राजस्थान की कृषि तकनीकें

Source: 
ग्राविस, जोधपुर, 2006

राजस्थान के किसान भले ही बहुत अधिक पढ़े लिखे नहीं हैं, परन्तु कृषि में उनका ज्ञान बहुत उन्नत है। इसी ज्ञान के आधार पर उन्होंने खेती के कई तरीके ईजाद किये। स्थान विशेष की मिट्टी, जलवायु, वर्षा की मात्रा एवं संसाधन के आधार पर कहाँ कौन सी फसलें करना उपयुक्त है, इसका विस्तृत ज्ञान किसानों के पास है। किसान को धरती पुत्र कहा जाता है, क्योंकि वह धरती की अनुकूलता के आधार पर खेती करते हैं। कृषि और मानव का सम्बन्ध सबसे पुराना और गहरा है। आदिमानव ने आजीविका के लिये कृषि की खोज की। आज कृषि सबसे विकसित उद्योग है जिस पर मानव जीवन आधारित है। भारत प्राकृतिक सम्पदा से परिपूर्ण देश है। यहाँ की जलवायु एवं मौसमी चक्र के अनुसार कृषि यहाँ का मुख्य व्यवसाय है, इसलिये भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है।

भारत की 80 प्रतिशत जनता गाँवों में बसती है। गाँव में आजीविका का प्रमुख साधन कृषि और पशुपालन है। यहाँ के किसान भले ही बहुत अधिक पढ़े लिखे नहीं हैं, परन्तु कृषि में उनका ज्ञान बहुत उन्नत है। इसी ज्ञान के आधार पर उन्होंने खेती के कई तरीके ईजाद किये। स्थान विशेष की मिट्टी, जलवायु, वर्षा की मात्रा एवं संसाधन के आधार पर कहाँ कौन सी फसलें करना उपयुक्त है, इसका विस्तृत ज्ञान किसानों के पास है। किसान को धरती पुत्र कहा जाता है, क्योंकि वह धरती की अनुकूलता के आधार पर खेती करते हैं। भारत की जलवायु एवं मौसम के अनुसार यहाँ पर दो प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं:-

खरीफ और रबी।

बंजर भूमि बनेगी कमाई का जरिया, निवेशक करेंगे गुलजार

Source: 
अमर उजाला, 31 मार्च 2018

अगर किसान के पास जमीन होने के बाद भी खेती करने वाला कोई नहीं है तो वह संविदा खेती को अपनाकर जमीन को बंजर होने से बचा सकता है। इसके लिये मंडी समिति के पास आवेदन करना होगा। उस जमीन में किन-किन फसलों की पैदावार हो सकती है इसके लिये मंडी समिति निजी कम्पनियों से सम्पर्क करेगी। कम्पनी जमीन को कृषि कार्य के लिये इस्तेमाल करेगी। इसकी एवज में भूमि मालिक को अंशदान मिलेगा।

मूल्य संवर्धित उत्पादों को प्रोत्साहन

Author: 
एम एस स्वामीनाथन
Source: 
योजना, मार्च 2018

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून 2013 जन वितरण प्रणाली में मोटे अनाजों और बाकी फसलों को शामिल करने का प्रावधान मुहैया कराता है। मीडिया की एक हालिया रिपोर्ट में संकेत दिये गए हैं कि कनार्टक और कुछ अन्य राज्यों में रबी और मोटे अनाज की बुआई के रकबे में अच्छी बढ़ोत्तरी हो सकती है। इस तरह की फसलों में दिलचस्पी बहाल करने में वाजिब कीमत और बड़े पैमाने पर खरीद अहम हैं। कर्नाटक सरकार ने 1 लाख टन रागी 200 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीदा है। अगर इसकी खरीद और खपत में तेजी आती है, तो किसान इसका और उत्पादन करेंगे।

परम्परागत देशी अनाज भारत शायद एक एकमात्र ऐसा देश, जिसने संसदीय कानून के जरिये हर जरूरतमंद घर के लिये खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की है। वैसे यह इंतजाम घरेलू इकाइयों के लिये पक्का किया गया है, लेकिन भूख से निपटने के लिये सामाजिक सहयोग की जरूरत है।

टिकाऊ कृषि प्रोत्साहन के लिये कृषि परामर्श

Author: 
करन मिस्क्विटा

किसान अपना अधिकतम समय खेतों में कृषि चुनौतियों से लड़ने में बिताते हैं, चाहे वो कीटों का आक्रमण हो या सूखे दिन। इस कारण, अच्छी कृषि प्रबन्धन की योजनाएँ बनाना और उनका पालन करना अतिरिक्त बोझ बन जाता है। इन बाधाओं को पहचानकर हम कुछ अच्छी हस्तक्षेप और नीतियाँ बना सकते हैं जो महत्त्वपूर्ण हों। ऐसी स्थिति में यह लाभप्रद टेक्नोलॉजी - टेक्स्ट-आधारित रिमाइंडर उपयोग की वृद्धि कर सकती है। सूक्ष्म कणों के क्षेत्र में यह पाया गया है कि ये बचत के स्तर को धीरे-धीरे आगे बढ़ाने में सहायक होते हैं और उन्हें पूर्व संस्थापित लक्ष्यों के मार्ग पर ला सकते हैं। नियमित परामर्शों के रूप में किसानों को सीधे मौसम की पूर्वानुमान जानकारी पहुँचाने के लिये मोबाइल का तेजी से उपयोग किया जा रहा है। इन परामर्शों का प्रयोग किसानों को टिकाऊ और परिवर्तनात्मक कृषि पद्धति से परिचय कराने के लिये भी किया जा रहा है, जो उपज की बढ़ोत्तरी और लागत को कम करने में योगदान दे सकते हैं। शोध से यह पता चला है कि जिन किसानों ने इस प्रकार के परामर्शों को अपनाया है, वे कीटनाशकों और उर्वरकों का कम प्रयोग करके अपनी कृषि लागत घटा रहें हैं और उन्होंने इन पद्धतियों को अपनाकर उत्पादों में लाभ कमा रहे हैं।

ऑर्गेनिक और हर्बल खेती से महकेगी देवभूमि

Author: 
अमर उजाला
Source: 
अमर उजाला, 24 मार्च, 2018

वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिये सरकार ने कृषि, उद्यान, पशुपालन के साथ ही कृषि और बागवानी से जुड़े लाइन डिपार्टमेंट के माध्यम से योजना तैयार की है। जिसमें पर्वतीय क्षेत्रों में कलस्टर बनाकर कृषि को बढ़ावा दिया जायेगा। प्रत्येक कलस्टर में क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी व भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार किसानों को फसलों की पैदावार के लिये प्रोत्साहित किया जायेगा। इसके साथ ही विपणन की सुविधा के लिये कोल्ड स्टोर, कोल्ड चेन, नई फल-सब्जी मण्डी, किसान आउटलेट, ग्रामीण हाट बाजार आदि विकसित किये जायेंगे।

बजट में खेतीबाड़ी पर फोकस किसानों में आयेगी खुशहाली

Source: 
अमर उजाला, 23 मार्च 2018

उत्तराखण्ड के बजट में कृषि और पानी पर भी ध्यान दिया गयाउत्तराखण्ड के बजट में कृषि और पानी पर भी ध्यान दिया गयापाँच वर्षों के भीतर किसानों की आय दोगुनी करने के लिये सरकार ने आम बजट में कृषि और औद्यानिकी क्षेत्र पर फोकस किया है। प्रदेश के किसानों की तरक्की और कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये बजट में नई योजनाओं की घोषणा की गई। उत्तराखंड को ऑर्गेनिक और हर्बल स्टेट बनाने के लिये 1500 करोड़ का प्रावधान किया गया। साथ ही कृषि के लिये 966.68 करोड़ एवं औद्यानिकी के लिये 311.23 करोड़ का अनुमानित बजट का प्रावधान सरकार ने किया है।

वर्मी कम्पोस्ट (vermicompost)

Source: 
ग्राविस, जोधपुर, 2006

वर्मीकम्पोस्टवर्मीकम्पोस्टकेंचुओं की मदद से कचरे को खाद में परिवर्तित करने हेतु केंचुओं को नियंत्रित वातावरण में पाला जाता है। इस क्रिया को वर्मीकल्चर कहते हैं, केंचुओं द्वारा कचरा खाकर जो कास्ट निकलती है उसे एकत्रित रूप से वर्मी कम्पोस्ट कहते हैं।

केंचुओं का महत्त्व


केंचुआ कृषि में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान भूमि सुधार के रूप में देता है। इनकी क्रियाशीलता मृदा में स्वतः चलती रहती है। प्राचीन समय में प्रायः भूमि में केंचुए पाये जाते थे तथा वर्षा के समय भूमि पर देखे जाते थे। परन्तु आधुनिक खेती में अधिक रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों के लगातार प्रयोगों से केंचुओं की संख्या में भारी कमी आई है। जिस भूमि में केंचुए नहीं पाये जाते हैं उनसे यह स्पष्ट होता है कि मिट्टी अब अपनी उर्वरा शक्ति खो रही है तथा उसका ऊसर भूमि के रूप में परिवर्तन हो रहा है।

केंचुआ मिट्टी में पाये जाने वाले जीवों में सबसे प्रमुख है। ये अपने आहार के रूप में मिट्टी तथा कच्चे जीवांश को निगलकर अपनी पाचन नलिका से गजारते हैं जिससे वह महीन कम्पोस्ट में परिवर्तित हो जाते हैं और अपने शरीर से बाहर छोटी-छोटी कास्टिग्स के रूप में निकालते हैं। इसी कम्पोस्ट को वर्मी कम्पोस्ट कहा जाता है। केंचुओं का प्रयोग कर व्यापारिक स्तर पर खेत पर ही कम्पोस्ट बनाया जाना सम्भव है। इस विधि द्वारा कम्पोस्ट मात्र 45 दिन में तैयार हो जाता है।

केंचुओं का पालन ‘कृमि संवर्धन‘ या ‘वर्मी कल्चर’ कहलाता है। अब तक केंचुओं की 4500 प्रजातियों विश्व के विभिन्न भागों में बताई जा चुकी हैं। केंचुए दो प्रकार के हैं- जलीय व स्थलीय।

आजीविका उन्नति के लिये मत्स्य-पालन प्रौद्योगिकी

Author: 
एम.ए. हसन
Source: 
केन्द्रीय अंतर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर कोलकाता-700120 पश्चिम बंगाल

प्राचीन युग से ही मात्स्यिकी मानव जाति के लिये भोजन, रोजगार आजीविका तथा आर्थिक लाभ का महत्त्वपूर्ण स्रोत रहा है। मात्स्यिकी दुनियाभर में एक अरब से ज्यादा लोगों के लिये आहार एवं लगभग 38 मिलियन से भी ज्यादा लोगों के लिये रोजगार का मुख्य साधन है। इसके अलावा अंतर्स्थलीय मत्स्य पालन का मात्स्यिकी क्षेत्र के रोजगार में सबसे बड़ा योगदान है। विश्व में रोजगार की 15 प्रतिशत भागीदारी मत्स्य पालन क्षेत्र से जुड़ी हुई है। मछली भारतीय परिवारों के भोजन एवं प्रोटीन पूर्ति का मुख्य साधन है। इसके अलावा हमारे देश में मत्स्य का सामाजिक व सांस्कृतिक, परम्पराओं एवं रीति-रिवाजों में भी महत्त्व परिलक्षित है। भारत में मत्स्य-पालन रोजगार, आहार, पोषण के अलावा विदेशी मुद्रा अर्जित कर भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारतीय जनसंख्या में से लगभग 60 लाख लोग आजीविका के लिये इस क्षेत्र पर निर्भर हैं।

गुलाब जल के उत्पादन से खुली आर्थिक समृद्धि की राह

Author: 
चन्द्रशेखर जोशी
Source: 
अमर उजाला, 19 मार्च 2018

गुलाब का फूलगुलाब का फूलकांटो के बीच पल्लवित होने वाला गुलाब का फूल जीवन की जटिलताओं को दूर कर उमंग भी कर सकता है, बशर्ते गुलाब की खेती बड़े पैमाने पर की जाए। इन फूलों से बना गुलाब जल सुगंध, स्वाद और सेहत के साथ ही नियमित आय का जरिया भी है।

बीते चार वर्षों से गुलाब की खेती करने के बाद गुलाब जल का उत्पादन करने वाले लोहाघाट के सुंई गाँव के रविशंकर चौबे अब यह बात दमदार तरीके से कहते हैं। चौबे अब ‘उत्तराखंड रोज वाटर’ नाम से गुलाब जल का उत्पादन करते हैं। सगंध पादप केंद्र देहरादून के वैज्ञानिक राकेश यादव कहते हैं कि जैविक होने के चलते पहाड़ी आबोहवा का गुलाब जल न केवल बेहतर है, बल्कि इसमें किसी भी तरह की मिलावट भी नहीं है।

गुलाब जल का अच्छा-खासा कारोबार करने वाले चौबे ने 2013 में गुलाब की खेती शुरू की। इस खेती की ओर उनका रुझान औषधी एवं सगंध पादप बोर्ड देहरादून के एक कार्यक्रम में शिरकत करने के बाद हुआ। सुंई गाँव में करीब पाँच नाली जमीन (जमीन के क्षेत्रफल की स्थानीय इकाई) पर गुलाब की खेती शुरू की। सिंचाई के लिये पास स्थित लोहावती नदी से पानी लिफ्ट किया और तीन कुंतल से अधिक गुलाब के फूलों का उत्पादन किया। फूलों की बिक्री में होने वाली झंझट से बचने के लिये उन्हें एक नया विचार सूझा और यह था गुलाब जल बनाने का। नूरजहाँ और डेमस्क प्रजाति से बनने वाले गुलाब जल के लिये उन्होंने संयंत्र लगाया।