Latest

चला गया ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स का प्रहरी


विनम्र श्रद्धांजलि- (16 फरवरी 2018), डॉ. ध्रुव ज्योति घोष के जाने से ईस्ट कोलकाता वेटलैंड आज अनाथ हो गया।

डॉ. ध्रुव ज्योति घोेषडॉ. ध्रुव ज्योति घोेषप्रकृति-पर्यावरण को लेकर कुछ लोगों के काम को देखकर अनायास ही यह ख्याल जेहन में कौंध जाता है कि उनका इस धरती पर आने का उद्देश्य ही यही रहा होगा।

पानी को लेकर काम करने वाले अनुपम मिश्र के बारे में ऐसा ही कहा जा सकता है। कोलकाता में रह रहे एक और शख्स के काम को देखकर यही ख्याल आता है। वह शख्स थे डॉ. ध्रुवज्योति घोष।

हमारा लक्ष्य पानी की हर बूँद का उपयोग

Source: 
नवोत्थान, जुलाई 2016

देश का एक बड़ा भू-भाग सूखे की मार झेल रहा है। सरकार लगातार इससे निबटने के लिये कई कार्य योजना पर कार्य कर रही है, जिसमें राज्य भी सहयोग कर रहे हैं। कृषि के विकास के लिये सरकार ने कई योजनाओं को कार्यरूप भी दिया है। नई योजनाओं को कैसे और किस रूप में लागू किया जा रहा है, ऐसे तमाम सवालों के उत्तर जानने के लिये केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह से नवोत्थान से खास बातचीत की। पेश है बातचीत के मुख्य अंश…

आपकी सरकार ने दो साल पूरे किये हैं। आपके मंत्रालय ने इन वर्षों में क्या उपलब्धि हासिल की है?

भारत एक कृषि प्रधान देश है, बावजूद इसके यहाँ किसानों की काफी उपेक्षा हुई। आजादी से पहले देश के जीडीपी में कृषि का बड़ा योगदान था, जो अब महज 18 फीसदी रह गया है। किसान को पता नहीं है कि खेत में क्या बीमारी है, दवा क्या देनी है। इनपुट लागत बढ़ रही है। यह सबसे बड़ी चुनौती थी। दूसरी चुनौती थी कि किसानों को अच्छा मूल्य मिले। तीसरी, आपदा से होने वाले नुकसान की पूरी भरपाई हो। चौथी चुनौती थी कि किसान को नई तकनीकी से अवगत कराया जाये। यानी कृषि अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाये। इसमें किसान की आय को बढ़ाना सबसे बड़ी चुनौती है। इसी कड़ी में मृदा हेल्थ कार्ड जारी किये जा रहे हैं। आने वाले दो वर्षों के अन्तराल पर देश के सभी किसानों को सॉयल हेल्थ कार्ड उपलब्ध कराया जायेगा। हम आपको बता दें कि किसान को उसकी जमीन की उर्वरक क्षमता की जानकारी देने के लिये हमारी सरकार ने देश में पहली बार सॉयल हेल्थ कार्ड स्कीम शुरू की है। इससे पहले कुछ राज्य अपने स्तर पर यह स्कीम अलग-अलग तरीके से चला रहे थे।

क्या इस कार्य में राज्य सरकारों का पूरा सहयोग मिल रहा है?

सच दिखाने पर सत्ता विरोधी जमात में हो जाएँगे शामिल

Author: 
अनिल अश्विनी शर्मा
Source: 
डाउन टू अर्थ, जनवरी 2018

संस्कृति और समाज को सत्ता के एकहरे असहिष्णु तरीके पेश करने के खिलाफ जो आवाज उठी उसे प्रतिरोध की पहचान मिली। सरकार के प्रचार के परदे को हटाकर गैरबराबरी, अत्याचार और भ्रष्टाचार के सवाल उठाने वाले सिनेमा को प्रतिरोध के सिनेमा का खिताब मिला। इस सिनेमा को आम मध्यमवर्गीय दर्शक नहीं मिलते हैं पर यह सत्ता के गलियारों में हलचल मचा देती है। मई 2014 के बाद देश में जो स्वच्छता अभियान का राग गाया जा रहा है उसे मात्र एक फिल्म “कक्कूस” से बेसुरा होने का खतरा पैदा हो गया। तमिल भाषा में कक्कूस का अर्थ होता है शौचालय। जहाँ सोच वहीं शौचालय का राग अलापने वाले प्रशासन को कक्कूस की सोच से इतना डर लगा कि इस फिल्म को प्रतिबन्धित कर दिया गया। वजह यह कि सरकारी प्रचारों के इतर दिव्या भारती सरकार से सवाल पूछ रही थी कि आम नागरिकों की गन्दगी साफ करने के लिये मैनहॉल में उतरे सफाईकर्मी की मौतों का जिम्मेदार कौन है? क्या ये हमारे देश के नागरिक नहीं हैं , क्या इनके बुनियादी अधिकार नहीं हैं? सिनेमा के पर्दे पर नीतियों से टकराते से सवाल तमिलनाडु पुलिस को पसन्द नहीं आये और राज्य पुलिस ने उनका उत्पीड़न शुरू किया। सत्ता के प्रतिबन्ध के बाद दिव्या ने सोशल मीडिया का मंच चुना और फिल्म को यूट्यूब पर डाल दिया। आज दिव्या देश के कोने-कोने में घूम जमीनी दर्शकों को यह फिल्म दिखा सत्ता के दिखाए सच और जमीनी हकीकत का फर्क दिखा रही हैं। सत्ता से सवाल पूछती साहसी फिल्मकार दिव्या भारती से अनिल अश्विवी शर्मा के सवाल…

शहरों के बढ़ते प्रदूषण से बचाएगा नेसोफिल्टर

Author: 
रितु राज
Source: 
राजस्थान पत्रिका, 06 जनवरी, 2018

नई दिल्ली। दिल्ली आईआईटी के तीन पूर्व छात्रों और प्रोफेसरों की टीम ने शहरों में बढ़ते प्रदूषण से बचने के लिये एक ऐसे यंत्र का निर्माण किया है, जो प्रदूषण की मार से बचाने में कारगर साबित हो सकता है। इस यंत्र को बनाने में राजस्थान के दो छात्रों की मुख्य भूमिका रही है। बीकानेर के प्रतीक शर्मा और उदयपुर के तुषार वैश्य का साथ दिया है उत्तर प्रदेश के जतिन केवलानी ने। आईआईटी के तीनों पूर्व छात्रों ने प्रोफेसरों की देख-रेख में इस महत्त्वपूर्ण यंत्र को बनाने में सफलता हासिल की है। इन छात्रों को पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने स्टार्टअप नेशनल अवार्ड से भी पुरस्कृत किया था। इस सम्बन्ध में पत्रिका संवाददाता रितु राज ने प्रतीक शर्मा से खास बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के मुख्य अंश-

वायु प्रदूषण नेसोफिल्टर क्या है और यह कैसे काम करता है?
हमने वायु प्रदूषण जैसी गम्भीर समस्या से निपटने के लिये नैनो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर यह नेसोफिल्टर बनाया है। यह एक फिल्टर है, इसकी पकड़ पैच की तरह होती है जो नाक में आसानी से चिपक जाता है। यह हवा में मौजूद प्रदूषित कणों और बैक्टीरिया को रोक कर उसे प्यूरीफाई कर ऑटो क्लीन कर देता है।

जागरुक करने के लिये कला को बनाया माध्यम

Source: 
नवोदय टाइम्स, 29 नवम्बर, 2017

अगर लंदन की टेम्स नदी को पुनर्जीवित किया जा सकता है तो फिर यमुना को क्यों नहीं। ये कहना है कि मुम्बई के 37 वर्षीय कलाकार भूषण कल्प का। भूषण अपनी कला के जरिए दिल्ली में यमुना नदी किस तरह खत्म हो रही है, इस पर रोशनी डाल रहे हैं। भूषण ने बताया कि किस तरह कला बदलाव का सबसे महत्त्वपूर्ण जरिया बन सकती है। इसकी मदद से लोग ये समझेंगे कि यमुना को पुनर्जीवित करने के लिये क्या करने की जरूरत है। इसमें सोशल मीडिया भी अहम भूमिका निभा रहा है।

नदी भी हमें वही दे रही है, जो हमने इसे दिया


यमुना भूषण ने यमुना की गिरती हुई स्थिति को दिखाने के लिये कला को माध्यम के तौर पर क्यों चुना इसे लेकर वो कहते हैं कि मुम्बई के सर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट का वर्ष 2003 का बैच ‘लॉस्ट एंड फाउंड’ की थीम पर अपना प्रोजेक्ट लेकर आया था इसे देखकर ही मैंने सोचा कि मैं इस थीम को यमुना नदी के लिये इस्तेमाल करूँगा। इस उम्मीद के साथ कि मेरे इस प्रयास से नदी की तत्कालीन स्थिति सुधरेगी और यह फिर से जीवंत हो उठेगी। बाकी नदियों की तरह यमुना समुद्र में नहीं मिलती। यह आपके पापों, आपकी गन्दगी को निगल तो लेती है पर खुद इससे उबर नहीं पाती और इसलिये अब ये नदी भी हमें वही चीजें दे रही है, जो हमने इसके साथ किया।

सिंचाई के अभाव में अब नहीं सूखने दिए जाएंगे बुन्देलखण्ड के खेत

Source: 
दैनिक भास्कर, 21 जून 2017

उत्तर प्रदेश के सिंचाई मंत्री धर्मपाल सिंह से ‘दैनिक भास्कर’ की विशेष बातचीत

लखनऊ। प्रदेश के किसानों को मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराया जाना योगी आदित्यनाथ सरकार की प्राथमिकता में शामिल है। तीन साल पूरी कर चुकी केंद्र की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सरकार ने किसानों को खाद-बिजली के अलावा सिंचाई आदि के संबंध में जो सुविधाएँ मुहैया कराई हैं, उन्हीं को आगे बढ़ाते हुए राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार ने संकल्प लिया है कि आने वाले दिनों में किसानों की फसल सिंचाई के अभाव में सूखने नहीं दी जाएगी। कर्जमाफी के बाद किसानों को सिंचाई सुविधाएँ बढ़ाने और उनमें रियायत दिये जाने की गरज से सरकार जल्द ही कई महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने जा रही है। किसानों के सम्बंध में सरकार की आगामी योजनाओं को लेकर उत्तर प्रदेश के सिंचाई मंत्री धर्मपाल सिंह से दैनिक भास्कर प्रतिनिधि योगेश श्रीवास्तव ने बात की-

सिंचाई को लेकर सरकार की क्या, किन योजनाओं को मूर्तरूप देने जा रही है?

नेतृत्व और निष्ठा का संकट

Author: 
सुष्मिता सेनगुप्ता
Source: 
डाउन टू अर्थ, मार्च 2017

अन्ना हजारेअन्ना हजारेएक तरफ विफल होता सुखोमाजरी है तो दूसरी तरफ रालेगण सिद्धि की आदर्श गाँव की छवि पर सवालिया निशान लग रहे हैं। जल संचयन, सम्भरण व संरक्षण की मिसाल रहे अन्ना हजारे के इस गाँव में टैंकरों से पानी की आपूर्ति भावी संकट का संकेत है? अन्ना हजारे ने जल संचयन के लिये विख्यात गाँवों की चुनौतियों के बारे में सुष्मिता सेनगुप्ता के साथ विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं इसके प्रमुख अंश :

सरकार ने अनेक परियोजनाओं में आपकी सोच को अंगीकार किया, उन पर अमल लिया लेकिन बाकी परियोजनाएँ रालेगण सिद्धि जितनी सफल नहीं रही हैं। ऐसा क्यों?
इस तरह की किसी भी योजना, परियोजना के सफल होने के लिये जरूरी है कि हमारे पास मजबूत नेतृत्व हो, एक मजबूत नेता हो। रालेगण सिद्धि प्रयोग सफल हुआ क्योंकि वहाँ आन्दोलन की अगुवाई करने के लिये सही नेतृत्व रहा। गाँव वालों की पूरी आस्था व निष्ठा इस तरह के नेता में होनी चाहिए। इसके लिये नेता को निःस्वार्थ भाव से काम करना चाहिए, वह भ्रष्ट नहीं हो और अपने जीवन में अच्छे सिद्धान्तों का पालन करने वाला हो। रालेगण सिद्धि जैसे प्रयोगों के लिये नागरिकों को जल संचयन से लेकर सामाजिक सुधारओं व आजीविका कमाने के लिये विभिन्न पहलुओं पर काम करना पड़ता है। ऐसे प्रयोगों की भारी आलोचना भी हो सकती है। ऐसी परियोजना के नेता में आलोचनाओं का सामना करने का साहस होना चाहिए।

पिछली गर्मियों में रालेगण सिद्धि गाँव में भी टैंकरों से जल आपूर्ति की गई। अपनी नियमित जलापूर्ति बनाए रखने या जल संचयन के लिहाज से रालेगण सिद्धि की राह कहाँ गलत रही है?

बिना विज्ञान के बढ़ रही है प्राकृतिक आपदाएँ - श्री वल्दिया


जियोलॉजिस्ट खड़ग सिंह वल्दिया के साथ प्रेम पंचोलीजियोलॉजिस्ट खड़ग सिंह वल्दिया के साथ प्रेम पंचोलीपिछले दिनों उत्तरभारत में आये भूकम्प के बारे में वरिष्ठ भू-वैज्ञानिक के. एस. वल्दिया ने दो-टूक कहा कि मध्य हिमालय में नव ढाँचागत विकास के बारे में सरकारों को एक बार फिर से सोचना चाहिए। वे कई वर्षों से सरकार को ऐसी प्राकृतिक आपदा के बारे में सचेत कर रहे हैं कि देश का मध्य हिमालय अभी शैशव अवस्था में है। यहाँ पर बाँध, भवन व सड़क जैसे नव निमार्ण को बिना वैज्ञानिक परीक्षण के नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार में बैठे जनता के नुमाइन्दे भी अपनी प्रजा की माँग को भूलाकर ऐसी नीति का समर्थन कर देते हैं जो बाद में जन विरोधी हो जाती है।

अच्छा हो कि मध्य हिमालय के परिप्रेक्ष्य में ‘लोक ज्ञान और विज्ञान’ को विकास के बाबत महत्त्व दिया जाना चाहिए। उत्तराखण्ड में भूकम्प का गढ़ बनता ही जा रहा है। माना प्राकृतिक आपदाओं ने यहाँ घर बना लिया हो। प्राकृतिक संसाधन होने के बावजूद भी लोग यहाँ प्यासे हैं? ऐसा मालूम पड़ता है कि प्रकृति व संस्कृति लोगों से मोहभंग हो चली हो जैसे सवालों का जवाब उन्होंने बेबाकी से दिया है। प्रस्तुत है उनसे बातचीत के अंश-

उत्तराखण्ड में भूकम्प के खतरे बढ़ते ही जा रहे हैं।

शब्दों की चौकीदारी संभव नहीं-अनुपम मिश्र

Author: 
संजय तिवारी
Source: 
विस्फोट डॉट कॉम
अनुपम मिश्रअनुपम मिश्रअनुपम मिश्र पानी और पर्यावरण पर काम करने के लिए जाने जाते हैं लेकिन उनकी सर्वाधिक चर्चित पुस्तक आज भी खरे हैं तालाब के साथ उन्होंने एक ऐसा प्रयोग किया जिसका दूरगामी दृष्टि दिखती है। उन्होंने अपनी किताब पर किसी तरह का कापीराईट नहीं रखा। इस किताब की अब तक एक लाख से अधिक प्रतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। मीडिया वर्तमान स्वरूप और कापीराईट के सवाल पर हमने विस्तृत बात की। यहां प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश-

कापीराईट को लेकर आपका नजरिया यह क्यों है कि हमें अपने ही लिखे पर अपना दावा (कापीराईट) नहीं करना चाहिए?
कापीराईट क्या है इसके बारे में मैं बहुत जानता नहीं हूं। लेकिन मेरे मन में जो सवाल आये और उन सवालों के जवाब में मैंने जो जवाब तलाशे उसमें मैंने पाया कि आपका लिखा सिर्फ आपका नहीं है।
इस खबर के स्रोत का लिंक: 
http://visfot.com