Latest

रसायनों की मारी, खेती हमारी (Chemical farming in India)

Source: 
समाज, प्रकृति और विज्ञान (समाज का प्रकृति एजेंडा), माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय, भोपाल, 2017

थाली में जहरथाली में जहरभारत कृषि प्रधान देश है। देश की बहुत बड़ी आबादी की रोजी रोटी खेती के सहारे है। एक मान्यता जो सच्चाई पर आधारित है कि कृषि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। समाज में खेती का क्या दर्जा था, इस बारे में पुराने जमाने में एक कहावत प्रचलित थी-

“उत्तम खेती, मध्यम बान,
अधम चाकरी, भीख निदान”


मुनाफे की खेती बना करेला

Author: 
शिवनंदन साहू
Source: 
राजस्थान पत्रिका, 23 सितम्बर, 2017

. कौशांबी। करेले का स्वाद भले ही कड़वा हो, लेकिन कौशांबी में सैकड़ों किसानों की जिन्दगी में करेले ने खासा मिठास घोल रखा है। गंगा की तराई से बसे सैकड़ों किसानों ने पूरी मेहनत से करेले की खेती किया और नतीजा यह रहा कि आज कौशांबी में बड़े पैमाने पर करेले का निर्यात हो रहा है। करेले की खेती करने वाले किसानों का कहना है कि बारिश के सीजन में किसी दूसरी हरी सब्जी की खेती करने में नुकसान की आशंका बनी रहती है। जबकि करेला की खेती में ऐसी सम्भावना बहुत कम रहती है। करेला से किसानों को कम लागत में ज्यादा मुनाफा हो रहा है। जिला उद्यान विभाग भी करेला की खेती करने वाले किसानों की मदद कर रहा है। विभाग करेले की खेती करने वाले किसानों को प्रोत्साहन के रूप में धनराशि भी देता है।

प्रस्तावना : कृषि उत्पादकता, पोषण स्तर एवं कुपोषण जनित बीमारियाँ

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

आर्थिक विकास का ऐतिहासिक अनुभव और आर्थिक विकास की सैद्धांतिक व्याख्या यह स्पष्ट करते हैं कि आर्थिक विकास की प्रारंभिक अवस्था में प्रत्येक अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं के विकास अनुभव की पुष्टि करते हैं। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के राष्ट्रीय उत्पाद, रोजगार और निर्यात की संरचना में कृषि क्षेत्र का योगदान उद्योग और सेवा क्षेत्र की तुलना में अधिक होता है। ऐसी स्थिति में कृषि का पिछड़ापन सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को पिछड़ेपन में बनाये रखता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कमजोर वर्ग के लोग जिनमें लघु एवं अति लघु कृषक और कृषि श्रमिक सम्मिलित हैं, अधिकांशत: गरीबी के दुश्चक्र में फँसे रहते हैं और वे निम्नस्तरीय संतुलन में बने रहते हैं। इनकी जोत का आकार तो छोटा होता है साथ ही इनके पास स्थायी उत्पादक परिसंपत्ति की कमी बनी रहती है। इनकी गरीबी अर्थव्यवस्था के पिछड़ेपन का मुख्य कारण होती है।

विभिन्न विकसित देशों का आर्थिक इतिहास यह स्पष्ट करता है कि कृषि विकास ने ही उनके औद्योगिक क्षेत्र के तीव्र विकास का मार्ग प्रशस्त किया है। आज के विकसित पूँजीवादी और समाजवादी अर्थव्यवस्थाओं के विकास के आरंभिक चरण में कृषि क्षेत्र ने वहाँ के गैर कृषि क्षेत्र के विकास हेतु श्रमशक्ति, कच्चा पदार्थ, भोज्य सामग्री और पूँजी की आपूर्ति की है। इंग्लैंड में सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में कृषकों ने तकनीकी परिवर्तन द्वारा कृषि विकास का मार्ग अपनाया और इसके आधिक्य को गैर कृषि क्षेत्र के विकास में प्रयोग किया गया।

वैकल्पिक फसल के रूप में सुगन्धित घासें

Author: 
दीपक कुमार वर्मा, रजनीश कुमार एवं रमेश कुमार
Source: 
विज्ञान प्रगति, सितम्बर 2017

लखनऊ स्थित सीएसआईआर के अग्रणी संस्थान केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) द्वारा अनेकों ऐसी फसलों के साथ-साथ नींबू घास अथवा (लेमनग्रास) और रोशाघास (पामारोजा) तथा सिट्रोनेला (जावा घास) की उन्नत खेती हेतु कृषि प्रौद्योगिकी व अधिक उपज देने वाली किस्मों का विकास किया गया है। इस प्रकार विकसित उन्नत प्रौद्योगिकी को किसानों और उद्यमियों में लोकप्रिय बनाने के लिये समय-समय पर प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रम चलाए जाते रहे हैं। इन सुगन्धित घासों की खेती व प्रसंस्करण में लगभग 35-40 हजार कृषक अथवा उद्यमी परिवार सीधे तौर पर जुड़े हैं तथा प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख मानव दिवसों के बराबर अतिरिक्त रोजगार सृजित हो रहे हैं। प्रकृति ने हमें सुगन्धित पौधों का अनमोल खजाना प्रदान किया है जिनकी विधिवत खेती और तेल के आसवन से आज हमारे देश में हजारों किसान लाभान्वित हो रहे हैं। इन सुगन्धित पौधों से निकाले गए सुवासित तेल विभिन्न प्रकार की सुगन्धियों के बनाने के अतिरिक्त एरोमाथिरैपी में बहुतायत से प्रयोग किये जाते हैं। लखनऊ स्थित सीएसआईआर के अग्रणी संस्थान केन्द्रीय औषधीय एवं सगन्ध पौधा संस्थान (सीमैप) द्वारा अनेकों ऐसी फसलों के साथ-साथ नींबू घास अथवा (लेमनग्रास) और रोशाघास (पामारोजा) तथा सिट्रोनेला (जावा घास) की उन्नत खेती हेतु कृषि प्रौद्योगिकी व अधिक उपज देने वाली किस्मों का विकास किया गया है।

पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में जैवप्रौद्योगिकी का योगदान

Author: 
सुनील कुमार ‘प्रियबच्चन’
Source: 
विज्ञान प्रगति, सितम्बर 2017

कुछ वर्ष पूर्व सीएसआईआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान, लखनऊ एवं केन्द्रीय खाद्य प्रौद्योगिक अनुसन्धान संस्थान, मैसूर द्वारा सायनोबैक्टीरिया से सिंगल सेल प्रोटीन का व्यापारिक उत्पादन करवाया गया। इसके लिये शैवाल क्लोरेला एवं सेनडेस्मस भी प्रयोग में लाये गए। ये सूक्ष्म जीव प्रदूषणकारी अपशिष्ट पदार्थों का अधिकतर उपयोग करते हैं जिनसे प्रदूषण नियंत्रण में सहायता मिलती है।

सौर ऊर्जा पौधों के लिये रोग नियंत्रक

Author: 
अभिलाष सिंह मौर्य एवं प्रेरणा कौशल
Source: 
विज्ञान प्रगति, सितम्बर 2017

पौधों में रोगों की रोकथाम के लिये वैकल्पिक तरीकों की आवश्यकता है ताकि हम रासायनिक पेस्टीसाइडों का उपयोग पूरी तरह से बन्द कर सकें या उनके उपयोग में कमी ला सकें। प्रकृति में पौधों से प्राप्त होने वाले कीटनाशक, जैविक कीटनाशक, जैविक खरपतवारनाशी और पौधों की प्रतिरोधी क्षमता वाली किस्में विद्यमान हैं जो रोगों, कीटनाशकों और खरपतवारों को अच्छी तरह से नियंत्रित कर सकती हैं। इसके अतिरिक्त विकसित कृषि पद्धतियाँ और सफेद पारदर्शी पॉलीथीन से सौर ऊर्जा संचित करना, जैसे कुछ ऐसे तरीके हैं जिनसे हम रोगों को नियंत्रित कर सकते हैं। हमारे देश में कीटों और रोगों के प्रकोप से हर वर्ष 18-20 प्रतिशत फसलोत्पाद नष्ट हो जाते हैं, जिससे देश को प्रतिवर्ष 30,000 करोड़ रुपए का नुकसान होता है। इस नुकसान को रोकने के लिये हमें रासायनिक पेस्टीसाइडों की आवश्यकता पड़ती है और आज इन रसायनों की खपत वर्ष 1954 के 434 टन की तुलना में 90,000 टन से अधिक हो गई है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वर्तमान में हम इन रोगों और कीटनाशकों को रोकने में तो सक्षम रहे हैं परन्तु कीटनाशकों की रासायनिक पेस्टीसाइडों के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता जो वर्ष 1954 में 7 कीटनाशकों में विद्यमान थी आज वह 50 से अधिक कीटनाशकों में पाई गई है। इसी तरह फफूंद की भी कई ऐसी प्रजातियाँ हैं जिनमें रासायनिक फफूंदनाशियों के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता पाई गई है। साधारणतया रासायनिक पेस्टीसाइडों के अधिकाधिक उपयोग से पीने का पानी, नदियों और कुओं का पानी भी दूषित हुआ है।

जल के अन्य उपयोग

Author: 
कुबेर सिंह गुरुपंच
Source: 
पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (मध्य प्रदेश) 492010, शोध-प्रबंध 1999

जल संसाधन का उपयोग कृषि में सिंचाई के अलावा मनुष्यों, पशुओं और अन्य जीवों के पीने के लिये, शक्ति के उत्पादन गंदे पानी को बहाने, सफाई, घोंघा, मछलीपालन, मनोरंजन, औद्योगिक कार्य एवं सौर परिवहन आदि हेतु किया जाता है। ऊपरी महानदी बेसिन में वर्तमान में जल का उपयोग घरेलू, औद्योगिक कार्य, मत्स्यपालन, शक्ति के उत्पादन एवं मनोरंजन हेतु किया जा रहा है।

जल संसाधन का मानव के लिये उपयोग :


जल एवं मानव का गहरा एवं व्यापक सम्बन्ध है। मनुष्य जल को विभिन्न कार्यों में प्रयोग करता है। जैसे इमारतों, नहरों, घाटी, पुलों, जलघरों, जलकुंडों, नालियों एवं शक्तिघरों आदि के निर्माण में। जल का अन्य उपयोग खाना पकाने, सफाई करने, गर्म पदार्थ को ठंडा करने, वाष्प शक्ति, परिवहन, सिंचाई व मत्स्यपालन आदि कार्यों के लिये किया जाता है। ऊपरी महानदी बेसिन में शहरी क्षेत्रों में औसत 70 लीटर प्रति व्यक्ति एवं ग्रामीण क्षेत्रों में 40 लीटर प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन जल का उपयोग किया जाता है।

जल का उपयोग :


(1) सिंचाई :
बेसिन में जल संसाधन का कुल उपलब्ध जल राशि का 44 प्रतिशत सिंचाई कार्यों में प्रयुक्त होता है। बेसिन में 41,165 लाख घनमीटर सतही जल एवं 11,132 .93 लाख घन मीटर भूगर्भजल सिंचाई कार्यों में प्रयुक्त होता है।

बेसिन में जल संसाधन विकास की पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं। यहाँ उपलब्ध कुल जल राशि का 1,52,277.98 लाख घन मीटर जल सिंचाई कार्यों में उपयोग में लाया जाता है, शेष जल राशि का उपयोग अन्य कार्यों औद्योगिक, मत्स्यपालन आदि में प्रयुक्त होता है। सतही एवं भूगर्भ जल का सर्वाधिक उपयोग रायपुर जिले में होता है।

मत्स्य उत्पादन

Author: 
कुबेर सिंह गुरुपंच
Source: 
पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (मध्य प्रदेश) 492010, शोध-प्रबंध 1999

मत्स्य पालन :


ग्रामीण अर्थव्यवस्था और मानव आहार में मछली का अति महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्राचीनकाल से ही मछली पालना एवं मछली पकड़ना एक महत्त्वपूर्ण उद्योग रहा है। मछली मनुष्य के भोजन का न केवल महत्त्वपूर्ण पदार्थ है अपितु यह सबसे सस्ता एवं सुगम खाद्य है। विभिन्न भागों में मछली की खपत मुख्यत: स्थानीय परम्परा रीति-रिवाज, धर्म एवं मछली पकड़ने की सुविधा पर निर्भर करती है।

मत्स्य उद्योग एक ऐसा उद्योग है जिसका आधार जल है। बेसिन में नदी, तालाब तथा जलाशय पर्याप्त हैं, और इसमें पाई जाने वाली मछलियाँ प्रकृति की देन है। वर्तमान में वैज्ञानिक ढंग से मछलियों का विकास किया जा रहा है। एवं इनकी प्रजातियाँ बढ़ाई जा रही हैं।

ऊपरी महानदी बेसिन में मत्स्य पालन कार्य हतु विभिन्न प्रकार के जल संसाधन उपलब्ध हैं परंतु मुख्य रूप से तीन जलस्रोतों पर ही मत्स्यपालन कार्य अधिक विकसित हुआ है - नदियाँ, सिंचाई विभाग के जलाशय और तालाब।

ऊपरी महानदी बेसिन - जलाशयवार मत्स्योत्पादन, 1997-98

नदियाँ :


इस क्षेत्र की सबसे बड़ी नदी महानदी और इसकी प्रमुख सहायक नदी शिवनाथ है। अन्य सहायक नदियों में मनियारी, खास, पैरी हसदेव, तांदुला, जौंक, सूखा, खोरसी, सोंदूर, तेल, सुरही, खरखरा, मनिहारी, आमनेर एवं ढोंटू मुख्य है।

ऊपरी महानदी बेसिन में इन नदियों से 35290.10 हेक्टेयर जल क्षेत्र मत्स्य पालन हेतु उपलब्ध है, इसमें 537.51 मिट्रिक टन मत्स्योत्पादन किया जाता है।

सिंचाई विभाग के जलाशय :

जल का घरेलू, औद्योगिक तथा अन्य उपयोग

Author: 
कुबेर सिंह गुरुपंच
Source: 
पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (मध्य प्रदेश) 492010, शोध-प्रबंध 1999

ग्रामीण तथा नगरीय पेयजल प्रदाय योजना का विकास :


जल मानव जीवन की एक प्रधान आवश्यकता है। प्रत्येक जीवधारी को जीवित रहने के लिये जल अत्यंत आवश्यक है। प्राचीन समय में पीने एवं घरेलू कार्यों के लिये नदी या तालाबों के जल को सीधे (बिना किसी यांत्रिकी या तकनीकी विधि का प्रयोग किये) उपयोग कर लिया जाता था। इस प्रकार की पेयजल व्यवस्था स्वास्थ्य के लिये अत्यंत हानिकारक एवं भयानक होती थी। वर्तमान में पेयजल की व्यवस्था यांत्रिकी एवं तकनीकी विधियों द्वारा किया जाता है। यह व्यवस्था लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा की जाती है।

ऊपरी महानदी बेसिन में सन 1991 के अनुसार कुल जनसंख्या 1,33,26,396 व्यक्ति हैं। इसमें 1,06,68,837 (80.5 प्रतिशत) ग्रामीण एवं 26,57,570 (19.05 प्रतिशत) नगरीय जनसंख्या है। यह जनसंख्या 14,723 गाँव एवं 68 नगर में निवास करती है। इसके अंतर्गत ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में उपलब्ध शुद्ध जल का वितरण एवं जल की समस्या का अध्ययन किया गया है।

ग्रामीण पेयजल व्यवस्था :


ऊपरी महानदी बेसिन में ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति के लिये वर्तमान में राजीव गांधी पेयजल मिशन (1972-73) एवं राष्ट्रीय पेयजल मिशन (1986) द्वारा सुरक्षित पेयजल विशेषकर समस्याग्रस्त एवं स्रोत-विहीन गाँवों में उपलब्ध हो रहा है।