हमारा शहर सबसे स्वच्छ

Source: 
दैनिक जागरण, 20 मई, 2018

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जैसे माचिस की एक तीली सम्पूर्ण दुनिया को स्वाहा करने की ताकत रखती है उसी तरह बहुत सूक्ष्म मात्रा की गन्दगी भी महामारी फैला सकती है। उदाहरण के लिये एक ग्राम मल में एक करोड़ विषाणु हो सकते हैं, एक हजार परजीवी हो सकते हैं और 100 परजीवियों के अंडे हो सकते हैं। साफ-सफाई और स्वच्छता आदिम मानव सभ्यता की निशानी रही है। इंसानों को साफ-सफाई की नसीहत देने वाली तभी अनेकानेक कहावतें प्रचलन में आईं। साफ-सफाई के पीछे के विज्ञान को हमारे मनीषियों ने बखूबी समझा। लिहाजा सभी धर्मों में उपासना, पूजा, कर्मकाण्ड आदि में सफाई का विशेष स्थान बनता गया। जब आबादी कम थी तो उपभोक्तावाद के अभाव में कचरा फैलाने वाली अप्रयोज्य वस्तुएँ भी कम थीं। जो कूड़ा-करकट निकलता था, उसका लोग तमाम तरीके से पुनरुपयोग कर लेते थे। आज आबादी ज्यादा है। उपभोक्तावाद चरम पर है। लिहाजा कचरा संस्कृति भी ज्यादा है। इसकी बानगी 4203 शहरों में कराये गये केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय के स्वच्छता सर्वेक्षण 2018 में दिखती है। चन्द शहरों को छोड़ दें तो बाकी की सड़ान्ध आपको विचलित कर सकती है। लगातार इन्दौर दूसरी बार सबसे साफ शहर बना है। दूसरे और तीसरे नम्बर पर क्रमशः भोपाल और चंडीगढ़ हैं। हमारा और आपका शहर क्यों नहीं बना अव्वल? जाहिर है हम सब उन नियम-कानून और प्रक्रियाओं का पालन नहीं करते हैं जो उक्त तीनों शहर कर रहे हैं। ऐसे में अगर अगले सर्वे में अपने शहर को आप शीर्ष पर देखना चाहते हैं तो स्वयं में बदलाव करते हुए कचरे के खिलाफ मुहिम छेड़ दीजिए।

इन्दौर: कायम रखा ताज

कचरा पैदा करने वाले हों जिम्मेदार

Author: 
स्वाति सिंह संबयाल
Source: 
दैनिक जागरण, 20 मई, 2018

स्वच्छता सर्वेक्षण 2018 इसके पहले हुये सर्वेक्षण से बेहतर है क्योंकि इसने नई तकनीकों और दीर्घकालिक उपायों को बढ़ावा दिया है। हालांकि पुरस्कार के लिये चुने गये शहरों में से कुछ शहर सिर्फ दिखने भर के साफ हुए हैं। यहाँ पर सफाई की दीर्घकालिक पद्धतियों का पालन नहीं किया जाता है।

इन्दौर और भोपाल पिछले वर्ष की सूची में भी शीर्ष पर थे। इन दोनों शहरों ने इस वर्ष कचरे को स्रोत से ही अलग-अलग करने और कचरा प्रबन्धन में विकेन्द्रीकरण की प्रणाली अपनाने में काफी सुधार दिखाया है।

पिछले कुछ वर्षों में साफ-सफाई को लेकर लोगों का परिप्रेक्ष्य बदल गया है। अब गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग करने पर और उसे प्रोसेस करने पर अधिक जोर दिया जाता है, बजाय उस कचरे को एकत्र करके लैंडफिल में डम्प कर देने के। यह देखा गया है कि ठोस कचरा प्रबन्धन में सबसे बड़ा मसला है अलग-अलग किये गये कचरे को उठाना। किसी शहर में चन्द सोसायटी या वार्ड में ही कचरा एकत्र करने की यह प्रक्रिया अपनाई जाती है। पूरे शहर से कचरा उठाने का जिम्मा भी गिनी-चुनी स्थानीय संस्थाओं के ऊपर होता है। सभी शहरों में अलग किये हुए कचरे को एकत्र करने और प्रोसेस करने के लिये पर्याप्त बुनियादी ढाँचा भी नहीं है।

स्वच्छता सर्वेक्षण के नतीजों में सबसे बड़ी अनियमितता यह है कि इसमें शहरों को कचरा उठाने की उनकी डोर-टू-डोर प्रणाली के आधार पर अंक दिये गये हैं। जबकि कुछ शहरों में डोर-टू-डोर प्रणाली का चलन नहीं है। इसके बावजूद वे सबसे साफ हैं। यहाँ गीले कचरे का मूल स्थान में ही ट्रीटमेंट किया जाता है और सूखे कचरे को नगरपालिका एकत्र करके ले जाती है। तिरुवनंतपुरम और अलापुझा जैसे इन शहरों में अधिकतम कचरे को कम्पोस्ट और बायोगैस में बदल दिया जाता है। प्लास्टिक, ग्लास, धातु, कागज जैसे अन्य अजैव पदार्थों को रिसाइक्लिंग के लिये भेज दिया जाता है। ये शहर कचरा एकत्र करने और उसे लैंडफिल तक पहुँचाने में करोड़ों रुपए खर्च करने की बजाय ठोस कचरे से धन बना रहे हैं।

सोच…शौचालय की, सूखे शौचालय या फ्लश शौचालय

Author: 
लोबजैंग चोरोल
Source: 
चरखा फीचर्स, मई 2018

सूखा शौचालयसूखा शौचालयलेह, लद्दाख/बदलते समय के साथ जीवन बहुत व्यस्त हो गया है, इस व्यस्तता के कारण हमें परिवारों के साथ बैठकर पौष्टिक और पर्याप्त भोजन करने तक का समय नहीं मिलता। हम इतने व्यस्त हैं कि हमारे पास साँस लेने तक की फुरसत नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि हम सिर्फ एक मशीन की तरह काम करने के लिये खाना-पानी और साँस ले रहे हैं।

आज लोगों को शौच करने का भी पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है। लेकिन मैं आपको बताना चाहूँगी कि लद्दाख के सूखे शौचालय (ड्राई टॉयलेट) में ऐसा बिल्कुल नहीं होता। सूखे शौचालयों के अन्दर हमेशा मिट्टी के ढेर पर चमकता फावड़ा रखा रहता है। मानव अपशिष्ट को फर्श में बनी छेद से गुजरता है और फावड़े की मदद से कचरे पर थोड़ी सूखी रेत फेंक दी जाती है और इस तरह अपघटन का दिलचस्प चक्र शुरू होता है। खाद के कमरे अर्थात इन सूखे शौचालयों में बिताया गया समय और प्रयास निश्चित रूप से बर्बाद नहीं होता।

यहाँ की शौचालय प्रणाली मूल रूप से दो तलों वाली होती है। पहले तल पर शौचालय और दूसरे तल पर मानव अपशिष्ट से बनने वाले खाद का स्थान होता है। शौचालय का उपयोग करने के बाद, छेद के नीचे थोड़ा रेत फेंकने के लिये फावड़े का उपयोग करना होता है, जो न केवल मानव अपशिष्ट को ढँकने के काम आता है बल्कि अपशिष्ट की गंध को कम करने में भी सहायक है।

यह कम्पोस्टिंग प्रक्रिया में भी मदद करता है। मानव अपशिष्ट, कम्पोस्टिंग प्रक्रिया से गुजरने के बाद उत्तम किस्म के खाद में परिवर्तित हो जाता है जिसे खेतों के चारों ओर छिड़ककर किसान अच्छी फसल पैदा करते हैं। ये सूखे शौचालय विशेष रूप से सर्दियों के महीनों में उपयोगी होते हैं जब तापमान माइनस 30 डिग्री सेल्सियस से कम हो जाता है और पानी जम जाता है।

विषैला हो गया गौला का पानी

Author: 
नमिता

लोगों को जीवनदान देने वाले शहर के प्रतिष्ठित अस्पताल ही लोगों के जीवन से खेल रहे हैं। अस्पताल कबाड़ियों के माध्यम से इस नदी और पास के जंगलों में जैव चिकित्सीय कचरा डाल रहे हैं। गौला रोखड़ ट्रेंचिंग ग्राउंड में सैकड़ों टन जैव चिकित्सीय कचरा डाला गया जा रहा है और उसे जलाया भी नहीं जाता है। नाम के लिये कहीं-कहीं गौला नदी के किनारे पर डंप चिकित्सीय कचरे में बस आग भर लगा दी जाती है। हल्द्वानी की जीवनरेखा कही जाने वाली गौला नदी का निर्मल पानी विषैला हो गया है। वजह है इसकी तलहटी में बसे हल्द्वानी शहर से निकलने वाले नालों, औद्योगिक कचरों, घरेलू कचरों और मेडिकल वेस्ट का नदी में बिना रोक टोक प्रवाह।

लगभग 500 किलोमीटर लम्बी गौला नदी का उद्गम स्थल निचले हिमालय की तलहटी में स्थित सातताल झील हैं। यह नदी काठगोदाम, हल्द्वानी, किच्छा और शाही होते हुए बरेली से 15 किलोमीटर पहले रामगंगा में मिल जाती है। रामगंगा थोड़ी दूरी तय करने के बाद गंगा में मिल जाती है।

कहते है कि हल्द्वानी और काठगोदाम के कुल पानी की जरूरत का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा गौला नदी से ही पूरा किया जाता था लेकिन आज इसका पानी इतना गन्दा हो चुका है कि लोग इसे छूने से भी कतराते हैं। हल्द्वानी सहित अन्य इलाकों में नदी का बड़ा ही धार्मिक महत्त्व है। लोग इसके जल का इस्तेमाल धार्मिक अनुष्ठानों के लिये करते थे लेकिन पानी के विषैले हो जाने के कारण अब ऐसा करने से कतराते हैं। लोग बस यही कहते हैं कि नदी का स्वरूप बिगड़ चुका है कि उन्हें पानी भरने के लिये बहुत दूर जाना पड़ता है।

डॉक्यूमेंटरी के जरिए स्वच्छता का सन्देश

Author: 
विष्णुप्रिया
Source: 
अमर उजाला, 10 मई 2018

विष्णु प्रिया सेनिटेशन डॉक्यूमेंटरीविष्णु प्रिया सेनिटेशन डॉक्यूमेंटरी (फोटो साभार - डेक्कन क्रॉनिकल)मेरा जन्म तमिलनाडु के मदुरै में हुआ। लेकिन पिता की नौकरी के सिलसिले में मेरी परवरिश मुम्बई से लेकर केन्या तक हुई। मैं पढ़ाई के सिलसिले मेें वापस भारत आई और चेन्नई में आर्किटेक्चर की पढ़ाई शुरू की। दो साल पहले यो ही दोस्तों के साथ बातचीत करते हुए एक दिन मुझे पता चल कि ग्रामीण इलाके की लड़कियाँ तब तक ही स्कूल जाती है, जब तक उन्हें मासिक धर्म की हकीकत से जूझना नहीं पड़ता। क्योंकि अधिकांश ग्रामीण स्कूलों में शौचालय की व्यवस्था नही होती। यह जानकर मैं थोड़ा हैरान हुई।

इस सिलसिले में मैंने खोजबीन की तो मुझे सच्चाई और भी भयावह लगी। मुझे एक ऐसी बच्ची के बारे में पता चला जिसने सिर्फ इसलिये दम तोड़ दिया था, क्योंकि खुले मेें शौच करने के शर्म से उसने शौच पर जाना ही छोड़ दिया था, जिससे उसके शरीर ऊतकों में संक्रमण हो गया और वह मर गई।

सच्चाई को और बेहतर तरीके से समझने के लिये मैंने कई ग्रामीण स्कूलों का दौरा किया। मैंने समस्या के पीछे की वजह जानने की कोशिश की, तो पता चला कि ग्रामीण इलाकों मेें पानी की कमी शौचालयों के निर्माण में असली बाधा है। मुझे यह भी जानकारी हुई कि कई अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं के पास और सरकारी इन्तजामों में ऐसे शौचालय बनाने की तकनीक उपलब्ध है, जिसमें पानी की बेहद कम जरूरत होती है।

झोपड़ियों के बीच बने शौचालय कह रहे स्वच्छता की कहानी

Author: 
प्रेम शंकर मिश्र
Source: 
दैनिक जागरण, 11 मई 2018

शौचालयशौचालयबिहार की इस इकलौती पंचायत को पिछले दिनों नानाजी देशमुख राष्ट्रीय गौरव ग्रामसभा पुरस्कार मिला। मुजफ्फरपुर जिले के सकरा प्रखंड की सबसे गरीब पंचायत भरथीपुर में भले ही अधिकांश लोग झोपड़ियों मेें रहते हों, लेकिन वे खुले में शौच को नहीं जाते। घर की जगह झोपड़ी ही सही, लेकिन हर घर के लिये शौचालय बन चुका है।

मुखिया इन्द्रभूषण सिंह के दृढ़ संकल्प को ग्रामीणों का सहयोग मिला तो ग्रामसभा की परिकल्पना साकार होने लगी। स्वच्छता का मिशन पूरा हुआ और पंचायत को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) घोषित कर दिया गया। अब अगला कदम, गाँव में ही रोजगार को बढ़ावा देकर गरीबी दूर करना और शिक्षा का प्रचार-प्रसार है।

स्वच्छता के जुनून से मिली सफलता

करीब 10 हजार की अबादी वाली इस पंचायत के 80 फीसद लोग गरीब हैं। पक्की सड़कों के किनारे बनीं झोपड़ियाँ इसका अहसास भी कराती हैं। मगर गुलाबी रंग के शौचालय की दीवारें यह बताती हैं कि ये झोपड़ियाँ तो शौचालय वाली हैं।

दो माह में बने 1700 शौचालय

जनवरी तक भरथीपुर पंचायत में महज दो सौ घरों में शौचालय थे। स्वच्छता का ऐसा जुनून चढ़ा कि महज दो माह की मेहनत से पंचायत को खुले में शौच से मुक्त करा दिया गया। इतने दिनों में यहाँ शौचालयों की संख्या 200 से बढ़कर 1900 से अधिक हो गई। मजदूर के रूप में ग्रामीणों ने दिन-रात मेहनत की। 30 मार्च को यह पंचायत ओडीएफ घोषित हो गई।

सशक्त पंचायती राज का बेजोड़ उदाहरण

स्वच्छता के सारथी बने विकासनगर के नौनिहाल

Author: 
राकेश खत्री
Source: 
दैनिक जागरण, 7 मई 2018

स्वच्छता के बारे में लोगों को जागरूक करती बच्चियाँस्वच्छता के बारे में लोगों को जागरूक करती बच्चियाँ (फोटो साभार - हिन्दुस्तान टाइम्स)‘वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो, हाथ में ध्वजा रहे, बाल दल सजा रहे, ध्वज कभी झुके नहीं, दल कभी रुके नहीं’, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की उक्त पंक्तियों की चरितार्थ कर रहे हैं पर्वतीय बाल मंच से जुड़े 2000 नौनिहाल। गाँवों मेें जागरुकता अभियान चला रहे इन नौनिहालों ने कुछ समय पूर्व बाल पंचायत के माध्यम से बड़े-बुजुर्गों को उनकी जिम्मेदारियों का अहसास कराया था। अब मंच से ये जुड़े नौनिहाल स्वयं भी निकल पड़े हैं ऊबड़-खाबड़ रास्तों का सफर तय करते हुए गाँवों को स्वच्छ बनाने।

अभियान के तहत बाल मंच ने देहरादून जिले के विकासनगर ब्लॉक के 12 दूरस्थ गाँवों को गोद लिया है। रुद्रपुर क्षेत्र के इन गाँवों में नौनिहाल ग्रामीणों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने के साथ ही स्वच्छता का वास्तविक अर्थ भी समझा रहे हैं।

इन नौनिहालों ने आबादी से दूर और सम्पर्क मार्गं पर लगे कूड़े के ढेरों को निस्तारित कर सभी 12 गाँवों में 1210 कूड़ा निस्तारण प्वाइंट बनाए हैं। इसके लिये सबसे पहले बस्ती से दूर गड्डे खोदे गए और फिर उन्हें ढँक दिया गया। साथ ही ग्रामीणों को इन गड्डों में ही कूड़ा डालने के लिये प्रेरित किया गया।

मंच से जुड़े प्रीतम पंवार, हिमानी चिमवाल व सुधीर भट्ट बताते हैं कि ग्रामीणों की स्वच्छता के प्रति जागरूक करना आसान नहीं था। क्योंकि, उनके लिये स्वच्छता का अर्थ सिर्फ घर-आँगन की सफाई तक ही सीमित था। ऐसे में उन्हें गन्दगी से होने वाले नुकसानों के बारे में समझाना भी टेढ़ी खीर साबित हो रहा था। इसलिये, बच्चों का सहारा लिया गया।

जंजीरें टूटती गईं शौचालय बनते गए

Author: 
मोनिका इजारदार
Source: 
अमर उजाला, 4 मई, 2018

शौचालयशौचालय भूख की वजह से उस बूढ़ी औरत ने मेरी आँखों के सामने दम तोड़ा था। बाद में पता चला कि वह इसलिये भूखी थी, क्योंकि उसके पेट में संक्रमण था और इस कारण उसके शरीर में किसी भी प्रकार का पोषण नही पहुँच पा रहा था। संक्रमण की वजह थी- उसके आस-पास का गन्दा माहौल। वह जिस बिस्तर पर थी, वह उसके सोने, बैठने, खाने यहाँ तक नित्य कर्म करने की इकलौती जगह थी। सफाई का ध्यान नहीं रखा गया और बीमारी ने उसकी जान ले ली।

स्वच्छता की दिशा में कुछ करने के लिये सिर्फ यही एक घटना नही थी, जिसने मुझे प्रेरित किया। इसके अलावा भी मैंने कई ऐसे किस्से सुन रखे थे, जो खुले में शौच करने वाली उन बच्चियों से जुड़े थे, जिनका बलात्कार किया जाता था। मैं छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से ताल्लुक रखती हूँ। 2014 की बात है, मैं कॉलेज की पढ़ाई के पहले सेमेस्टर की परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी। यह वही वक्त था, जब देश में एक बड़ी राजनीतिक परिवर्तन हुआ था।

नई सरकार ने इसी वर्ष अपना महत्वाकांक्षी स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया था। इसके तहत सरकार ने देशव्यापी प्रशिक्षण शिविर आयोजित किये थे। अभियान के प्रति मेरी दिलचस्पी जगी और मैं उस प्रशिक्षण का हिस्सा बनी। बूढ़ी औरत वाली घटना प्रशिक्षण के दौरान घटी थी। मैंने उसी वक्त लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने की दिशा में काम करने का निश्चय कर लिया था।

अन्दर शौचालय, बाहर शौच - सरकार लक्ष्य से दूर

Author: 
सुष्मिता सेनगुप्ता
Source: 
डाउन टू अर्थ, अप्रैल, 2018

खुले में शौचखुले में शौच (फोटो साभार - स्क्रॉल.इन) पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय (एमडीडब्ल्यूएस) ने 1 मार्च, 2018 को इण्डिया हैबिटेट सेंटर में ग्रामीण स्वच्छ भारत मिशन पर एक बैठक का आयोजन किया। बैठक में स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) पर तीसरी बार चर्चा की जा रही थी। यह पहली बार नहीं है कि मंत्रालय ने मिशन की प्रगति के बारे में चर्चा करने के लिये इससे सम्बन्धित लोगों को इकट्ठा किया हो। भारत को स्वच्छ बनाने की समय सीमा (अक्टूबर, 2019) तेजी से सामने आ रही है।

बैठक पेयजल और स्वच्छता सचिव, परमेश्वरन अय्यर की प्रस्तुति के साथ शुरू हुई। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि घरेलू कवरेज पर मंत्रालय द्वारा दिखाए गए आँकड़े बहुत प्रभावशाली हैं। अक्टूबर 2014 में जब मिशन शुरू किया गया था तो कवरेज लगभग 40 प्रतिशत थी, जो कि 38.70 प्रतिशत से बढ़ी है।

मंत्रालय द्वारा दिखाए गए नक्शे से पता चलता है कि ऐसा कोई राज्य नहीं है जहाँ घरेलू शौचालय कवरेज 30 प्रतिशत से कम है। उत्तर प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, बिहार और ओड़िशा के चार राज्यों में 60 प्रतिशत से कम घरेलू कवरेज दिखाए गए हैं और अन्य सभी राज्यों में 60 प्रतिशत से अधिक कवरेज हैं। आँकड़े शौचालयों के निर्माण की उच्च दर के बारे में बताते हैं।

केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के पूर्व सचिव एन सी सक्सेना ने बताया कि स्वच्छ भारत मिशन के अन्तर्गत शौचालयों का उपयोग अभी भी एक समस्या है।