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जल संसाधन का कृष्येत्तर क्षेत्रों में उपयोग

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

पेयजल के क्षेत्र में :


स्वच्छ एवं पर्याप्त पेयजल की उपलब्धता स्वस्थ मानव और सभ्य समाज की न केवल आधारभूत आवश्यकता है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति का मूलभूत अधिकार भी है। हमारे संविधान में पेयजल की आपूर्ति विषयक प्राविधान सातवीं अनुसूची के भाग-दो में देते हुए इसे राज्य सरकारों के दायित्वों के अंतर्गत राज्य का विषय रखा गया है। प्रत्येक जनपद की सीमा के अंतर्गत सभी शहरी एवं नगरीय बस्तियों में शुद्ध एवं पर्याप्त पेयजल व्यवस्था सुनिश्चित करना संबंधित राज्य सरकारों का दायित्व है तथा केंद्र सरकार राज्य सरकार द्वारा किये गये तत्संबंधी प्रयासों के लिये आर्थिक सहायता प्रदान करती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सामान्यत: शहरी क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु व्यापक प्रयास किये गये, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों की ओर सरकार द्वारा यथोचित ध्यान देना बाद में प्रारंभ किया गया। अत: शहरी क्षेत्रों की तुलना में हमारे ग्रामीण क्षेत्र शुद्ध पेयजल की आपूर्ति में पिछड़े रहे हैं। पिछले दो तीन दशकों में ग्रामीण क्षेत्र में सभी ग्राम वासियों को पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिये विभिन्न पेयजल योजनाओं एवं कार्यक्रमों को प्रभावपूर्ण तरीकों से संचालित किया जा रहा है।

मनुष्य के पीने, खाना बनाने, स्नान करने, बर्तनों की सफाई एवं घर की धुलाई तथा शौच व्यवस्था आदि हेतु जल की आवश्यकता होती है। परिणामत: शुद्ध एवं स्वच्छ जल के स्रोत सदैव से मानव आकर्षण के केंद्र रहे हैं। घरेलू कार्यों में जल के उपयोग की मात्रा यद्यपि तुलनात्मक रूप से कम है, फिर भी जल के इस उपयोग का महत्त्व अत्यधिक है। जनपद के निवासी तम्बू, झोपड़ी, कच्चे पक्के छोटे बड़े मकान बनाकर जलस्रोतों के सहारे ग्राम तथा नगरों में निवास कर रहे हैं। इस क्षेत्र में परिवार के रहन-सहन का स्तर तथा ग्रामीण नगरीय बस्तियों के अनुसार जलापूर्ति प्रतिरूप में प्रर्याप्त भिन्नता मिलती है। जो निम्नांकित वर्णन से स्पष्ट है।

ग्रामीण बस्तियों में जल का उपयोग :

वैज्ञानिकों ने नमी की कमी में उगाई जा सकने वाली किस्मों के लिये मेथी के आनुवंशिक गुणों की खोज की (Fenugreek varieties for low-moisture soils)

Source: 
इंडिया साइंस वायर, 18 अक्टूबर, 2017

. वास्को-द-गामा (गोवा) : स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत गुणकारी मेथी की नई किस्मों को विकसित करने के लिये भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने महत्त्वपूर्ण शोध किए हैं। आईसीएआर-राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केंद्र, तबीजी, अजमेर के वैज्ञानिकों ने पानी की निम्न उपलब्धता वाले स्थानों में भी मेथी की पैदावार बढ़ाने के लिये 13 विविध आनुवंशिक गुणों (जीनोटाइप) वाले मेथी के बीजों के परीक्षण किए। इनमें से चार एएफजी-4, एएफजी-6, हिसार सोनाली और आरएमटी-305 कम पानी में भी अच्छी पैदावार देने वाले साबित हुए हैं।

सामान्य भाषा में जीनोटाइप का मतलब होता है डीएनए में जीनों का एक ऐसा समूह, जो एक विशिष्ट विशेषता के लिये जिम्मेदार होता है। इन जीनोटाइपों की पहचान करके किसी विशेष बीमारी या जलवायुविक परिस्थितियों के प्रति प्रतिरोध वाली विभिन्न उन्नत किस्मों को बनाया जाता है, जिनसे उच्च पोषण मूल्य और अधिक पैदावार वाली फसलें तैयार की जाती हैं।

मेथी रबी की फसल है। इसे मुख्य रूप से राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, पंजाब और उत्तर प्रदेश में अक्टूबर से लेकर नवंबर के मध्य में बोया जाता है। मेथी के सही तरह से अंकुरण के लिये मृदा में पर्याप्त नमी बहुत जरूरी होती है। अतः वैज्ञानिकों ने विशेषरुप से शुष्क भूमि या नमी की कमी वाले क्षेत्रों में आनुवंशिक परिवर्तनशीलता द्वारा ऐसी किस्में तैयार करने का प्रयास किया है, जो कम पानी में भी मेथी की उत्तम गुणवत्ता वाली अधिक उपज दे सकेंगी। इन नमी-सहिष्णु किस्मों से पानी की पर्याप्त मात्रा वाले स्थानों में पानी की बचत के साथ साथ अब मेथी को देश के अन्य शुष्क भागों में भी आसानी से उगाया जा सकता है।

लघु बाँध सिंचाई

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

प्रकृति ने प्राकृतिक संसाधन के रूप में अनेक निधियाँ प्रदान की हैं। इन प्राकृतिक संसाधनों में जल सबसे बहुमूल्य है। पानी का प्रयोग प्राणीमात्र, मनुष्य, पशु, पक्षी, पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ सभी करते हैं, इसीलिये जल को जीवन का आधार कहा गया है।

अध्ययन क्षेत्र में कूप एवं नलकूप सिंचाई

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

जल जीवन का आधार है। जल का सर्वाधिक उपभोग कृषि क्षेत्र में होता है। जो उसे कृत्रिम एवं प्राकृतिक साधनों द्वारा प्राप्त होता है। वर्षा के अभाव में कृत्रिम साधनों द्वारा खेतों को जल उपलब्ध कराया जाता रहा है। भाराीय वर्षा पूर्णत: मानसून से प्राप्त होती है, जो अनिश्चित, अनियमित तथा असामयिक होने के साथ-साथ विषम भी है। अत: कृषि के लिये सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। भारत में प्राचीन काल से ही सिंचाई के लिये कृत्रिम साधनों का प्रयोग होता आ रहा है। सिंचाई के लिये जल दो रूपों में प्राप्त होता है। धरातलीय जल तथा भूमिगत जल किंतु वायु की तरह जल यथेष्ठ मात्रा में उपलब्ध नहीं है। विभिन्न उपयोगों के लिये शुद्ध जल की आवश्यकता पड़ती है, जिसका प्रमुख स्रोत भूमिगत जल है। यह जलराशि धरातल के नीचे पाई जाती है। धरातलीय जल प्रवेश्य चट्टानों में निरंतर नीचे की ओर रिसता रहता है। वर्षा काल में जब धरातल पर जल की मात्रा बढ़ जाती है, जल का रिसाव भी बढ़ जाता है। इसके कारण बड़ी मात्रा में जल नीचे चला जाता है। फलत: भूमि के नीचे जल का स्तर ऊँचा हो जाता है। कूपों और नलकूपों के माध्यम से इस जल का उपयोग कर लेते हैं।

कूप एवं नलकूप ऐसे कृत्रिम साधन हैं, जिससे भूमिगत जल को बाहर निकाला जाता है। इस जल का उपयोग विभिन्न कार्यों में किया जाता है, जिनमें सिंचाई भी एक है। भारत में कूप एवं नलकूप सिंचाई के महत्त्वपूर्ण साधन हैं। वर्तमान समय में इन दोनों साधनों के सम्मिलित योगदान से 55.90 प्रतिशत भू-भाग सींचा जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश में कूप एवं नलकूप 70.47 प्रतिशत क्षेत्र को सिंचन क्षमता उपलब्ध कराते हैं। कूप एवं नलकूप सिंचाई साधनों की अपनी अलग-अलग विशेषतायें हैं।

कूप


कूप भूमिगत जल निकालने का एक परंपरागत साधन है। इसका उपयोग प्राचीन काल से चला आ रहा है। भारत में कूपों की सहायता से कुल सिंचित भूमि के लगभग 22.47 प्रतिशत भाग में सिंचाई की जाती है। कुओं द्वारा वहीं सिंचाई की जाती है, जहाँ इनके निर्माण के लिये निम्न भौगोलिक दशाएँ अनुकूल हों।

लोगों को मिलेगा मंडुवे (कोदो) के आटे की बर्फी का स्वाद (sweets of finger millet flour)


मंडुआ (कोदो)मंडुआ (कोदो)उतराखण्ड के मंडुवे की माँग सात समंदर पार तक है। बशर्ते इस ओर हम लोग ध्यान देंगे तो आने वाले समय में मंडुआ लोगों की आजीविका का साधन बन जाएगा। पहले पहल लोग मंडुआ को कइयों स्तर पर उपयोग में लाते थे। मंडुवे की रोटी तो आम बात थी, चूँकि यदि किसी दूधमुहे बच्चे को जुकाम, खाँसी इत्यादि की समस्या होती थी तो लोग एक बाउल में पानी उबालकर उसमें मंडुवे का आटा डालकर उसकी भाप सुँघाना ही ऐसी बीमारी का यह तरीका रामबाण इलाज था।

मंडुवे के आटे से स्थानीय स्तर पर कई प्रकार की डीस भी तैयार होती थी जो ना तो तैलीय होती थी और ना ही स्पाइसी बजाय लोग इसे अतिपौष्टिक कहते थे। जैसे सीड़े, डिंडके जिन्हें सिर्फ-व-सिर्फ हल्की आँच के सहारे दो बर्तनों में रखकर पानी के भाप से पकाया जाता है। इसमें चीनी गुड़ और मंडुवे के आटे के अलावा और कुछ प्रयोग नहीं होता था। मगर बाजार ने इस मंडुवे को गेहूँ के सामने एक बारगी पछाड़ दिया परन्तु अब धीरे-धीरे मंडुवे की पौष्टिकता का पता चलने लग गया और मंडुवे का बाजार ऊपर होने लग गया है।

अध्ययन क्षेत्र में नहर सिंचाई

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में सिंचाई की अत्याधिक आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि यहाँ मौसमी वर्षा होने के कारण वर्ष भर मिट्टी में नमी संचित नहीं रह पाती है। यहाँ वर्षा की अनिश्चितता पाई जाती है, तथा वर्षा का वितरण भी सर्वत्र एक समान नहीं होता है। उष्ण उपोष्ण कटिबंध में स्थित होने के कारण जल का वाष्पीकरण अधिक होता है। इन परिस्थितियों में बिना सिंचाई किये फसलों का अच्छा उत्पादन करना संभव नहीं हो पाता है। यहाँ पर्याप्त मात्रा में जल बहुत थोड़े भाग को मिलता है, जबकि बहुत बड़ा क्षेत्र कम वर्षा से प्रभावित है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में बिना सिंचाई किये अच्छा उत्पादन प्राप्त नहीं किया जा सकता। वर्तमान समय में तेज गति से बढ़ती जनसंख्या के भरण-पोषण के लिये गहन कृषि की अत्यधिक आवश्यकता है। अत: गहन कृषि एवं जनपद के समुचित विकास के लिये सिंचाई सुविधाओं में वृद्धि आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य हो गयी है। सिंचाई स्रोतों में नहर सिंचाई सबसे सुलभ एवं सस्ता साधन है। अध्ययन क्षेत्र में सबसे अधिक क्षेत्र पर नहरों द्वारा सिंचाई की जाती है।

नहरों का वितरण एवं उनमें जल की उपलब्धता :

अध्ययन क्षेत्र में कृषि आयाम

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

भूमि उपयोग एवं जल संसाधन एक दूसरे के पूरक हैं, अत: जल संसाधन की उपलब्धता के अध्ययन के संबंध में भूमि उपयोग का अध्ययन बहुत महत्त्वपूर्ण है। भूमि उपयोग के प्रतिरूप का प्रभाव धरातलीय जल के पुनर्भरण पर पड़ता है। वन, झाड़ियों, उद्यानों, फसलों एवं घास के मैदानों द्वारा भूमि आच्छादित रहती है। भूमिगत जल के रिसाव को प्रभावित करने में वाष्पन एवं वाष्पोत्सर्जन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। भूमि उपयोग का अध्ययन हम निम्न बिंदुओं में करते हैं।

भूमि उपयोग प्रतिरूप :


भूमि उपयोग भौगोलिक अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। वास्तविक रूप में भूमि उपयोग शब्द स्वत: वर्णात्मक है। परंतु प्रयोग पारस्परिक शब्द उपयोग तथा भूमि संसाधन उपयोग के अर्थ की व्याख्या में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। फॉक्स के अनुसार - भूमि उपयोग, के अंतर्गत भू-भाग प्राकृत प्रदत्त विशेषताओं के अनुरूप रहता है। इस प्रकार यदि कोई भू-भाग प्राकृत मानवीय प्रभाव से वंचित है अथवा उसका उपयोग प्राकृतिक रूप से हो रहा है, तो उस भाग के लिये ‘‘भूमि प्रयोग’’ शब्द का प्रयोग उचित होगा। यदि किसी भू-भाग पर मानवीय छाप अंकित है या मानव अपनी आवश्यकता के अनुरूप उपयोग कर रहा है तो उस भू-भाग के लिये भूमि उपयोग शब्द का योग अधिक उचित होगा। इस प्रकार मानव के उपयोग के साथ भूमि संसाधन इकाई बन जाती है। जब भू-भाग का प्राकृतिक रूप लुप्त हो जाता हैं तथा मानवीय क्रियाओं का योगदान महत्त्वपूर्ण हो जाता है, तो उसे भूमि उपयोग कहते हैं। किसी स्थान की भूमि जल संसाधन उपयोग को अनेक प्रकार से प्रभावित करती है, क्योंकि जिन स्थानों की भूमि समतल होती हैं, पेड़-पौधे अधिक होते हैं, जल का अधिक पुनर्भरण होता है। जबकि इसके विपरीत क्षेत्र जहाँ पर वर्षा के बाद पानी बहकर नदियों में चला जाता है, और जल स्तर काफी नीचे चला जाता है। अत: जल संसाधन की उपलब्धता के अध्ययन में भूमि उपयोग प्रारूप का अध्ययन आवश्यक हो जाता है।

गेहूँ का आधार एवं प्रमाणित बीजोत्पादन

Author: 
डॉ. रवि कुमार एवं डॉ. ऋषिपाल सिंह
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

गेहूँ की खेतीगेहूँ की खेतीआधार बीज तैयार करने के लिये प्रजनक बीज किसी प्रमाणीकरण संस्था के मान्य स्रोत से प्राप्त किया जा सकता है। बोने से पहले थैलों पर लगे लेबल से बीज के किस्म की शुद्धता की जाँच कर लेनी चाहिए और लेबल को सम्भालकर रखना चाहिए।

निबन्धन


जिस खेत में बीजोत्पादन करना हो उसका निबन्धन राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा करवाना चाहिए। गेहूँ स्वंय- परागित फसल है, अतः प्रमाणित बीज उत्पादन के लिये प्रमाणीकरण शुल्क मात्र 175 रुपया प्रति हेक्टेयर एवं निबन्धन शुल्क 25 रुपया प्रति हेक्टेयर है।

खेत का चयन


गेहूँ के बीज उत्पादन के लिये ऐसे खेत का चुनाव करना चाहिए, जिसमें पिछले मौसम में गेहूँ न बोया गया हो। अगर विवशतावश वही खेत चुनाव करना पड़े तो उसी प्रभेद को उस खेत में लगाना चाहिए जो कि पिछले मौसम में बोया गया था और बीज की आनुवंशिक शुद्धता प्रमाणीकरण मानकों के अनुरूप थी। खेत की मृदा उर्वक, दोमट हो एवं जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए।

उन्नत प्रभेद


उत्पादन तकनीकी का सबसे अहम पहलू उपयुक्त किस्म का चुनाव होता है। झारखण्ड राज्य के लिये अनुशंसित किस्में सिंचित समय पर बुआई के लिये एच.यू.डब्ल्यू. 468, के 9107 एवं बिरसा गेहूँ 3 हैं। इन किस्मों की उपज क्षमता 40-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। सिंचित विलम्ब से बुआई के लिये एच.यू.डब्ल्यू. 234, एच.डी. 2643 (गंगा) एवं बिरसा गेहूँ 3 है। इनकी उपज क्षमता 35-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

पृथक्करण

जल संसाधन की उपलब्धता का आकलन एवं वितरण

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

जल संसाधन की उपलब्धता का आकलन एवं वितरण


जल मानव जीवन की अत्यंत महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है, प्राणों की रक्षा के लिये वायु के बाद द्वितीय स्थान जल का है। जल मुख्यत: दो रूपों में प्राप्त होता है- 1. सतही जल 2. भूमिगत जल। सतही जल एवं भूगर्भिक जल एक ही जल पद्धति के भाग हैं, जो एक दूसरे से अंत: संबंधित हैं तथा एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं। भारत में संपूर्ण वैश्विक जनसंख्या का लगभग 16 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, परंतु भारतीय उपमहाद्वीप की नदियों में औसत मासिक जल प्रवाह का मात्र 4 प्रतिशत जल प्राप्त होता है। यह भारत में जल की आवश्यकता से कम उपलब्धता का द्योतक है। चीन की नदियों में यही औसत जल प्रवाह 8 प्रतिशत है, जिसे भारत से 25 प्रतिशत अधिक जनसंख्या का भरण-पोषण करना पड़ता है।