कन्फेक्शनरी के काम आएगी मूंगफली की नई किस्म

Author: 
उमाशंकर मिश्र
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 22 जनवरी, 2018

नई दिल्ली : भारतीय वैज्ञानिकों ने मूंगफली की ऐसी किस्म विकसित की है जो किसानों की आमदनी बढ़ाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण साबित हो सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि देश के किसान कन्फेक्शनरी उत्पादों में बहुतायत में उपयोग होने वाली तेल की उच्च मात्रा युक्त मूंगफली इस नई किस्म की खेती करके फायदा उठा सकते हैं। जल्दी ही मूंगफली की यह किस्म भारत में जारी की जा सकती है।

ग्रीनहाउस में विकसित किए गए मूंगफली के नए पौधों के साथ डॉ. जैनीला मूंगफली की इस किस्म को हैदराबाद स्थित अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्ण-कटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (इक्रीसैट) के शोधकर्ताओं ने देश के अन्य शोध संस्थानों के साथ मिलकर विकसित किया है। इसे विकसित करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि “यह स्पेनिश एवं वर्जीनिया गुच्छे वाली मूंगफली की प्रजाति है, जिसे भारत में खेती के लिए अनुकूलित किया गया है।”

कई कन्फेक्शनरी उत्पादों में मूंगफली इस किस्म का उपयोग होता है और इसका बाजार तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन मूंगफली की खेती करने वाले भारत के किसानों को कन्फेक्शनरी के बढ़ते बाजार का फायदा नहीं मिल पा रहा था क्योंकि इस उद्योग में उपयोग होने वाली उच्च तेल की मात्रा युक्त मूंगफली वे मुहैया नहीं करा पा रहे थे। मूंगफली की इस किस्म की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए यह नई प्रजाति विकसित की गई है। शोधकर्ताओं का कहना है कि मूंगफली की इस प्रजाति की माँग काफी अधिक है और इसकी खेती करने से देश के छोटे किसानों को खासतौर पर फायदा हो सकता है।

केंचुए से आएगी जैविक खेती में क्रान्ति

Author: 
गिरीश पांडेय
Source: 
दैनिक जागरण, 20 जनवरी, 2018

धीरे-धीरे ही सही सरकार जैविक खेती की ओर कदम बढ़ा रही है। ऐसी खेती जिसमें लागत कम हो और पर्यावरण के अनुकूल भी। उत्पादों के जैविक होने के नाते अच्छे दाम मिलने से किसानों की आय भी बढ़ेगी जल, जमीन और लोगों की सेहत अलग से सलामत रहेगी। खामोशी से होने वाली इस जैविक क्रान्ति का जरिया बनेगा ‘केंचुआ’।

सिक्किम में जैविक खेती इसके लिये सरकार सभी 97814 राजस्व गाँवों में वर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद) की एक इकाई खोलेगी। अगले पाँच साल तक हर साल यह क्रम दोहराया जायेगा। इस तरह पाँच साल में वर्मी कम्पोस्ट की करीब पाँच लाख इकाइयाँ खुलेंगी। एक इकाई की अनुमानित लागत 8000 रुपये पर सरकार 6000 अनुदान देगी। अधिक उपज के लिये रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों का बिना सोचे-समझे बेतहाशा प्रयोग किया गया है। इनके जहर का असर जल, जमीन और भोजन पर भी पड़ा है। जल, जमीन और भोजन की शुद्धता और लोगों के स्वास्थ्य के लिये जैविक खेती और जैविक उत्पाद समय की माँग है। केन्द्र के साथ प्रदेश सरकार का भी इस पर खासा जोर है। हर गाँव में वर्मी कम्पोस्ट इकाई की स्थापना का लक्ष्य इसका सुबूत है।

जल संग्रहण की एक आसान तकनीक - जियो टैंक


जियो टैंकजियो टैंकउत्तराखण्ड हिमालय में जल संरक्षण के लिये चाल-खाल की पारम्परिक पद्धति है, जो आज भी कई जगह पर विद्यमान है। पर इसके इतर ‘जियो टैंक’ नाम से एक नई तकनीक हिमालय एक्शन रिसर्च सेंटर (हार्क संस्था) नौगाँव, उत्तरकाशी ने ईजाद की है। इस तकनीक का प्रयोग वे किसानों के साथ उत्तरकाशी के बाद भविष्य में बागेश्वर में करने जा रहे हैं।

संस्था का मानना है जलवायु परिवर्तन के कारण पहाड़ में जल संकट गहराता जा रहा है, कारण इसके पहाड़ में सिंचाई के अभाव में नगदी फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। जियो टैंक से किसानों को काफी हद तक सुविधा मिलेगी। यह एक प्रकार की सस्ती और सुलभ तकनीक है जिसे आम किसान खुद ही तैयार कर सकता है।

बता दें कि चाल-खाल का आकार-प्रकार जमीन के भीतर गड्ढेनुमा के आकार का होता है। इससे पानी को सिंचाई के लिये खेतों में पहुँचाने तक मोटरपम्प की आवश्यकता पड़ती है। कुछ लोगों ने इस चाल-खाल को पॉलिथीन से कवर करके जल एकत्रिकरण के नए तरीके भी अपनाए, फिर भी कुछ महंगा साबित हुआ। अब ‘जियो टैंक’ ऐसी तकनीक आई है जिसे स्थानान्तरणीय और सस्ती व सुलभ कही जा रही है।

हिमालय एक्शन रिसर्च सेंटर (हार्क) के संस्थापक महेन्द्र कुँवर का मानना है कि हिमालय एक बहुत ही संवेदनशील भौगोलिक संरचना है। जहाँ भूमि धँसाव एवं भूगर्भीय हलचलें एक आम बात है। जिसका ज्वलन्त उदाहरण 06 दिसम्बर 2017 को आये 5.2 तीव्रता का भूकम्प है।

सर्दी में सूखे जैसे हालात से किसान चिन्तित

Source: 
दैनिक जागरण, 18 जनवरी, 2018

हिमाचल प्रदेश में सूखे जैसी स्थिति से किसानों-बागवानों के साथ आम लोगों की दिक्कतें भी बढ़ गई हैं। मौसम के तेवर आने वाले दिनों में भी ऐसे ही रहे तो लोगों को सूखे की मार झेलनी पड़ेगी। इसका असर खेती व बागवानी पर पड़ने के साथ-साथ लोगों की सेहत पर भी पड़ेगा। अगर जल्द बारिश व बर्फबारी नहीं होती है तो गर्मियों में पेयजल किल्लत के साथ बिजली संकट का सामना भी करना पड़ सकता है। प्रदेश की आबादी का बड़ा हिस्सा जीवन-यापन के लिये खेती-बागवानी पर निर्भर है। बारिश-बर्फबारी न होने से सेब आर्थिकी पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। सेब की फसल तैयार होने के लिये जो जरूरी चिलिंग आवर्स चाहिए वे बर्फबारी न होने से नहीं मिल पायेंगे। इससे फ्लावरिंग प्रभावित होगी और सेब का साइज भी नहीं बन पायेगा।

संरक्षित खेती से बचेगा पर्यावरण

Author: 
अमित कुमार झा
Source: 
डाउन टू अर्थ, जनवरी 2018

धान की पुआल में लगभग 50-55 प्रतिशत कार्बन, 0.6-0.68 प्रतिशत नाइट्रोजन, 0.20-0.23 प्रतिशत फास्फोरस एवं 0.78-1.15 प्रतिशत पोटेशियम होते हैं जो जलाने के उपरान्त नष्ट हो जाते हैं। पूरे भारत में लगभग 9.8 करोड़ टन फसल अवशेषों को जला दिया जाता है जिससे काफी मात्रा में पौधों के लिये जरूरी पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। फसल अवशेषों को जलाने से ग्रीन हाउस गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड एवं कार्बन मोनोऑक्साइड आदि निकलती है जो पर्यावरण एवं मानव जीवन के लिये हानिकारक है।

कृषि और किसानों की मुस्कुराहट का आएगा नया दौर

Author: 
डॉ. जयंतीलाल भंडारी
Source: 
राजस्थान पत्रिका, 30 दिसम्बर, 2017

हम आशा करें कि 2018 में सरकार कृषि और गाँवों के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी। इससे किसानों की मुस्कुराहट बढ़ेगी और उनकी खुशहाली का नया दौर आएगा।
कृषि निःसन्देह वर्ष 2017 कृषि संकट का वर्ष रहा। देश के कई राज्यों में मौसम की मार से जूझते किसानों ने लाभकारी मूल्य पाने के लिये आन्दोलन किए, वहीं उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश आदि राज्यों ने किसानों के हजारों करोड़ रुपए के ऋण माफ किए। बीते वर्ष किसानों को मिली निराशाओं और चिन्ताओं को ध्यान में रखते हुए नए वर्ष 2018 में केन्द्र सरकार कृषि व किसानों को सर्वोच्च प्राथमिकता देती दिखेगी।

कृषि सम्बन्धी आँकड़ों को देखें तो पाते हैं कि बीते वर्ष कृषि विकास दर करीब 4 फीसदी रही, जबकि 2016 में यह 5 फीसदी थी। वर्ष 2014 में कृषि निर्यात 43 अरब डॉलर था, 2017 में घटकर करीब 33 अरब डॉलर रह गया। जीडीपी में कृषि का योगदान 2013-14 में 18.2 फीसदी था, वह 2016-17 में घटकर 17.4 फीसदी रह गया। इसके चलते नीति आयोग ने समीक्षा की कि देश में 80 फीसदी किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था से बाहर हैं।

ई-तकनीकों का ग्रामीण विकास में योगदान

Author: 
डॉ. वीरेन्द्र कुमार
Source: 
कुरुक्षेत्र, अगस्त 2017

आई.सी.टी. के महत्त्व को समझते हुए किसानों तक नवीनतम कृषि सम्बन्धी वैज्ञानिक जानकारियों के प्रसार हेतु कई पहल की गई हैं। वेब-आधारित ‘के.वी.के. पोर्टल’ भी बनाए गए हैं। आई.सी.ए.आर. के संस्थानों के बारे में जानकारियाँ उपलब्ध करवाने के लिये आई.सी.ए.आर. पोर्टल और कृषि शिक्षा से सम्बन्धित उपयोगी सूचनाएँ प्रदान करने के लिये एग्री यूनिवर्सिटी पोर्टल को विकसित किया गया है। इसके अतिरिक्त के.वी.के. मोबाइल एप भी किसानों को त्वरित व सुलभ सूचनाएँ उपलब्ध करवाने के लिये बनाया गया है। कृषि और ग्रामीण विकास में डिजिटल इंडिया के दृष्टिकोण को साकार करने में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान होगा।

फसल उत्पादन से सम्बन्धित किसी भी समस्या के समाधान के लिये किसान कॉल सेंटर की सुविधा सभी राज्यों में उपलब्ध है। इस सेवा के तहत किसान अपनी समस्या दर्ज करा सकते हैं जिनका समाधान 24 घंटों के अन्दर कृषि विशेषज्ञों द्वारा उपलब्ध करा दिया जाता है। किसान कृषि विश्वविद्यालय और कृषि अनुसन्धान केन्द्रों के विशेषज्ञों के माध्यम से अपने प्रश्नों के उत्तर पाने के लिये नजदीकी किसान कॉल सेंटर पर टोल फ्री नं. 1800-180-1551 से साल के 365 दिन प्रातः 6 बजे से रात्रि 10 बजे के बीच सम्पर्क कर सकते हैं।

जल संरक्षण एवं सिंचाई में महिलाओं की भूमिका

Author: 
डॉ. शशिकला पुष्पा, डॉ. बी. रामास्वामी
Source: 
डाउन टू अर्थ, दिसम्बर 2017

हमें महिलाओं के सक्रिय सहभाग के साथ जल संसाधन प्रबंधन में उनकी दक्षता बढ़ाने की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित करने के लिये हमें कानूनों तथा संस्थागत व्यवस्थाओं में बदलाव करना होगा ताकि महिलाओं को सिंचित कृषि एवं जल संरक्षण में अपनी भूमिका बढ़ाने का मौका मिले। इतिहास में अधिकतर सभ्यताओं ने जल तथा महिलाओं को जीवन का स्रोत माना है। अब महिलाओं के लिये जल की और जल के लिये महिलाओं की आवश्यकता स्वीकार करने का समय आ गया है।

लैंगिक मुद्दों का अर्थ महिलाओं एवं पुरुषों के जीवन तथा उनके बीच के सम्बन्धों को प्रभावित करने वाला पहलू है। योजना तैयार करने, रख-रखाव तथा प्रबंधन में महिलाओं की सहभागिता कम रहने से सेवाओं की गुणवत्ता तथा महिलाओं की स्थिति एवं विकास में उनकी सहभागिता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। महिलाओं तथा पुरुषों का निष्पक्ष विकास करने के लिये सभी राष्ट्रीय योजनाओं में लैंगिक पक्षों को जरूर शामिल किया जाना चाहिये।

तोरा में बड़-बड़ गुण हौ गे मड़ुआ

Author: 
चैतन्य चंदन
Source: 
डाउन टू अर्थ, दिसम्बर 2017

मड़ुआ में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम, आयरन और फाइबर पाया जाता है इसलिये यह अन्य अनाजों की तुलना में अधिक ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम है

तोरा में बड़-बड़ गुन हौ गे मड़ुआ
जब मड़ुआ में दू पत्ता भेल
बुढ़िया-बुढ़वा कलकत्ता गेल
तोरा में बड़-बड़ गुन हौ गे मड़ुआ
तोरा कोठी में रखबो गे मड़ुआ
तोरा में बड़-बड़ गुन हौ गे मड़ुआ


मड़ुआ से रोटी और स्वादिष्ट हलवा बनाया जाता है दीनानाथ साहनी की पुस्तक ‘माँ की लोरियाँ और संस्कार गीत’ में संकलित यह लोकगीत मड़ुआ के गुणों का बखान करता है। इस लोकगीत में बताया गया है कि मड़ुआ को काफी दिनों तक कोठी में रखा जा सकता है और यह खराब नहीं होता। अंगिका भाषा का यह लोक गीत एक समय मड़ुआ की कटाई के समय गाया जाता था। हालाँकि अब मड़ुआ की खेती को छोड़कर लोग गेहूँ और धान की खेती करने लगे हैं। इसका कारण मड़ुआ को लेकर सरकार का उपेक्षापूर्ण रवैया भी रहा है। मड़ुआ की खरीदी सरकार नहीं करती इसलिये किसानों को इसे बेचने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है।