Latest

सर्दी में सूखे जैसे हालात से किसान चिन्तित

Source: 
दैनिक जागरण, 18 जनवरी, 2018

हिमाचल प्रदेश में सूखे जैसी स्थिति से किसानों-बागवानों के साथ आम लोगों की दिक्कतें भी बढ़ गई हैं। मौसम के तेवर आने वाले दिनों में भी ऐसे ही रहे तो लोगों को सूखे की मार झेलनी पड़ेगी। इसका असर खेती व बागवानी पर पड़ने के साथ-साथ लोगों की सेहत पर भी पड़ेगा। अगर जल्द बारिश व बर्फबारी नहीं होती है तो गर्मियों में पेयजल किल्लत के साथ बिजली संकट का सामना भी करना पड़ सकता है। प्रदेश की आबादी का बड़ा हिस्सा जीवन-यापन के लिये खेती-बागवानी पर निर्भर है। बारिश-बर्फबारी न होने से सेब आर्थिकी पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। सेब की फसल तैयार होने के लिये जो जरूरी चिलिंग आवर्स चाहिए वे बर्फबारी न होने से नहीं मिल पायेंगे। इससे फ्लावरिंग प्रभावित होगी और सेब का साइज भी नहीं बन पायेगा।

संरक्षित खेती से बचेगा पर्यावरण

Author: 
अमित कुमार झा
Source: 
डाउन टू अर्थ, जनवरी 2018

धान की पुआल में लगभग 50-55 प्रतिशत कार्बन, 0.6-0.68 प्रतिशत नाइट्रोजन, 0.20-0.23 प्रतिशत फास्फोरस एवं 0.78-1.15 प्रतिशत पोटेशियम होते हैं जो जलाने के उपरान्त नष्ट हो जाते हैं। पूरे भारत में लगभग 9.8 करोड़ टन फसल अवशेषों को जला दिया जाता है जिससे काफी मात्रा में पौधों के लिये जरूरी पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। फसल अवशेषों को जलाने से ग्रीन हाउस गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड एवं कार्बन मोनोऑक्साइड आदि निकलती है जो पर्यावरण एवं मानव जीवन के लिये हानिकारक है।

कृषि और किसानों की मुस्कुराहट का आएगा नया दौर

Author: 
डॉ. जयंतीलाल भंडारी
Source: 
राजस्थान पत्रिका, 30 दिसम्बर, 2017

हम आशा करें कि 2018 में सरकार कृषि और गाँवों के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी। इससे किसानों की मुस्कुराहट बढ़ेगी और उनकी खुशहाली का नया दौर आएगा।
कृषि निःसन्देह वर्ष 2017 कृषि संकट का वर्ष रहा। देश के कई राज्यों में मौसम की मार से जूझते किसानों ने लाभकारी मूल्य पाने के लिये आन्दोलन किए, वहीं उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश आदि राज्यों ने किसानों के हजारों करोड़ रुपए के ऋण माफ किए। बीते वर्ष किसानों को मिली निराशाओं और चिन्ताओं को ध्यान में रखते हुए नए वर्ष 2018 में केन्द्र सरकार कृषि व किसानों को सर्वोच्च प्राथमिकता देती दिखेगी।

कृषि सम्बन्धी आँकड़ों को देखें तो पाते हैं कि बीते वर्ष कृषि विकास दर करीब 4 फीसदी रही, जबकि 2016 में यह 5 फीसदी थी। वर्ष 2014 में कृषि निर्यात 43 अरब डॉलर था, 2017 में घटकर करीब 33 अरब डॉलर रह गया। जीडीपी में कृषि का योगदान 2013-14 में 18.2 फीसदी था, वह 2016-17 में घटकर 17.4 फीसदी रह गया। इसके चलते नीति आयोग ने समीक्षा की कि देश में 80 फीसदी किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था से बाहर हैं।

ई-तकनीकों का ग्रामीण विकास में योगदान

Author: 
डॉ. वीरेन्द्र कुमार
Source: 
कुरुक्षेत्र, अगस्त 2017

आई.सी.टी. के महत्त्व को समझते हुए किसानों तक नवीनतम कृषि सम्बन्धी वैज्ञानिक जानकारियों के प्रसार हेतु कई पहल की गई हैं। वेब-आधारित ‘के.वी.के. पोर्टल’ भी बनाए गए हैं। आई.सी.ए.आर. के संस्थानों के बारे में जानकारियाँ उपलब्ध करवाने के लिये आई.सी.ए.आर. पोर्टल और कृषि शिक्षा से सम्बन्धित उपयोगी सूचनाएँ प्रदान करने के लिये एग्री यूनिवर्सिटी पोर्टल को विकसित किया गया है। इसके अतिरिक्त के.वी.के. मोबाइल एप भी किसानों को त्वरित व सुलभ सूचनाएँ उपलब्ध करवाने के लिये बनाया गया है। कृषि और ग्रामीण विकास में डिजिटल इंडिया के दृष्टिकोण को साकार करने में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान होगा।

फसल उत्पादन से सम्बन्धित किसी भी समस्या के समाधान के लिये किसान कॉल सेंटर की सुविधा सभी राज्यों में उपलब्ध है। इस सेवा के तहत किसान अपनी समस्या दर्ज करा सकते हैं जिनका समाधान 24 घंटों के अन्दर कृषि विशेषज्ञों द्वारा उपलब्ध करा दिया जाता है। किसान कृषि विश्वविद्यालय और कृषि अनुसन्धान केन्द्रों के विशेषज्ञों के माध्यम से अपने प्रश्नों के उत्तर पाने के लिये नजदीकी किसान कॉल सेंटर पर टोल फ्री नं. 1800-180-1551 से साल के 365 दिन प्रातः 6 बजे से रात्रि 10 बजे के बीच सम्पर्क कर सकते हैं।

जल संरक्षण एवं सिंचाई में महिलाओं की भूमिका

Author: 
डॉ. शशिकला पुष्पा, डॉ. बी. रामास्वामी
Source: 
डाउन टू अर्थ, दिसम्बर 2017

हमें महिलाओं के सक्रिय सहभाग के साथ जल संसाधन प्रबंधन में उनकी दक्षता बढ़ाने की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित करने के लिये हमें कानूनों तथा संस्थागत व्यवस्थाओं में बदलाव करना होगा ताकि महिलाओं को सिंचित कृषि एवं जल संरक्षण में अपनी भूमिका बढ़ाने का मौका मिले। इतिहास में अधिकतर सभ्यताओं ने जल तथा महिलाओं को जीवन का स्रोत माना है। अब महिलाओं के लिये जल की और जल के लिये महिलाओं की आवश्यकता स्वीकार करने का समय आ गया है।

लैंगिक मुद्दों का अर्थ महिलाओं एवं पुरुषों के जीवन तथा उनके बीच के सम्बन्धों को प्रभावित करने वाला पहलू है। योजना तैयार करने, रख-रखाव तथा प्रबंधन में महिलाओं की सहभागिता कम रहने से सेवाओं की गुणवत्ता तथा महिलाओं की स्थिति एवं विकास में उनकी सहभागिता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। महिलाओं तथा पुरुषों का निष्पक्ष विकास करने के लिये सभी राष्ट्रीय योजनाओं में लैंगिक पक्षों को जरूर शामिल किया जाना चाहिये।

तोरा में बड़-बड़ गुण हौ गे मड़ुआ

Author: 
चैतन्य चंदन
Source: 
डाउन टू अर्थ, दिसम्बर 2017

मड़ुआ में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम, आयरन और फाइबर पाया जाता है इसलिये यह अन्य अनाजों की तुलना में अधिक ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम है

तोरा में बड़-बड़ गुन हौ गे मड़ुआ
जब मड़ुआ में दू पत्ता भेल
बुढ़िया-बुढ़वा कलकत्ता गेल
तोरा में बड़-बड़ गुन हौ गे मड़ुआ
तोरा कोठी में रखबो गे मड़ुआ
तोरा में बड़-बड़ गुन हौ गे मड़ुआ


मड़ुआ से रोटी और स्वादिष्ट हलवा बनाया जाता है दीनानाथ साहनी की पुस्तक ‘माँ की लोरियाँ और संस्कार गीत’ में संकलित यह लोकगीत मड़ुआ के गुणों का बखान करता है। इस लोकगीत में बताया गया है कि मड़ुआ को काफी दिनों तक कोठी में रखा जा सकता है और यह खराब नहीं होता। अंगिका भाषा का यह लोक गीत एक समय मड़ुआ की कटाई के समय गाया जाता था। हालाँकि अब मड़ुआ की खेती को छोड़कर लोग गेहूँ और धान की खेती करने लगे हैं। इसका कारण मड़ुआ को लेकर सरकार का उपेक्षापूर्ण रवैया भी रहा है। मड़ुआ की खरीदी सरकार नहीं करती इसलिये किसानों को इसे बेचने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है।

मौत देती खेती

Author: 
सोनम तनेजा
Source: 
डाउन टू अर्थ, दिसम्बर 2017

कीटनाशकों के जहर से विदर्भ क्षेत्र में किसानों की मौत इससे सम्बन्धित नियमों में सरकारी अनदेखी पर सवाल उठाती है।

कपास के खेत विदर्भ के किसानों के लिये मौत का कारण बन रहे हैं किसानों की आत्महत्या के लिये कुख्यात महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में एक और मुसीबत सिर उठा रही है। क्षेत्र में पिछले चार महीने के भीतर करीब 35 किसानों की कीटनाशकों के जहर से मौत हो चुकी है। उनमें से अधिकांश कपास और सोयाबीन के खेतों में काम कर रहे थे। उन्होंने खेतों में कीटनाशकों के छिड़काव के दौरान अनजाने में कीटनाशक निगल लिया। मरने वालों की संख्या यवतमाल जिले में सबसे अधिक है। यहाँ जुलाई से नवम्बर के पहले सप्ताह के बीच 18 किसानों की मौत हो गई। इस तरह की घटनाएँ नागपुर, अकोला और अमरावती जिलों में भी हुई हैं। यवतमाल में श्री वसंतराव नाइक गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज के प्रमुख बीएस येलके बताते हैं, “जुलाई से करीब 479 विष के मामले अस्पताल में आए हैं। ज्यादातर लोगों को चक्कर आने, उल्टियाँ करने, दस्त और आँखों में धुंधलापन की शिकायत थी।” येलके ने दो नवम्बर को डाउन टू अर्थ को बताया कि अभी 10 मरीजों का इलाज चल रहा है। इनमें तीन की हालत गम्भीर है और एक वेंटीलेटर पर है।

कृषि उद्यमिता विकसित हो

Author: 
पंकज जायसवाल
Source: 
दोपहर का सामना, 21 दिसम्बर, 2017

युवाओं के गाँव में रहने से गाँव को भी इनके सानिध्य और सामर्थ्य के अनेक लाभ मिलेंगे और ये युवा अपने नए सोच से अपने क्षेत्र की राजनीति से लेकर अर्थ तक क्रान्तिकारी बदलाव लाएँगे। जीवन यापन के खर्च भी कम होंगे। अतः बचत ज्यादा होगी, बचत ज्यादा होगी तो विनियोग ज्यादा होगा और विनियोग ज्यादा होगा तो देश का जीडीपी बढ़ेगा जिससे सर्वांगीण विकास होगा। उपरोक्त अध्ययन से यही प्राप्त होता है कि देश के नेतृत्व को ऐसे क्षेत्रों को लेकर एक विशेष योजना बनानी पड़ेगी, जो वहाँ के संसाधनों को सर्वोत्तम उचित मूल्य दिलाते हुए देश का सन्तुलित विकास कर सके।

संवहनीय खेती : फसल स्वरूप का पानी की उपलब्धता के अनुरूप निर्धारण

Author: 
डॉ. वाई.एस. शिवे और डॉ. टीकम सिंह
Source: 
कुरुक्षेत्र, नवम्बर 2017

खेती की समुचित प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल, फसल पश्चात प्रसंस्करण तथा गुणवत्ता में वृद्धि के जरिए मौजूदा पारम्परिक कृषि में सुधार मुमकिन है। इससे खेती न सिर्फ लम्बे समय में संवहनीय बनेगी बल्कि उत्पादन को उपभोक्तावाद से जोड़कर इसे लाभकारी व्यवसाय भी बनाया जा सकेगा। दीर्घकालिक रूप से खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भरता बनाए रखने के लिये धान-गेहूँ रोटेशन प्रणाली की उपज क्षमता और पर्यावरण अनुकूलता में साथ-साथ सुधार लाने में संवहनीय कृषि की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।