नया विकास मॉडल हिमालय के लिये चिन्ता का विषय है - श्री भट्ट


गाँधीवादी, चंडी प्रसाद भट्ट पर्यावरणीय मुद्दों से सरोकार रखने वाले देश की नामचीन हस्ती हैं। इन्होंने गोपेश्वर में ‘दशोली ग्राम स्वराज्य संघ’ (1964) की स्थापना की और 1973 में चिपको आन्दोलन से जुड़े। समाज और पर्यावरण से जुड़े कार्यों के लिये इन्हें मैग्सेसे पुरस्कार, गाँधी शान्ति पुरस्कार और पद्मश्री, पद्मविभूषण जैसे सम्मान से नवाजा जा चुका है।

चण्डी प्रसाद भट्टचण्डी प्रसाद भट्टहिमालय की चिन्ता जिस तरह से हिमालय में रहने वाले लोग कर रहे हैं उससे अधिक हिमालय का दोहन देश के सत्तासीन लोग करते आये हैं। इतिहास गवाह है कि भारी जन-धन की हानि के पश्चात ही सरकारों की नींद खुलती है।

इन मुद्दों पर पिछले दिनों पर्यावरणविद चण्डी प्रसाद भट्ट से उनके देहरादून प्रवास के दौरान खुलकर चर्चा हुई। वे काफी चिन्तित थे कि मौजूदा समय में मौसम का जो चक्र बदल रहा है वह बहुत ही खतरनाक साबित हो सकता है। लोग भी प्राकृतिक संसाधनों को लेकर चिन्तित हैं। वे कह रहे थे कि सिविल सोसाइटी द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के काम जो हो रहे हैं वे भी नीतिगत मामलों में पिछड़ते ही जा रहे हैं, यही दुखद है।

संरक्षण और दोहन में सन्तुलन

गाँधी शान्ति पुरस्कार से सम्मानित, पद्मविभूषण व पर्यावरणविद चण्डी प्रसाद भट्ट इस बात को लेकर चिन्तित हैं कि हिमालय के विकास का मॉडल अब तक सामने नहीं आ पाया है। पिछले 20 वर्षों से हिमालय में आपदा ने घर बना लिया है। हिमालय क्षेत्र में हर विकास के कार्यों में प्राकृतिक आपदा के न्यूनीकरण के प्रावधान की दरकरार है।

स्टीफेन हॉकिंग आधुनिक समय के सबसे लोकप्रिय वैज्ञानिक

Author: 
डॉ. सुबोध महंती

स्टीफेन हॉकिंगस्टीफेन हॉकिंग (फोटो साभार - स्पेशल कवरेज न्यूज डॉट इन)स्टीफेन हॉकिंग की मृत्यु विज्ञान जगत के लिये एक ऐसी अपूरणीय क्षति है, जिसकी पूर्ति मुश्किल है। उनका ब्रह्मांड विज्ञान (कॉस्मोलॉजी) एवं सैद्धान्तिक भौतिकी में योगदान न केवल मार्गदर्शक है बल्कि दूरगामी प्रभाव रखने वाला है। जब हम इस बात का अहसास करते हैं कि किन शारीरिक परिस्थितियों में उन्होंने ये कार्य किए तो उससे उनके कार्यों का महत्त्व कई गुना बढ़ जाता है। विज्ञान के अलावा भी कई अन्य मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त करने में वे चूकते नहीं थे। आने वाले दिनों में विज्ञान में उनके योगदान तथा दूसरे विषयों पर उनके विचारों की चर्चा होती रहेगी।

हॉकिंग अपने समय के विश्व के सबसे लोकप्रिय वैज्ञानिक थे। अल्बर्ट आइंस्टाइन के बाद शायद ही कोई वैज्ञानिक हो जिसने आम लोगों की कल्पना को इस तरह से प्रभावित किया है, जैसे कि हॉकिंग ने किया था। उन्होंने दुनिया भर के लाखों-करोड़ों लोगों को आकर्षित किया। उनका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि हर व्यक्ति उनके प्रति आकर्षण महसूस करता था। उनकी छोटी-सी भी टिप्पणी दुनिया भर में ‘हॉकिंग ने ऐसा कहा’ कहकर फैल जाती थी।

स्टीफेन हॉकिंग ब्रह्मांड की गहराइयों तक थी उनकी पहुँच

Author: 
डॉ. प्रदीप कुमार मुखर्जी
Source: 
आविष्कार, अप्रैल, 2018

स्टीफेन हॉकिंगस्टीफेन हॉकिंग (फोटो साभार - विकिपीडिया)न्यूटन और आइंस्टाइन जैसे महान वैज्ञानिकों की श्रेणी में गिने जाने वाले स्टीफेन हॉकिंग अब नहीं रहे। 14 मार्च, 2018 की सुबह कैम्ब्रिज स्थित अपने घर पर 76 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। कम्प्यूटर एवं कृत्रिम आवाज के सहारे बोलने वाले हॉकिंग का शरीर हालांकि, ज्यादातर पहिएदार कुर्सी तक ही सीमित रहा, लेकिन इसमें कोई भी सन्देह नहीं कि उनके मस्तिष्क की पहुँच असीम ऊँचाइयों तक थी।

ह्वीलचेयर से बँधे होने के बावजूद वह पूरे जोश के साथ देश-विदेश घूमकर अपने व्याख्यान देते रहे। इन व्याख्यानों में वह ब्रह्मांड सम्बन्धी अपने सिद्धान्त (जिसके अनुसार सीमाबद्ध विस्तार वाले ब्रह्मांड की न कोई परिसीमा है और न कोई किनारा) तथा विलक्षण पिंड कृष्ण विवरों यानी ब्लैक होल्स के बारे में मस्तिष्क को झकझोरने वाली जानकारी रोचक ढंग से प्रस्तुत करते थे।

श्रोताओं के बीच विनोदप्रियता तथा अपने नटखट अन्दाज के लिये मशहूर हॉकिंग गम्भीर विषय पर अपने व्याख्यानों के बीच-बीच में हास्य एवं विनोद का पुट भी ले आते थे। इसका प्रत्यक्ष अनुभव इन पंक्तियों के लेखक को भी हुआ जब उसे 17 जनवरी 2001 को नई दिल्ली के सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम में आयोजित हॉकिंग का ‘भविष्य का पूर्वानुमान: ज्योतिष से कृष्ण विवरों तक’ विषय पर व्याख्यान सुनने का अवसर प्राप्त हुआ।

कृषि विज्ञान में भी बेहतर करियर

Source: 
राष्ट्रीय सहारा, 30 अप्रैल, 2018

वर्तमान दौर में जबकि शिक्षा के क्षेत्र में तरह-तरह की सम्भावनाएँ सजीव हो रही हैं तो कृषि विज्ञान भी करियर के क्षेत्र में मील का पत्थर बन सकता है। सरकार भी इस समय कृषि विज्ञान की तरफ ज्यादा मुखातिब है। इसी के मद्देनजर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. अखौरी वैशम्पायन से हमारे संवाददाता सोहनलाल ने विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है उसी के अंश


प्रो. अखौरी वैशम्पायनप्रो. अखौरी वैशम्पायनवर्तमान परिवेश में शिक्षा को रोजगार परक बनाने के लिये क्या किया जाना चाहिए?

स्टूडेंट्स रेडी प्रोग्राम के तहत कोर्सेस भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद द्वारा बनाये जाते हैं जिसे बीएचयू विद्वत परिषद द्वारा अनुमोदित कराकर कार्यकारिणी परिषद द्वारा स्वीकृत कराकर लागू किया जाता है। यह पाठ्यक्रम (कृषि) रोजगारपरक दृष्टि से भारत के सभी कृषि विश्वविद्यालयों हेतु चलाये जाते हैं।

इन पाठ्यक्रमों में कृषि के विभिन्न आयामों व प्रायोगिक विधाओं के साथ-साथ रोजगार परक उन सभी विषयों को सम्मिलित किया जाता है जिनमें वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों तथा किसानों के समन्वित विचार-विमर्श से हमारे विद्यार्थियों को प्रायोगिक अनुभवों की शृंखला तैयार करायी जाती है। चाहे वह गेहूँ, जौ, मक्का, दलहन, तिलहन, फल-फूल, सब्जी की उन्नत पैदावार से सम्बन्धित हो या इन पर लगने वाले रोगों व कीटों की रोकथाम से सम्बन्धित हो। चूँकि इन सारी प्रक्रियाओं में हमारे विद्यार्थी विभिन्न समूहों में हमारे वैज्ञानिकों, अध्यापकों व किसानों के साथ रहते हैं। अतः उनकी योग्यता में प्रचुर बढ़त होती रहती है।

युद्ध और शांति के बीच जल - भाग चार


(प्रख्यात पानी कार्यकर्ता श्री राजेन्द्र सिंह के वैश्विक जल अनुभवों पर आधारित एक शृंखला)
इजराइली जल प्रबन्धन - दादागिरी भी, समझदारी भी

इजराइल का जल प्रबन्धनइजराइल का जल प्रबन्धन इजराइल का फिलिस्तीन की पानी पर दादागिरी का वर्णन आप सुना चुके। इससे पहले कि आप इजराइल के पानी प्रबन्धन के बारे में बताएँ, बेहतर होगा कि वहाँ से जुड़े पानी का कोई और विवाद हो तो पाठकों के साथ शेयर करें?

हाँ, हैं न। इजराइल और जाॅर्डन के बीच पानी का विवाद बहुत पुराना है। यह विवाद, जाॅर्डन नदी के रेपेरियन राइट से जुड़ा है।

युद्ध और शान्ति के बीच जल


प्रख्यात पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह के वैश्विक जल अनुभवों पर आधारित एक शृंखला

विश्व जल दिवस, 22 मार्च 2018 पर विशेष


यह दावा अक्सर सुनाई पड़ जाता है कि तीसरा विश्व युद्ध, पानी को लेकर होगा। मुझे हमेशा यह जानने की उत्सुकता रही कि इस बारे में दुनिया के अन्य देशों से मिलने वाले संकेत क्या हैं? मेरे मन के कुछेक सवालों का उत्तर जानने का एक मौका हाल ही में मेरे हाथ लग गया। प्रख्यात पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह, पिछले करीब ढाई वर्ष से एक वैश्विक जलयात्रा पर हैं। इस यात्रा के तहत वह अब तक करीब 40 देशों की यात्रा कर चुके हैं। यात्रा को 'वर्ल्ड पीस वाटर वाॅक' का नाम दिया गया है। मैंने राजेन्द्र सिंह से निवेदन किया और वह मेरी जिज्ञासा के सन्दर्भ में अपने वैश्विक अनुभवों को साझा करें और वह राजी भी हो गए। मैंने, दिनांक 07 मार्च, 2018 को सुबह नौ बजे से गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान के कमरा नम्बर 103 में उनसे लम्बी बातचीत की। प्रस्तुत हैं राजेन्द्र सिंह जी से हुई बातचीत के कुछ महत्त्वपूर्ण अंश
जलपुरुष राजेन्द्र सिंह के साथ लेखक अरुण तिवारीजलपुरुष राजेन्द्र सिंह के साथ लेखक अरुण तिवारीइस वक्त जो मुद्दे अन्तरराष्ट्रीय तनाव की सबसे बड़ी वजह बनते दिखाई दे रहे हैं, वे हैं - आतंकवाद, सीमा विवाद और आर्थिक तनातनी। निःसन्देह, सम्प्रदायिक मुद्दों को भी उभारने की कोशिशें भी साथ-साथ चल रही हैं। स्वयं को राष्ट्रवादी कहने वाली ताकतें अपनी सत्ता को निवासी-प्रवासी, शिया-सुन्नी, हिन्दू-मुसलमान जैसे मसलों के उभार पर टिकाने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में यह कथन कि तीसरा विश्व युद्ध, पानी को लेकर होगा; आगे चलकर कितना सही साबित होगा?

प्रकृति और स्त्री पर आधिपत्य की आलोचना है इको फेमिनिज्म

Source: 
डाउन टू अर्थ, मार्च 2018

साहित्य उत्सव मनाने की चीज नहीं है। फिलहाल जो साहित्योत्सव चल रहा है उसके पीछे व्यापार की आँखें हैं। वह उत्सव मात्र रह जायेगा। लेकिन साहित्योत्सवों का एक अच्छा लक्ष्य भी है। वह साहित्य के प्रति रुचि बढ़ाकर उसमें निहित सोद्देश्य ज्ञान-विज्ञान का प्रसार कर सकता है, ऐसा नहीं हुआ तो उससे कोई फायदा नहीं है।

एक अनोखी आर्द्रभूमि बचाने को आतुर इकलौता आदमी

Author: 
पैट्रिक बरखम/एसबी वेडा
Source: 
द गार्जियन, 9 मार्च 2016

यह स्टोरी ‘द गार्जियन’ में जब छपी थी, तब ध्रुवज्योति घोष जीवित थे। उनका निधन 16 फरवरी 2018 को हार्ट अटैक से हो गया। ध्रुवज्योति घोष ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स के गार्जियन की तरह थे। उन्होंने लम्बे समय तक न केवल इसकी देखभाल की बल्कि दुनिया को यह भी बताया कि किस तरह इस आर्द्रभूमि में लाखों लीटर गन्दा पानी प्राकृतिक तरीके से साफ हो जाता है। यह स्टोरी आर्द्रभूमि को बचाने के लिये ध्रुवज्योति घोष के संघर्ष को भी दर्शाती है। गमले में रखे परित्यक्त पौधे की तरह ही जनवरी में कोलकाता की सड़कों पर लगे पेड़ धूल से सने होते हैं। ट्रैफिक सिग्नल पर गाड़ियाँ रुकती हैं, तो हॉकर धूल झाड़ने वाला डस्टर लेकर कार ड्राइवरों के पास दौड़ पड़ते हैं।

शहर के फ्लाईओवरों के बीच की जगह में पौधे लगाए गए हैं और इनके आसपास क्लीन व ग्रीन शहर के पोस्टर चस्पां कर दिये गए हैं। शहर में जितने पोस्टर ‘क्लीन व ग्रीन शहर’ के दिखते हैं, उससे कहीं ज्यादा पोस्टर निवेशकों से यहाँ निवेश करने की अपील वाले हैं।

सुसंस्कृत शहर के रूप में मशहूर कोलकाता की आबादी करीब 14.5 मिलियन है और ब्रिटिश हुकूमत के वक्त यह लंदन के बाद दूसरा सबसे बड़ा शहर था जहाँ अंग्रेजों का शासन चलता था। अब यह शहर दिल्ली, मुंबई, चेन्नई व बंगलुरु जैसा बन जाने को उतावला है।

कोलकाता शहर समुद्र की सतह से महज 5 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और पानी से घिरा हुआ है। इस शहर के पूर्वी हिस्से में वृहत आकार की एक अनोखी आर्द्रभूमि है। ठीक ऐसे समय में जब कोलकाता को इस आर्द्रभूमि की सख्त जरूरत है, इस पर रीयल एस्टेट डेवलपरों की गिद्ध दृष्टि पड़ गई है।

चला गया ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स का प्रहरी


विनम्र श्रद्धांजलि- (16 फरवरी 2018), डॉ. ध्रुव ज्योति घोष के जाने से ईस्ट कोलकाता वेटलैंड आज अनाथ हो गया।

डॉ. ध्रुव ज्योति घोेषडॉ. ध्रुव ज्योति घोेषप्रकृति-पर्यावरण को लेकर कुछ लोगों के काम को देखकर अनायास ही यह ख्याल जेहन में कौंध जाता है कि उनका इस धरती पर आने का उद्देश्य ही यही रहा होगा।

पानी को लेकर काम करने वाले अनुपम मिश्र के बारे में ऐसा ही कहा जा सकता है। कोलकाता में रह रहे एक और शख्स के काम को देखकर यही ख्याल आता है। वह शख्स थे डॉ. ध्रुवज्योति घोष।