Latest

बिहार वन विभाग के आयोजनों में नहीं दिखेंगे बोतलबन्द पानी

Author: 
कुमार कृष्णन

जल की शुद्धता के प्रति आज हमें सचेत नहीं किया जा रहा है, भयभीत किया जा रहा है। यह भय हमें एक खतरे से भले ही बचा रही हो, लेकिन निश्चित रूप से भय और अविश्वास के एक बड़े खतरे की ओर धकेल रही है, जब हम अपने पर ही अविश्वास करने लगते हैं। हमारी सारी समझ कुंद पड़ जाती हैै। यह मान लेते हैं कि सामने बह रहे पानी में स्वाइन फ्लू से लेकर पोलियो और कैंसर तक के वायरस हैं, जबकि बोतलबन्द पानी पूर्णत: सुरक्षित है।

लीमा, भारत और अमेरिका-चीन करार

Author: 
नागराज अडवे
Source: 
आउटलुक, दिसम्बर 2014
गरीब भारतीयों और तीसरी दुनिया वालों के लिए विनाशकारी है बड़ी ताकतों का समझौता

आउटलुक टीम द्वारा नागराज अडवे के साक्षात्कार पर आधारित लेख।

. अमेरिका-चीन द्वारा हाल में जलवायु परिवर्तन पर की गई घोषणा के मायने क्या हैं?
12 नवम्बर, 2014 को अमेरिका और चीन द्वारा जलवायु परिवर्तन पर की गयी संयुक्त घोषणा के मूल में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के प्रभावों को कम करना है। इसमें कहा गया है कि अमेरिका 2025 तक अपने सालाना उत्सर्जन को 2005 के स्तर से 26-28 फीसदी कम करेगा। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2005 में अमेरिका का कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन 599.9 करोड़ टन था।

अपनी तरफ से चीन ने वादा किया है कि वह अपने कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को 2030 तक या सम्भव हुआ तो उससे पहले अधिकतम स्तर पर ले जाएगा। हालाँकि इसमें यह स्पष्ट नहीं है कि अधिकतम स्तर क्या होगा। चीन ने यह इरादा भी जाहिर किया है कि 2030 तक वह अपने प्राथमिक ऊर्जा उपभोग में गैर-जीवावशेष ईंधन की हिस्सेदारी बढ़ाकर 20 फीसदी तक ले जाएगा। चिन्ता की बात यह है कि इसमें नाभिकीय ऊर्जा और बड़ी पनबिजली परियोजनाएँ शामिल हैं।

यह घोषणा हमारी पृथ्वी के लिए विनाशकारी क्यों है?

प्लांट लगने के बावजूद बढ़ रहा है फ्लोरोसिस का खतरा- डॉ. अशोक घोष

Author: 
पुष्यमित्र
. यह देखकर अच्छा लगता है कि बिहार की राजधानी पटना के अनुग्रह नारायण सिंह कॉलेज में पयार्वरण एवं जल प्रबंधन विभाग भी है। इस विभाग में मिलते हैं डॉ. अशोक कुमार घोष, जो पिछले तेरह-चौहद सालों से बिहार के विभिन्न इलाकों में पेयजल में मौजूद रासायनिक तत्वों और उनकी वजह से यहां के लोगों को होने वाली परेशानियों पर लगातार न सिर्फ शोध कर रहे हैं, बल्कि लोगों को जागरूक कर रहे हैं और इस समस्या का बेहतर समाधान निकालने की दिशा में भी अग्रसर हैं।

राज्य की गंगा पट्टी के इर्द-गिर्द बसे इलाकों में पानी में आर्सेनिक की उपलब्धता और आम लोगों पर पड़ने वाले इसके असर पर इन्होंने सफलतापूर्वक सरकार और आमजन का ध्यान आकृष्ट कराया है। पिछले तीन-चार साल से वे पानी में मौजूद एक अन्य खतरनाक रसायन फ्लोराइड की मौजूदगी और उसके कुप्रभावों पर काम कर रहे हैं। उनके प्रयासों का नतीजा है कि बिहार की सरकार भी इन मसलों पर काम करने की दिशा में सक्रिय हुई है और पूरे राज्य के जलस्रोतों का परीक्षण कराया गया है।

‘पानी’ एक भविष्योन्मुखी फिल्म है: शेखर कपूर

Author: 
रवीन्द्र त्रिपाठी
Source: 
कल्पतरु एक्सप्रेस, 23 नवंबर 2014
. गोवा का मेरियट होटल मांडवी नदी के किनारे है और यहां की लॉबी में खड़े होकर लगता है कि आप समुद्र के सामने हैं। एक विशाल जल-राशि के सामने अगर ‘पानी’ फिल्म बना रहे शेखर कपूर से बातचीत हो ये सुखद संयोग ही है। शेखर बहुत ही आत्मीय ढंग से बात करते हैं। होटल की लॉबी में मिलते ही कहते हैं अरे ‘मैं अपना मोबाइल अपनी कार में ही भूल गया। लेकर आता हूं’। पेश है शेखर कपूर से रवीन्द्र त्रिपाठी की खास बातचीत।

आपकी फिल्म ‘पानी’ कब बन रही है?


यशराज फिल्मस के पास प्रोजेक्ट है। वे निर्माता हैं और जब वे शुरू करना चाहेंगे तो मैं भी शुरू हो जाऊंगा। चूंकि ये महंगी फिल्म है, सौ-डेढ़ सौ करोड़ की और इसमें कई स्पेशल इफेक्ट होंगे, इसलिए निर्माता को भी कई बातें सोचनी पड़ती है। लेकिन इस फिल्म को लेकर कई वीडियो बना दिए हैं। अगर कल को मैं न भी रहूं तो कोई दूसरा निर्देशक जब इसे हाथ में ले तो उसे पता रहे कि मेरा विजन क्या था।

भावी फिल्म भविष्य में होनेवाले पानी के संकट के बारे में है?


इसमें मोटा-मोटी बात तो ये है कि भविष्य के ऐसे शहर की कल्पना की गई है, जिसमें कुछ लोगों का पानी पर नियंत्रण होगा और बाकी लोगों के पास प्यास। जिनका पानी पर अधिकार होगा वे ऊपरी शहर में रहेंगे और बाकी प्यासे लोग निचले शहर में। जिनके पास पानी होगा, वही शहर पर भी अधिकार रखेंगे। जैसे हमने लोकतंत्र को सिर्फ वोट तंत्र में बदल दिया है, जिस पर कुछ ही लोग काबिज हैं, वैसे ही पानी का मसला भी ताकतवर लोगों के हाथों में फंसता जाएगा। ऊपरी शहर और निचले शहर में संघर्ष होगा, लेकिन जो प्यासे होंगे वे पानी पर अधिकार वालों के हाथों दबाए जाएंगे।

आप क्या पढ़ते हैं?

कारसेवा का करिश्मा : निर्मल कालीबेई

.होशियारपुर के धनोआ गांव से निकलकर कपूरथला तक जाती है 160 किमी लंबी कालीबेई। इसेे कालीबेरी भी कहते हैं। कुछ खनिज के चलते काले रंग की होने के कारण ‘काली’ कहलाई। इसके किनारे बेरी का दरख्त लगाकर गुरुनानक साहब ने 14 साल, नौ महीने और 13 दिन साधना की। एक बार नदी में डूबे, तो दो दिन बाद दो किमी आगे निकले। मुंह से निकला पहला वाक्य था: “न कोई हिंदू, न कोई मुसलमां।’’ उन्होंने ‘जपजीसाहब’ कालीबेईं के किनारे ही रचा। उनकी बहन नानकी भी उनके साथ यहीं रही। यह 500 साल पुरानी बात है।

अकबर ने कालीबेईं के तटों को सुंदर बनाने का काम किया। व्यास नदी इसे पानी से सराबोर करती रही। एक बार व्यास ने जो अपना पाट क्या बदला; अगले 400 साल कालीबेईं पर संकट रहा।

किसान वैज्ञानिक से खास बातचीत

Author: 
कुसुमलता सिंह
Source: 
कुरुक्षेत्र, फरवरी 2011
कुछ लोगों की निगाह में नई चीजों का आविष्कार सिर्फ पढ़े-लिखे लोग ही कर सकते हैं, लेकिन इसी देश में कई ऐसे लोग हैं जो पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन रिसर्च के नाम पर एक बड़ी उपलब्धि है उनके खाते में। ऐसे ही एक कारीगर हैं मदनलाल कुमावत। वे बहुफसली थ्रेशर बनाकर आज भारत ही नहीं दुनियाभर में छाए हुए हैं। उन्हें फोब्स ने प्रमुख शक्तिशाली ग्रामीण भारतीय उद्यमी माना है। राजस्थान के सीकर जिले के छोटे से गांव दांता निवासी मदनलाल को कभी यह अंदाजा ही नहीं था कि वह जो कुछ भी कर रहे हैं वह एक दिन उन्हें विश्व-स्तर पर ख्याति दिलाएगा। बहुफसली थ्रेशर की वजह से उन्हें ब्लॉक से लेकर जिला स्तर तक के कई पुरस्कार दिए जा चुके हैं। 10 नवंबर, 2010 को कृषि भवन में आयोजित कार्यक्रम में कृषि मंत्री ने भी उनका सम्मान किया। आइए, जानते हैं कि मदनलाल कुमावत ने किस तरह से यह उपलब्धि हासिल की। जानते हैं उन्हीं की जुबानी

मदनलाल कुमावत जी आज आपका काम और नाम दुनियाभर में छाया हुआ है। कैसा महसूस कर रहे हैं?
. कहते हैं कि मेहनत से किया गया काम कभी बेकार नहीं जाता है। मैंने मेहनत की। मेरा काम लोगों को पंसद आया और आज जो कुछ भी हूं आप लोगों के सामने हूं। पहले गांव में नाम हुआ, फिर ब्लॉक से जिले में। राज्य में पहचान बनी और फिर देशभर में। अब तो दुनियाभर में मेरा नाम पहुंच गया है। सच कहूं, जब भी मेरे काम की तारीफ होती है मैं गौरवान्वित महसूस करता हूं। इसके लिए पहले भी कई पुरस्कार मिल चुके हैं। जब पता चला कि दुनिया के प्रसिद्ध लोगों के बीच हमारा नाम पहुंच गया है तो निश्चित रूप से बहुत प्रसन्नता हो रही है। मुझे इतनी खुशी है कि उसे बयां नहीं कर सकता।

आप अपने बारे में कुछ बताएं। आपकी शिक्षा कहां तक हुई और किस तरह से आपका यह सफर शुरू हुआ?

सामूहिक प्रयास से सफल हुई पानी की खेती

Author: 
मनोहर कुमार जोशी
Source: 
कुरुक्षेत्र, जुलाई 2012
.राजस्थान के मेवाड़ अंचल में सोलहवीं शताब्दी में तत्कालीन महाराणा राजसिंह ने भीषण अकाल, पेयजल की आपूर्ति, नगर के सौन्दर्यीकरण एवं रोजगार को ध्यान में रखकर राजसमन्द झील का निर्माण कराया था। पिछले तीन दशक में मार्बल खनन एवं प्रसंस्करण उद्योग के कचरे ने झील के जलागम क्षेत्र को अवरुद्ध कर दिया था। नतीजतन यह जलाशय लगभग सूख गया था। ऐसी स्थिति में कछु बुद्धिजीवियों ने झील की सफाई एवं गोमती नदी के जलप्रवाह में अवरोध हटाने का बीड़ा उठाया और वह अभियान बनकर सामने आया। सामूहिक प्रयास से झील में फिर से पानी की आवक हुई।

झील की सफाई में अहम भूमिका अदा करने वाले श्रीमाली किसान, मजदूर और आम आदमी के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए हैं।

राजस्थान के राजसमन्द जिले के मजां गांव में 12 दिसम्बर, 1965 में जन्मे दिनेश श्रीमाली कहते हैं-मुझे अपने नाना स्वतंत्रता सेनानी ओंकारलाल जी से समाज सेवा के संस्कार विरासत में मिले। इन्हीं संस्कारों ने मुझे विश्वप्रसिद्ध राजसमंद झील और गोमती नदी के जलागम क्षेत्र में हुए खनन के विरोध में 1989 में वैचारिक जन-जागरुकता में सक्रिय भागीदारी अदा करने की शक्ति प्रदान की। सफलता के मुकाम तक पहुंचने में आई समस्याओं और कठिनाइयों के बारे में लेखक ने श्री श्रीमाली से बातचीत की।

प्रारंभ में किस तरह की कठिनाइयां आई और लोगों का साथ कैसा रहा।

देखना, रोशनी देने का काम फिर होगा रौशन

जलपुरुष श्री राजेन्द्र सिंह से साक्षात्कार पर आधारित लेख

तरुण भारत संघ अरुण मुझे समझता है और मैं अरुण को समझता हूं। यही वजह है कि उसके और मेरे बीच कई बार..कई बातों को लेकर धुर असहमति के बावजूद मैं जब भी दिल्ली में होता हूं, सबसे पहले उसे याद करता हूं। मुझे अच्छा लगता है कि मेरी राय में सुधार के लिए वह अक्सर बंद किवाड़ों को खोलने का मार्ग अपनाता है। उस दिन भी वह याद दिलाने की कोशिश करता रहा कि डॉक्टरी पढ़ने के बावजूद मैंने गांव में रहकर काम करना पसंद किया।

गांव में भी मैने डॉक्टरी की बजाय, फावड़ा उठाकर जोहड़ खोदने का काम अपनाया। यह सब मैने सहज् भाव से किया। ऐसा करते हुए मुझे कोई डर नहीं लगा। आजकल कोई पढ़-लिखकर वापस गांव में मिट्टी खोदने के काम में लगे, तो अक्सर लोग उसे ‘रिजेक्टिड यूथ’ मानकर सहानुभूति, उपहास या बेकद्री जताएंगे।

दरअसल, अरुण गांवों को लेकर चिंतित था। उसके मन में कई सवाल थे: आजकल पढ़ने-लिखने के बाद नौजवान गांव में क्यों नहीं रहना चाहते? अब कैरियर और पैकेज पर इतना जोर क्यों है?

कितना सुरक्षित है बोतलबंद पानी?

Author: 
के. शेषाद्रि
Source: 
सजग समाचार परिवर्तन, 30 अप्रैल 2014
बूंद-बूंद से मुनाफे का कारोबार
किस हद तक हो रहा बीआईएस नियमों का पालन


. हममें से लगभग सभी लोग पानी खरीदकर पीना पसंद करते हैं क्योंकि हम समझते हैं कि हम ऐसा पानी पी रहे हैं जो हर लिहाज से सेहतमंद है। पानी को बोतल में बंद कर बूंद-बूंद से पैसा कमाने में लगी देशी विदेशी कंपनियों ने भी विज्ञापनों के जरिए लोगों को यह विश्वास दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि वे जो पानी पी रहे हैं वो पूरी तरह से सुरक्षित है। जानकारों का कहना है कि ऐसा नहीं है। हाल के दिनों में कई ब्रांडों के बोतलबंद पानी के नमूनों की जांच में तय मानक से कई गुणा ज्यादा कीटनाशक होने की बात सामने आई है। कई मामलों में तो ये बोतलबंद पानी नलों के पानी से भी खराब साबित हुए हैं। इससे साफ है कि सभी कंपनियां भारतीय मानक ब्यूरों (बीआईएस) के नियमों का पालन नहीं कर रही हैं।

बोतलबंद पानी बनाने में इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डाल रहे हैं। जागरुकता की कमी ने समस्या और बढ़ा दी है। कहीं नल के पानी को बोतलबंद कर मिनरल पानी के नाम पर बेचा जा रहा हो तो कहीं पाउच और बोतलों पर एक्सपायरी डेट तक नहीं है। धड़ल्ले से अमानक स्तर की पाउच और पानी की बोतलों की बिक्री हो रही है। बोतलों में पानी बेचने वाली ज्यादातर कंपनियां भूमि तल या फिर नदी, तालाब आदि से पानी लेती हैं। चिंता की बात तो यह है कि पानी के ये स्रोत पहले से ही कीटनाशक की चपेट में होते हैं। खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ रहा है। सरकार ने पानी की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिए कुछ मापदंड बना रखे हैं। पर सवाल यह उठता है कि क्या कंपनियां इन नियमों का पालन कर रही हैं? अगर नहीं, तो सरकार इस बारे में क्या कर रही है?