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किसान जितनी मौसम की मार झेल रहे हैं, उतनी ​ही कर्ज की भी : प्रीति चौधरी

Author: 
मनोरमा

.गौरवशाली अतीत से समृद्ध बुन्देलखण्ड की धरती पिछले डेढ़ दशक से ज्यादा समय से सूखे की चपेट में है। यह धरती अब अपने अतीत की समृद्धि और शौर्यगाथाओं नहीं, बल्कि गरीबी, भुखमरी, कर्ज, पलायन और हर दूसरे दिन किसानों की आत्महत्याओं की कहानी सुनाती है।

अभी पिछले तीन-चार महीनों में ही लगभग हर दूसरे-तीसरे दिन बुन्देलखण्ड के किसी-न-किसी गाँव से किसान की आत्महत्या की खबर आती रही है और अप्रैल 2003 से मार्च 2015 तक यहाँ के लगभग 3280 किसानों ने आत्महत्या की है।

पिछले साल ओलावृष्टि और फिर सूखा ने हालात और खराब बना दिया। आमतौर पर बुन्देलखण्ड में औसत बारिश 1145.7 मिमी. तक होती है लेकिन पिछले मानसून में यहाँ केवल 643.2 मिमी. बारिश ही दर्ज हुई है और कुछ जिलों में तो केवल 484.1 मिमी. तक।

बुन्देलखण्ड पैकेज : केन्द्र तथा राज्यों को जारी करना होगा श्वेत पत्र – राजेन्द्र सिंह

Author: 
अनिल सिंदूर
1. उजाड़, सुखाड़ तथा बिगाड़ बचाना है तो बुन्देलखण्ड के तालाबों को संरक्षित करना होगा।
2. सदियों से चले आ रहे पानी संचयन तरीके आज भी कारगर



. बुन्देलखण्ड को सूखे तथा असमय वर्षा त्रासदी से बचाने को मिले पैकेज पर केन्द्र तथा राज्यों को श्वेत पत्र जारी करना होगा तभी मालूम हो सकेगा कि असलियत में पैकेज की हकीकत क्या है। यह बात मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित जलपुरुष खिताब प्राप्त राजेन्द्र सिंह ने 150वीं जयंती पर आयोजित मूर्ति अनावरण समारोह में एक औपचारिक वार्ता के दौरान कही।

उन्होंने बताया कि जल संरक्षण को यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार ने 7266 करोड़ रुपए उ.प्र. तथा म.प्र. के 13 जनपदों को दिये थे यदि सरकारों की नीयत अच्छी होती तो आज बुन्देलखण्ड की जो स्थिति है वह न होती। देश में 70 प्रतिशत खेती वर्षा आधारित है जिससे 38 प्रतिशत उत्पादन होता है और 30 प्रतिशत खेती सिंचाई आधारित है जिससे 55 प्रतिशत उत्पादन होता है उस पर बदलते पर्यावरण ने वर्षा आधारित खेती का उत्पादन और कम कर दिया है।

बुन्देलखण्ड की भौगोलिक परिस्थितियों को दृष्टिगत रख नेशनल रेनफिड अथॉरिटी को यह काम सौंपा गया था कि वह वर्षा आधारित खेती के रकबे को कम करने की दिशा में इस पैकेज से कार्य करवाए लेकिन देखा जा रहा है कि पैकेज की राशि तो ख़त्म हो गई लेकिन समस्या जस-की-तस खड़ी है। देखा गया है कि किसी भी राजनैतिक दल की सरकार रही हो इस ओर ध्यान किसी ने भी नहीं दिया।

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि बुन्देलखण्ड को उजाड़, सुखाड़ तथा बिगाड़ से बचाना है तो अब बुन्देलखण्ड के तालाबों को संरक्षित कर उनमें वर्षाजल का संचयन करना होगा। इस वर्ष औसत वर्षा के सापेक्ष 54 प्रतिशत वर्षा हुई है भले ही वो असमय हुई हो, उस वर्षाजल का संचयन किया होता तो तस्वीर बदलने की ओर हम पहला कदम उठा चुके होते।

पानी का उचित प्रबन्धन बहुत जरूरी है - डॉ. भीष्म कुमार

Source: 
जल चेतना तकनीकी पत्रिका, सितम्बर 2011

. राष्ट्रीय भाषा, हिन्दी में एक जल सम्बन्धी तकनीकी पत्रिका प्रकाशित करने का ख्याल आपको कैसे आया?
विगत दशक में पानी की उपलब्धता एवं जल गुणवत्ता से सम्बन्धित समस्याएँ काफी बढ़ गई हैं जिसका मुख्य कारण आम जनता में जल से सम्बन्धित जानकारियों की कमी है जिससे पानी का अनावश्यक प्रयोग करना एवं अनजाने में ही पानी की गुणवत्ता को खराब करना तथा अनुपयोगी पानी का इस्तेमाल करने पर विभिन्न प्रकार की बीमारियों का शिकार होने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

‘जल चेतना’ पत्रिका के माध्यम से जनता को उपरोक्त के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी देने हेतु संस्थान में हिन्दी में एक जल सम्बन्धी तकनीकी पत्रिका प्रकाशित करने का निर्णय लिया।

इस पत्रिका का क्या प्रारूप होगा और इसकी पृष्ठभूमि एवं अन्तराल कैसे रखा जाएगा?
इस पत्रिका में जल से सम्बन्धित कुछ लेख विशेषज्ञों से आमंत्रित किये जाएँगे एवं कुछ लेख पानी की अलग-अलग समस्याओं एवं उनके समाधान से सम्बन्धित अनुभवों के आधार पर लेखकों से प्राप्त होने तथा उनका चयन करने पर शामिल किया जाएगा।

इसके अतिरिक्त पानी से सम्बन्धित कुछ रोजमर्रा की जिन्दगी में उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी तथा कुछ जानकारी नियमित स्तम्भों द्वारा हर अंक में प्रसारित की जाएगी। अभी इस पत्रिका का अन्तराल साल में दो अंकों का फिर इसे त्रैमासिक करते हुए मासिक बनाने का प्रावधान है।

हिन्दी में तकनीकी लेखों का चयन करना कितना मुश्किल रहा?

जल, जंगल और जमीन का संरक्षण और दोहन विकास के महत्त्वपूर्ण पायदान : हरीश रावत

उत्तराखण्ड के मौजूदा मुख्यमंत्री हरीश रावत को पंडित नारायण दत्त तिवारी के बाद सबसे अधिक अनुभवी राजनेता माना जाता है। हरीश रावत का मानना है कि इस प्रदेश के विकास की गाड़ी गाँवों से होते हुए ही मंजिल तक पहुँच सकती है। उनका यह भी मानना है कि गाँवों की आर्थिकी सुधारने और शिक्षा तथा चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाएँ पहाड़ के गाँवों तक पहुँचाए बिना पलायन रोकना सम्भव नहीं है और इसीलिये उनकी सरकार मैगी या नूडल्स की बजाय राज्य के पहाड़ी उत्पादों ‘मंडुवा और झंगोरा’ की बात करती है। मुख्यमंत्री का कहना है कि ग्राम स्तर तक लोकतंत्र को मजबूत करने और ग्रामवासियों की उनके विकास में सीधी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये शीघ्र ही राज्य का अपना पंचायती राज एक्ट आ रहा है। यही नहीं उनकी सरकार सीमित ज़मीन के असीमित लाभों का मार्ग प्रशस्त करने के लिये भूमि बन्दोबस्त की तैयारी शुरू करने जा रही है। राज्य के विकास का रोडमैप स्वयं मुख्यमंत्री के श्रीमुख से सुनने और प्रदेश की ज्वलन्त समस्याओं के समाधान की उनकी मंशा जानने के लिये पिछले दिनों उनके बीजापुर हाउस स्थित आवास पर उनसे लम्बी बातचीत की। पेश है हरीश रावत से हुई लम्बी बातचीत के प्रमुख अंश

.यमुना-गंगा, कोसी-रामगंगा को कैसे लिंक करें इस पर विचार चल रहा है। नदियों पर जलाशय बनाने की प्रक्रिया जारी है। इससे यह फायदा होगा कि इस विशाल जलराशि का उपयोग हम अपने ही राज्य में कर सकते हैं। पानी पर सरकारें अकूत धन खर्च कर रही हैं।

पहाड़ की भौगोलिक स्थिति के अनुसार और परम्परागत रूप से भी जल संरक्षण की चाल-खाल की पद्धति को बढ़ावा दिया जा रहा है। जल संरक्षण होगा तो ही राज्य की कृषि उत्पादन की क्षमता बढ़ेगी।

हिमालय के लिये केन्द्र में अलग से मंत्रालय हो

Author: 
अनिल अश्विनी शर्मा
Source: 
राजस्थान पत्रिका 11 सितम्बर 2015
नई दिल्ली, पत्रिका। हम लगातार हिमालय की रक्षा के लिये केन्द्र सरकार से अलग मंत्रालय की माँग कर रहे हैं। इस पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए। अलग मंत्रालय होने से हिमालय से जुड़ी तमाम समस्याएँ, जानकारी और कार्यवाही एक ही स्थान पर हो सकेगी। यह बात पर्यावरणविद डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने राजस्थान पत्रिका से विशेष बातचीत में कही।

मैदानी इलाके के लोगों का इसे बचाने में योगदान नगण्य है। उन्होंने कहा कि विकास और पारिस्थितिकी के बीच भी नियंत्रण होना चाहिए। आज हम जिस तौर तरीके से विकास का पहिया घुमा रहे हैं, इससे हिमालय को नुकसान हो रहा है। हिमालय में पिछले दिनों आई प्राकृतिक आपदाओं का कारण पारिस्थितिक असन्तुलन है। यदि हिमालय पर खतरा बढ़ेगा तो दुनिया भी अछूती नहीं रहेगी क्योंकि हिमालय में लगातार जैव विविधता का ह्रास हो रहा है।

श्री अय्यर के बिना यह नदी दिवस

विश्व नदी दिवस, 27 सितम्बर 2015 पर विशेष


. 27 सितम्बर को हर वर्ष आना है अन्तरराष्ट्रीय नदी दिवस बनकर। किन्तु अब श्री रामास्वामी आर. अय्यर नहीं आएँगे। मुद्दा नदी का हो या जलनीति का, कार्यक्रम छोटा हो या बड़ा; बाल सुलभ सरलता.. मुस्कान लिये दुबले-पतले-लम्बे-गौरवर्ण श्री अय्यर सहजता से आते थे और सबसे पीछे की खाली कुर्सियों में ऐसे बैठ जाते थे, मानों वह हों ही नहीं। वह अब सचमुच नहीं हैं। 9 सितम्बर, 2015 को वह नहीं रहे। कई आयोजनों, रचनाओं और आन्दोलनों की ‘बैकफोर्स’ चली गई।

श्री अय्यर यदि कोई फिल्म स्टार, खिलाड़ी, नेता, बड़े अपराधी या आतंकवादी होते, तो शायद यह हमारे टी वी चैनलों के लिये ‘प्राइम न्यूज’ और अखबारों के लिये ‘हेडलाइन’ होती।

नई दिल्ली के लोदी रोड स्थित श्मशान गृह में हुए उनके अन्त्येष्टि संस्कार में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर शोक जताने वालों की सूची अच्छी-खासी लम्बी होती; कैमरों की कतार होती; फ्लैश चमके होते, किन्तु यह सब नहीं हुआ; क्योंकि वह, वे सभी नहीं थे।

पानी वाले मास्टरजी

विश्व साक्षरता दिवस 08 सितम्बर 2015 पर विशेष


. ‘‘अरे जल्दी से टोटी बन्द कर ले, मास्टरजी आ रहे हैं।’’ ऐसी पुकार गाज़ियाबाद के आसपास के गाँवों में अक्सर सुनाई दे जाती है। त्रिलोक सिंह जी, गाज़ियाबाद से सटे गाँव गढ़ी के हैं। गाज़ियाबाद के सरस्वती विद्या मन्दिर में अंग्रेजी के अध्यापक हैं, लेकिन क्या स्कूल और क्या समाज, उनकी पहचान ही ‘पानी वाले मास्टरजी’ की हो गई है।

बीते दस सालों में मास्टरजी भी सौ से ज्यादा गाँवों में पहुँच चुके हैं, पाँच हजार से ज्यादा ग्रामीणों और दस हजार से ज्यादा बच्चों के दिल-दिमाग में यह बात बैठ चुके हैं कि पानी किसी कारखाने में बन नहीं सकता और इसकी फिजूलखर्ची भगवान का अपमान है। उनकी इस मुहिम में उनकी पत्नी श्रीमती शोभा सिंह भी महिलाओं को समझाने के लिये प्रयास करती हैं।

त्रिलोक सिंह जी अपने विद्यालय में बेहद कर्मठता से बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाते हैं और उसके बाद बचे समय के हर पल को अपने आसपास इस बात का सन्देश फैलाने में व्यतीत करते हैं कि जल नहीं बचाया तो जीवन नहीं बचेगा। मास्टर त्रिलोक सिंह जी ना तो किसी संस्था से जुड़े हैं और ना ही कोई संगठन बनाया है.... बस लोग जुड़ते गए कारवाँ बनता गया.... की तर्ज पर उनके साथ सैंकड़ों लोग जुड़े गए हैं।

भारत अनुभव करेगा जलवायु परिवर्तन का गहरा असर

Author: 
अजीज एलबहरी
Source: 
डाउन टू अर्थ
भूगर्भीय जल के भण्डारों का अतिरिक्त दोहन और धरातल के पानी की मानसून की वर्षा पर निर्भरता के कारण देश में ताजे पानी की उपलब्धता घटेगी। फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन (एफएओ) की तरफ से प्रकाशित एक पुस्तक में कहा गया है कि ग्लोबल वार्मिंग से खाद्य उत्पादन प्रभावित होगा और प्रमुख फसलों के पोषक गुणों में कमी लाएगा। एफएओ के व्यापार और बाजार विभाग के वरिष्ठ अर्थशास्त्री और क्लाइमेट चेंज एंड फूड सिस्टम नामक किताब के सम्पादक अजीज एलबहरी ने डाउन टू अर्थ को बताया कि किस तरह आने वाले वर्षों में खाद्य की उपलब्धता जलवायु पर निर्भर करेगी।

बीसवीं सदी में औद्योगिक देशों के किसान तकनीकी नवोन्मेष, बेहतर प्रबन्धन, बाजार तक पहुँच और नीतिगत समर्थन के माध्यम से उत्पादन बढ़ा सकते थे। एशिया में 1960 के दशक के आखिर में और सत्तर के दशक में हरित क्रान्ति के कारण गेहूँ और धान का उत्पादन बढ़ा। आज चुनौती यह है कि हम किस तरह पैदावार बढ़ाएँ और क्षरण होते उन प्राकृतिक संसाधनों को बचाएँ जिन पर भावी उत्पादन क्षमता निर्भर करती है। जलवायु परिवर्तन का खाद्य उत्पादन से क्या रिश्ता है और खाद्य की वैश्विक उपलब्धता निर्धारित करने में इसकी क्या भूमिका है?

कामयाब रहा पोखरों का सामुदायिक प्रबन्धन

Author: 
मोहित कुमार राय
Source: 
डाउन टू अर्थ
कोलकाता के अलाभकारी वसुन्धरा फ़ाउंडेशन के संयोजक मोहित कुमार राय का कहना है कि पिछले दो दशकों में शहर 200 पोखर सालाना खो रहा है। उन्होंने कहा कि बंगाली भाषा में पुकुर कहे जाने वाले यह पोखर शहर का पारिस्थितिकी के लिये अहम हैं। मोहित कुमार राय से सुष्मिता सेनगुप्ता की बातचीत पर आधारित साक्षात्कार

कोलकाता पुकुरों का शहर है। शहर के इतिहास को इसके जलाशयों के इतिहास के माध्यम से कहा जा सकता है। इसके तमाम जगहों के नाम पुकुर से जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिये मनोहरपुकुर, अहीरपुकुर, बोसपुकुर, ठाकुरपुकुर, पद्दपुकुर और तालपुकुर। शहर में 30 सड़कें ऐसी हैं जिनका नाम पुकुरों के नाम पर पड़ा है। शहर में कमला और विमला नाम के ताल भी हैं जिनका नामकरण शासक की पत्नियों के नाम पर किया गया था। यह तालाब ताजमहल से भी पुराने हैं। कोलकाता में कितने पोखर हैं और आज वे किस स्थिति में हैं?

सरकारी विभागों के आँकड़ों में इस बारे में भारी कमियाँ हैं। कोलकाता नगर निगम (केएमसी) ने 2000 के आरम्भ से ही सर्वेक्षण किया लेकिन वह पोखरों की सूची जारी करने को लेकर झिझक रहा है। सन् 2006 में उसने एक सूची जारी की जो कहती है कि निगम क्षेत्र में 3,874 पोखर हैं। लेकिन सूची इन जलाशयों का सही ठिकाना या आकार नहीं बताती।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत काम करने वाले नेशनल एटलस और थिमैटिकक मैप आर्गेनाइजेशन (नाटमो) ने विस्तृत नक्शे के साथ कोलकाता का एटलस प्रकाशित किया। इस एटलस में पोखरों की संख्या 8,731 बताई गई थी। लेकिन नाटमो का अध्ययन 20 साल पुराने आँकड़े के आधार पर किया गया था।