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नदियों से मित्रता का मिला ईनाम

Author: 
उमेश कुमार राय

पुरस्कार लेते बफेलो नियाग्रा रीवरकीपर के प्रतिनिधिपुरस्कार लेते बफेलो नियाग्रा रीवरकीपर के प्रतिनिधिबफेलो नियाग्रा रीवरकीपर एक सामुदायिक संगठन है। इस संगठन को इस साल थीस इंटरनेशनल वाटरप्राइज अवार्ड दिया गया है। इंटरनेशनल रीवर फाउंडेशन की ओर से आयोजित तीन दिवसीय 19वें इंटरनेशनल रीवर सिम्पोजियम में संगठन के प्रतिनिधि जे. बर्नोस्की और सुजैन कोर्नाकी को यह पुरस्कार सौंपा गया। संगठन को यह अवार्ड नदियों और नदियों के बेसिन के संरक्षण, उनकी सुरक्षा के लिये दिया गया है। बतौर पुरस्कार 2 लाख ऑस्ट्रेलियन डॉलर दिया गया। पिछले वर्ष इस संगठन को नॉर्थ अमेरिकन रीवरप्राइज अवार्ड दिया गया था।

यहाँ यह भी बताते चलें कि इंटरनेशनल रीवर फाउंडेशन ने इस पुरस्कार की शुरुअात 1999 से की थी और अब तक 15 संगठनों को यह पुरस्कार मिल चुका है।

केन-बेतवा लिंक बुन्देलखण्ड को बाढ़-सुखाड़ में डुबोकर मारने का काम है- राजेन्द्र सिंह


अरुण तिवारी द्वारा जलपुरुष राजेन्द्र सिंह से बातचीत पर आधारित साक्षात्कार

राजेन्द्र सिंहराजेन्द्र सिंह सुना है कि पानी के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार आजकल आपके मार्गदर्शन में काम रही है?
मेरा सहयोग तो सिर्फ तकनीकी सलाहकार के रूप में है। वह भी मैं अपनी मर्जी से जाता हूँ।

उत्तर प्रदेश सरकार अपने विज्ञापनों में आपके फोटो का इस्तेमाल कर रही है। ऐसा लगता है कि आप अखिलेश सरकार से काफी करीबी से जुड़े हुए हैं। पानी प्रबन्धन के मामले में क्या आप सरकार के कामों से सन्तुष्ट हैं?

कुछ काम अच्छे जरूर हुए हैं। लेकिन सरकार के प्लान ऐसे नहीं दिखते कि वे राज्य को बाढ़-सुखाड़ मुक्त बनाने को लेकर बनाए व चलाए जा रहे हों। बाढ़-सुखाड़ तब तक आते रहेंगे, जब तक कि आप पानी को ठीक से पकड़ने के काम नहीं करेंगे।

साक्षात्कार: जानें मोबाइल पर पानी में फ्लोराइड की मात्रा

Author: 
मनोरमा

सैमुअल राजकुमारसैमुअल राजकुमारजल प्रदूषण मानवता के सबसे बड़े संकटों में से एक ​है खासतौर पर प्रदूषित पेयजल। पूरी दुनिया के लोग पेय की कमी और दूषित पेयजल की समस्या से जूझ रहे हैं। आज पूरे विश्व की 85 प्रतिशत आबादी सूखे के हालात में रह रही है और कुल 78.3 करोड़ लोगों की पहुँच में साफ पानी नहीं है।

भारत की बात करें तो पानी से सम्बन्धित कुछ आँकड़ों पर नजर डालना बेहद जरूरी है जैसे दुनिया की 16 प्रतिशत आबादी भारत में बसती है लेकिन विश्व के कुल जल संसाधन का केवल 4 प्रतिशत ही भारत के पास है। जबकि भारत ​में भूजल का दोहन पूरे विश्व में सबसे ज्यादा होता है यहाँ तक ​कि चीन भी इस मामले में हमसे पीछे है।

हाल के आँकड़ों के मुताबिक भारत की कुल एक चौथाई यानी लगभग 33 करोड़ आबादी पीने के पानी की कमी से जूझ रही है।

मैला प्रथा से मुक्ति कब

Author: 
भाषा सिंह
Source: 
शुक्रवार, 16 से 31 अगस्त 2016

इस साल मैगसेसे पुरस्कार दो ऐसे व्यक्तियों को मिला है जो जाति प्रथा के ढाँचे, पेशेगत गुलामी को चुनौती दे रहे हैं। इनमें बेजवाड़ा विल्सन मैला प्रथा से मुक्ति के संघर्ष के अग्रणी और अनथक कार्यकर्ता हैं। उनसे एक बातचीत।



. एशिया का नोबेल कहा जाने वाला सम्मानित रमन मैगसेसे पुरस्कार इस बार भारत में दो ऐसे व्यक्तियों को मिला है जो जाति प्रथा के ढाँचे, पेशेगत गुलामी को चुनौती दे रहे हैं। सामाजिक क्षेत्र में अभूतपूर्व काम करने के लिये सफाई कर्मचारी आंदोलन के बेजवाड़ा विल्सन और संस्कृति के क्षेत्र में टीम.एम. कृष्णा को जो कर्नाटक संगीत में हाशिये के समुदायों को प्रवेश दिलाने के लिये सक्रिय है। पचास वर्षीय बेजवाड़ा विल्सन का जन्म कर्नाटक के कोलार गोल्ड माइंस में एक दलित परिवार में हुआ। उनका परिवार अंग्रेजों द्वारा बनायी गई इस खान में मैला ढोने का काम करता था। पिछले 35 सालों से उनके जीवन का एक ही मकसद है, मैला प्रथा का सम्पूर्ण खात्मा। बेजवाड़ा विल्सन सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक हैं। सहज-सरल व्यक्तित्व वाले विल्सन भीमराव अंबेडकर की विचारधारा में गहरा विश्वास रखते हैं। विल्सन से बातचीत के कुछ अंश।

एशिया का नोबेल कहे जाने वाले रमन मैगसेसे पुरस्कार पाने वाले आप पहले भारतीय दलित हैं, इससे आपकी लड़ाई को कितना बल मिलेगा।

फ्लोराइड पीड़ित गाँवों में पहुँची सरकार


.वसुंधरा दाश प्राइम मिनिस्टर रूरल डेवलपमेंट फेलोशिप (अध्येतावृत्ति) के तहत मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के गाँवों में काम कर रही हैं। प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास फेलोशिप तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार के समय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की पहल पर शुरू हुई थी। सम्प्रति 226 युवा इस फेलोशिप के तहत 18 राज्यों के 111 जिलों में काम कर रहे हैं। ये लोग स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर काम करते हैं। वसुंधरा दाश वर्ष 2014 से काम कर रही हैं।

छिंदवाड़ा में काम करते हुए उन्होंने कई ऐसे गाँवों के बारे में पता लगाया जो फ्लोराइड से प्रभावित हैं। इन गाँवों में वे स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर कई तरह के काम कर रही हैं।

जल समाधि का मन बनाकर गया था : किशोर कोडवानी


.सवाल अकेले पीपल्याहाना तालाब का भी नहीं है, मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी माने जाने वाले इन्दौर शहर के हवा और पानी पर ही संकट खड़ा हो गया है। यही हालात रहे तो 2021 के बाद शहर में साफ हवा और शुद्ध पानी के लिये भी लोग तरसने लगेंगे। हालात यहाँ तक बिगड़ सकते हैं कि इन्दौर के लोगों को हवा और पानी के लिये पलायन करना पड़े।

यह दावा प्रकृति के जानकार विशेषज्ञ कर रहे हैं। हम किस तरह के विकास की बातें कर रहे हैं, यह कौन सा विकास है। हम किस दिशा में जा रहे हैं। क्या हम सामूहिक आत्महत्याओं की दिशा में बढ़ रहे हैं।

बुन्देलखण्ड को नष्ट करने की साजिश हो रही हैः परिहार

Author: 
रमेश ठाकुर
Source: 
सोपानSTEP, जुलाई, 2016

प्राकृतिक आपदा और सरकारी तंत्र से बेहाल बुन्देलखण्ड सालों से सूखे की मार झेल रहा है। सूखे के चलते खेत-खलिहान चौपट हो गए हैं। लोगों को दो जून की रोटी तक नसीब नहीं हो पा रही है। इस स्थिति में किसान शहर की तरफ पलायन कर रहे हैं। पलायन और बुन्देलखण्ड के किसानों से जुड़े सवालों पर भारतीय किसान यूनियन (भानु) के बुन्देलखण्ड अध्यक्ष शिव नारायण सिंह परिहार से सोपानSTEP के लिये रमेश ठाकुर ने बातचीत की। प्रस्तुत है, बातचीत के प्रमुख अंश:

पिछले दो दशकों से बुन्देलखण्ड बूरे दौर से गुजर रहा है। मौजूदा समय में क्या हालात हैं?


. बुन्देलखण्ड राजनीति का अखाड़ा बनकर रह गया है। वायदे बहुत किए जाते हैं, लेकिन समय के साथ धुंधले हो जाते हैं। बुन्देलखण्ड आजाद भारत का आज भी सबसे असुविधाओं वाला क्षेत्र है। बुन्देलखण्ड पहले से ही कई वर्षों से भीषण सूखे की मार झेल रहा है। और अब मानवीय समस्या का सामना कर रहा है। बांदा, चित्रकूट, महोबा, झांसी, ललितपुर आदि जिलों में पिछले कुछ वर्षों से निरंतर अंधाधुध अवैध खनन का काम किया जा रहा है। पानी, पहाड़, जंगल, वन्यजीव, खेती, मजदूरी और स्थानीय निवासियों की सेहत तथा पर्यावरण सब कुछ खनन की भेंट चढ़ रहा है। इस अवैध खनन की जानकारी सूबे की सरकार को भी है फिर भी रोकने के बजाय और बढ़ावा दे रही है। खनन से धरती की कोख में बाकी बचा पानी भी लगातार सूखता जा रहा है, जिससे खेती-बाड़ी, जीवन-यापन और मवेशियों का जीवन संकट में पड़ गया है।

खबर है कि भुखमरी के कारण लोग यहाँ से दूसरे जगहों के लिये पलायन कर रहे हैं?

सामाजिक सरोकार को समर्पित विद्या

Author: 
हरबीन अरोड़ा

. पदमश्री विद्या बालन का परिचय महज एक अच्छी अभिनेत्री तक ही सीमित नहींं है। वे ऐसी अभिनेत्री हैं जिनके लिए फिल्मों के साथ ही सामाजिक सरोकार भी बहुत मायने रखता है। यही वजह है कि वे केंद्र सरकार की ओर से चलाये जा रहे कई अभियानों का अहम हिस्सा हैं। विद्या की छवि भी एक ऐसी अभिनेत्री की है जो अपने काम के प्रति ईमानदार तो है साथ ही विनम्र और हाजिरजवाब भी। पिछले दिनों महिला आर्थिक मंच के कार्यक्रम में वे शिरकत करने पहुँची थी। इस कार्यक्रम में उन्होंने अपने अभिनय और सामाजिक दायित्व पर विस्तृत चर्चा की जिसकी भरपूर सराहना हुई थी। विद्या ने परिणीता फिल्म के साथ बॉलीवुड में कदम रखा था और इसके बाद उन्होंने पा, कहानी, इश्किया, डर्टी पिक्चर, नो वन किल्ड जेसिका जैसी फिल्मों में दमदार भूूमिका निभाकर बॉलीवु़ड में अलग मुकाम हासिल किया। कई फिल्मों को उन्होंने अपने दम पर हिट करवाई।

केंद्र सरकार की कई परियोजनाओं से जुड़कर वे अब सामाजिक क्षेत्र में भी एक नया मुकाम हासिल करने की ओर अग्रसर हैं। असल में बालन ने मुंबई विश्वविद्यालय से सामाजशास्त्र में एमए किया है और आज वे सामाजिक कामों में बढ़चढ़कर हिस्सा ले रही हैं इसका थोड़ा श्रेय उनकी शिक्षा-दीक्षा को भी जाता है।

सामाजिक मुहिम में उनकी उपलब्धि की बात करें तो वर्ष 2011 में वे वर्ल्डवाइड फंड फॉर नेचर-इंडियाज अर्थ आवर अभियान से जुड़ीं और फिर बच्चों की शिक्षा से जुड़े अभियान छोटे कदम प्रगति की ओर की ब्रांड अम्बेसडर बनीं। संप्रति वे निर्मल भारत अभियान से भी जुड़ी हैं जिसका लक्ष्य वर्ष 2017 तक सभी ग्रामीण घरों में शौचलय की सुविधा मुहैया करवाना है। विद्या बालन के करियर, सामाजिक मुद्दों पर उनके रुझान और उनकी निजी जिंदगी को लेकर हरबीन अरोड़ा ने लम्बी बात बातचीत की। यहाँ पेश है उनसे बातचीत के मुख्य अंश-

जरूरतमंदों की मदद से खुशी मिलती है-नाना पाटेकर

Author: 
राजा राजाध्यक्ष

.ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि फिल्म जगत के सितारे सामाजिक कामों में बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हों। फिल्मी सितारो की जिंदगी तो एक्टिंग, प्रसिद्धी और पैसों के ईर्द-गिर्द ही चक्कर लगाया करती है। अलबत्ता कुछ सितारे सामाजिक सरोकार के कामों में हिस्सा लेते हुए दिख जाते हैं लेकिन उनका असल उद्देश्य तो तस्वीरें खिंचवाना और सुर्खियाँ बटोरना ही होता है।

हाँ, इस दौर में भी कुछ गिने चुने अभिनेता हैं जो चुपचाप अपने सामाजिक दायित्वों का बड़ी ही शिद्दत से निर्वाह कर रहे हैं। इनमें एक अहम नाम है नाना पाटेकर का। लीक से हटकर और मसाला दोनों तरह की फिल्मों में सफलता का परचम लहराने वाले नाना पाटेकर कई दशकों से सामाजिक कामों में तल्लीनता से लगे हुए हैं। उनके सामाजिक दायित्वबोध का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे अपनी हर फिल्म से मिलने वाली राशि का एक हिस्सा जरूरतमंदों के लिए अलग रख देते हैं।

सामाजिक कामों के चलते वे अक्सर ही चर्चा में रहते हैं लेकिन इस बार महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में जाकर उन्होंने उन परिवारों की मदद की जिनके घर के लोगों ने कृषि संकट से हारकर आत्महत्या कर ली थी। उनके इस कदम ने मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा और वे सुर्खियों में आ गये। पाटेकर के इस निःस्वार्थ कदम का फायदा यह हुआ कि उनके अभियान से जन आंदोलन का एक माहौल बनने लगा। इस बीच नाना पाटेकर ने नाम फाउंडेशन की स्थापना कर डाली ताकि सूखाग्रस्त लोगों को मदद दी जा सके।

नाना पाटेकर की पारिवारिक पृष्ठभूमि को देखें तो यह समझना आसान होगा कि क्यों सामाजिक मुद्दे उन्हें अपनी ओर खींचते हैं। वे जिस परिवार से आते हैं उस परिवार की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी लिहाजा उन्हें छोटी उम्र में ही पैसे कमाने के लिए कई तरह के काम करने पड़े।