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एक एकड़ में उगाई धान की 140 प्रजातियाँ

Author: 
गोविंद दुबे
Source: 
दैनिक जागरण, 30 सितम्बर 2017

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के खागा तहसील का हसनपुर अकोढिया गाँव इन दिनों चर्चा में है। यहाँ के एक किसान के खेत में देश और दुनिया की 140 प्रजातियों की धान की फसल लहलहा रही है। जिसे देखने के लिये कृषि वैज्ञानिकों की टीम के अलावा आस-पास के किसानों की भी भीड़ जुटती है। किसान ने स्थानीय जलवायु के अनुकूल धान की बेहतर प्रजाति का पता लगाने के लिये यह प्रयोग किया है। अब कृषि वैज्ञानिकों के लिये भी यह शोध का विषय बन गया है।

लहलहा रही धान


यह पूरी कवायद किसान ने यह जानने के लिये की है कि उसके खेत की मिट्टी और जलवायु के अनुरूप सबसे उत्पादक धान कौन सा हो सकता है, जिसका वह सफल उत्पादन कर सके। रमेश सिंह के इस प्रयोग ने कृषि वैज्ञानिकों को भी हैरत में डाल दिया। एक समान परिस्थिति और जलवायु में देश-विदेश की 140 धान प्रजातियोंं को किसान ने एक एकड़ में सफलतापूर्वक तैयार किया। रमेश ने पाकिस्तान, चीन, अमेरिका सहित 20 देशों की प्रजातियों का धान उगाया है। तकरीबन सौ प्रजातियाँ पककर तैयार हो गईं तो चालीस प्रजातियों की बाली हरी है। उन्होंने बताया कि सभी प्रजातियों की पौध एक ही दिन लगाई गई थी और पानी व उर्वरक की बराबर मात्रा में दी गई है।

यह मिलेगा लाभ


रमेश ने बताया कि एक एकड़ में धान की हर प्रजाति की रोपाई की गई है। वैज्ञानिक अब इस बात पर शोध कर रहे हैं कि यहाँ की जलवायु के लिये कौन-कौन सी प्रजातियाँ उपयुक्त होंगी। एक बाली में पड़े दानों की संख्या से उत्पादन का पता चलेगा। रोग प्रतिरोधक क्षमता, फसल पकने की अवधि एवं धान से चावल की रिकवरी के मानकों पर बेहतर प्रजाति का चयन होगा। अच्छी प्रजाति मिलने से उत्पादन का अच्छा मूल्य मिलेगा। इस समय हाइब्रिड की 80 फीसद प्रजाति में चावल की रिकवरी की समस्या आ रही है। इस शोध से 67 प्रतिशत से अधिक रिकवरी वाली प्रजातियों की चिन्हित किया जा सकेगा। किसान ने बताया कि जो फसल पकती जा रही है, उसका अलग रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है।

कृषि वैज्ञानिकों ने सराहा

खाद्य एवं पोषण सुरक्षा में वैज्ञानिक क्रान्तियाँ

Author: 
वीरेन्द्र कुमार
Source: 
विज्ञान प्रगति, अक्टूबर 2017

इस वर्ष विश्व खाद्य दिवस हेतु चुना गया विषय ‘चेंज द फ्यूचर ऑफ माइग्रेशन-इन्वेस्ट इन फूड सिक्योरिटी एंड रूरल डेवलपमेंट’ है। देश की तेजी से बढ़ती जनसंख्या के लिये खाद्यान्न की आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करन नितान्त आवश्यक है। जिससे कोई भी भारतीय भूखे पेट न सो सके। देश में समय-समय पर खाद्य, पोषण और आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये अनेक वैज्ञानिक क्रान्तियों जैसे हरित क्रान्ति, पीली क्रान्ति, नीली क्रान्ति, श्वेत क्रान्ति, ब्राउन क्रान्ति व सिल्वर क्रान्ति की शुरुआत की गई।

बदलते परिवेश का फलोत्पादन पर प्रभाव

Author: 
राम रोशन शर्मा
Source: 
विज्ञान प्रगति, अक्टूबर 2017

फलों की कम उत्पादकता हेतु जलवायु, कार्यिक एवं जैविक कारक उत्तरदायी होते हैं। परन्तु हाल ही के वर्षों में जलवायु सम्बन्धी कारकों ने न केवल विश्व स्तर पर परन्तु हमारे देश में भी फलों की उत्पादन एवं उनकी गुणवत्ता को प्रभावित किया है। इस तेजी से बदलते परिवेश का असर भूमंडलीय तापमान में बढ़ोत्तरी, मौसमी चक्र में बदलाव, कहीं सूखा तो कहीं अधिकाधिक वर्षा, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्री जलस्तर में बढ़ोत्तरी आदि अत्यन्त कठिन परिस्थितियों को जन्म दिया है। निश्चित तौर पर ये सभी स्थितियाँ फलों की उपज एवं गुणवत्ता को प्रभावित करेंगी।

वर्मीकम्पोस्ट - बुन्देलखण्ड की लाल मिट्टियों के लिये एक प्रभावी सुधारक (Vermicompost - An effective reformer for the Red soil of Bundelkhand

Author: 
वी.एन. शारदा
Source: 
भा.कृ.अनु.प. - भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान अनुसन्धान केन्द्र, दतिया (मध्य प्रदेश)

बुन्देलखण्ड क्षेत्र की लाल मिट्टियों में जल धारण क्षमता, गहराई एवं कार्बनिक पदार्थों की उपलब्धता कम होने के कारण वे मृदा कटाव के प्रति अधिक संवेदनशील होती है। भारत के शुष्क खेती वाले क्षेत्रों में अन्य मिट्टियों की तुलना में इन मिट्टियों की उत्पादकता सबसे कम है। जैविक खादों के प्रयोग से खेतों में नमी संरक्षण करके इन मिट्टियों की उत्पादकता एवं फसल सघनता को काफी हद तक बढ़ाया जा सकता है, जिसके लिये क्षेत्र में पशु-धन संख्या प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

केंचुए गोबर को खाद के रूप में परिवर्तित करतेकेंचुए गोबर को खाद के रूप में परिवर्तित करते

प्रस्तावना


बुन्देलखण्ड की लाल मिट्टियाँ मुख्यतः ग्रेनाइट एवं नीस खनिज द्वारा निर्मित हैं। मिट्टी की बलुई संरचना, अल्प जलधारण शक्ति, कम भू-सतह संतृप्ति और ऑर्गेनिक कार्बन की नगण्य उपस्थिति ही इस मिट्टी की कम उत्पादकता का कारण है। भारत में मिट्टियों का उत्पादकता स्तर सबसे कम है।

अनियमित वर्षा और बीच-बीच में आने वाले सूखे के कारण खरीफ ऋतु में भी जल की कमी की समस्या आती रहती है जिस कारण किसानों को अपने खेतों को प्रायः खाली रखना पड़ता है। इन्हीं सब कारणों से इस क्षेत्र की फसल सघनता 100 प्रतिशत से भी कम है।

इटावा जनपद के जल संसाधन की समस्याएँ (Water Resource Problems of Etawah district)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

जल संसाधन की समस्यायें
बाढ़ एवं जल जमाव :
बाढ़ :



‘‘Flood is a discharge which exceeds the natural channel capacity of a river and then spills on to the adjacent flood plain’’

नदियों की बाढ़ एक प्राकृतिक घटना है। बाढ़ से जनपद में चंबल, यमुना, क्वारी, सेंगर, अहनैया, पुरहा आदि नदियों के किनारों की भूमि डूब जाती है। कछारी क्षेत्र की फसलें नष्ट हो जाती हैं एवं यातायात अवरुद्ध हो जाता है। धन-जन की हानि होने से जनपद की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

सामान्यत: लगभग पाँच या दस वर्ष तक के अंतराल से जनपद की नदियों में बाढ़ आने का इतिहास है। सन 1996 की बाढ़ इतनी भयानक थी कि कानपुर से ग्वालियर राष्ट्रीय राजमार्ग बंद करना पड़ा था। चंबल नदी पर बने ‘बरई पुल’ एवं यमुना नदी पर बने इटावा पुल पर यातायात बंद कर दिया गया था। जनपद के लगभग सभी छोटे-छोटे पुल टूट गये थे। छोटे पुलों की निर्माण सामग्री तीव्र बहाव में बह गयी थी। इस वर्ष प्रभावित गाँवों की संख्या 154 थी। बहुत से गाँवों के संपर्क मार्ग जल में डूब जाने के कारण अनेक समस्यायें उत्पन्न हो गयीं। सरकार ने नौका आदि का प्रबंध किया, जो पर्याप्त नहीं था। बाढ़ से घिरे लोगों को 40000 हजार रुपये की खाद्य सामग्री डाली गयी। इस बाढ़ में 8 लोगों की मौत हो गयी। अनेक जानवर पानी के तेज बहाव के साथ बह गये। नदियों की तलहटी में बसे गाँवों के अंदर पानी भर गया जिसमें सैकड़ों घर पानी से डूब गये। कछारों में पानी भर जाने से फसल नष्ट हो गयी। बाद में बाढ़ पीड़ितों को भोजन वस्त्र एवं आवास व्यवस्था हेतु जिलाधीश इटावा द्वारा लगभग 11 लाख रुपये वितरित किये गये, जो पर्याप्त नहीं थे। जिलाधीश कार्यालय इटावा के एक अनुमान के अनुसार लगभग 20 लाख रुपये की खरीफ की फसलें नष्ट हो गयीं। 12 लाख रुपये के मकानों की एवं लगभग 50 हजार रुपये की पशुधन की हानि हुई। लगभग 5 लाख रुपयों के पुलों एवं सड़कों की क्षति हुई।

इटावा जनपद के जल संसाधन का कृष्येत्तर क्षेत्रों में उपयोग (Use of Water Resources in Agricultural Sectors of Etawah District)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

पेयजल के क्षेत्र में :


स्वच्छ एवं पर्याप्त पेयजल की उपलब्धता स्वस्थ मानव और सभ्य समाज की न केवल आधारभूत आवश्यकता है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति का मूलभूत अधिकार भी है। हमारे संविधान में पेयजल की आपूर्ति विषयक प्राविधान सातवीं अनुसूची के भाग-दो में देते हुए इसे राज्य सरकारों के दायित्वों के अंतर्गत राज्य का विषय रखा गया है। प्रत्येक जनपद की सीमा के अंतर्गत सभी शहरी एवं नगरीय बस्तियों में शुद्ध एवं पर्याप्त पेयजल व्यवस्था सुनिश्चित करना संबंधित राज्य सरकारों का दायित्व है तथा केंद्र सरकार राज्य सरकार द्वारा किये गये तत्संबंधी प्रयासों के लिये आर्थिक सहायता प्रदान करती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सामान्यत: शहरी क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु व्यापक प्रयास किये गये, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों की ओर सरकार द्वारा यथोचित ध्यान देना बाद में प्रारंभ किया गया। अत: शहरी क्षेत्रों की तुलना में हमारे ग्रामीण क्षेत्र शुद्ध पेयजल की आपूर्ति में पिछड़े रहे हैं। पिछले दो तीन दशकों में ग्रामीण क्षेत्र में सभी ग्राम वासियों को पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिये विभिन्न पेयजल योजनाओं एवं कार्यक्रमों को प्रभावपूर्ण तरीकों से संचालित किया जा रहा है।

मनुष्य के पीने, खाना बनाने, स्नान करने, बर्तनों की सफाई एवं घर की धुलाई तथा शौच व्यवस्था आदि हेतु जल की आवश्यकता होती है। परिणामत: शुद्ध एवं स्वच्छ जल के स्रोत सदैव से मानव आकर्षण के केंद्र रहे हैं। घरेलू कार्यों में जल के उपयोग की मात्रा यद्यपि तुलनात्मक रूप से कम है, फिर भी जल के इस उपयोग का महत्त्व अत्यधिक है। जनपद के निवासी तम्बू, झोपड़ी, कच्चे पक्के छोटे बड़े मकान बनाकर जलस्रोतों के सहारे ग्राम तथा नगरों में निवास कर रहे हैं। इस क्षेत्र में परिवार के रहन-सहन का स्तर तथा ग्रामीण नगरीय बस्तियों के अनुसार जलापूर्ति प्रतिरूप में प्रर्याप्त भिन्नता मिलती है। जो निम्नांकित वर्णन से स्पष्ट है।

ग्रामीण बस्तियों में जल का उपयोग :

वैज्ञानिकों ने नमी की कमी में उगाई जा सकने वाली किस्मों के लिये मेथी के आनुवंशिक गुणों की खोज की (Fenugreek varieties for low-moisture soils)

Source: 
इंडिया साइंस वायर, 18 अक्टूबर, 2017

. वास्को-द-गामा (गोवा) : स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत गुणकारी मेथी की नई किस्मों को विकसित करने के लिये भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने महत्त्वपूर्ण शोध किए हैं। आईसीएआर-राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केंद्र, तबीजी, अजमेर के वैज्ञानिकों ने पानी की निम्न उपलब्धता वाले स्थानों में भी मेथी की पैदावार बढ़ाने के लिये 13 विविध आनुवंशिक गुणों (जीनोटाइप) वाले मेथी के बीजों के परीक्षण किए। इनमें से चार एएफजी-4, एएफजी-6, हिसार सोनाली और आरएमटी-305 कम पानी में भी अच्छी पैदावार देने वाले साबित हुए हैं।

सामान्य भाषा में जीनोटाइप का मतलब होता है डीएनए में जीनों का एक ऐसा समूह, जो एक विशिष्ट विशेषता के लिये जिम्मेदार होता है। इन जीनोटाइपों की पहचान करके किसी विशेष बीमारी या जलवायुविक परिस्थितियों के प्रति प्रतिरोध वाली विभिन्न उन्नत किस्मों को बनाया जाता है, जिनसे उच्च पोषण मूल्य और अधिक पैदावार वाली फसलें तैयार की जाती हैं।

मेथी रबी की फसल है। इसे मुख्य रूप से राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, पंजाब और उत्तर प्रदेश में अक्टूबर से लेकर नवंबर के मध्य में बोया जाता है। मेथी के सही तरह से अंकुरण के लिये मृदा में पर्याप्त नमी बहुत जरूरी होती है। अतः वैज्ञानिकों ने विशेषरुप से शुष्क भूमि या नमी की कमी वाले क्षेत्रों में आनुवंशिक परिवर्तनशीलता द्वारा ऐसी किस्में तैयार करने का प्रयास किया है, जो कम पानी में भी मेथी की उत्तम गुणवत्ता वाली अधिक उपज दे सकेंगी। इन नमी-सहिष्णु किस्मों से पानी की पर्याप्त मात्रा वाले स्थानों में पानी की बचत के साथ साथ अब मेथी को देश के अन्य शुष्क भागों में भी आसानी से उगाया जा सकता है।

इटावा जनपद का लघु बाँध सिंचाई (Lower dam irrigation of Etawah district)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

प्रकृति ने प्राकृतिक संसाधन के रूप में अनेक निधियाँ प्रदान की हैं। इन प्राकृतिक संसाधनों में जल सबसे बहुमूल्य है। पानी का प्रयोग प्राणीमात्र, मनुष्य, पशु, पक्षी, पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ सभी करते हैं, इसीलिये जल को जीवन का आधार कहा गया है।

इटावा जनपद के अध्ययन क्षेत्र में कूप एवं नलकूप सिंचाई (Well and tubewell irrigation in the study area of Etawah district)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

जल जीवन का आधार है। जल का सर्वाधिक उपभोग कृषि क्षेत्र में होता है। जो उसे कृत्रिम एवं प्राकृतिक साधनों द्वारा प्राप्त होता है। वर्षा के अभाव में कृत्रिम साधनों द्वारा खेतों को जल उपलब्ध कराया जाता रहा है। भाराीय वर्षा पूर्णत: मानसून से प्राप्त होती है, जो अनिश्चित, अनियमित तथा असामयिक होने के साथ-साथ विषम भी है। अत: कृषि के लिये सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। भारत में प्राचीन काल से ही सिंचाई के लिये कृत्रिम साधनों का प्रयोग होता आ रहा है। सिंचाई के लिये जल दो रूपों में प्राप्त होता है। धरातलीय जल तथा भूमिगत जल किंतु वायु की तरह जल यथेष्ठ मात्रा में उपलब्ध नहीं है। विभिन्न उपयोगों के लिये शुद्ध जल की आवश्यकता पड़ती है, जिसका प्रमुख स्रोत भूमिगत जल है। यह जलराशि धरातल के नीचे पाई जाती है। धरातलीय जल प्रवेश्य चट्टानों में निरंतर नीचे की ओर रिसता रहता है। वर्षा काल में जब धरातल पर जल की मात्रा बढ़ जाती है, जल का रिसाव भी बढ़ जाता है। इसके कारण बड़ी मात्रा में जल नीचे चला जाता है। फलत: भूमि के नीचे जल का स्तर ऊँचा हो जाता है। कूपों और नलकूपों के माध्यम से इस जल का उपयोग कर लेते हैं।

कूप एवं नलकूप ऐसे कृत्रिम साधन हैं, जिससे भूमिगत जल को बाहर निकाला जाता है। इस जल का उपयोग विभिन्न कार्यों में किया जाता है, जिनमें सिंचाई भी एक है। भारत में कूप एवं नलकूप सिंचाई के महत्त्वपूर्ण साधन हैं। वर्तमान समय में इन दोनों साधनों के सम्मिलित योगदान से 55.90 प्रतिशत भू-भाग सींचा जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश में कूप एवं नलकूप 70.47 प्रतिशत क्षेत्र को सिंचन क्षमता उपलब्ध कराते हैं। कूप एवं नलकूप सिंचाई साधनों की अपनी अलग-अलग विशेषतायें हैं।

कूप


कूप भूमिगत जल निकालने का एक परंपरागत साधन है। इसका उपयोग प्राचीन काल से चला आ रहा है। भारत में कूपों की सहायता से कुल सिंचित भूमि के लगभग 22.47 प्रतिशत भाग में सिंचाई की जाती है। कुओं द्वारा वहीं सिंचाई की जाती है, जहाँ इनके निर्माण के लिये निम्न भौगोलिक दशाएँ अनुकूल हों।