सेब छोड़ अनार और सब्जियाँ उगा रहे हैं जलवायु परिवर्तन से त्रस्त किसान (Himachal farmers start growing pomegranate and cabbage, as apple lines recede due to climate change)

Author: 
दिनेश सी. शर्मा
Source: 
इंडिया साइंस वायर, 30 नवंबर, 2017

हिमाचल प्रदेश में मानसून सीजन की अवधि तो बढ़ रही है, पर समग्र रूप से बरसात कम हो रही है। हिमाचल और जम्मू कश्मीर में स्थित मौसम विभाग के ज्यादातर स्टेशन पिछले करीब तीन दशक से तापमान में बढ़ोत्तरी की प्रवृत्ति के बारे में बता रहे हैं।

कम नहीं हैं जलवायु परिवर्तन के खतरे


हम अभी भी भारी मात्रा में पानी सोखने वाली गन्ना और धान की फसलों का उत्पादन कर रहे हैं, वह भी ऐसे इलाकों में जहाँ पानी की भारी कमी है। जबकि पानी की कमी वाले क्षेत्रों में वहाँ की जलवायु के हिसाब से फसलों की खेती की जाने की बेहद जरूरत है। यह समय की मांग है।

केंचुआ खाद-टिकाऊ खेती एवं आमदनी का अच्छा स्रोत

Author: 
धर्मा उराँव, विनोद कुमार पाण्डेय, रंजय कुमार सिंह, शिवेन्द्र कुमार दुबे, डाॅ. बी.पी. राय, उपेन्द्र कुमार
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

. बढ़ती हुई जनसंख्या एवं अधिक उत्पादन के लिये सीमित भूमि पर अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी की उर्वरा शक्ति को ह्रास कर रही है एवं मिट्टी, जल तथा वायु तीनों को प्रदूषित कर रहा है। रासायनिक उर्वरकों का अधिक मूल्य भी किसानों की आर्थिक स्थिति को कमजोर करते जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में यदि किसान जैविक उर्वरक एवं रासायनिक उर्वरक के बीच सन्तुलन स्थापित कर अपने फसलों में प्रयोग करें तो कम लागत में अच्छा उत्पादन प्राप्त करते हुए टिकाऊ खेती की परिकल्पना कर सकते हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र, चतरा ने किसानों के घर में उपलब्ध कम्पोस्ट एवं अन्य घरेलु अवशेष के माध्यम से वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन का कार्यक्रम बनाया। इसके लिये सर्वप्रथम हंटरगंज प्रखण्ड के खुटी केवाल ग्राम के किसानों के साथ बैठक कर वैसे 25 किसानों को चयनित किया गया जिसके पास कम से कम 2 मवेशी उपलब्ध हों और उन्हें दो दिन का प्रशिक्षण कृषि विज्ञान केन्द्र में दिया गया।

घृतकुमारी की लाभदायक खेती

Author: 
जय कुमार
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

घृतकुमारी का उपयोग औषधीय योगों एवं प्रसाधन सामग्रियों के निर्माण में किया जाता है। औषधीय दृष्टि से यह शीतल, तिक्त, मधुर, रसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, रसायन, बलकारक, प्लीहा-यकृत वृद्धि कारक, रक्त विकार, चर्मरोग का नाश एवं मल का भेदन करने वाली होती हैं। घृतकुमारी का सार पाचक, उदरशूल एवं मंदाग्नि अर्श आदि रोगों में विशेष उपयोगी हैं। वर्तमान समय में अधिकांशतः त्वचा पर लगाये जाने वाली क्रीम, शैम्पू एवं विभिन्न हर्बल- उत्पादों में घृतकुमारी के जेल का प्रयोग बहुतायत से हो रहा है।

घृतकुमारी लिलियेसी परिवार का एक प्रमुख आौषधीय पौधा है, जिसका वैज्ञानिक नाम एलो बार्बाडेंसिस ( एलोवेरा) है। घृतकुमारी को घीकुवार, ग्वारपाठा एवं एलुआ नामों सेे भी जाना जाता है विश्व में इसकी 200 से अधिक जातियाँ पाई जाती हैं। घृतकुमारी का मूल निवास उत्तर-पूर्वी अफ्रीका एवं स्पेन हैं तथा भारतवर्ष में यह हिमालय से कन्याकुमारी तक सर्वत्र पाया जाता है। भारतीय चिकित्सा पद्धतियों जैसे आयुर्वेद एवं यूनानी में इस पौधे का विशिष्ट महत्त्व है एवं इसका उपयोग विभिन्न औषधीय योगों एवं प्रसादन सामग्री के रूप में किया जाता है। वर्तमान समय में इसकी अत्यधिक माँग के कारण वृहत स्तर पर इसकी खेती आवश्यक हो गई है, जिससे देश की आन्तरिक माँग पूर्ति के साथ-साथ इससे निर्मित उत्पादों का निर्यात भी किया जा सके।

दुधारू पशुओं की प्रमुख नस्लें एवं दूध व्यवसाय हेतु उनका चयन

Author: 
डाॅ. राजीव रजंन. एवं डाॅ. हेमन्त कुमार
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

यदि पशु की वंशावली उपलब्ध हो तो उनके बारे में सभी बातों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। लेकिन हमारे यहाँ वंशावली रिकॉर्ड रखने का प्रचलन नहीं है, जिसके कारण अनेक लक्षणों के आधार पर ही पशु का चुनाव करना पड़ता है। अच्छे डेरी फार्म से पशु खरीदने में यह सुविधा प्राप्त हो सकती है।

कृषि में महिलाओं की भूमिका, समस्या एवं निदान

Author: 
डाॅ.सीमा डे, डाॅ. नीलिमा श्रीवास्तव एवं डाॅ. बी. के. झा
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

कृषि मंत्रालय के स्तर से भी निरंतर इस बात के प्रयास किये जा रहे हैं कि कृषि कार्यों में लगी ग्रामीण महिलाओं की स्थिति में तेजी से सुधार हो। हमारे देश में कृषि विज्ञान केन्द्रों के द्वारा विकास हेतु कृषि कार्यों में लगी महिलाओं के लिये विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाये जाते हैं।

किसानों की सेवा में किसान कॉल केन्द्र

Author: 
डॉ. सत्यप्रिय, डॉ. सुशील झा ‘सुमन’ एवं डॉ. बी. के. झा
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

किसान कॉल केन्द्रों को सुचारु रूप से चलानें, विभिन्न क्रिया-कलापों का समय-समय पर नोडल संस्था द्वारा निरीक्षण एवं समीक्षा किया जाता है। विभिन्न स्तर पर क्रियाकलापों किसान प्रश्नोत्तर, विषय विशेषज्ञों की उपलब्धता जो कॉल स्तरIII के पास दिया गया हो, इनकी प्रतिक्रिया 72 घंटों के अन्दर उपलब्ध कराना इत्यादि के लिये नोडल संस्था उत्तरदायी होत हैं।

सूचना क्रांति का एक सशक्त माध्यम-सामुदायिक रेडियो स्टेशन

Author: 
डॉ. सत्यप्रिय एवं श्रीमती शशि सिंह
Source: 
प्रसार शिक्षा निदेशालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, राँची, जनवरी-दिसम्बर 2009

सूचना देश का विकास कर सकती है तथा देश की संस्कृति को दूसरे देशों तक पहुँचा भी सकती है। बड़े स्तर पर यह कार्य आकाशवाणी के माध्यम से तो हो रहा है, पर जब हम बहुत सारे लोगों की बात कहते हैं तो कई चीजें छूट जाती है और कई लोग छूट जाते हैं। ऐसे में किसी समुदाय को लेकर चला जाय तो सहभागिता आसान हो जाती है। सामुदायिक रेडियो की स्थापना में लागत भी कम आती है और इसका संचालन भी सहज है।

कमाई का अच्छा जरिया बन सकते हैं औषधीय पौधे

Author: 
कमाल अहमद रूमी
Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 26 नवम्बर, 2017

औषधीय पौधे यानी मेडिसिनल प्लांट कमाई का अच्छा जरिया बन सकते हैं। इसके लिये बस आपको छोटी सी रकम निवेश करनी पड़ेगी और तीन महीने में आपकी रकम तो वापस मिल ही जाएगी साथ ही इससे आपको अच्छा मुनाफा भी होगा।