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खेत का पानी खेत में तो घर का कचरा बगीचे में क्यों नहीं

Author: 
डॉ. किशोर पंवार
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, 17 नवम्बर 2017

सुरसा की तरह विकराल होती शहरी कचरे की समस्या का कोई हल ढूँढने की आवश्यकता है। इस मानव जनित उपभोक्तावादी संकट से पार पाने के लिये नागरिकों को समन्वित प्रयास करने होंगे। कई छोटे-छोटे उपाय अपनाने होंगे। इनमें कचरे के सेग्रीगेशन से लेकर अपने घरों में कम्पोस्ट खाद बनाने के तरीके अपनाने होंगे। खेत का पानी खेत की तर्ज पर घरों का कचरा बगीचे में रखने की पैरवी करता प्रस्तुत आलेख।

खुशी की बात यह है कि म्यूनिसिपल वेस्ट का लगभग 50-60 प्रतिशत हिस्सा जैव अपघटनशील है। यानि इसका कम्पोस्ट बनाया जा सकता है। कचरा संग्रहण के विकेन्द्रीकरण की दिशा में इन्दौर नगर पालिका निगम ने एक और बड़ा और सराहनीय कदम उठाया है। इसने अपने आधिपत्य के लगभग 500 से अधिक बगीचों में दो-दो कम्पोस्ट पिट बना दिये हैं। यानि अब इन बगीचों के कचरे को लैंडफिल स्थल तक परिवहन नहीं करना पड़ेगा।

समुद्री जीव-जन्तुओं के लिये भीषण खतरा है प्लास्टिक कचरा


प्लास्टिक कचरे की समस्या से आज समूचा विश्व जूझ रहा है। इससे मानव ही नहीं बल्कि समूचा जीव-जन्तु एवं पक्षी जगत प्रभावित है। यदि इस पर शीघ्र अंकुश नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में स्थिति और विकराल हो जायेगी और तब उसका मुकाबला कर पाना टेड़ी खीर होगा। कहने का तात्पर्य यह कि उस समय स्थिति की भयावहता का इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय प्राणी जगत यानी जीव-जन्तुओं एवं पक्षियों का अस्तित्व ही समाप्ति के निकट होगा। देखा जाये तो आज प्लास्टिक कचरा पर्यावरण और जीव-जगत के लिये गम्भीर खतरा बन चुका है। वैज्ञानिकों के शोध-अध्ययन इसके प्रमाण हैं।

एक अध्ययन में कहा गया है कि बढ़ते प्लास्टिक कचरे के कारण धरती की सांस फूलने लगी है। सबसे बड़ी चौंकाने वाली और खतरनाक बात यह है कि यह समुद्री नमक में भी जहर घोल रहा है। इससे मनुष्य के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव अवश्यंभावी है। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। कारण यह है कि प्लास्टिक एक बार समुद्र में पहुँच जाने के बाद विषाक्त पदार्थों और प्रदूषकों के लिये चुम्बक बन जाते हैं। अमेरिका के लोग हर साल प्लास्टिक के 660 से अधिक कण निगल रहे हैं। अध्ययनों ने इसे प्रमाणित भी कर दिया है। यही नहीं असलियत तो यह है कि धरती पर घास-फूस पर अपना जीवन निर्वाह करने वाले जीव-जन्तु भी प्लास्टिक से अपनी जान गँवा ही रहे हैं, समुद्री जीव-जन्तु, मछलियाँ और पक्षी भी इससे अपनी जान गँवाने को विवश हैं।

आस्था के केन्द्र पर पर्यावरण की सुध


हमारे ज्यादातर प्राचीन तीर्थ पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं। धार्मिक आस्था का सम्मान हर हाल में होना चाहिए, किंतु इन स्थलों पर पर्यावरण की जो महिमा है, उसका भी ख्याल रखने की जरूरत है ? आस्था और पर्यावरण के तालमेल से ही इन स्थलों की आध्यात्मिकता बनी हुई है। इन स्थलों पर अंधाधुंध निर्माण और लोगों की बढ़ती संख्या इनका आध्यात्मिक अनुभव को तो ठेस लगा ही रहे हैं, भगदड़ से अनायास उपजने वाली त्रासदियों का सबब भी बन रहे हैं। केदारनाथ त्रासदी इसी बेतरतीब निर्माण और तीर्थयात्रियों की बड़ी संख्या का परिणाम थी। इसलिए एनजीटी ने वैष्णो देवी मंदिर पर श्रद्धालुओं की संख्या तय करके उचित पहल की है।

स्वच्छता और गाँधीजी

Author: 
सुदर्शन आयंगार
Source: 
कुरुक्षेत्र, अक्टूबर 2017

महात्मा गाँधी स्वच्छता और साफ-सफाई के मुद्दे पर अपना ध्यान केन्द्रित करने वाले पहले प्रमुख नेता थे। वह अपने जीवन के आखिरी दिनों तक लोगों का ध्यान इस समस्या की ओर लगातार खींचते रहे। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि उन्होंने इस समस्या पर काम किया तथा शौचालयों के निर्माण और मैले की वैज्ञानिक ढंग से सफाई के लिये अनेक प्रयोग किए। उन्होंने बेहद खतरनाक ढंग से मैला साफ करने वाले सफाईकर्मियों के उद्धार के लिये भी काम किया।

नरसिंहपुर कैसे हुआ खुले में शौच की आदत से मुक्त

Source: 
कुरुक्षेत्र, अक्टूबर 2017

जिला-स्तर पर संसाधन टीम बनाई गई जिसमें सम्बन्धित विभागों के अधिकारियों और जाने-माने लोगों को शामिल करके समयबद्ध कार्यक्रम बनाया गया। ऐसा लक्ष्य तय किया गया कि आम लोगों को अभियान में इस तरह से शामिल किया जाए जिससे वे साफ-सुथरा माहौल बनाने में गौरव महसूस करें। इसकी शुरुआत घरों के सर्वेक्षण से हुई जिसमें यह पता लगा गया कि जिले के सभी घरों में शौचालय की सुविधा की स्थिति क्या है। इससे यह पता लगाने में मदद मिली कि कितना कार्य किया जाना बाकी है और मानव संसाधनों, सामान तथा धन के लिहाज से कितने संसाधनों की आवश्यकता होगी।

स्वच्छ विद्यालय पुरस्कार में पिछड़ गया उत्तराखण्ड


स्वच्छ विद्यालय पुरस्कार पोर्टल पर यदि अमुक विद्यालय का शिक्षक स्कूल की स्वच्छता की जानकारी अपलोड करेगा तो उन्हें लगातार स्कूल में रहना होगा, बच्चों के साथ नियमित स्कूल परिसर की स्वच्छता बनाए रखने के लिये और कई तरह की गतिविधियाँ शायद उन्हें करनी पड़े इत्यादि। जैसी समस्या स्वच्छ विद्यालय के लिये उनके साथ ना हो जाये। पर कौतुहल का विषय यह है कि प्रधानमंत्री के कहने पर भी उत्तराखण्ड राज्य के विद्यालयों में स्वच्छता के प्रति उदासीनता का रवैया आखिर क्यों? उत्तरखण्ड में जब स्कूलों की बात होती है तो इसमें सर्वाधिक समस्या पलायन को कहा गया है। यह एक अलग प्रकार की समस्या है। मगर जब स्कूलों की ‘स्वच्छता’ की बात हो तो इसमें कहना ही क्या है। स्कूल भवन है, लगभग स्कूलों में शौचालय बने हैं, कागजों में अध्यापक हैं परन्तु हकीकत में बच्चों की संख्या कम ही है। ऐसे में तो ये विद्यालय स्वच्छ साफ तो होने ही चाहिए। परन्तु कहानी इसके उलट है। उलट इस मायने में कि जिस राज्य के लोगों ने मोदी को भारी बहुमत दिया हो और वहीं के अध्यापक प्रधानमंत्री मोदी के सपनों पर पानी फेर रहे हों। इसलिये कि राज्य के स्कूलों में स्वच्छता अभियान की पोल सरकारी रिपोर्ट ही खोल रही है।

सरकारी आँकड़े बता रहे हैं कि 14 हजार स्कूलों में से सिर्फ 127 स्कूलों ने ‘स्वच्छ विद्यालय पुरस्कार पोर्टल’ पर अपनी रिपोर्ट अपलोड की है। केन्द्रीय संयुक्त सचिव मनीष गर्ग ने इस बावत सचिव विद्यालय चन्द्रशेखर भट्ट को फोन पर खरी-खरी सुनाई। केन्द्र सरकार ने सवाल खड़ा किया कि सर्व शिक्षा अभियान के अर्न्तगत दूसरे नम्बर पर आये उत्तराखण्ड के स्कूलों की ऐसी हालत क्यों है।

स्वच्छ भारत के लिये अपशिष्ट प्रबन्धन की नई तकनीक और प्रौद्योगिकी

Author: 
निमिष कपूर
Source: 
कुरुक्षेत्र, अक्टूबर, 2017

आज कचरे का प्रबन्धन, पुनः उपयोग और पुनर्निर्माण समय की माँग है। देश के वैज्ञानिक संस्थानों में नई तकनीकों एवं प्रौद्योगिकी के सहारे कचरे से निर्माण किया जा रहा है जिससे न केवल कचरे से निजात मिल रही है बल्कि हम वेस्ट टू वेल्थ यानी कचरे से सम्पन्नता की ओर टिकाऊ कदम बढ़ा रहे हैं। इस आलेख में हम कचरा प्रबन्धन के लिये किये जा रहे नीतिगत, वैज्ञानिक व तकनीकी प्रयासों को जानेंगे जो स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने में मदद कर रहे हैं। हमारे गाँव और शहरों में जगह-जगह लगे कचरे के ढेर और उनमें पनपते रोग आज गम्भीर खतरा बन चुके हैं। घर से कार्यालय या कॉलेज जाते समय और ट्रेन से किसी रेलवे स्टेशन पहुँचने से पूर्व नजर आते कचरे के पहाड़ हमारा स्वागत करते हैं। कचरे में स्थानीय मवेशी प्लास्टिक की पन्नियों को अपना भोजन बनाते हैं तो कहीं सड़े-गले कचरे के साथ इलेक्ट्रॉनिक कचरा भी इनके पेट में चला जाता है। ऐसे में आज कचरे का प्रबन्धन, पुनः उपयोग और पुनर्निर्माण समय की माँग है। देश के वैज्ञानिक संस्थानों में नई तकनीकों एवं प्रौद्योगिकी के सहारे कचरे से निर्माण किया जा रहा है जिससे न केवल कचरे से निजात मिल रही है बल्कि हम वेस्ट टू वेल्थ यानी कचरे से सम्पन्नता की ओर टिकाऊ कदम बढ़ा रहे हैं।

दो पिट वाले वॉटर सील शौचालय (Twin pit water seal toilet)

Author: 
युगल जोशी, नीरज तिवारी
Source: 
कुरुक्षेत्र, अक्टूबर 2017

शौचालय के दो गड्ढे एक सिरे पर जंक्शन चैम्बर से जुड़े रहते हैं। गड्ढों के तले पर सीमेंट नहीं किया जाता और यह मिट्टी का ही बना होता है। गड्ढों की दीवारों की चिनाई हनीकॉम्ब यानी मधुमक्खी के छत्ते के आकार में की जाती हैं। शौचालय का उपयोग करने वालों की संख्या को ध्यान में रखते हुए गड्ढे का आकार घटता-बढ़ता रह सकता है। गड्ढे की क्षमता आमतौर पर तीन साल तक काम करने की होती है। करीब तीन साल में पहले गड्ढे के भर जाने पर इसे जंक्शन चैम्बर से बन्द कर दिया जाता है और दूसरे गड्ढे को चालू कर दिया जाता है।

स्वच्छाथॉन : स्वच्छता के परिदृश्य में बदलाव और जनान्दोलन का निर्माण

Author: 
रेनी विल्फ्रेड
Source: 
कुरुक्षेत्र, अक्टूबर 2017

स्वच्छाथॉन 1.0 - पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय द्वारा एक स्वच्छता हैकाथॉन का आयोजन किया गया। उद्देश्य था- देश की स्वच्छता (इसमें हाइजीन शामिल) से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान हेतु नए विचारों को लोगों से इकट्ठा किया जाये और फिर इन विचारों को पोषित (इन्क्यूबेट) कर टिकाऊ समाधानों के रूप में विकसित किया जाये। इस पहल में भारी भागीदारी हुई। 6 श्रेणियों में 3000 से अधिक प्रविष्टियाँ (अन्तरराष्ट्रीय भी) प्राप्त हुई। इन 6 श्रेणियों में ‘स्कूल शौचालयों’ का परिचालन व रख-रखाव और व्यवहार में परिवर्तन हेतु संवाद समेत ‘मासिक धर्म में स्वच्छता का ध्यान’ जैसा अक्सर उपेक्षित मुद्दा भी शामिल था। एक जन-आन्दोलन की भावना से सरकारी और निजी क्षेत्र एक साथ आये- स्कूल व कॉलेजों के छात्रों, प्रोफेशनलों, संगठनों, स्टार्टअप्स, एनजीओ व राज्य सरकारों ने रोचक नई सोच से परिपूर्ण, उत्तम व व्यवहार्य समाधान प्रस्तुत किये। “स्वच्छाथॉन 1.0 - स्वच्छता और सफाई के क्षेत्र में देश के सामने मौजूद समस्याएँ सुलझाने के दीर्घकालिक नजरिए के साथ लोगों से समाधान प्राप्त करने और सहायता उपलब्ध कराने के लिये स्वच्छता हैकाथॉन है। 6 श्रेणियों में अन्तरराष्ट्रीय प्रविष्टियों समेत 3000 से अधिक प्रविष्टियाँ प्राप्त हुईं। इन श्रेणियों में ‘स्कूल के शौचालयों का परिचालन एवं रख-रखाव’ और ‘व्यवहार में परिवर्तन का संचार’ तथा ‘मासिक धर्म में स्वच्छता का ध्यान’ जैसे अक्सर भुला दिये जाने वाले मुद्दे शामिल हैं। स्कूलों और कॉलेजों के छात्रों, पेशेवरों, सगठनों, स्टार्टअप तथा गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) ने सरकारों की सक्रिय भागीदारी वाले उत्साहजनक, अनूठे, नए और व्यावहारिक समाधान दिये। सरकारी तथा निजी संगठनों ने इस बड़े कार