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फ्लोरिसिस से तुलसी की जंग

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डाउन टू अर्थ
सरदार पटेल महाविद्याल में पर्यावरण विज्ञान के सहायक प्रोफेसर राहुल कुम्बले से अपर्णा पल्लवी से बातचीत पर आधारित लेख।

.भारत के 19 राज्यों के 196 जिलों के पीने के पानी में फ्लोराइड का स्तर सुरक्षित समझे जाने वाले 1.5 अंश प्रति दस लाख (पीपीएम) के मुकाबले बहुत ज्यादा है। लेकिन इस इलाके के गरीब लोगों को इस हानिकारक तत्व से छुटकारा पाने के लिये अब महंगे उपकरणों की जरूरत नहीं है। उन्हें अगर कुछ चाहिए तो तुलसी का पौधा। चन्द्रपुर महाराष्ट्र के सरदार पटेल महाविद्यालय में पर्यावरण विज्ञान के सहायक प्रोफेसर राहुल कुम्बले ने अपर्णा पल्लवी को बताया कि तुलसी किस तरह गुणकारी है

यह अध्ययन क्यों?


फ्लोरिसिस जो कि दाँत और हड्डियों के ढाँचे को नुकसान पहुँचाती है दुनिया के 25 देशों में स्थानीय बीमारी के तौर पर है। अमेरिका के गैर मुनाफा वाले संगठन फ्लोराइड एक्शन नेटवर्क के एक अनुमान के अनुसार भारत में 2.50 करोड़ लोग फ्लोरोसिस से प्रभावित हैं और बाकी 6.6 करोड़ लोग इसके खतरे में हैं।

आप की पद्धति कैसे काम करती है?


यह सरल है। हमें महज इतना करना है कि पवित्र तुलसी की पत्तियों को या तो पानी के साथ थोड़ी देर तक हिलाना है या खौलाना है। यह तकरीबन 20 लीटर प्रदूषित पानी को ठीक करने के लिये काफी है। इस पद्धति का असर जानने के लिये हमने फ्लोराइड की अलग-अलग मात्रा वाले पानी के तमाम सैंपलों के साथ प्रयोग किया।

जब पाँच पीपीएम फ्लोराइड मात्रा वाले 100 मिलीलीटर पानी को 75 मिलीग्राम ताजी पत्तियों के साथ हिलाया गया तो करीब 95 प्रतिशत फ्लोराइड 20 मिनट में खत्म हो गया। जबकि तुलसी के डंठल और सूखी पत्तियों में उसी पानी के सैंपल से फ्लोराइड हटाने की 74 से 78 प्रतिशत क्षमता होती है।

तुलसी की पत्तियाँ क्यों?

मैया नहीं, वोट दिलाने वाली नदी है गंगा

जल प्रबन्धन को लेकर नदियों को जोड़ना और मोक्षदायिनी गंगा की सफाई मोदी सरकार अपने साथ चुनाव प्रचार से ही लेती आई है। इसे लेकर चाहे केन्द्र सरकार और कुछ राजनैतिक दलों में उत्साह हो, लेकिन कई मानते हैं कि यह न तो व्यवहारिक और न ही सम्भव- दोनों नदियों को जोड़ना और गंगा की सफाई! इन दोनों ही मुद्दों पर राजेन्द्र सिंह से नीतिश द्वारा बातचीत पर आधारित लेख।

. देश में लोकशाही की शुरुआत से अब तक परम्परागत जल-स्रोतों को आप किस दृष्टि से देखते हैं?
भारत में जल प्रबन्धन सामुदायिक और विकेन्द्रीत था। यहाँ पर राजा, समाज और महाजन तीनों मिलकर जल प्रबन्धन करते थे। पानी के काम के लिए राजा जमीन देता, समाज पसीना देता और महाजन पैसा देता था। इस तरह भारत का जल प्रबन्धन चलता था। अंग्रेजी हुकूमत से पहले जल लोगों का था। लोग ही उसके बारे में साझा निर्णय करते थे। फिर अंग्रेजों ने कहना शुरू किया कि जो भारतीय लोग हैं, उन्हें पानी का प्रबन्धन करना नहीं आता। ये सपेरे हैं और ये गन्दा पानी पीते हैं। इससे अपने लोगों में परम्परागत जल प्रबन्धन को लेकर शंकाएँ पैदा शुरू होने लगीं।

जैसे-जैसे शिक्षा बढ़ी, वैसे-वैसे परम्परागत जल प्रबन्धन से हमारा विस्वास हटता चला गया। और फिर हम पाईप लाईन की पानी सप्लाई जैसी चीजों में फँसने लगे। हम लोगों को तालाब, कुएँ, बावड़ी से पानी लाने में पसीना बहाना पड़ता था। जैसे-जैसे शिक्षा बढ़ी, ‘बिना करे खाने का स्वभाव बढ़ा’, वैसे-वैसे बिना करे पानी मुल जाए उसकी भी आदत पड़ गई। और फिर हमने नए तालाबों को बनाने, पुरानों की मरम्मत कराना छोड़ दिया। बल्कि तालाबों पर पार्क बनने लगे, कब्जे हो गए। जिससे हम बेपानी हो गए। हमारे भूजल के भण्डार खाली हो गए और एक तरह से पानीदार लोग बेपानी हो गए।

हमारा जल प्रबन्धन, दृष्टिकोण

Source: 
छत्तीसगढ़ साक्षात्कार, जुलाई-अगस्त 2014
जल प्रबन्धन को लेकर नदियों को जोड़ना और मोक्षदायिनी गंगा की सफाई मोदी सरकार अपने साथ चुनाव प्रचार से ही लेती आई है। इसे लेकर चाहे केन्द्र सरकार और कुछ राजनैतिक दलों में उत्साह हो, लेकिन कई मानते हैं कि यह न तो व्यवहारिक और न ही सम्भव- दोनों नदियों को जोड़ना और गंगा की सफाई! इन दोनों ही मुद्दों पर प्रख्यात जल विशेषज्ञ अनुपम मिश्र से नीतिश द्वारा बातचीत पर आधारित लेख।

.वर्तमान में भारत को किस प्रकार के जल प्रबन्धन की जरूरत आप महसूस कर रहे हैं?
हम सभी लोग जानते हैं कि हमारे देश में एक तरह की जलवायु नहीं है। हर साल मौसम बदलता रहता है, जिससे बारिश कहीं ज्यादा तो कहीं कम होती है। हमारे यहाँ मोटे तौर पर जैसलमेर में न्यूनतम वार्षिक औसत 15 सेमी से लेकर मेघालय, जिसका नाम ही मेघों पर है, वहाँ पानी मीटरों में गिरता है। सेंटीमीटर में नहीं! इसमें छत्तीसगढ़ भी आता है, जहाँ 200 से 400 सेमी तक बरसात होती है। ऐसी जगहों पर जल-प्रबन्धन न कोई एक दिन में बन सकने वाली व्यवस्था नहीं है।

बिहार वन विभाग के आयोजनों में नहीं दिखेंगे बोतलबन्द पानी

Author: 
कुमार कृष्णन

जल की शुद्धता के प्रति आज हमें सचेत नहीं किया जा रहा है, भयभीत किया जा रहा है। यह भय हमें एक खतरे से भले ही बचा रही हो, लेकिन निश्चित रूप से भय और अविश्वास के एक बड़े खतरे की ओर धकेल रही है, जब हम अपने पर ही अविश्वास करने लगते हैं। हमारी सारी समझ कुंद पड़ जाती हैै। यह मान लेते हैं कि सामने बह रहे पानी में स्वाइन फ्लू से लेकर पोलियो और कैंसर तक के वायरस हैं, जबकि बोतलबन्द पानी पूर्णत: सुरक्षित है।

लीमा, भारत और अमेरिका-चीन करार

Author: 
नागराज अडवे
Source: 
आउटलुक, दिसम्बर 2014
गरीब भारतीयों और तीसरी दुनिया वालों के लिए विनाशकारी है बड़ी ताकतों का समझौता

आउटलुक टीम द्वारा नागराज अडवे के साक्षात्कार पर आधारित लेख।

. अमेरिका-चीन द्वारा हाल में जलवायु परिवर्तन पर की गई घोषणा के मायने क्या हैं?
12 नवम्बर, 2014 को अमेरिका और चीन द्वारा जलवायु परिवर्तन पर की गयी संयुक्त घोषणा के मूल में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के प्रभावों को कम करना है। इसमें कहा गया है कि अमेरिका 2025 तक अपने सालाना उत्सर्जन को 2005 के स्तर से 26-28 फीसदी कम करेगा। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2005 में अमेरिका का कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन 599.9 करोड़ टन था।

अपनी तरफ से चीन ने वादा किया है कि वह अपने कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को 2030 तक या सम्भव हुआ तो उससे पहले अधिकतम स्तर पर ले जाएगा। हालाँकि इसमें यह स्पष्ट नहीं है कि अधिकतम स्तर क्या होगा। चीन ने यह इरादा भी जाहिर किया है कि 2030 तक वह अपने प्राथमिक ऊर्जा उपभोग में गैर-जीवावशेष ईंधन की हिस्सेदारी बढ़ाकर 20 फीसदी तक ले जाएगा। चिन्ता की बात यह है कि इसमें नाभिकीय ऊर्जा और बड़ी पनबिजली परियोजनाएँ शामिल हैं।

यह घोषणा हमारी पृथ्वी के लिए विनाशकारी क्यों है?

प्लांट लगने के बावजूद बढ़ रहा है फ्लोरोसिस का खतरा- डॉ. अशोक घोष

Author: 
पुष्यमित्र
. यह देखकर अच्छा लगता है कि बिहार की राजधानी पटना के अनुग्रह नारायण सिंह कॉलेज में पयार्वरण एवं जल प्रबंधन विभाग भी है। इस विभाग में मिलते हैं डॉ. अशोक कुमार घोष, जो पिछले तेरह-चौहद सालों से बिहार के विभिन्न इलाकों में पेयजल में मौजूद रासायनिक तत्वों और उनकी वजह से यहां के लोगों को होने वाली परेशानियों पर लगातार न सिर्फ शोध कर रहे हैं, बल्कि लोगों को जागरूक कर रहे हैं और इस समस्या का बेहतर समाधान निकालने की दिशा में भी अग्रसर हैं।

राज्य की गंगा पट्टी के इर्द-गिर्द बसे इलाकों में पानी में आर्सेनिक की उपलब्धता और आम लोगों पर पड़ने वाले इसके असर पर इन्होंने सफलतापूर्वक सरकार और आमजन का ध्यान आकृष्ट कराया है। पिछले तीन-चार साल से वे पानी में मौजूद एक अन्य खतरनाक रसायन फ्लोराइड की मौजूदगी और उसके कुप्रभावों पर काम कर रहे हैं। उनके प्रयासों का नतीजा है कि बिहार की सरकार भी इन मसलों पर काम करने की दिशा में सक्रिय हुई है और पूरे राज्य के जलस्रोतों का परीक्षण कराया गया है।

‘पानी’ एक भविष्योन्मुखी फिल्म है: शेखर कपूर

Author: 
रवीन्द्र त्रिपाठी
Source: 
कल्पतरु एक्सप्रेस, 23 नवंबर 2014
. गोवा का मेरियट होटल मांडवी नदी के किनारे है और यहां की लॉबी में खड़े होकर लगता है कि आप समुद्र के सामने हैं। एक विशाल जल-राशि के सामने अगर ‘पानी’ फिल्म बना रहे शेखर कपूर से बातचीत हो ये सुखद संयोग ही है। शेखर बहुत ही आत्मीय ढंग से बात करते हैं। होटल की लॉबी में मिलते ही कहते हैं अरे ‘मैं अपना मोबाइल अपनी कार में ही भूल गया। लेकर आता हूं’। पेश है शेखर कपूर से रवीन्द्र त्रिपाठी की खास बातचीत।

आपकी फिल्म ‘पानी’ कब बन रही है?


यशराज फिल्मस के पास प्रोजेक्ट है। वे निर्माता हैं और जब वे शुरू करना चाहेंगे तो मैं भी शुरू हो जाऊंगा। चूंकि ये महंगी फिल्म है, सौ-डेढ़ सौ करोड़ की और इसमें कई स्पेशल इफेक्ट होंगे, इसलिए निर्माता को भी कई बातें सोचनी पड़ती है। लेकिन इस फिल्म को लेकर कई वीडियो बना दिए हैं। अगर कल को मैं न भी रहूं तो कोई दूसरा निर्देशक जब इसे हाथ में ले तो उसे पता रहे कि मेरा विजन क्या था।

भावी फिल्म भविष्य में होनेवाले पानी के संकट के बारे में है?


इसमें मोटा-मोटी बात तो ये है कि भविष्य के ऐसे शहर की कल्पना की गई है, जिसमें कुछ लोगों का पानी पर नियंत्रण होगा और बाकी लोगों के पास प्यास। जिनका पानी पर अधिकार होगा वे ऊपरी शहर में रहेंगे और बाकी प्यासे लोग निचले शहर में। जिनके पास पानी होगा, वही शहर पर भी अधिकार रखेंगे। जैसे हमने लोकतंत्र को सिर्फ वोट तंत्र में बदल दिया है, जिस पर कुछ ही लोग काबिज हैं, वैसे ही पानी का मसला भी ताकतवर लोगों के हाथों में फंसता जाएगा। ऊपरी शहर और निचले शहर में संघर्ष होगा, लेकिन जो प्यासे होंगे वे पानी पर अधिकार वालों के हाथों दबाए जाएंगे।

आप क्या पढ़ते हैं?

कारसेवा का करिश्मा : निर्मल कालीबेई

.होशियारपुर के धनोआ गांव से निकलकर कपूरथला तक जाती है 160 किमी लंबी कालीबेई। इसेे कालीबेरी भी कहते हैं। कुछ खनिज के चलते काले रंग की होने के कारण ‘काली’ कहलाई। इसके किनारे बेरी का दरख्त लगाकर गुरुनानक साहब ने 14 साल, नौ महीने और 13 दिन साधना की। एक बार नदी में डूबे, तो दो दिन बाद दो किमी आगे निकले। मुंह से निकला पहला वाक्य था: “न कोई हिंदू, न कोई मुसलमां।’’ उन्होंने ‘जपजीसाहब’ कालीबेईं के किनारे ही रचा। उनकी बहन नानकी भी उनके साथ यहीं रही। यह 500 साल पुरानी बात है।

अकबर ने कालीबेईं के तटों को सुंदर बनाने का काम किया। व्यास नदी इसे पानी से सराबोर करती रही। एक बार व्यास ने जो अपना पाट क्या बदला; अगले 400 साल कालीबेईं पर संकट रहा।

किसान वैज्ञानिक से खास बातचीत

Author: 
कुसुमलता सिंह
Source: 
कुरुक्षेत्र, फरवरी 2011
कुछ लोगों की निगाह में नई चीजों का आविष्कार सिर्फ पढ़े-लिखे लोग ही कर सकते हैं, लेकिन इसी देश में कई ऐसे लोग हैं जो पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन रिसर्च के नाम पर एक बड़ी उपलब्धि है उनके खाते में। ऐसे ही एक कारीगर हैं मदनलाल कुमावत। वे बहुफसली थ्रेशर बनाकर आज भारत ही नहीं दुनियाभर में छाए हुए हैं। उन्हें फोब्स ने प्रमुख शक्तिशाली ग्रामीण भारतीय उद्यमी माना है। राजस्थान के सीकर जिले के छोटे से गांव दांता निवासी मदनलाल को कभी यह अंदाजा ही नहीं था कि वह जो कुछ भी कर रहे हैं वह एक दिन उन्हें विश्व-स्तर पर ख्याति दिलाएगा। बहुफसली थ्रेशर की वजह से उन्हें ब्लॉक से लेकर जिला स्तर तक के कई पुरस्कार दिए जा चुके हैं। 10 नवंबर, 2010 को कृषि भवन में आयोजित कार्यक्रम में कृषि मंत्री ने भी उनका सम्मान किया। आइए, जानते हैं कि मदनलाल कुमावत ने किस तरह से यह उपलब्धि हासिल की। जानते हैं उन्हीं की जुबानी

मदनलाल कुमावत जी आज आपका काम और नाम दुनियाभर में छाया हुआ है। कैसा महसूस कर रहे हैं?
. कहते हैं कि मेहनत से किया गया काम कभी बेकार नहीं जाता है। मैंने मेहनत की। मेरा काम लोगों को पंसद आया और आज जो कुछ भी हूं आप लोगों के सामने हूं। पहले गांव में नाम हुआ, फिर ब्लॉक से जिले में। राज्य में पहचान बनी और फिर देशभर में। अब तो दुनियाभर में मेरा नाम पहुंच गया है। सच कहूं, जब भी मेरे काम की तारीफ होती है मैं गौरवान्वित महसूस करता हूं। इसके लिए पहले भी कई पुरस्कार मिल चुके हैं। जब पता चला कि दुनिया के प्रसिद्ध लोगों के बीच हमारा नाम पहुंच गया है तो निश्चित रूप से बहुत प्रसन्नता हो रही है। मुझे इतनी खुशी है कि उसे बयां नहीं कर सकता।

आप अपने बारे में कुछ बताएं। आपकी शिक्षा कहां तक हुई और किस तरह से आपका यह सफर शुरू हुआ?