हिस्से में जमीन का एक टुकड़ा आया। जमीन का वही टुकड़ा हम पति-पत्नी के जीवन का सहारा था। मेरे पति अब भी तम्बाकू की खेती करते थे। चूँकि मैं थोड़ा पढ़ी-लिखी थी, सो मेरे दिमाग में समाज पर तम्बाकू के दुष्प्रभाव की बात चलती रहती थी।

मैंने अपने पति से भी यह साल पूछा कि आप तम्बाकू ही क्यों उगाते हैं। पर शायद मेरी चिन्ताएँ पति पर कोई असर डालने में नाकाम रहीं। यह देख मैंने खुद फावड़ा उठाने का फैसला लिया और अपने खेत के एक हिस्से में सब्जियों की खेती शुरू कर दी। इससे पहले मुझे खेती करने का कोई अनुभव नहीं था, मगर इच्छाशक्ति के बल पर मैं एक झटके में शर्मीली गृहिणी से महिला किसान में बदल गई।

स्मार्ट ग्रामीण जीवन के लिये गोबर धन योजना

Author: 
निमिष कपूर
Source: 
कुरुक्षेत्र, मार्च, 2018

गोबर धन योजनागोबर धन योजना देश के गाँवों में अब गोबर और कृषि अवशेष से ऊर्जा और समृद्धि का आगाज होने वाला है। बजट 2018 में ग्रामीणों के जीवन को बेहतर बनाने के लिये सरकार ने एक अनूठा प्रयास किया है। ग्रामीण विकास के लिये एक नई योजना की घोषणा की गई है जिसका शीर्षक है गोबर धन योजना। यदि गोबर धन योजना देश के ग्रामीण अंचलों में समय से और वैज्ञानिक तरीके से लागू की जाती है तो देश के 155 गाँव सफलता की नई इबारत लिखेंगे, जिसमें किसान और पशुपालकों की आय के साधन बढ़ेंगे और वे वैज्ञानिक सोच के साथ देश की आर्थिकी में योगदान देंगे।

ग्रामीणों के जीवन को बेहतर बनाने के लिये 2018-19 के बजट में गोबर-धन यानी गैलवनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्स धन योजना की घोषणा की गई है। इस योजना में खेती और पशुपालन से जुड़े एक बड़े जनसमूह की भागीदारी, उनका आर्थिक लाभ और समग्र विकास की एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा इस योजना में परिलक्षित होती है।

गोबर धन योजना के अन्तर्गत पशुओं के गोबर और खेतों के ठोस अपशिष्ट पदार्थों को कम्पोस्ट, बायोगैस और बायो-सीएनजी में परिवर्तित किया जाएगा। समावेशी समाज निर्माण के दृष्टिकोण के तहत सरकार ने विकास के लिये 115 आकांक्षायुक्त जिलों की पहचान की है। इन जिलों में स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, सिंचाई, ग्रामीण विद्युतीकरण, पेयजल, शौचालय तक पहुँच आदि में निवेश करके निश्चित समयावधि में विकास की गति को तेज किया जाएगा। सरकार जिन 115 जिलों को विकास का मॉडल बनाने की तैयारी में है, वहाँ गैलवनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्स धन योजना मुख्य भूमिका निभाएगी।