Latest

लाख की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भागीदारी

Author: 
आर. के. सिंह एवं गोविन्द पाल
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

लाख की खेती में अन्य फसलों की अपेक्षा बहुत ही दक्षता एवं समय की आवश्यकता नहीं होती है। इसकी खेती में बहुत ही आसान प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं। यदि लाख की खेती को वैज्ञानिक तरीके अपना कर किया जाये तो यह अधिक आय एवं रोजगार का स्रोत होगा जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के लिये पलायन की समस्या को कम करेगा। लाख पोषक वृक्ष जो कि बहुतायत में बंजर भूमि में उपलब्ध है या ऐसी भूमि पर पोषक वृक्षों को लगाया जा सकता है जो कि खेती के लिये अनुपयुक्त समझी जाती है लाख की खेती से प्राप्त आय किसानों द्वारा जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं एवं अन्य कृषि आगतों को खरीदने में प्रयोग किया जाता है।

प्राकृतिक खेती - कहानी मेरे अनुभवों की

Author: 
डॉ. आशुतोष अग्निहोत्री

यदि आप अपने बच्चों को प्यार करते हैं। उनको सुखी देखना चाहते हैं तो ये अपराध कैसे कर सकते हैं कि उनके लिये पीने का स्वच्छ पानी, स्वच्छ हवा, स्वच्छ खाद्यान्न भी छोड़कर नहीं जावें। ज्यादा उपज लेने के चक्कर में केमिकलों का उपयोग करके आखिर हम क्या कर रहे हैं? मेरे हिसाब से हमलोग तो स्वार्थी की श्रेणी में भी आने लायक नहीं हैं क्योंकि स्वार्थी इन्सान तो अपना स्व + अर्थ सिद्ध करता है।

स्ट्राबेरी की उन्नत खेती

Author: 
राकेश रंजन एवं रंजय कुमार सिंह
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

स्ट्राबेरी की खेतीस्ट्राबेरी की खेतीभारत में स्ट्राबेरी की खेती सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों में 1960 के दशक से शुरू हुई, परन्तु उपयुक्त किस्मों की अनुउपब्धता तथा तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण इसकी खेती में अब तक कोई विशेष सफलता नहीं मिल सकी। आज अधिक उपज देने वाली विभिन्न किस्में, तकनीकी ज्ञान, परिवहन शीत भण्डार और प्रसंस्कण व परिरक्षण की जानकारी होने से स्ट्राबेरी की खेती लाभप्रद व्यवसाय बनती जा रही है। बहुद्देशीय कम्पनियों के आ जाने से स्ट्राबेरी के विशेष संसाधित पदार्थ जैसे जैम, पेय, कैंडी इत्यादि बनाए जाने के लिये प्रोत्साहन मिल रहा है।

 

स्ट्राबेरी में पाये जाने वाले तत्व (100 ग्राम खाने योग्य भाग में)

कार्बनिक खेती में जैव उर्वरकों का योगदान (Contribution of organic fertilizers in organic farming)

Author: 
नरेन्द्र कुमार
Source: 
विज्ञान प्रगति, अक्टूबर 2017

जैव उर्वरक एक प्रकार के जीव होते हैं जो मृदा की पोषण गुणवत्ता को बढ़ाते हैं। ये जीवाणु, कवक तथा सायनोबैक्टीरिया के मुख्य स्रोत होते हैं। द्विबीजपत्री (लैग्यूमिनस) पादपों की जड़ों पर स्थित ग्रंथियों का निर्माण राइजोबियम के सहजीवी सम्बन्ध द्वारा होता है। यह जीवाणु वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को स्थिरीकृत कर इसे कार्बनिक रूप में परिवर्तित कर देते हैं जिससे पादप इसका प्रयोग पोषकों के रूप में करते हैं।

जैविक रोग नियंत्रक द्वारा पौधा रोग निदान-एक उभरता समाधान

Author: 
डाॅ. हेम चन्द्र लाल
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

झारखण्ड की अम्लीय मिट्टी तथा जलवायु, ट्राइकोडर्मा आधारित जैव फफूंदनाशी के लिये अत्यधिक उपयोगी हैं। यह मृदा में पाई जाने वाली हरे रंग की एक फफूंदी है जो पौधों में बीमारी करने वाले रोग कारकों जैसे राइजोक्टोनिया, पीथियम, स्केलेरोशियम, मैक्रोफोमिना, स्कलरोटिनिया, फाइटोफ्थोरा, मिलाइडोगाइन, हर्समनिएला इत्यादि का पूर्ण रूपेण अथवा आंशिक रूप से विनाश करके इनके द्वारा होने वाली बीमारियों जैसे आर्द्रगलन, बीज सड़न, उकठा, मूल विगलन एवं सूत्रकृमि का मूलग्रंथि रोग इत्यादि के नियंत्रण में सहायक होता है।

फलों की तुड़ाई की कसौटियाँ

Author: 
उदित कुमार, रंजय कुमार सिंह, वी.के. पाण्डे एवं राकेश रंजन
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

ताजे फलों में सामान्य जीवन क्रियाएँ जैसे श्वसन, उत्स्वेदन आदि होने के कारण विनाशशील होते हैं। इन क्रियाओं को एकदम नहीं रोका जा सकता, पर उचित प्रबन्धन से इनकी गति धीमी की जा सकती है। फलों की तुड़ाई के लिये परिपक्वता का सही ज्ञान होने से किसान भाई बहुत हद तक इस क्षति को कम कर सकते हैं।

विभिन्न फलों की तुड़ाई की कसौटियाँ


परिपक्वता की कसौटियाँ कई कारकों जैसे पोषण, फल का आकार, जलवायु, वृक्ष पर फलों की स्थिति, मिट्टी कटाई-छँटाई तथा वृद्धि नियामक पदार्थों के छिड़काव से प्रभावित होती है। अतः एक विधि पर निर्भर न रहकर विभिन्न कसौटियों के संयोग से परिपक्वता की सही अवस्था की जानकारी मिल सकती है। कुछ मुख्य फलों में व्यावहारिक रूप से इस्तेमाल किये जाने वाले तरीकों का वर्णन नीचे दिया गया है-

आम


गूदे का रंग हल्का पीला, फल का विशेष गुरूत्व 1.01 से 1.02 तक, गुठली पर रेशों का बनना, फल का घुलनशील ठोस 120 ब्रिक्स होने पर तुड़ाई के लिये उपयुक्त समझा जाता है।

केला


फल 115 से 130 दिन में तैयार हो जाते हैं। इस अवस्था में फल का तीन-चौथाई भाग का परिपक्व होना, कोणापन का लुप्त होना, गूदे और छिलके का अनुपात 1.1 से 1.4 होना प्रमुख लक्षण है।

नींबू वर्गीय फल


फलों का हरापन विलुप्त होकर फसल व किस्म के अनुसार केरोटिन का विकास, तुड़ाई के समय चीनी व अम्ल का अनुपात लगभग 10 से 12 प्रतिशत होना चाहिए।

अमरूद


रंग परिवर्तन पर फलों की तुड़ाई करते हैं, जब गहरा हरा रंग पीले रंग में परिवर्तित हो तथा फल का विशेष गुरूत्व 1 से कम (0.98 से 0.99) होना चाहिए।

पपीता


फल के ऊपर वाले हिस्से में या धानियों के मध्य वाले भाग में जैसे ही पीलापन शुरू हो तथा कम-से-कम 11.5 प्रतिशत घुलनशील ठोस पदार्थ की मात्रा होने पर तुड़ाई करनी चाहिए।

सीताफल

आम की उन्नत बागवानी कैसे करें

Author: 
पवन कुमार झा
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

आम की बागवानीआम की बागवानीफूल निकलने के समय आम आर्द्रता, जल या कुहासा को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करता है। औसत वार्षिक वर्षा 150 से.मी. वाले क्षेत्रों में, पर्याप्त सूर्य की रोशनी एवं कम आर्द्रता में आम की फसल अच्छी होती है।

कम अम्लीय मिट्टी में आम की फसल अच्छी होती है। कच्चे आम का उपयोग अचार, चटनी और आमचुर में होता है। पके हुए आम से जाम, अमट, कस्टर पाउडर, टाॅफी इत्यादि बनाया जाता है सूखे हुए फूल से डायरिया एवं डिसेन्ट्री का भी इलाज सफलतापूर्वक किया जाता है।

प्रभेदः-


मई में पकने वालीः- बम्बई, स्वर्णरेखा, केसर, अलफांसो।
जून में पकने वाली दशहरी, लंगरा, कृष्णभोग, मल्लिका।
जुलाई में पकने वालीः- फजली, सिपिया, आम्रपाली।
अगस्त में पकने वालीः- बथुआ, चौसा, कातिकी।

प्रसार विधि


रूट स्टोक के लिये पके हुए फल से स्टोन निकालकर एक सप्ताह के भीतर मिट्टी में बो दें। दो-तीन सप्ताह की आयु में पौधों को नर्सरी बेड में ग्राफ्टिंग के लिये स्थानान्नतरित करते है। ट्रान्सप्लांटिंग के पहले नर्सरी बेड में प्रचुर मात्रा में कम्पोस्ट या पत्ता खाद डालते हैं। जुलाई-अगस्त में ग्राफ्टिंग करते हैं।

भिनियर ग्राफ्टिंग/साइड ग्राफ्टिंग


सही साइन जिसमें तीन से चार महीने का सूट एवं फूल नहीं हो का चुनाव करें। सूट को मदरप्लांट में घुसा दें। बड को बहार निकाल लें। यह कार्य उत्तरी भारत में मार्च से सितम्बर तक किया जाता है।

स्टोन ग्राफ्टिंग

बाग में ग्लैडिओलस

Author: 
डॉ. अजय कु. द्विवेदी
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

ग्लैडिओलसग्लैडिओलसशल्ककन्दीय फूल के रूप में ग्लैडिओलस विश्व स्तर पर कट-फ्लावर के रूप में उगाया जाता है। भारत में इसकी खेती बंगलुरु, श्रीनगर, नैनीताल, पुणे व उटकमण्डलम में वृहत रूप से होता है। झारखण्ड के धनबाद में अब इसकी खेती छोटे पैमाने पर आरम्भ हो चुकी है। इसकी खेती गृह बाजार तथा निर्यात, दोनों हेतु किया जाता है। शीतकाल में ग्लैडिओलस का यूरोपियन देशों में निर्यात किया जाता है। जिसके कारण काफी विदेशी मुद्रा का अर्जन होता है।

किस्म


रंग के आधार पर इसके कई किस्म पाये जाते हैं। उगाए जाने योग्य अधिकतर किस्म जैसे मेलोडी, ट्रॉपीक, सिज, स्नो, प्रिन्स, फ्रेंडशीप, एप्पल, ब्लॉसम, किंग लियर इत्यादि नीदरलैंड में विकसित किये गए हैं। सागर, श्रीदूर, शक्ति, अग्निरेखा, श्वेता, सुनयना, नीलम, चिराग, बिंदिया, अंजली, अर्चना इत्यादि भारत में विकसित की गई है।

पादप प्रवर्धन


ग्लैडिओलस बीज, कंद व उत्तक संवर्धन द्वारा उगाए जाते हैं। उच्च गुणवत्ता के कंद विकसित करने के लिये 10-15 से.मी. की दूरी पर अवस्थित पंक्तियों में 5 से.मी. की दूरी पर छोटे कंदों को लगाया जाता है। जिससे प्रति हेक्टेयर 4-5 लाख बड़े कंद प्राप्त किये जाते हैं।

मृदा व जलवायु


ग्लैडिओलस की खेती के लिये भूमि का पी.एच. मान 5.5-6.5 रहना चाहिए। बलुआही, दोमट, पोषक तत्वों से भरपूर अच्छी जलनिकास वाली भूमि अच्छी होती है। पी.एच. ठीक करने हेतु चूना अथवा डोलोमाइट का प्रयोग करना चाहिए। इसकी खेती 15-25 सेंटीग्रेड तापमान तथा पर्याप्त प्रकाश में सबसे अच्छे तरीके से सम्भव है। बहुत ज्यादा आर्द्रता रोगों को बढ़ावा देता है।

जमीन की तैयारी

खाने से पहले की छोटी-छोटी लेकिन मोटी बातें

Author: 
मनीष अग्रहरि
Source: 
विज्ञान प्रगति, अक्टूबर 2017

इन दिनों फलों, सब्जियों, पशु उत्पादों और डेयरी समेत अन्य खाद्य उत्पादों को रोगों व कीटों से बचाने के लिये भारी मात्रा में पेस्टीसाइड का उपयोग किया जाता है अथवा उनको पकाने, बढ़ाने, चमकाने वाले बहुसंख्यक हानिकारक रसायनों का उपयोग किया जाता है। इन रसायनों का रेजीडुअल इफेक्ट (अवशेष प्रभाव) काफी लम्बे समय तक कायम रहता है। यदि खाद्य उत्पादों को सावधानी से उपयोग न किया गया तो स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचना तय है।