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झारखण्ड राज्य में मृदा स्वास्थ्य की स्थिति समस्या एवं निदान (Problems and Diagnosis of Soil Health in Jharkhand)

Author: 
बी.के. अग्रवाल, अजय कुमार एवं जटाशंकर चौधरी
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

पोटाश पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिये आवश्यक है। यह पौधों को कीट-व्याधि से बचाने में मदद करता है। साथ-ही-साथ सूखे की स्थिति में फसल की जल उपयोगी क्षमता को बढ़ाता है। ऐसा माना जाता है कि झारखण्ड की मिट्टियों में पोटाश पर्याप्त मात्रा में है, परन्तु वास्तव में स्थिति ऐसी नहीं है। अतः पोटाश उर्वरक के रूप में म्यूरेट ऑफ पोटाश (पोटैशियम क्लोराइड) का उपयोग करना चाहिए। नाइट्रोजन पौधों की बढ़वार हेतु बहुत आवश्यक तत्व है, परन्तु इसका असन्तुलित व्यवहार मिट्टी के स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। झारखण्ड राज्य कृषि क्षेत्र में काफी पिछड़ा हुआ है। इस राज्य को खाद्यान्न के मामलें में आत्मनिर्भर बनाने हेतु वर्तमान उपज को बढ़ाकर दुगुना करना होगा। इसके लिये मृदा स्वास्थ्य की स्थिति एवं उनकी समस्याओं का जानकारी होना अति आवश्यक है ताकि, प्रदेश के किसान कम लागत में अच्छी उपज प्राप्त कर सकें।

झाारखण्ड प्रदेश में लगभग 10 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि, अम्लीय भूमि (पी.एच. 5.5 से कम) के अन्तर्गत आती है। यदि हम विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्र में पड़ने वाली जिलों में अम्लीय भूमि की स्थिति को देखें तो उत्तरी पूर्वी पठारी जोन (जोन 4 के अन्तर्गत जामताड़ा, धनबाद, बोकारो, गिरीडीह, हजारीबाग एवं राँची के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 50 प्रतिशत से अधिक भूमि अम्लीय समस्या से ग्रसित है।

कृषि उत्पादकता में वृद्धि के उपाय

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

स्वतंत्रता के लगभग 53 वर्ष बाद गत 28 जुलाई 2002 को केंद्रीय कृषि मंत्री श्री नीतीश कुमार ने नई राष्ट्रीय कृषि नीति संसद के पटल पर रखी, इसकी मुख्य विशेषता यह है कि सरकार ने अगले दो दसकों के लिये कृषि क्षेत्र में प्रतिवर्ष 4 प्रतिशत की विकास दर निर्धारित की है। 17 पृष्ठों की कृषि नीति में भूमि सुधार के माध्यम से गरीब किसानों को भूमि प्रदान करना, कृषि जोतों का समेकन, कृषि क्षेत्र में निवेश को बढ़ाना, किसानों को फसल के लिये कवर प्रदान करना, किसानों के बीजों के लेन-देन के अधिकार को बनाये रखना जैसे लक्ष्यों को निर्धारित किया गया है। इसके अतिरिक्त मुख्य फसलों की न्यूनतम मूल्य नीति को जारी रखने का आश्वासन दिया गया है। इस नीति के तहत कृषि का सतत विकास रोजगार सृजन, ग्रामीण क्षेत्रों को स्वालंबी बनाना किसानों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने और पर्यावरण संरक्षित कृषि तकनीकि अपना अन्य मुख्य उद्देश्य है। नीति में कहा गया है कि अप्रयुक्त बंजर भूमि का कृषि और वनोरोपण के लिये प्रयोग बहु फसल और अंत: फसल के माध्यम से फसल गहनता बढ़ाने पर जोर दिया जायेगा। सरकार कृषि में जैव प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिये जोर देगी, इसके अंतर्गत देश में उपलब्ध विशाल जैव विविधता की सूची बनाने तथा उसे वर्गीकृत करने के लिये संबंद्ध कार्यक्रम बनाया जायेगा।

उर्वरकों की क्षमता बढ़ाने के उपाय (Measures to increase the efficiency of fertilizers)

Author: 
डॉ. जनार्दन प्रसाद
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

झारखण्ड की 47 प्रतिशत मिट्टी में कम प्रतिशत में जैव कार्बन है। मिट्टी परीक्षण करने के बाद कितना गोबर खाद देना है, उसका निर्धारण होता है। समुचित मात्रा में गोबर खाद देकर ही फसलों में दिये गए उर्वरकों का पूर्ण उपयोग किया जा सकता है। गोबर खाद मिट्टी की दशा का सुधारकर अनुपलब्ध पोषक तत्व को उपलब्ध पोषक तत्व में बदल देता है। किसानों में यह धारणा है कि रासायनिक उर्वरक डालने से मिट्टी खराब हो जाता है, यह सही नहीं है। यदि सही मात्रा एवं अनुपात में तीनों आवश्यक उर्वरकों का प्रयोग किया जाय तो भरपूर उपज लिया जा सकता है।

कृषक परिवारों के स्वास्थ्य का स्तर

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

स्वस्थ्य जीवन के लिये यह आवश्यक है कि व्यक्ति को ऐसा भोजन मिले जिसमें सभी पोषक तत्व उचित मात्रा में उपस्थित हों, ऐसा तभी संभव है जब उसको संतुलित भोजन प्राप्त हो परंतु हर व्यक्ति का संतुलित भोजन सामान्य नहीं हो सकता है। व्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्य संपादित करता है। अत: कार्य की विभिन्नता के आधार पर उसे भोजन की भी आवश्यकता होती है। समझदार व्यक्ति को अपना भोजन इस आयु, जलवायु, ऋतु तथा लिंग के अनुसार भी भोजन में पोषक तत्वों की आवश्यकताओं में अंतर आता है। जैसे गर्भवती स्त्री या स्तनपान कराने वाली स्त्री की भोजन आवश्यकता साधारण स्त्री की तुलना में अधिक कैलोरीयुक्त भोजन चाहिए। संतुलित आहार समस्त प्राणियों की एक प्रमुख आवश्यकता है। अत: संतुलित भोजन में समस्त तत्वों की उचित मात्रा का होना आवश्यक है।

संतुलित आहार की विभिन्नता :-


विभिन्न व्यक्तियों के लिये विभिन्न प्रकार के भोजन तथा विभिन्न प्रकार की मात्रात्मक आवश्यकता होती है जो निम्न बातों पर निर्भर करती है।

1. आयु : बाल्यावस्था में जब शरीर विकसित होता है तब बालक को वसा और प्रोटीन अधिक मात्रा में चाहिए वृद्धवस्था में पाचन शक्ति दुर्बल हो जाती है तब भोजन की कम मात्रा की आवश्यकता होती है।

2. जलवायु : शीत प्रधान देशों में ग्रीष्म प्रधान देशों की अपेक्षा ताप का अधिक उपयोग होता है। अत: शीत प्रधान देशों में अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में भोजन की आवश्यकता होती है।

3. लिंग : पुरुष की अपेक्षा स्त्रियों में कम भोजन की आवश्यकता होती है।

4. परिश्रम : शारीरिक परिश्रम करने वाले व्यक्तियों के शरीर से अधिक ऊर्जा का ह्रास होता है अत: उसकी पूर्ति के लिये अधिक भोजन चाहिए। इनके भोजन में श्वेतसार की मात्रा अधिक होनी चाहिए। मानसिक श्रम करने वालों को भोजन की कम मात्रा चाहिए परंतु उसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक होनी चाहिए।

उर्वरकों का दीर्घकालीन प्रभाव एवं वैज्ञानिक अनुशंसाएँ (Long-term effects of fertilizers and scientific recommendations)

Author: 
डाॅ. पी. महापात्रा एवं अजय कुमार
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

नाइट्रोजन, स्फूर, पोटाश के साथ चूना डालने से उर्वरकों की क्षमता बढ़ जाती है। गाोबर खाद थोड़े मात्रा में सभी पोषक तत्व पौधों को प्रदान करता है। यह सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता को सामान्य बनाए रखने के साथ-साथ मिट्टी की संरचना को भी सही बनाए रखने में मदद करता है नाइट्रोजन के रूप में अमोनियम सल्फेट के प्रयोग से पौधों की बढ़त बिल्कुल ही कम पाई गई है। अतः किसानों को झारखण्ड की ऊपरी आम्लिक मिट्टियों में अमोनियम सल्फेट का व्यवहार नहीं करना चाहिए। भारत सरकार के भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद द्वारा किसानों के लिये कई उपयोगी योजनाएँ चलाई जा रही हैं। इस कड़ी में झारखण्ड राज्य के अन्तर्गत उर्वरक शोध परियोजना 1972-73 से सोयाबीन एवं गेहूँ फसल-चक्र पर चलाई जा रही है।

झारखण्ड में छोटानागपुर एवं संथाल परगना के ऊपरी भूमि की लाल एवं पीली मिट्टियों में आवश्यक भास्मिक तत्व जैसे-कैल्शियम एवं मैग्नीशियम काफी कम मात्रा में उपस्थित रहते हैं। अम्लीयता के कारण सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे-लोहा, तांबा, जस्ता, मैगनीज का सान्द्रण बढ़ जाता है जो पौधों की वृद्धि के लिये हानिकारक होता है एवं साथ-ही-साथ इससे बोरॉन एवं मोलिब्डीनम की उपलब्धता घट जाती है।

एल्युमीनियम एवं लौह-तत्व का सान्द्रण बढ़ जाने के फलस्वरूप फॉस्फेट या स्फूर की उपलब्धता घट जाती है। नत्रजन, स्फूर एवं पोटाश मिट्टी में रहने पर भी उपलब्ध नहीं हो पाता। मिट्टियों में जैविक पदार्थ एवं कैल्शियम की कमी के कारण मिट्टी की जलधारण क्षमता काफी कम होती है।

भारत सरकार की कृषि नीति (Agricultural policy of India)

HIndi Title: 

 

तुम्हारे क्षेत्र में-
फसलों के कौन-कौन से बीज बोए जाते है? उनमें से कौन से संकर और कौन से देशी बीज हैं?
अपने क्षेत्र के संकर और देशी बीजों की इन बिन्दुओं पर तुलना करो-
-फसल की अवधि
- कितनी बार सिंचाई
- उत्पादन
- खाद
- बीमारियाँ
- दवाएँ
भारत सरकार ने अपनी नई कृषि नीति में संकर बीजों से खेती पर बहुत जोर दिया हैं। आओ इस पाठ में समझें कि नई कृषि नीति कब व कैसे बनाई गई।


स्वतंत्रता के बाद कृषि की समस्याएँ


अनाज का उत्पादन बढ़ाअनाज का उत्पादन बढ़ाआपने पढ़ा कि सरकार विकास के लिये पंचवर्षीय योजनाएँ बनाती हैं। इन योजनाओं में सरकार कृषि नीति बनाती है। कृषि नीति बनाते समय सरकार को यह विचार करना पड़ता है कि खेती-किसानी व अनाज उत्पादन में क्या समस्याएँ हैं। किसानों के क्या हालात हैं। इन समस्याओं को कैसे हल किया जाये। जैसे-जैसे परिस्थितियाँ बदलती हैं वैसे सरकार को कृषि नीति भी बदलनी पड़ती है।

जब हमारा देश अंग्रेज शासन से आजाद हुआ तब हमारे अधिकांश किसानों के हालात बहुत बुरे थे। भारत के हर 100 लोगों में से लगभग 75 लोग कृषि पर निर्भर थे। पर इनमें आधे से अधिक लोगों के पास जमीन नहीं थी या दो एकड़ से कम जमीन थी। चन्द बड़े जमींदारों के पास कुल खेतिहर भूमि का आधे से अधिक हिस्सा था। उत्पादन भी बहुत कम था। एक एकड़ में 2-3 बोरी अनाज से अधिक नहीं होता था। बहुत कम जमीन सिंचित थी। बहुत से गरीब किसान और मजदूर भुखमरी और कुपोषण के शिकार थे। हर साल कहीं-न-कहीं सूखा पड़ता था या बाढ़ आती थी। गरीब किसानों के पास इतना अनाज नहीं रहता था कि वे ऐसे बुरे दिनों का सामना कर पाएँ।
विकिपीडिया से (From Wikipedia): 

 

अन्य स्रोतों से: 

  

संदर्भ: 

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बाहरी कड़ियाँ: 

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अपने गाँव से करेंगे चकबन्दी की शुरुआत - मुख्यमंत्री


राज्य स्तरीय कृषक महोत्सव कार्यक्रम को सम्बोधित करते मुख्यमंत्री रावतराज्य स्तरीय कृषक महोत्सव कार्यक्रम को सम्बोधित करते मुख्यमंत्री रावत‘आप भला तो जग भला’ जैसी कहावत को कृतार्थ करने की राह पकड़े उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत इन दिनों अपने वक्तव्य में कहीं भी चूक नहीं करते कि वे चकबन्दी अपने गाँव खैरासैण से आरम्भ करेंगे। जबकि 80 के दशक में उत्तरकाशी जनपद के बीफ गाँव में स्व. राजेन्द्र सिंह रावत ने चकबन्दी करवाई।

यह पहला गाँव है जहाँ लोगों ने स्वैच्छिक चकबन्दी को तबज्जो दी थी। उसके बाद कई सरकारें आईं और गईं पर किसी में भी इतना दम नहीं दिखा कि वे चकबन्दी के लिये खास नीतिगत पहल करे। अब लगभग चार दशक बाद राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री ने इस ओर कदम बढ़ाया है। अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो मुख्यमंत्री रावत की यह पहल रंग ला सकती है।

ज्ञात हो कि उत्तराखण्ड राज्य में कृषि की जोत एकदम छोटी है और बिखरी भी हुई है। कृषि विकास के लिये राज्य में चकबन्दी करना नितान्त आवश्यक है। यह बात सभी राजनीतिक व सामाजिक संगठनों के मंचों पर लगातार उठती रही। पिछली कांग्रेस सरकार ने बाकायदा एक चकबन्दी विकास बोर्ड का गठन भी किया था। इस बोर्ड के अध्यक्ष भी चकबन्दी के प्रणेता स्व. राजेन्द्र सिंह रावत के छोटे भाई केदार सिंह रावत को मनोनित किया गया। इस बोर्ड ने चकबन्दी पर कितना काम किया यह सामने नहीं आ पाया। इधर वर्तमान में भाजपानीत सरकार ने बोर्ड को तो ठंडे बस्ते में डाल दिया, उधर मुख्यमंत्री बार-बार अपने भाषणों में जरूर कहते हैं कि वे पहले अपने गाँव से चकबन्दी की शुरुआत करेंगे।

भोजन के पोषक तत्व एवं पोषक स्तर

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

भोजन मनुष्य की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आधारभूत आवश्यकता है जिसके बिना कोई भी प्राणी जीवन की कल्पना नहीं कर सकता है। जीवन के प्रारंभ से जीवन के अंत तक शांत करने तथा शारीरिक विकास के लिये मनुष्य को भोजन की आवश्यकता होती है। डॉ. रंधावा के अनुसार ‘‘भोजन की आदत तथा पर्यावरण जिसमें मनुष्य जीवनयापन करता है, ये घनिष्ट संबंध होता है जिसके लिये मनुष्य सर्वप्रथम स्वयं पर्यावरण से संबंध स्थापित करता है तत्पश्चात उस पर्यावरण के अनुसार वह अपनी आदतें तथा स्वभाव को समायोजित करता है। इन आदतों में मनुष्य सर्वप्रथम भोजन की आदतों का समायोजन तथा बाद में अन्य आवश्यकताओं में संतुलन स्थापित करता है।’’ अली मोहम्मद 2 का मत है कि भोजन तथा खानपान की आदतों के निर्धारण में आय का आकार सार्वाधिक महत्त्वपूर्ण होता है। खानपान की आदतों में लगभग समानता रहते हुए भी आय का आकार तथा भोज्य पदार्थों की भोजन की आदतों में न्यूननाधिक अंतर उत्पन्न करते हैं। ‘‘चौहान आरवी सिंह 2 वे समय अंतराल के साथ-साथ स्थाई आदतों, स्थाई पसंद तथा स्थाई रुचियों में परिवर्तित हो जाती हैं। परिस्थितिकीय अंतर आय का आकार परिवार का आकार खाद्य पदार्थों की उपलब्धता तथा लोगों के जीने का ढंग आदि लोगों की भोजन की आदतों में अंतर के लिये उत्तरदायी होते हैं।’’ इस दृष्टि से अध्ययन क्षेत्र जनपद प्रतापगढ़ में भोजन की आदतों में बहुत अधिक भिन्नता देखने को मिलती है। यद्यपि जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले लोग एक ही प्रशासन तंत्र के अंतर्गत नियंत्रित हैं परंतु फिर भी विभिन्न क्षेत्रों में परिस्थितिकीय अंतर, लोगों की भोजन संबंधी आदतों में अंतर उत्पन्न करती है।

1. भोजन की रासायनिक रचना

भूमिगत जल संरक्षण - संचयन और कम पानी की सिंचाई विधियाँ (Ground Water Conservation - Less Water Irrigation Methods)

Author: 
डाॅ. अजय कुमार सिंह, आलोक कुमार, राजकुमार योगी और अनिल कुमार जायसवाल
Source: 
लाक्षा-2016, कृषि ज्ञान प्रबंध निदेशालय (डीकेएमए), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, भारतीय प्राकृतिक राल एवं गोंद संस्थान, रांची

कृषि विकास किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का मेरुदण्ड है। सघन फसल उत्पादन में पानी एक अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण घटक है, जिसका कोई विकल्प नहीं है। वस्तुतः यह कटु सत्य है कि सम्पूर्ण विश्व में जल ही ऐसा संसाधन है, दो निरंतर चिंता का विषय बना हुआ है। वर्तमान में जल संकट के कई कारण है, जैसे जनसंख्या वृद्धि, कम होती वर्षा का परिमाण, बढ़ता औद्योगिकीकरण, बढ़ता शहरीकरण, वृक्षों कि अंधाधुंध कटाई, विलासिता, आधुनिकतावादी एवं भोगवादी प्रवृत्ति, स्वार्थी प्रवृत्ति एवं जल के प्रति संवेदनहीनता, भूजल पर बढ़ती निर्भरता एवं इसका अत्यधिक दोहन, परम्परागत जल संग्रहण तकनीकों की उपेक्षा, समाज की सरकार पर बढ़ती निर्भरता, कृषि में बढ़ता जल का उपभोग आदि।