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हर कॉलोनी में एक तलैया हो : कृष्ण गोपाल व्यास

मध्यप्रदेश में पानी रोको अभियान की आयोजना बनाने वाली टीम के एक सदस्य श्री केजी व्यास से भी हमने जल संरचनाओं के तकनीकी पक्ष को लेकर विस्तृत बातचीत की। श्री व्यास मूलतः भूवैज्ञानिक हैं और पानी आंदोलन के वरिष्ठ चिंतक रहे हैं। आप म.प्र. सरकार की राज्य स्तरीय जलग्रहण कार्यक्रम समिति में सदस्य भी हैं। श्री व्यास ने उन देशों की भी यात्रायें की है जहां पानी हमारे देश के मुकाबले बहुत कम बरसता है। लेकिन बेहतर जल प्रबंधन के कारण वहां के निवासियों के चेहरे पानीदार लगते हैं। इस बातचीत के कुछ अंश के माध्यम से आप भी श्री व्यास से रूबरू होईएः

अभी और जंग लड़नी है : राधा भट्ट

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राधा भट्ट: फोटो साभार - चौथी दुनियाराधा भट्ट: फोटो साभार - चौथी दुनियाहिमालय को बचाना है. नदियों, पर्वतों और जंगलों को पैसों के लालची व्यापारियों की भेंट नहीं चढ़ने देना है. चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े. गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्ष राधा भट्ट के दिन रात आजकल इसी जद्दोज़हद में कट रहे हैं. वे लड़ रही हैं. उत्तराखंड की महिलाओं के साथ आंदोलन कर रही हैं. पर्वतों, नदियों, जंगलों और घाटियों की पद यात्रा करते हुए सरकार के ख़िला़फ, व्यापारियों और बिल्डरों के ख़िला़फ विरोध के स्वर पूरी मज़बूती से दर्ज़ करा रही हैं.
इस खबर के स्रोत का लिंक: 

http://www.chauthiduniya.com/2009/10/abhi-aur-jang-ladani-hai-radha-bhat...

हर व्यक्ति की अपनी नर्मदा होती है- मेधा पाटकर

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निर्मला डोसी
मेधा ताईमेधा ताईसन् सत्तावन के आंदोलन के सक्रिय भागीदार बसंत खानोलकर तथा 'स्वाधार' व अन्य समाजसेवी संस्थाओं से शिद्दत से जुड़ी इंदु ताई की बेटी मेधा साधारण स्त्री होती तो आश्चर्य होता। जिन्होंने नि:स्वार्थ समाजसेवा, देश के लिये पूर्ण समर्पण व दुर्धर्ष कर्मठता के संस्कार जन्मघुट्टी में पाये और वैसे ही स्वस्थ परिवेश में बड़ी हुईं। उनके व्यक्तित्व में जो धार है, वह यशस्वी माता-पिता से मिली। शिक्षा, संस्कार तथा परिवेश ने उसे और सान पर चढ़ाया। दिसंबर 1954 में जन्मी मेधा ने 'सामाजिक कार्य' विषय लेकर एम.ए.

पानी बचाना ही होगा

जल प्रबंधन विशेषज्ञ राजेंद्र सिंह से विकास संवाद के प्रशांत दुबे की बातचीत



लोग उन्हें ‘पानी वाले बाबा ’ के नाम से जानते हैं.

राजस्थान के जो इलाके सरकारी फाइलों में डार्क जोन घोषित थे, वहां 80 के दशक में पानी को लेकर राजेंद्र सिंह ने काम करना शुरु किया- अकेले. फिर गांव के लोग जुड़ने लगे. तरुण भारत संघ बना. जल संरचना पर काम बढ़ता गया. गांव-गांव में जोहड़ बनने लगे और बंजर धरती पर हरी फसलें लहलहाने लगी. दुनिया भर के लोगों ने इस काम को सराहा. 2001 में राजेंद्र सिंह को रमन मैगसेसे पुरस्कार से भी नवाजा गया. पिछले दिनों जब राजेंद्र सिंह भोपाल पहुंचे तो उनसे यह बातचीत की गई.

• आपको इस काम की प्रेरणा कैसे मिली ?

सरस्वती क्यों न बही

....और सरस्वती क्यों न बही अब तक?


वैज्ञानिक प्रमाण, पुरातात्विक तथ्य
1996 में 'इन्डस-सरस्वती सिविलाइजेशन' नाम से जब एक पुस्तक प्रकाश में आयी तो वैदिक सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता और आर्यों के बारे में एक नया दृष्टिकोण सामने आया। इस पुस्तक के लेखक सुप्रसिध्द पुरातत्वविद् डा. स्वराज्य प्रकाश गुप्त ने पहली बार हड़प्पा सभ्यता को सिंधु-सरस्वती सभ्यता नाम दिया और आर्यों को भारत का मूल निवासी सिद्ध किया।

ताजे पानी का मतलब?

इन्दिरा मिश्रइन्दिरा मिश्रवन विभाग जानता है, कि जल ही जीवन है, पर पानी की बरबादी रोकने के कोई कारगर प्रयास दिखाई नहीं देते। घर में एक बार फ्लश कम खींचने का मतलब है एक पेड़ का पोषण कर सकने लायक पानी बचा लेना। उधर टयूबवेल से एक बाल्टी पानी खींचने का मतलब है किसी विशाल पेड़ का प्राण सोखना।

इन्दिरा मिश्र

कोसी के लिए समझदारी और सावधानी

जल-विद्युत विशेषज्ञ दीपक ग्यावलीजल-विद्युत विशेषज्ञ दीपक ग्यावलीजल-विद्युत विशेषज्ञ दीपक ग्यावली, नेपाल के पूर्व जल संसाधन मंत्री रह चुके हैं तथा नेपाल के जल संरक्षण फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं। कोसी की बाढ़ और भविष्य की तैयारियों पर दीपक ग्यावली के बेवाक विचार

कोसी ने अपना तटबंध क्यों तोड़ा? मरम्मत कार्य के लिए कौन जिम्मेदार था, भारत या नेपाल?

दीपक ग्यावली : इस बात को समझने के लिए जरा पीछे मुड़कर देखना ज़रूरी है। तब हमें यह अनुभव होगा कि यह आपदा तीन बातों का नापाक मेल है: 1. इस प्रकार के जल-पारिस्थितिक शासन के लिए गलत टैक्नॉलोजी का चुनाव, 2. कोसी समझौते के परिणामस्वरूप गलत संस्थागत प्रबंध,

तीर्थ का एक अनमोल प्रसाद

जल मंदिर का प्रसादजल मंदिर का प्रसादश्री पद्रे


कर्नाटक राज्य के गडग में स्थित वरी नारायण मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि कुमार व्यास ने इसी मंदिर में बैठकर महाभारत की रचना की। यह ऐतिहासिक मंदिर आज एक बार फिर से इतिहास रच रहा है। कई वर्षों में इस मंदिर के कुंए का पानी खारा हो गया था। इतना खारा कि यदि उस पानी में ताबें का बरतन धो दिया जाए तो वह काला हो जाता था। तब मंदिर के खारे पानी के निस्तार के लिए वहां एक बोरवैल खोदा गया। उस कुंए में पानी होते हुए भी उसका कोई उपयोग नहीं बचा था। बोरवैल चलता रहा। और फिर उसका पानी भी नीचे खिसकने लगा। कुछ समय बाद ऐतिहासिक कुंए की तरह यह आधुनिक बोरवैल भी काम का नहीं बचा। कुंए में कम से कम खारा पानी तो था। इस नए कुंए में तो एक बूंद पानी नहीं बचा। मंदिर में न जाने कितने कामों के लिए पानी चाहिए। इसलिए फिर एक दूसरा बोरवैल खोदा गया। कुछ ही वर्षों में वह भी सूख गया।

पहाड़ के माथे पर पानी से तिलक

दक्षिण कन्नडा के किसान ए महालिंगा नाईकदक्षिण कन्नडा के किसान ए महालिंगा नाईकमहालिंगा नाईक पोथी की इकाई-दहाई नहीं जानते लेकिन उन्हें पता है कि बूंदों की इकाई-दहाई सैकड़ा हजार और फिर लाख-करोड़ में कैसे बदल जाती है।

58 साल के अमई महालिंगा नाईक कभी स्कूल नहीं गये। उनकी शिक्षा दीक्षा और समझ खेतों में रहते हुए ही विकसित हुई। इसलिए वर्तमान शिक्षा प्रणाली के वे घोषित निरक्षर हैं। लेकिन दक्षिण कन्नडा जिले के अडयानडका में पहाड़ी पर 2 एकड़ की जमीन पर जब कोई उनके पानी के काम को देखता है तो