Latest

जल संसाधन उपयोग

Author: 
कुबेर सिंह गुरुपंच
Source: 
पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (मध्य प्रदेश) 492010, शोध-प्रबंध 1999

सिंचाई :


पौधों के विकास के लिये कृत्रिम रूप से जल देना सिंचाई कहलाता है। वर्षा की अनिश्चितता एवं अनियमितता के कारण सिंचाई की आवश्यकता होती है। ऊपरी महानदी बेसिन में जल उपयोग की दृष्टि से सिंचाई का स्थान महत्त्वपूर्ण है। यहाँ 12,38,084 हेक्टेयर भूमि विभिन्न साधनों से सिंचित है। यह सम्पूर्ण फसली क्षेत्र का 28.99 प्रतिशत है, जबकि मध्यप्रदेश का औसत 23.8 प्रतिशत है। अव्यवस्थित, असमान एवं अपर्याप्त वर्षा के प्रभाव को सिंचाई के साधनों द्वारा कम किया जा सकता है।

ऊपरी महानदी बेसिन के बहुत बड़े भाग में कृषि के लिये सबसे बड़े बाधक तत्व आर्द्रता की कमी है। सिंचाई का महत्त्व न केवल फसलों को बचाने के लिये अपितु अधिक उत्पादन एवं गहन कृषि के लिये हमेशा रहा है। सिंचाई के द्वारा फसल प्रतिरूप में विभिन्नता एवं परिवर्तन देखने को मिलता है इसके अतिरिक्त सिंचाई परिवर्तित प्रविधि रासायनिक खाद तथा आधुनिक यंत्रों के उपयोग के संदर्भ में अधिक महत्त्वपूर्ण है।

सिंचाई के साधन :


ऊपरी महानदी बेसिन में धरातलीय एवं भूमिगत जलस्रोतों से सिंचाई होती है। धरातल का जल नदियों और तालाबों से तथा भूमिगत जल कुओं और जलकूपों द्वारा उपलब्ध होता है। बेसिन में सिंचाई के मुख्य तीन साधन हैं - 1. नहर, 2. तालाब एवं 3. कुआँ तथा नलकूप।

बेसिन के सिंचाई साधनों विकास की प्रगति में विभन्नता है क्योंकि ज्यादातर सिंचाई कुओं एवं नहरों के द्वारा होती है। इसके साथ ही नलकूप एवं तालाबों द्वारा सिंचाई में प्रगति हुई है।

सिंचाई का वितरण :

मोती की खेती से चमकेगी किस्मत (Pearl farming brings fortune)


पानी से भोजन लेने की प्रक्रिया में एक सीप 96 लीटर पानी को जीवाणु-वीषाणु मुक्त करने की क्षमता रखता है। सीप पानी की गन्दगी को दूर करके पानी में नाइट्रोजन की मात्रा कम कर देता है और ऑक्सीजन की मात्रा आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ा देता है। यही नहीं सीप जल को प्रदूषण मुक्त करके प्रदूषण पैदा करने वाले अवयवों को हमेशा के लिये खत्म कर देता है। इसलिये सीप की खेती पर्यावरण के अनुकूल खेती के रूप में विकसित हो रही है। समुद्री जीवों में सीप अकेला ऐसा जीव है, जो पानी को साफ रखता है। स्वाति नक्षत्र में ओस की बूँद सीप पर पड़े, तो मोती बन जाता है। इस कहावत से आशय यही है कि पूरी योजना और युक्ति के साथ कार्य किया जाये तो किस्मत चमक जाती है। उत्तर प्रदेश के चन्दौली जिले में मोती का सफल प्रयोग कर एक नवयुवक ने नई उम्मीदें जगाई है। पारम्परिक कृषि के समानान्तर यह नया प्रयोग इस पूरे क्षेत्र में विकास के नए आयाम गढ़ सकता है। शुरुआत बनारस मण्डल के चन्दौली जिले के महुरा प्रकाशपुर गाँव से हुई है। जहाँ शिवम यादव ने मोती उत्पादन शुरू किया है।

पूरे विंध्यक्षेत्र में मोती उत्पादन का यह पहला कारोबारी प्रयास है। शिवम की सफलता को देख अब इलाके के कई लोग उनसे प्रशिक्षण लेने आ रहे हैं। कम्प्यूटर एप्लीकेशन में स्नातक के बाद शिवम ने नौकरी या पारम्परिक कृषि की बजाय नया करने की ठानी। उन्हें पता चला कि भुवनेश्वर की संस्था ‘सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेश वाटर एक्वाकल्चर’ मोती उत्पादन का प्रशिक्षण देती है। शिवम ने 2014 में प्रशिक्षण लेकर गाँव में मोती उत्पादन शुरू किया। वैसे अंडमान-निकोबार द्वीप में भी समुद्र में मोती का कारोबार शुरू हुआ है।

बाबूलाल दाहिया ने किया किसान-अवार्ड लेने से इंकार


"मध्यप्रदेश में खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है। इसकी वजह से यहाँ के किसानों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। बीते दिनों मंदसौर में किसानों के प्रदर्शन में हुए गोलीकांड के दौरान प्रदेश की सरकार तथा किसानों के बीच दूरी यकायक खासी बढ़ गई है। किसानों के हक़ में फैसले लेने में प्रदेश सरकार नाकाम रही है। प्रदेश की सरकार से किसी भी तरह का सम्मान लेना किसानों के हित में आन्दोलन कर रहे किसानों तथा गोलीकांड में शहीद हुए किसानों के साथ एक प्रकार से धोखा होगा।"

किसान बाबूलाल दाहिया यह कहना है सतना जिले में पिथोराबाद गाँव के एक किसान बाबूलाल दाहिया का। उन्हें 10 सितंबर 2017 को चित्रकूट में आयोजित प्रदेश किसान कार्यसमिति के समापन पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाथों कृषि अवार्ड लेने के लिये सतना जिले के कृषि विभाग ने चयनित किया था। लेकिन उन्होंने यह कहकर सबको चौंका दिया कि किसानों के हितों की अनदेखी करने वाली सरकार से मिलने वाले सम्मान को वे ग्रहण नहीं करेंगे। उन्होंने पुरस्कार ठुकरा दिया है।

चंदौली का लाल मोती की खेती से चमका रहा किस्मत

Author: 
जितेंद्र उपाध्याय
Source: 
दैनिक जागरण, 12 सितम्बर, 2017

. नई पहल - उत्तर प्रदेश के महुरा प्रकाशपुर गाँव में युवक ने मोती की खेती का सफल प्रयोग कर दिखाई नई राह

स्वाति नक्षत्र में ओस की बूँद सीप पर पड़े, तो मोती बन जाती है। इस कहावत से आशय यही है कि पूरी योजना और युक्ति के साथ कार्य किया जाए तो किस्मत चमक जाती है। उत्तर प्रदेश के चंदौली में मोती की खेती का सफल प्रयोग कर एक नवयुवक ने नई उम्मीदें जगा दी हैं। पारम्परिक कृषि के समानान्तर यह नया प्रयोग इस पूरे क्षेत्र में विकास के नए आयाम गढ़ सकता है।

शुरुआत : बनारस मंडल के चंदोली जिले में महुरा प्रकाशपुर गाँव है। जहाँ शिवम यादव ने मोती उत्पादन शुरू किया है। पूरे विंध्यक्षेत्र में मोती उत्पादन का यह पहला कारोबारी प्रयास है। शिवम की सफलता को देख अब इलाके के कई लोग उनसे प्रशिक्षण लेने आ रहे हैं।

कहाँ से सीखा हुनर : कम्प्यूटर एप्लीकेशन में स्नातक के बाद शिवम ने नौकरी या पारम्परिक कृषि के बजाय नया करने की ठानी। उन्हें पता चला कि भुवनेश्वर की संस्था ‘सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेश वाटर एक्वाकल्चर’ मोती उत्पादन का प्रशिक्षण देती है। शिवम ने 2014 में प्रशिक्षण लेकर गाँव में मोती उत्पादन शुरू किया।

कैसे बनाते हैं मोती : शिवम ने 40 गुणे 35 मीटर का तालाब बनाया है। इसमें वे एक बार में दस हजार सीप डालते हैं। इनमें 18 माह बाद सुन्दर मोती बनकर तैयार हो जाते हैं। सीप को तालाब में डालना तो आसान है, लेकिन इससे पहले की प्रक्रिया थोड़ी कठिन है। यह एक तरह की शल्यक्रिया होती है। एक-एक सीप के खोल में बहुत सावधानी पूर्वक चार से छह मिलीमीटर तक का सुराख किया जाता है। इस सुराख के माध्यम से सीप के अन्दर नाभिकनुमा धातु कण (मैटल टिश्यु) स्थापित किया जाता है। इसे इयोसिन नामक रसायन डालकर सीप के बीचों-बीच चिपका दिया जाता है।

फंगल इन्फेक्शन से लड़ने के लिये मिला नया हथियार (New weapon found to fight fungal infections)

Author: 
उमाशंकर मिश्र
Source: 
इंडिया साइंस वायर, नई दिल्ली, 8 सितंबर 2017

भारतीय शोधकर्ताओं ने धान के पौधे से एक बैक्टीरिया खोजा है, जो रोगजनक फंगस (फफूंद) को खाता है, साथ ही शोधकर्ताओं ने उस बैक्टीरिया में एक फंगल-रोधी प्रोटीन की भी पहचान की है, जो कई तरह के फंगल इन्फेक्शन से लड़ने में मददगार हो सकता है।

डॉ गोपालजी झा (अगली पंक्ति में दाएं से तीसरे स्थान पर) शोधकर्ताओं की टीम के साथ वैज्ञानिकों के अनुसार बीजी-9562 नामक यह नया प्रोटीन पौधों के साथ-साथ मनुष्य और अन्य जीव-जंतुओं में होने वाले फंगल इन्फेक्शन को रोकने में कारगर साबित हो सकता है। यह शोध नई दिल्ली स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट जीनोम रिसर्च (एनआईपीजीआर) के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है।

अध्ययनकर्ताओं की टीम में शामिल प्रमुख शोधकर्ता डॉ. गोपालजी झा ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “बीजी-9562 एक फंगल-रोधी प्रोटीन है, जो फंगल-भोजी बैक्टीरिया बर्खोल्डेरिआ ग्लैडिओली के एक रूप एनजीजे1 में पाया जाता है। एनजीजे1 फंगस पर आश्रित रहता है और उसकी कोशिकाओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है।”

भौतिक तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

Author: 
कुबेर सिंह गुरुपंच
Source: 
पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (मध्य प्रदेश) 492010, शोध-प्रबंध 1999

भौतिक पृष्ठभूमि


स्थिति एवं विस्तार :
ऊपरी महानदी बेसिन मध्य प्रदेश राज्य के पूर्वी भाग में स्थित है। इसका अंक्षाशीय विस्तार 19047’ उत्तरी अक्षांश से 23007’ उत्तरी अक्षांश और देशांतरीय विस्तार 80017’ पूर्वी देशांतर से 83052’ पूर्वी देशांतर तक 73,951 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है। प्रशासनिक दृष्टि से इसके अंतर्गत बिलासपुर संभाग के बिलासपुर एवं रायगढ़ जिले (जशपुर तहसील को छोड़कर), रायपुर संभाग के रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव एवं बस्तर जिले के कांकेर तहसील का क्षेत्र आता है। इसकी जनसंख्या 1,33,26,396 (1991) व्यक्ति हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि :
ऐतिहासिक काल में ऊपरी महानदी बेसिन दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। रायगढ़ जिले के सिंघनपुर की गुफाओं तथा काबरा पहाड़ी में 50 हजार वर्ष तक के पुराने शिलाचित्र हुये हैं, (गुप्त 1973, 78) जिससे पता चलता है कि यह बेसिन 50 हजार वर्ष पूर्व से ही आबाद था। सन 1741 में इस बेसिन पर भोसला मराठों का अधिकार हुआ, परंतु अव्यवस्था के कारण यहाँ 1818 में अंग्रेजों का आधिपत्य हो गया। सन 1830 में मराठों ने इस क्षेत्र पर पुन: अधिकार कर लिया। सन 1947 में इस क्षेत्र का विलय स्वतंत्र भारत में हो गया और यह मध्य प्रांत एवं बरार राज्य का हिस्सा बना। अंतत: सन 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के फलस्वरूप मध्यप्रदेश राज्य का हिस्सा बन गया।

भू-वैज्ञानिक संरचना :


भू-वैज्ञानिक संरचना, जल संसाधन विशेषताएँ एवं भू-गर्भजल के विकास में महत्त्वपूर्ण कारक है। ऊपरी महानदी बेसिन का मध्यवर्ती भाग कुडप्पा शैल समूह द्वारा निर्मित है, और सीमांत पठारी भाग में मुख्यतया धारवाड़ तथा गोंडवाना शैल समूह पाये जाते हैं। बेसिन के शैल समूह निम्नलिखित हैं -

सूखे में भी उपयोगी है बारहनाजा


. हाल ही में उत्तराखण्ड के बीज बचाओ आंदोलन के विजय जड़धारी जी ने बताया कि सूखे की स्थिति में भी वहाँ झंगोरा और मड़िया की फसल अच्छी है। यही खास महत्त्व की बात है बारहनाजा जैसी मिश्रित फसलों की। जहाँ एक ओर सूखे से हमारे मध्यप्रदेश के किसान परेशान हैं, उनकी चिंता बढ़ रही है, वहीं उत्तराखण्ड में बारहनाजा की कुछ फसलें किसानों को संबल दे रही हैं।

विजय जड़धारी जी खुद किसान हैं और वे अपने खेत में बारहनाजा पद्धति से फसलें उगाते हैं। बारहनाजा का शाब्दिक अर्थ बारह अनाज है, पर इसके अंतर्गत बारह अनाज ही नहीं बल्कि दलहन, तिलहन, शाक-भाजी, मसाले व रेशा शामिल हैं। इसमें 20-22 प्रकार के अनाज होते हैं।

एक जमाने में चिपको आंदोलन से जुड़े रहे जड़धारी जी बरसों से देशी बीज बचाने की मुहिम में जुटे रहते हैं। वे न केवल सिर्फ बीज बचा रहे हैं, उनसे जुड़ी खान-पान की संस्कृति व ग्रामीण संस्कृति को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिये गाँव-गाँव यात्रा निकाली जाती हैं। बैठकें की जाती हैं। महिलाओं को जोड़ा जाता है।

पिछले साल सितंबर में हम मुनिगुड़ा ( ओडिशा) में कल्पवृक्ष और स्थानीय संस्थाओं के आयोजन में मिले थे तब वे पूरी अनाज की प्रदर्शनी लेकर आए थे। उनकी प्रदर्शनी में कोदा ( मंडुवा), मारसा ( रामदाना), जोन्याला (ज्वार), मक्का, राजमा, जख्या, गहथ (कुलथ), भट्ट ( पारंपरिक सोयाबीन), रैंयास( नौरंगी), उड़द, तिल, जख्या, काखड़ी (जीरा), कौणी, मीठा करेला, चीणा इत्यादि अनाज व सब्जियाँ लेकर आए थे। यह सभी देखने में रंग-बिरंगे, चमकदार व सुंदर थे ही, साथ ही स्वादिष्ट में भी बेजोड़ हैं।

प्रस्तावना : ऊपरी महानदी बेसिन में जल संसाधन मूल्यांकन एवं विकास (Introduction : Water Resource Appraisal and Development in the Upper Mahanadi Basin)

Author: 
कुबेर सिंह गुरुपंच
Source: 
पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (मध्य प्रदेश) 492010, शोध-प्रबंध 1999

पृथ्वी पर मानव के उपयोग के लिये अत्यंत सीमित मात्रा में जल उपलब्ध है। यह एक जलीय चक्र के माध्यम से गतीय स्वरूप से वाष्पीय एवं अंतत: वर्षा के रूप में धरातल पर प्राप्त होता है जो वाष्पोत्सर्जन जलावाह आदि के माध्यम से पुन: चक्रीय स्थिति के प्रथम स्तर पर पहुँच जाता है। बेसिन में जल संसाधन की प्राप्ति का एकमात्र स्रोत वर्षा ही है। शोध प्रबंध के द्वितीय भाग के प्रथम उपभाग में वर्षा तथा जलाधिशेष, द्वितीय उपभाग में धरातलीय जल एवं तृतीय उपभाग में भौम जल का वर्णन किया गया है।

जंगल, पहाड़ और पानी


. इस साल फिर सूखे के आसार हैं। फसलें सूख रही हैं। रोग लग रहे हैं। किसानों के माथे पर चिंता के बादल घिर रहे हैं। उनकी उम्मीदों पर पानी फिर रहा है। पिछले कुछ सालों में लगातार सूखा, अनियमित वर्षा और कभी कम वर्षा की स्थिति बनी हुई है। इस लेख में हम पानी और जंगल के रिश्ते को समझने की कोशिश करेंगे, जिससे यह समझने में मदद मिले कि आखिर बारिश क्यों नहीं हो रही है।

हाल के बरसों में यह देखा जा रहा है कि गाँवों के अधिकांश कुआँ, बावड़ियाँ और तालाब सूख रहे हैं। सदानीरा नदियाँ मर रही हैं। नदियों के किनारे के आस-पास की छोटी-छोटी झाड़ियाँ, पेड़ और घास-फूस अब नहीं हैं। ये सब मिलकर न केवल नदियों को सदानीरा बनाते थे बल्कि भू-पृष्ठ के पानी को सोखकर नीचे तक पहुँचाकर भूजल में वृद्धि करते थे।

सतना जिले के किसान और देशी बीजों के जानकार बाबूलाल दाहिया कहते हैं “ ये जंगल ही उपजाऊ मिट्टी भी बनाते हैं। वे कहते हैं कि पहाड़ के पत्थरों के संधि स्थलों में पेड़ों की पत्तियाँ झड़-झड़कर जमा होती हैं और सड़-गल कर इन्हीं पत्थरों के क्षरण के साथ उपजाऊ मिट्टी बनाती हैं।”

आज जब नदियाँ सूख रही हैं, रह-रह कर अपने बचपन की याद आती है, जब दुधी नदी में पूरे साल भर पानी रहता था। यह नदी मध्यप्रदेश के पूर्वी छोर पर होशंगाबाद जिला और नरसिंहपुर को विभक्त करती है। इसी नदी के किनारे के गाँव में मेरा बचपन बीता है।

हम देखा करते थे इस नदी के किनारे कोहा (अर्जुन), गूलर, लडेन, झाऊं, गोंदरा, जामुन, बहेड़ा, महुआ, करंज इत्यादि कई प्रकार के वृक्ष और छोटी- मोटी झाड़ियाँ होती थीं। ये सभी वृक्ष पानीदार हैं, यानी इनमें पानी की मात्रा ज्यादा होती है। यानी पेड़ भी एक तरह से पानी ही है।