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बैगुल जलाशय में मात्स्यिकी विकास हेतु संस्तुतियाँ (Recommendations for fisheries development in Bagul reservoir)

Author: 
पूनम त्रिपाठी, सर्वेश कुमार एवं ए.पी. शर्मा
Source: 
राष्ट्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान केंद्र, (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद), भीमताल- 263136, जिला- नैनीताल (उत्तराखंड)

उत्तराखंड भारत का 27वां तथा नवनिर्मित राज्यों में सबसे छोटा राज्य है जो हिमालय में स्थित है। प्रदेश में विभिन्न प्रकार के जलस्रोत जैसे-झील, जलाशय, नदियाँ और झरने बहुतायत में हैं। उत्तराखंड में कुमाऊँ के तराई क्षेत्र में शारदा सागर, नानक सागर, बैगुल, तुमड़िया, बौर, धौरा, हरिपुरा आदि जलाशय स्थित हैं। शारदा सागर तथा नानक सागर क्रमश: 7303 एवं 4662 हे. जल क्षेत्र के साथ वृहद जलाशय हैं अन्य जलाशय मध्यम आकार के हैं जिनका जल क्षेत्र 1200 से 2220 हे. तक है। बैगुल जलाशय भी एक मध्यम आकार का जलाशय है जो उत्तराखंड राज्य के ऊधम सिंह नगर जिले में उत्तर पूर्व भाग में स्थित है, उसका उत्तरी भाग 28063’ देशान्तर तथा पूर्वी भाग 79084’ अक्षांश में स्थित है। बैगुल लम्बाई 15.30 किमी, अधिकतम ऊँचाई 13.7 मी., ऊपरी स्तर 212.14 मी., स्पिलवे क्षमता 566.00 क्यूसेक, जलग्रह क्षेत्रफल 302.00 वर्ग किमी., पूर्ण जलाशय का स्प्रेड एरिया 2693.93 हे., अपर बैगुल फीडर की क्षमता 17.00 क्यूसके तथा बरा कैनाल की क्षमता 7.0 क्यूसेक है। इस जलाशय के पानी को सिंचाई, विधुत उत्पादन, जल पेय पूर्ति, आदि के लिये किया जाता है।

इस जलाशय का लगभग दो तिहाई भाग पानी की सतह पर दलीय खरपतवार से भरा है। यहाँ पादप प्लवक की बहुत सी प्रजातियाँ पायी जाती हैं जिनमें बेसिलेरियोफाइसी, क्लोरोफाइसी, सायेनोफाइसी तथा यूग्लिनोफाइसी वर्ग प्रमुख हैं जन्तु प्लवक की भी बहुत सी प्रजातियाँ पायी जाती हैं। जिनमें रोटीफेरा, क्लेडोसेरा तथा कोपीपोडा शामिल हैं। यहाँ की मछलियों को चार भागों में क्रमश: मेजर कार्प, माइनर कार्प, कैट फिश तथा वीड फिश में विभाजित किया गया है यह जलाशय लगभग 400 से अधिक मछुआरों के जीवन-यापन का स्रोत है। बैगुल जलाशय में मछलियों की 13 फैमलीज की 37 प्रजातियाँ उपलब्ध हैं, जिनमें लेबियो गोनियस (कुर्सा), सिरहाईनस मृगला (नैन) तथा गडूसिया छपरा (सुहिया) प्रमुख हैं। इन मछलियों को पकड़ने के लिये मछुआरे कास्ट नेट, गिल नैट, डीप नैट, महाजाल तथा ड्रैग नैट आदि का उपयोग करते हैं।

 

पर्वतांचल एवं मात्स्यिकी (Mountains and Fisheries)

Author: 
राजेश एवं योगेश कुमार चौहान
Source: 
राष्ट्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान केंद्र, (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद), भीमताल- 263136, जिला- नैनीताल (उत्तराखंड)

भारतवर्ष एक कृषि प्रधान देश जहाँ पर नित छ: ऋतुओं की छटा प्रदर्शित होती रहती है। यहाँ की कण-कण में समाहित है कृषकों के पसीने की बूँदे जो आभास कराती है यहाँ के जनमानस की श्रद्धा व भावना। विश्व की अन्नय प्रसिद्ध क्रांतियों में भारत का एक अभूतपूर्व योगदान रहा है। फिर चाहे वे श्वेत क्रांति हो या हरित क्रांति इसी क्रांति की श्रृंखला में अग्रसर है नीली क्रांति। नीली क्रांति के पथ पर अग्रसरित भारतवर्ष मत्स्य उत्पादन की श्रेणी में अपना शीर्ष स्थान बनाये हुए हैं। फिर यहाँ समुद्री मात्स्यिकी हो अथवा अन्तरस्थलीय जल संपदा का प्रबंध।

मैदानी भू-भाग के विभिन्न क्षेत्रों के साथ भारत का पर्वतीय क्षेत्र भी कदम से कदम मिलाते हुए अग्रसरित है किन्तु अभी भी आवश्यकता है कुछ महत्त्वपूर्ण नीति निर्धारणों की जो समयानुकूल अति आवश्यक होती जा रही है। पर्वतीय क्षेत्रों को प्रमुख रूप से मत्स्य पालन के आधार पर तीन क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है।

1. ऊपरी क्षेत्र या उच्च हिमालयी श्रेणी
2. मध्य क्षेत्र या मध्यम हिमालयी श्रेणी
3. निचला क्षेत्र या शिवालिक अथवा निम्न हिमालयी श्रेणी

उच्च हिमालयी श्रेणी - इन क्षेत्रों का तापमान 100C से कम होता है एवं शीत ऋतु में यहाँ जल की ऊपरी सतह जम जाती है, उदाहरणार्थ - लद्दाख (जम्मू-कश्मीर), केदारनाथ, बद्रीनाथ, (उत्तराखंड) तथा कुछ हिमाचल प्रदेशीय क्षेत्र।

यहाँ पर पाई जाने वाली मत्स्य प्रजाति निम्नवत हैं :

सालमॉन - सालमो क्लार्की (कटथ्रोट ट्राउट)
सालमो सलार (अटलान्टिक सालमॉन)
ऑन्कोरिन्कस श्वेश्चा (चिनहुक सालमॉन)
ऑन्कोरिन्कस नर्का (शॉकआई सालमॉन)
ऑन्कोरिन्कस केटा (चम सालमॉन)

ट्राउट - रेनबो ट्राउट - आन्कोरिन्कस माइकिस
ब्रुक ट्राउट - साल्वेलिनस फॉन्टिनेलिस
ब्राउन ट्राउट - सॉलमो ट्रूटा फेरिओ

भीमताल झील में महासीर मत्स्य प्रजातियों की पिछले दशक में जनसंख्या एवं प्रजनन का व्यवहारिक अध्ययन (Practical studies of population and fertility in the last decade of Mahasir Fishery species in Bhimtal Lake)

Author: 
देवेन्द्र सिंह मलिक
Source: 
राष्ट्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान केंद्र, (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद), भीमताल- 263136, जिला- नैनीताल (उत्तराखंड)

हिमालय के कुमाऊँ क्षेत्र को छकाता अथवा पश्चिम-मूर क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इस क्षेत्र में विभिन्न आकार की सुन्दर शीतजलीय झीलें विद्यमान हैं। जैसे कि नैनीताल, भीमताल, सातताल, नौकुचियाताल, पन्नाताल (गरुड़ताल) एवं खुरपाताल में वर्षभर जल उपलब्ध रहता है जबकि सरियाताल, मलवाताल, सुखाताल, एवं खोरियाताल, केवल वर्षाऋतु के बाद ही झील का रूप ले लेती हैं एवं ग्रीष्मकाल में सूख जाती हैं। नलदमयन्ती झील जो कि प्राकृतिक रूप से ग्राम्य समाज द्वारा निर्मित है। महासीर प्रजाति की मत्स्य सम्पदा को समीप से अवलोकन करने के लिये एक उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में विद्यमान हैं।

वर्तमान में भीमताल झील की जलीय पारिस्थितिकी का विभिन्न तरह के प्रदूषण से निरंतर ह्रास हो रहा है। जिसके कारण इस प्रमुख झील की मत्स्य जैव विविधता के ऊपर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है। सन 1989-1993 तक के अध्ययन के शोध निष्कर्ष के आधार पर भीमताल झील में बीस मत्स्य प्रजातियों की उपलब्धता सुनिश्चित की गई जिसके अंतर्गत महासीर साधारण कार्प एवं वृहद कार्प मत्स्य की जनसंख्या 76.2 प्रतिशत, 23.3 प्रतिशत एवं 0.54 प्रतिशत क्रमश: पायी गयी।

महासीर में टोर पुटिटोरा का साइज (300-670 मिमी. लम्बाई एवं वजन 250-3000 ग्राम) के साथ-साथ लगभग 37.1 प्रतिशत टोर पुटिटोरा की उपलब्धता केवल 300-350 मिमी. के लम्बाई आकार में प्राप्त हुई। केवल मात्र कुछ पुटिटोरा जिनकी लम्बाई, आकार 920-1210 मिमी. एवं वजन 8.0-16.5 किग्रा. तक भी रिकार्ड किया गया। इस महासीर जनसंख्या के आंकड़े के आधार पर केवल 26.8 प्रतिशत मादा महासीर से ही अण्डे प्रजनन के लिये प्राप्त हो सके एवं प्रजननकाल के भी वर्ष में मुख्यत: दो बार (अप्रैल-मई) एवं (अगस्त-सितम्बर) निर्धारित किया गया। उपरोक्त प्रजनन काल में अण्डों के आकार भी विभिन्न आकार में एवं अण्डों की संख्या दर भी विभिन्न संख्या में उपलब्ध हो सकी।

तो आकाश बन गये फ़सलों के डॉक्टर

Author: 
चैतन्य सोनी
Source: 
दैनिक जागरण, सागर, नई दुनिया, 1 सितम्बर 2017

ऑर्गेनिक फार्मूले से विकसित की तीन एकड़ में फाइव लेयर फार्मिंग तकनीक और कमाते हैं एक एकड़ में 3-4 लाख।

आकाश चौरसिया (किसान गुरू)आकाश चौरसिया (किसान गुरू)पीएमटी में एमबीबीएस की बजाय बीडीएस मिलने के बाद मेडिकल क्षेत्र में जाने का विचार छोड़ सागर के आकाश चौरसिया फ़सलों के डॉक्टर बन गये। उन्होंने अपने तीन एकड़ के खेत को आदर्श फार्म हाउस में तब्दील कर दिया । गर्मी के सीजन में एक साथ पाँच फसलें लेकर परंपरागत किसानों के लिये नजीर पेश की है। फ़ाइव लेयर फाॅर्मिंग के साथ जैविक खेती, गाय के गोबर से केंचुआ खाद, गोमूत्र से दवाएँ व कीटनाशक तैयार किया है। कई राज्य सरकारें और संस्थाएँ इस तकनीक के प्रचार-प्रसार के लिये इन्हें आमंत्रित कर चुकी हैं। अब तक सात राष्ट्रीय पुरस्कार पा चुके हैं।

बदल गया विचार


सागर के तिली वार्ड निवासी आकाश चौरसिया का 2010 पीएमटी में सिलेक्शन हुआ। पसंदीदा एमबीबीएस की जगह बीडीएस मिलने पर मेडिकल प्रोफेशन में जाने का विचार छोड़ खेती की तरफ मुड़ गये। उन्होंने परंपरागत खेती को जैविक खेती में तब्दील कर, मल्टीलेयर फाॅर्मिंग, इंट्राक्राॅप फसलें उगाना शुरू कर दिया। साल भर में एक एकड़ से करीब 3 से 4 लाख रूपये तक मुनाफा उठा रहे हैं।

गोमूत्र, गोबर और केंचुआ खाद

नैनीताल झील के पारिस्थितिकीय संतुलन में जलीय पौधों की भूमिका (Role of aquatic plants in the ecological balance of Nainital lake)

Author: 
देवेन्द्र सिंह मलिक, रश्मि यादव एवं पवन कुमार भारती
Source: 
राष्ट्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान केंद्र, (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद), भीमताल- 263136, जिला- नैनीताल (उत्तराखंड)

उत्तराखंड राज्य 9 नवम्बर, 2000 को भारतीय गणतन्त्र का 27वां राज्य बना जिसका नाम उत्तरांचल रखा गया था। मध्य हिमालय में 28047’ से 31020’ उत्तर एवं 77035’ से 80055’ पूर्व देशान्तर तक फैला तथा 198 से 7,116 मी. समुद्रतलीय ऊँचाई वाला यह राज्य 53,483 वर्ग कि.मी. के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। 01 जनवरी, 2007 को इसका नाम उत्तराखंड हो गया, जिसके दो प्रमुख भाग हैं- गढ़वाल व कुमाऊँ।

नैनीताल जिला भी कुमाऊँ का ही एक भाग है जहाँ पर कई ताजे शीत जल की बड़ी छोटी झीलें हैं। भौगोलिक दृष्टि से नैनीताल जिला 29023’09’ उत्तर एवं 79027’35’’ पूर्व तक समुद्र तल से 1937 मी. की अत्यधिक ऊँचाई पर स्थित है। 48 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली तथा तीन तरफ पर्वतों से घिरी नैनीताल झील की अधिक से अधिक लम्बाई 1.4 किमी. और चौड़ाई 0.45 किमी. है जबकि गहराई 16.5 मी. से 27.3 मी. तक है। यहाँ की औसत वर्षा लगभग 2030 मिली. है। गत दो वर्षों में 2004-2006 में नैनीताल झील के जल व तलछट में भारी धातुओं का परीक्षण किया गया। झील से जल व तलछट के नमूने प्रत्येक मौसम गर्मी, वर्षा एवं शरद ऋतु में झील के सतही (उथले) व तली के पानी (छिछले) से विभिन्न 8 स्थानों से लिये गए। जल व तलछट के भौतिक, रसायनिक कारकों व भारी धातुओं के विश्लेषण हेतु मल्लीताल, तल्लीताल व मध्यम क्षेत्र से नमूनों को एकत्र किया गया।

पर्वतीय क्षेत्र की प्रमुख मत्स्य जैव विविधता एवं अभ्यागत मत्स्य प्रजातियों का समावेश

Author: 
ए. के. सिंह
Source: 
राष्ट्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान केंद्र, (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद), भीमताल- 263136, जिला- नैनीताल (उत्तराखंड)

मत्स्य विविधता एवं उनका संरक्षण आज केवल वातावरण एवं परिवेश के दृष्टिकोण से आवश्यक है अपितु खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो के डाटाबेस के अनुसार लगभग 708 मछलियाँ मीठे जल की हैं जिसमें लगभग 3.32 प्रतिशत मछलियाँ शीतजल की हैं। पर्वतीय प्रदेश में आज बहुत सी अभ्यागत मछलियाँ प्रवेश कर गयी हैं जिनका मत्स्य पालन में अच्छा घुसपैठ है। विदेशी ट्राउट मछलियाँ सर्वप्रथम अंग्रेजी शासन काल में वर्ष 1906 में क्रीडा मात्स्यिकी के उद्देश्य से लाई गयी थी जिन्हें कश्मीर में सफलतापूर्वक पाला गया था। तत्पश्चात हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल एवं उत्तर-पूर्वी राज्यों के पहाड़ी स्थानों पर भी उन्हें पाला जा रहा है। इसी तरह चाइनीज मूल की कार्प मछलियों का भी पालन पोषण इन क्षेत्रों में किया जा रहा है।

हाल में ही अफ्रीकी मूल की मछली जिसे सामान्यत: भारत में थाई मांगुर के नाम से जाना जाता है पड़ोसी देशों से चोरी छिपे मैदानी क्षेत्रों में लाया गया था। अब इसे पर्वतीय क्षेत्रों के निचले भागों में भी पाल जा रहा है। आज पर्वतीय स्थान के मत्स्य संपदा के वर्तमान स्थिति की जानकारी जनमानस तक पहुँचाने की आवश्यकता है ताकि उनके संरक्षण हेतु स्थानीय लोगों का सहयोग प्राप्त हो सके। टिकाऊ संवर्धन एवं मत्स्य पालन की वृद्धि के लिये व्यवहारिक तकनीकी ज्ञान को मत्स्य पालकों तक पहुँचाने की भी आवश्यकता है। स्थानीय मत्स्य प्रजातियों के साथ-साथ अभ्यागत अथवा प्रत्यारोपित मत्स्य प्रजातियों का मत्स्य पालन में समावेश कर मत्स्य उत्पादन करने के लिये भी नये प्रयास प्रचलित हो रहे हैं। इस प्रकार नई प्रजातियों (अभ्यागत या प्रत्यारोपित) के समावेश के संभावित खतरों से भी स्थानीय लोगों को अवगत कराने की आवश्यकता है। पर्वतीय क्षेत्रों में चूँकि स्थानीय प्रजातियों की बढ़वार मैदानी मत्स्य प्रजातियों की तुलना में प्राय: कम प्रतीत होती है अत: अभ्यागत मछलियों का समावेश साधारणत: आकर्षक देखा जा रहा है।

महासीर मछलियों के आनुवंशिक चरित्र निर्धारण एवं संरक्षण में विविध राइबोसोमल जीन अनुक्रमों का उपयोग

Author: 
रविन्द्र कुमार, एन.एस. नागपुरे, बासदेव कुशवाहा, पूनम जयंत सिंह, एस.के. श्रीवास्तव एवं वजीर एस. लाकडा
Source: 
राष्ट्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान केंद्र, (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद), भीमताल- 263136, जिला- नैनीताल (उत्तराखंड)

सुनहरी महशीरसुनहरी महशीर भारत में महासीर की तकरीबन सात प्रजातियाँ पायी जाती हैं जो देश के अलग-अलग हिस्सों में उपलब्ध हैं। इन सभी प्रजातियों को वैज्ञानिकों ने उनके शारीरिक बनावट एवं संरचना के आधार पर वर्गीकृत किया है। किन्तु निरंतर पर्यावरणीय परिवर्तनों के वजह से इनके शारीरिक बनावट एवं संरचना में कुछ बदलाव आया है जिसके कारण ठीक प्रकार से इनकी पहचान एवं उसके फलस्वरूप पारिस्थितिकी सन्तुलन हेतु इनका संरक्षण करना कठिन होता जा रहा है।

आनुवंशिक स्तर पर महासीर की प्रजातियों को पहचानने के लिये गुणसूत्रों के आकार एवं सूत्र का प्रयोग किया जाता है। किन्तु सभी प्रजातियों में गुणसूत्रों की संख्या (2N) 100 पायी जाती हैं। अन्य कोशिका आनुवंशिक चिन्हकों में Ag-NOR और CMA3 चिन्हक प्रयोग किए जाते रहे हैं। लेकिन इन चिन्हकों की अपनी मर्यादाएं हैं। इसके फलस्वरूप अभी भी कई प्रजातियों के आनुवंशिक चरित्र निर्धारण में अनिश्चितता बरकरार है।

आजकल जैव-विज्ञानियों ने राइबोसोमल जीन अनुक्रमों में पायी जाने वाली भिन्नता का उपयोग आनुवंशिक चरित्र निर्धारण हेतु किया जा रहा है। राइबोसोमल जीन से 18S, 5.8S, 28S, आई.टी.एस. एवं ई.टी.एस. अनुक्रम ट्रान्सक्राइब्ड होते हैं तथा एन.टी.एस. अनुक्रम ट्रान्सक्राइब्ड नहीं होते हैं। इन अनुक्रमों में प्रजाति एवं जीव विशेष भिन्नता पायी जाती है जिनका इस्तेमाल मत्स्य की कई प्रजातियों/स्टॉक को पहचानने में किया गया है। इसी प्रकार राइबोसोमल जीन अनुक्रमों का उपयोग महासीर प्रजातियों के आनुवंशिक चरित्र-चित्रण में उपयोग किया जा सकता है।

पारिस्थितिकीय जोखिम के मूल्यांकन हेतु आनुवंशिक विषाक्तता जैव-चिन्हकों की उपयोगिता (The usefulness of genetic toxicity bio-markers to evaluate ecological exposure)

Author: 
एन.एस. नागपुरे, रविन्द्र कुमार, पूनम जयन्त सिंह, बासदेव कुशवाहा, एस.के. श्रीवास्तव एवं वजीर एस. लाकडा
Source: 
राष्ट्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान केंद्र, (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद), भीमताल- 263136, जिला- नैनीताल (उत्तराखंड)

मानव जाति के पिछले कुछ दशकों में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है एवं प्रतिदिन हजारों की तादाद में नये रासायनिक उत्पाद अस्तित्व में आ रहे हैं, जिनका उपयोग कृषि, उद्योग, चिकित्सा, खाद्य, सौन्दर्य सामग्री इत्यादि में किया जा रहा है। कारखानों से निकले संश्लेषित रसायन जिनमें भारी धातु तत्व, कीटनाशक इत्यादि हमारे प्राकृतिक जल संसाधनों को प्रदूषित कर रहा है। इनमें से कुछ घातक रसायन मछलियों के डी.एन.ए. के सुरक्षा प्रणाली को भेद कर इसकी मूल संरचना एवं कार्य में परिवर्तन करने की क्षमता रखता है। इन कारकों को आनुवंशिक विष कहा जाता है। ये विषैले तत्व डी.एन.ए. का उत्परिवर्तन, गुणसूत्रों का खण्डन, अंतर्स्राव में परिवर्तन, प्रतिरक्षित प्रणाली इत्यादि को कुप्रभावित कर सकते हैं जिससे ट्यूमर, कैंसर, प्रजनन क्षमता व वृद्धि में कमी पायी जाती है।

इन कारणों से मछलियों की कई प्रजातियाँ प्रभावित हो गई हैं। आनुवंशिक विषाक्तता का अध्ययन के लिये माइक्रोनयूक्लियस टेस्ट, गुणसूत्र विकृति टेस्ट, सिस्टर क्रोमैटिड विनिमय एवं कोमेट एसे का इस्तेमाल किया जा सकता है। इनमें कोमेट एसे अपनी विश्वसनीयता एवं संवेदनशीलता की वजह से ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है। कई जलीय जन्तु जैव-प्रबोधन अध्ययन के लिये कोमेट असे एवं माइक्रोन्यूक्लियस टेस्ट काफी लाभप्रद पाया गया है। हाल ही में संस्थान के शोधार्थियों ने गोमती नदी की मछलियों में आनुवंशिक विषाक्तता का अध्ययन करने के लिये उपरोक्त दोनों विधियों का उपयोग किया है और प्रदूषित जल में रहने वाली मछलियों के डी.एन.ए. में ज्यादा नुकसान पाया गया है।

भौगोलिक सूचना तंत्र (GIS) और मात्स्यिकी (Geographic Information Systems (GIS) and Fisheries)

Author: 
प्रेम कुमार एवं अशोक कुमार नायक
Source: 
राष्ट्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान केंद्र, (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद), भीमताल- 263136, जिला- नैनीताल (उत्तराखंड)

जलकृषि तटीय क्षेत्रों में एक महत्त्वपूर्ण व्यवसाय माना जाता है जिससे लाखों को रोजगार एवं देश को करोड़ों की देशी मुद्रा मिलती है। जलकृषि उद्योग में मुनाफे से प्रभावित होकर जहाँ जगह मिली वहीं तालाबों का निर्माण करना शुरू कर दिया जिससे तटीय वातावरण में महत्त्वपूर्ण पेड़ 'मैंग्रोव' तथा अन्य प्राकृतिक संपदा का ह्रास हो गया।