Latest

घृतकुमारी की लाभदायक खेती

Author: 
जय कुमार
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

घृतकुमारी का उपयोग औषधीय योगों एवं प्रसाधन सामग्रियों के निर्माण में किया जाता है। औषधीय दृष्टि से यह शीतल, तिक्त, मधुर, रसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, रसायन, बलकारक, प्लीहा-यकृत वृद्धि कारक, रक्त विकार, चर्मरोग का नाश एवं मल का भेदन करने वाली होती हैं। घृतकुमारी का सार पाचक, उदरशूल एवं मंदाग्नि अर्श आदि रोगों में विशेष उपयोगी हैं। वर्तमान समय में अधिकांशतः त्वचा पर लगाये जाने वाली क्रीम, शैम्पू एवं विभिन्न हर्बल- उत्पादों में घृतकुमारी के जेल का प्रयोग बहुतायत से हो रहा है।

घृतकुमारी लिलियेसी परिवार का एक प्रमुख आौषधीय पौधा है, जिसका वैज्ञानिक नाम एलो बार्बाडेंसिस ( एलोवेरा) है। घृतकुमारी को घीकुवार, ग्वारपाठा एवं एलुआ नामों सेे भी जाना जाता है विश्व में इसकी 200 से अधिक जातियाँ पाई जाती हैं। घृतकुमारी का मूल निवास उत्तर-पूर्वी अफ्रीका एवं स्पेन हैं तथा भारतवर्ष में यह हिमालय से कन्याकुमारी तक सर्वत्र पाया जाता है। भारतीय चिकित्सा पद्धतियों जैसे आयुर्वेद एवं यूनानी में इस पौधे का विशिष्ट महत्त्व है एवं इसका उपयोग विभिन्न औषधीय योगों एवं प्रसादन सामग्री के रूप में किया जाता है। वर्तमान समय में इसकी अत्यधिक माँग के कारण वृहत स्तर पर इसकी खेती आवश्यक हो गई है, जिससे देश की आन्तरिक माँग पूर्ति के साथ-साथ इससे निर्मित उत्पादों का निर्यात भी किया जा सके।

दुधारू पशुओं की प्रमुख नस्लें एवं दूध व्यवसाय हेतु उनका चयन

Author: 
डाॅ. राजीव रजंन. एवं डाॅ. हेमन्त कुमार
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

यदि पशु की वंशावली उपलब्ध हो तो उनके बारे में सभी बातों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। लेकिन हमारे यहाँ वंशावली रिकॉर्ड रखने का प्रचलन नहीं है, जिसके कारण अनेक लक्षणों के आधार पर ही पशु का चुनाव करना पड़ता है। अच्छे डेरी फार्म से पशु खरीदने में यह सुविधा प्राप्त हो सकती है।

कृषि में महिलाओं की भूमिका, समस्या एवं निदान

Author: 
डाॅ.सीमा डे, डाॅ. नीलिमा श्रीवास्तव एवं डाॅ. बी. के. झा
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

कृषि मंत्रालय के स्तर से भी निरंतर इस बात के प्रयास किये जा रहे हैं कि कृषि कार्यों में लगी ग्रामीण महिलाओं की स्थिति में तेजी से सुधार हो। हमारे देश में कृषि विज्ञान केन्द्रों के द्वारा विकास हेतु कृषि कार्यों में लगी महिलाओं के लिये विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाये जाते हैं।

किसानों की सेवा में किसान कॉल केन्द्र

Author: 
डॉ. सत्यप्रिय, डॉ. सुशील झा ‘सुमन’ एवं डॉ. बी. के. झा
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

किसान कॉल केन्द्रों को सुचारु रूप से चलानें, विभिन्न क्रिया-कलापों का समय-समय पर नोडल संस्था द्वारा निरीक्षण एवं समीक्षा किया जाता है। विभिन्न स्तर पर क्रियाकलापों किसान प्रश्नोत्तर, विषय विशेषज्ञों की उपलब्धता जो कॉल स्तरIII के पास दिया गया हो, इनकी प्रतिक्रिया 72 घंटों के अन्दर उपलब्ध कराना इत्यादि के लिये नोडल संस्था उत्तरदायी होत हैं।

सूचना क्रांति का एक सशक्त माध्यम-सामुदायिक रेडियो स्टेशन

Author: 
डॉ. सत्यप्रिय एवं श्रीमती शशि सिंह
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

सूचना देश का विकास कर सकती है तथा देश की संस्कृति को दूसरे देशों तक पहुँचा भी सकती है। बड़े स्तर पर यह कार्य आकाशवाणी के माध्यम से तो हो रहा है, पर जब हम बहुत सारे लोगों की बात कहते हैं तो कई चीजें छूट जाती है और कई लोग छूट जाते हैं। ऐसे में किसी समुदाय को लेकर चला जाय तो सहभागिता आसान हो जाती है। सामुदायिक रेडियो की स्थापना में लागत भी कम आती है और इसका संचालन भी सहज है।

कमाई का अच्छा जरिया बन सकते हैं औषधीय पौधे

Author: 
कमाल अहमद रूमी
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 26 नवम्बर, 2017

औषधीय पौधे यानी मेडिसिनल प्लांट कमाई का अच्छा जरिया बन सकते हैं। इसके लिये बस आपको छोटी सी रकम निवेश करनी पड़ेगी और तीन महीने में आपकी रकम तो वापस मिल ही जाएगी साथ ही इससे आपको अच्छा मुनाफा भी होगा।

तालाबों ने बदली निपनियाँ गाँव की जिन्दगी

Source: 
कुरुक्षेत्र, नवम्बर 2017

बदलाव की इस सफल गाथा को देखने के लिये पड़ोसी जिलों तथा राज्यों से किसान आते हैं और बहुत कुछ सीखकर जाते हैं। देश में खेत-तालाब बनाने की लहर तेज, बहुत तेज होती जा रही है।

जल उपयोग दक्षता बढ़ाने हेतु सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली

Author: 
डॉ. वीरेन्द्र कुमार
Source: 
कुरुक्षेत्र, नवम्बर 2017

सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली सामान्य रूप से बागवानी फसलों में उर्वरक व पानी देने की सर्वोत्तम एवं आधुनिक विधि है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली के द्वारा कम पानी से अधिक क्षेत्र की सिंचाई की जा सकती है। इस प्रणाली में पानी को पाइप लाइन के द्वारा स्रोत से खेत तक पूर्व-निर्धारित मात्रा में पहुँचाया जाता है। इससे एक तरफ तो जल की बर्बादी को रोका जा सकता है, तो दूसरी तरफ यह जल उपयोग दक्षता बढ़ाने में सहायक है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली अपनाकर 30-37 प्रतिशत जल की बचत की जा सकती है। साथ ही इससे फसलों की गुणवत्ता और उत्पादकता में भी सुधार होता है। सरकार भी ‘प्रति बूँद अधिक फसल’ के मिशन के अन्तर्गत फव्वारा व टपक सिंचाई पद्धति को बढ़ावा दे रही है।

सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को आम जनता, किसानों व प्रसारकृमियों में और अधिक लोकप्रिय बनाने की जरूरत है, ताकि संरक्षणपूर्ण प्रौद्योगिकियों के प्रयोग से बेहतर जल प्रबन्धन एवं जल उपयोग दक्षता को अधिक लाभप्रद बनाया जा सके। कम पानी वाले क्षेत्रों में ड्रिप सिंचाई प्रणाली अपनाई जानी चाहिए।

सिंचाई प्रणालियों की आवश्यकता और उनके प्रकार

Author: 
वासुदेव मीणा
Source: 
कुरुक्षेत्र, नवम्बर 2017

सिंचाई सूखी जमीन को वर्षाजल के पूरक के तौर पर पानी की आपूर्ति की तकनीक है। इसका मुख्य लक्ष्य कृषि है। भारत के अलग-अलग हिस्सों में सिंचाई की विभिन्न प्रकार की प्रणालियों को इस्तेमाल में लाया जाता है। देश में सिंचाई कुओं, जलाशयों, आप्लावन और बारहमासी नहरों तथा बहु-उद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के जरिए की जाती है। सिंचाई प्रणाली के समुचित इस्तेमाल के लिये इससे सम्बन्धित इंजीनियर को मिट्टी की प्रकृति, नमी, पानी की गुणवत्ता और सिंचाई की आवृत्ति के बारे में जानकारी होनी चाहिए।