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लोगों को मिलेगा मंडुवे (कोदो) के आटे की बर्फी का स्वाद (sweets of finger millet flour)


मंडुआ (कोदो)मंडुआ (कोदो)उतराखण्ड के मंडुवे की माँग सात समंदर पार तक है। बशर्ते इस ओर हम लोग ध्यान देंगे तो आने वाले समय में मंडुआ लोगों की आजीविका का साधन बन जाएगा। पहले पहल लोग मंडुआ को कइयों स्तर पर उपयोग में लाते थे। मंडुवे की रोटी तो आम बात थी, चूँकि यदि किसी दूधमुहे बच्चे को जुकाम, खाँसी इत्यादि की समस्या होती थी तो लोग एक बाउल में पानी उबालकर उसमें मंडुवे का आटा डालकर उसकी भाप सुँघाना ही ऐसी बीमारी का यह तरीका रामबाण इलाज था।

मंडुवे के आटे से स्थानीय स्तर पर कई प्रकार की डीस भी तैयार होती थी जो ना तो तैलीय होती थी और ना ही स्पाइसी बजाय लोग इसे अतिपौष्टिक कहते थे। जैसे सीड़े, डिंडके जिन्हें सिर्फ-व-सिर्फ हल्की आँच के सहारे दो बर्तनों में रखकर पानी के भाप से पकाया जाता है। इसमें चीनी गुड़ और मंडुवे के आटे के अलावा और कुछ प्रयोग नहीं होता था। मगर बाजार ने इस मंडुवे को गेहूँ के सामने एक बारगी पछाड़ दिया परन्तु अब धीरे-धीरे मंडुवे की पौष्टिकता का पता चलने लग गया और मंडुवे का बाजार ऊपर होने लग गया है।

इटावा जनपद के अध्ययन क्षेत्र में नहर सिंचाई (Canal irrigation in the study area of Etawah district)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में सिंचाई की अत्याधिक आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि यहाँ मौसमी वर्षा होने के कारण वर्ष भर मिट्टी में नमी संचित नहीं रह पाती है। यहाँ वर्षा की अनिश्चितता पाई जाती है, तथा वर्षा का वितरण भी सर्वत्र एक समान नहीं होता है। उष्ण उपोष्ण कटिबंध में स्थित होने के कारण जल का वाष्पीकरण अधिक होता है। इन परिस्थितियों में बिना सिंचाई किये फसलों का अच्छा उत्पादन करना संभव नहीं हो पाता है। यहाँ पर्याप्त मात्रा में जल बहुत थोड़े भाग को मिलता है, जबकि बहुत बड़ा क्षेत्र कम वर्षा से प्रभावित है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में बिना सिंचाई किये अच्छा उत्पादन प्राप्त नहीं किया जा सकता। वर्तमान समय में तेज गति से बढ़ती जनसंख्या के भरण-पोषण के लिये गहन कृषि की अत्यधिक आवश्यकता है। अत: गहन कृषि एवं जनपद के समुचित विकास के लिये सिंचाई सुविधाओं में वृद्धि आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य हो गयी है। सिंचाई स्रोतों में नहर सिंचाई सबसे सुलभ एवं सस्ता साधन है। अध्ययन क्षेत्र में सबसे अधिक क्षेत्र पर नहरों द्वारा सिंचाई की जाती है।

नहरों का वितरण एवं उनमें जल की उपलब्धता :

इटावा जनपद के अध्ययन क्षेत्र में कृषि आयाम (Agricultural dimensions in the study area of Etawah district)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

भूमि उपयोग एवं जल संसाधन एक दूसरे के पूरक हैं, अत: जल संसाधन की उपलब्धता के अध्ययन के संबंध में भूमि उपयोग का अध्ययन बहुत महत्त्वपूर्ण है। भूमि उपयोग के प्रतिरूप का प्रभाव धरातलीय जल के पुनर्भरण पर पड़ता है। वन, झाड़ियों, उद्यानों, फसलों एवं घास के मैदानों द्वारा भूमि आच्छादित रहती है। भूमिगत जल के रिसाव को प्रभावित करने में वाष्पन एवं वाष्पोत्सर्जन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। भूमि उपयोग का अध्ययन हम निम्न बिंदुओं में करते हैं।

भूमि उपयोग प्रतिरूप :


भूमि उपयोग भौगोलिक अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। वास्तविक रूप में भूमि उपयोग शब्द स्वत: वर्णात्मक है। परंतु प्रयोग पारस्परिक शब्द उपयोग तथा भूमि संसाधन उपयोग के अर्थ की व्याख्या में अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। फॉक्स के अनुसार - भूमि उपयोग, के अंतर्गत भू-भाग प्राकृत प्रदत्त विशेषताओं के अनुरूप रहता है। इस प्रकार यदि कोई भू-भाग प्राकृत मानवीय प्रभाव से वंचित है अथवा उसका उपयोग प्राकृतिक रूप से हो रहा है, तो उस भाग के लिये ‘‘भूमि प्रयोग’’ शब्द का प्रयोग उचित होगा। यदि किसी भू-भाग पर मानवीय छाप अंकित है या मानव अपनी आवश्यकता के अनुरूप उपयोग कर रहा है तो उस भू-भाग के लिये भूमि उपयोग शब्द का योग अधिक उचित होगा। इस प्रकार मानव के उपयोग के साथ भूमि संसाधन इकाई बन जाती है। जब भू-भाग का प्राकृतिक रूप लुप्त हो जाता हैं तथा मानवीय क्रियाओं का योगदान महत्त्वपूर्ण हो जाता है, तो उसे भूमि उपयोग कहते हैं। किसी स्थान की भूमि जल संसाधन उपयोग को अनेक प्रकार से प्रभावित करती है, क्योंकि जिन स्थानों की भूमि समतल होती हैं, पेड़-पौधे अधिक होते हैं, जल का अधिक पुनर्भरण होता है। जबकि इसके विपरीत क्षेत्र जहाँ पर वर्षा के बाद पानी बहकर नदियों में चला जाता है, और जल स्तर काफी नीचे चला जाता है। अत: जल संसाधन की उपलब्धता के अध्ययन में भूमि उपयोग प्रारूप का अध्ययन आवश्यक हो जाता है।

गेहूँ का आधार एवं प्रमाणित बीजोत्पादन

Author: 
डॉ. रवि कुमार एवं डॉ. ऋषिपाल सिंह
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

गेहूँ की खेतीगेहूँ की खेतीआधार बीज तैयार करने के लिये प्रजनक बीज किसी प्रमाणीकरण संस्था के मान्य स्रोत से प्राप्त किया जा सकता है। बोने से पहले थैलों पर लगे लेबल से बीज के किस्म की शुद्धता की जाँच कर लेनी चाहिए और लेबल को सम्भालकर रखना चाहिए।

निबन्धन


जिस खेत में बीजोत्पादन करना हो उसका निबन्धन राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा करवाना चाहिए। गेहूँ स्वंय- परागित फसल है, अतः प्रमाणित बीज उत्पादन के लिये प्रमाणीकरण शुल्क मात्र 175 रुपया प्रति हेक्टेयर एवं निबन्धन शुल्क 25 रुपया प्रति हेक्टेयर है।

खेत का चयन


गेहूँ के बीज उत्पादन के लिये ऐसे खेत का चुनाव करना चाहिए, जिसमें पिछले मौसम में गेहूँ न बोया गया हो। अगर विवशतावश वही खेत चुनाव करना पड़े तो उसी प्रभेद को उस खेत में लगाना चाहिए जो कि पिछले मौसम में बोया गया था और बीज की आनुवंशिक शुद्धता प्रमाणीकरण मानकों के अनुरूप थी। खेत की मृदा उर्वक, दोमट हो एवं जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए।

उन्नत प्रभेद


उत्पादन तकनीकी का सबसे अहम पहलू उपयुक्त किस्म का चुनाव होता है। झारखण्ड राज्य के लिये अनुशंसित किस्में सिंचित समय पर बुआई के लिये एच.यू.डब्ल्यू. 468, के 9107 एवं बिरसा गेहूँ 3 हैं। इन किस्मों की उपज क्षमता 40-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। सिंचित विलम्ब से बुआई के लिये एच.यू.डब्ल्यू. 234, एच.डी. 2643 (गंगा) एवं बिरसा गेहूँ 3 है। इनकी उपज क्षमता 35-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

पृथक्करण

इटावा जनपद का जल संसाधन की उपलब्धता का आकलन एवं वितरण (Assessment and Distribution of Water Resources of Etawah district)

Author: 
दुर्गेश सिंह
Source: 
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी से भूगोल विषय में पी.एच.डी. की उपाधि हेतु प्रस्तुत शोध प्रबंध - 2008-09

जल संसाधन की उपलब्धता का आकलन एवं वितरण


जल मानव जीवन की अत्यंत महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है, प्राणों की रक्षा के लिये वायु के बाद द्वितीय स्थान जल का है। जल मुख्यत: दो रूपों में प्राप्त होता है- 1. सतही जल 2. भूमिगत जल। सतही जल एवं भूगर्भिक जल एक ही जल पद्धति के भाग हैं, जो एक दूसरे से अंत: संबंधित हैं तथा एक दूसरे को प्रभावित भी करते हैं। भारत में संपूर्ण वैश्विक जनसंख्या का लगभग 16 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, परंतु भारतीय उपमहाद्वीप की नदियों में औसत मासिक जल प्रवाह का मात्र 4 प्रतिशत जल प्राप्त होता है। यह भारत में जल की आवश्यकता से कम उपलब्धता का द्योतक है। चीन की नदियों में यही औसत जल प्रवाह 8 प्रतिशत है, जिसे भारत से 25 प्रतिशत अधिक जनसंख्या का भरण-पोषण करना पड़ता है।

आदिवासियों की खाद्य सुरक्षा पर संकट (Tribal crisis on food security)

Source: 
विश्व खाद्य दिवस, 16 अक्टूबर 2017 पर विशेष

आदिवासियों को अपने संचित ज्ञान से यह मालूम था कि किस मौसम और समय में उन्हें क्या खाना चाहिए। वे अकाल और बाढ़ के वक्त भी अपने और अपने परिवार को सुरक्षित रख लिया करते थे। मोटे अनाजों, जंगल के फल-फूल और पत्तियों तथा जंगली जानवरों के शिकार से उन्हें किस तरह पोषण मिल सकता है, इसकी भी जानकारी थी। इनसे उनके शरीर को यथोचित पोषक तत्व मिल जाया करते थे। ऐसे खाद्य पदार्थ उनके घरों में लम्बे समय तक वे संग्रहित कर लेते थे, जबकि आज के अनाज जल्दी ही खराब होने लगते हैं। जंगलों में रहने वाला हमारा आदिवासी समाज परम्परागत तरीके से अपनी खाद्य सुरक्षा सदियों से करता रहा है, लेकिन इन दिनों आदिवासी इलाकों में खाद्य सुरक्षा की स्थिति ठीक नहीं है। परम्परागत तौर-तरीकों और मोटे अनाज का रकबा तेजी से घटने के कारण आदिवासी बच्चे कुपोषण तथा गम्भीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। एक तरफ जहाँ सरकार ने पूरे देश में खाद्य सुरक्षा कानून लागू किया है, वहीं दूसरी तरफ आदिवासी समाज में खानपान को लेकर कई विसंगतियाँ हैं।

कभी आदिवासी समाज जंगलों में रहकर वहाँ के पेड़-पौधों और यहाँ होने वाले मोटे अनाज की फसलों पर निर्भर हुआ करता था। लेकिन आज न तो जंगलों पर इनकी निर्भरता बची है और न ही मोटा अनाज इनके हाथ में रहा। आज ये सरकारी योजना में मिलने वाले 'सरकारी गेहूँ' की कृपा पर आश्रित होते जा रहे हैं। यहाँ बाँटे जाने वाले इस गेहूँ की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। जन संगठनों के मुताबिक कई जगह सड़ा हुआ गेहूँ बाँटा जा रहा है।

अर्द्ध शुष्क क्षेत्र की लाल मिट्टियों में वर्षाजल संग्रहण एवं उपयोग तकनीक

Author: 
प्रशांत कुमार मिश्रा
Source: 
भा.कृ.अनु.प. - भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान अनुसन्धान केन्द्र, दतिया (मध्य प्रदेश)

मध्य भारत में, बुन्देलखण्ड क्षेत्र की जलवायु उष्ण अर्द्धशुष्क है तथा यहाँ पर मुख्यतया लाल व काली मिट्टियाँ पाई जाती हैं। इस क्षेत्र का धरातल ऊँचा-नीचा, कम वर्षा एवं उसका वितरण असामान्य, सिंचाई की कम सुविधायें तथा पेड़-पौधों की वृद्धि के लिये अनुपयुक्त मृदायें हैं। इस क्षेत्र में लगभग 70 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि पर वर्षा आधारित खेती होती है तथा फसल उत्पादकता बहुत कम है। वर्षा के मौसम में भी इस क्षेत्र में सूखे की स्थितियाँ उत्पन्न होना सामान्य बात है तथा लाल मिट्टियों में फसलों को सूखे का जल्दी-जल्दी सामना करना पड़ता है। ऐसी दशा में लम्बी अवधि की खरीफ की फसल या कम जल आवश्यकता वाली कम अवधि की रबी की फसल बिना पूरक सिंचाई के लेना असम्भव है। इस क्षेत्र में सिंचाई के लिये भूमिगत जल की उपलब्धता बहुत कम है। परन्तु बहुसंख्यक पहाड़ियों तथा ऊँचे-नीचे धरातल के कारण वर्षाजल संग्रहण एवं उसके पुनः उपयोग की अपार सम्भावनायें हैं। तीव्र वर्षा के कारण काफी मात्रा में अपवाह होता है जिसे एक तालाब में भण्डारण के पश्चात उसके पुनः उपयोग द्वारा फसल की क्रान्तिक अवस्थाओं पर सिंचाई के लिये प्रयोग किया जा सकता है।

प्रस्तावना


बुन्देलखण्ड क्षेत्र मध्य भारत में स्थित है। इसका भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 70.4 लाख हेक्टेयर है तथा यहाँ का धरातल ऊँचा-नीचा है। इस क्षेत्र में उत्तर प्रदेश के सात जिले तथा मध्य प्रदेश के छः जिले आते हैं। इस क्षेत्र में औसत वार्षिक वर्षा 750 से 1200 मिमी के बीच होती है।

इस क्षेत्र में लाल मिट्टियाँ 50 प्रतिशत से अधिक भू-भाग में पायी जाती हैं। खरीफ ऋतु में 70 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र बिना फसलों की बुवाई के खाली रहता है। लाल मिट्टियाँ ऊँचाई पर पायी जाती हैं तथा इनकी जलधारण क्षमता कम होती है, जिसके फलस्वरूप वर्षा ऋतु में भी अल्प वर्षा या कुछ समय तक वर्षा न होने की स्थिति में फसलें जल की कमी से प्रभावित होती हैं।

कृषि उत्पादकता, पोषण स्तर एवं कुपोषण जनित बीमारियाँ : निष्कर्ष एवं सुझाव

Author: 
करूणेश प्रताप सिंह
Source: 
डॉ. राजबहादुर सिंह भदौरिया रीडर, अर्थशास्त्र विभाग जनता महाविद्यालय अजीतमल जिला-औरैया (उ.प्र.), सत्र - 2000

विकास और उससे उत्पन्न समस्याओं का आश्य यह नहीं है कि धरा का कोष रिक्त हो गया है और भी भारत में अप्रयुक्त और अल्प प्रयुक्त संसाधनों का विपुल भंडार विद्यमान है आवश्यकता है विवेकपूर्ण विदोहन की, उर्वरक शक्ति का उपयोग करने के साथ-साथ लौटाने की विकास की प्रत्येक संकल्पना और परिकल्पना को पर्यावरण की कसौटी पर अहर्य सिद्ध होने पर ही विकास के लिये व्यवहार में लाना होगा।

अपशिष्ट बचाएगा किसानों की सूखती फसलें

Author: 
भगवती तेली
Source: 
राजस्थान पत्रिका, 09 अगस्त, 2017

नारायण ने बताया कि इसे बड़े स्तर पर बाजार में उतारने व स्टार्टअप के लिये सरकार की ओर से ढाई लाख रुपए दिए जाएँगे। यह आइडिया दो बार राष्ट्रीय विज्ञान मेला, पिच टू विन में चयनित हो चुका है। इसके अलावा यंग इनोवेशन अवार्ड, एजुकेशन फेस्टिवल में मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, मुख्यमंत्री व उच्च शिक्षामंत्री से भी सम्मानित हो चुके हैं। साथ ही हाल ही में देश के टॉप 25 इनोवेटर्स में भी चयनित हुए हैं।