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कृषि में कारपोरेट का दबदबा

Author: 
रविशंकर
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 02 दिसम्बर, 2017

सरकार जनता की सुविधाएँ और सब्सिडी घटा रही है। खेती से जीविका नहीं चलती। फसल संबंधित उद्योग-धंधों पर, जो पहले लघु क्षेत्र के लिये आरक्षित थे, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का वर्चस्व है। मनरेगा में काम घटा दिया गया है। रसोई गैस और मिट्टी के तेल में पहले कैश ट्रांसफर शुरू किया गया, फिर सब्सिडी हटाकर सिलेंडर महँगे कर दिए

खेती में मशीनीकरण का अव्यावहारिक पक्ष

Author: 
भुवन भास्कर
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 02 दिसम्बर, 2017

भारत में खेती की स्थिति कमाल की है। राजनीति में इसका जितना ऊँचा स्थान है, नीति-निर्माण में इसे उतना ही नजरअंदाज किया गया है। आजीविका के लिहाज से यह जितनी व्यापक है, अर्थव्यवस्था में योगदान के लिहाज से इसका स्थान उतना ही गौण है। इस विरोधाभासी स्थिति का ही नतीजा है कि किसान से करीबी का दावा करने वाले नेताओं और मंत्रियों से भरे इस देश में आजादी के 70 साल बाद भी जब खेती का जिक्र आता है, तब किसानों की आत्महत्या सबसे बड़ा मुद्दा बन जाती है। दरअसल, इस विरोधाभास की कहानी आजादी के तुरंत बाद ही शुरू हो गई थी। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1954 में उस समय उद्योगों को आधुनिक भारत के मंदिर करार दिया था, जब देश की तीन-चौथाई से ज्यादा आबादी आजीविका के लिये खेती पर ही निर्भर थी।

किसान की स्थिति में सम्भव है सुधार

Author: 
अजित सिंह
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 02 दिसम्बर, 2017

जमीन किसान के लिये सिर्फ जमीन नहीं है। जमीन उत्पादन के लिये महत्त्वपूर्ण इनपुट है। जोखिम से बचाव का इंश्योरेंस है। विरासत में देने-लेने की संपत्ति है। और सबसे बढ़कर किसान के तौर पर उसकी थाती है। इसलिये वह अपनी जमीन बचाने के लिये खुद को जमीन में गाड़ने और विरोध-प्रदर्शन के लिये जी-जान लगाने से भी गुरेज नहीं करता।

कृषि पर मारलेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर, क्यों किसानों को अपनी जमीन बचाने के लिये खुद को जमीन में गाड़कर विरोध-प्रदर्शन करना पड़ा? क्यों देश के अलग-अलग हिस्सों में आदिवासी, किसान अपनी जमीन बचाने के लिये कभी सरकार तो कभी कॉरपोरेट से मोर्चा लेते दिखाई पड़ते हैं? जाहिर है कि सरकार और कॉरपोरेट का गठजोड़ लंबे समय से किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करने पर उतारू है। यह सिलसिला शुरू तो आजादी के बाद ही हो गया था, जब बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के नाम पर भूमि अधिग्रहण का सिलसिला तेज हुआ। नब्बे के दशक में जब अर्थव्यवस्था के दरवाजे आर्थिक उदारीकरण के लिये खुले तो औद्योगिक और व्यावसायिक गतिविधियों में तेजी आई और आधारभूत ढांचे के निर्माण पर ध्यान गया। इस समूची प्रक्रिया में जमीन महत्त्वपूर्ण थी। खास तौर पर वह जमीन जो किसान के पास है, और सस्ते दाम पर मिल सकती है। इसके बाद सिंगूर से लेकर सिंगरौली तक क्या हुआ, सबके सामने है। सरकारें विकास के नाम पर किसानों की जमीन हड़प कर उद्योगपतियों को सौंपने के धंधे में उतर गईं। इसके लिये अपनी ताकत और सत्ता का मनमाना इस्तेमाल किया।

मर्ज बढ़ता गया जो यूँ दवा हुई

Author: 
के.सी. त्यागी
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 02 दिसम्बर, 2017

कुछ माह पूर्व मध्य प्रदेश के लगभग सभी दाल व्यापारी हड़ताल पर चले गये थे क्योंकि सरकार उन पर ‘‘एमएसपी” के मुताबिक दाल खरीदने का दबाव बना रही थी। प्याज को लेकर भी ऐसी तस्वीर सामने आ चुकी है। मंदसौर की घटना के बाद राज्य सरकार द्वारा प्याज का समर्थन मूल्य 8 रु. प्रति किलो घोषित किया गया लेकिन अव्यवस्था और कालाबाजारी के कारण किसानों को उस वक्त भी 4 रु. का भाव ही मिला। प्रति वर्ष गन्ना किसानों को भुगतान की समस्या आती है। पेराई में लेट-लतीफी के कारण उत्पादन की उचित कीमत नहीं मिल पाती

पक्की की जाए निश्चित आय

Author: 
सोमपाल शास्त्री
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 02 दिसम्बर, 2017

किसानों की एक और बड़ी समस्या यह है कि सरकार करीब दो दर्जन फसलों का एमएसपी घोषित तो कर देती है लेकिन उसको खरीदने की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं करती। हकीकत यह है कि पंजाब, हरियाणा, पूर्वी व उत्तरी राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश आदि को छोड़कर कहीं भी एमएसपी पर फसल खरीदने की कोई व्यवस्था नहीं है

मशरूम की खेती से दिया सैकड़ों को रोजगार

Source: 
अमर उजाला, 01 दिसम्बर, 2017

नोएडा के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा और इसके बाद इग्नू से सोशल वर्क में मास्टर डिग्री लेने के बाद मैंने यही सीखा- पहले अपना काम खुद करो, फिर दूसरों को सीख दो। मेरे पिता फौज में थे। वर्तमान में मैं देहरादून के मोथरोवाला क्षेत्र में रहती हूँ, पर मेरा पुराना घर चमोली के पास कंडारा गाँव में है। पढ़ाई खत्म करने के बाद मैंने तीन साल तक दिल्ली के कई संस्थानों में नौकरी की। मैं जब पलायन की वजह से उत्तराखण्ड के खाली होते गाँवों की खबर अखबारों में पढ़ती, तो लगता जैसे मैं भी उसी भीड़ का हिस्सा हूँ। मैं हमेशा सोचती थी कि कुछ ऐसा करूँ, जिससे मैं अपने साथ अपने राज्य और समुदाय के दूसरे लोगों का भी सहारा बन सकूँ। मुझे एहसास हुआ कि इसके लिये मुझे नौकरी छोड़ अपने राज्य की सम्भावनाओं के बारे में पता लगाकर वहीं कुछ नया काम शुरू करना होगा।

सेब छोड़ अनार और सब्जियाँ उगा रहे हैं जलवायु परिवर्तन से त्रस्त किसान (Himachal farmers start growing pomegranate and cabbage, as apple lines recede due to climate change)

Author: 
दिनेश सी. शर्मा
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 30 नवंबर, 2017

हिमाचल प्रदेश में मानसून सीजन की अवधि तो बढ़ रही है, पर समग्र रूप से बरसात कम हो रही है। हिमाचल और जम्मू कश्मीर में स्थित मौसम विभाग के ज्यादातर स्टेशन पिछले करीब तीन दशक से तापमान में बढ़ोत्तरी की प्रवृत्ति के बारे में बता रहे हैं।

कम नहीं हैं जलवायु परिवर्तन के खतरे


हम अभी भी भारी मात्रा में पानी सोखने वाली गन्ना और धान की फसलों का उत्पादन कर रहे हैं, वह भी ऐसे इलाकों में जहाँ पानी की भारी कमी है। जबकि पानी की कमी वाले क्षेत्रों में वहाँ की जलवायु के हिसाब से फसलों की खेती की जाने की बेहद जरूरत है। यह समय की मांग है।

केंचुआ खाद-टिकाऊ खेती एवं आमदनी का अच्छा स्रोत

Author: 
धर्मा उराँव, विनोद कुमार पाण्डेय, रंजय कुमार सिंह, शिवेन्द्र कुमार दुबे, डाॅ. बी.पी. राय, उपेन्द्र कुमार
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

. बढ़ती हुई जनसंख्या एवं अधिक उत्पादन के लिये सीमित भूमि पर अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी की उर्वरा शक्ति को ह्रास कर रही है एवं मिट्टी, जल तथा वायु तीनों को प्रदूषित कर रहा है। रासायनिक उर्वरकों का अधिक मूल्य भी किसानों की आर्थिक स्थिति को कमजोर करते जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में यदि किसान जैविक उर्वरक एवं रासायनिक उर्वरक के बीच सन्तुलन स्थापित कर अपने फसलों में प्रयोग करें तो कम लागत में अच्छा उत्पादन प्राप्त करते हुए टिकाऊ खेती की परिकल्पना कर सकते हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र, चतरा ने किसानों के घर में उपलब्ध कम्पोस्ट एवं अन्य घरेलु अवशेष के माध्यम से वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन का कार्यक्रम बनाया। इसके लिये सर्वप्रथम हंटरगंज प्रखण्ड के खुटी केवाल ग्राम के किसानों के साथ बैठक कर वैसे 25 किसानों को चयनित किया गया जिसके पास कम से कम 2 मवेशी उपलब्ध हों और उन्हें दो दिन का प्रशिक्षण कृषि विज्ञान केन्द्र में दिया गया।