जैविक तरीके से बढ़ सकते हैं अश्वगंधा के औषधीय गुण

Source: 
इंडिया साइंस वायर, 23 अप्रैल, 2018

प्रयोगशाला में अश्वगंधा के पौधे का उत्पादन और फील्ड में अश्वगंधा के पौधों का उत्पादनप्रयोगशाला में अश्वगंधा के पौधे का उत्पादन और फील्ड में अश्वगंधा के पौधों का उत्पादन गोवा। भारतीय, अफ्रीकी और यूनानी पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों में तीन हजार से अधिक वर्षों से अश्वगंधा का उपयोग हो रहा है। भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ताजा अध्ययन में पाया है कि जैविक तरीके से उत्पादन किया जाए तो अश्वगंधा के पौधे की जीवन दर और उसके औषधीय गुणों में बढ़ोत्तरी हो सकती है।

शोध के दौरान सामान्य परिस्थितियों में उगाए गए अश्वगंधा की अपेक्षा वर्मी-कम्पोस्ट से उपचारित अश्वगंधा की पत्तियों में विथेफैरिन-ए, विथेनोलाइड-ए और विथेनोन नामक तीन विथेनोलाइड्स जैव-रसायनों की मात्रा लगभग 50 से 80 प्रतिशत अधिक पायी गई है। ये जैव-रसायन अश्वगंधा के गुणों में बढ़ोत्तरी के लिये जिम्मेदार माने जाते हैं।

अमृतसर स्थित गुरु नानक देव विश्वविद्यालय और जापान के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्ड इंडस्ट्रियल साइंस एंड टेक्नोलॉजी के वनस्पति वैज्ञानिकों द्वारा किया गया यह अध्ययन प्लॉस वन नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

झींगों के साथ रेतीले झींगों के पालन की संभावना

Author: 
जो कि किलकूडन, वी कृपा, ऐ. मार्ग्रट मुत्तु रत्तिनम, सी मणिबॉल, वी धनपति, ए.डी. गांधी, वी.एल.लेस्सली और एस. गणेशन
Source: 
केन्द्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान का मद्रास शोध केन्द्र

निष्कर्ष
झींगा मछली की ग्रो आउट व्यवस्था की पूर्णता के दौरान 35 प्रति sq.m, के क्षेत्र में सफेद झींगा फेन्नरोपेनियस इंडिकस के बीज (30-40 mm TL; 0.3-0.4 g) प्राप्त हुए। शुरुआत में झींगा मछलियों की संख्या 463 और झींगों की संख्या 425 थी। झींगों को वाणिज्यिक पेलेट खाद्य पदार्थ खिलाया गया और झींगा मछलियों को ताजा क्लैम मांस खिलाया गया। फसल के दौरान, झींगों में 98% से अधिक जीवन्तता पाई गई और झींगा मछलियों में 82.9% जीवन्तता पाई गई।

इसमें से 2835 मोल्ट निकाले गए। अंतिम झींगा मछली जैव भार का फसल 37.712 kg प्रति sq.m था और कुल झींगा मछली जैव भार का फसल 3.02 kg प्रति sq.m था। झींगों का जैव भार फसल 278.6g प्रति Sqm था। उक्त गहन व्यवस्था में प्राप्त उत्पादन से यह स्पष्ट होता है कि अधिक सघनता में झींगा के साथ रेत में होने वाले झींगा मछलियों को जलजीव पालन व्यवस्थाओं में एक साथ पालना संभव है क्योंकि उनमें खाद्य पदार्थों की स्पर्धा नहीं होती और झींगा मछली, रेतीले झींगों का शिकार नहीं करते जिससे इस ग्रो आउट व्यवस्था से अत्यधिक आर्थिक लाभ प्राप्त हो सकते हैं।

परिचय

तो कैसे मिटेगी इण्डिया और भारत के बीच की खाई

Author: 
देवेन्दर शर्मा
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, अप्रैल 2018

अब तो बाजार की अर्थव्यवस्था भी धर्म का अंग बन गई है। जो इस पर विश्वास रखते हैं वो राष्ट्रीयकृत बैंकों के कारपोरेट डिफॉल्ट्स का भी समर्थन करने के लिये तैयार हैं। यहाँ तक कि आर्थिक सलाहकार ने भी कह दिया कि कारपोरेट ऋण की माफी आर्थिक विकास का हिस्सा है जबकि किसानों की ऋण माफी से ऋण अनुशासनहीनता बढ़ती है? शहरी इण्डिया और ग्रामीण भारत के बीच बहुत दूरी है। दोनों एक-दूसरे को नहीं समझते हैं और ये खाई बढ़ती ही जा रही है। शहरों में रहने वाले लोग ग्रामीण परिवेश से बहुत दूर होते चले गए हैं। उन्हें गाँव की जीवनशैली का जरा भी आभास नहीं है।

आलू की फसल के लिये खतरा बन रहा है यूरोपीय मूल का रोगाणु

Author: 
मनु मुदगिल
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 13 अप्रैल, 2018

वर्ष 2013-14 में पश्चिम बंगाल में लेट ब्लाइट नामक बीमारी से आलू की फसल में प्रति हेक्टेयर उत्पादन में 8000 किलोग्राम तक गिरावट हो गई थी, जिससे किसान कर्ज के बोझ से दबकर आत्महत्या करने को मजबूर हो गए। लेट ब्लाइट आलू के खेत को 2-3 दिन के भीतर नष्ट कर देती है। इसका सबसे भयावह उदाहरण वर्ष 1840 के आयरलैंड में आलू के अकाल को माना जा सकता है, जिसके कारण वहाँ पर करीब 20 लाख लोग प्रभावित हुए थे।

जैविक खेती पर जोर के साथ जैविक मटन की अनूठी पहल

Author: 
कृष्णेंदु कुमार
Source: 
अमर उजाला, 09 अप्रैल, 2018

उत्तराखण्ड के पर्वतीय जनपदों में रसायन वाले उर्वरकों का इस्तेमाल नहीं के बराबर होता है, इसका मतलब है कि इन जनपदों की भेड़-बकरियाँ जैविक चारे का सेवन करती हैं। ऐसे में उनके शरीर में हानिकारक रसायनों की मात्रा कम होती है। ऐसी भेड़-बकरियों के मांस की ही मार्केटिंग जैविक मांस के रूप में करने की योजना बनाई गई है। इसके उत्पादन के लिये पशुपालन विभाग पशुपालकों की सोसाइटी बनायेगा।

आधुनिक कृषि

Source: 
पर्यावरण विज्ञान उच्चतर माध्यमिक पाठ्यक्रम

आधुनिक कृषि प्रणाली ने समूचे देश में अनाज के उत्पादन की वृद्धि में भारी योगदान दिया है। आधुनिक कृषि प्रणाली के प्रयोग से देश अनाज के उत्पादन में पर्याप्तता प्राप्त कर सकता है। कृषि कार्य में उपयोगी आधुनिक विधियाँ हैं- बेहतर बीजों का प्रयोग, उचित सिंचाई तथा रासायनिक खादों के प्रयोग से पौधों को पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों की आपूर्ति व कीटनाशकों के प्रयोग से पौधों को लगने वाली बीमारियों व कीटाणुओं का नियंत्रण। आधुनिक कृषि में ट्रैक्टर, कम्बाइन हार्वेस्टर व सिंचाई के लिये ट्यूबवेलों द्वारा आधुनिक जोताई (खेती) की विधियों का प्रयोग किया है। उच्च उत्पादकता वाले बीजों के माध्यम से खाद्य-उत्पादन में भारी वृद्धि को हरित क्रांति कहा गया है। आधुनिक कृषि का मुख्य उद्देश्य अच्छी फसल के साथ-साथ वायु, जल, भूमि व मानवीय स्वास्थ्य का संरक्षण भी होना चाहिए।

उद्देश्य


इस पाठ के अध्ययन के समापन के पश्चात, आपः

- हरित क्रांति को परिभाषित कर पाएँगे;
- भारत के प्रयोग में आने वाले ऊँची उत्पादकता के पौधों की किस्मों (HYV) के विषय में जान पाएँगे;
- खादों व कीटनाशकों की आवश्यकता का महत्त्व जान पाएँगे;
- बेहतर किस्म के बीजों, कृषि यंत्रों और सिंचाई की आवश्यकता पर पर्याप्त जोर दे सकेंगे;
- मशरूम (खुम्मी) की बुवाई, पशुपालन व मत्स्य पालन की विधियाँ जैसी नई कृषि विधियों के बारे में जान पाएँगे;
- पशुपालन को परिभाषित कर पाएँगे;
- मवेशियों का निवास, भोजन इत्यादि के सम्बन्ध में प्रबंधन प्रक्रिया का वर्णन कर पाएँगे;
- मवेशियों को साधारणतः होने वाली बीमारियों का नाम बता पाएँगे;
- मरे हुए पशुओं के निपटान का पर्यावरण पर दुष्प्रभाव से सम्बन्ध जोड़ सकेंगे;
- हार्मोनों के अविवेकपूर्ण ढंग से प्रयोग का मवेशी, इत्यादि पर दुष्प्रभाव को जान पाएँगे;
- जलीय कृषि के विपरीत प्रभावों की विवेचना कर पाएँगे।

20.1 हरित क्रांति क्या है

जैव प्रौद्योगिकी एवं उसके उपयोग

Source: 
पर्यावरण विज्ञान उच्चतर माध्यमिक पाठ्यक्रम

हरित क्रान्ति द्वारा खाद्य आपूर्ति में तिगुनी वृद्धि में सफलता मिलने के बावजूद मनुष्य की बढ़ती जनसंख्या का पेट भर पाना सम्भव नहीं है। उत्पादन में वृद्धि आंशिक रूप से उन्नत किस्मों की फसलों के उपयोग के कारण हैं जबकि इस वृद्धि में मुख्यतया उत्तम प्रबन्धकीय व्यवस्था और कृषि रसायनों का प्रयोग एक कारण है। हालांकि विकासशील देशों के किसानों के लिये कृषि रसायन काफी महंगे पड़ते हैं व परम्परागत प्रजनन के द्वारा निर्मित किस्मों से उत्पादन में वृद्धि सम्भव नहीं है। तुम पिछले अध्याय में जैव प्रौद्योगिकी जिसके बारे में पढ़ चुके हो, उसमें मुख्यतया आनुवंशिक रूप से रूपान्तरित सूक्ष्मजीवों, कवक, पौधों व जन्तुओं का उपयोग करते हुए जैव भैषजिक व जैविक पदार्थों का औद्योगिक स्तर पर उत्पादन किया जाता है। जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग चिकित्साशास्त्र, निदानसूचक, कृषि में आनुवंशिकतः रूपान्तरित फसलें, संसाधित खाद्य, जैव सुधार, अपशिष्ट प्रतिपादन व ऊर्जा उत्पादन में हो रहा है। जैव प्रौद्योगिकी के तीन विवेचनात्मक अनुसन्धान क्षेत्र हैं-

(क) उन्नत जीवों जैसे-सूक्ष्मजीवों या शुद्ध एंजाइम के रूप में सर्वोत्तम उत्प्रेरक का निर्माण करना।
(ख) उत्प्रेरक के कार्य हेतु अभियांत्रिकी द्वारा सर्वोत्तम परिस्थितियों का निर्माण करना, तथा
(ग) अनुप्रवाह प्रक्रमण तकनीक का प्रोटीन/कार्बनिक यौगिक के शुद्धीकरण में उपयोग करना।
अब हम पता लगाएँगे कि मनुष्य जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग विशेष रूप से स्वास्थ्य व खाद्य उत्पादन के क्षेत्र में जीवनस्तर के सुधार में किस प्रकार से लगा हुआ है।

कृषि में जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग

पोषण और आमदनी का जरिया बनी सब्जी प्रजातियाँ

Author: 
उमाशंकर मिश्र
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 06 अप्रैल, 2018

झारखंड की सब्जियाँझारखंड की सब्जियाँ गरीब और पिछड़ा माने जाने वाले झारखंड जैसे राज्यों के जनजातीय लोग कई ऐसी सब्जियों की प्रजातियों का उपभोग अपने भोजन में करते हैं, जिनके बारे में देश के अन्य हिस्सों के लोगों को जानकारी तक नहीं है।

भारतीय शोधकर्ताओं ने झारखंड के स्थानीय आदिवासियों द्वारा उपयोग की जाने वाली ऐसी पत्तेदार सब्जियों की 20 प्रजातियों की पहचान की है, जो पौष्टिक गुणों से युक्त होने के साथ-साथ भोजन में विविधता को बढ़ावा दे सकती हैं। पोषण एवं खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी सब्जियों की ये स्थानीय प्रजातियाँ मददगार हो सकती हैं।

सब्जियों की इन प्रजातियों में शामिल लाल गंधारी, हरी गंधारी, कलमी, बथुआ, पोई, बेंग, मुचरी, कोईनार, मुंगा, सनई, सुनसुनिया, फुटकल, गिरहुल, चकोर, कटई/सरला, कांडा और मत्था इत्यादि झारखंड के आदिवासियों के भोजन का प्रमुख हिस्सा हैं। जनजातीय लोगों द्वारा भोजन में सबसे अधिक उपभोग लाल गंधारी, हरा गंधारी और कलमी का होता है। वहीं, गिरहुल का उपभोग सबसे कम होता है।

अध्ययनकर्ताओं ने राँची, गुमला, खूंटी, लोहरदगा, पश्चिमी सिंहभूमि, रामगढ़ और हजारीबाग समेत झारखंड के सात जिलों के हाट (बाजारों) में सर्वेक्षण कर वहाँ उपलब्ध विभिन्न मौसमी सब्जियों की प्रजातियों के नमूने एकत्रित किए हैं। इन सब्जियों में मौजूद पोषक तत्वों, जैसे- विटामिन-सी, कैल्शियम, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, पोटैशियम, सोडियम और सल्फर, आयरन, जिंक, कॉपर एवं मैगनीज, कैरोटेनॉयड्स और एंटी ऑक्सीडेंट गुणों का पता लगाने के लिये नमूनों का जैव-रासायनिक विश्लेषण किया गया है।

वनस्पति जीवनाशियों का महत्त्व

Source: 
ग्राविस, जोधपुर, 2006

नीम के वृक्ष का प्रत्येक भाग जड़, छाल, फूल, पत्ते तथा फल अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुके हैं, परन्तु औषधीय एवं व्यावसायिक दृष्टि से नीम का जो भाग सर्वाधिक मूल्यवान सिद्ध हो चुका है वह है इसका फल अथवा फल से प्राप्त होने वाला बीज। नीम का बीज न केवल औषधीय दृष्टि से उपयोगी है बल्कि यह उच्च श्रेणी के कीटनाशक का भी स्रोत है तथा बहुमूल्य उर्वरक का भी। भारतवर्ष में वनस्पतियों का इस्तेमाल प्राचीनकाल से ही हो रहा है। इनका उपयोग घाव, फोड़े, दर्द, सूजन अमीर निवारण और भण्डारण में अन्न फल और फूल के रख-रखाव हेतु किया जाता था। वनस्पति के किसी भाग यानि जड़, तना, पत्ता, छाल, फल, फूल और बीज को इस्तेमाल करके हानिप्रद जीवों की रोकथाम की जाती है। इन भागों में रासायनिक तत्व होते हैं जो कीट, रोग और खरपतवार आदि का नियंत्रण करते हैं। इसे वनस्पति जीवनाशी या जैविक जीवनाशी भी कहते हैं जो फसलों स्तरधारियों, अनाज, मिट्टी, पानी और पर्यावरण के लिये पूर्व सुरक्षित होता है।

हमारे देश में कई पौधे जैसे नीम, करंज, तम्बाकू, सीताफल, वकायन, क्राइसेन्थीमन आदि पौधे विस्तृत रूप से पाये जाते है। जिनके विभिन्न उत्पादों के कीट व्याधियों का नियंत्रण आसानी से किया जाता है।

नीम