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पानी वाले मास्टरजी

विश्व साक्षरता दिवस 08 सितम्बर 2015 पर विशेष


. ‘‘अरे जल्दी से टोटी बन्द कर ले, मास्टरजी आ रहे हैं।’’ ऐसी पुकार गाज़ियाबाद के आसपास के गाँवों में अक्सर सुनाई दे जाती है। त्रिलोक सिंह जी, गाज़ियाबाद से सटे गाँव गढ़ी के हैं। गाज़ियाबाद के सरस्वती विद्या मन्दिर में अंग्रेजी के अध्यापक हैं, लेकिन क्या स्कूल और क्या समाज, उनकी पहचान ही ‘पानी वाले मास्टरजी’ की हो गई है।

बीते दस सालों में मास्टरजी भी सौ से ज्यादा गाँवों में पहुँच चुके हैं, पाँच हजार से ज्यादा ग्रामीणों और दस हजार से ज्यादा बच्चों के दिल-दिमाग में यह बात बैठ चुके हैं कि पानी किसी कारखाने में बन नहीं सकता और इसकी फिजूलखर्ची भगवान का अपमान है। उनकी इस मुहिम में उनकी पत्नी श्रीमती शोभा सिंह भी महिलाओं को समझाने के लिये प्रयास करती हैं।

त्रिलोक सिंह जी अपने विद्यालय में बेहद कर्मठता से बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाते हैं और उसके बाद बचे समय के हर पल को अपने आसपास इस बात का सन्देश फैलाने में व्यतीत करते हैं कि जल नहीं बचाया तो जीवन नहीं बचेगा। मास्टर त्रिलोक सिंह जी ना तो किसी संस्था से जुड़े हैं और ना ही कोई संगठन बनाया है.... बस लोग जुड़ते गए कारवाँ बनता गया.... की तर्ज पर उनके साथ सैंकड़ों लोग जुड़े गए हैं।

भारत अनुभव करेगा जलवायु परिवर्तन का गहरा असर

Author: 
अजीज एलबहरी
Source: 
डाउन टू अर्थ
भूगर्भीय जल के भण्डारों का अतिरिक्त दोहन और धरातल के पानी की मानसून की वर्षा पर निर्भरता के कारण देश में ताजे पानी की उपलब्धता घटेगी। फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन (एफएओ) की तरफ से प्रकाशित एक पुस्तक में कहा गया है कि ग्लोबल वार्मिंग से खाद्य उत्पादन प्रभावित होगा और प्रमुख फसलों के पोषक गुणों में कमी लाएगा। एफएओ के व्यापार और बाजार विभाग के वरिष्ठ अर्थशास्त्री और क्लाइमेट चेंज एंड फूड सिस्टम नामक किताब के सम्पादक अजीज एलबहरी ने डाउन टू अर्थ को बताया कि किस तरह आने वाले वर्षों में खाद्य की उपलब्धता जलवायु पर निर्भर करेगी।

बीसवीं सदी में औद्योगिक देशों के किसान तकनीकी नवोन्मेष, बेहतर प्रबन्धन, बाजार तक पहुँच और नीतिगत समर्थन के माध्यम से उत्पादन बढ़ा सकते थे। एशिया में 1960 के दशक के आखिर में और सत्तर के दशक में हरित क्रान्ति के कारण गेहूँ और धान का उत्पादन बढ़ा। आज चुनौती यह है कि हम किस तरह पैदावार बढ़ाएँ और क्षरण होते उन प्राकृतिक संसाधनों को बचाएँ जिन पर भावी उत्पादन क्षमता निर्भर करती है। जलवायु परिवर्तन का खाद्य उत्पादन से क्या रिश्ता है और खाद्य की वैश्विक उपलब्धता निर्धारित करने में इसकी क्या भूमिका है?

कामयाब रहा पोखरों का सामुदायिक प्रबन्धन

Author: 
मोहित कुमार राय
Source: 
डाउन टू अर्थ
कोलकाता के अलाभकारी वसुन्धरा फ़ाउंडेशन के संयोजक मोहित कुमार राय का कहना है कि पिछले दो दशकों में शहर 200 पोखर सालाना खो रहा है। उन्होंने कहा कि बंगाली भाषा में पुकुर कहे जाने वाले यह पोखर शहर का पारिस्थितिकी के लिये अहम हैं। मोहित कुमार राय से सुष्मिता सेनगुप्ता की बातचीत पर आधारित साक्षात्कार

कोलकाता पुकुरों का शहर है। शहर के इतिहास को इसके जलाशयों के इतिहास के माध्यम से कहा जा सकता है। इसके तमाम जगहों के नाम पुकुर से जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिये मनोहरपुकुर, अहीरपुकुर, बोसपुकुर, ठाकुरपुकुर, पद्दपुकुर और तालपुकुर। शहर में 30 सड़कें ऐसी हैं जिनका नाम पुकुरों के नाम पर पड़ा है। शहर में कमला और विमला नाम के ताल भी हैं जिनका नामकरण शासक की पत्नियों के नाम पर किया गया था। यह तालाब ताजमहल से भी पुराने हैं। कोलकाता में कितने पोखर हैं और आज वे किस स्थिति में हैं?

सरकारी विभागों के आँकड़ों में इस बारे में भारी कमियाँ हैं। कोलकाता नगर निगम (केएमसी) ने 2000 के आरम्भ से ही सर्वेक्षण किया लेकिन वह पोखरों की सूची जारी करने को लेकर झिझक रहा है। सन् 2006 में उसने एक सूची जारी की जो कहती है कि निगम क्षेत्र में 3,874 पोखर हैं। लेकिन सूची इन जलाशयों का सही ठिकाना या आकार नहीं बताती।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत काम करने वाले नेशनल एटलस और थिमैटिकक मैप आर्गेनाइजेशन (नाटमो) ने विस्तृत नक्शे के साथ कोलकाता का एटलस प्रकाशित किया। इस एटलस में पोखरों की संख्या 8,731 बताई गई थी। लेकिन नाटमो का अध्ययन 20 साल पुराने आँकड़े के आधार पर किया गया था।

कभी भी जमीन का मुद्दा नहीं होगा अप्रासंगिक: दिवाकर

Author: 
कुमार कृष्णन
. आज जब पूरे देश में विकास के मॉडल के नाम पर किसानों से जमीन छीनने और अधिग्रहण की बात की जा रही है। वहीं बिहार जैसे सामंती प्रदेश में देने की प्रक्रिया जारी है। राज्य में 65 फीसदी लोग भूमिहीन हैं और मजदूरी करते हैं। बिहार भूमि के महत्त्वपूर्ण सवाल पर एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के निर्देशक तथा बिहार सरकार द्वारा गठित कोर कमेटी के सदस्य डॉ. डीएम दिवाकर से बातचीत।

बहुत सारे लोग कहते हैं कि बिहार में भूदान और जमीन के सवाल की कोई प्रासंगिकता नहीं है। इस संदर्भ में आपकी क्या राय है?
ऐसी धारणा उन लोगों की है जिनके पास जमीन है या फिर जमींदार किस्म के लोग हैं। जब तक धरती पर भूमिहीन है तब​ तक जमीन की प्रासंगिकता खत्म नहीं होने वाली है। जमीन मनुष्य की पहचान है। भूमि नहीं होने के कारण कई तरह के प्रमाणपत्र नहीं बनते हैं। तो फिर लोग यह सवाल कैसे करते हैं कि भूमि का सवाल प्रासंगिक नहीं है।

इस संदर्भ में विनोबा भावे की अवधारणा क्या रही है?
हमारा देश आध्यात्मिक देश रहा है। दान और पूजा का अपना महत्व है। इसे विनोबा भावे ने समझा। जिस समय आंध्र प्रदेश के पोचमपल्ली में हिंसक दौर चल रहा था, उस समय विनोबा भावे के मन में आया कि क्यों नहीं दान से इन विसंगतियों को दूर किया जाय। उन्होंने इस हिंसक वातावरण में हस्तक्षेप किया और दान की प्रवृत्ति विकसित करने के प्रयोग को अमल में लाया, जिसके फलस्वरूप उन्हें 100 एकड़ जमीन प्राप्त हुई। इसी प्रयोग को उन्होंने पूरे देश में लागू किया। भूदान आन्दोलन सच्चे अर्थों में राष्ट्रव्यापी और राष्ट्रीय आन्दोलन था।

बिहार में क्या हुआ था उन दिनों?

इन अँखियन जस जन-गन-मन देखा’ : स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद

माँ गंगा की निर्मलता-अविरलता के संघर्ष की कहानी एक शताब्दी से अधिक पुरानी हो चुकी है। इतने लम्बे समय में अपने प्राणों को संकट में डालकर भी गंगा की अविरलता-निर्मलता सुनिश्चित करने के संकल्प पर डटे रहने वाले नाम चुनिंदा ही हैं। कह सकते हैं कि उनमे से एक नाम स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद का भी है। पूर्व में हम सभी उन्हें प्रोफेसर जीडी अग्रवाल के नाम से जानते रहे हैं। संयोग से स्वामी जी के जीवन और गंगा संघर्ष के बारे में बहुत कम लिखा और सुना गया है। सुखद है कि हिन्दी वाटर पोर्टल से बतौर लेखक-सलाहकार जुड़े श्री अरुण तिवारी को दो वर्ष पूर्व उनसे लम्बी बात करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने बातचीत को शृंखलाबद्ध तरीके से प्रस्तुत करने का निर्णय लिया है। प्रस्तुत है इस बातचीत का एक परिचय :

.खास परिचितों के बीच ‘जी डी’ के सम्बोधन से चर्चित सन्यासी स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के गंगापुत्र होने के बारे में शायद ही किसी को सन्देह हो। बकौल श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी, वह भी गंगापुत्र हैं। “मैं आया नहीं हूँ; मुझे माँ गंगा ने बुलाया है।’’ - श्री मोदी का यह बयान तो बाद में आया, गंगा पुत्र स्वामी सानंद की आशा पहले बलवती हो गई थी कि श्री मोदी के नेतृत्व वाला दल केन्द्र में आया, तो गंगा जी को लेकर उनकी माँगों पर विचार अवश्य किया जाएगा। हालांकि उस वक्त तक राजनेताओं और धर्माचार्यों को लेकर स्वामी सानंद के अनुभव व आकलन पूरी तरह आशान्वित करने वाले नहीं थे; बावजूद इसके यदि आशा थी तो शायद इसलिये कि इस आशा के पीछे शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी का वह आश्वासन तथा दृढ़ संकल्प था, जो उन्होंने स्वामी सानंद के कठिन प्राणघातक उपवास का समापन कराते हुए वृन्दावन में क्रमशः दिया व दिखाया था।

कोसी के लिए समझदारी और सावधानी

Author: 
इंदू भाटी
Source: 
इकोनॉमिक और पॉलिटिकल वीकली से साभार, शिवमपूर्णा, अगस्त 2014
जल-विद्युत विशेषज्ञ दीपक ग्यावली, नेपाल के पूर्व जल संसाधन मन्त्री रह चुके हैं तथा नेपाल के जल संरक्षण फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं। कोसी की बाढ़ और भविष्य की तैयारियों पर दीपक ग्यावली के बेबाक विचार :-

. कोसी ने अपना तटबंध क्यों तोड़ा? मरम्मत कार्य के लिए कौन जिम्मेदार था, भारत या नेपाल?
दीपक ग्यावली: इस बात को समझने के लिए जरा पीछे मुड़कर देखना जरूरी है। तब हमें यह अनुभव होगा कि यह आपदा तीन बातों का नापाक मेल है:- 1. इस प्रकार के जल- पारिस्थितिक शासन के लिए गलत टेक्नोलॉजी का चुनाव, 2. कोसी समझौते के परिणामस्वरूप गलत संस्थागत प्रबंध, जो इस तरह की सीमांतर नदी व्यवस्था का प्रबंधन करने के लिए उपयुक्त नहीं हैं तथा 3. पिछली अर्ध शताब्दी से सार्वजनिक-सेवा में गलत आचरण, जिसमें भ्रष्टाचार के पहलू शामिल हैं और साथ ही बिहार राजनीति, जिसका दिल्ली के लोग मजाक उड़ाना पसंद करते हैं, पर जो स्वतंत्र भारत का एक आंतरिक हिस्सा बन गए हैं। आखिरकार जब अंग्रेज भारत छोड़कर गए तो बिहार भारत का सबसे उन्नत राज्य था, पटना विश्वविद्यालय भारत के शीर्ष विश्वविद्यालयों में से एक था और जब मेरी दादी, ताउलीहावा में बीमार थीं तो मेरे पिताजी और दादाजी उन्हें इलाज के लिए, पास के लखनऊ या दिल्ली नहीं, बल्कि पटना ले गए क्योंकि वहाँ का अस्पताल सर्वश्रेष्ठ था। पर क्या यही बात हम आज स्वतंत्र भारत के बिहार के लिए कह सकते हैं? मेरी दलील है कि बिहार की समृद्धि में यह गिरावट बिहारी राजनीति में वृद्धि से मेल खाती है, जिसे कोसी परियोजना काफी तादाद में साथ लेकर आई।

‘निर्मल गंगा, अविरल गंगा' गंगा सभा का संकल्प

Author: 
शिव शंकर जायसवाल
Source: 
यथावत, 16-31 मार्च 2015
गंगा सभा हरिद्वार के तीर्थ पुरोहितों की संस्था है। इसकी स्थापना 1916 में महामना मदन मोहन मालवीय ने की थी। गंग नहर के निर्माण के दौरान ब्रिटिश सरकार गंगा पर जो बाँध बना रही थी, उसके कारण हर की पौड़ी से गंगा की धारा की बजाय नहर प्रवाहित होने की बात सामने आई। हिन्दू यह नहीं चाहते थे। उनका कहना था कि उनकी धार्मिक आस्था का सम्मान हो और हर की पौड़ी से गंगा की मूल धारा प्रवाहित हो। इसके लिए मालवीय जी की अगुआई में वृहद आंदोलन हुआ और सरकार को उसके सामने झुकना पड़ा। तत्पश्चात मालवीय जी के सुझाव पर श्री गंगा सभा की स्थापना की गई। हरिद्वार के तीर्थ रूप की रक्षा तथा हर की पौड़ी के प्रबन्धन का दायित्व पुरोहितों की इस संस्था के जिम्मे है। वे तीर्थ की परम्पराओं का निर्वाह करते हैं, धार्मिक कार्यों में तीर्थ यात्रियों की सहायता करते हैं और अन्य प्रकार से उनकी सहायता तथा उनके हितों की रक्षा करते हैं। धार्मिक मेलों, विशेषकर कुम्भ-अर्धकुम्भ पर्वों के आयोजन में प्रशासन अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ गंगा सभा से भी परामर्श करता है। गंगा सभा के अध्यक्ष ‘गाँधीवादी पुरुषोत्तम शर्मा’ से ‘शिव शंकर जायसवाल’ ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के अभियान को लेकर यह बातचीत की है :-

गंगा के जल को पवित्र मानकर हम उसका आचमन करते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार वह पीने क्या, नहाने लायक भी नहीं रह गया है। आपका क्या कहना है?


गंगाजल तो पवित्र था, है और रहेगा। हम ही उसे अपवित्र कर रहे हैं। शुरुआत 1935 में, हरिद्वार में सीवरलाइन डालते समय अंग्रेजों ने की। उन्होंने शहर का मल-जल गंगा में डाल दिया। उसके बाद जो सरकारें आईं, उन्होंने भी यह क्रम जारी रखा। आज जो कल-कारखाने हैं, अपनी सारी गन्दगी गंगा में बहाकर उसे जहरीला बना रहे हैं।

कांग्रेस सरकार में राजीव गाँधी का ध्यान तो गंगा के प्रदूषण की ओर गया था?

यमुना के स्वाभाविक प्रवाह को बनाए रखना होगा : मनोज मिश्र

Author: 
जितेन्द्र चतुर्वेदी
Source: 
यथावत, 16-31 मार्च 2015
मनोज मिश्र पर्यावरण से सम्बन्धित मामलों के विशेषज्ञ हैं। वे भारतीय वन सेवा से भी जुड़े रहे। वर्तमान में यमुना जिये अभियान चला रहे हैं। यमुना के मौजुदा हाल पर ‘मनोज मिश्र’ से यथावत के संवाददाता ‘जितेन्द्र चतुर्वेदी’ ने बातचीत की। उसके प्रमुख अंश :

‘यमुना बचाओ अभियान’ आप बहुत दिनों से चला रहे हैं। इस दौरान आपका क्या अनुभव रहा है?


हाँ, यह सही बात है कि यमुना को लेकर पिछले कई सालों से मैं काम कर रहा हूँ। 2007 में हमलोगों ने ‘यमुना जिये अभियान’ शुरू किया था। हालाँकि शुरुआती दौर में हमारी बात सुनने के लिए कोई तैयार नहीं था। यमुना के सन्दर्भ में हम जो सन्देश देना चाहते थे, वह लोगों तक नहीं पहुँचते थे, लेकिन समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है। अब नागरिक समाज हो या सरकार दोनों ही इस गम्भीर मुद्दों पर हमारी बात सुनती है। मीडिया का भी काफी सहयोग मिला है। मूल वजह यही है कि ‘यमुना जिये अभियान’ इतना आगे बढ़ पाया है।

गंगा के प्रवाह तन्त्र में यमुना की क्या भूमिका है?


यमुना तो गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है। यह गंगा से कहीं ज्यादा पानी अपने साथ लाती है और इलाहाबाद में गंगा के प्रवाह को नया जीवन देती है। ऐसे में यदि यमुना का प्रवाह और उसके जल की गुणवत्ता प्रभावित होगी, तो गंगा पर इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।

दिल्ली के सन्दर्भ में यमुना की क्या उपयोगिता है?


इतना समझ लीजिए कि यह नदी दिल्ली की जीवन रेखा है। यह दिल्ली में पानी का एक मात्र स्रोत है। यमुना नदी दिल्ली की 70 फीसदी पानी की जरूरतों को पूरा करती है। इन सबके अलावा यमुना दिल्ली की पहचान है। इस शहर की सभ्यता और संस्कृति का पालना है।

दिल्ली में जारी पेड़-पौधे की कटाई और अवैध खनन का यमुना पर क्या प्रभाव पड़ा है?

स्वतन्त्र आपदा निवारण मन्त्रालय बनाए केन्द्र सरकार

Author: 
बीडब्लू पाण्डेय
Source: 
नेशनल दुनिया, 30 अप्रैल 2015
कच्छ में भूकम्प आने के बाद भारत सरकार आपदा प्रबन्धन को लेकर जागी। नेपाल में आये भूकम्प की विनाशलीला को देखते हुए भारत सरकार को गम्भीर हो जाना चाहिए। खासतौर से दिल्ली इस खतरे को किसी भी हाल में नहीं झेल पाएगी। इसलिए केन्द्र सरकार को चाहिए कि वो अलग से एक स्वतन्त्र आपदा निवारण मन्त्रालय स्थापित करे। दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स के आपदा प्रबंधन व एन्वायरमेंट विशेषज्ञ बीडब्लू पाण्डेय से नेशनल दुनिया के वरिष्ठ संवाददाता धीरेन्द्र मिश्र से बातचीत पर आधारित लेख।

6.5 पर ही जमींदोज हो जाएगी आधी दिल्ली


दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के बीडब्लू पाण्डेय का नेपाल के विनाशकारी भूकम्प के बारे में कहना है कि दिल्ली में बहुत सारे एरिया ऐसे हैं जहाँ 6.5 रिक्टर स्केल पर ही नेपाल जैसे हालात हो जाएंगे। पुरानी दिल्ली और पूर्वी दिल्ली का कई इलाका पूरी तरह से जमींदोज हो जाएगा। यही हाल कमोबेश दक्षिणी दिल्ली के मुनिरका, बेर सराय, जिया सराय, कटवारिया सराय, अदचिनी, शेख सराय, जेएनयू, मोहम्मदपुर आदि क्षेत्रों का भी है। क्योंकि इन क्षेत्रों में निजी बिल्डर्स ने मल्टी स्टोरी मकान बना दिए हैं। इन क्षेत्रों में बने किसी भी मल्टी स्टोरी भवनों में भूकम्परोधी तकनीक तो दूर जरूरी मानदण्डों का भी पालन नहीं किया है। काठमाण्डू से 17 किलोमीटर के एक गाँव की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वहाँ पर क्या हुआ? एक भी घर तबाह होने से नहीं बचा। आपको पता है क्यों? क्योंकि ये सभी मकान लकड़ी के बने थे। घर के आस-पास ओपन स्पेस था। लोग भूकम्प आते ही घर से भाग निकले। लेकिन इसी सन्दर्भ के दिल्ली की बात करेंगे तो वलनरेबिलिटी प्वाइंट दस हो जाएगा, यानी यहाँ पर जान-माल का नुकसान बड़े पैमाने पर होगा। ऐसा इसलिए कि दिल्ली भवन ज्यों-ज्यों ऊपर की ओर बढ़ता है वह चौड़ा होता जाता है।

भवन सीमेंट के हैं पर बेस है कमजोर